Tag: global security
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डोभाल की अध्यक्षता में ब्रिक्स एनएसए मीटिंग, रणनीतिक सहयोग और सुरक्षा पर फोकस
नई दिल्ली । नई दिल्ली में 22 से 23 जून 2026 को ब्रिक्स राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन होने जा रहा है जिसकी अध्यक्षता भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल करेंगे। विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस उच्च स्तरीय बैठक में ब्रिक्स सदस्य देशों के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी और एनएसए शामिल होंगे और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े अहम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया तेजी से बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य और नई तकनीकी चुनौतियों का सामना कर रही है। बैठक का मुख्य विषय आज की दुनिया के सामने मौजूद गैर पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियां तय किया गया है जिसके तहत साइबर सुरक्षा आतंकवाद सूचना युद्ध और उभरती तकनीक के सुरक्षा प्रभाव जैसे मुद्दों पर फोकस किया जाएगा।दो दिन चलने वाली इस बैठक में सदस्य देश अपने अनुभव और रणनीतिक दृष्टिकोण साझा करेंगे ताकि सामूहिक सुरक्षा सहयोग को और मजबूत किया जा सके। विदेश मंत्रालय के अनुसार बैठक के दौरान काउंटर टेररिज्म और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के सुरक्षित उपयोग पर ब्रिक्स के संयुक्त कार्य समूहों की प्रगति की समीक्षा भी की जाएगी। इससे सीमा पार खतरों से निपटने और एक मजबूत बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचा विकसित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।भारत इस मंच के माध्यम से ब्रिक्स के भीतर सुरक्षा सहयोग को केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित न रखते हुए उसे रणनीतिक और तकनीकी मुद्दों तक विस्तारित करने की दिशा में काम कर रहा है। इसी बीच इस बैठक में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के शामिल होने की संभावना भी चर्चा में है जो अगस्त 2025 के बाद उनका पहला भारत दौरा होगा।वांग यी चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका भी निभाते हैं और एनएसए अजीत डोभाल के निमंत्रण पर भारत आ रहे हैं। इस यात्रा को भारत और चीन के बीच चल रहे संवाद और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रयासों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि वैश्विक कूटनीतिक गतिविधियों और अन्य अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की टाइमिंग के कारण पिछले कुछ ब्रिक्स बैठकों में उनकी अनुपस्थिति भी देखी गई थी।इस बार की बैठक को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें बड़े भू राजनीतिक समीकरणों के बीच सुरक्षा सहयोग के नए रास्ते तलाशने की कोशिश होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक ब्रिक्स देशों के बीच रणनीतिक भरोसा बढ़ाने और वैश्विक सुरक्षा ढांचे को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। -

27 यूरोपीय देशों के प्रतिनिधियों से मिले राहुल गांधी, व्यापार से लेकर सुरक्षा तक कई मुद्दों पर मंथन
नई दिल्ली । भारत की राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चाओं के बीच गुरुवार को एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने यूरोपीय देशों के 27 प्रतिनिधियों के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की। यह मुलाकात यूरोपीय एंबेसी परिसर में आयोजित की गई, जहां भारत और यूरोप के बीच संबंधों को और मजबूत करने, बदलते वैश्विक परिदृश्य में साझेदारी की संभावनाओं और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ।सूत्रों के अनुसार यह बैठक केवल औपचारिक संवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें रणनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक पहलुओं पर गहराई से चर्चा की गई। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत और यूरोपीय संघ के देशों के बीच सहयोग को किस प्रकार नई दिशा दी जा सकती है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है और देशों के बीच आर्थिक व सुरक्षा चुनौतियां बढ़ रही हैं।
इस महत्वपूर्ण बैठक में राहुल गांधी के साथ कांग्रेस के विदेश मामलों के विभाग के चेयरपर्सन सलमान खुर्शीद भी मौजूद रहे। चर्चा के दौरान दोनों पक्षों ने लोकतांत्रिक मूल्यों, अंतरराष्ट्रीय स्थिरता और बहुपक्षीय सहयोग जैसे विषयों पर विचार साझा किए। सूत्रों का कहना है कि बातचीत में यह भी रेखांकित किया गया कि भारत और यूरोप के बीच संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों क्षेत्रों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक जुड़ाव भी गहरा है।
