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  • BJP के बाद अब संघ में भी पीढ़ीगत बदलाव की तैयारी, ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद Gen-Z पर बढ़ेगा फोकस

    BJP के बाद अब संघ में भी पीढ़ीगत बदलाव की तैयारी, ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद Gen-Z पर बढ़ेगा फोकस


    नई दिल्ली। भाजपा ने अपनी नई संगठनात्मक टीम के जरिए बदलते राजनीतिक और सामाजिक माहौल के अनुरूप पार्टी को पुराने ढांचे से नए स्वरूप में ढालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सबसे अहम बदलाव यह है कि नए नेतृत्व को फैसले लेने में अधिक स्वतंत्रता दी गई है। वरिष्ठ नेता अब मुख्य रूप से मार्गदर्शक की भूमिका में रहेंगे और संगठन को जरूरत पड़ने पर उनकी सलाह और सहयोग लिया जाएगा। राजनीतिक दलों में समय-समय पर होने वाले पीढ़ीगत बदलाव की इसी कड़ी का असर अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में भी दिखाई दे सकता है। हालांकि, संघ प्रमुख के पद में बदलाव को लेकर फिलहाल कोई चर्चा नहीं है।

    आमतौर पर किसी राजनीतिक दल के विपक्ष में रहने के दौरान संगठनात्मक प्रयोगों के लिए ज्यादा गुंजाइश होती है। सत्ता में रहते हुए बड़े बदलावों से बचने की प्रवृत्ति रहती है। इसके बावजूद भाजपा ने केंद्र में एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बाद भी अपने संगठन में बदलाव की शुरुआत की है। पार्टी के युवा अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी नई टीम में युवा चेहरों के साथ अनुभवी नेताओं को भी जगह दी है, लेकिन निर्णय लेने की स्वतंत्रता अपने स्तर पर बनाए रखी है।

    हर दशक में बदलता रहा भाजपा का संगठन

    भाजपा के 1980 में गठन के बाद करीब-करीब हर दशक में पार्टी के संगठन में बदलाव देखने को मिले हैं। पिछली सदी के अंतिम दशक में तत्कालीन संगठन प्रमुख लालकृष्ण आडवाणी ने 1992 से 1995 के बीच बड़ी संख्या में युवाओं को पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी थीं। उस दौर में नरेंद्र मोदी भी प्रमुख युवा चेहरों में शामिल थे। 21वीं सदी के पहले और दूसरे दशक में भी संगठन में इसी तरह बदलाव हुए। हालांकि, उस समय वरिष्ठ नेताओं की भूमिका अधिक प्रभावी थी और वे नई टीमों को नेतृत्व देने के साथ उनका मार्गदर्शन भी करते थे।

    इस बार तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है। पार्टी का नेतृत्व युवा है और निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी उसी के हाथों में रखी गई है। सूत्रों के मुताबिक, संगठन को मजबूत करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका भी अहम बनी रहेगी। वरिष्ठ नेता नई टीम को मजबूती देने और जरूरत के मुताबिक सलाह देने की भूमिका में रहेंगे।

    अगले साल संघ में भी बड़े बदलाव की संभावना

    भाजपा के संगठनात्मक बदलाव के बाद अब उसकी वैचारिक और संगठनात्मक ताकत के प्रमुख केंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी अगले साल महत्वपूर्ण परिवर्तन की संभावना जताई जा रही है। ‘कॉकरोच प्रोटेस्ट’ के बाद संघ का फोकस Gen-Z पर बढ़ने की बात कही जा रही है। संघ की ओर से अपने शताब्दी वर्ष के बाद नई पीढ़ी को लेकर संकेत भी दिए गए हैं।

    इसका व्यापक असर भाजपा के संगठन पर भी दिखाई दे सकता है। जेन-Z और जेन-अल्फा को लेकर बदलते सामाजिक माहौल के बीच भाजपा और संघ अपने नेतृत्व तथा कार्यकर्ताओं में नई पीढ़ी की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे सकते हैं।

    हालांकि, संघ प्रमुख को बदलने की कोई चर्चा नहीं है। मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत 2009 से इस पद पर हैं। संघ में सरसंघचालक के चुनाव की व्यवस्था नहीं है। इस पद पर नियुक्ति आम सहमति से होती है। मौजूदा संघ प्रमुख किसी नाम का सुझाव देते हैं तो संगठन के भीतर उस नाम पर सहमति बनाई जा सकती है।

  • Gen Z के प्रदर्शन पर गजेंद्र पटेल का गंभीर आरोप: विदेशी ताकतें छात्रों को भड़का रहीं, बोले- मर्यादा में रखें अपनी मांगें

    Gen Z के प्रदर्शन पर गजेंद्र पटेल का गंभीर आरोप: विदेशी ताकतें छात्रों को भड़का रहीं, बोले- मर्यादा में रखें अपनी मांगें


