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  • जर्मनी में Gen Z का प्रदर्शन हिंसक हुआ, फ्रैंकफर्ट में दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट

    जर्मनी में Gen Z का प्रदर्शन हिंसक हुआ, फ्रैंकफर्ट में दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट


    नई दिल्ली। जर्मनी में बढ़ती महंगाई, शिक्षा के लिए पर्याप्त फंडिंग और अनिवार्य सैन्य सेवा के विरोध में हजारों युवा सड़कों पर उतर आए। शनिवार को बर्लिन, फ्रैंकफर्ट और म्यूनिख समेत 34 शहरों में प्रदर्शन हुए। फ्रैंकफर्ट में प्रदर्शन के दौरान कुछ नकाबपोश लोगों ने दुकानों में लूटपाट की और कई जगह तोड़फोड़ की। पुलिस के मुताबिक, शहर के केंद्र में हिंसा हुई और आपातकालीन सेवाओं पर पेट्रोल बम भी फेंके गए।

    ये प्रदर्शन ‘जेन Z रेगेल्ट’ नामक समूह की ओर से आयोजित किए गए थे। युवाओं ने बेहतर रोजगार, आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा के लिए अधिक सरकारी फंडिंग और सार्वजनिक सुविधाओं में सुधार की मांग उठाई। साथ ही, अनिवार्य सैन्य सेवा के खिलाफ भी विरोध जताया। ये आंदोलन यूरोप के कई हिस्सों में युवाओं की अगुवाई में चल रहे प्रदर्शनों का हिस्सा हैं।

    फ्रैंकफर्ट में हिंसा, दुकानों के शीशे तोड़े

    प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, फ्रैंकफर्ट में प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। कुछ नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने दुकानों में लूटपाट की, जबकि कई अन्य दुकानों को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी।

    फ्रैंकफर्ट पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर बताया कि शहर के केंद्र में हिंसक उपद्रव जारी हैं। कई दुकानों की खिड़कियां तोड़ दी गई हैं और आपातकालीन सेवाओं पर मोलोटोव कॉकटेल यानी पेट्रोल बम फेंके जा रहे हैं। पुलिस ने लोगों से शहर के केंद्र में जाने से बचने और वहां मौजूद लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की।

    हैम्बर्ग में भी कुछ बैरिकेड्स में आग लगा दी गई। जर्मन अधिकारियों के मुताबिक, अधिकांश प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन उन्होंने आशंका जताई कि चरमपंथी समूह भीड़ का फायदा उठाकर हिंसा फैला सकते हैं।

    महंगाई और आर्थिक असुरक्षा से नाराज युवा

    प्रदर्शन में शामिल युवाओं का कहना है कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी में भी जीवन-यापन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। महंगाई के कारण आम लोगों और खासकर युवाओं के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। वे बेहतर रोजगार के अवसर, भविष्य की आर्थिक सुरक्षा और सरकारी सुविधाओं में सुधार चाहते हैं। बर्लिन में आयोजित एक रैली के दौरान ‘जेन Z रेगेल्ट’ की प्रवक्ता ने कहा कि युवा युद्ध के लिए नहीं, बल्कि शांति और आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

    यूरोप के कई देशों में युवा आंदोलन

    जर्मनी में हुए ये प्रदर्शन यूरोप के विभिन्न देशों में युवाओं की बढ़ती सक्रियता के बीच हुए हैं। सर्बिया में छात्र आंदोलनों ने राजनीति और चुनावी माहौल को प्रभावित किया है। वहीं, फ्रांस में युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई जगह हिंसा और लूटपाट की घटनाएं सामने आई थीं। शिक्षा, रोजगार, महंगाई और सरकारी नीतियों को लेकर युवाओं की नाराजगी यूरोप के कई हिस्सों में प्रदर्शनों के रूप में सामने आ रही है।

  • पीयूष गोयल ने जर्मन कंपनियों को भारत में निवेश का दिया न्योता, विनिर्माण और नवाचार में बताए बड़े अवसर

    पीयूष गोयल ने जर्मन कंपनियों को भारत में निवेश का दिया न्योता, विनिर्माण और नवाचार में बताए बड़े अवसर


    नई दिल्ली ।
    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं के साथ बैठकों के दौरान भारत में निवेश, विनिर्माण और नवाचार की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत जर्मन कंपनियों के लिए बड़े अवसर उपलब्ध कराता है। भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच विश्वास, प्रतिस्पर्धात्मकता और एक-दूसरे की पूरक क्षमताओं के आधार पर मजबूत आर्थिक साझेदारी विकसित करने की भी व्यापक संभावनाएं हैं। गोयल ने दोनों देशों के उद्योग जगत से सहयोग बढ़ाने और नए कारोबारी अवसर तलाशने का आह्वान किया।

    बर्लिन दौरे के दौरान गोयल ने फ्रेसेनियस ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल सेन के साथ बैठक की। इसमें भारत के तेजी से बढ़ते स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र, गुणवत्तापूर्ण और किफायती चिकित्सा सेवाओं की बढ़ती मांग तथा मजबूत विनिर्माण क्षमताओं पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने विचार किया कि इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर भारतीय बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है।

