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  • गरुड़ पुराण के अनुसार इन तीन विशेष आदतों वाले लोगों के पास नहीं आते यमदूत, सीधे विष्णुदूत कराते हैं उत्तम लोकों की यात्रा

    गरुड़ पुराण के अनुसार इन तीन विशेष आदतों वाले लोगों के पास नहीं आते यमदूत, सीधे विष्णुदूत कराते हैं उत्तम लोकों की यात्रा

    नई दिल्ली । सनातन धर्म ग्रंथों और पौराणिक शास्त्रों में मृत्यु तथा उसके बाद आत्मा की यात्रा को लेकर बेहद गूढ़ और विस्तृत नियम बताए गए हैं। विशेषकर ‘गरुड़ पुराण’ में इंसानी जीवन के अंतिम समय और कर्मों के आधार पर मिलने वाली गतियों का गहन विश्लेषण मिलता है। सामान्य मान्यताओं के अनुसार, जब किसी भी जीवित प्राणी का अंत समय निकट आता है, तो यमराज के दूत अर्थात यमदूत उसकी आत्मा को लेने के लिए पृथ्वी लोक पर आते हैं। गरुड़ पुराण में यमदूतों के स्वरूप को अत्यंत भयानक और पाप कर्म करने वालों के प्रति बेहद क्रूर बताया गया है। परंतु, इसी महापुराण में कुछ ऐसे गोपनीय नियमों का भी उल्लेख मिलता है, जो यह स्पष्ट करते हैं कि तीन विशेष श्रेणी के मनुष्यों के समीप आने की हिम्मत स्वयं यमदूत भी नहीं कर पाते हैं। इन पुण्य आत्माओं को कभी भी यमलोक की यातनाएं नहीं सहनी पड़तीं, बल्कि उनके स्वागत के लिए साक्षात वैकुंठ धाम से भगवान विष्णु के दिव्य पार्षद अवतरित होते हैं।

    मध्य प्रदेश । पौराणिक गरुड़ पुराण के आधिकारिक सिद्धांतों के अनुसार, इस विशिष्ट सूची में पहला स्थान उन परम भक्तों का आता है जो अपना संपूर्ण जीवन ईश्वर की आराधना, नाम सिमरन और आध्यात्मिक चेतना में व्यतीत करते हैं। ऐसे जातकों के मन से मृत्यु का भय पूरी तरह समाप्त हो जाता है। जब इन सांसारिक सासों का अंतिम दौर आता है, तो यमदूत दूर ही रहते हैं और वैकुंठ से आए शांत व चतुर्भुज रूप धारी विष्णुदूत अत्यंत आदरपूर्वक इन पवित्र आत्माओं को अपने दिव्य विमान में बैठाकर परमधाम ले जाते हैं। दूसरी श्रेणी में उन उदारवादी लोगों को रखा गया है जो सदैव निस्वार्थ भाव से दीन-दुखियों, बेसहारा पशु-पक्षियों और बीमारों की सेवा में तत्पर रहते हैं। शास्त्रों के मुताबिक, भूखे को अन्न और प्यासे को पानी देना सबसे बड़ा मानवीय धर्म है। इस प्रकार निरंतर संचित होने वाले पुण्यों के कारण यमराज के दूत ऐसे परोपकारी इंसानों को स्पर्श तक नहीं करते, क्योंकि उनका अधिकार क्षेत्र केवल दूसरों को प्रताड़ित करने वाले अपराधियों तक ही सीमित होता है।

    इसके अतिरिक्त, तीसरी श्रेणी में उन धर्मनिष्ठ मनुष्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है जो जीवन की अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी सत्य, ईमानदारी और न्याय का मार्ग कभी नहीं छोड़ते। अपने माता-पिता की निश्छल सेवा करने वाले और किसी भी जीव का दिल न दुखाने वाले साफ दिल के इंसानों को तपस्वियों के समतुल्य माना गया है। ऐसे सदाचारी लोगों को मृत्यु काल के दौरान तनिक भी शारीरिक या मानसिक कष्ट की अनुभूति नहीं होती है। यमदूत ऐसे महापुरुषों को दूर से ही नमन करते हैं और उनके प्राण बिना किसी पीड़ा के स्वतः ही शरीर त्याग देते हैं, जिसके पश्चात उन्हें सीधे मोक्ष अथवा उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

    गरुड़ पुराण की ये अमूल्य और कल्याणकारी बातें आधुनिक मानव समाज को अपने आचरण व कर्मों को सुधारने का एक बड़ा संदेश देती हैं। शास्त्र यह प्रमाणित करते हैं कि मृत्यु अपरिवर्तनीय सत्य है, परंतु उससे भयभीत होने के स्थान पर यदि मनुष्य लोभ, मोह, ईर्ष्या और छल-कपट से दूरी बना ले, तो उसका अंत समय स्वतः ही सुधर जाता है। बुरे कर्मों में लिप्त रहने वालों के लिए जहां यमदूतों की कठोर यातनाएं निश्चित हैं, वहीं सात्विक और धार्मिक जीवन जीने वाले पुण्यात्माओं को अंततः ईश्वर के चरणों में शाश्वत स्थान प्राप्त होता है।

  • गरुड़ पुराण के पन्नों में छिपा है आपके अगले जन्म का रहस्य; जीवित रहते किए गए कर्म ही तय करते हैं मनुष्य, पशु या पक्षी का शरीर

    गरुड़ पुराण के पन्नों में छिपा है आपके अगले जन्म का रहस्य; जीवित रहते किए गए कर्म ही तय करते हैं मनुष्य, पशु या पक्षी का शरीर

