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  • सोने पर बढ़ा दुनिया का भरोसा: केंद्रीय बैंक बढ़ा रहे गोल्ड रिजर्व, कीमतों में बड़ी तेजी के संकेत

    सोने पर बढ़ा दुनिया का भरोसा: केंद्रीय बैंक बढ़ा रहे गोल्ड रिजर्व, कीमतों में बड़ी तेजी के संकेत

    नई दिल्ली । वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच सोना एक बार फिर सबसे भरोसेमंद निवेश विकल्प के रूप में उभर रहा है। दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ा रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के ताजा वार्षिक सर्वेक्षण ने यह संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में यह रुझान और तेज हो सकता है। इससे न केवल गोल्ड रिजर्व का महत्व बढ़ेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

    सर्वेक्षण में 76 केंद्रीय बैंकों ने हिस्सा लिया, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है। इसमें शामिल 84 प्रतिशत केंद्रीय बैंकों का मानना है कि अगले पांच वर्षों में वैश्विक भंडार में सोने की हिस्सेदारी मौजूदा स्तर की तुलना में काफी अधिक होगी। दिलचस्प बात यह है कि विकसित देशों के साथ-साथ उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के केंद्रीय बैंक भी इस मुद्दे पर लगभग एक जैसी राय रखते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक वित्तीय प्रणाली में हो रहे बदलावों के कारण केंद्रीय बैंक अपनी आरक्षित संपत्तियों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं। लंबे समय तक अमेरिकी डॉलर को सबसे सुरक्षित रिजर्व मुद्रा माना जाता रहा, लेकिन हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक प्रतिबंधों और वैश्विक व्यापार में बदलावों के चलते कई देशों ने वैकल्पिक सुरक्षित संपत्तियों की तलाश शुरू कर दी है। सोना इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर सामने आया है।

    अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़े भी इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। सर्वेक्षण में शामिल 74 प्रतिशत रिजर्व प्रबंधकों का अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी और कम हो सकती है। ऐसे में सोना केंद्रीय बैंकों के लिए सुरक्षा कवच की भूमिका निभा सकता है।

    बाजार विशेषज्ञ और केडिया एडवाइजरी के निदेशक अजय केडिया का कहना है कि दीर्घकालिक दृष्टि से सोने का रुख बेहद मजबूत बना हुआ है। हालांकि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और महंगाई के दबाव के कारण निकट भविष्य में सोने पर कुछ दबाव देखने को मिल सकता है, लेकिन लंबी अवधि में इसकी संभावनाएं सकारात्मक हैं। उनका अनुमान है कि अगले एक वर्ष के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना नई ऊंचाइयों को छू सकता है।

    सोने की बढ़ती मांग केवल निवेशकों तक सीमित नहीं है। केंद्रीय बैंकों की खरीदारी भी बाजार को मजबूत आधार प्रदान कर रही है। जब दुनिया के सबसे बड़े वित्तीय संस्थान अपनी संपत्तियों का बड़ा हिस्सा सोने में स्थानांतरित करते हैं, तो यह निवेशकों के लिए भी एक मजबूत संकेत माना जाता है। यही कारण है कि आर्थिक संकट, युद्ध, महंगाई और मुद्रा अवमूल्यन जैसी परिस्थितियों में सोने की मांग तेजी से बढ़ जाती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक अनिश्चितता बनी रहती है और केंद्रीय बैंक इसी तरह सोना खरीदते रहते हैं, तो आने वाले वर्षों में गोल्ड मार्केट में नई तेजी देखने को मिल सकती है। निवेशकों के लिए यह संकेत है कि सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा और दीर्घकालिक निवेश का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी बनता जा रहा है।

  • 1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत

    1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत



    नई दिल्ली। भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का साल एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था और स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए सोने का सहारा लेना पड़ा।

    कैसे पैदा हुआ आर्थिक संकट?
    1991 के दौरान भारत कई आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ थाविदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से घट गया थादेश के पास कुछ ही दिनों के आयात के लिए पैसा बचा थाखाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई थींनिर्यात में गिरावट और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा था
    इन परिस्थितियों ने देश को डिफॉल्ट की कगार पर पहुंचा दिया था।

    क्यों गिरवी रखना पड़ा सोना?
    संकट इतना गहरा था कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को तत्काल कदम उठाना पड़ा। विदेशी कर्ज चुकाने के लिए फंड की जरूरत थीअंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाए रखना जरूरी थाभुगतान संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका थाऐसे में भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा सहायता जुटाई।

    कितना सोना इस्तेमाल हुआ?
    रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को भेजा गया।करीब 20 टन सोना स्विट्जरलैंड के बैंक के पास गिरवी रखा गया यह सोना देश की अर्थव्यवस्था को तुरंत राहत देने के लिए इस्तेमाल किया गया।