    गोयल ने भारत की कुशल प्रतिभा और उत्पादन क्षमता को जर्मन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया। उनके अनुसार, कंपनियां भारत में उपलब्ध योग्य कर्मचारियों और विश्वस्तरीय विनिर्माण सुविधाओं का लाभ उठाकर घरेलू तथा वैश्विक बाजारों में अपनी पहुंच मजबूत कर सकती हैं। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में बढ़ती मांग के कारण चिकित्सा उत्पादों और सेवाओं के विकास में भी सहयोग की संभावनाएं हैं।

    केंद्रीय मंत्री ने बेयर के फार्मास्यूटिकल्स प्रभाग के अध्यक्ष स्टीफन ओएलरिख के साथ भी चर्चा की। इस बैठक में भारत में बेयर की विस्तार योजनाओं और देश के विकसित होते स्वास्थ्य क्षेत्र में अधिक निवेश की संभावनाओं पर विचार किया गया। बातचीत में नवाचार और सहयोग को बढ़ावा देने से जुड़े अवसर भी शामिल रहे। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए इस क्षेत्र में निवेश और तकनीकी सहयोग को महत्वपूर्ण माना गया।

    गोयल ने बर्लिन में नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिलदिज के साथ बैठक में भी भाग लिया। इसमें भारत में कंपनी के विनिर्माण विस्तार, टिकाऊ निर्माण सामग्री और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। भारत में तेजी से हो रहे शहरीकरण और आर्थिक बदलावों के बीच निर्माण क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर जोर दिया गया। टिकाऊ निर्माण सामग्री और उत्पादन क्षमता बढ़ाने से जुड़े अवसर इस बातचीत के प्रमुख विषय रहे।

    इससे पहले गोयल ने जर्मन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (डीजीएपी) के इंडिया सेंटर के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया। कार्यक्रम में जर्मनी की संघीय आर्थिक मामलों और ऊर्जा मंत्री कैथरीना रीचे भी मौजूद थीं। गोयल ने कहा कि यह केंद्र भारत-जर्मनी संबंधों की बढ़ती मजबूती और आपसी सहयोग को गहरा करने की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

    अपने संबोधन में गोयल ने दोनों देशों की पूरक क्षमताओं को महत्वाकांक्षी आर्थिक लक्ष्यों के लिए मजबूत आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता आर्थिक साझेदारी को नई गति दे सकता है। उनके अनुसार, भारत और जर्मनी मिलकर वैश्विक स्तर पर मजबूत और लचीली मूल्य शृंखलाएं विकसित कर सकते हैं। इसके लिए दोनों देशों के उद्योगों और निवेशकों को पारस्परिक लाभ वाले क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।

    बर्लिन स्थित ईएसएमटी बर्लिन की ओर से आयोजित बिजनेस लीडर्स राउंडटेबल में भी गोयल ने प्रमुख कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और उद्योग प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की। उन्होंने भारत और जर्मनी के बीच व्यापारिक तथा आर्थिक संबंधों के भविष्य को लेकर विश्वास जताया। इन बैठकों के जरिए निवेश, उत्पादन, स्वास्थ्य सेवा, निर्माण सामग्री और नवाचार जैसे क्षेत्रों में कारोबारी सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं को सामने रखा गया।

  • जर्मनी-नीदरलैंड दौरा…. ट्रंप की टैरिफ नीति और ट्रेड डील पर अनिश्चितता के बीच भारत का नया दांव

    जर्मनी-नीदरलैंड दौरा…. ट्रंप की टैरिफ नीति और ट्रेड डील पर अनिश्चितता के बीच भारत का नया दांव


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) ने बीते डेढ़ साल में भारतीय माल (Indian goods) पर शुल्क (Tariff) की दर तीन बार बदली। अब अधिकतर भारतीय सामान पर सामान्य शुल्क के ऊपर 10 फीसदी लगता है। फरवरी 2026 में 18% की दर वाले जिस अंतरिम ढांचे का एलान हुआ था, उस पर आठ महीने बाद भी हस्ताक्षर नहीं हुए। इसी अनिश्चितता के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal) 22 से 24 अक्तूबर तक जर्मनी (Germany) और 24 से 27 अक्तूबर तक नीदरलैंड (Netherlands) के दौरे पर रहेंगे। उनके साथ करीब 100 कंपनियों और नवउद्यमों का दल है।

    बीते चार साल में भारत ने एक के बाद एक समझौते किए हैं और यूरोपीय संघ उसका 22वां मुक्त व्यापार साझेदार बना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और विदेश मंत्री मार्को रुबियो के व्यापार समझौते पर सकारात्मक बयान के बावजूद अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीयर का कहना है कि घोषणा तुरंत होने वाली नहीं है। यानी तस्वीर अब भी साफ नहीं।


