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  • गोल्ड मेडल की असली सच्चाई आई सामने, जानें किस धातु से बनता है स्वर्ण पदक और क्यों चढ़ाई जाती है सोने की परत

    गोल्ड मेडल की असली सच्चाई आई सामने, जानें किस धातु से बनता है स्वर्ण पदक और क्यों चढ़ाई जाती है सोने की परत

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में जब कोई एथलीट स्वर्ण पदक जीतता है, तो उसकी चमक पूरे देश को गौरवान्वित करती है। आम तौर पर लोगों की धारणा यही रहती है कि यह पदक पूरी तरह से ठोस सोने का बना होता है। हालांकि वास्तविक सच इससे काफी अलग है। आधुनिक ओलंपिक और बड़ी वैश्विक खेल प्रतियोगिताओं में दिए जाने वाले गोल्ड मेडल पूरी तरह सोने के नहीं होते, बल्कि इन्हें खास अंतरराष्ट्रीय मानकों और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के तहत तैयार किया जाता है।

    खेल नियमों के अनुसार एक स्वर्ण पदक का मुख्य हिस्सा चांदी का बना होता है। किसी भी मानक गोल्ड मेडल में कम से कम 92.5 प्रतिशत शुद्ध चांदी का उपयोग किया जाता है। इसके ऊपरी हिस्से पर ही केवल असली सोने की एक पतली परत चढ़ाई जाती है। यही परत पदक को उसकी खास सुनहरी चमक और पहचान प्रदान करती है, जिससे यह देखने में पूरी तरह सोने का प्रतीत होता है।

    अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के नियमों के तहत एक स्वर्ण पदक का कुल वजन सामान्यतः 500 ग्राम के आसपास रखा जाता है। इतने वजन वाले पदक में मात्र 6 ग्राम शुद्ध सोना होना अनिवार्य होता है, जो ऊपर से कोटेड होता है। बाकी का पूरा हिस्सा उच्च गुणवत्ता वाली चांदी से ही निर्मित होता है। यदि पूरा पदक शुद्ध सोने से तैयार किया जाए, तो इसकी लागत काफी अधिक बढ़ जाएगी और यह व्यावहारिक नहीं रहेगा।

    शुद्ध सोना एक बेहद मुलायम धातु मानी जाती है, जिससे यदि पूरा मेडल बनाया जाए तो उसके आसानी से मुड़ने या खराब होने का जोखिम बना रहता है। चांदी अधिक मजबूत, टिकाऊ और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली धातु है। इसी कारण चांदी के आधार पर सोने की कोटिंग करना सबसे उपयुक्त और टिकाऊ विकल्प माना जाता है।

    अगर इतिहास की बात करें तो वर्ष 1912 के स्टॉकहोम ओलंपिक तक खिलाड़ियों को पूरी तरह सोने के बने मेडल ही दिए जाते थे। इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और बढ़ती लागत के चलते नियमों में बदलाव किया गया। वर्तमान व्यवस्था में केवल सोने की परत चढ़ाने का नियम लागू है, जिससे पदकों की गुणवत्ता और मजबूती दोनों बनी रहती है।

    किसी भी खिलाड़ी के लिए स्वर्ण पदक की असली कीमत उसकी धातु की बाजार दर से नहीं तय होती। यह पदक वर्षों की कड़ी मेहनत, त्याग, अनुशासन और अपने देश को शीर्ष पर पहुंचाने के गौरव का प्रतीक होता है। यही ऐतिहासिक और भावनात्मक सम्मान इस पदक को दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार बनाता है।

