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  • बैंकों का कर्ज देने का तरीका बदला, होम लोन से आगे निकली NBFCs की हिस्सेदारी, गोल्ड लोन में 82.5% उछाल

    बैंकों का कर्ज देने का तरीका बदला, होम लोन से आगे निकली NBFCs की हिस्सेदारी, गोल्ड लोन में 82.5% उछाल


    नई दिल्ली । देश में बैंकों के कर्ज वितरण के तरीके में बदलाव देखने को मिल रहा है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में बैंकों ने घर खरीदने वाले ग्राहकों की तुलना में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को अधिक कर्ज दिया। 31 मार्च से 30 सितंबर के बीच बैंकों ने NBFCs को करीब 1.8 लाख करोड़ रुपये का ऋण उपलब्ध कराया, जबकि आवास क्षेत्र को 1.4 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया गया। इस अवधि में गोल्ड लोन भी तेजी से बढ़ा और खुदरा कर्ज की वृद्धि में इसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही।

    आंकड़ों के मुताबिक, 31 मार्च से 30 सितंबर के बीच बैंकों ने कुल 16.1 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त गैर-खाद्य ऋण वितरित किया। इसमें बड़े उद्योगों को 2.04 लाख करोड़ रुपये का कर्ज मिला, जबकि NBFCs को 1.83 लाख करोड़ रुपये का ऋण दिया गया। आवास क्षेत्र में यह राशि 1.35 लाख करोड़ रुपये रही। गोल्ड लोन के रूप में 1.15 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज दिया गया। व्यापार क्षेत्र को 1.02 लाख करोड़ रुपये और सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को 91,366 करोड़ रुपये का ऋण मिला।

    गोल्ड लोन में सबसे अधिक तेजी दर्ज की गई है। पिछले एक साल में इस श्रेणी का बकाया कर्ज 82.5 प्रतिशत बढ़कर 5.8 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। वित्त वर्ष की पहली छमाही में ही इसमें 25.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। मार्च से सितंबर के बीच बैंकों ने सोना गिरवी रखकर 1.2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया। इस वृद्धि के साथ गोल्ड लोन बैंकिंग क्षेत्र में तेजी से बढ़ने वाले ऋण खंडों में शामिल हो गया है।

    अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का कुल गैर-खाद्य ऋण सितंबर के अंत तक सालाना आधार पर 19.1 प्रतिशत बढ़कर 229 लाख करोड़ रुपये हो गया। मार्च के मुकाबले इसमें 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस कुल ऋण में सेवाओं का हिस्सा 4.9 लाख करोड़ रुपये, व्यक्तिगत कर्ज का 4.5 लाख करोड़ रुपये, उद्योगों का 3.7 लाख करोड़ रुपये और कृषि क्षेत्र का 1.8 लाख करोड़ रुपये रहा। आंकड़े बताते हैं कि बैंकिंग क्षेत्र में उद्योग, सेवा और व्यक्तिगत कर्ज की मांग बनी हुई है।

    सेवा क्षेत्र को मिलने वाला कर्ज भी तेजी से बढ़ा है। इस क्षेत्र का कुल ऋण सालाना आधार पर 28.3 प्रतिशत बढ़कर 64.9 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। अतिरिक्त गैर-खाद्य ऋण में सेवाओं की हिस्सेदारी 30.6 प्रतिशत रही। सेवा क्षेत्र में NBFCs को दिया गया कर्ज 41.8 प्रतिशत बढ़कर 22.5 लाख करोड़ रुपये हो गया। वहीं, कमर्शियल रियल एस्टेट क्षेत्र को दिए गए ऋण में 23.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह 7.5 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

    उद्योगों को मिलने वाले कर्ज में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। औद्योगिक ऋण सालाना आधार पर 19.5 प्रतिशत बढ़कर 49.8 लाख करोड़ रुपये हो गया। बड़ी कंपनियों को दिया गया कर्ज 16 प्रतिशत बढ़कर 33 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। मध्यम आकार की कंपनियों के लिए ऋण में 33.2 प्रतिशत और छोटी कंपनियों के कर्ज में 24.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उद्योगों को दिए गए अतिरिक्त 3.7 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में बड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 2 लाख करोड़ रुपये और छोटी कंपनियों की हिस्सेदारी 1.6 लाख करोड़ रुपये रही।

    कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए बैंक ऋण सालाना आधार पर 19.5 प्रतिशत बढ़कर 28.2 लाख करोड़ रुपये हो गया। एक साल पहले यह 23.6 लाख करोड़ रुपये था। व्यापार क्षेत्र को मिलने वाले ऋण में भी 23.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई। दूसरी ओर, व्यक्तिगत कर्ज 17.3 प्रतिशत बढ़कर 74.27 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया।