    किसने संभाली जिम्मेदारी?
    इस कठिन फैसले के पीछे देश की आर्थिक टीम शामिल थीतत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरअर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंहवित्त मंत्री यशवंत सिन्हाRBI के वरिष्ठ अधिकार यह निर्णय बेहद गोपनीय तरीके से लिया गया था ताकि बाजार में घबराहट न फैले।

    कैसे भेजा गया सोना?
    मुंबई एयरपोर्ट से विशेष सुरक्षा में सोना विदेश भेजा गया

    इसे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बैंकों में गिरवी रखा गया

    इसके बदले भारत को तत्काल विदेशी मुद्रा सहायता मिली

    क्या मिला फायदा?
    इस कदम के बादभारत को तत्काल आर्थिक राहत मिलीदेश डिफॉल्ट होने से बच गयाबाद में 1991 के आर्थिक सुधारों का रास्ता खुला।  यही सुधार आगे चलकर भारत की उदारीकरण नीति की नींव बने।1991 का सोना गिरवी संकट भारत के लिए एक चेतावनी था कि आर्थिक अनुशासन कितना जरूरी है।उस समय लिए गए कठिन फैसलों ने देश को दिवालिया होने से बचाया और एक नई आर्थिक दिशा दी।

  • भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में ऐतिहासिक उछाल..

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में ऐतिहासिक उछाल..


    नई दिल्ली।भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में एक बार फिर जबरदस्त मजबूती देखने को मिली है। 16 जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 14.167 बिलियन डॉलर की तेज बढ़त के साथ 701.360 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। यह उछाल न केवल हाल के महीनों में सबसे बड़ी साप्ताहिक वृद्धि में से एक माना जा रहा है, बल्कि यह भारत की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक भरोसे को भी दर्शाता है।इससे पहले 9 जनवरी को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में केवल 392 मिलियन डॉलर की मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। ऐसे में एक ही सप्ताह में 14 अरब डॉलर से अधिक की छलांग को अर्थशास्त्री और बाजार विशेषज्ञ बेहद सकारात्मक संकेत मान रहे हैं।

    भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा घटक फॉरेन करेंसी एसेट्स यानी एफसीए इस वृद्धि में प्रमुख कारण रहा। 16 जनवरी को समाप्त सप्ताह में एफसीए में 9.652 बिलियन डॉलर का इजाफा हुआ, जिससे इसकी कुल वैल्यू बढ़कर 560.518 बिलियन डॉलर हो गई। एफसीए में अमेरिकी डॉलर के साथ-साथ यूरो, पाउंड और जापानी येन जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राएं शामिल होती हैं, जिनका मूल्यांकन डॉलर के संदर्भ में किया जाता है।सोने के भंडार में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में गोल्ड रिजर्व की वैल्यू 4.623 बिलियन डॉलर बढ़कर 117.454 बिलियन डॉलर हो गई। वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है और इसमें बढ़ोतरी भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति को मजबूत बनाती है।

    हालांकि, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स यानी एसडीआर और आईएमएफ में भारत की रिजर्व पोजिशन में हल्की गिरावट दर्ज की गई। एसडीआर की वैल्यू 35 मिलियन डॉलर घटकर 18.704 बिलियन डॉलर रह गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में रिजर्व पोजिशन 73 मिलियन डॉलर घटकर 4.684 बिलियन डॉलर पर आ गई।आंकड़ों पर नजर डालें तो इससे पहले 17 अक्टूबर 2025 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 702.25 बिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंचा था। वहीं, देश का अब तक का ऑल-टाइम हाई विदेशी मुद्रा भंडार 704.89 बिलियन डॉलर रहा है, जो सितंबर 2024 में दर्ज किया गया था। मौजूदा आंकड़े उस रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी देश के लिए मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार उसकी आर्थिक सेहत का अहम संकेतक होता है। यह न केवल आयात भुगतान और बाहरी झटकों से निपटने में मदद करता है, बल्कि मुद्रा विनिमय दर को स्थिर रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। जब डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बढ़ता है, तब केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रुपये को सहारा देता है।

    बढ़ता हुआ विदेशी मुद्रा भंडार इस बात का संकेत भी है कि देश में विदेशी निवेश और डॉलर की आवक मजबूत बनी हुई है। इससे भारत की वैश्विक व्यापार क्षमता बढ़ती है और अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती मिलती है। कुल मिलाकर, विदेशी मुद्रा भंडार में यह उछाल भारत की आर्थिक स्थिति के लिए बेहद सकारात्मक और भरोसेमंद संकेत के रूप में देखा जा रहा है।