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मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा से खुलेगा सुख समृद्धि का मार्ग, जानिए नवरात्रि के पहले दिन क्या करें और किन बातों का रखें ध्यान
नई दिल्ली । शारदीय नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा की उपासना और शक्ति की आराधना का विशेष अवसर माना जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी के नौ स्वरूपों की विधि विधान से पूजा की जाती है। इस पावन पर्व के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और उन्हें मां दुर्गा का प्रथम स्वरूप माना जाता है। नवरात्रि की शुरुआत में भक्त मां शैलपुत्री से सुख शांति साहस और समृद्धि की कामना करते हैं। मंदिरों और घरों में पूजा की तैयारियां की जाती हैं और घटस्थापना के साथ देवी उपासना का शुभारंभ होता है। मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से मां शैलपुत्री की पूजा करने से भक्तों को मानसिक शक्ति और सकारात्मकता प्राप्त होती है।मां शैलपुत्री का स्वरूप अत्यंत दिव्य और कल्याणकारी माना जाता है। धार्मिक चित्रों में उन्हें वृषभ यानी बैल पर विराजमान दिखाया जाता है। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल का फूल होता है। मां शैलपुत्री को प्रकृति और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार वे पूर्व जन्म में राजा दक्ष की पुत्री सती थीं और भगवान शिव से उनका विवाह हुआ था। अगले जन्म में उन्होंने हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और शैलपुत्री कहलायीं। इसी कारण नवरात्रि के पहले दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। भक्त मां के इस स्वरूप की आराधना करके जीवन में स्थिरता और दृढ़ संकल्प की कामना करते हैं।नवरात्रि के पहले दिन पूजा की शुरुआत सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनने से की जाती है। इसके बाद पूजा स्थल की साफ सफाई करके चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाया जाता है और मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। परंपरा के अनुसार सबसे पहले शुभ मुहूर्त में घटस्थापना की जाती है। इसके लिए मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और विधि के अनुसार जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। इसके बाद दीपक जलाकर मां शैलपुत्री का ध्यान किया जाता है। उन्हें फूल अक्षत चंदन धूप दीप और फल अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप किया जा सकता है। उनका प्रचलित मंत्र है ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः। भक्त अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार आरती करके पूजा संपन्न करते हैं।मां शैलपुत्री की पूजा में सफेद रंग का विशेष महत्व बताया जाता है। कई धार्मिक परंपराओं में उन्हें सफेद फूल और सफेद रंग से जुड़ी पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। भोग में शुद्ध घी अर्पित करने की मान्यता भी प्रचलित है। श्रद्धालु पूजा के समय परिवार की सुख समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करते हैं। हालांकि पूजा सामग्री और भोग की परंपराएं अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती हैं। घटस्थापना का शुभ समय भी स्थान और पंचांग के अनुसार अलग होता है इसलिए पूजा से पहले स्थानीय पंचांग में मुहूर्त की पुष्टि करना उचित है।नवरात्रि के पहले दिन कई भक्त उपवास भी रखते हैं। कुछ लोग पूरे नौ दिनों तक व्रत करते हैं जबकि कुछ पहले और अंतिम दिन उपवास रखते हैं। व्रत के दौरान फलाहार और सात्विक भोजन का सेवन किया जाता है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर अपनी क्षमता के अनुसार भोजन करना चाहिए और लंबे समय तक भूखे रहने से बचना चाहिए। मां शैलपुत्री की आराधना के साथ नवरात्रि का शुभारंभ भक्तों को श्रद्धा अनुशासन और सकारात्मक सोच का संदेश देता है। नौ दिनों तक चलने वाली यह उपासना मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों के प्रति भक्ति प्रकट करने का अवसर है। -

शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू, जानें घटस्थापना का शुभ मुहूर्त और विजयादशमी की तारीख