    फिक्स्ड डिपॉजिट के बदले दिए जाने वाले कर्ज में भी उल्लेखनीय तेजी आई। इस श्रेणी में बैंकों का बकाया ऋण 53.3 प्रतिशत बढ़कर 2.2 लाख करोड़ रुपये हो गया। पिछले छह महीनों में इसमें 28.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। मार्च से सितंबर के दौरान बैंकों ने फिक्स्ड डिपॉजिट के बदले 47,471 करोड़ रुपये का कर्ज दिया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बैंकिंग क्षेत्र में NBFCs, गोल्ड लोन और जमा राशि के बदले मिलने वाले कर्ज की मांग तेजी से बढ़ी है।

  • लगातार दूसरे दिन फिसले सोने-चांदी के भाव, घरेलू और वैश्विक बाजारों में बिकवाली से निवेशकों की बढ़ी सतर्कता

    लगातार दूसरे दिन फिसले सोने-चांदी के भाव, घरेलू और वैश्विक बाजारों में बिकवाली से निवेशकों की बढ़ी सतर्कता

    नई दिल्ली । घरेलू सर्राफा और वायदा बाजार में मंगलवार को लगातार दूसरे दिन सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। कारोबारी सत्र की शुरुआत से ही दोनों कीमती धातुओं पर बिकवाली का दबाव दिखाई दिया, जिसके कारण इनके दाम में लगभग 1.20 प्रतिशत तक की कमजोरी देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी नरमी का असर भारतीय बाजार पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जिससे निवेशकों और कारोबारियों ने सतर्क रुख अपनाया।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज में सोने के अगस्त 2026 डिलीवरी वाले वायदा अनुबंध की शुरुआत पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले हल्की कमजोरी के साथ हुई। शुरुआती कारोबार के दौरान कीमतों में लगातार गिरावट बनी रही और सोना दिन के शुरुआती घंटों में एक हजार रुपये से अधिक सस्ता होकर कारोबार करता दिखाई दिया। कारोबार के दौरान सोने ने दिन का निचला स्तर भी छुआ, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि बाजार में खरीदारी की तुलना में बिकवाली का दबाव अधिक बना हुआ है।

    चांदी के वायदा कारोबार में भी इसी तरह का रुख देखने को मिला। सितंबर 2026 डिलीवरी वाले अनुबंध की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और शुरुआती कारोबार के दौरान इसमें और अधिक कमजोरी दर्ज की गई। कारोबार के पहले कुछ घंटों में चांदी एक प्रतिशत से अधिक टूट गई। दिन के दौरान इसके भाव लगातार दबाव में बने रहे, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशकों का झुकाव फिलहाल सुरक्षित मुनाफावसूली की ओर है।

    अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजारों में भी सोना और चांदी दोनों दबाव में रहे। वैश्विक स्तर पर कीमती धातुओं में आई बिकवाली का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता में बदलाव और डॉलर से जुड़े संकेतों का प्रभाव कीमती धातुओं की कीमतों पर लगातार बना हुआ है। ऐसे माहौल में निवेशक नए आर्थिक संकेतों और केंद्रीय बैंकों की आगामी नीतियों पर भी नजर बनाए हुए हैं।

    हालांकि कीमतों में गिरावट के बावजूद सोने की मांग से जुड़ा एक अलग रुझान भी सामने आया है। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल से जून तिमाही के दौरान गोल्ड लोन का दायरा उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। हालिया आकलनों के अनुसार, गोल्ड लोन अब सुरक्षित ऋण श्रेणी में सबसे बड़ा एसेट क्लास बनकर उभरा है और इसने वाहन ऋण को भी पीछे छोड़ दिया है। यह संकेत देता है कि आर्थिक जरूरतों के समय लोग सोने को वित्तीय सुरक्षा के प्रभावी साधन के रूप में अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।

    बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि कीमती धातुओं में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। निवेशकों को केवल दैनिक मूल्य परिवर्तन के आधार पर निर्णय लेने के बजाय वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, ब्याज दरों के रुझान, मुद्रा बाजार की चाल और घरेलू मांग जैसे व्यापक कारकों पर भी ध्यान देना चाहिए। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दबाव बना रहता है तो निकट भविष्य में सोने और चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। वहीं, घरेलू मांग और निवेशकों की खरीदारी की रणनीति आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।