बैठक में प्रमुख रूप से व्यापार, हरित ऊर्जा, तकनीकी सहयोग, सुरक्षा ढांचे और वैश्विक स्थिरता जैसे विषयों पर विस्तृत बातचीत हुई। इन मुद्दों को आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि आने वाले समय में आपसी सहयोग को और मजबूत करने की जरूरत है, ताकि वैश्विक चुनौतियों का मिलकर समाधान निकाला जा सके।
राहुल गांधी ने बातचीत के दौरान भारत और यूरोप के बीच लंबे समय से चले आ रहे लोकतांत्रिक मूल्यों और सांस्कृतिक संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों क्षेत्रों के बीच संवाद और सहयोग केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह साझा मूल्यों और वैश्विक जिम्मेदारियों पर भी आधारित होना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस मुलाकात को कूटनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल के वर्षों में भारत और यूरोपीय देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत हुई है, चाहे वह व्यापारिक समझौते हों या वैश्विक सुरक्षा से जुड़े मुद्दे। ऐसे में इस प्रकार की उच्च स्तरीय बैठकें दोनों पक्षों के बीच संवाद को और अधिक प्रभावी बनाने का माध्यम मानी जा रही हैं।
इस बैठक ने यह भी संकेत दिया कि भारत और यूरोप के बीच भविष्य में सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं। विशेष रूप से तकनीकी विकास, ऊर्जा परिवर्तन और वैश्विक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी और गहरी होने की संभावना जताई जा रही है।
कुल मिलाकर यह बैठक भारत-यूरोप संबंधों को नई दिशा देने की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, जिसमें दोनों पक्षों ने संवाद और सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।
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मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच अमेरिका की दुविधा: क्या चीन पर से हट रहा है फोकस?
नई दिल्ली । अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर वाशिंगटन में एक नई बहस तेज हो गई है जहां सांसदों ने मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच चीन पर से ध्यान हटने की आशंका जताई है पेंटागन के बजट से जुड़ी एक अहम सुनवाई के दौरान कई सांसदों ने चिंता व्यक्त की कि मौजूदा हालात अमेरिका की इंडो पैसिफिक रणनीति को प्रभावित कर सकते हैंहाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के अध्यक्ष माइक डी रॉजर्स ने कहा कि अमेरिका इस समय अभूतपूर्व वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है जिसमें चीन सबसे बड़ा दीर्घकालिक खतरा बनकर उभर रहा है उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन अब केवल अपनी सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि वह प्रशांत महासागर के गहरे हिस्सों तक अपनी सैन्य ताकत का विस्तार कर रहा है इसके लिए वह नौसैनिक जहाजों मिसाइल सिस्टम और अंतरिक्ष क्षमताओं में तेजी से निवेश कर रहा है
सुनवाई के दौरान सांसदों ने इस बात पर भी जोर दिया कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका की बढ़ती सैन्य तैनाती विशेष रूप से कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स की मौजूदगी से संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है इसका सीधा असर इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका की प्रतिक्रिया क्षमता पर पड़ सकता है जहां चीन को सबसे बड़ा रणनीतिक चुनौती माना जाता है
कई सांसदों ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका का ध्यान इस महत्वपूर्ण क्षेत्र से हटता है तो चीन को अपनी स्थिति और मजबूत करने का मौका मिल सकता है उन्होंने कहा कि यह केवल सैन्य नहीं बल्कि भू राजनीतिक संतुलन का भी मामला है जहां थोड़ी सी ढील भी दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है
जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के अध्यक्ष डैन केन ने इन चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सैन्य तैनाती हमेशा रणनीतिक संतुलन का हिस्सा होती है उन्होंने बताया कि हर निर्णय में जोखिम और विकल्पों का आकलन किया जाता है और उसी के आधार पर प्राथमिकताएं तय की जाती हैं उनका कहना था कि अमेरिका को एक साथ कई क्षेत्रों में अपनी प्रतिबद्धताओं को संतुलित करना पड़ता है
वहीं रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने सरकार की रणनीति का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिकी सेना दुनिया भर में एक साथ कई खतरों से निपटने में सक्षम है उन्होंने भरोसा जताया कि मौजूदा रणनीति तत्काल चुनौतियों से निपटने के साथ साथ दीर्घकालिक सुरक्षा को भी सुनिश्चित करती है
