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  • कैलिफोर्निया में बढ़ा जंगल की आग का खतरा, रिकॉर्ड वाइल्डफायर से अलर्ट पर प्रशासन

    कैलिफोर्निया में बढ़ा जंगल की आग का खतरा, रिकॉर्ड वाइल्डफायर से अलर्ट पर प्रशासन


    नई दिल्ली ।अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य में जंगल की आग यानी वाइल्डफायर का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। बढ़ते तापमान, लंबे सूखे और तेजी से सूखती वनस्पतियों ने राज्य को आग के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि अब अधिकारी पारंपरिक “फायर सीजन” की अवधारणा को छोड़कर पूरे साल आग के खतरे की बात करने लगे हैं। इस वर्ष अभी जंगल की आग का चरम मौसम शुरू भी नहीं हुआ है, लेकिन दमकल विभाग पहले ही 2,580 से अधिक वाइल्डफायर घटनाओं का सामना कर चुका है।

    कैलिफोर्निया वन एवं अग्नि सुरक्षा विभाग के अनुसार इस साल अब तक राज्य में 2,584 जंगल की आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 79,690 एकड़ से अधिक क्षेत्र जलकर राख हो गया है। इन आगजनी की घटनाओं में 25 इमारतें भी नष्ट हुई हैं। हालांकि राहत की बात यह है कि अब तक किसी की मौत की पुष्टि नहीं हुई है।

    सोमवार को भी रिवरसाइड, केर्न और सैन डिएगो समेत कई इलाकों में जंगलों में आग जलती रही। दमकल अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में तापमान और बढ़ने तथा मौसम के और अधिक शुष्क होने के कारण आग लगने की घटनाएं सामान्य से कहीं ज्यादा हो सकती हैं।

    सीएएल फायर के बटालियन चीफ डेविड एक्यूना ने कहा कि अब “फायर सीजन” शब्द पुराना हो चुका है। उनके मुताबिक जंगलों में आग लगने का खतरा केवल गर्मियों और पतझड़ तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह पूरे साल बना रहता है। इसी वजह से विभाग अब “पीक फायर ईयर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन इस संकट को और गंभीर बना रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अच्छी बारिश के कारण बड़ी मात्रा में वनस्पति उगी थी। अब वही वनस्पति गर्म और सूखे मौसम में सूखकर आग के लिए ईंधन का काम कर रही है। इससे आग तेजी से फैलने और बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में लेने की आशंका बढ़ गई है।

    सीएएल फायर के बटालियन प्रमुख ब्रेंट पास्कुआ ने कहा कि सभी प्रेडिक्टिव मॉडल संकेत दे रहे हैं कि इस साल औसत से अधिक खतरनाक वाइल्डफायर सीजन देखने को मिल सकता है। वहीं वैज्ञानिकों ने भी चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कैलिफोर्निया में आग का मौसम पहले की तुलना में जल्दी शुरू हो रहा है और अधिक समय तक बना रहता है।

    यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया लॉस एंजिल्स की एक स्टडी में पाया गया कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन के कारण 1992 से 2020 के बीच कैलिफोर्निया में आग का मौसम छह से 46 दिन पहले शुरू होने लगा है। अध्ययन के अनुसार घास, झाड़ियों और पेड़ों में नमी की कमी आग लगने के समय और उसकी तीव्रता को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक है।

    कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसम ने भी हाल ही में चेतावनी दी थी कि जलवायु परिवर्तन मौसम को और अधिक खतरनाक बना रहा है। उन्होंने कहा कि अब जंगल की आग का कोई ऑफ-सीजन नहीं बचा है और एक छोटी सी चिंगारी भी बड़ी तबाही में बदल सकती है।

    राज्य सरकार ने इस खतरे से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में फायर ब्रिगेड के बजट को लगभग दोगुना कर दिया है। साथ ही दमकल कर्मियों की संख्या बढ़ाई गई है और दुनिया के सबसे बड़े एरियल फायरफाइटिंग बेड़ों में से एक का निर्माण किया गया है। अधिकारियों ने नागरिकों से भी अपील की है कि वे अपने घरों के आसपास सुरक्षा क्षेत्र बनाएं, आपातकालीन किट तैयार रखें और स्थानीय अलर्ट सिस्टम से जुड़े रहें।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में कैलिफोर्निया के लिए चुनौती और बढ़ सकती है। ऐसे में प्रशासन और नागरिकों दोनों को सतर्क रहकर तैयारी करनी होगी ताकि किसी भी संभावित आपदा से नुकसान को कम किया जा सके।

  • महासागर के भीतर मंडरा रही बड़ी तबाही की चेतावनी, AMOC करंट के कमजोर होने से बढ़ा खतरा

    महासागर के भीतर मंडरा रही बड़ी तबाही की चेतावनी, AMOC करंट के कमजोर होने से बढ़ा खतरा