    मध्य प्रदेशमध्य प्रदेश में छात्रों के प्रदर्शन को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। बीजेपी के नवनियुक्त राष्ट्रीय महासचिव और खरगोन-बड़वानी सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने छात्र आंदोलनों के पीछे विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप का दावा किया है। पटेल ने कहा कि सोशल मीडिया के जरिए एक विचार तेजी से फैलाया जाता है और उसके बाद Gen Z के युवा उससे जुड़ जाते हैं। उनके मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम को देश के भीतर पर्दे के पीछे से कुछ बाहरी तत्वों का समर्थन मिल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसी ताकतें देश को बांटने और युवाओं के बीच नफरत फैलाने की कोशिश कर रही हैं।

    इंदौर में पत्रकारों से चर्चा के दौरान गजेंद्र सिंह पटेल से देश के अलग अलग हिस्सों में हो रहे छात्र प्रदर्शनों को लेकर सवाल पूछा गया था। इसी दौरान उन्होंने कहा कि पहले छात्र आंदोलन सकारात्मक सोच और रचनात्मक मुद्दों के साथ आगे बढ़ते थे। राजनीतिक नेताओं के प्रति भी भाषा और व्यवहार में एक तरह का सम्मान दिखाई देता था लेकिन अब छात्र आंदोलनों का स्वरूप और तरीका बदलता नजर आ रहा है। पटेल ने युवाओं से अपील की कि वे अपनी समस्याओं और मांगों को मर्यादा के दायरे में रखते हुए सरकार के सामने रखें।

    पटेल का यह बयान ऐसे समय आया है जब उनके ही संसदीय क्षेत्र के बड़वानी जिले में एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय के करीब 200 छात्रों ने शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर लगभग 25 किलोमीटर तक मार्च किया। छात्रों की शिकायत थी कि शिक्षकों ने उनके साथ कथित तौर पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और अभद्र व्यवहार किया। छात्रों के इस विरोध प्रदर्शन ने स्थानीय स्तर पर प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व का ध्यान खींचा है।

    इस प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए पटेल ने कहा कि स्कूल में किसी शिक्षक से छोटी मोटी गलती हो सकती है लेकिन बच्चों को इस तरह सड़कों पर नहीं उतरना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार और संगठन बच्चों के साथ हैं और उनकी समस्याओं का समाधान निश्चित रूप से किया जाएगा। पटेल ने यह भी दावा किया कि पिछले एक साल से सक्रिय कुछ संगठनों ने सरकारी स्कूल के छात्रों को गुमराह किया और उन्हें प्रदर्शन के लिए उकसाने का काम किया है।

    बीजेपी नेता ने युवाओं को देश की ताकत बताते हुए कहा कि युवा समझदार हैं और उन्हें यह समझना चाहिए कि उनके आंदोलन का इस्तेमाल कोई बाहरी ताकत अपने हित के लिए न करे। उन्होंने कहा कि छात्रों की वास्तविक समस्याओं पर सरकार गंभीरता से काम कर रही है और शिकायतों के समाधान के लिए संवाद का रास्ता सबसे बेहतर है।

    बातचीत के दौरान पटेल ने इथेनॉल उत्पादन को लेकर भी सरकार की नीतियों का बचाव किया। उन्होंने दावा किया कि देश इथेनॉल उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ने के साथ ईंधन क्षेत्र को भी फायदा होगा। चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को उन्होंने कुछ समय की समस्या बताते हुए विपक्ष पर लोगों को गलत जानकारी के जरिए गुमराह करने का आरोप लगाया। छात्र आंदोलनों से लेकर आर्थिक मुद्दों तक पटेल के बयानों ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है।

  • इस्तीफे के बाद पहली बार खुलकर बोले धर्मेंद्र प्रधान, NEET विवाद और विरोध पर कहा- मैं किसान का बेटा हूं, वापस नहीं जाऊंगा

    इस्तीफे के बाद पहली बार खुलकर बोले धर्मेंद्र प्रधान, NEET विवाद और विरोध पर कहा- मैं किसान का बेटा हूं, वापस नहीं जाऊंगा


    नई दिल्ली । नीट पेपर लीक विवाद और छात्रों के विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देने वाले धर्मेंद्र प्रधान ने पहली बार विस्तार से अपनी चुप्पी तोड़ी है। ओडिशा के संबलपुर से भाजपा सांसद और वरिष्ठ भाजपा नेता धर्मेंद्र प्रधान ने भुवनेश्वर के जीएम विश्वविद्यालय में छात्रों और शिक्षकों को संबोधित करते हुए अपने इस्तीफे के फैसले और युवा पीढ़ी को लेकर अपनी सोच सामने रखी। उन्होंने कहा कि जेन जी उनके लिए अपने बच्चों की तरह हैं और कुछ लोगों ने उन्हें गुमराह करने की कोशिश की। प्रधान ने कहा कि उनके लिए मंत्री पद से ज्यादा महत्वपूर्ण देश के बच्चों का भविष्य और उनकी सुरक्षा है।

    धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भारत में हर साल कम से कम दो करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। पिछले 10 वर्षों में करीब 20 करोड़ बच्चे देश में पैदा हुए हैं और इन बच्चों की अपनी आकांक्षाएं हैं। उनके मुताबिक यही युवा आने वाले समय में भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में काम करेंगे। उन्होंने कहा कि पद उनके लिए कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा। नीट विवाद के बीच उन्होंने देश और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस्तीफा देने का फैसला किया।

