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  • नेपाल में फिर बाढ़ का खतरा बढ़ा, त्रिशूली परियोजना के लापता कर्मियों की तलाश में भारतीय और नेपाली दल जुटे

    नेपाल में फिर बाढ़ का खतरा बढ़ा, त्रिशूली परियोजना के लापता कर्मियों की तलाश में भारतीय और नेपाली दल जुटे

    नई दिल्ली ।नेपाल में आई भीषण बाढ़ और अचानक आई जल आपदा के बाद हालात अब भी बेहद चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान जारी है, जबकि बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार गुरुवार तक मृतकों की संख्या बढ़कर 1252 हो गई और करीब 5083 लोगों के लापता होने का अनुमान है। शव नहीं मिलने या पहचान नहीं होने के कारण कई परिवार प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार भी कर रहे हैं।

    त्रिशूली पावर प्रोजेक्ट में काम करने वाले कई कर्मचारी भी बाढ़ के बाद से लापता बताए जा रहे हैं। इसी बीच परियोजना में काम करने वाले एक कर्मचारी ने आरोप लगाया कि बाढ़ आने से पहले चीन की कंपनी के एक सुपरवाइजर ने 265 कर्मचारियों को सुरंग के भीतर छोड़ दिया और खुद बाहर निकल गया।

    कर्मी के अनुसार सुरंग के अंदर मौजूद मजदूरों ने एक तेज आवाज सुनी थी। इसके बाद उन्होंने अपने सुपरवाइजर से सुरंग से बाहर निकलने की अनुमति मांगी थी। इस घटना से परियोजना में काम कर रहे लोगों की सुरक्षा और आपदा के समय प्रबंधन की तैयारियों को लेकर सवाल उठे हैं।

    लापता लोगों की तलाश में भारत भी नेपाल की मदद कर रहा है। भारतीय सुरंग बचाव दल नेपाली सेना के साथ मिलकर चिलिमे पावर हाउस में बचाव अभियान चला रहा है। भारतीय दूत ने स्याब्रूबेसी स्थित भारतीय टनल बचाव दल के आधार शिविर का दौरा किया और अभियान की प्रगति की जानकारी ली।

    बचाव दलों ने विशेष उपकरणों की मदद से सुरंग के भीतर करीब 100 मीटर तक का निरीक्षण किया है। अब सुरंग के और अंदर जाने के लिए भारी उपकरण लाने की तैयारी की जा रही है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद भारतीय और नेपाली दल बचाव कार्य जारी रखे हुए हैं।

    इस बीच नेपाल के उत्तरी हिस्सों में एक बार फिर बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। भोटेकोशी नदी के ऊपरी इलाकों में लगातार बारिश होने के कारण जलस्तर बढ़ने की आशंका जताई गई है। इसका असर भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों के अलावा रसुवा और नुवाकोट जिलों से होकर बहने वाली छोटी नदियों और जलधाराओं पर भी पड़ सकता है।

    नेपाल में हालिया तबाही के बाद हिमनदों की स्थिति को लेकर भी चिंता बढ़ी है। तिब्बती पठार के ग्लेशियरों में बदलाव और उनके अस्थिर होने की आशंका को भविष्य में अचानक बाढ़ के संभावित कारणों से जोड़ा जा रहा है। पिछले कुछ दशकों में इस क्षेत्र के ग्लेशियरों में उल्लेखनीय कमी आने की बात भी सामने आई है।

    26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के आसपास चट्टानों के खिसकने या हिमस्खलन के कारण अचानक बाढ़ आई थी। इससे उत्तरी और मध्य नेपाल के कई कस्बों और गांवों में भारी नुकसान हुआ। मौजूदा परिस्थितियों में लगातार बारिश और बढ़ते जलस्तर ने प्रशासन की चिंता फिर बढ़ा दी है।