    नई दिल्ली । धरती पर जलवायु परिवर्तन को लेकर अक्सर जंगलों की आग, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ते समुद्र स्तर की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा अदृश्य खतरा तेजी से बढ़ रहा है जो पूरी दुनिया के मौसम चक्र को बदल सकता है। यह खतरा अटलांटिक महासागर की गहराइयों में बहने वाली विशाल समुद्री धारा AMOC यानी अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन से जुड़ा है, जिसे धरती की जलवायु प्रणाली की रीढ़ भी माना जाता है।

    AMOC एक ऐसा महासागरीय तंत्र है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म पानी को उत्तरी अटलांटिक और यूरोप की ओर ले जाता है। वहां यह पानी ठंडा होकर भारी हो जाता है और हजारों मीटर गहराई में जाकर वापस दक्षिण दिशा की ओर बहता है। यह निरंतर प्रक्रिया सदियों से वैश्विक तापमान, समुद्री लवणता और मौसम संतुलन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती रही है।

    हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों और उपग्रह डेटा संकेतों के अनुसार यह शक्तिशाली समुद्री धारा अब धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह प्रणाली और अधिक धीमी पड़ गई या पूरी तरह असंतुलित हो गई, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार इसके कमजोर होने से उत्तरी यूरोप में सर्दियां और अधिक कठोर हो सकती हैं, जहां तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे तक गिर सकता है। वहीं दूसरी ओर, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मानसून के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है। इसके अलावा अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र स्तर बढ़ने का खतरा भी बढ़ सकता है, जिससे तटीय इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।

    इस पूरे मुद्दे की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह खतरा दिखाई नहीं देता। यह समुद्र की हजारों मीटर गहराई में बेहद धीमी गति से काम करता है, इसलिए इसका कोई स्पष्ट दृश्य प्रमाण नहीं होता जिसे कैमरे में कैद कर दिखाया जा सके। इसी कारण यह विषय आम जनता की नजरों से अक्सर दूर रह जाता है, जबकि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर बेहद बड़ा हो सकता है।

    वैज्ञानिकों का कहना है कि आधुनिक जलवायु संकटों में सबसे बड़ी समस्या यही है कि कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं अदृश्य हैं। वे न तो तूफान की तरह दिखाई देती हैं और न ही आग की तरह तुरंत महसूस होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव लंबे समय में कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है।

    इस स्थिति की तुलना अक्सर महासागरों में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण से की जाती है, जो आंखों से दिखाई नहीं देता लेकिन पूरे समुद्री जीवन को प्रभावित करता है। इसी तरह AMOC भी एक ऐसा सिस्टम है जिसकी गिरावट धीरे-धीरे लेकिन गहरे प्रभाव के साथ सामने आ सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के जलवायु संकेतों को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़े संकट को जन्म दे सकता है। इसलिए वैश्विक स्तर पर इस पर लगातार निगरानी और शोध बेहद जरूरी है ताकि समय रहते इसके प्रभावों को समझा और नियंत्रित किया जा सके।

  • होर्मुज नहीं, अब गल्फ स्ट्रीम का डर! अगर थम गई यह समुद्री धारा तो यूरोप पर टूट सकता है जलवायु संकट

    होर्मुज नहीं, अब गल्फ स्ट्रीम का डर! अगर थम गई यह समुद्री धारा तो यूरोप पर टूट सकता है जलवायु संकट


    नई दिल्ली । दुनिया की अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और स्वेज नहर जैसे समुद्री मार्गों का महत्व अक्सर चर्चा में रहता है। इन मार्गों पर किसी भी तरह का भू-राजनीतिक तनाव या सैन्य संघर्ष वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इन दिनों पश्चिमी देशों और वैज्ञानिकों की चिंता किसी समुद्री व्यापारिक मार्ग को लेकर नहीं, बल्कि एक ऐसी प्राकृतिक समुद्री धारा को लेकर है जो यूरोप के मौसम और जीवनशैली की आधारशिला मानी जाती है। यह धारा है गल्फ स्ट्रीम, जिसके कमजोर पड़ने की आशंका ने वैज्ञानिकों को सतर्क कर दिया है।

    गल्फ स्ट्रीम अटलांटिक महासागर में बहने वाली गर्म समुद्री धारा है, जो एक बड़े समुद्री परिसंचरण तंत्र का हिस्सा है। वैज्ञानिक इसे अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) के नाम से जानते हैं। यह प्रणाली समुद्र के भीतर एक विशाल कन्वेयर बेल्ट की तरह काम करती है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों से गर्म पानी उत्तर दिशा की ओर बहता है और ठंडे क्षेत्रों में पहुंचकर नीचे डूब जाता है। इसके बाद यह ठंडा पानी फिर दक्षिण की ओर लौटता है। यह सतत चक्र पृथ्वी के तापमान और मौसम को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

