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  • ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क की गुप्त रणनीतिक चाल: बिना युद्ध बढ़ रहा सैन्य दबदबा

    ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क की गुप्त रणनीतिक चाल: बिना युद्ध बढ़ रहा सैन्य दबदबा



    नई दिल्ली। अमेरिका और डेनमार्क के बीच ग्रीनलैंड को लेकर रणनीतिक बातचीत एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका यहां तीन नए सैन्य अड्डे बनाने की योजना पर काम कर रहा है, लेकिन आधिकारिक तौर पर यह प्रक्रिया अभी केवल कूटनीतिक चर्चा के स्तर पर है और किसी भी तरह का अंतिम समझौता नहीं हुआ है।

    ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, लंबे समय से अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका कारण इसका आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होना है, जहां से उत्तरी अटलांटिक महासागर और यूरोप-उत्तर अमेरिका के बीच के समुद्री मार्गों पर नजर रखी जा सकती है। अमेरिका पहले से ही यहां थुले एयर बेस के जरिए अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए हुए है, जो शीत युद्ध के समय से सक्रिय है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और डेनमार्क के बीच हाल के महीनों में उच्च स्तरीय बातचीत हुई है, जिसमें ग्रीनलैंड के दक्षिणी हिस्से में अतिरिक्त सैन्य ढांचे विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई है। माना जा रहा है कि इन प्रस्तावित अड्डों का उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा, खासकर रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रखना है।

    अमेरिका की रणनीति आर्कटिक क्षेत्र में अपनी निगरानी और सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने की है। इस क्षेत्र में बर्फ पिघलने के कारण नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं, जिससे वैश्विक शक्तियों की रुचि बढ़ गई है। इसी वजह से अमेरिका इस इलाके को अपने रक्षा नेटवर्क का अहम हिस्सा मानता है।

    हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि डेनमार्क एक संप्रभु राष्ट्र है और ग्रीनलैंड उसकी स्वायत्त इकाई है, इसलिए किसी भी प्रकार के सैन्य विस्तार या नई तैनाती के लिए दोनों देशों की सहमति जरूरी होती है। डेनमार्क की सरकार ने भी इस बात की पुष्टि की है कि अमेरिका के साथ बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने किसी भी “सीक्रेट डील” या कब्जे जैसे दावों को स्पष्ट रूप से खारिज नहीं किया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा मामला भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है, न कि किसी तत्काल सैन्य कब्जे की योजना। अमेरिका का लक्ष्य नाटो सहयोगियों के साथ मिलकर आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना है, ताकि भविष्य की किसी भी सुरक्षा चुनौती का सामना किया जा सके।

    फिलहाल स्थिति यह है कि बातचीत जारी है और किसी भी अंतिम निर्णय की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में “बिना गोली चले कब्जा” जैसी बातें अधिकतर राजनीतिक और मीडिया व्याख्याओं का हिस्सा मानी जा रही हैं, जबकि वास्तविकता अभी कूटनीतिक स्तर पर ही सीमित है।

  • ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी… अमेरिका ने पिटुफिक स्पेस बेस पर भेजा मिलिट्री एयरक्राफ्ट

    ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी… अमेरिका ने पिटुफिक स्पेस बेस पर भेजा मिलिट्री एयरक्राफ्ट


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की ग्रीनलैंड पर (Occupation of Greenland) कब्जा करने की धमकियों के बीच अब अमेरिका ने एक ऐसा कदम उठाया जिससे तनाव और बढ़ गया है। अमेरिका ने हाल ही में ग्रीनलैंड के पिटुफिक स्पेस बेस (Pitufik Space Base) पर एक नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड (NORAD) विमान की तैनाती कर दी है। मिलिट्री एयरक्राफ्ट की तैनाती को लेकर अमेरिका का कहना है कि यह विमान अपने पुराने लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा। अमेरिका ने यह भी कहा कि यह कार्रवाई डेनमार्क और ग्रीनलैंड को बताकर की गई है।

    बता दें कि पिटुफिक स्पेस बेस एक अहम अमेरिकी मिलिट्री इंस्टॉलेशन और कम्युनिकेशन हब है। यहां एक मिसाइल वॉर्निंग सिस्टम भी है जो उत्तर अमेरिका की सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है। वहीं हाई आर्कटिक में इसकी लोकेशन को वजह से इस क्षेत्र में इसका अहम रणनीतिक महत्व है।

