Tag: Ghatasthapana Muhurat
-

भोपाल में नवरात्रि की धूम, घटस्थापना के साथ मां शैलपुत्री की आराधना शुरू, मंदिरों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
नई दिल्ली। शारदीय नवरात्रि के शुभारंभ के साथ ही राजधानी भोपाल में मां दुर्गा की भक्ति और आराधना का माहौल बन गया है। नौ दिनों तक चलने वाले शक्ति उपासना के इस पर्व के पहले दिन घरों और मंदिरों में घटस्थापना के साथ मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा अर्चना की जा रही है। शहर के प्रमुख देवी मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं और श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। तलैया स्थित काली माता मंदिर पीर गेट की कर्फ्यू वाली माता मंदिर और प्लेटिनम प्लाजा स्थित माता मंदिर सहित अन्य धार्मिक स्थलों पर भक्त मां के दर्शन कर परिवार की सुख समृद्धि और खुशहाली की कामना कर रहे हैं।ज्योतिष मठ संस्थान भोपाल के ज्योतिषाचार्य पंडित विनोद गौतम के अनुसार इस वर्ष पूरे नौ दिनों की नवरात्रि का संयोग बना है। नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के अलग अलग स्वरूपों की पूजा की जाएगी। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस बार माता रानी का आगमन हाथी पर माना गया है जिसे शुभता समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना का विशेष महत्व है। पंडित गौतम के मुताबिक रविवार को घटस्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक निर्धारित बताया गया है। चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग के कारण अभिजीत काल में घटस्थापना को बेहतर माना गया है। प्रदोष काल में अखंड ज्योति स्थापित करने की परंपरा निभाई जाएगी जबकि तांत्रिक साधक मध्यरात्रि में विशेष पूजा करेंगे।नवरात्रि के नौ दिनों में श्रद्धालु मां दुर्गा के अलग अलग स्वरूपों की पूजा के साथ विशेष भोग अर्पित करेंगे। घरों में कलश स्थापना के बाद दीप प्रज्ज्वलित कर मंत्र जाप दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाएगा। कई श्रद्धालु नौ दिनों तक व्रत रखेंगे और सात्विक भोजन के साथ संयमित दिनचर्या अपनाएंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों में झूठ बोलने क्रोध करने और परिवार में विवाद से बचना चाहिए। माता पिता की सेवा गुरुजनों का सम्मान और महिलाओं के प्रति आदर का भाव रखने पर भी विशेष जोर दिया जाता है। भक्त देवी मां के दर्शन के दौरान नारियल लाल चुनरी लाल फूल कुमकुम और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर सकते हैं। यदि पूजन सामग्री उपलब्ध न हो तो श्रद्धापूर्वक मंत्र जाप और मां के नामों का स्मरण भी किया जा सकता है।पंचांग के अनुसार नवरात्रि के दौरान 18 अक्टूबर को महाअष्टमी और 19 अक्टूबर को महानवमी मनाई जाएगी। इसके बाद 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा का पर्व मनाया जाएगा। अंतिम दिनों में मंदिरों में विशेष पूजा अनुष्ठान और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के मंदिर पहुंचने की उम्मीद है।नवरात्रि के उत्साह का असर मां दुर्गा की प्रतिमाओं के बाजार में भी दिखाई दे रहा है। हबीबगंज बंगाली कॉलोनी स्थित प्रतिबिंब दक्षिणेश्वर कालीबाड़ी कला केंद्र में इस बार मां दुर्गा की करीब 160 प्रतिमाएं तैयार की गई हैं। केंद्र के मूर्तिकार उत्तम कुमार नंदी के मुताबिक मूर्ति निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री महंगी होने से लागत बढ़ गई है। पहले 35 रुपये में मिलने वाली सामग्री अब 45 रुपये में मिल रही है। इसके बावजूद प्रतिमाओं की मांग बनी हुई है। केंद्र में पिछले 10 से 12 वर्षों से प्रतिमाएं बनाई जा रही हैं और पश्चिम बंगाल तथा कोलकाता से आए करीब 12 से 13 कारीगर इस काम में जुटे हैं। यहां तैयार सबसे ऊंची प्रतिमा 12 फीट की है। प्रतिमाएं श्रद्धालुओं की पसंद के अनुसार बुक की जा रही हैं। नवरात्रि के आगमन के साथ भोपाल में आस्था उत्साह और भक्ति का माहौल है। श्रद्धालु मां दुर्गा की आराधना कर सुख शांति और समृद्धि की कामना कर रहे हैं। -

मां दुर्गा की भक्ति में डूबेगा देश, नौ दिनों तक होगी शक्ति की उपासना, घटस्थापना से कन्या पूजन तक जानिए नवरात्रि की पूरी परंपरा
नई दिल्ली । देशभर में शारदीय नवरात्रि के आगमन के साथ ही मां दुर्गा की भक्ति और आराधना का विशेष पर्व शुरू हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पावन उत्सव को लेकर भक्तों में उत्साह और श्रद्धा का माहौल है। घरों से लेकर मंदिरों तक पूजा की तैयारियां की जा रही हैं और देवी के स्वागत के लिए पूजा स्थल सजाए जा रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा करने पर सुख समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि का समापन 19 अक्टूबर को होगा जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा। इन नौ दिनों में भक्त पूजा पाठ व्रत और सेवा के माध्यम से मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करेंगे।नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना का विशेष महत्व माना जाता है। इसे कलश स्थापना भी कहा जाता है और इसी के साथ देवी उपासना की शुरुआत होती है। घटस्थापना से पहले घर के पूजा स्थल की अच्छी तरह साफ सफाई करनी चाहिए। इसके बाद चौकी पर लाल या स्वच्छ कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा अथवा तस्वीर स्थापित की जाती है। परंपरा के अनुसार मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और निर्धारित विधि से कलश की स्थापना की जाती है। कलश को शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद दीपक जलाकर मां दुर्गा का ध्यान किया जाता है और उन्हें फूल अक्षत फल तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। घटस्थापना का शुभ मुहूर्त स्थान और पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है इसलिए पूजा से पहले स्थानीय पंचांग में दिए गए समय की पुष्टि करना उचित है।नवरात्रि के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है। पहले दिन मां शैलपुत्री दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी तीसरे दिन मां चंद्रघंटा चौथे दिन मां कूष्मांडा पांचवें दिन मां स्कंदमाता छठे दिन मां कात्यायनी और सातवें दिन मां कालरात्रि की आराधना होती है। आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। भक्त अपनी पारिवारिक परंपराओं और श्रद्धा के अनुसार नौ दिनों तक व्रत रखते हैं। कुछ श्रद्धालु पूरे नौ दिन उपवास करते हैं जबकि कुछ पहले और अंतिम दिन व्रत रखकर देवी की उपासना करते हैं। व्रत के दौरान फलाहार और सात्विक भोजन को प्राथमिकता दी जाती है।धार्मिक मान्यताओं के साथ नवरात्रि का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। कहीं दुर्गा पूजा के भव्य पंडाल सजाए जाते हैं तो कहीं गरबा और डांडिया के आयोजन भक्तों को आकर्षित करते हैं। मंदिरों में विशेष आरती भजन और कीर्तन होते हैं। अष्टमी और नवमी के अवसर पर कई परिवार कन्या पूजन करते हैं और छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर भोजन कराते हैं। जरूरतमंदों की सहायता और दान पुण्य को भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।नवरात्रि के दौरान पूजा स्थल की स्वच्छता बनाए रखना श्रद्धापूर्वक पूजा करना और अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखना जरूरी है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर लंबे समय तक भूखे रहने से बचना चाहिए और जरूरत के अनुसार पौष्टिक आहार लेना चाहिए। नवरात्रि केवल उपवास और धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं बल्कि आत्मसंयम सकारात्मकता और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश भी देता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा से परिवार की खुशहाली सुख शांति और जीवन में सफलता की कामना करते हैं। विजयादशमी के साथ इस पर्व का समापन होगा और श्रद्धालु धर्म की विजय तथा अधर्म के अंत का संदेश लेकर आगे बढ़ेंगे। -

Navratri 2026 Date: 11 अक्टूबर से शुरू होंगे शारदीय नवरात्र चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग में घटस्थापना का मिलेगा विशेष अवसर
नई दिल्ली। शारदीय नवरात्र 2026 इस बार एक विशेष ज्योतिषीय संयोग के कारण चर्चा में हैं। मां दुर्गा की आराधना का यह पावन पर्व इस वर्ष 11 अक्टूबर से शुरू होगा और पूरे 10 कैलेंडर दिनों तक चलेगा। पंचांग की गणना के अनुसार करीब 50 वर्षों में छठी बार ऐसा संयोग बन रहा है जब तिथि के विस्तार के कारण नवरात्र की अवधि सामान्य से अधिक होगी। इस दौरान अष्टमी तिथि दो दिन पड़ने के कारण पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का कार्यक्रम भी खास रहेगा। श्रद्धालु घरों और मंदिरों में मां भगवती की उपासना करेंगे और पूरे विधि-विधान से घटस्थापना कर नवरात्र की शुरुआत करेंगे।काशी के विद्वान ज्योतिषियों के अनुसार जब किसी तिथि की अवधि एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय के बाद तक बनी रहती है तो पंचांग की गणना में उसका प्रभाव लगातार दो दिनों तक माना जा सकता है। इसी तरह तिथि के विस्तार से इस बार नवरात्र की अवधि 10 कैलेंडर दिनों की हो रही है। बीएचयू के ज्योतिष विभाग के ज्योतिषाचार्य प्रोफेसर सुभाष पांडेय के अनुसार नवरात्र के पहले दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग का संयोग बन रहा है। इस वजह से घटस्थापना के शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व रहेगा।
पंचांग के अनुसार 11 अक्टूबर को घटस्थापना के लिए अभिजीत मुहूर्त सुबह नहीं बल्कि दोपहर में निर्धारित किया गया है। कलश स्थापना का शुभ समय सुबह 11 बजकर 37 मिनट से दोपहर 12 बजकर 23 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालुओं को पूजा संकल्प और घटस्थापना के लिए कुल 48 मिनट का समय मिलेगा। जो भक्त पूरे नौ दिनों तक व्रत रखकर मां दुर्गा की आराधना करते हैं वे इस अवधि में विधि-विधान से कलश स्थापित कर पूजा आरंभ कर सकते हैं। हालांकि स्थानीय पंचांग और पूजा परंपरा के अनुसार मुहूर्त में अंतर हो सकता है इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के पंचांग से भी जानकारी लेनी चाहिए।