    यूरोप के अपेक्षाकृत गर्म मौसम के पीछे भी इसी गल्फ स्ट्रीम का बड़ा योगदान माना जाता है। ब्रिटेन, नॉर्वे और पश्चिमी यूरोप के कई देशों में सर्दियां उतनी कठोर नहीं होतीं जितनी समान अक्षांश वाले अन्य क्षेत्रों में होती हैं। इसका कारण यही गर्म समुद्री धारा है, जो इन क्षेत्रों तक गर्मी पहुंचाती रहती है। यदि यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है तो यूरोप का जलवायु संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग इस समुद्री तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरे हैं। बढ़ते तापमान के कारण आर्कटिक और उत्तरी क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे समुद्र में मीठे पानी की मात्रा बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मीठा पानी खारे पानी की तुलना में हल्का होता है, जिससे समुद्री जल का सामान्य डूबने वाला चक्र प्रभावित हो सकता है। यदि पानी पर्याप्त मात्रा में नीचे नहीं डूबेगा तो AMOC की गति धीमी पड़ सकती है और गल्फ स्ट्रीम कमजोर हो सकती है।

    यदि ऐसा होता है तो इसके प्रभाव बेहद व्यापक होंगे। उत्तर-पश्चिम यूरोप में तापमान कई डिग्री तक गिर सकता है, जिससे भीषण ठंड का दौर शुरू हो सकता है। दक्षिणी यूरोप में बारिश का पैटर्न बदलने से सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, ऊर्जा की मांग बढ़ेगी और आर्थिक गतिविधियों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा बड़ा वैश्विक मुद्दा बन सकता है।

    हालांकि वैज्ञानिकों को कुछ उम्मीदें भी दिखाई दे रही हैं। हालिया शोधों में संकेत मिले हैं कि आर्कटिक महासागर में बर्फ पिघलने से बनने वाले नए खुले समुद्री क्षेत्र पानी को तेजी से ठंडा करने में मदद कर सकते हैं। इससे समुद्री परिसंचरण तंत्र को कुछ हद तक सहारा मिल सकता है। हालांकि यह संभावना अभी शोध के स्तर पर है और वैज्ञानिक लगातार इस पर निगरानी बनाए हुए हैं।

    कुल मिलाकर गल्फ स्ट्रीम का भविष्य केवल यूरोप ही नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु संतुलन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही वजह है कि वैज्ञानिक और नीति निर्माता इस समुद्री धारा की स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं।

  • क्या बदल रहा है धरती पर सूरज की रोशनी का संतुलन? कुछ जगह बढ़ेगी गर्मी, कहीं कम पहुंचेगी धूप

    क्या बदल रहा है धरती पर सूरज की रोशनी का संतुलन? कुछ जगह बढ़ेगी गर्मी, कहीं कम पहुंचेगी धूप


    नई दिल्ली । धरती पर जीवन का आधार मानी जाने वाली सूर्य की रोशनी अब पूरी दुनिया में समान रूप से नहीं पहुंच रही है। वैज्ञानिकों की एक नई रिसर्च में संकेत मिले हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी के विभिन्न हिस्सों में धूप का संतुलन बदल रहा है। इसका असर भविष्य में मौसम, तापमान, कृषि उत्पादन और सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है।

    हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और बदलते जलवायु पैटर्न के कारण पृथ्वी तक पहुंचने वाली सूर्य ऊर्जा का वितरण प्रभावित हो रहा है। चीन की एक शोध टीम द्वारा किए गए अध्ययन में उन्नत जलवायु मॉडल और कंप्यूटर सिमुलेशन का उपयोग किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि बढ़ते तापमान के साथ वातावरण में नमी और बादलों के स्वरूप में बदलाव हो रहा है, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों में सूर्य की किरणों की मात्रा भी बदल रही है।

    अध्ययन के मुताबिक, आर्कटिक और अंटार्कटिका जैसे ध्रुवीय क्षेत्रों में भविष्य में सूर्य की रोशनी कम पहुंच सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ती नमी और घने बादलों की वजह से सूर्य की कई किरणें धरती तक पहुंचने से पहले ही परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में चली जाएंगी। अनुमान है कि आर्कटिक क्षेत्र में गर्मियों के दौरान सूर्य ऊर्जा में उल्लेखनीय कमी दर्ज की जा सकती है।