    अमेरिका से पहले डेनमार्क ने भी ग्रीनलैंड में अपनी मिलिट्री मौजूदगी बढ़ा दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार को कई डेनिश सैनिकों और मिलिट्री उपकरणों को ले जाने वाले कई विमान द्वीप पर उतारे गए हैं। डेनिश रक्षा बलों ने बताया है कि देश की सेना प्रमुख के साथ सैनिकों की एक बड़ी टुकड़ी को नुक और कांगेरलुसुआक में तैनात किया गया है। इससे पहले यहां डेनिश सुरक्षा बलों के नेतृत्व में एक मल्टीनेशनल मिलिट्री एक्सरसाइज भी हुआ था।

    ट्रंप ने लगाया 10 फीसदी टैरिफ
    इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स, नॉर्वे, स्वीडन और ब्रिटेन पर 10 फीसदी अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की घोषणा की थी। ट्रंप ने इन देशों द्वारा ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ नाम के एक सैन्य अभ्यास के तहत सैनिक तैनात करने के बाद यह कदम उठाया।

    नाटो देशों का कहना है कि यह तैनाती ग्रीनलैंड की स्वायत्तता के समर्थन के लिए की गई थी, खासकर उन रिपोर्टों के बाद, जिनमें दावा किया गया था कि ट्रंप प्रशासन संसाधन-समृद्ध इस आर्कटिक द्वीप को “राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों” से अपने अधीन करना चाहता है। इसके जवाब में ट्रंप ने कहा कि यह आयात शुल्क एक फरवरी से लागू होगा और एक जून से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह शुल्क तब तक लागू रहेगा जब तक ग्रीनलैंड की पूर्ण और सम्पूर्ण खरीद को लेकर कोई समझौता नहीं हो जाता।

    यूरोपीय नेताओं ने प्रस्तावित आयात शुल्क की कड़ी निंदा की है और चेतावनी दी कि इस तरह के कदम अटलांटिक पार संबंधों को कमजोर कर सकते हैं और एक खतरनाक गिरावट के चक्र को जन्म दे सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि डेनमार्क के नेतृत्व वाला सैन्य अभ्यास आवश्यक सुरक्षा जरूरतों के जवाब में है और इससे किसी को कोई खतरा नहीं है।

  • ट्रंप से पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपति कर चुके हैं ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश…

    ट्रंप से पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपति कर चुके हैं ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश…

    वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो (Venezuelan President Maduro) को उनके किले से उठाकर न्यूयॉर्क की अदालत में पेश करवाने वाले ट्रंप का अगला सपना ग्रीनलैंड को अमेरिकी आधिपत्य में लाने का है। यूरोप समेत पूरी दुनिया इसका विरोध कर रही है, लेकिन ट्रंप अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। उनका तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र और अमेरिकी धरती की रक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जा होना बहुत जरूरी है। इस कब्जे के लिए वह साम, दाम, दंड भेद सभी प्रकार की नीति अपनाने के लिए भी तैयार हैं। लेकिन इतिहास उठाने पर पता चलता है कि ग्रीनलैंड का ख्वाब सजाने वाले ट्रंप पहले अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं। इसके पहले भी कई राष्ट्रपतियों का मन इसको लेकर ललचा चुका है। हालांकि, किसी को भी यह हासिल नहीं हुआ।

    ग्रीन लैंड की जमीन का आधुनिक अमेरिका द्वारा दिखाया गया लालच का पहला उदाहरण वर्ष 1867 में सामने आता है। यह वह समय था, जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने रूस से अलास्का को खरीदा था। ऐसे में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम एच. सिवार्ड ने डेनमार्क को भी लगे हाथ आइसलैंड और ग्रीनलैंड खरीदने का ऑफर दे डाला। अलास्का डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तत्कालीन अमेरिकी ट्रेजरी सचिव रॉबर्ट जे वॉकर ने कहा था कि ग्रीनलैंड अगर अमेरिका के हिस्से में आ जाता है, तो यह बहुत ही ज्यादा फायदेमंद होगा। इससे अमेरिका व्यापारिक दुनिया पर नियंत्रण हासिल कर पाएगा। हालांकि, इस समय पर भी डेनमार्क और ग्रीनलैंड को लोगों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और यह आगे नहीं बढ़ पाया।


