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  • भारत की आर्थिक प्रगति जश्न के काबिल, अगले वर्षों में भी सात प्रतिशत से अधिक विकास की उम्मीद

    भारत की आर्थिक प्रगति जश्न के काबिल, अगले वर्षों में भी सात प्रतिशत से अधिक विकास की उम्मीद

    नई दिल्ली । भारत की आर्थिक प्रगति को पिछले एक दशक की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए शीर्ष अर्थशास्त्री क्युंघून किम ने कहा है कि देश की लगातार मजबूत आर्थिक वृद्धि और बेहतर होती आर्थिक स्थिति भविष्य के लिए आशावाद का आधार प्रदान करती है। उनके अनुसार, भारत के सामने अभी कई चुनौतियां हैं, लेकिन इसके बावजूद देश ने आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने कहा कि मध्यम अवधि में भी भारत के मजबूत विकास की संभावनाएं बनी हुई हैं और यह उपलब्धि सराहना के साथ जश्न मनाने योग्य है।

    क्युंघून किम ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने विचारों में कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति को उसके आकार और आबादी के संदर्भ में समझना जरूरी है। करीब 1.4 अरब लोगों वाले देश के लिए लगातार मजबूत विकास दर हासिल करना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनौतियों के बावजूद भारत की आर्थिक रूप से आगे बढ़ने की क्षमता और आने वाले वर्षों में विकास की संभावनाएं सकारात्मक बनी हुई हैं।

    उनकी यह टिप्पणी भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर वैश्विक संस्थानों के बदले आकलन के बीच आई है। एक दिन पहले उन्होंने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक जैसे प्रमुख वैश्विक संस्थानों ने चालू वर्ष और अगले वर्ष के लिए भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमानों को बढ़ाकर सात प्रतिशत से अधिक कर दिया है। उनके अनुसार, विभिन्न संस्थानों के अनुमानों में हुआ यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और विकास की संभावनाओं को दर्शाता है।

    किम ने कोविड-19 महामारी के बाद भारत की आर्थिक स्थिति में आए सुधार का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, महामारी के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में 5.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। हालांकि, इसके बाद अर्थव्यवस्था ने तेजी से वापसी की और वर्ष 2021 में 9.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। इसके बाद अगले चार वर्षों तक विकास दर सात प्रतिशत से ऊपर बनी रही। इस प्रदर्शन को उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।

    अर्थशास्त्री ने कहा कि लगातार बेहतर होते आर्थिक आंकड़ों के कारण उन्हें और कई अन्य अर्थशास्त्रियों को अपनी विकास दर संबंधी भविष्यवाणियों में बार-बार संशोधन करना पड़ा। हर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़े उम्मीदों से बेहतर रहे। इसके परिणामस्वरूप भारत ने लगातार पांच वर्षों तक सात प्रतिशत से अधिक की आर्थिक वृद्धि दर्ज की। उनके मुताबिक, यह प्रदर्शन वर्ष 2003 से 2007 के उस दौर की याद दिलाता है, जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ था।

    किम ने वर्ष 2021 से 2025 के बीच भारत की औसत वार्षिक विकास दर 7.83 प्रतिशत रहने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1960 के बाद किसी भी पांच वर्षीय अवधि में यह दूसरी सबसे ऊंची औसत वृद्धि दर है। इससे अधिक औसत वृद्धि केवल वर्ष 2003 से 2007 के दौरान दर्ज की गई थी, जब यह आंकड़ा 7.89 प्रतिशत रहा था। इस तुलना के जरिए उन्होंने भारत की हालिया आर्थिक वृद्धि के महत्व को रेखांकित किया।

    भारत की अर्थव्यवस्था के आकार में आए बदलाव को भी किम ने अहम बताया। उनके अनुसार, वर्ष 2007 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार एक ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा अधिक था, जबकि अब यह चार ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच रही है। इसका अर्थ है कि आज समान विकास दर से होने वाला आर्थिक विस्तार दो दशक पहले की तुलना में कहीं बड़े पैमाने पर मूल्य सृजन करता है। किम ने कहा कि भारत की पिछले दशक की प्रगति और मध्यम अवधि में मजबूत विकास की संभावनाएं महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि देश के सामने चुनौतियां बनी हुई हैं।

  • त्योहारों से पहले चीनी की बिक्री बढ़ाने की छूट, भारत की जीडीपी वृद्धि 7.3 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान

    त्योहारों से पहले चीनी की बिक्री बढ़ाने की छूट, भारत की जीडीपी वृद्धि 7.3 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान

    नई दिल्ली ।त्योहारी सीजन में बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने चीनी मिलों को अतिरिक्त बिक्री की अनुमति दी है। इस फैसले के तहत मिलें अक्टूबर 2026 में उत्पादित चीनी को अक्टूबर और नवंबर, दोनों महीनों में बेच सकेंगी। यह बिक्री उनके नियमित मासिक कोटे के अतिरिक्त होगी। सरकार के इस कदम का उद्देश्य त्योहारों के दौरान बाजार में आपूर्ति को सुचारू बनाए रखना और मांग के अनुरूप चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