नई दिल्ली: मां दुर्गा की आराधना का प्रमुख पर्व शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होने जा रहा है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के साथ धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होती है। इसके बाद नौ दिनों तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना की जाती है। पर्व के अंतिम चरण में अष्टमी या नवमी पर कन्या पूजन की परंपरा निभाई जाती है। इसके अगले दिन विजयादशमी मनाई जाती है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से शुरू होकर 20 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ संपन्न होंगे।हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर 2026 को रात 9 बजकर 18 मिनट पर शुरू होगी। यह तिथि 11 अक्टूबर को रात 9 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर शारदीय नवरात्र का पहला दिन 11 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इसी दिन घरों और मंदिरों में कलश स्थापना की जाएगी और मां दुर्गा की पूजा शुरू होगी। नवरात्र के दौरान श्रद्धालु अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार व्रत रखते हैं। कई भक्त पूरे नौ दिन उपवास करते हैं, जबकि कुछ लोग पहले और अंतिम दिन व्रत रखकर पूजा-अर्चना करते हैं। इन दिनों देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
शारदीय नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु इन समयावधियों में अपनी परंपरा के अनुसार कलश स्थापना कर सकते हैं। घटस्थापना को नवरात्र पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, क्योंकि इसी के साथ देवी आराधना और नौ दिनों के धार्मिक अनुष्ठानों का आरंभ होता है। पूजा की तैयारी करते समय श्रद्धालु पूजा स्थल की सफाई करते हैं और आवश्यक सामग्री एकत्र करते हैं। मुहूर्त में कलश स्थापित करने के बाद मां दुर्गा का ध्यान करके परिवार के लिए सुख-शांति और मंगल की प्रार्थना की जाती है।
नवरात्र के पहले दिन पूजा करने के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के पूजा स्थल की सफाई करके वहां चौकी स्थापित करें। चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर रखें। पूजा आरंभ करने से पहले भगवान गणेश का स्मरण करें और फिर विधि-विधान से घटस्थापना करें। कलश स्थापित करने के लिए उसमें साफ जल भरें। परंपरा के अनुसार, कलश में अक्षत, सुपारी और सिक्का भी रखा जा सकता है। इसके बाद कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते रखें और लाल कपड़े में लपेटा हुआ नारियल उसके ऊपर स्थापित करें। कलश स्थापना करते समय मां दुर्गा का ध्यान करें और घर-परिवार की सुख-शांति तथा मंगल की कामना करें।
घटस्थापना के बाद मां दुर्गा को रोली, अक्षत, सिंदूर, फूल, माला, फल और मिठाई अर्पित करें। पूजा स्थल पर दीपक और धूप जलाएं। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार दुर्गा सप्तशती, देवी मंत्र या दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं। पूजा के अंत में मां दुर्गा की आरती करें और प्रसाद वितरित करें। इसके बाद नौ दिनों तक देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्र के अंतिम दिनों में अष्टमी या नवमी के अवसर पर कन्या पूजन करने की परंपरा भी प्रचलित है। इस दौरान कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। नौ दिनों की आराधना के बाद 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा, जिसके साथ शारदीय नवरात्र का समापन होगा।
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शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू, पहले दिन घटस्थापना के लिए जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और जरूरी सामग्री
नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का पर्व 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू होगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक उत्सव में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान घर में सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होती है। इस दिन विधि-विधान से कलश स्थापित करने की परंपरा है।घटस्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु इन समयावधियों को ध्यान में रखकर पूजा की तैयारी कर सकते हैं। कलश स्थापना नवरात्रि की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। इसके बाद भक्त मां दुर्गा की आराधना करते हुए नौ दिनों तक पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
कलश स्थापना से पहले पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिए। इसके लिए चौड़े मुंह वाला मिट्टी का पात्र, साफ मिट्टी, जौ, कलश, गंगाजल, शुद्ध पानी, सिक्का, सुपारी, साबुत चावल यानी अक्षत, दूर्वा, रोली और कलावा की जरूरत होती है। इसके साथ ही आम या अशोक के पांच अथवा सात पत्ते और पानी वाला नारियल भी रखना चाहिए। पूजा के लिए लाल कपड़ा या चुनरी, फूल, फल, पान, इलायची, लौंग, घी का दीपक, मिठाई और बताशे भी उपयोगी सामग्री हैं।
नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। इस चौकी पर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। फिर पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। इसके बाद माता रानी को फूल, चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। पूजा शुरू करने से पहले सभी आवश्यक सामग्री व्यवस्थित रखना सुविधाजनक होता है।
घटस्थापना की प्रक्रिया में सबसे पहले मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी डालकर जौ बोए जाते हैं। इसके ऊपर मिट्टी की हल्की परत डालें और थोड़ा पानी छिड़कें। इसके बाद इस पात्र को पूजा स्थल पर रख दें। नवरात्रि के नौ दिनों तक जौ में थोड़ा-थोड़ा पानी डालते रहना चाहिए, ताकि उनमें अंकुर निकल सकें। धार्मिक परंपरा में जौ बोने को समृद्धि और अच्छी फसल के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसे नई शुरुआत और खुशहाली से भी जोड़ा जाता है।
इसके बाद कलश पर कलावा बांधें और उसमें गंगाजल तथा साफ पानी भरें। कलश में साबुत सुपारी, सिक्का, अक्षत और हल्दी की गांठ जैसी शुभ वस्तुएं रखी जा सकती हैं। फिर कलश के मुख पर आम या अशोक के पांच अथवा सात पत्ते सजाएं और उसके ऊपर नारियल स्थापित करें। तैयार कलश को जौ वाले पात्र के पास रखें। इसके बाद मां दुर्गा के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप, फूल, फल तथा मिठाई अर्पित करें। अंत में मां दुर्गा के मंत्रों का जाप कर आरती करें।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में बोए गए जौ का अच्छी तरह अंकुरित होना शुभ संकेत माना जाता है। जौ को समृद्धि और अच्छी फसल से जोड़ने की परंपरा के चलते घटस्थापना के दौरान इन्हें विशेष महत्व दिया जाता है। इस प्रकार कलश स्थापना, जौ बोने और मां दुर्गा की पूजा के साथ नवरात्रि के नौ दिवसीय पर्व का आरंभ होता है।
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नवरात्र शुरू होने से पहले निपटा लें ये 5 जरूरी काम, पूजा में बाधा से बचने के लिए अभी कर लें तैयारी
नई दिल्ली: शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले हैं। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के साथ मां दुर्गा की पूजा-अर्चना शुरू होगी और इसके बाद लगातार नौ दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे। नवरात्र के दौरान पूजा में किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए कुछ जरूरी तैयारियां पहले ही पूरी करने की सलाह दी जाती है। इनमें घर की साफ-सफाई से लेकर पूजा सामग्री जुटाने और ऐसे काम पूरे करने तक की बातें शामिल हैं, जिन्हें नवरात्र के दौरान करना वर्जित माना जाता है।नवरात्र से पहले सबसे पहले पूरे घर की अच्छी तरह सफाई करने की बात कही गई है। घर के कोने-कोने की सफाई के साथ टूटी-फूटी और कबाड़ की चीजों को भी बाहर कर देना चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल की भी अच्छी तरह सफाई करनी चाहिए। भगवान के वस्त्र और पूजा के बर्तनों को धोकर साफ करने के साथ पूजा सामग्री रखने की जगह को भी व्यवस्थित करना जरूरी बताया गया है। पूजा स्थल पर मौजूद निर्माल्य को हटा देना चाहिए और जो पूजा सामग्री खत्म हो गई है, उसकी सूची बनाकर उसे पहले ही खरीद लेना चाहिए।
यदि नवरात्र में अखंड ज्योति जलानी है या घटस्थापना करनी है, तो उससे जुड़ी सभी जरूरी सामग्री एक दिन पहले ही लाकर रख लेने की सलाह दी गई है। पूजा के लिए साफ चौकी की व्यवस्था भी पहले कर लेनी चाहिए, ताकि नवरात्र के पहले दिन पूजा की तैयारियों में जल्दबाजी न करनी पड़े। घर की सफाई और पूजा स्थल की व्यवस्था पहले से पूरी होने पर नौ दिनों तक पूजा-पाठ के दौरान जरूरी चीजें आसानी से उपलब्ध रह सकती हैं।
नवरात्र से पहले घर में रखी तामसिक चीजों को हटाने की भी बात कही गई है। इनमें लहसुन-प्याज, नॉनवेज और शराब जैसी चीजें शामिल हैं। यदि किसी कारण से इन्हें घर से पूरी तरह हटाना संभव न हो, तो इन्हें अलग स्थान पर रखने की सलाह दी गई है। इन्हें पूजा स्थल या उस जगह के पास नहीं रखना चाहिए, जहां भोग तैयार किया जाता है। जिन घरों में नॉनवेज भोजन बनाया जाता है, वहां भोग, प्रसाद और व्रत का भोजन तैयार करने के लिए अलग बर्तनों की व्यवस्था करने की सलाह दी गई है। नॉनवेज बनाने वाले बर्तनों में भोग या व्रत का भोजन नहीं बनाना चाहिए।