हालांकि आलोचकों का मानना है कि मिडिल ईस्ट में लंबे समय तक सैन्य संलिप्तता अमेरिका की क्षमताओं पर दबाव डाल सकती है और इससे विरोधी देशों को गलत संदेश जा सकता है उन्होंने यह भी कहा कि यदि इंडो पैसिफिक क्षेत्र से ध्यान हटता है तो चीन को अपनी सैन्य और आर्थिक पकड़ मजबूत करने का अतिरिक्त अवसर मिल सकता है
गौरतलब है कि इंडो पैसिफिक क्षेत्र अमेरिका की विदेश और रक्षा नीति का केंद्र बना हुआ है जहां वह अपने सहयोगी देशों के साथ साझेदारी को मजबूत करने में जुटा है ऐसे में यह बहस इस बात को दर्शाती है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाए रखना कितना चुनौतीपूर्ण हो गया है
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ईरान तनाव के बीच अमेरिका की कूटनीति तेज भारत, कनाडा केन्या से अहम बातचीत
नई दिल्ली:मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच मार्को रुबियो के नेतृत्व में अमेरिका ने अपनी कूटनीतिक सक्रियता तेज कर दी है। इस क्रम में उन्होंने भारत कनाडा और केन्या के शीर्ष नेताओं से बातचीत कर ईरान और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार साझा किए।भारत के साथ हुई बातचीत में एस जयशंकर के साथ मध्य पूर्व की मौजूदा स्थिति और बदलते हालात पर चर्चा की गई। दोनों देशों ने आपसी रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और वैश्विक स्थिरता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद के साथ बातचीत में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उस पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। अमेरिका ने इस दौरान वैश्विक सुरक्षा और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने पर जोर दिया। साथ ही हैती में शांति बहाली के प्रयासों और वहां की स्थिति पर भी विचार साझा किए गए।
केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो के साथ हुई बातचीत में अमेरिका ने ईरान के मुद्दे पर केन्या के रुख की सराहना की। दोनों नेताओं ने खाड़ी देशों के खिलाफ ईरान की गतिविधियों की निंदा पर चर्चा की और क्षेत्रीय स्थिरता को बनाए रखने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। इस दौरान अमेरिका ने हैती में शांति स्थापित करने के लिए केन्या के योगदान की भी सराहना की।
अमेरिका की यह पहल इस बात का संकेत है कि वह अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का समाधान ढूंढने की दिशा में काम कर रहा है। एशिया अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका के प्रमुख साझेदार देशों के साथ संवाद बढ़ाकर अमेरिका अपनी कूटनीतिक पकड़ को और मजबूत करना चाहता है।
यह कूटनीतिक सक्रियता दर्शाती है कि अमेरिका ईरान और मध्य पूर्व के मुद्दों को लेकर बेहद गंभीर है और वह अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर एक संयुक्त रणनीति के तहत आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।
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ईरान में युद्ध का कहर: तेहरान सहित देशभर में हमलों की संख्या 80,000 से ऊपर
नई दिल्ली । ईरान के रेड क्रेसेंट सोसायटी के अध्यक्ष पीरहुसैन कोलिवंद ने एक बयान में कहा है कि युद्ध की शुरुआत के बाद से अमेरिका और इजरायल ने ईरान में 80 000 से अधिक नागरिक स्थलों पर हमला किया है। इन हमलों में अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का उल्लंघन भी शामिल है। कोलिवंद ने बताया कि इनमें से 20 000 से अधिक हमले तेहरान में हुए हैं जबकि शेष 60 000 अन्य इलाकों में दर्ज किए गए हैं।उन्होंने कहा कि इन हमलों में करीब 18 790 व्यापारिक प्रतिष्ठान 266 मेडिकल सेंटर और 498 स्कूल निशाने पर रहे। हमलों में कम से कम 12 स्वास्थ्यकर्मी मारे गए और 90 से अधिक घायल हुए। युद्ध की शुरुआत से अब तक सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है जिनमें बच्चे और 231 महिलाएं भी शामिल हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इस संघर्ष में अब तक 1 500 से अधिक लोग मारे गए हैं।
इसी बीच इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी ने देश के मध्य हवाई क्षेत्र में इजरायल के एफ-16 लड़ाकू विमान को निशाना बनाने का दावा किया है। ईरानी सरकारी मीडिया के अनुसार तेहरान की सेना ने तेल अवीव के पास बेन गुरियन एयरपोर्ट पर सैन्य विमानों के ईंधन टैंकों पर भी हमला किया।
ईरान के खातम अल-अनबिया सेंट्रल हेडक्वार्टर के प्रवक्ता इब्राहिम ज़ोल्फ़ागरी ने चेतावनी दी कि यदि संयुक्त अरब अमीरात से दक्षिणी ईरानी द्वीपों पर हमले दोहराए गए तो रास अल-खैमाह पर भी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि हर हमला उसी जगह पर जवाब देगा जहां से हमला हुआ।