    खाद्य मंत्रालय ने चीनी मिलों को जारी निर्देश में अक्टूबर में उत्पादित चीनी की दोनों महीनों में बिक्री की अनुमति दी है। सामान्य मासिक आवंटन के अलावा अतिरिक्त मात्रा बेचने की छूट से बाजार में आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है। त्योहारों के दौरान चीनी की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है। हालांकि, इस अतिरिक्त बिक्री की अनुमति से बाजार में कीमतों पर कितना असर पड़ेगा, इसकी जानकारी उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।

    इस बीच, भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को लेकर भी सकारात्मक अनुमान सामने आया है। डेलॉयट इंडिया के आकलन के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि दर 7.1 से 7.3 प्रतिशत के बीच रह सकती है। इस अनुमान के पीछे निजी निवेश में सुधार को एक प्रमुख कारण बताया गया है। निजी क्षेत्र की ओर से निवेश बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों और बाजार की मांग को अतिरिक्त समर्थन मिलने की उम्मीद है।

    आकलन के मुताबिक, अगले वित्त वर्ष 2027-28 में भी भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर मजबूत रह सकती है, हालांकि इसके कुछ धीमी रहने का अनुमान है। इस अवधि में जीडीपी वृद्धि दर 6.6 से 7 प्रतिशत के बीच रहने की संभावना जताई गई है। यह अनुमान दर्शाता है कि आने वाले वित्त वर्षों में भी आर्थिक विस्तार जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन विकास की वास्तविक गति कई घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

    आर्थिक विकास के सामने कुछ जोखिम भी बताए गए हैं। इनमें भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में आने वाली बाधाएं शामिल हैं। ऊर्जा की कीमतों में तेजी से उत्पादन और परिवहन की लागत प्रभावित हो सकती है। वहीं, वैश्विक व्यापार में रुकावटों का असर वस्तुओं की आपूर्ति और कारोबारी गतिविधियों पर पड़ सकता है। इन परिस्थितियों के कारण आर्थिक विकास के अनुमान में बदलाव की संभावना बनी रहती है।

    इसी बीच, केंद्र सरकार ने वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो यानी एफएसआईबी का नए सिरे से गठन किया है। पूर्व सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के सचिव एससीएल दास को ब्यूरो का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। उनका कार्यकाल अधिसूचना जारी होने की तारीख से तीन साल का होगा। एफएसआईबी सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों में शीर्ष पदों पर नियुक्तियों के लिए सिफारिशें करता है। इस संस्था की भूमिका वित्तीय क्षेत्र में वरिष्ठ पदों पर चयन प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

    नए अध्यक्ष के साथ ब्यूरो में छह सदस्य भी शामिल किए गए हैं। इनमें भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक अरिजीत बसु, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व निदेशक सतीश काशीनाथ मराठे और पूर्व कार्यकारी निदेशक रमनाथन सुब्रमणियन शामिल हैं। इनके अलावा भारतीय जीवन बीमा निगम के पूर्व प्रमुख सिद्धार्थ मोहंती, न्यू इंडिया एश्योरेंस की पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक नीरजा कपूर और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण की पूर्व सदस्य टीएल अलामेलु को भी सदस्य बनाया गया है।

    इस प्रकार, त्योहारी मांग को ध्यान में रखते हुए चीनी की अतिरिक्त बिक्री की अनुमति, आर्थिक विकास के अनुमान और वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो के नए गठन से जुड़े फैसले एक साथ सामने आए हैं। चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उठाया गया कदम निकट अवधि की बाजार मांग से जुड़ा है, जबकि जीडीपी वृद्धि के अनुमान और एफएसआईबी में नियुक्तियां अर्थव्यवस्था तथा वित्तीय संस्थानों से संबंधित व्यापक घटनाक्रम हैं।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच तेजी से बढ़ रही भारत की अर्थव्यवस्था 7% रहेगी GDP ग्रोथ

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच तेजी से बढ़ रही भारत की अर्थव्यवस्था 7% रहेगी GDP ग्रोथ


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अर्थव्यवस्था (Economy) वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी मजबूत वृद्धि दर्ज कर सकती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) ने वर्ष 2026 और 2027, दोनों में भारत की GDP ग्रोथ 7 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। इसके मुकाबले वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर 2026 में 3.1 फीसदी और 2027 में 3.4 प्रतिशत रहने की संभावना है। हालांकि, ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें, सरकारी कर्ज और वित्तीय जोखिम दुनिया की अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