    प्रधान ने इससे पहले भी अपने इस्तीफे को लेकर यही तर्क दिया था। उन्होंने कहा था कि 20 जुलाई की घटना को देखते हुए और बच्चों तथा देश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पद छोड़ने का फैसला किया। उनका आरोप रहा कि जेन जी के युवाओं को गुमराह करने की कोशिश की गई। अब भुवनेश्वर में छात्रों और शिक्षकों के बीच दिए गए संबोधन में उन्होंने एक बार फिर अपने इसी रुख को दोहराया।

    हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर विवाद के साथ ही धर्मेंद्र प्रधान को अपने गृह राज्य ओडिशा में भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। बीजू जनता दल के कार्यकर्ता उनके कई कार्यक्रमों में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। रायराखोल में एक कार्यक्रम के दौरान भी प्रधान के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। विरोध के बीच प्रधान ने कहा कि वह इस तरह की नारेबाजी से परेशान नहीं हैं। उन्होंने खुद को किसान का बेटा बताते हुए कहा कि उन्हें वापस जाने के लिए कहा जाएगा तब भी वह वापस नहीं जाएंगे बल्कि लौटकर आएंगे।

    धर्मेंद्र प्रधान ने अपने संबोधन में बीजू जनता दल के अध्यक्ष और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि नवीन पटनायक युवाओं को उनके खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। प्रधान ने कहा कि नवीन बाबू उन्हें ओडिशा के लोगों के लिए शर्म की बात और बुरा व्यक्ति बताते हैं लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्होंने कभी ऐसा कोई काम किया है जिससे राज्य के लोगों को शर्मिंदगी उठानी पड़ी हो।

    प्रधान ने कहा कि संभव है कि वह राज्य के लिए सम्मान न ला पा रहे हों लेकिन उन्होंने अपने काम से कभी भी ओडिशा के लोगों को शर्मिंदा नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि वह भविष्य में भी ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे राज्य की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे। इस दौरान सभा में मौजूद लोगों ने उनके सवाल के जवाब में समर्थन जताया। कार्यक्रम में बीजेडी विधायक और ओडिशा विधानसभा के उपनेता प्रसन्ना आचार्य भी मौजूद थे।

    धर्मेंद्र प्रधान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब उनके इस्तीफे को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। एक तरफ विपक्ष और प्रदर्शनकारी छात्र नीट से जुड़े विवादों को लेकर सवाल उठा रहे हैं तो दूसरी ओर प्रधान अपने फैसले को युवाओं और देश की सुरक्षा से जोड़कर देख रहे हैं। उन्होंने साफ संकेत दिया है कि पद छोड़ने के बावजूद वह सार्वजनिक जीवन और ओडिशा की राजनीति से पीछे हटने वाले नहीं हैं। उनके बयान से यह भी स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में नीट विवाद के साथ ओडिशा की राजनीतिक लड़ाई में भी उनका मुद्दा प्रमुख बना रह सकता है।

  • राहुल गांधी ने प्रयागराज में छात्रों से साधा संवाद, ‘दर्द-डेटा-दौलत’ के मुद्दे पर BJP का पलटवार

    राहुल गांधी ने प्रयागराज में छात्रों से साधा संवाद, ‘दर्द-डेटा-दौलत’ के मुद्दे पर BJP का पलटवार


    नई दिल्ली । प्रयागराज में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के बीच संवाद करते हुए बेरोजगारी पेपर लीक महंगी शिक्षा और रोजगार के घटते अवसरों को लेकर सरकार पर निशाना साधा। KP ग्राउंड में आयोजित छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी ने देश के करीब 40 करोड़ युवाओं को भारत की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए कहा कि युवाओं की ऊर्जा और क्षमता का सही इस्तेमाल किया जाए तो भारत आर्थिक और सामाजिक रूप से नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। हालांकि उनके इस कार्यक्रम के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी ने भी पलटवार करते हुए राहुल गांधी से झारखंड के आंदोलनरत छात्रों के मुद्दे पर सवाल पूछ दिए। बीजेपी नेताओं ने कहा कि अगर राहुल गांधी वास्तव में छात्रों की समस्याओं को लेकर गंभीर हैं तो उन्हें प्रयागराज के साथ रांची जाकर उन छात्रों से भी मिलना चाहिए जो प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

    राहुल गांधी ने अपने संबोधन में युवाओं की समस्याओं को मुख्य रूप से दर्द डेटा और दौलत के तीन मुद्दों से जोड़कर समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में युवा रोजगार और बेहतर अवसरों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका कहना था कि लाखों रुपये खर्च करके उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार हासिल करना है। राहुल गांधी ने दावा किया कि केवल डिग्री या सर्टिफिकेट मिलने से युवा का भविष्य सुरक्षित नहीं हो जाता क्योंकि जब शिक्षा के बाद नौकरी का अवसर नहीं मिलता तो परिवारों पर आर्थिक दबाव और युवाओं में निराशा दोनों बढ़ते हैं।

    पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं की अनियमितताओं का मुद्दा भी राहुल गांधी के भाषण के केंद्र में रहा। उन्होंने कहा कि एक युवा कई वर्षों तक किसी सरकारी परीक्षा की तैयारी करता है लेकिन अगर परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो उसकी पूरी मेहनत प्रभावित हो सकती है। उन्होंने ऐसे युवाओं के उदाहरण भी सामने रखे जो आर्थिक दबाव के बीच काम करते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। राहुल गांधी ने कहा कि परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता बेहद जरूरी है क्योंकि लाखों युवाओं का भविष्य इन परीक्षाओं से जुड़ा हुआ है।

    राहुल गांधी ने इसके बाद डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते महत्व पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि आने वाली अर्थव्यवस्था में युवा और डेटा मिलकर बड़ी ताकत बन सकते हैं। उनके अनुसार जिस तरह पिछली सदी में पेट्रोलियम को आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण संसाधन माना गया उसी तरह डिजिटल दौर में डेटा बेहद महत्वपूर्ण संसाधन बन चुका है। उन्होंने कहा कि भारत के करोड़ों नागरिक रोजाना इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं और इससे बड़ी मात्रा में डेटा तैयार होता है। राहुल ने इस डेटा से होने वाले आर्थिक लाभ और उसके स्वामित्व को लेकर भी सवाल उठाए।

    सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर टिप्पणी करते हुए राहुल गांधी ने रील्स और लगातार डिजिटल कंटेंट देखने की आदत को आधुनिक दौर की एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं का काफी समय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बीत रहा है जबकि दूसरी तरफ सुरक्षित रोजगार और बेहतर करियर के अवसरों की तलाश जारी है। उनका तर्क था कि युवाओं की ऊर्जा को केवल डिजिटल मनोरंजन तक सीमित करने के बजाय उसे शिक्षा कौशल नवाचार और रोजगार सृजन की दिशा में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

    राहुल गांधी का यह कार्यक्रम कांग्रेस के छात्रों की गूंज अभियान का हिस्सा बताया गया। इस अभियान के जरिए कांग्रेस पेपर लीक भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं बेरोजगारी और परीक्षा प्रणाली में सुधार जैसे मुद्दों को युवाओं के बीच उठाने की कोशिश कर रही है। पार्टी का दावा है कि देश के युवाओं की समस्याओं को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाना जरूरी है।

    वहीं बीजेपी ने राहुल गांधी के कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक हमला तेज कर दिया। बीजेपी नेताओं ने झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े छात्रों के विरोध प्रदर्शन का मुद्दा उठाते हुए सवाल किया कि राहुल गांधी प्रयागराज में छात्रों से संवाद कर सकते हैं तो रांची में आंदोलन कर रहे छात्रों से मिलने क्यों नहीं जाते। बीजेपी का कहना है कि झारखंड में कांग्रेस सरकार की सहयोगी है और वहां छात्रों की समस्याओं पर राहुल गांधी को सीधे संवाद करना चाहिए।

    राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम के बीच Gen-Z और युवा मतदाताओं को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज होती दिखाई दी। पेपर लीक रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दे पहले से ही युवाओं के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। ऐसे में कांग्रेस और बीजेपी दोनों की नजर युवा वर्ग पर है। प्रयागराज में राहुल गांधी का छात्रों से संवाद इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि युवाओं से जुड़े रोजगार शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था के मुद्दे किस तरह राजनीतिक बहस को प्रभावित करते हैं और क्या Gen-Z वास्तव में आगामी चुनावी राजनीति का नया केंद्र बनता है।

  • भारत के घरों में रखा ₹315 लाख करोड़ का सोना बनेगा अर्थव्यवस्था की ताकत, गोल्ड मार्केट में Gen Z का बड़ा रोल

    भारत के घरों में रखा ₹315 लाख करोड़ का सोना बनेगा अर्थव्यवस्था की ताकत, गोल्ड मार्केट में Gen Z का बड़ा रोल


    नई दिल्ली। भारत में सोने को लेकर निवेश का नजरिया तेजी से बदल रहा है। कभी परंपरा और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाने वाला सोना अब डिजिटल निवेश और वित्तीय संपत्ति के रूप में भी देखा जाने लगा है। इस बदलाव में देश की Gen Z पीढ़ी की भूमिका अहम मानी जा रही है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की रिपोर्ट ‘स्वर्णिम उड़ान 2047’ के मुताबिक, युवा पीढ़ी पारंपरिक आभूषणों की तुलना में डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF जैसे विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ रही है।

    Gen Z बदल रही गोल्ड में निवेश की परंपरा
    नई पीढ़ी सोने को केवल विरासत के तौर पर संभालकर रखने के बजाय इसे एक एसेट के रूप में देख रही है। डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ETF में निवेश के पीछे आसान खरीदारी, कम मात्रा में निवेश और जरूरत पड़ने पर उसे कैश में बदलने जैसी सुविधाएं प्रमुख वजह हैं।

    WGC के मुताबिक, वर्ष 2035 तक भारत की Gen Z की कुल खरीद क्षमता 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। ऐसे में इस पीढ़ी की निवेश आदतों में बदलाव का असर देश के गोल्ड मार्केट के साथ-साथ व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