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर तेहरान और ईरान के कई अन्य शहरों पर हमला किया था। इस हमले में ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी और आम नागरिक मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने इजरायल और मध्य पूर्व में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए।
इन घटनाओं ने क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक तेल और ऊर्जा बाजार पर भी गहरा प्रभाव डाला है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस पर चिंता व्यक्त की है और युद्ध की तत्काल समाप्ति की आवश्यकता को रेखांकित किया है। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि देश अपने नागरिकों और संप्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है और किसी भी तरह की आक्रामक कार्रवाई का जवाब देगा।
इस संघर्ष ने न केवल क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित किया है बल्कि वैश्विक मानवाधिकार और युद्ध कानून की स्थितियों को भी चुनौती दी है। नागरिक इलाकों स्वास्थ्य केंद्रों और स्कूलों पर हमले ने एक मानवीय संकट को जन्म दिया है जिसे तत्काल अंतरराष्ट्रीय ध्यान की आवश्यकता है।
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ट्रंप का दावा: अमेरिकी हमलों में ईरान की नौसेना और वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह नष्ट, अभियान अभी जारी
नई दिल्ली । वाशिंगटन से रवाना होते समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर बेहद चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ढांचे को इतनी भयंकर क्षति पहुँचाई है कि अब वहां कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा है। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ईरान की नौसेना की पूरी क्षमता और उसकी वायु रक्षा प्रणाली अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।ट्रंप के अनुसार अमेरिकी हमलों ने ईरानी एयरबेस, नौसैनिक जहाजों और रडार सिस्टम को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि ईरान के कई शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेता भी इस अभियान में प्रभावित हुए हैं, जिससे नेतृत्व संकट उत्पन्न हो गया है। व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने अमेरिकी सेना की ताकत और कार्यक्षमता की तारीफ करते हुए इसे विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बताया।
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि अमेरिकी सेना ने कुछ महत्वपूर्ण ईरानी ठिकानों को जानबूझकर सुरक्षित छोड़ दिया है। उनके अनुसार, यदि अमेरिका चाहे तो केवल एक घंटे में उन बचे हुए ठिकानों को भी पूरी तरह से नष्ट कर सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाई ईरान के लिए अपने देश को फिर से खड़ा करना लगभग असंभव बना देगी।
ट्रंप ने यह साफ किया कि अमेरिकी हमले केवल जवाबी कार्रवाई नहीं थे, बल्कि ईरान की सैन्य क्षमता को जड़ से समाप्त करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थे। उनके अनुसार ईरान की नौसेना के अधिकांश जहाज अब समुद्र की गहराई में डूब चुके हैं और वायुसेना भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है। इस बयान से स्पष्ट होता है कि अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से पंगु बनाने की पूरी योजना बनाई है।
पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या अमेरिकी कार्रवाई अब रोक दी जाएगी। ट्रंप ने कड़ा जवाब देते हुए कहा कि अभियान अभी जारी है और सेना आगे की कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा संदेश है कि अमेरिका की सुरक्षा से खिलवाड़ भारी पड़ेगा। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया, जिसे अमेरिका ने पहले कभी नहीं देखा।
विश्व के रक्षा विशेषज्ञ और राजनेता अब ट्रंप के इस दावे पर बहस कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और सैन्य पटल पर हलचल मचा दी है। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर हैं कि ईरान इस विनाशकारी दावे और सैन्य क्षति के बारे में क्या प्रतिक्रिया देता है।
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50 साल बाद पहली बार रूस-अमेरिका के बीच कोई परमाणु सीमा नहीं, न्यू स्टार्ट संधि समाप्त, वैश्विक सुरक्षा पर चिंता
नई दिल्ली। रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों पर लगी अंतिम बड़ी कानूनी पाबंदी अब समाप्त हो गई है। 5 फरवरी 2026 को न्यू स्टार्ट संधि की अवधि पूरी हो गई, जिससे लगभग 50 साल बाद दोनों देशों के रणनीतिक परमाणु हथियारों-जैसे अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें, सबमरीन-लॉन्च मिसाइलें और बॉम्बर-पर कोई बाध्यकारी सीमा नहीं रही। विशेषज्ञ इसे वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं।न्यू स्टार्ट संधि क्या थी?