    IMF ने AI में बढ़ते निवेश को ग्लोबल ग्रोथ के संभावित सहारे के रूप में देखा है। कंप्यूटिंग हार्डवेयर, डेटा सेंटर और AI तकनीक पर खर्च बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल रहा है। लंबे समय में यह तकनीक उत्पादकता बढ़ाने, कामकाज की लागत घटाने और कारोबार की दक्षता सुधारने में मदद कर सकती है।


    मूडीज, एसएंडपी, वर्ल्ड बैंक और फिच भी बढ़ा चुके हैं अनुमान

    इससे पहले मूडीज रेटिंग्स, उसके बाद एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स और विश्व बैंक (World Bank) ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर अपना अनुमान बढ़ा चुके हैं। वर्ल्ड बैंक ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP ग्रोथ 7.1% रहने का अनुमान जताया है। इससे पहले इसने भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.6% रहने का अनुमान लगाया था।

    पिछले महीने मूडीज ने भी जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 1 प्रतिशत बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया, जबकि एसएंडपी ने अपने अनुमान में 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की। फिच ने भी पिछले महीने भारत के ग्रोथ का अनुमान 6.4 से 6.9% किया था।


    IMF ने चेताया

    IMF के मुताबिक, वैश्विक अर्थव्यवस्था अब तक लगातार आर्थिक झटकों के बावजूद मजबूती से आगे बढ़ी है, लेकिन यह मजबूती पहले के मुकाबले अधिक नाजुक और असमान होती जा रही है। IMF ने चेतावनी दी है कि एनर्जी सप्लाई में रुकावटें लंबे समय तक बनी रहीं तो आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में निवेश से उत्पादकता बढ़ने और आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है।


    दुनिया के मुकाबले भारत की ग्रोथ दोगुने से ज्यादा

    IMF के अनुमान के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 2026 और 2027 में 7 फीसदी रह सकती है। वहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर इन वर्षों में क्रमशः 3.1 फीसदी और 3.4 फीसदी रहने का अनुमान है। इस तरह भारत की अनुमानित वृद्धि दर वैश्विक औसत से दोगुने से भी अधिक है।


    दुनिया के मुकाबले भारत की ग्रोथ दोगुने से ज्यादा

    IMF के अनुमान के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था की विकास दर 2026 और 2027 में 7 प्रतिशत रह सकती है। वहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर इन वर्षों में क्रमशः 3.1 प्रतिशत और 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इस तरह भारत की अनुमानित वृद्धि दर दुनिया के औसत से दोगुने से भी अधिक है।


    दुनिया की ग्रोथ 2027 में 3.4% रहने का अनुमान

    IMF के अनुसार, ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ रेट 2026 में 3.1 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। 2027 में इसके बढ़कर 3.4 प्रतिशत होने का अनुमान है। हालांकि, यह वृद्धि वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद जोखिमों को पूरी तरह दूर नहीं करती। फंड का कहना है कि कंपनियां बार-बार आने वाले आर्थिक झटकों के अनुसार खुद को ढाल रही हैं। दूसरी ओर, तकनीकी कंपनियों में निवेश की तेजी ने वित्तीय बाजारों को उम्मीद दी है, लेकिन बाजारों में जोखिमों को कम करके आंकने की आशंका भी बनी हुई है।

  • भारतीय शेयर बाजार में फिर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद, अगले वित्त वर्ष में कॉरपोरेट आय 17 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान

    भारतीय शेयर बाजार में फिर बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद, अगले वित्त वर्ष में कॉरपोरेट आय 17 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार इस साल डॉलर के लिहाज से 15.6 प्रतिशत गिरावट के बावजूद अन्य क्षेत्रीय बाजारों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। अगले वित्त वर्ष में कंपनियों की आय में 17 प्रतिशत तक वृद्धि होने का अनुमान है। बाजार में गिरावट के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि, बैंक ऋण, कॉरपोरेट कर्ज और मशीनरी आयात से जुड़े आंकड़े आर्थिक गतिविधियों में मजबूती के संकेत दे रहे हैं। इन संकेतकों के आधार पर भारतीय बाजार की संभावनाओं को लेकर सकारात्मक अनुमान जताया गया है।

    एक वैश्विक इक्विटी रणनीति रिपोर्ट में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के बाजारों में भारत को अपेक्षाकृत अधिक हिस्सेदारी देने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट तैयार करने वाले जेफरीज के इक्विटी रणनीति विभाग के ग्लोबल प्रमुख क्रिस वुड ने एमएससीआई एशिया पैसिफिक, जापान को छोड़कर, इंडेक्स में भारत के लिए 12 प्रतिशत आवंटन की सिफारिश की। इस इंडेक्स में भारत का भार 10.5 प्रतिशत है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय बाजार में गिरावट के बावजूद देश की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि की संभावनाएं बनी हुई हैं और उपलब्ध आर्थिक आंकड़े भी मजबूत स्थिति दर्शाते हैं।

