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  • वैश्विक सप्लाई चेन के नए दौर में भारत की मजबूत छलांग, मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेज हुई रफ्तार; निवेश और उत्पादन में बढ़त के संकेत

    वैश्विक सप्लाई चेन के नए दौर में भारत की मजबूत छलांग, मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में तेज हुई रफ्तार; निवेश और उत्पादन में बढ़त के संकेत

    नई दिल्ली । वैश्विक सप्लाई चेन में लगातार हो रहे बदलाव के बीच भारत दुनिया के प्रमुख विनिर्माण केंद्रों में अपनी स्थिति तेजी से मजबूत करता दिखाई दे रहा है। महामारी के बाद बदले अंतरराष्ट्रीय कारोबारी माहौल ने वैश्विक कंपनियों को उत्पादन और आपूर्ति व्यवस्था में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है। इसका सबसे बड़ा लाभ भारत को मिलता दिखाई दे रहा है, जहां निवेश, उत्पादन क्षमता और औद्योगिक गतिविधियों में लगातार विस्तार दर्ज किया जा रहा है। उद्योग जगत का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क का और भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

    हालिया आकलन के अनुसार कोविड-19 के बाद दुनिया भर की कंपनियों ने केवल एक देश पर निर्भर रहने की रणनीति से दूरी बनानी शुरू की है। इसके स्थान पर चीन+1, फ्रेंडशोरिंग और नियरशोरिंग जैसी रणनीतियों को अपनाया जा रहा है, जिससे सप्लाई चेन अधिक सुरक्षित, लचीली और जोखिमों से कम प्रभावित रहे। इस वैश्विक बदलाव ने भारत को नए निवेश और उत्पादन अवसर उपलब्ध कराए हैं।

    रिपोर्ट में दुनिया की प्रमुख विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं का विश्लेषण करते हुए बताया गया है कि महामारी के बाद भारत ने अपनी औसत विनिर्माण वृद्धि दर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। महामारी-पूर्व अवधि की तुलना में हाल के वर्षों में उत्पादन वृद्धि तेज हुई है और भारत वैश्विक औसत से बेहतर प्रदर्शन करने वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय विनिर्माण क्षेत्र लगातार प्रतिस्पर्धी बन रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सफलता के पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं। देश का विशाल घरेलू बाजार, तेजी से विकसित हो रहा बुनियादी ढांचा, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में सुधार, डिजिटल परिवर्तन और निवेश के अनुकूल नीतियों ने उद्योगों का भरोसा बढ़ाया है। इसके साथ ही वैश्विक कंपनियां उत्पादन इकाइयों के विस्तार के लिए भारत को एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रही हैं।

    औद्योगिक क्षेत्र को गति देने में सरकार की विभिन्न योजनाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना, औद्योगिक कॉरिडोर, पीएम गति शक्ति जैसी पहलों ने विनिर्माण क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के साथ उत्पादन क्षमता बढ़ाने का रास्ता तैयार किया है। इन पहलों के कारण कई क्षेत्रों में नई परियोजनाएं शुरू हुई हैं और रोजगार सृजन की संभावनाएं भी बढ़ी हैं।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बने रहने के लिए भारत को लॉजिस्टिक्स लागत कम करने, औद्योगिक आधारभूत ढांचे को और मजबूत बनाने तथा घरेलू सप्लायर नेटवर्क का विस्तार करने पर लगातार काम करना होगा। कारोबार करने में आसानी को बेहतर बनाना, नई तकनीकों को उद्योगों में तेजी से अपनाना और मुक्त व्यापार समझौतों का प्रभावी उपयोग भी भविष्य की विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।

    विश्लेषकों के अनुसार यदि वर्तमान सुधारों की गति बनी रहती है और वैश्विक निवेश का प्रवाह इसी तरह जारी रहता है, तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया के अग्रणी विनिर्माण केंद्रों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है। इससे न केवल निर्यात क्षमता बढ़ेगी, बल्कि रोजगार, औद्योगिक विकास और आर्थिक वृद्धि को भी नई गति मिलेगी। बदलती वैश्विक सप्लाई चेन के इस दौर में भारत के सामने एक दीर्घकालिक अवसर मौजूद है, जिसे प्रभावी नीतियों और मजबूत औद्योगिक ढांचे के माध्यम से और अधिक सशक्त बनाया जा सकता है।

  • ब्राजील बना भारत का 'सुपर पार्टनर': रेयर अर्थ मिनरल्स से लेकर एयरोस्पेस तक 9 बड़े समझौते, चीन के एकाधिकार पर मोदी का सीधा प्रहार!