    यूरोप का दरवाजा खुला, पर ताला अब तक नहीं हटा

    यूरोपीय संघ के साथ हुआ समझौता भारत का अब तक का सबसे बड़ा सौदा है। यूरोपीय संघ अपने 99.3 प्रतिशत और भारत अपने 96.6 प्रतिशत कारोबार पर शुल्क हटाएगा या घटाएगा। भारत यूरोपीय कारों पर शुल्क 110 प्रतिशत तक के स्तर से घटाकर 40 प्रतिशत पर लाएगा। पर नौ महीने बाद भी यह लागू नहीं हुआ है। गोयल का यह दौरा इसलिए नीतिगत कम और व्यावहारिक ज्यादा है।


    बर्लिन और हेग में क्या होगा

    गोयल बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में हिस्सा लेंगे और जर्मनी के आर्थिक मामलों एवं ऊर्जा मंत्री तथा चांसलर कार्यालय के जी-7 और जी-20 शेरपा से द्विपक्षीय बातचीत करेंगे। भारतीय कारोबारी दल की अलग बैठकें वाहन और उन्नत विनिर्माण, सूचना तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कृषि एवं उपभोक्ता सामान, दवा और स्वास्थ्य में होंगी।

    नीदरलैंड में बातचीत सरकार से सरकार के स्तर पर होगी। 25 अक्तूबर को भारतीय दल रॉटरडम बंदरगाह देखने जाएगा और 26 अक्तूबर को हेग में भारत-नीदरलैंड कारोबार मंच की बैठक होगी।


    अब तक की कोशिशों से क्या मिला

    वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल निर्यात 863.1 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। इसमें वस्तुओं का निर्यात 441.8 अरब डॉलर और सेवाओं का 421.3 अरब डॉलर रहा। यह उसी साल हुआ जिस साल अमेरिका ने शुल्क बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया था।

    मुक्त व्यापार समझौते वाले बाजारों में आसियान देश सबसे ऊपर रहे, जहां 38.42 अरब डॉलर का माल गया। संयुक्त अरब अमीरात 37.36 अरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर रहा। ब्रिटेन के साथ समझौता 15 जुलाई 2026 को लागू हुआ और उसी वित्त वर्ष में वहां 13.44 अरब डॉलर का निर्यात दर्ज हुआ।

    ऑस्ट्रेलिया के साथ समझौते से पहले वित्त वर्ष 2020-21 में वहां भेजे माल के लिए सिर्फ 1,482 मूल प्रमाणपत्र जारी हुए थे, समझौते के बाद यह औसतन 45 हजार से ऊपर पहुंच गया। ऑस्ट्रेलिया को निर्यात चार अरब डॉलर से बढ़कर 7.28 अरब डॉलर हो गया।

    ओमान के साथ समझौता एक जून 2026 को लागू हुआ और जून में ही वहां निर्यात पिछले महीने से 54.7 प्रतिशत और पिछले साल के मुकाबले 189.6 प्रतिशत बढ़ गया। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ समझौता अक्तूबर 2025 से लागू है और अब तक 7,885 मूल प्रमाणपत्र जारी हो चुके हैं।

  • फ्रांस अकेले बनाएगा राफेल से भी उन्नत छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान, जर्मनी से अलग होने के बाद भारत से सहयोग की उम्मीद

    फ्रांस अकेले बनाएगा राफेल से भी उन्नत छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान, जर्मनी से अलग होने के बाद भारत से सहयोग की उम्मीद

    नई दिल्ली । फ्रांस अब छठी पीढ़ी का अत्याधुनिक लड़ाकू विमान बनाने की तैयारी अपने दम पर आगे बढ़ा रहा है। जर्मनी और स्पेन के साथ मिलकर विकसित किए जा रहे भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रम में मतभेदों के बाद फ्रांस ने अपनी रणनीति बदल दी है। इस नई योजना के तहत वह ऐसा विमान विकसित करना चाहता है, जो तकनीक और युद्धक क्षमताओं के मामले में मौजूदा राफेल लड़ाकू विमान से अधिक उन्नत हो। फ्रांस की सशस्त्र बल मंत्री कैथरीन वौत्रिन ने संसदीय सुनवाई के दौरान पुष्टि की कि जुलाई 2026 में परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। अब फ्रांस तकनीकी विकास और उत्पादन पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हुए इस महत्वाकांक्षी योजना को पूरा करना चाहता है।

    इस नई परियोजना का नाम अवियन डी कॉम्बैट डू फ्यूचर (ACF) रखा गया है, जिसका अर्थ भविष्य का लड़ाकू विमान है। इससे पहले यह कार्यक्रम फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) के नाम से जाना जाता था। जर्मनी और स्पेन के साथ संयुक्त रूप से आगे बढ़ने की योजना में मतभेद सामने आने के बाद फ्रांस ने अलग रास्ता चुना। फ्रांसीसी वायुसेना प्रमुख जनरल जेरोम बेलेंजर के मुताबिक, अब इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्तर पर विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य विमान के विकास से जुड़े अहम फैसलों और तकनीकी क्षमताओं पर फ्रांस का नियंत्रण बनाए रखना है।