    स्थानीय मुद्रा में निफ्टी इस साल 13.4 प्रतिशत नीचे है। इस प्रदर्शन के आधार पर इंडोनेशिया के बाद भारतीय बाजार क्षेत्र के कमजोर प्रदर्शन करने वाले बाजारों में दूसरे स्थान पर है। इंडोनेशिया के बाजार में इस अवधि के दौरान 42.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। डॉलर के आधार पर भारतीय बाजार की गिरावट 15.6 प्रतिशत बताई गई है। इसके बावजूद रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की संरचनात्मक विकास की कहानी बरकरार है। इस आकलन में आर्थिक वृद्धि और कंपनियों की आय में संभावित बढ़ोतरी को महत्वपूर्ण माना गया है।

    रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.5 से 7 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान जताया गया है। वहीं, नाममात्र जीडीपी वृद्धि दर 11 से 12 प्रतिशत रहने की संभावना बताई गई है। कॉरपोरेट आय के मामले में चालू वित्त वर्ष के दौरान 14 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है, जबकि अगले वित्त वर्ष में यह दर बढ़कर 17 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। कंपनियों की आय में संभावित तेजी शेयर बाजार के प्रदर्शन के लिए अहम संकेतक मानी जा रही है। हालांकि, ये आंकड़े अनुमान हैं और वास्तविक वृद्धि आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।

    बैंकिंग क्षेत्र के आंकड़ों में भी ऋण गतिविधियों में बढ़ोतरी दिखाई गई है। सितंबर के मध्य तक बैंक ऋण में सालाना आधार पर 18.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। अगस्त में कॉरपोरेट ऋण 21.6 प्रतिशत बढ़ा, जबकि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई को दिए गए कर्ज में 25.5 प्रतिशत का इजाफा हुआ। इसी अवधि में जमा राशि 17.3 प्रतिशत बढ़ी। रिपोर्ट के अनुसार, कॉरपोरेट ऋण में यह वृद्धि इस संभावना की ओर संकेत करती है कि निजी क्षेत्र में लंबे समय से प्रतीक्षित पूंजीगत व्यय का चक्र शुरू हो सकता है।

    मशीनरी आयात के आंकड़े भी निवेश गतिविधियों में बदलाव का संकेत देते हैं। अगस्त में समाप्त 12 महीनों के दौरान भारत का मशीनरी आयात 66 अरब डॉलर रहा। वित्त वर्ष 2021 में यह आंकड़ा 29 अरब डॉलर था। इसके अलावा, रिपोर्ट में भारतीय रुपये को लेकर भी आकलन प्रस्तुत किया गया है। क्रिस वुड के मुताबिक, वर्ष 2025 की शुरुआत से 10.7 प्रतिशत गिरावट के बाद रुपया संभवतः अपने निचले स्तर पर पहुंच गया है। इन आर्थिक संकेतकों के आधार पर रिपोर्ट में भारतीय शेयर बाजार के लिए अन्य क्षेत्रीय बाजारों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन की संभावना जताई गई है।

  • आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 का जीडीपी अनुमान 7.1 प्रतिशत पर रखा, महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता

    आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 का जीडीपी अनुमान 7.1 प्रतिशत पर रखा, महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली ।
    भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 7.1 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं और महंगाई से जुड़े जोखिमों के बावजूद घरेलू आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। केंद्रीय बैंक ने आर्थिक वृद्धि को लेकर भरोसा जताया है, लेकिन बढ़ती महंगाई और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को लेकर सतर्क रुख अपनाया है।

    आरबीआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। दूसरी तिमाही के लिए 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही के लिए 6.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही के लिए 6.8 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी आर्थिक वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। आरबीआई के मुताबिक घरेलू मांग और निवेश गतिविधियां आर्थिक वृद्धि को समर्थन दे रही हैं।

    गवर्नर ने बताया कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में कारोबारी गतिविधियां विस्तार की स्थिति में हैं। दूसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज पीएमआई वृद्धि क्षेत्र में बने रहे, हालांकि पिछली तिमाही की तुलना में इनकी गति कुछ धीमी हुई है। केंद्रीय बैंक का आकलन है कि घरेलू मांग, निवेश, सेवाओं की मजबूती और विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार अर्थव्यवस्था को आगे भी सहारा दे सकते हैं।

    महंगाई के मोर्चे पर आरबीआई ने खाद्य कीमतों में बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जताई है। गवर्नर के अनुसार खाद्य मुद्रास्फीति का दबाव अब व्यापक रूप ले रहा है और चीनी तथा प्याज जैसी वस्तुओं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अगस्त में खाद्य और ईंधन महंगाई दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसमें आधार प्रभाव की भी भूमिका रही। आरबीआई महंगाई की स्थिति पर नजर रखने के लिए महंगाई अपेक्षाओं, कंपनियों के मूल्य निर्धारण व्यवहार, कोर इन्फ्लेशन और अन्य आर्थिक संकेतकों का आकलन कर रहा है।

    केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के साथ अन्य प्रमुख दरों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी दर को 5.25 प्रतिशत और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी दर तथा बैंक रेट को 5.75 प्रतिशत किया गया है। वैश्विक स्तर पर भी महंगाई के दबाव बढ़ने की आशंका के बीच प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा मौद्रिक नीति को सख्त किए जाने का उल्लेख किया गया है। पश्चिम एशिया में तनाव और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम भी वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम माने जा रहे हैं।

    व्यापार के मोर्चे पर भारत का व्यापार घाटा जुलाई और अगस्त में बढ़कर 58.7 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 55.1 अरब डॉलर था। आरबीआई के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक सामान और कच्चे तेल के आयात ने इसमें भूमिका निभाई। वैश्विक व्यापार वृद्धि में नरमी, ऊंची ऊर्जा कीमतें और व्यापार नीति से जुड़ी अनिश्चितताएं चालू खाते के घाटे के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं।

    वहीं वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 13.8 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 9.6 अरब डॉलर से अधिक है। महंगाई के निकट भविष्य के परिदृश्य को लेकर आरबीआई ने दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी, अल नीनो की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को आपूर्ति पक्ष के दबाव के प्रमुख कारणों में शामिल किया है। पूरे वित्त वर्ष में सीपीआई महंगाई 5.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत, तीसरी में 6 प्रतिशत और चौथी में 5.7 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है।

  • विश्व बैंक ने भारत की जीडीपी वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया, घरेलू मांग और सेवाओं से मजबूत रहेगी अर्थव्यवस्था

    विश्व बैंक ने भारत की जीडीपी वृद्धि का अनुमान बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत किया, घरेलू मांग और सेवाओं से मजबूत रहेगी अर्थव्यवस्था

    नई दिल्ली: विश्व बैंक ने भारत की आर्थिक विकास दर को लेकर अपना अनुमान बढ़ा दिया है। ताजा साउथ एशिया इकोनॉमिक अपडेट रिपोर्ट में विश्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। रिपोर्ट में भारत की अर्थव्यवस्था की मजबूती के पीछे मजबूत घरेलू मांग, औद्योगिक गतिविधियों में विस्तार और सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूती को प्रमुख आधार बताया गया है। वैश्विक स्तर पर मौजूद अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की विकास गति मजबूत बनी रहने की बात कही गई है।

    विश्व बैंक के अनुसार, भारत की दीर्घकालिक विकास संभावनाओं को पिछले वर्षों में लागू किए गए कई महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधारों से मजबूती मिली है। इनमें श्रम संहिताओं का एकीकरण, वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी सुधार, टैरिफ युक्तिकरण और दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता शामिल हैं। इसके अलावा भौतिक और डिजिटल अवसंरचना में बड़े निवेश को भी अर्थव्यवस्था की विकास क्षमता को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया गया है। इन सुधारों के बीच घरेलू मांग को आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख आधार माना गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन व्यापक अर्थव्यवस्था में मौजूद मजबूती भारत को मौजूदा वित्त वर्ष में मजबूत विकास दर बनाए रखने में मदद कर सकती है। घरेलू मांग लगातार आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे रही है और इसे भारत की अर्थव्यवस्था की प्रमुख ताकतों में शामिल किया गया है। औद्योगिक गतिविधियों में विस्तार और सेवा क्षेत्र की मजबूती भी आर्थिक वृद्धि को समर्थन दे रही है। हालांकि, आने वाले महीनों में कुछ बाहरी और मौसम संबंधी जोखिम विकास तथा महंगाई प्रबंधन के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं।

    विश्व बैंक ने ऊंची ऊर्जा कीमतों और अल नीनो से जुड़े प्रतिकूल मौसमीय प्रभावों को प्रमुख जोखिमों में शामिल किया है। भारत कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है, इसलिए ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। वहीं, अल नीनो से जुड़े प्रतिकूल मौसम का असर कृषि क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है। कृषि क्षेत्र पर दबाव का प्रभाव उन लोगों की आजीविका पर भी पड़ सकता है, जिनके लिए खेती आय का प्रमुख स्रोत है।

    दक्षिण एशिया के व्यापक आर्थिक परिदृश्य में भी विश्व बैंक ने वर्ष 2026 के लिए क्षेत्र की विकास दर का अनुमान बढ़ाया है। पहले 6.3 प्रतिशत के अनुमान के मुकाबले अब क्षेत्र की विकास दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार, इस बदलाव में भारत के अपेक्षा से बेहतर आर्थिक प्रदर्शन की प्रमुख भूमिका है। हालांकि, भारत को छोड़कर दक्षिण एशिया के बाकी देशों की विकास दर का अनुमान 4.1 प्रतिशत से घटाकर 3.6 प्रतिशत कर दिया गया है। इस कटौती का मुख्य कारण बांग्लादेश की विकास दर के अनुमान में की गई बड़ी कमी बताई गई है।

  • भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत

    भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत


    नई दिल्ली ।भारत वित्त वर्ष 2026-27 में 6.7 प्रतिशत की अनुमानित GDP वृद्धि के साथ दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे मजबूत विकास संभावनाओं वाले देशों में बना हुआ है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सितंबर 2026 की चीफ इकोनॉमिस्ट्स आउटलुक रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के पीछे घरेलू मांग को प्रमुख आधार बताया गया है।

    रिपोर्ट में अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, भारत समेत दुनिया के 10 प्रमुख क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति का आकलन किया गया है। इसके लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से जुड़े 92 मुख्य अर्थशास्त्रियों की राय ली गई।

    भारत को लेकर विशेषज्ञों का भरोसा मई की तुलना में बढ़ा है। सितंबर की रिपोर्ट में 74 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों ने भारत में मजबूत या बहुत मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद जताई है। मई में यह आंकड़ा 52 प्रतिशत था। वहीं 98 प्रतिशत विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 12 महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि कम से कम मध्यम स्तर या उससे बेहतर रह सकती है।

    रिपोर्ट में रोजगार की स्थिति को लेकर अपेक्षाकृत स्थिर तस्वीर सामने आई है। करीब 70 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों को अगले एक वर्ष में बेरोजगारी दर में कोई बड़ा बदलाव होने की उम्मीद नहीं है। हालांकि 17 प्रतिशत विशेषज्ञ बेरोजगारी बढ़ने और 13 प्रतिशत इसमें कमी आने का अनुमान लगा रहे हैं।

    आंकड़ों के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की बेरोजगारी दर जुलाई में 5.1 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 5 प्रतिशत रह गई। इसी दौरान श्रम बल भागीदारी दर 55.4 प्रतिशत से बढ़कर 55.6 प्रतिशत हो गई।

    रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े मजबूत आर्थिक गतिविधियों के बीच श्रम बाजार के अपेक्षाकृत स्थिर रहने का संकेत देते हैं। हालांकि रोजगार के नए अवसर पैदा करने की गति बनाए रखना अभी भी महत्वपूर्ण माना गया है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी विशेषज्ञों की चिंता मई के मुकाबले कम हुई है। अगले 12 महीनों को लेकर 55 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने मध्यम महंगाई की संभावना जताई है, जबकि 45 प्रतिशत ने उच्च महंगाई की आशंका व्यक्त की है। मई में 61 प्रतिशत विशेषज्ञ उच्च या बहुत उच्च महंगाई को लेकर चिंतित थे।

    अगस्त में CPI आधारित खुदरा महंगाई 4.8 प्रतिशत रही। यह भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर है, लेकिन 2 से 6 प्रतिशत के निर्धारित दायरे में बनी हुई है।

    मौद्रिक नीति को लेकर 67 प्रतिशत विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। वहीं 24 प्रतिशत विशेषज्ञों ने नीति के और सख्त होने की संभावना जताई है। अगस्त में RBI ने नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखते हुए तटस्थ रुख कायम रखा था।

    राजकोषीय नीति को लेकर भी 72 प्रतिशत विशेषज्ञों ने बड़े बदलाव की संभावना नहीं जताई। करीब 22 प्रतिशत ने कुछ नरम रुख अपनाए जाने की संभावना व्यक्त की।

    रिपोर्ट का सर्वेक्षण 20 अगस्त को पूरा हुआ था। इसके बाद 31 अगस्त को जारी पहली तिमाही के GDP आंकड़ों में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। इस प्रदर्शन के बाद कई वैश्विक संस्थानों ने भारत के विकास अनुमान में बदलाव किया है।

    मूडीज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP वृद्धि का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जैसी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है।

  • फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…

    फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…


    नई दिल्ली। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल फ्रांस पर बढ़ता सार्वजनिक कर्ज चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते प्रभावी वित्तीय सुधार नहीं किए, तो आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में आ सकती है। बढ़ती उधारी लागत और राजनीतिक अनिश्चितता को लेकर निवेशकों और अर्थशास्त्रियों ने भी चिंता जताई है।

    फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज फिलहाल करीब 3.5 ट्रिलियन यूरो तक पहुंच चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियों के कारण राजकोषीय सुधारों की संभावना कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में कर्ज का बोझ और बढ़ने का जोखिम बना हुआ है।

    ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ से बढ़ सकती है मुश्किल
    अर्थशास्त्रियों ने फ्रांस के सामने ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ का खतरा बताया है। इसका मतलब ऐसी स्थिति से है, जब सरकारी बॉन्ड पर चुकाई जाने वाली ब्याज दर आर्थिक विकास की गति से अधिक हो जाती है। इससे सरकार का कर्ज लगातार बढ़ता जाता है और अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में उसका बोझ तेजी से बढ़ने लगता है। यदि सरकार लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष (प्राइमरी सरप्लस) हासिल नहीं कर पाती, तो इस स्थिति से बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो सकता है।

    2050 तक GDP के 203% तक पहुंच सकता है कर्ज
    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मौजूदा हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ तो फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज वर्ष 2050 तक उसकी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 203 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह चेतावनी आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के महासचिव मैथियास कोरमैन के हालिया बयान के आधार पर दी गई है। अनुमान है कि वर्ष 2029 तक केवल ब्याज भुगतान का खर्च ही लगभग 100 अरब यूरो तक पहुंच सकता है।

    निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों की बढ़ी चिंता
    क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सारा कार्लसन ने भी कहा है कि सार्वजनिक कर्ज पर बढ़ता ब्याज भुगतान फ्रांस के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक बन सकता है। वहीं निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली ने वित्तीय जोखिमों का हवाला देते हुए अपने ग्राहकों को फ्रांसीसी सरकारी कर्ज में निवेश कम करने की सलाह दी है।

    कोविड के बाद भी कम नहीं हुआ कर्ज
    आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष की पहली तिमाही में फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज 3.5 ट्रिलियन यूरो (करीब 4 ट्रिलियन डॉलर) से अधिक हो गया, जो देश की GDP का 117.5 प्रतिशत है। फ्रांस की ऑडिट संस्था कोर्ट डेस कॉम्प्टेस के मुताबिक यह स्तर कोविड-19 महामारी के दौरान बने रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है। संस्था का कहना है कि यूरोजोन में फ्रांस ऐसा प्रमुख देश है, जिसने महामारी के बाद अपने कर्ज के बोझ को उल्लेखनीय रूप से कम नहीं किया।

    ब्याज भुगतान बना सबसे बड़ा खर्च
    वर्ष 2025 में फ्रांस ने अपने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए करीब 66 अरब यूरो खर्च किए, जो शिक्षा और रक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के बजट से भी अधिक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2029 तक यह राशि बढ़कर 100 अरब यूरो तक पहुंच सकती है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तेज आर्थिक विकास या लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष के जरिए इस संकट से बाहर निकला जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसे संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट डेस कॉम्प्टेस की वरिष्ठ अधिकारी कैरिन कैम्बी ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो फ्रांस कर्ज के ब्याज के बढ़ते बोझ तले दब सकता है और इस स्थिति से बाहर निकलने में कई वर्ष लग सकते हैं।

    चुनाव से पहले बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
    बढ़ता सार्वजनिक कर्ज अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले फ्रांस की राजनीति का भी अहम मुद्दा बन गया है। प्रमुख सेंट्रिस्ट नेता एडुआर्ड फिलिप और गैब्रियल अट्टल ने इसे अपने चुनावी एजेंडे का प्रमुख हिस्सा बनाया है। वहीं सांसद केविन मौविएक्स का कहना है कि कर्ज का बढ़ता स्तर गंभीर चेतावनी है और यदि सुधार में देर की गई तो इसके परिणाम और अधिक गंभीर हो सकते हैं।

  • GDP केवल आंकड़ों का खेल नहीं… लोगों की जिंदगी पर पड़ता है इसका सीधा असर

    GDP केवल आंकड़ों का खेल नहीं… लोगों की जिंदगी पर पड़ता है इसका सीधा असर


    नई दिल्ली।
    जीडीपी (GDP) किसी देश की सीमाओं के भीतर एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक वर्ष या तिमाही) में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य है। यह अर्थव्यवस्था (Economy) के आकार और स्वास्थ्य को दर्शाती है। जीडीपी सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं होता। इसका सीधा और अप्रत्यक्ष असर नौकरी (Jobs), महंगाई (Inflation), आमदनी (Income), कर्ज (Debt), टैक्स (Taxes) और सरकारी सुविधाओं (Government services) पर पड़ता है।


    1. रोजगार और नौकरी के मौके

    ऊंची जीडीपी ग्रोथ (7% या उससे ज्यादा) का मतलब है कि अर्थव्यवस्था में गतिविधियां तेज हैं। इससे नई नौकरियां बनती हैं, खासकर निर्माण, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, आईटी और सर्विस सेक्टर में। कम ग्रोथ होने पर कंपनियां भर्ती रोकती हैं या छंटनी करती हैं। नौकरी मिलने की संभावना बढ़ती है, वेतन वृद्धि बेहतर हो सकती है।