    ब्राजील बना भारत का 'सुपर पार्टनर': रेयर अर्थ मिनरल्स से लेकर एयरोस्पेस तक 9 बड़े समझौते, चीन के एकाधिकार पर मोदी का सीधा प्रहार!


    नई दिल्ली ।दुनिया भर में ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ दुर्लभ खनिजों की प्रोसेसिंग और खनन पर लगभग 70% से 90% तक नियंत्रण रखने वाला चीन अब मुश्किल में पड़ सकता है। अपनी इस ताकत के दम पर समय-समय पर दुनिया को आंख दिखाने वाले चीन की हेकड़ी को शांत करने के लिए भारत ने एक मास्टरस्ट्रोक खेला है। शनिवार को भारत और ब्राजील के बीच एक ऐसी ऐतिहासिक ट्रेड डील हुई है, जो न केवल चीन पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन के समीकरण को भी पूरी तरह बदल कर रख देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा के बीच हुई उच्च स्तरीय वार्ता के बाद दोनों देशों ने जरूरी मिनरल्स और स्टील सप्लाई चेन में सहयोग के लिए समझौतों पर मुहर लगा दी है।

    प्रधानमंत्री मोदी ने इस साझेदारी को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बताया है। उन्होंने कहा कि ब्राजील के साथ हुए इस खनिज समझौते से चीन पर भारत की निर्भरता काफी हद तक कम होगी और यह एक मजबूत, सुरक्षित सप्लाई चेन बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। इस मुलाकात के दौरान भारत और ब्राजील ने साल 2030 तक अपने द्विपक्षीय व्यापार को 30 अरब अमेरिकी डॉलर तक ले जाने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य भी निर्धारित किया है। आपको बता दें कि 2006 में जहां यह व्यापार महज 2.4 अरब डॉलर था, वहीं अब यह 15 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, लेकिन दोनों नेताओं का मानना है कि दोनों देशों की क्षमता इससे कहीं अधिक है।

    इस ऐतिहासिक अवसर पर कुल 9 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें सबसे प्रमुख है ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ के क्षेत्र में सहयोग और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए बनाई गई ‘डिजिटल साझेदारी’। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस बात पर जोर दिया कि ब्राजील के पास नायोबियम, लिथियम और लौह अयस्क जैसे बहुमूल्य खनिज संसाधनों का भंडार है, जबकि भारत के पास विश्व स्तरीय तकनीक और विनिर्माण क्षमता है। जब ये दोनों शक्तियां हाथ मिलाएंगी, तो दुनिया को एक वैकल्पिक और विश्वसनीय औद्योगिक पार्टनर मिलेगा।

    व्यापारिक मोर्चे पर भी बड़े कदम उठाए गए हैं। एनएमडीसी, वेल और अडानी गंगावरम पोर्ट के बीच करीब 500 मिलियन डॉलर की लागत से लौह अयस्क ब्लेंडिंग सुविधा स्थापित करने पर सहमति बनी है। इसके अलावा, एयरोस्पेस क्षेत्र में एक बड़ी सफलता तब मिली जब ब्राजील की दिग्गज कंपनी ‘एम्ब्रेयर’ और ‘अडानी डिफेंस’ ने भारत में ई175 रीजनल जेट की असेंबली लाइन स्थापित करने का फैसला किया। फार्मा क्षेत्र में भी कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं के संयुक्त शोध के लिए हाथ मिलाया गया है। साफ है कि भारत और ब्राजील की यह नई जुगलबंदी न केवल चीन के आर्थिक दबदबे को चुनौती दे रही है, बल्कि विकासशील देशों के हितों को वैश्विक मंच पर मजबूती से स्थापित भी कर रही है।