न्यू स्ट्रैटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटीNew START2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव के बीच हस्ताक्षरित एक ऐतिहासिक समझौता था। यह संधि उन रणनीतिक हथियारों की तैनाती को सीमित करती थी जो देश के महत्वपूर्ण राजनीतिक और सैन्य ठिकानों को निशाना बना सकते थे। इसे 2011 में लागू किया गया और मूलतः 10 साल के लिए थी। 2021 में इसे राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 5 साल बढ़ाकर 2026 तक कर दिया।संधि का इतिहास
परमाणु हथियारों पर नियंत्रण की पहल शीत युद्ध के समय से चली आ रही है। 1970 के दशक में SALT समझौते ने संख्या पर सीमा लगाई, लेकिन कटौती नहीं की।1991: START I – हजारों हथियारों में कटौती
1993: START II – और कटौती, पर पूरी तरह लागू नहीं
2002: SORT – 1,700-2,200 वारहेड्स पर सहमति, जांच-पड़ताल सीमित
2010: न्यू स्टार्ट – रणनीतिक हथियारों पर बाध्यकारी सीमा
2021 के बाद स्थिति
2023 में रूस ने निरीक्षण बंद कर दिया, लेकिन सीमा पालन का दावा जारी रखा। इसका कारण यूक्रेन युद्ध में अमेरिका की भूमिका बताया गया। अब संधि पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और दोनों देश स्वतंत्र हैं।रूस का बयान
रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अब न्यू स्टार्ट संधि के तहत कोई दायित्व या पारस्परिक घोषणा दोनों देशों पर लागू नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए “गंभीर क्षण” करार दिया।
संभावित असर
संधि समाप्त होने के बाद रूस और अमेरिका दोनों अपनी मिसाइलों और रणनीतिक वारहेड्स की संख्या बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी और लॉजिस्टिक कारणों से यह तुरंत संभव नहीं है, लेकिन लंबी अवधि में हथियारों की नई होड़ शुरू हो सकती है।
वैश्विक संतुलन
रूस और अमेरिका के पास दुनिया के 90% से अधिक परमाणु हथियार हैं। जनवरी 2025 तक रूस के पास 4,309 और अमेरिका के पास 3,700 वारहेड्स थे। अन्य देशों जैसे चीन600), फ्रांस290और ब्रिटेन225के पास अपेक्षाकृत कम हथियार हैं।विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय चेतावनी
सुरक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि न्यू स्टार्ट के खत्म होने से वैश्विक परमाणु होड़ तेज हो सकती है। फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के मैट कोर्डा के अनुसार, दोनों देश अपनी तैनात क्षमताओं को लगभग दोगुना कर सकते हैं।संधि समाप्त होने से पहले पोप लियो और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने दोनों देशों से अपील की कि वे परमाणु सीमाओं को बनाए रखें और नई, सत्यापनीय संधि पर तुरंत बातचीत शुरू करें। गुतारेस ने चेतावनी दी कि दशकों में पहली बार दुनिया सबसे बड़े परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बिना किसी बाध्यकारी सीमा के दौर में प्रवेश कर रही है, जिससे हथियारों के इस्तेमाल का जोखिम सबसे अधिक बढ़ गया है।