    घरों में 31 हजार टन से ज्यादा सोना
    भारत के घरों में 31 हजार टन से अधिक सोना मौजूद होने का अनुमान है। इसकी कीमत 315 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई है। इसके मुकाबले भारत के पास करीब 880 टन का आधिकारिक गोल्ड रिजर्व है। बड़ी मात्रा में घरेलू सोना अभी वित्तीय व्यवस्था का सक्रिय हिस्सा नहीं है।

    ASSOCHAM की एक रिपोर्ट में भी भारतीय परिवारों के पास मौजूद सोने की विशाल मात्रा का जिक्र किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, अगर घरेलू सोने का एक छोटा हिस्सा भी वित्तीय साधनों में लगाया जाता है तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त पूंजी मिल सकती है।

    सिर्फ 2% सोना अर्थव्यवस्था से जुड़ा तो बड़ा फायदा
    रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि घरेलू सोने का सिर्फ 2 प्रतिशत हिस्सा भी वित्तीय साधनों में स्थानांतरित होने पर वर्ष 2047 तक भारत की GDP में 7.5 ट्रिलियन डॉलर तक का अतिरिक्त योगदान हो सकता है। वहीं, अगर घरों में रखा 5 प्रतिशत सोना अर्थव्यवस्था से जुड़ता है तो भारत का आयात बिल करीब 90 अरब डॉलर तक कम हो सकता है।

    गोल्ड को उत्पादक संपत्ति में बदलने की तैयारी
    विशेषज्ञों के मुताबिक, घरेलू सोने को वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने पर मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और कृषि जैसे क्षेत्रों के लिए पूंजी उपलब्ध हो सकती है। गोल्ड मॉनिटाइजेशन, गोल्ड-लिंक्ड सेविंग स्कीम और गोल्ड लोन जैसे विकल्प इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। गोल्ड लोन के बढ़ते आंकड़े भी इस बदलाव की ओर संकेत करते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में नवंबर 2025 तक गोल्ड लोन का आंकड़ा 24.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

    अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक संपत्ति बन सकता है सोना
    देश में 38 करोड़ से अधिक Gen Z की बड़ी आबादी है। इस पीढ़ी की बदलती निवेश प्राथमिकताएं गोल्ड मार्केट का स्वरूप बदल सकती हैं। अगर घरेलू सोना बड़ी मात्रा में वित्तीय प्रणाली में आता है तो बाजार में पूंजी की उपलब्धता बढ़ सकती है, निवेश के लिए अधिक संसाधन मिल सकते हैं और सोने के आयात पर निर्भरता घट सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की भी संभावना है। ऐसे में भारत के घरों में पड़ा पुस्तैनी सोना आने वाले वर्षों में सिर्फ आभूषण या विरासत नहीं, बल्कि देश की आर्थिक ताकत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

  • Gen-Z के मुद्दे पर थरूर का BJP पर हमला, बोले- सत्ताधारी पार्टी को लगा बड़ा झटका

    Gen-Z के मुद्दे पर थरूर का BJP पर हमला, बोले- सत्ताधारी पार्टी को लगा बड़ा झटका


    नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मुंबई में जेन-जी और जेन-अल्फा के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के संवाद पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने दावा किया कि हाल के घटनाक्रमों से सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है।

    थरूर ने कहा कि जंतर-मंतर पर हुए ‘कॉकरोच पार्टी’ के प्रदर्शन, एक मंत्री के इस्तीफे और उसके बाद जल्दबाजी में पारित किए गए बिल के अलावा हालिया दो उपचुनावों के नतीजे भी सत्तारूढ़ दल के लिए चिंता का विषय हैं।

    BJP की गढ़ मानी जाने वाली सीट हारने का किया जिक्र
    शशि थरूर ने प्रशांत किशोर की जीत का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने BJP की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीट पर जीत दर्ज की है। उनके मुताबिक, इस सीट पर BJP तीन दशक से ज्यादा समय से जीतती आ रही थी और पार्टी ने यहां नौ बार जीत हासिल की थी, लेकिन अब उसे हार का सामना करना पड़ा।

    उन्होंने मध्य प्रदेश की दतिया सीट का भी उल्लेख किया और कहा कि कांग्रेस इस सीट को बरकरार रखने में सफल रही है। थरूर ने कहा कि दोनों ही सीटें हिंदी भाषी राज्यों में आती हैं और इन नतीजों से आगे के चुनावों को लेकर उम्मीद नजर आती है।

    उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर होने वाले चुनाव राजनीतिक दलों को अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका देते हैं। थरूर के मुताबिक, अगले मार्च में कुछ राज्यों में चुनाव होने हैं और कांग्रेस उन राज्यों में जीत हासिल करने की स्थिति में है।

    मोहन भागवत ने Gen-Z को लेकर क्या कहा था?
    मुंबई में Gen-Z और Gen-Alpha के साथ संवाद के दौरान RSS प्रमुख मोहन भागवत ने नई पीढ़ी को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि Gen-Z और Gen-Alpha पुरानी पीढ़ी की तुलना में भी अधिक देशभक्त और ईमानदार हैं और उनकी बात सुनी जानी चाहिए।

    भागवत ने यह भी कहा कि नई पीढ़ी के साथ संवाद में कमी रही, जिसकी वजह से दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन जैसी स्थिति सामने आई। उन्होंने 20 जुलाई को दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद कहा था कि आज की युवा पीढ़ी बहुत से सवाल पूछती है।