    योजना के अनुसार, फ्रांस 2027 में नए विमान के प्रदर्शनकारी मॉडल यानी एयरक्राफ्ट डेमोंस्ट्रेटर पर काम शुरू करने की तैयारी कर रहा है। इस परियोजना में पहले से विकसित तकनीकों और राफेल के प्रस्तावित F5 संस्करण से मिलने वाली क्षमताओं का उपयोग किए जाने की योजना है। हालांकि, नए विमान के विकास के लिए विस्तृत तकनीकी कार्य और अन्य तैयारियां भी जरूरी होंगी। परियोजना का लक्ष्य 2040 के शुरुआती वर्षों तक इस छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को तैयार करना है। यदि तय समयसीमा के अनुसार काम आगे बढ़ता है, तो यह फ्रांस की वायुसेना के लिए भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    नए विमान की योजना केवल एक लड़ाकू जेट तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसमें ड्रोन, निर्देशित हथियारों और कॉम्बैट क्लाउड जैसी तकनीकों पर भी काम जारी रखने की बात कही गई है। कॉम्बैट क्लाउड का उद्देश्य युद्ध के दौरान विमान, ड्रोन और अन्य सैन्य प्रणालियों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान और समन्वय को बेहतर बनाना है। इस तरह की तकनीकें भविष्य के हवाई अभियानों में महत्वपूर्ण हो सकती हैं। हालांकि, इन सभी क्षमताओं के अंतिम स्वरूप और नए विमान में उनके इस्तेमाल से संबंधित विस्तृत जानकारी अभी स्पष्ट नहीं है।

    फ्रांस के सामने इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक इसका भारी वित्तीय खर्च है। देश के पास लड़ाकू विमान बनाने से जुड़ी महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमताएं हैं, लेकिन छठी पीढ़ी के विमान को अकेले विकसित करने के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी। फ्रांस आर्थिक चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। ऐसे में परियोजना को तय समय पर पूरा करने और विकास का खर्च उठाने के लिए उसे अतिरिक्त वित्तीय सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।

    इसी वजह से फ्रांस अब केवल तकनीकी साझेदारों के बजाय वित्तीय निवेशकों की तलाश कर रहा है। इस संदर्भ में भारत का नाम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत पहले ही फ्रांस के साथ इस परियोजना में जुड़ने की इच्छा जता चुका है। दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं को देखते हुए भारत की भागीदारी पर चर्चा की गुंजाइश बनी हुई है। हालांकि, भारत की भूमिका किस रूप में होगी, कितना निवेश किया जाएगा और दोनों देशों के बीच किस तरह की व्यवस्था बनेगी, इसे लेकर अभी कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

    स्वीडन के साथ भी संभावित सहयोग को लेकर चर्चा होने की जानकारी दी गई है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि फ्रांस अपनी नई रणनीति के तहत किन देशों को वित्तीय या अन्य सहयोग के लिए अपने साथ जोड़ता है। फिलहाल उसका प्रमुख लक्ष्य छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को 2040 के शुरुआती वर्षों तक तैयार करना है। जर्मनी और स्पेन के साथ संयुक्त परियोजना से अलग होने के बाद फ्रांस की यह नई योजना उसकी रक्षा नीति और भविष्य की सैन्य विमानन क्षमताओं के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • राहुल गांधी की हिरासत पर भड़के शशि थरूर, जर्मनी में होने के कारण प्रदर्शन से रहे दूर

    राहुल गांधी की हिरासत पर भड़के शशि थरूर, जर्मनी में होने के कारण प्रदर्शन से रहे दूर

    नई दिल्ली ।कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने पर चिंता जताते हुए सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए हैं। मंगलवार को नई दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ इंडिया गठबंधन के प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया था। देर रात राहुल गांधी और अन्य नेताओं को रिहा कर दिया गया। प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सके शशि थरूर ने कहा कि राहुल गांधी के साथ कथित हाथापाई की तस्वीरें देखकर वह बेहद परेशान हैं।

    शशि थरूर ने कहा कि ऐसे समय में विरोध प्रदर्शन करना उन नागरिकों के साथ खड़े होने जैसा है, जिनके संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया जा रहा है। उन्होंने राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने की तस्वीरों पर प्रतिक्रिया देते हुए सरकार के रुख को शर्मनाक बताया। थरूर ने यह भी कहा कि वह प्रदर्शन स्थल पर मौजूद नहीं थे, लेकिन उनका समर्थन विपक्षी आंदोलन के साथ है। उन्होंने अपने संदेश में न्याय मिलने की उम्मीद भी जताई।

    प्रदर्शन में खुद शामिल नहीं होने को लेकर शशि थरूर ने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि वह जर्मनी में एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए गए हुए हैं। उनके अनुसार, करीब चार महीने पहले बर्लिन में आयोजित होने वाली इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का वादा किया था। इसी प्रतिबद्धता के कारण वह दिल्ली के प्रदर्शन में नहीं पहुंच सके। उन्होंने कहा कि वह दूर रहकर ही अपना समर्थन दे सकते हैं, लेकिन उनकी भावनात्मक मौजूदगी प्रदर्शन कर रहे नेताओं के साथ है।