  • सीडब्ल्यूजी 2026 में भारत का दमदार पंच, लवलीना सहित 10 मुक्केबाज पहुंचे फाइनल

    सीडब्ल्यूजी 2026 में भारत का दमदार पंच, लवलीना सहित 10 मुक्केबाज पहुंचे फाइनल


    नई दिल्ली। कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए एक बार फिर दुनिया को अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। ग्लासगो में खेले गए सेमीफाइनल मुकाबलों में भारत के दस मुक्केबाजों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को हराकर फाइनल में जगह बनाई है। अब पूरा देश इन खिलाड़ियों से स्वर्ण पदकों की उम्मीद लगाए बैठा है। जिस आत्मविश्वास और आक्रामक अंदाज के साथ भारतीय खिलाड़ियों ने अपने मुकाबले जीते हैं उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि टीम इस बार केवल पदक जीतने नहीं बल्कि बॉक्सिंग में अपना दबदबा स्थापित करने उतरी है।

    महिलाओं की 75 किलोग्राम स्पर्धा में ओलंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन ने एक बार फिर अपने अनुभव और तकनीक का शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने तुवालू की प्रतिद्वंद्वी को एकतरफा मुकाबले में 5-0 से हराते हुए फाइनल में प्रवेश किया। मुकाबले के पहले राउंड से ही लवलीना ने अपने लंबे रीच बेहतरीन फुटवर्क और सटीक पंचों के दम पर विरोधी पर पूरी तरह नियंत्रण बनाए रखा। उनकी जीत ने भारत की स्वर्ण पदक की उम्मीदों को और मजबूत कर दिया।

    विश्व चैंपियन जैस्मिन लेंबोरिया ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए महिलाओं की 57 किलोग्राम स्पर्धा में अपनी प्रतिद्वंद्वी को लगातार दबाव में रखा। मुकाबले के दौरान विरोधी खिलाड़ी को कई बार स्टैंडिंग काउंट मिला जिसके बाद रेफरी ने मुकाबला रोकते हुए जैस्मिन को विजेता घोषित कर दिया। उनकी दमदार जीत ने भारतीय टीम का मनोबल और ऊंचा कर दिया।

    महिलाओं की 70 किलोग्राम स्पर्धा में अरुंधति चौधरी ने दिन का सबसे बड़ा उलटफेर करते हुए गत चैंपियन को हराकर फाइनल में जगह बनाई। उन्होंने शुरुआत से ही आक्रामक खेल दिखाया और अपने शानदार पंचों से विरोधी को संभलने का मौका नहीं दिया। इस जीत ने साबित कर दिया कि भारतीय महिला मुक्केबाज अब दुनिया की किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

    प्रीति पवार साक्षी और प्रिया घणघस ने भी अपने मुकाबलों में शानदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल का टिकट पक्का किया। इन तीनों खिलाड़ियों ने एकतरफा जीत दर्ज कर यह दिखाया कि भारतीय महिला बॉक्सिंग लगातार नई ऊंचाइयों को छू रही है और भविष्य में भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करती रहेगी।

    पुरुष वर्ग में भी भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया। जादुमणि सिंह सचिन सिवाच अंकुश पंघाल और नरेंद्र बरवाल ने अपने अपने मुकाबले जीतकर फाइनल में जगह बनाई। इन सभी खिलाड़ियों ने तकनीक आत्मविश्वास और आक्रामक खेल का बेहतरीन प्रदर्शन किया। खासकर सुपर हैवीवेट वर्ग में नरेंद्र बरवाल की जीत ने दर्शकों को बेहद प्रभावित किया और भारत के लिए एक और संभावित स्वर्ण पदक की उम्मीद जगा दी।

    भारतीय मुक्केबाजों का यह प्रदर्शन केवल पदकों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह देश में बॉक्सिंग के लगातार मजबूत होते स्तर का भी प्रमाण है। पिछले कुछ वर्षों में खिलाड़ियों ने विश्व स्तर पर लगातार शानदार प्रदर्शन किया है और अब कॉमनवेल्थ गेम्स में भी उनका दबदबा साफ दिखाई दे रहा है। यदि फाइनल में भी यही लय बरकरार रही तो भारत के खाते में कई स्वर्ण पदक आ सकते हैं और यह अभियान भारतीय खेल इतिहास के सबसे यादगार अभियानों में शामिल हो सकता है।