    1946 में 100 मिलियन डॉलर का दिया था ऑफर

    लगभग 9 दशक तक अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करने का सपना मन में दबाए रखा। इस बीच पहला विश्व युद्ध भी समाप्त हो गया। अब बारी आई दूसरे विश्वयुद्ध की। इसमें नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर हमला बोल दिया। ग्रीनलैंड की रक्षा करने की जिम्मेदारी अमेरिका के कंधों पर आ गई। इसी दौर में अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य उपस्थिति को बढ़ाया और इस आर्कटिक द्वीप की रक्षा की। इसके बाद युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन अमेरिका का ग्रीनलैंड प्यार एक बार फिर से जाग गया। वर्ष1946 में जब इस द्वीप को खाली करने की बारी आई, तो अमेरिका ने अपने पैसे की ताकत को दिखाना चाहा। दूसरे विश्वयुद्ध में बर्बाद हो चुके डेनमार्क के लिए 100 मिलियन डॉलर की राशि एक बड़ी बात थी, हालांकि इसके बाद भी डेनमार्क ने इस पेशकश को ठुकरा दिया और अमेरिका को मायूस होकर यहां से हटना पड़ा।


    सैन्य बेस बनाने में कामयाब रहा अमेरिका

    इसके बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड अमेरिका की छत्र छाया में नाटो के तहत शामिल हो गए। अमेरिका को अपनी मनचाही मुराद भी मिल गई। कोल्ड वॉर के समय से ही अमेरिका ने रूस को काउंटर करने के लिए ग्रीनलैंड का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। डेनमार्क ने भले ही ग्रीनलैंड अमेरिका को देने से इनकार कर दिया हो, लेकिन नाटो में शामिल होने के नाते वह अमेरिकी सेना को इसके इस्तेमाल से नहीं रोक सकती थी। ऐसे में अमेरिका ने यहां पर 1943 से संचालित पिटफिक स्पेस बेस को और भी ज्यादा मजबूत कर लिया और यहां पर अपनी सैन्य उपस्तिथि को बढ़ा दिया।

    तमाम कोशिशों के बाद भी अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदने में नाकामयाब रहा। हाालंकि, सैन्य बेस स्थापित करने से उसके मनसूबे कुछ हद तक कामयाब होते हुए भी नजर आए। इसके बाद आई 21वीं सदी। अमेरिका के राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप, अपने पहले कार्यकाल के आखिर में ट्रंप ने खुले तौर पर ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश की। उनकी यह पेशकश, अमेरिकी सुरक्षा से ज्यादा ग्रीनलैंड की जमीन के नीचे दबी अपार खनिज संपदा को लेकर थी। हालांकि, उस समय पर भी डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने ही इस प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया कि उनका यह क्षेत्र बिकाऊ नहीं है।

    इसके बाद ट्रंप को सत्ता से जाना पड़ा और बात आई-गई हो गई। लेकिन 2025 में ट्रंप एक बार फिर से सत्ता में लौटे। इस बार ज्यादा आक्रामक होकर। आते ही उन्होंने ऐलान कर दिया कि अब ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनना ही होगा। 2025 में अमेरिकी कांग्रेस के एक संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा, “मुझे लगता है कि हम इसे (ग्रीनलैंड) को किसी तरह हासिल कर ही लेंगे। किसी न किसी तरह हम इसे जरूर हासिल करेंगे।”

    अमेरिका पैसे की दम पर पिछली दो सदी से ग्रीनलैंड को अपना हिस्सा बनाने की बात कर रहा है। लेकिन हर बार डेनमार्क और ग्रीनलैंड इससे इनकार कर देते हैं। इसबार भी ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड को खरीदना आसान नहीं होगा। हालांकि, ट्रंप इस मामले में थोड़ा अलग रुख भी अपना रहे हैं, अभी तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए सैन्य अभियान चलाने की बात नहीं कही है, लेकिन ट्रंप ने यह विकल्प भी खुला रखा है।

    आपको बता दें, ग्रीनलैंड की सरकार और डेनमार्क को दरकिनार करते हुएस अमेरिका ने सीधे ग्रीनलैंड की जनता को ही पैसा देने की पेशकश की थी,हालांकि उन्होंने भी इससे इनकार कर दिया। रॉयटर्स के मुताबिक ग्रीनलैंड के लोगों ने इस बात को अपमानजनक माना और पूरी तरह से खारिज कर दिया।

