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  • दूषित पानी और GBS सिंड्रोम को मात देकर 67 वर्षीय महिला घर लौटी

    दूषित पानी और GBS सिंड्रोम को मात देकर 67 वर्षीय महिला घर लौटी


    इंदौर । इंदौर भागीरथपुरा की 67 वर्षीय पार्वती कोंडला ने एक ऐसा संघर्ष जीता जिसे देखकर डॉक्टर और परिजन दोनों हैरान हैं। दूषित पानी से फैलने वाले बैक्टीरिया के कारण उनके शरीर में गिलियन-बैरे सिंड्रोम  उत्पन्न हो गया जिसने उनकी नसों को प्रभावित कर लकवा पैदा कर दिया। इस दौरान 36 लोगों की मौत हुई लेकिन पार्वती ने 72 दिनों तक अस्पताल में जिंदगी के लिए जंग लड़ी और अंततः जीत हासिल की।

    28 दिसंबर को पार्वती के पति भेरूलाल कोंडला को उल्टी-दस्त की शिकायत हुई। शुरू में मामूली संक्रमण का अंदेशा था लेकिन जल्द ही दूषित पानी में मौजूद कैम्पीलोबैक्टर जेजुनी बैक्टीरिया ने उनके नर्वस सिस्टम पर हमला कर दिया। उसी दिन पार्वती को स्कीम 78 स्थित विवेक मेमोरियल अस्पताल में भर्ती किया गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें आईसीयू में रेफर किया गया और फिर 2 जनवरी को बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती किया गया।

    GBS सिंड्रोम में शरीर का इम्यून सिस्टम अपनी ही नसों को खत्म कर देता है। देखते ही देखते पार्वती का शरीर लकवाग्रस्त हो गया और किडनियों ने काम करना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने शुरुआती तौर पर बचने की संभावना केवल 3-4 प्रतिशत बताई। इसके बाद उन्हें 16 दिन वेंटिलेटर और 22 दिन ICU में रखा गया। जब फेफड़ों ने साथ छोड़ दिया तो ट्रेकोस्टोमी कर गले में छेद बनाकर सांस लेने का रास्ता बनाया गया। 18 दिन तक पार्वती पूरी तरह बेहोश रहीं।

    भागीरथपुरा का यह मामला शासन की निगरानी में था। केंद्रीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय कई बार अस्पताल पहुंचे और परिवार को ढांढस बंधाया कि वे किसी की बात की चिंता न करें। 72 दिनों के इलाज का खर्च लगभग 19.50 लाख रुपए शासन द्वारा कवर किया गया।

    48 दिन बाद पार्वती को HDU में रेफर किया गया और धीरे-धीरे स्वास्थ्य में सुधार हुआ। 6 मार्च को उनका ट्रेकोस्टोमी सिस्टम बंद किया गया और धीरे-धीरे लिक्विड डाइट शुरू की गई। 9 मार्च को उन्हें डिस्चार्ज किया गया। अब CMHO डॉ. माधव हसानी की टीम उनकी मॉनिटरिंग कर रही है।

    घर लौटने के बाद भी पार्वती की लड़ाई खत्म नहीं हुई। बेटे प्रदीप के अनुसार फिजियोथेरेपिस्ट केयर टेकर और दवाओं का खर्च महीने का 60-70 हजार रुपए आ रहा है। उन्हें दिन में 9 बार लिक्विड डाइट दी जाती है जिसमें 6 बार दूध और प्रोटीन और 3 बार अन्य लिक्विड ट्यूब के जरिए दिए जाते हैं।

    हालांकि घर आने के बाद उन्होंने हाथ उठाना और परिजनों को पहचान कर जवाब देना शुरू कर दिया है पर उनकी रिकवरी अभी भी चल रही है। प्रदीप ने कहा कि डॉक्टरों की मेहनत परिवार की श्रद्धा और मां की इच्छाशक्ति ने उन्हें मौत से वापस लौटाया।