    नई दिल्ली । सनातन धर्म के अठारह पुराणों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण महाग्रंथ गरुड़ पुराण में मनुष्य के जीवन, मृत्यु और उसके पश्चात मिलने वाले अगले जन्म को लेकर कई गूढ़ और चौंकाने वाले तथ्यों का विश्लेषण किया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार, मृत्यु के बाद किसी जीव को कौन सा शरीर प्राप्त होगा, यह कोई आकस्मिक घटना या भाग्य का खेल नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से मनुष्य द्वारा अपने वर्तमान जीवन में किए गए अच्छे और बुरे कर्मों के लेखा-जोखा पर निर्भर करता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि मनुष्य अपने जीवित रहते ही अपने अगले जन्म की पृष्ठभूमि तैयार कर लेता है और उसके वर्तमान कर्म ही यह सुनिश्चित करते हैं कि वह पुनः मानव योनि में आएगा या किसी पशु-पक्षी के रूप में धरती पर जन्म लेगा।

    धार्मिक ग्रंथ के प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार, जो व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवनकाल में सदाचार का पालन करते हैं, निस्वार्थ भाव से दीन-दुखियों की सहायता करते हैं और धर्म के मार्ग से कभी विचलित नहीं होते, उन्हें मृत्यु के उपरांत पुनः मनुष्य जीवन का उपहार मिलता है। ऐसी पुण्यात्माओं को अगले जन्म में संस्कारी, समृद्ध और प्रतिष्ठित परिवारों में जन्म लेने का सुअवसर प्राप्त होता है, जहां उन्हें समाज में उचित मान-सम्मान और तमाम भौतिक सुख-सुविधाएं सुलभ होती हैं। इसके विपरीत, जो लोग जीवन भर केवल लोभ, मोह, छल-कपट, चोरी और दूसरों को प्रताड़ित करने जैसे कृत्य में संलिप्त रहते हैं, उनका अगला जीवन अत्यंत कष्टदायी और दयनीय हो जाता है। ऐसे नकारात्मक आचरण वाले व्यक्तियों को मानव चोले से वंचित होकर विभिन्न पशु-पक्षियों की निकृष्ट योनियों में भटकना पड़ता है।

    गरुड़ पुराण में विभिन्न प्रकार के विशिष्ट अपराधों और पापों के आधार पर मिलने वाले विशिष्ट जन्मों और उनके दंड का भी विस्तृत विवरण दिया गया है। ग्रंथ के अनुसार, जो मनुष्य जीवन भर दूसरों के अन्न की चोरी करता है अथवा छल से किसी के धन को हड़पता है, वह अपने अगले जन्म में चूहा या नेवला बनता है। इसी प्रकार, जो लोग समाज में पूजनीय अपने माता-पिता, गुरुजनों अथवा वयोवृद्ध बुजुर्गों का अनादर और अपमान करते हैं, उन्हें अगले जन्म में कौआ या कोई ऐसा अप्रिय पक्षी बनना पड़ता है जिसे मानव समाज सहज रूप से देखना पसंद नहीं करता। इसके अतिरिक्त, पराई महिलाओं पर कुदृष्टि रखने वाले और अपनों के साथ विश्वासघात करने वाले पुरुषों के लिए गरुड़ पुराण में कठोरतम दंड का प्रावधान है; ऐसे लोग अगले जन्म में भयानक अजगर या रेंगने वाले विषैले जीवों के रूप में धरती पर आते हैं।

    आलस्य और अकर्मण्यता को भी सनातन व्यवस्था में एक बड़ा दोष माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जो लोग पूर्णतः आलसी होते हैं और स्वयं पुरुषार्थ न करके केवल दूसरों की गाढ़ी कमाई पर ऐश करते हैं, वे अगले जन्म में गधा या बैल के रूप में जन्म लेते हैं ताकि वे प्रकृति के नियम के तहत कठिन शारीरिक श्रम का वास्तविक महत्व समझ सकें। इसी क्रम में, जो लोग समाज में अपने ऊंचे पद, सत्ता और बाहुबल के घमंड में चूर होकर असहाय एवं कमजोर वर्गों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें अगले जन्म में हिंसक प्रवृत्ति के पशुओं जैसे शेर या भेड़िए का शरीर प्राप्त होता है, जहां उन्हें स्वयं के अस्तित्व की रक्षा और भोजन के लिए दर-दर भटकना पड़ता है और निरंतर संघर्ष करना पड़ता है।

    मूलतः, गरुड़ पुराण यह दार्शनिक संदेश देता है कि संपूर्ण प्रकृति हर जीव को उसके मूल स्वभाव और आचरण के अनुरूप ही अगला भौतिक शरीर प्रदान करती है। यदि किसी व्यक्ति का आंतरिक स्वभाव हिंसक, क्रूर और तामसी है, तो उसे स्वाभाविक रूप से जानवर का शरीर मिलता है, और यदि वह भीतर से शांत, करुणामयी तथा परोपकारी है, तो वह पुनः मनुष्य का श्रेष्ठ जीवन प्राप्त करता है। यह आध्यात्मिक व्यवस्था मानव को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि उसके वर्तमान आचरण में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रतिपादित की गई है। गरुड़ पुराण का परम संदेश यही है कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभता से मिलता है, इसलिए सांसारिक नफरत और लोभ को त्यागकर प्रेम, दया और धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए क्योंकि मृत्यु के बाद केवल कर्म ही जीव के साथ जाते हैं।