    राष्ट्रपति ट्रंप भले ही ग्रीनलैंड को जीतने के लिए कुछ भी कर जाने के तैयार दिख रहे हों, लेकिन ग्रीनलैंड की जनता और यूरोपीय देश इस पर राजी नहीं दिखते। ट्रंप के ग्रीनलैंड प्रस्ताव के विरोध में यूरोपीय देश खड़े हुए हैं। प्रतीकात्मक रूप से ही सही लेकिन जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी सेना को ग्रीनलैंड में भेजा है। इससे नाराज ट्रंप ने इन देशों के ऊपर 10 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ का ऐलान किया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा कि अगर यह देश नहीं मानते तो जून से यह टैरिफ 25 फीसदी हो जाएगा।

  • ट्रंप की धमकी पर ग्रीनलैंड के सियासी दलों की दो-टूक, बोले- कोई दूसरा तय नहीं करेगा हमारे देश का भविष्य

    ट्रंप की धमकी पर ग्रीनलैंड के सियासी दलों की दो-टूक, बोले- कोई दूसरा तय नहीं करेगा हमारे देश का भविष्य


    नूक (ग्रीनलैंड)।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने जब से ग्रीनलैंड (Greenland) पर कब्जे की बात कही है, खलबली मची हुई है। अब ग्रीनलैंड की संसद (Greenland Parliament) के तमाम नेताओं ने संयुक्त वक्तव्य जारी किया है। इसमें ग्रीनलैंड के नेताओं ने कहा है कि उनके देश का भविष्य कोई दूसरा नहीं तय करेगा, बल्कि खुद यहां के लोग करेंगे। इंसारत्तूस में प्रतिनिधित्व करने वाली सभी पांच पार्टियों के नेताओं द्वारा साइन किए गए एक बयान में, अमेरिका या डेनमार्क के नियंत्रण के किसी भी सुझाव को अस्वीकार कर दिया। इस बयान में कहा गया है कि हम अमेरिकन नहीं बनना चाहते हैं। हमें डैनिश नहीं होना चाहते। हम सिर्फ ग्रीनलैंड वाले बनकर रहना चाहते हैं।

    गौरतलब है कि तीन जनवरी को की गई कार्रवाई में वेनेजुएला के नेतृत्व को सफलतापूर्वक उखाड़ फेंकने के बाद, अमेरिका सरकार का हौसला बढ़ गया है। अब वह सीधे ग्रीनलैंड को अपने कब्जे में लेने की बात कर रही है। विभिन्न यूरोपीय नेताओं ने अपनी चिंता व्यक्त की है, लेकिन वे एक कथित सहयोगी द्वारा किए गए विश्वासघात पर कोई सुसंगत प्रतिक्रिया देने में सक्षम नहीं हो पाए हैं।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका को रूस और चीन को ग्रीनलैंड पर कब्जा करने से रोकने के लिए उस पर अपना नियंत्रण करना चाहिए। ट्रंप ने व्हाइट हाउस में तेल इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि अगर हम ग्रीनलैंड नहीं लेते हैं, तो रूस या चीन आपके पड़ोसी बन जाएंगे। ऐसा नहीं होने वाला है। मैं आसानी से डील करना चाहता हूं। लेकिन अगर हम इसे आसानी से नहीं करते हैं, तो हम इसे मुश्किल तरीके से करेंगे। उन्होंने डेनमार्क के एक स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड पर डेनमार्क की संप्रभुता पर सवाल उठाया और इस विशाल, संसाधन से भरपूर द्वीप पर ऐतिहासिक दावों को खारिज कर दिया।

    ट्रंप ने कहा कि मैं डेनमार्क का प्रशंसक हूं, लेकिन, आप जानते हैं, सिर्फ इसलिए कि 500 साल पहले उनका एक जहाज वहां उतरा था, इसका मतलब यह नहीं है कि वे उस जमीन के मालिक हैं। यह टिप्पणियां अमेरिका और कई नाटो सहयोगियों के बीच बढ़ते तनाव के बीच आई हैं। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने ऐसे किसी भी कदम को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने चेतावनी दी है कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी हमला नाटो और दूसरे विश्व युद्ध के बाद की सुरक्षा व्यवस्था का अंत होगा।