नवरात्र के दौरान बाल और नाखून कटवाना वर्जित माना जाता है। खासतौर पर नवरात्र का व्रत रखने वाले लोगों को इन नौ दिनों में बाल और नाखून नहीं कटवाने की सलाह दी जाती है। इसलिए यह काम नवरात्र शुरू होने से पहले ही पूरा कर लेना बेहतर बताया गया है। इन तैयारियों के अलावा घटस्थापना के मुहूर्त की जानकारी भी पहले से रखना जरूरी है। 11 अक्टूबर 2026 को घटस्थापना के लिए सुबह का शुभ मुहूर्त 6:19 बजे से 10:12 बजे तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा। नवरात्र की पूजा के लिए घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई तथा आवश्यक सामग्री की व्यवस्था पहले से करने से तैयारियों को समय पर पूरा किया जा सकता है।
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शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर से, जानें घटस्थापना, अष्टमी-नवमी और दशहरा की पूरी तारीख
नई दिल्ली: शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर, रविवार से होगी। इसी दिन घटस्थापना के साथ मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा का सिलसिला शुरू होगा। नवरात्रि का समापन 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा के साथ होगा। इस बार अष्टमी और नवमी की तिथियों के संयोग के कारण दोनों से जुड़े पूजा-अनुष्ठान 19 अक्टूबर को किए जाएंगे। नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास भी रखते हैं।11 अक्टूबर को नवरात्रि के पहले दिन प्रतिपदा तिथि पर घटस्थापना और मां शैलपुत्री की पूजा होगी। घटस्थापना को कलश स्थापना भी कहा जाता है। इस दौरान कलश स्थापित करने के साथ जौ बोने की परंपरा भी है। दिए गए पंचांग के अनुसार, 11 अक्टूबर को घटस्थापना का शुभ समय सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक बताया गया है। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक रहेगा। घटस्थापना का समय अलग-अलग शहरों में स्थानीय सूर्योदय और पंचांग की गणना के कारण कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना उचित माना गया है।
नवरात्रि की प्रमुख तिथियों के अनुसार 12 अक्टूबर को द्वितीया पर मां ब्रह्मचारिणी, 13 अक्टूबर को तृतीया पर मां चंद्रघंटा, 14 अक्टूबर को चतुर्थी पर मां कूष्मांडा और 15 अक्टूबर को पंचमी पर मां स्कंदमाता की पूजा होगी। 16 अक्टूबर को षष्ठी पर मां कात्यायनी और 17 अक्टूबर को सप्तमी पर मां कालरात्रि की आराधना की जाएगी। 19 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी और महानवमी से जुड़े अनुष्ठान होंगे, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा। नवरात्रि में मां के नौ स्वरूपों में पहले दिन शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कूष्मांडा, पांचवें दिन स्कंदमाता, छठे दिन कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी और नौवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्रि के दौरान शक्ति की आराधना करने से साहस, आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार उपवास रखते हैं और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं। नवरात्रि के बाद दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है, जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। रामायण की मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। इसी वजह से देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरे के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने की परंपरा है।
घटस्थापना को नवरात्रि का महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे शुभ मुहूर्त में किया जाना चाहिए। कलश स्थापना के लिए साफ स्थान का चयन किया जाता है और पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद कलश में जल भरकर उसके ऊपर आम या अशोक के पत्ते और नारियल रखने की परंपरा है। घटस्थापना के मुहूर्त पर स्थानीय सूर्योदय और पंचांग की गणना का प्रभाव पड़ता है, इसलिए अलग-अलग शहरों में समय में अंतर हो सकता है। उदाहरण के तौर पर मुंबई और दिल्ली के लिए बताए गए घटस्थापना मुहूर्त अलग हो सकते हैं।
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चैत्र नवरात्रि 2026: गुरुवार से शुरुआत, माता का वाहन बनेगी डोली; जानिए शास्त्रों में कैसे तय होता है आगमन का वाहन
नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत जप पाठ तथा भक्ति के माध्यम से माता रानी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय परंपराओं के अनुसार नवरात्रि में माता दुर्गा का पृथ्वी पर आगमन किस वाहन से होता है इसका विशेष महत्व माना जाता है। यह वाहन घटस्थापना के दिन के आधार पर निर्धारित होता है और इसे उस वर्ष की समग्र ऊर्जा तथा संभावित परिस्थितियों का संकेत भी माना जाता है।साल 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च गुरुवार से हो रही है। ज्योतिषीय नियमों के अनुसार यदि नवरात्रि की शुरुआत गुरुवार या शुक्रवार से होती है तो माता रानी का आगमन डोली यानी पालकी पर माना जाता है। इसी कारण इस वर्ष माता का वाहन डोली निर्धारित किया गया है। शास्त्रों में यह परंपरा इस विश्वास से जुड़ी है कि देवी का वाहन उस वर्ष के सामाजिक आर्थिक प्राकृतिक और राजनीतिक हालात के बारे में संकेत देता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सप्ताह के अलग-अलग दिनों के आधार पर माता का वाहन तय होता है। यदि नवरात्रि रविवार या सोमवार से शुरू हो तो माता हाथी पर सवार होकर आती हैं जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है। यह अच्छी वर्षा सुख-समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। वहीं शनिवार या मंगलवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का वाहन घोड़ा माना जाता है जो संघर्ष युद्ध या अशांति का संकेत देता है। यदि नवरात्रि बुधवार से प्रारंभ हो तो माता नाव पर सवार होकर आती हैं जिसे अत्यंत शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। गुरुवार या शुक्रवार से नवरात्रि शुरू होने पर माता का आगमन डोली पर माना जाता है।
डोली या पालकी को ज्योतिषीय दृष्टि से सामान्यत शुभ संकेत नहीं माना जाता। मान्यता है कि ऐसे वर्ष में सामाजिक या आर्थिक चुनौतियां स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं महामारी प्राकृतिक असंतुलन या आर्थिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। हालांकि विद्वान यह भी बताते हैं कि यह भविष्यवाणी किसी निश्चित घटना का संकेत नहीं बल्कि सामूहिक ऊर्जा का प्रतीकात्मक अर्थ है।
धार्मिक आस्था के अनुसार माता की कृपा से सभी कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है। इसलिए नवरात्रि के दौरान श्रद्धा और नियमपूर्वक पूजा-पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। भक्त इन दिनों में दुर्गा सप्तशती का पाठ कन्या पूजन हवन और दान-पुण्य करके माता का आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
इस प्रकार 2026 की चैत्र नवरात्रि में माता का आगमन डोली पर माना जा रहा है जिसे सतर्कता और संयम का संकेत समझा जा सकता है। आस्था और भक्ति के साथ मनाई गई नवरात्रि न केवल आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है बल्कि जीवन में सकारात्मकता और संतुलन भी लाती है।
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चैत्र नवरात्र 2026: पहले तीन दिन रहेगा पंचक का साया, जानिए घटस्थापना पर इसका क्या पड़ेगा प्रभाव
नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्र को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व वाला पर्व माना जाता है। यह नौ दिनों तक चलने वाला उत्सव देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना को समर्पित होता है। हर वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से इसकी शुरुआत होती है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्र 19 मार्च से प्रारंभ होकर 27 मार्च तक मनाई जाएगी। नवरात्र के पहले दिन होने वाली सबसे महत्वपूर्ण रस्म कलश स्थापना या घटस्थापना होती है जिसे देवी शक्ति के घर में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि विधान से पूजा करने पर घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सुख समृद्धि का वास होता है।हालांकि इस वर्ष नवरात्र की शुरुआत के साथ एक विशेष ज्योतिषीय स्थिति भी बन रही है। दरअसल नवरात्र के पहले दिन से पंचक का प्रभाव भी रहेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार पंचक 16 मार्च 2026 की शाम 6 बजकर 14 मिनट से शुरू होकर 21 मार्च 2026 तक रहेगा। इस तरह नवरात्र के शुरुआती तीन दिन पंचक की अवधि में ही पड़ेंगे। पंचक को ज्योतिष शास्त्र में ऐसा समय माना जाता है जब कुछ विशेष प्रकार के शुभ कार्यों को करने से बचने की सलाह दी जाती है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार पंचक के दौरान वाहन खरीदना नया व्यवसाय शुरू करना गृह प्रवेश करना या विवाह जैसे बड़े और मांगलिक कार्यों को टालना बेहतर माना जाता है। मान्यता है कि इस समय शुरू किए गए कार्यों में बाधाएं आ सकती हैं या उनका अपेक्षित फल नहीं मिल पाता। इसी कारण लोग पंचक के दौरान बड़े आर्थिक या सामाजिक निर्णय लेने में सावधानी बरतते हैं।