    इससे पहले मंगलवार को इंडिया गठबंधन के सांसदों ने संसद भवन से निर्वाचन सदन की ओर मार्च निकाला था। पुलिस ने संसद मार्ग पर नीति आयोग और आकाशवाणी भवन के सामने विपक्षी सांसदों को रोक दिया। इसके बाद कई सांसद सड़क पर धरने पर बैठ गए। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाद्रा और कांग्रेस तथा सहयोगी दलों के कुछ नेता आकाशवाणी भवन परिसर में बरगद के पेड़ के नीचे धरने पर बैठ गए। यह धरना दोपहर करीब 12:20 बजे शुरू हुआ और कई घंटे तक जारी रहा।

    धरने के दौरान राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर मतदाता सूची से जुड़े आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों के सांसद निर्वाचन आयुक्तों से मिलना चाहते हैं। राहुल गांधी के मुताबिक, करीब 300 सांसद मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों से मिलने पहुंचे थे, लेकिन उन्हें मिलने की अनुमति नहीं दी गई। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।

    पुलिस के अनुसार, मंगलवार रात करीब आठ बजे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाद्रा और अन्य विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने प्रदर्शन स्थल से करीब 260 लोगों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी दी, जिनमें 10 सांसद भी शामिल थे। हिरासत में लिए गए नेताओं में कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल, पवन खेड़ा, के. सुरेश, अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और इमरान प्रतापगढ़ी के अलावा तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओब्रायन और समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिबुल्ला नदवी भी शामिल थे। नेताओं को किंग्सवे कैंप ले जाया गया और करीब दो घंटे बाद रात 10 बजे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य नेताओं को रिहा कर दिया गया।

  • H-1B पर ट्रंप की सख्ती…. US छोड़ अब जर्मनी-ब्रिटेन जैसे देशों का रुख कर रहे भारतीय पेशेवर

    H-1B पर ट्रंप की सख्ती…. US छोड़ अब जर्मनी-ब्रिटेन जैसे देशों का रुख कर रहे भारतीय पेशेवर


    नई दिल्ली।
    अमेरिका (America) में एच-1बी वीजा (H-1B Visa) पर सख्ती और लगातार बदलते नियमों ने भारतीय पेशेवरों (Indian Professionals) और शोधकर्ताओं के कॅरिअर विकल्पों को बुरी तरह प्रभावित किया है। बीते एक साल में वीजा शुल्क और प्रक्रिया को लेकर अनिश्चितता बढ़ने के बीच भारतीय पेशेवर जर्मनी व ब्रिटेन (Germany and Britain) जैसे देशों का रुख कर रहे हैं। कुछ पेशेवर भारत लौटने का मन भी बना चुके हैं।

    अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स के ताजा आंकड़े इसके स्पष्ट संकेत दे रहे हैं। भौतिकी में पीएचडी करने वाले विदेशी स्कॉलर्स के अमेरिका छोड़ने की दर 2023-24 के 16% से बढ़कर 2024-25 में 29% हो गई। यह तीन दशक में एक साल की सबसे बड़ी बढ़ोतरी है। वहीं, 60% अमेरिकी विवि में विदेशी छात्रों के आवेदन में कमी आई है। चालू वित्त वर्ष के तो शुरुआती नौ महीने में वीजा आवेदन में 10% की बड़ी गिरावट आई है।


    पलायन के दर्द तक पहुंची सपनों की जिंदगी

    अमेरिकी मीडिया कंपनी बिजनेस इनसाइडर की पड़ताल में सामने आया कि अमेरिका में सपनों की जिंदगी से पलायन का दर्द कई भारतीयों की कहानी बन चुका है। शिकागो में काम कर रहीं वैज्ञानिक अनन्या जोशी को कंपनी ने एच-1बी स्पॉन्सरशिप से इन्कार दिया तो उन्हें जर्मनी शिफ्ट होना पड़ा। कोलंबिया यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स सुंजना रमना एच-1बी हासिल करने के लिए तीन बार प्रयास कर चुकी थीं। बाद में ब्रिटेन का हाई-पोटेंशियल वीजा हासिल कर लंदन में फिनटेक कंपनी में नौकरी हासिल की। वह कहती हैं, सपने को किसी एक देश से नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं और लक्ष्यों से जोड़ना चाहिए।


    60% अमेरिकी विवि में विदेशी छात्रों के आवेदन में आई कमी

    एच1-बी: भारतीय बड़े लाभार्थी
    भारत -69.9% (2,83,772)
    चीन-12.1% (49,161)
    अन्य देश- 18.0%