    राहत सामग्री के वितरण को व्यवस्थित करने के लिए नेपाल सरकार ने सिंगल विंडो व्यवस्था लागू की है। इसके तहत निजी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को नेपाल में राहत सामग्री सीधे भेजने या ले जाने से पहले अनुमति लेना जरूरी होगा। सीमा पर राहत सामग्री के लिए निर्धारित कस्टम प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही उसे आगे ले जाने की अनुमति दी जाएगी।

    बाढ़ के बाद जारी बचाव अभियान में भारत की सहायता से सुरंगों में फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है। वहीं नेपाल में दोबारा बढ़ते जलस्तर और संभावित आपदा को देखते हुए स्थानीय प्रशासन तथा बचाव एजेंसियां सतर्क हैं। लगातार निगरानी, समय पर चेतावनी और प्रभावित क्षेत्रों तक राहत पहुंचाना फिलहाल सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है।

  • नेपाल बाढ़ के बाद हिमालयी राज्यों में ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन के खतरे पर केंद्र सरकार ने तैयारियां तेज कीं

    नेपाल बाढ़ के बाद हिमालयी राज्यों में ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन के खतरे पर केंद्र सरकार ने तैयारियां तेज कीं

    नई दिल्ली ।नेपाल में पिछले सप्ताह आई भयावह बाढ़ के बाद भारत सरकार ने हिमालयी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में संभावित प्राकृतिक आपदाओं को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ और हिमस्खलन के खतरे को देखते हुए केंद्र ने बचाव और तैयारी की मौजूदा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की है।

    गुरुवार को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई। इसमें हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद संवेदनशील स्थानों की पहचान, निगरानी व्यवस्था और किसी संभावित आपदा से पहले चेतावनी जारी करने के उपायों पर चर्चा की गई।

    बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों तथा संबंधित राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके अलावा केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी तैयारियों की जानकारी साझा की।

    ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी को बैठक में प्रमुख प्राथमिकता के तौर पर रखा गया। अधिकारियों से संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और बर्फ से ढके क्षेत्रों पर लगातार नजर रखने को कहा गया, ताकि वहां होने वाले बदलावों का समय रहते पता लगाया जा सके।

    हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों के फटने से अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आने का खतरा रहता है। ऐसे में प्रभावित होने वाले संभावित क्षेत्रों और पानी के प्रवाह के रास्तों की पहले से पहचान करना आपदा प्रबंधन की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।

    बैठक में अत्यधिक जोखिम वाले स्थानों को चिह्नित करने और संभावित जलप्रवाह मार्गों का निर्धारण करने पर भी जोर दिया गया। इसका उद्देश्य खतरे की स्थिति में संबंधित प्रशासन को समय रहते सूचना देना और प्रभावित आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की कार्रवाई शुरू करना है।

    केंद्रीय गृह सचिव ने जोखिम बढ़ने की स्थिति में संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की सक्रिय निगरानी को जरूरी बताया। समय पर चेतावनी मिलने से प्रशासन को राहत और बचाव के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने तथा निकासी की प्रक्रिया शुरू करने का अवसर मिल सकता है।

    बैठक में राज्यों ने अपने-अपने क्षेत्रों में आपदा से निपटने की तैयारियों और रणनीतियों की जानकारी दी। इसके बाद राज्य एजेंसियों, जिला प्रशासन तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि संभावित ग्लेशियल झील विस्फोट या हिमस्खलन जैसी घटनाओं से निपटने की तैयारी केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जोखिम की पहले पहचान, निवारक कदम और स्थानीय समुदायों की तैयारी को भी योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

    राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी आपदा प्रबंधन तैयारियों की नियमित समीक्षा करने की सलाह दी गई। साथ ही प्रारंभिक चेतावनी और निकासी व्यवस्था में मौजूद कमियों को पहचानकर उनमें समय रहते सुधार करने को कहा गया।

    इस पूरी कवायद का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के संभावित प्रभाव को कम करना और प्रशासन की प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करना है। खास तौर पर संवेदनशील इलाकों में निगरानी, चेतावनी और स्थानीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है।