हालांकि धार्मिक और नियत तिथि वाले पर्व त्योहारों पर पंचक का प्रभाव नहीं माना जाता। इसी वजह से नवरात्र की घटस्थापना पर पंचक का कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना करना पूरी तरह से शुभ और शास्त्रसम्मत है। इस दिन विधिपूर्वक पूजा अर्चना व्रत और मां दुर्गा की आराधना करने से जीवन में सुख शांति समृद्धि और सौभाग्य की वृद्धि होती है।
इस वर्ष नवरात्र के पहले तीन दिन पंचक में पड़ने के कारण श्रद्धालुओं को यह सलाह दी जा रही है कि धार्मिक कार्यों को छोड़कर अन्य मांगलिक गतिविधियों से परहेज करें। जैसे वाहन खरीदना नया व्यापार शुरू करना गृह प्रवेश विवाह या मुंडन जैसे संस्कार इन दिनों में टाल देना बेहतर माना जाता है।
नवरात्र के नौ दिनों में भक्त माता दुर्गा के नौ रूपों शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी चंद्रघंटा कूष्मांडा स्कंदमाता कात्यायनी कालरात्रि महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं। इस दौरान लोग व्रत रखते हैं भजन कीर्तन करते हैं दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और घरों तथा मंदिरों में विशेष पूजा अर्चना का आयोजन करते हैं। श्रद्धा और भक्ति से की गई पूजा से जीवन में मानसिक शांति सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है।
इस प्रकार पंचक के प्रभाव के बावजूद चैत्र नवरात्र की घटस्थापना और पूजा अर्चना पूरी तरह शुभ मानी जाती है। श्रद्धालु इस पावन पर्व को पूरे उत्साह और आस्था के साथ मनाते हैं और मां दुर्गा से सुख समृद्धि तथा कल्याण की कामना करते हैं।
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गुप्त नवरात्र 2026: घटस्थापना पर विशेष मंत्र जप से दूर होंगे दुख, घर में आएगी सुख-समृद्धि
नई दिल्ली । गुप्त नवरात्र 2026 का पावन पर्व इस वर्ष 19 जनवरी से आरंभ होकर 27 जनवरी तक श्रद्धा और साधना के साथ मनाया जाएगा। माघ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक चलने वाले गुप्त नवरात्र को शक्ति उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण काल माना गया है। इस दौरान दस महाविद्याओं और मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की गुप्त साधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कालखंड में की गई उपासना साधक को शीघ्र फल प्रदान करती है और जीवन से नकारात्मक शक्तियों का नाश करती है। गुप्त नवरात्र की शुरुआत घटस्थापना से होती है, जिसे अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि घटस्थापना के समय यदि विशेष मंत्रों का जप किया जाए तो घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। घटस्थापना के दौरान मां दुर्गा का आवाहन कर उनके बीज मंत्रों का जप करने से मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक कष्ट दूर होते हैं। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस समय श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई साधना व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।गुप्त नवरात्र को अन्य नवरात्रों से अलग इसलिए माना जाता है क्योंकि इसमें साधना को गोपनीय रखा जाता है। विशेष रूप से तांत्रिक साधक, सिद्धि प्राप्त करने वाले उपासक और शक्ति आराधक इस समय मंत्र, तंत्र और यंत्र साधना करते हैं। माना जाता है कि इन नौ दिनों में दस महाविद्याएंकाली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला अपने साधकों पर विशेष कृपा करती हैं। धार्मिक विश्वास है कि गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की आराधना करने से न केवल मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, बल्कि जीवन में आ रही बाधाएं भी दूर होती हैं। जो भक्त श्रद्धा से व्रत रखते हैं और नियमपूर्वक पूजा करते हैं, उन्हें आत्मिक शांति के साथ-साथ भौतिक सुखों की भी प्राप्ति होती है। विशेषकर जिन लोगों के जीवन में लंबे समय से कष्ट, रोग या आर्थिक समस्याएं बनी हुई हैं, उनके लिए यह साधना काल अत्यंत फलदायी माना गया है।
माघ माह में सूर्य उत्तरायण रहता है, जिसे शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ समय माना गया है। इसी कारण माघी गुप्त नवरात्र का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दौरान देवी मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, हवन और मंत्र जप किए जाते हैं। कई श्रद्धालु इन नौ दिनों तक संयम, सात्विक आहार और नियमित पूजा के माध्यम से मां शक्ति की आराधना करते हैं। कुल मिलाकर गुप्त नवरात्र 2026 साधना, तप और श्रद्धा का ऐसा पावन अवसर है, जिसमें घटस्थापना से लेकर नवमी तक मां दुर्गा और दस महाविद्याओं की उपासना कर भक्त अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना कर सकते हैं।