    विदेशी पेशेवर…नेशनल साइंस फाउंडेशन के मुताबिक अमेरिका के साइंस व इंजीनियरिंग कार्यबल में 22% विदेशी मूल के हैं। मास्टर डिग्री धारकों में 39% और पीएचडी धारकों में 46% वैज्ञानिक विदेशी मूल के हैं। एच-1बी के आवेदनों में 44.5% प्रोफेशनल-तकनीकी सेवाओं से, मैन्युफैक्चरिंग से 12.1%, आईटी से 9.9%, फाइनेंस से 9.0% जुड़े हैं।


    एक लाख डॉलर शुल्क से मची अफरातफरी

    ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल 20 सितंबर को एच-1बी वीजा की फीस बढ़ाकर एक लाख डॉलर कर दी थी। इस घोषणा के बाद एच-1बी कर्मचारियों और कंपनियों के बीच यात्रा और नौकरी को लेकर असमंजस पैदा हुआ। बाद की कानूनी प्रक्रिया में इस शुल्क के अमल पर रोक लगी, लेकिन सितंबर, 2026 में ट्रंप प्रशासन ने इस नीति को एक साल और बढ़ा दिया है।


    लौटेगी प्रतिभा तो भारत को मिलेगा फायदा

    अमेरिका में अवसरों की अनिश्चितता बढ़ने पर भारतीय पेशेवरों के लिए स्वदेश में कॅरिअर और उद्यमिता के विकल्प आकर्षक हो सकते हैं। भारतीय मूल के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की बड़ी संख्या पहले से ही देश में स्टार्टअप, आईटी, एआई और अनुसंधान क्षेत्रों से जुड़ी है। ऐसे में अवसर बढ़े हैं।

  • यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    यूरोप झुलसा रिकॉर्ड गर्मी से, WHO ने दी गंभीर चेतावनी; कई देशों में जनजीवन प्रभावित, स्वास्थ्य और बिजली व्यवस्था पर बढ़ा संकट

    नई दिल्ली । यूरोप इस समय भीषण हीटवेव की चपेट में है, जहां कई देशों में रिकॉर्ड स्तर का तापमान दर्ज किया जा रहा है। लगातार बढ़ती गर्मी ने स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली व्यवस्था और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर गंभीर दबाव पैदा कर दिया है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जबकि कई स्थानों पर अत्यधिक तापमान के कारण सामान्य जनजीवन भी प्रभावित हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का स्पष्ट संकेत है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। संगठन के अनुसार महाद्वीप का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। वर्तमान हीटवेव से लगभग 15 करोड़ लोग प्रभावित बताए जा रहे हैं। कई देशों में स्कूलों के संचालन पर असर पड़ा है और बिजली की मांग अचानक बढ़ने से ऊर्जा प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है।

    जर्मनी में अत्यधिक गर्मी का असर परिवहन व्यवस्था पर भी दिखाई दिया। लीपज़िग में तेज तापमान के कारण ट्राम की पटरियों को नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आईं, जिससे सेवाएं प्रभावित हुईं। वहीं राजधानी बर्लिन में लोगों को राहत पहुंचाने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर पानी का छिड़काव किया गया। कई शहरों में प्रशासन ने लोगों से दोपहर के समय घरों में रहने और अनावश्यक यात्रा से बचने की अपील की है।

    फ्रांस में स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जून के अंतिम सप्ताह के दौरान सामान्य से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं। अंतिम संस्कार से जुड़े संस्थानों पर भी काम का दबाव बढ़ा है। पेरिस सहित कई क्षेत्रों में श्मशान और कब्रिस्तानों की क्षमता पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की बात सामने आई है। स्थानीय प्रशासन स्थिति पर लगातार निगरानी रखे हुए है और आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

    युद्धग्रस्त यूक्रेन में यह हीटवेव नई चुनौती बनकर उभरी है। पहले से क्षतिग्रस्त ऊर्जा ढांचे पर बढ़ती बिजली मांग का दबाव बढ़ गया है। कई इलाकों में बिजली आपूर्ति को संतुलित रखने के लिए आपातकालीन कटौती लागू की गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध और भीषण गर्मी का संयुक्त प्रभाव देश की बिजली व्यवस्था के लिए गंभीर परीक्षा साबित हो रहा है।

    यूरोप के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। कई स्थानों पर सड़कें, रेल ढांचा और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं भीषण गर्मी से प्रभावित हुई हैं। सोशल मीडिया पर अत्यधिक तापमान से जुड़ी अनेक तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं, हालांकि प्रशासन लोगों से अपुष्ट सूचनाओं पर भरोसा न करने और केवल आधिकारिक सलाह का पालन करने की अपील कर रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ती हीटवेव केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का गंभीर संकेत है। अत्यधिक गर्मी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कृषि, ऊर्जा, परिवहन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसलिए दीर्घकालिक स्तर पर जलवायु अनुकूल नीतियों, हरित ऊर्जा के विस्तार और शहरी ढांचे को अत्यधिक तापमान के अनुरूप विकसित करने की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। वर्तमान हालात यह संकेत देते हैं कि यदि वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में इस तरह की चरम मौसमी घटनाएं और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं।

  • जर्मनी के लीपजिग में दर्दनाक हादसा: तेज रफ्तार कार भीड़ में घुसी, 2 की मौत, 22 घायल; पुलिस जांच में जुटी