    पार्वती की यह कहानी न सिर्फ जिंदगी की जंग जीतने का उदाहरण है बल्कि लोगों के लिए प्रेरणा भी है कि संकट और मुश्किलें कितनी भी बड़ी हों सही समय पर इलाज परिवार का सहयोग और मजबूत इच्छाशक्ति से हर चुनौती को पार किया जा सकता है।

  • इंदौर में गंदा पानी फैलाता है GBS महामारी, जानें इसका इलाज और बचाव के उपाय

    इंदौर में गंदा पानी फैलाता है GBS महामारी, जानें इसका इलाज और बचाव के उपाय


    इंदौर । इंदौर का भागीरथपुरा इलाका इस समय गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है। दूषित पानी के कारण शुरू हुई उल्टी और दस्त की समस्या अब एक खतरनाक न्यूरोलॉजिकल बीमारी गुइलेन-बैरे सिंड्रोम में बदल चुकी है। यह बीमारी चिकित्सा विशेषज्ञों के लिए भी चिंता का कारण बन गई है क्योंकि इसके इलाज में न सिर्फ जटिलता है बल्कि खर्च भी बहुत ज्यादा है।
    इंदौर त्रासदी के आंकड़े
    अब तक इंदौर प्रशासन ने इस बीमारी से 6 मौतों की पुष्टि की है जबकि स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक यह आंकड़ा 16 तक पहुंच चुका है। लगभग 200 लोग इस संक्रमण की चपेट में आ चुके हैं और 150 से ज्यादा मरीजों का इलाज जारी है। इन मरीजों में से कई को वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत है।
    गुइलेन-बैरे सिंड्रोम GBS क्या है
    चिकित्सकों के मुताबिक गुइलेन-बैरे सिंड्रोम एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति है जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम अपनी ही नसों पर हमला करता है। इसका कारण दूषित पानी से पेट में संक्रमण होना होता है जिससे शुरुआत में उल्टी-दस्त होते हैं। इसके बाद मरीजों को हाथ-पैर में झुनझुनी सुन्नपन और कमजोरी महसूस होती है और स्थिति गंभीर होने पर पैरालिसिस लकवा और सांस लेने में कठिनाई हो सकती है।यदि समय पर इलाज न मिले तो 10% मामलों में यह बीमारी घातक साबित हो सकती है।

    इलाज और खर्च
    GBS का इलाज बेहद महंगा है। एक इंजेक्शन की कीमत लगभग ₹30000 तक होती है और गंभीर मामलों में इलाज का कुल खर्च ₹10 लाख से ₹15 लाख तक पहुंच सकता है। कई मरीजों को 10 या उससे ज्यादा इंजेक्शन और वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत होती है। हालांकि राहत की बात यह है कि अगर इलाज समय पर शुरू किया जाए तो 70% मरीज पूरी तरह से ठीक हो सकते हैं।
    प्रशासन की अपील और बचाव के उपाय
    स्वास्थ्य विभाग ने इस बीमारी के फैलने के कारण दूषित पानी को जिम्मेदार ठहराया है। विशेषज्ञों ने स्थानीय लोगों से अपील की है कि वे पानी उबालकर पियें और खाने-पीने की चीजों में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें। इसके अलावा किसी भी व्यक्ति को यदि हाथ-पैर में कमजोरी झुनझुनी या सुन्नपन महसूस हो तो उसे सामान्य कमजोरी न समझते हुए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
    बचाव के उपाय
    पानी उबालकर पिएं दूषित पानी से बचने के लिए यह सबसे प्रभावी तरीका है।स्वच्छता का ध्यान रखें व्यक्तिगत स्वच्छता और खाने-पीने की चीजों की सफाई पर विशेष ध्यान दें। सावधानी रखें यदि शरीर में कमजोरी या झुनझुनी महसूस हो तो इसे सामान्य न समझें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। इस महामारी से बचाव के लिए प्रशासन पूरी कोशिश कर रहा है और स्थानीय लोग भी जल्द ही इससे उबरने के उपायों को अपनाने के लिए तैयार हैं।