    मोहन भागवत का यह संवाद ऐसे समय में हुआ है, जब युवा मुद्दों और Gen-Z की राजनीतिक भागीदारी को लेकर देश की राजनीति में चर्चा तेज है। इसी को लेकर शशि थरूर ने भी सत्ताधारी दल के लिए हालिया घटनाक्रमों को राजनीतिक चेतावनी के तौर पर पेश किया है।

  • Gen-Z से संवाद बढ़ाएगा RSS, 100 से ज्यादा शहरों के युवाओं से बात करेंगे मोहन भागवत

    Gen-Z से संवाद बढ़ाएगा RSS, 100 से ज्यादा शहरों के युवाओं से बात करेंगे मोहन भागवत


    नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने देश की नई पीढ़ी, खासकर Gen-Z और Gen Alpha से संवाद बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत 6 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से देश के 100 से अधिक शहरों के हजारों विद्यार्थियों से संवाद करेंगे। इस कार्यक्रम में 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग के 2,000 से अधिक छात्रों के शामिल होने की संभावना है।

    यह संवाद ‘इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइटेड नेशन्स’ (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ पर आयोजित वार्षिक चैंपियनशिप कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन अवसर पर होगा। कार्यक्रम का आयोजन मुंबई के अंबानी सेंटर में किया जाएगा, जबकि विभिन्न शहरों के छात्र ऑनलाइन माध्यम से इसमें जुड़ेंगे।

    युवाओं से जुड़ने पर रहेगा जोर
    आरएसएस के अनुसार, वर्ष 2011 में स्थापित IIMUN का संचालन युवा स्वयं करते हैं और संगठन का दावा है कि अब तक इससे 7.5 करोड़ से अधिक युवा जुड़ चुके हैं। सम्मेलन का उद्देश्य नई पीढ़ी के विचारों, आकांक्षाओं और चुनौतियों पर खुला संवाद स्थापित करना है।

    Gen-Z और Gen Alpha पर विशेष फोकस
    कार्यक्रम में मुख्य रूप से दो पीढ़ियों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। Gen-Z में 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा शामिल हैं, जबकि Gen Alpha में 2010 से 2024 के बीच जन्मे बच्चों को माना जाता है।

    संवाद को बताया था बदलाव का माध्यम
    हाल के दिनों में मोहन भागवत ने कहा था कि समाज और समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है तथा युवाओं से निरंतर संवाद के जरिए ही चुनौतियों का बेहतर समाधान निकाला जा सकता है। उनके अनुसार, अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक होता है और नई पीढ़ी के विचारों को समझना आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा था कि बच्चों और युवाओं के मन की बात सुनकर ही उनके साथ प्रभावी संवाद स्थापित किया जा सकता है। यह कार्यक्रम युवाओं के साथ विचार-विमर्श और सामाजिक विषयों पर संवाद की इसी पहल का हिस्सा माना जा रहा है।

  • CBSE मूल्यांकन विवाद ने पकड़ा राजनीतिक रंग, राहुल गांधी बोले- सवाल पूछने वाली युवा पीढ़ी से डर रही सरकार

    CBSE मूल्यांकन विवाद ने पकड़ा राजनीतिक रंग, राहुल गांधी बोले- सवाल पूछने वाली युवा पीढ़ी से डर रही सरकार


    नई दिल्ली। CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली को लेकर उठे विवाद ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। परीक्षा परिणामों और मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर छात्रों की शिकायतों के बीच विपक्ष ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इसी मुद्दे को आधार बनाकर सरकार और विपक्ष के बीच बयानबाजी भी तेज हो गई है।

    शिक्षा व्यवस्था पर बढ़ा राजनीतिक दबाव

    लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली में कथित गड़बड़ियों को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े संस्थानों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सवाल उठना चिंता का विषय है। उनका कहना था कि लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े मामलों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई होनी चाहिए।

    OSM प्रणाली पर उठे नए सवाल
    कक्षा 12वीं की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली एक डिजिटल प्रक्रिया है, जिसमें छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर स्क्रीन पर जांचा जाता है। हाल के दिनों में इस प्रणाली को लेकर कई तरह की शिकायतें सामने आई हैं। कुछ छात्रों ने गलत मूल्यांकन और अंकों में विसंगति जैसे मुद्दे उठाए हैं। इसी के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया और इसे लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं।

    युवाओं और छात्रों की भूमिका पर बहस
    विवाद के दौरान यह मुद्दा भी सामने आया कि नई पीढ़ी अब शिक्षा और व्यवस्था से जुड़े सवालों पर खुलकर अपनी बात रख रही है। छात्रों की आवाज और उनकी शिकायतों को लेकर बहस तेज हुई है। विपक्ष का कहना है कि युवाओं की बात सुनी जानी चाहिए और उनकी चिंताओं को गंभीरता से लिया जाना जरूरी है। शिक्षा से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग लगातार उठ रही है।

    सुधार की मांग हुई तेज
    विपक्षी नेताओं ने शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया है। परीक्षा प्रक्रिया से लेकर मूल्यांकन और परिणाम तक पूरे ढांचे को और मजबूत बनाने की बात कही जा रही है। उनका मानना है कि छात्रों का भरोसा बनाए रखने के लिए एक ऐसी व्यवस्था तैयार करनी होगी जिसमें किसी प्रकार की गड़बड़ी की संभावना कम से कम हो।

    शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर चर्चा

    इस पूरे विवाद के बाद एक बार फिर देश की परीक्षा प्रणाली और मूल्यांकन प्रक्रिया पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक के इस्तेमाल के साथ-साथ मजबूत निगरानी और स्पष्ट प्रक्रिया भी जरूरी है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और बहस देखने को मिल सकती है क्योंकि यह सीधे लाखों छात्रों और उनके भविष्य से जुड़ा विषय है।

  • जेनजी में बढ़ती लोकप्रियता पर बोले जैकी श्रॉफ, इंसानियत और अपनापन ही मेरी असली पहचान है

    जेनजी में बढ़ती लोकप्रियता पर बोले जैकी श्रॉफ, इंसानियत और अपनापन ही मेरी असली पहचान है

    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता जैकी श्रॉफ अपनी अलग शैली, सहज व्यक्तित्व और दमदार अभिनय के लिए लंबे समय से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाए हुए हैं। 80 और 90 के दशक में बड़े पर्दे पर अपनी छाप छोड़ने के बाद भी आज वह नई पीढ़ी यानी जेनजी के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया से लेकर युवा दर्शकों तक उनकी बढ़ती लोकप्रियता लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है।

    इसी बीच अपनी आगामी फिल्म के प्रमोशन के दौरान बातचीत में जैकी श्रॉफ ने अपनी इस लोकप्रियता का कारण बेहद सरल शब्दों में बताया। उन्होंने कहा कि वह हमेशा लोगों को उम्र के आधार पर नहीं देखते, बल्कि इंसानियत और व्यवहार को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं। उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति चाहे किसी भी उम्र का हो, हर किसी के साथ समान सम्मान और अपनापन रखना ही उनके स्वभाव की असली पहचान है।

    अभिनेता ने कहा कि उनके लिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज इंसानी रिश्ते हैं। वह मानते हैं कि जब कोई व्यक्ति अपने दिल को खुला रखता है और दूसरों की बातों को ध्यान से सुनता है, तो संबंध अपने आप मजबूत हो जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हर व्यक्ति से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है, इसलिए खुद को किसी से बड़ा या बेहतर समझना सही नहीं है।

    जैकी श्रॉफ ने यह भी बताया कि वह हमेशा लोगों के साथ सहजता से जुड़ने की कोशिश करते हैं, चाहे वह बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग। उनके अनुसार जब व्यवहार में सादगी और अपनापन होता है, तो पीढ़ियों के बीच की दूरी अपने आप खत्म हो जाती है। यही कारण है कि वह अलग-अलग उम्र के दर्शकों से आसानी से जुड़ पाते हैं और उनकी लोकप्रियता हर पीढ़ी में बनी रहती है।

    नई दिल्ली। अपनी आगामी फिल्म को लेकर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह प्रोजेक्ट उनके लिए बेहद खास है क्योंकि इसमें एक अनोखी और अलग सोच को दिखाया गया है। फिल्म में उनका किरदार एक दादा का है, जो अपने पोते के साथ दोस्त जैसा रिश्ता साझा करता है। यह कहानी पारिवारिक संबंधों को एक नए दृष्टिकोण से पेश करती है, जहां उम्र की दीवारें रिश्तों को सीमित नहीं करतीं।

    अभिनेता ने कहा कि इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका नया कॉन्सेप्ट है, जो पारंपरिक सोच से हटकर एक ताजा अनुभव देता है। यह फिल्म यह संदेश देती है कि प्यार, समझ और अपनापन किसी भी पीढ़ी के बीच दूरी को खत्म कर सकता है।

    जैकी श्रॉफ का यह नजरिया न केवल उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे एक कलाकार अपने व्यवहार और सोच के जरिए सभी उम्र के दर्शकों से जुड़ा रह सकता है। उनकी सरलता और मानवीय दृष्टिकोण ही उन्हें आज भी दर्शकों के बीच खास बनाता है।

  • नेपाल में फीकी पड़ी बालेन शाह का चमक…. महज दो माह में टूटने लगा Gen Z का भरोसा!

    नेपाल में फीकी पड़ी बालेन शाह का चमक…. महज दो माह में टूटने लगा Gen Z का भरोसा!


    काठमांडु।
    नेपाल (Nepal) में पारंपरिक राजनेताओं (Traditional Politicians) के खिलाफ जेनरेशन जेड (Gen-Z) के आंदोलन के रूप में देखे गए ऐतिहासिक चुनावों के जरिए सत्ता में आए बालेन शाह (Balen Shah) की सरकार के लिए शुरुआती उम्मीदें और चमक अब फीकी पड़ती नजर आ रही हैं। महज दो महीने के भीतर ही सरकार चौतरफा विवादों, अदालती झटकों और कूटनीतिक मोर्चों पर आलोचनाओं से घिर गई है। संसद सत्र को टालकर अध्यादेशों की बाढ़ लाने और आलोचनाओं पर प्रधानमंत्री शाह की चुप्पी ने उनके समर्थकों को भी निराश किया है।