    जर्मनी के लीपजिग में दर्दनाक हादसा: तेज रफ्तार कार भीड़ में घुसी, 2 की मौत, 22 घायल; पुलिस जांच में जुटी


    नई दिल्ली। जर्मनी के लीपजिग शहर में सोमवार शाम एक बड़ा हादसा हुआ, जब एक तेज रफ्तार कार भीड़भाड़ वाले शॉपिंग इलाके में घुस गई। इस घटना में 2 लोगों की मौत हो गई और 22 लोग घायल हो गए।

    कैसे हुआ हादसा?
    पुलिस के अनुसार, कार शहर के ऑगस्टसप्लात्ज क्षेत्र से होते हुए ग्रिमाइशे श्ट्रासे के शॉपिंग एरिया में घुसी और कई पैदल यात्रियों को टक्कर मारती चली गई। घटना के बाद इलाके में अफरा-तफरी मच गई।

    जानमाल का नुकसान
    इस हादसे में 63 वर्षीय महिला और 77 वर्षीय पुरुष की मौत हो गई, जबकि घायलों में कुछ की हालत गंभीर बताई जा रही है।

    आरोपी गिरफ्तार
    पुलिस ने मौके पर ही 33 वर्षीय जर्मन नागरिक को गिरफ्तार कर लिया है। अधिकारियों के मुताबिक, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि यह हादसा था या जानबूझकर किया गया हमला। जांच जारी है।प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि कार बहुत तेज गति से आई और अचानक भीड़ में घुस गई। लोगों में भगदड़ मच गई और कई लोग जान बचाने के लिए दुकानों और इमारतों में छिप गए।

    सुरक्षा पर सवाल
    जर्मनी में पिछले कुछ वर्षों में भीड़भाड़ वाले इलाकों में वाहनों से टक्कर की घटनाएं सामने आती रही हैं, जिससे सुरक्षा व्यवस्था पर फिर सवाल खड़े हो गए हैं। फिलहाल पुलिस मामले की गहराई से जांच कर रही है और आरोपी से पूछताछ जारी है।

  • जर्मनी से 5000 अमेरिकी सैनिकों की वापसी: बयानबाजी से बढ़ा तनाव, NATO पर मंडराया खतरा

    जर्मनी से 5000 अमेरिकी सैनिकों की वापसी: बयानबाजी से बढ़ा तनाव, NATO पर मंडराया खतरा


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और जर्मन चांसलर Friedrich Merz के बीच बढ़ते जुबानी टकराव के बीच अमेरिका ने जर्मनी से करीब 5,000 सैनिकों को वापस बुलाने का बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार यह प्रक्रिया अगले 6 से 12 महीनों में पूरी की जाएगी। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब ईरान मुद्दे पर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं।

    तनाव की शुरुआत उस वक्त हुई जब मर्ज ने एक कार्यक्रम में अमेरिका की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि वॉशिंगटन के पास स्पष्ट योजना नहीं है और ईरान के साथ उसकी कोशिशें बेअसर साबित हो रही हैं। इस बयान से नाराज ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए जर्मन नेतृत्व की आलोचना की और कहा कि उन्हें वैश्विक सुरक्षा की वास्तविक समझ नहीं है।

    दरअसल, जर्मनी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी लंबे समय से यूरोप में NATO की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा रही है। वर्तमान में जर्मनी में 36,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जो यूरोप में अमेरिका की सबसे बड़ी सैन्य मौजूदगी में से एक है। यहां के प्रमुख सैन्य ठिकाने जैसे Ramstein Air Base और स्टुटगार्ट स्थित कमांड सेंटर पूरे यूरोप, अफ्रीका और मध्य पूर्व में अमेरिकी अभियानों के लिए ‘लॉन्चिंग पैड’ का काम करते हैं।

    हालांकि, ट्रंप पहले भी जर्मनी से सैनिक हटाने की कोशिश कर चुके हैं। उन्होंने NATO के 2% रक्षा खर्च लक्ष्य को लेकर जर्मनी की आलोचना की थी और 12,000 सैनिकों की वापसी का प्रस्ताव रखा था, जिसे बाद में Joe Biden प्रशासन ने रोक दिया था। अब एक बार फिर सैनिकों की वापसी का फैसला सामने आने से यूरोप-अमेरिका संबंधों में खटास बढ़ती दिख रही है।

    इस फैसले के पीछे एक बड़ी रणनीति भी मानी जा रही है। ट्रंप प्रशासन यूरोप से सैन्य फोकस हटाकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र की ओर बढ़ाना चाहता है, ताकि China के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह फैसला लागू होता है, तो इससे NATO की एकजुटता कमजोर हो सकती है और यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। साथ ही, यह संदेश भी जा सकता है कि अमेरिका अब अपने पारंपरिक सहयोगियों के प्रति पहले जितना प्रतिबद्ध नहीं है।