तिथियों की गणना के मुताबिक 18 अक्टूबर को पूरे दिन अष्टमी तिथि रहेगी जबकि 19 अक्टूबर की सुबह 7 बजकर 53 मिनट तक अष्टमी का प्रभाव बना रहेगा। इसके बाद नवमी तिथि शुरू होगी जो 20 अक्टूबर की सुबह 9 बजकर 29 मिनट तक रहेगी। इसी कारण इस बार नवरात्र का कैलेंडर दस दिनों का होगा। पंचांग के अनुसार 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। इस दिन नवरात्र के समापन के साथ दशहरा पर्व का धार्मिक महत्व भी रहेगा। कन्या पूजन और व्रत पारण करने वाले श्रद्धालुओं को तिथि और स्थानीय परंपरा के अनुसार समय का ध्यान रखना होगा।
इस बार मां दुर्गा के आगमन और प्रस्थान को लेकर भी ज्योतिषीय मान्यताओं में विशेष चर्चा है। शास्त्रीय गणना के अनुसार रविवार से नवरात्र शुरू होने के कारण मां दुर्गा का आगमन हाथी पर माना जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं में हाथी पर देवी के आगमन को अच्छी वर्षा और अतिवृष्टि के संकेत से जोड़ा जाता है। वहीं देवी का प्रस्थान मुर्गे पर होने की मान्यता है जिसे कुछ परंपराओं में जनमानस की व्याकुलता और अशांति से जोड़कर देखा जाता है। ये ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताएं हैं इन्हें निश्चित भविष्यवाणी या वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
नवरात्र के दौरान भक्त मां शैलपुत्री से लेकर मां सिद्धिदात्री तक नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं। घरों में अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है और मंदिरों में विशेष श्रृंगार भजन कीर्तन तथा धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि सच्ची श्रद्धा और विधि-विधान से की गई आराधना से जीवन में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इस तरह 2026 का शारदीय नवरात्र तिथि विस्तार शुभ मुहूर्त और विशेष धार्मिक मान्यताओं के कारण भक्तों के लिए महत्वपूर्ण रहने वाला है।
-

चैत्र नवरात्रि 2026: पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा से पाएँ सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद
नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व आज 19 मार्च 2026 से आरंभ हो चुका है जो 27 मार्च 2026 को राम नवमी के दिन संपन्न होगा। हिंदू धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व है क्योंकि इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित होता है जिन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री और सौभाग्य की देवी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने से जीवन में स्थिरता सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति प्राप्त होती है।ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस वर्ष घटस्थापना यानी कलश स्थापना के लिए दो शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। पहला मुहूर्त सुबह 06:52 से 07:43 तक रहेगा जिसकी अवधि लगभग 50 मिनट है। यदि इस समय पूजा संभव न हो तो अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 से 12:53 तक विशेष फलदायी माना गया है। शुभ मुहूर्त में की गई पूजा घर में सुख-समृद्धि और बरकत लेकर आती है।
पूजा की शुरुआत प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने से होती है। इसके बाद घर के पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा या मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। विधिपूर्वक कलश स्थापना की जाती है जो नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। इसके बाद मां शैलपुत्री का ध्यान करते हुए उन्हें सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं क्योंकि सफेद रंग उन्हें अत्यंत प्रिय है।
भोग के रूप में मां को गाय के दूध से बनी मिठाई या अन्य सफेद खाद्य पदार्थ अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान घी का अखंड दीपक जलाना शुभ माना जाता है जिससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सकारात्मक वातावरण का निर्माण होता है। श्रद्धा और भक्ति के साथ मंत्रोच्चारण और प्रार्थना करने से मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
पूजा के समापन पर आरती का विशेष महत्व होता है। सुबह की आरती सूर्योदय के समय और शाम की आरती सूर्यास्त के बाद करना शुभ माना जाता है। परिवार के सभी सदस्यों का एक साथ आरती में शामिल होना घर में प्रेम एकता और सामंजस्य को बढ़ाता है। मां शैलपुत्री की आरती के माध्यम से भक्त अपनी मनोकामनाएं व्यक्त करते हैं और जीवन में सुख-संपत्ति की कामना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री की पूजा से व्यक्ति के जीवन में स्थिरता आती है और मन के विकार दूर होते हैं। जो भक्त सच्चे मन से उनकी आराधना करते हैं उन्हें हर प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख शांति तथा समृद्धि का आगमन होता है। इस प्रकार नवरात्रि का पहला दिन आध्यात्मिक ऊर्जा और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।