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चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मां दुर्गा की पूजा से मिलेगा जीवन में सुख और समृद्धि चैत्रनवरात्रि2026
नई दिल्ली । हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र माह का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इसी माह से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से जहां नववर्ष 1 जनवरी को आता है वहीं हिंदू नववर्ष चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत भी होती है। यह एक प्रमुख धार्मिक पर्व है जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। चैत्र नवरात्रि का आयोजन विशेष रूप से शांति समृद्धि और सुख-शांति की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस दौरान भक्त मां दुर्गा की उपासना के साथ-साथ व्रत भी रखते हैं ताकि उनका जीवन खुशहाल और समृद्ध हो सके।चैत्र नवरात्रि 2026: तिथि और अवधि
चैत्र नवरात्रि 2026 का आरंभ 19 मार्च को होगा जो कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है। यह दिन विशेष रूप से कलश स्थापना के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसके बाद नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की उपासना का सिलसिला चलता है। नवमी तिथि 27 मार्च को आएगी और इसी दिन राम नवमी का पर्व भी मनाया जाएगा। इस दिन विशेष रूप से राम भक्तों द्वारा श्रीराम के जन्मोत्सव की पूजा की जाती है। चैत्र नवरात्रि की समाप्ति 27 मार्च को होगी। इस दिन विशेष रूप से दिनभर देवी पूजा की जाती है और उपवासी भक्तों द्वारा व्रत का पारण किया जाता है।
चैत्र नवरात्रि 2026: कलश स्थापना मुहूर्त
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है। इस दिन विशेष रूप से एक पवित्र मिट्टी के कलश को घर के पूजा स्थान पर स्थापित किया जाता है और फिर देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा शुरू होती है।
19 मार्च 2026 को कलश स्थापना का मुहूर्त इस प्रकार हैसुबह का मुहूर्त 06:00 AM – 06:45 AM
दोपहर का मुहूर्त 11:30 AM – 12:15 PM
सांयकाल का मुहूर्त 06:00 PM – 06:45 PMइन मुहूर्तों में से जो भी समय आपके लिए सुविधाजनक हो उस समय कलश स्थापना कीजिए। विशेष रूप से शुद्धि और पवित्रता का ध्यान रखें। पूजा के दौरान श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी दुर्गा की उपासना करें और व्रत का संकल्प लें।
देवी पूजा और विशेष अनुष्ठान
चैत्र नवरात्रि के दौरान प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाती है। इस प्रकार के अनुष्ठानों से मनुष्य को न केवल मानसिक शांति मिलती है बल्कि उसके जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान भी संभव होता है।
प्रथम दिन 19 मार्च मां शैलपुत्री की पूजा होती है। दूसरे दिन 20 मार्च मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। तीसरे दिन 21 मार्च मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। चौथे दिन 22 मार्च मां कूष्मांडा की पूजा होती है पांचवे दिन 23 मार्च मां स्कंदमाता की पूजा होती है। छठे दिन 24 मार्च मां कात्यायनी की पूजा होती है। सातवे दिन 25 मार्च मां कालरात्रि की पूजा होती है। आठवे दिन 26 मार्च मां महागौरी की पूजा होती है नौवे दिन 27 मार्च मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है साथ ही साथ राम नवमी का पर्व मनाया जाता है। इन नौ दिनों में व्रति पूजा और उपासना से भक्तों को मानसिक शारीरिक और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
चैत्र नवरात्रि 2026 का आरंभ 19 मार्च से हो रहा है और इसके साथ ही हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी होती है। यह समय देवी दुर्गा की उपासना व्रत और पूजा का होता है जिससे भक्त अपने जीवन में सुख शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। कलश स्थापना के दौरान विशेष मुहूर्त का पालन करें और नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा कर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाएं। इस अवसर पर घर में मां दुर्गा का व्रत करना और उनकी पूजा करना निश्चित रूप से जीवन में सुख और शांति लेकर आता है।इस अवसर पर घर में मां दुर्गा का व्रत करना और उनकी पूजा करना निश्चित रूप से जीवन में सुख और शांति लेकर आता है।