    कुल मिलाकर, जर्मनी से सैनिकों की संभावित वापसी सिर्फ एक सैन्य निर्णय नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति और शक्ति संतुलन का संकेत है, जिसका असर आने वाले समय में यूरोप और दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था पर साफ दिखाई दे सकता है।

  • जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा US…. ईरान युद्ध के बीच सहयोगियों से बिगड़े रिश्ते

    जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा US…. ईरान युद्ध के बीच सहयोगियों से बिगड़े रिश्ते


    वाशिंगटन।
    ईरान (Iran) के साथ चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका (America) के उसके यूरोपियन सहयोगियों के साथ भी संबंध खराब होने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका (America) ने जर्मनी (Germany) से अपने 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। बता दें कि अभी गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज (German Chancellor Friedrich Merz) पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अपने “टूटे हुए देश” पर ध्यान दें और ईरान युद्ध के बारे में सोचने में समय बर्बाद न करें।


    जर्मनी के चांसलर और ट्रंप में बयानबाजी

    ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मर्ज को “रूस-यूक्रेन को युद्ध समाप्त कराने” और “अपने टूटे हुए देश को ठीक करने (खास तौर पर आव्रजन और ऊर्जा के मामले में)” पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए तथा ईरान युद्ध के बारे में सोचने में कम समय खर्च करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका जर्मनी में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाने पर विचार कर रहा रहा है। जर्मनी उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक प्रमुख सहयोगी और यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डा हैं।


    जर्मनी से बटालिय वापस बुलाएगा अमेरिका

    पेंटागन के एक सीनियर अधइकारी ने कहा था कि जर्मनी के चांसलर के बयान बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इससे उन्हें नुकसान होने वाला है। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले के वक्त यूरोप से सैनिकों को वापस बुलाया गया था, उसी तरह का अभियान इस बार भी चलाया जाएगा। यूरोप में बड़ी संख्या में सैनिकों में कटौती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी में मौजूद ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को भी वापस बुला लिया जाएगा। यहां लॉन्ग रेंज फायर बटालियन पर भी रोक लगा दी गई है।

    ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका के उसके यूरोपियन सहयोगियों के साथ भी संबंध खराब होने लगे हैं। इसी बीच अमेरिका ने जर्मनी से अपने 5 हजार सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला किया है। बता दें कि अभी गुरुवार को ही डोनाल्ड ट्रंप ने जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि अपने “टूटे हुए देश” पर ध्यान दें और ईरान युद्ध के बारे में सोचने में समय बर्बाद न करें।

    जर्मनी के चांसलर और ट्रंप में बयानबाजी
    ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मर्ज को “रूस-यूक्रेन को युद्ध समाप्त कराने” और “अपने टूटे हुए देश को ठीक करने (खास तौर पर आव्रजन और ऊर्जा के मामले में)” पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए तथा ईरान युद्ध के बारे में सोचने में कम समय खर्च करना चाहिए। इससे पहले बुधवार को ट्रंप ने धमकी दी थी कि अमेरिका जर्मनी में अपनी सैन्य मौजूदगी घटाने पर विचार कर रहा रहा है। जर्मनी उत्तर एटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक प्रमुख सहयोगी और यूरोपीय संघ (ईयू) की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जहां अमेरिका के कई अहम सैन्य अड्डा हैं।


    जर्मनी से बटालिय वापस बुलाएगा अमेरिका

    पेंटागन के एक सीनियर अधइकारी ने कहा था कि जर्मनी के चांसलर के बयान बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण हैं और इससे उन्हें नुकसान होने वाला है। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि जिस तरह से यूक्रेन पर रूस के हमले के वक्त यूरोप से सैनिकों को वापस बुलाया गया था, उसी तरह का अभियान इस बार भी चलाया जाएगा। यूरोप में बड़ी संख्या में सैनिकों में कटौती की जाएगी। इसके अलावा जर्मनी में मौजूद ब्रिगेड कॉम्बैट टीम को भी वापस बुला लिया जाएगा। यहां लॉन्ग रेंज फायर बटालियन पर भी रोक लगा दी गई है।


    NATO में पैदा हो गया नया तनाव

    डोनाल्ड ट्रंप पहले से ही नाटो को महत्व कम देते थे। वहीं जब होर्मुज बंद होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो देशों का आह्वान किया तो किसी ने साथ नहीं दिया। ऐसे में ईरान संकट के बीच नाटो में भी काफी तनाव पैदा हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कहते रहे हैं कि नाटो देशों ने होर्मुज खुलवाने में उनका साथ नहीं दिया।

    इसी बीच वाइट हाउस ने संसद को लिखे एक पत्र में कहा है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सशस्त्र बलों की निरंतर उपस्थिति के बावजूद वह ईरान के साथ युद्ध को खत्म ही मानता है। राष्ट्रपति ट्रंप के इस संदेश के जरिए ईरान के साथ युद्ध जारी रखने के लिए संसद सदस्यों की मंजूरी प्राप्त करने की एक मई की कानूनी समय सीमा को प्रभावी ढंग से दरकिनार कर दिया गया है।