    बालेन शाह की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के पास 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 181 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत है, लेकिन नेशनल असेंबली (ऊपरी सदन) में उनका एक भी सदस्य नहीं है। विधायी संशोधन और कानून पारित करने के लिए उच्च सदन की भूमिका अनिवार्य होती है।

    इस विधायी गतिरोध से बचने के लिए शाह सरकार ने एक विवादास्पद रास्ता चुना। 30 अप्रैल को शुरू होने वाले निचले सदन के सत्र को 11 मई तक टाल दिया गया और इस 12 दिनों के अंतराल में सरकार ने आठ अध्यादेश पारित कर दिए। समर्थकों का मानना है कि यह उस सुधार के एजेंडे के साथ विश्वासघात है जिसके दम पर वे सत्ता में आए थे।


    न्यायपालिका से जुड़ा विवाद

    सबसे बड़ा विवाद संवैधानिक परिषद से जुड़े अध्यादेश को लेकर हुआ। यह परिषद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीशों और अन्य संवैधानिक निकायों के प्रमुखों की नियुक्ति की सिफारिश करती है। नए अध्यादेश के जरिए प्रधानमंत्री को वीटो पावर दे दी गई। इसके तहत यदि किसी नाम पर टाई होता है, तो पीएम का फैसला अंतिम होगा और वे बहुमत के फैसले को भी पलट सकते हैं। परिषद के दो सदस्यों उच्च सदन के अध्यक्ष नारायण दहाल और भीष्मराज आंगदाम्बे ने इस पर असहमति जताई।

    राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भी इसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजा था, लेकिन सरकार द्वारा बिना बदलाव के दोबारा भेजे जाने पर उन्हें इसे मंजूरी देनी पड़ी। अध्यादेश के तुरंत बाद परिषद ने डॉ. मनोज शर्मा को मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की, जिससे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सपना मल्ला प्रधान सहित तीन वरिष्ठ न्यायाधीश पीछे छूट गए। नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने इसप कहा, “बालेन को इस कृत्य की कीमत चुकानी होगी, जो देश की 15 मिलियन महिलाओं का अपमान है।”


    सुप्रीम कोर्ट का झटका

    प्रशासन को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करने के नाम पर सरकार ने एक अन्य अध्यादेश के जरिए संवैधानिक निकायों, राज्य बोर्डों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों में तैनात करीब 1,600 लोगों की नियुक्तियां रद्द कर दीं। इसके साथ ही, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्र संगठनों और कर्मचारी यूनियनों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास किया गया। हालांकि, नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने इस अध्यादेश पर रोक लगा दी है, जो शाह सरकार के लिए एक बड़ा कानूनी झटका है। इससे पहले कोर्ट ने बिना पुनर्वास के सुकुम्बासी (भूमिहीन निवासियों) को हटाने पर भी रोक लगाई थी।


    संसद में बर्ताव और स्थानीय स्तर पर विरोध

    11 मई को शुरू हुए संसद सत्र के पहले ही दिन पीएम बालेन शाह सफेद कैनवास जूते पहनकर पहुंचे, जिसे संसदीय मर्यादा के लिहाज से बहुत अनौपचारिक माना गया। इसके बाद वे राष्ट्रपति के अभिभाषण के बीच में ही अचानक सदन से बाहर निकल गए और बुधवार को बिना किसी सूचना के संसद से गायब रहे, जिसके कारण विपक्ष के हंगामे के बाद सदन को स्थगित करना पड़ा।

    काठमांडू घाटी में बागमती नदी के किनारे चलाए गए अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान दो भूमिहीन लोगों की आत्महत्या के बाद मानवीय संकट गहरा गया। तीखी आलोचना के बाद शाह ने सोशल मीडिया पर सफाई दी कि सरकार सच्चे भूमिहीनों के पुनर्वास के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन फर्जी भूमिहीनों के खिलाफ कार्रवाई जरूरी थी।

    इसके अतिरिक्त, देश के शीर्ष उद्योगपतियों को भ्रष्टाचार के आरोप में हिरासत में लेने के फैसले से घरेलू और विदेशी निवेशकों में डर का माहौल बन गया है, जिसे संभालने के लिए अब वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले को डैमेज कंट्रोल करना पड़ रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मोर्चे पर भी नई सरकार अनुभवहीन साबित हो रही है। बालेन शाह ने अप्रैल में 17 देशों के राजदूतों से मुलाकात कर बहुपक्षीय संबंधों का भरोसा दिया था। लेकिन इसके तुरंत बाद भारत और चीन ने नेपाल के क्षेत्रीय दावे की अनदेखी करते हुए लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर सड़क खोलने की घोषणा कर दी, जिस पर काठमांडू को विरोध पत्र भेजना पड़ा।

    बालेन शाह ने संकल्प लिया है कि वे एक साल तक कोई विदेशी दौरा नहीं करेंगे और केवल मंत्रियों या उससे ऊपर के स्तर के गणमान्य व्यक्तियों से ही मिलेंगे। इसी कूटनीतिक कड़े रुख के कारण भारत के विदेश सचिव विवेक मिस्री ने अपना नेपाल दौरा स्थगित कर दिया।