    2. महंगाई और खर्च

    तेज जीडीपी से मांग बढ़ती है, जिससे कभी-कभी महंगाई का दबाव भी आता है। अगर विकास दर संतुलित रहे, तो आपूर्ति बढ़ने से महंगाई काबू में रहती है। आम आदमी के लिए बहुत तेज विकास दर का मतलब महंगाई का खतरा होती है वहीं इसकी धीमी रफ्तार से आमदनी पर असर होता है। इसका मध्यम और स्थिर विकास सबसे बेहतर होता है।


    3. आपकी आमदनी और व्यापार

    अच्छी जीडीपी दर से छोटे कारोबार, दुकानदार, ट्रांसपोर्ट, होटल और सर्विस सेक्टर को फायदा होता है। ग्रामीण इलाकों में बेहतर विकास का मतलब कृषि से जुड़े रोजगार और आमदनी में सुधार होता है। आम आदमी के लिए बेहतर है काम-धंधा चलता है, आमदनी बढ़ने की उम्मीद बनती है।


    4. कर्ज, ईएमआई और ब्याज दर

    अगर जीडीपी दर मजबूत और महंगाई काबू में हो, तो आरबीआई ब्याज दरें घटा सकता है। इससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन सस्ते होते हैं। ईएमआई कम हो सकती है, नया कर्ज लेना आसान होता है।


    5. सरकार की कमाई और योजनाएं

    ज्यादा जीडीपी दर से सरकार को ज्यादा टैक्स राजस्व मिलता है। इससे सड़क, अस्पताल, स्कूल, सब्सिडी और सामाजिक योजनाओं पर खर्च बढ़ सकता है। आम आदमी के लिए बेहतर सरकारी सेवाएं तैयार होती हैं और योजनाओं का लाभ मिलता है।


    6. शेयर बाजार और निवेश

    अच्छी जीडीपी दर के अनुमान से शेयर बाजार में तेजी आती है। म्यूचुअल फंड, पीएफ और रिटायरमेंट फंड पर सकारात्मक असर पड़ता है। आम आदमी के लिए निवेश से बेहतर रिटर्न की संभावनाएं बनती हैं।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था नए साल भी तेज रफ्तार से बढ़ेगी…. जीडीपी 6.7% रहने का अनुमान

    भारतीय अर्थव्यवस्था नए साल भी तेज रफ्तार से बढ़ेगी…. जीडीपी 6.7% रहने का अनुमान


    नई दिल्ली।
    वैश्विक आर्थिक विकास (Global Economic Development) के स्थिर रहने की उम्मीद के बीच अगले साल भी भारत (India) तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं (Indian Economy Grow at Faster) में से एक बना रहेगा। गोल्डमैन सैश (Goldman Sachs) के अनुसार, 2026 में वैश्विक विकास दर के 2.8 फीसदी रहने का अनुमान है। यह 2.5 फीसदी के आम सहमति अनुमान से अधिक है। यह कई अर्थव्यवस्थाओं में स्थिर महंगाई और आसान मौद्रिक स्थितियों के कारण संभव हो पा रहा है।

    रिपोर्ट में कहा गया है, टैरिफ में कमी, कर कटौती और आसान वित्तीय स्थितियों के कारण अमेरिका का प्रदर्शन काफी बेहतर रहने की संभावना है। मजबूत घरेलू मांग और अनुकूल संरचनात्मक रुझानों के कारण भारत सहित उभरते बाजारों का प्रदर्शन विकसित देशों से बेहतर रहने की उम्मीद है। इस दौरान भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर लगभग 6.7 फीसदी और 2027 में 6.8 फीसदी रह सकती है। यह आम सहमति के विकास अनुमानों से अधिक है और भारत को तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनाए रखता है।


    अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं में कम होगा मूल्य का दबाव

    गोल्डमैन सैश का अनुमान है कि कमोडिटी की कम कीमतों, बेहतर उत्पादकता और आपूर्ति पक्ष की बाधाओं में कमी से 2026 के अंत तक अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं में मूल्य दबाव कम हो जाएगा। इस माहौल से कई उभरते बाजारों के केंद्रीय बैंकों को उदार नीतिगत रुख बनाए रखने या अपनाने की अनुमति मिलने की संभावना है, जो भारत जैसे देशों के लिए विकास की संभावनाओं को और अधिक समर्थन दे सकता है।


    चीन की विकास दर 4.8%

    फर्म का अनुमान है कि चीन 2026 में 4.8 और 2027 में 4.7 फीसदी की दर से विकास करेगा। भारत की विकास गति को मजबूत घरेलू खपत, सार्वजनिक अवसंरचना पर खर्च और निर्यात प्रधान अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में वैश्विक व्यापार व्यवधानों के प्रति अपेक्षाकृत सीमित जोखिम से लगातार लाभ मिल रहा है। अमेरिका और यूरो क्षेत्र जैसी उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में जहां मध्यम वृद्धि की उम्मीद है, वहीं भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक विस्तार में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बनी हुई हैं।