    दूसरी ओर, भारत, अमेरिका और यूरोप के कई मध्य अक्षांश वाले क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है। इन इलाकों में बादलों की मात्रा घटने की संभावना जताई गई है। कम बादलों का अर्थ है कि सूर्य की किरणें अधिक मात्रा में धरती तक पहुंचेंगी, जिससे गर्मी और तापमान में वृद्धि हो सकती है। भारत जैसे देशों में, जहां पहले से ही हीटवेव एक गंभीर चुनौती बन चुकी है, वहां इस बदलाव का असर और अधिक महसूस किया जा सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि सूर्य की रोशनी के इस असंतुलन के पीछे कई कारण काम कर रहे हैं। बढ़ता वैश्विक तापमान वातावरण में अधिक नमी पैदा कर रहा है। यह नमी कई क्षेत्रों में सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित कर लेती है, जबकि कुछ इलाकों में बादलों की कमी के कारण अधिक धूप जमीन तक पहुंच रही है। वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को “डाउनवर्ड सरफेस सोलर रेडिएशन” के रूप में परिभाषित करते हैं, जिसका अर्थ है वह सौर ऊर्जा जो वातावरण को पार करके सीधे पृथ्वी की सतह तक पहुंचती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की गति इसी तरह जारी रही तो भविष्य में इसके व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। कृषि उत्पादन, जल संसाधन, मानव स्वास्थ्य और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं भी इससे प्रभावित हो सकती हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक लगातार ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और पर्यावरण संरक्षण के उपायों पर जोर दे रहे हैं।

    हालांकि यह बदलाव धीरे-धीरे हो रहा है, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके संकेत अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। आने वाले दशकों में सूर्य की रोशनी का यह बदलता संतुलन दुनिया के मौसम तंत्र को नई दिशा दे सकता है।

  • यूरोप में बढ़ता जलवायु संकट: रिकॉर्ड गर्मी और हीटवेव का खतरा, WMO ने जारी किया अलर्ट

    यूरोप में बढ़ता जलवायु संकट: रिकॉर्ड गर्मी और हीटवेव का खतरा, WMO ने जारी किया अलर्ट


    नई दिल्ली । यूरोप में जलवायु परिवर्तन की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है और ताजा रिपोर्ट्स ने इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया है विश्व मौसम विज्ञान संगठन और कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है जहां तापमान वृद्धि वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी रफ्तार से हो रही है

    डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने यूरोपियन स्टेट ऑफ द क्लाइमेट रिपोर्ट 2025 पेश करते हुए कहा कि 1980 के बाद से यूरोप में तापमान में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह स्थिति अब पर्यावरण से लेकर मानव जीवन तक हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में हालात और भयावह हो सकते हैं

    रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में यूरोप के लगभग 95 प्रतिशत हिस्से में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया गया इसमें मेडिटेरेनियन क्षेत्र से लेकर आर्कटिक सर्कल तक लंबे समय तक गर्मी का असर बना रहा कई क्षेत्रों में रिकॉर्ड हीटवेव देखने को मिली खासतौर पर सब आर्कटिक क्षेत्र फेनोस्कैंडिया में जुलाई के महीने में लगातार 21 दिन तक हीटवेव चली जो अब तक की सबसे लंबी और गंभीर मानी जा रही है

    स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि आर्कटिक सर्कल के आसपास तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया जो सामान्य परिस्थितियों में बेहद असामान्य है इसके अलावा बढ़ती गर्मी और सूखे हालात ने जंगल की आग के खतरे को भी कई गुना बढ़ा दिया है रिपोर्ट के अनुसार 2025 में यूरोप में लगभग 1.034 मिलियन हेक्टेयर जमीन आग की चपेट में आई जो साइप्रस देश के कुल क्षेत्रफल से भी ज्यादा है

    जंगल की आग के कारण उत्सर्जन में भी भारी वृद्धि हुई है जिसमें स्पेन का योगदान सबसे अधिक रहा इस तरह की घटनाओं ने न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है बल्कि जैव विविधता पर भी गंभीर प्रभाव डाला है समुद्री हीटवेव के कारण भूमध्य सागर में सीग्रास जैसे संवेदनशील इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा है वहीं पीटलैंड क्षेत्रों में आग लगने से कार्बन उत्सर्जन और बढ़ गया है

    जलवायु परिवर्तन का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल रहा है Food and Agriculture Organization और डब्ल्यूएमओ की संयुक्त रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक गर्मी वैश्विक खाद्य प्रणाली को प्रभावित कर रही है जिससे एक अरब से ज्यादा लोग जोखिम में आ सकते हैं इसके अलावा हीट स्ट्रेस के कारण हर साल दुनिया भर में लगभग 500 अरब काम के घंटे का नुकसान हो रहा है

    विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की समस्या बन चुका है और इससे निपटने के लिए तत्काल और ठोस कदम उठाने की जरूरत है यूरोपीय देशों ने 2030 और 2050 के लिए कई लक्ष्य तय किए हैं लेकिन रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन प्रयासों की गति को और तेज करने की आवश्यकता है कुल मिलाकर यह रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतावनी है कि यदि दुनिया ने अभी कदम नहीं उठाए तो जलवायु संकट आने वाले समय में और भी विनाशकारी रूप ले सकता है