Tag: groundwater level
-

गर्मी से पहले इंदौर में पानी का संकट, 85 हजार परिवारों के बाद अब 22 जोन में चिंता, टैंकरों के लिए 71 नए हाइड्रेंट चिह्नित
इंदौर । इंदौर में गर्मी शुरू होने से पहले ही पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। इस बार सामान्य से कम बारिश होने और कई ट्यूबवेल बंद होने के कारण आने वाले महीनों में जलापूर्ति बनाए रखना नगर निगम के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। नगर निगम की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार शहर में कुल 6040 ट्यूबवेल हैं जिनमें से 361 फिलहाल बंद पड़े हैं। शहर के 22 जोन में पानी की समस्या सामने आई है। कई इलाकों में लोग अभी से टैंकरों के जरिए पानी की व्यवस्था करने को मजबूर हो रहे हैं। स्थिति को देखते हुए नगर निगम ने नए जलस्रोत विकसित करने की तैयारी शुरू कर दी है।शहर की जरूरतों को पूरा करने के लिए करीब 200 नए ट्यूबवेल खोदने की आवश्यकता बताई गई है। इनमें से 100 ट्यूबवेल के लिए टेंडर आमंत्रित किए गए हैं। इसके साथ ही बंद पड़े ट्यूबवेल को दोबारा चालू करने के लिए भी कदम उठाए जा रहे हैं। निगम की योजना के तहत पंपों की मरम्मत और तकनीकी खराबियों को दूर करने के लिए 10 विशेष टीमें लगाने की तैयारी है। इससे उन क्षेत्रों में राहत मिल सकती है जहां नर्मदा जल का कनेक्शन नहीं है और स्थानीय जलस्रोतों पर निर्भरता अधिक है।जलसंकट की चिंता बढ़ने की एक बड़ी वजह इस साल कम बारिश होना है। इंदौर में सामान्य तौर पर करीब 37 इंच बारिश दर्ज की जाती है लेकिन इस बार लगभग 23 इंच बारिश ही हुई है। इस तरह सामान्य के मुकाबले करीब 14 इंच कम पानी बरसा है। कम बारिश का असर भूजल स्तर पर पड़ सकता है। ऐसे में नए ट्यूबवेल खोदने से पहले संबंधित क्षेत्रों में भूजल की उपलब्धता का तकनीकी सर्वे करना जरूरी होगा। यदि किसी इलाके में भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है तो वहां बोरिंग कराने के बाद भी पर्याप्त पानी मिलने की गारंटी नहीं होगी। इसलिए नए जलस्रोत विकसित करने के साथ वर्षाजल संचयन और भूजल पुनर्भरण पर भी ध्यान देना होगा।नगर निगम की रिपोर्ट के मुताबिक शहर में कुल 105 जलप्रदाय टंकियां हैं। इनमें से 95 टंकियों के जरिए रोजाना जलापूर्ति की जा रही है। बाकी 10 टंकियों से नियमित पानी की सप्लाई नहीं होने के कारणों को स्पष्ट करने और प्रभावित क्षेत्रों की जरूरतों का आकलन करने की आवश्यकता है। यदि इन क्षेत्रों में वैकल्पिक व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो गर्मी के दौरान लोगों की परेशानी बढ़ सकती है। पानी की आपूर्ति सुचारु रखने के लिए निगम ने टैंकर व्यवस्था को भी मजबूत करने की योजना बनाई है। इसके तहत 71 नए हाइड्रेंट स्थान चिह्नित किए गए हैं। इसके अलावा 12 मौजूदा समप और हाइड्रेंट स्थानों को आपातकालीन जल भराव केंद्र के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी है। जरूरत के अनुसार नए समप विकसित करने और उन्हें ट्यूबवेल या पाइपलाइन से जोड़ने की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं।एमआईसी सदस्य बबलू शर्मा के मुताबिक नगर निगम गर्मी के दौरान संभावित जलसंकट से बचने के लिए योजना बना रहा है। नए ट्यूबवेल खोदने और मौजूदा जलस्रोतों को दुरुस्त करने पर काम किया जाएगा ताकि लोगों को पानी की परेशानी का सामना न करना पड़े। हालांकि कम बारिश और गिरते भूजल स्तर के बीच केवल नए ट्यूबवेल खोदना ही पर्याप्त नहीं होगा। समय पर मरम्मत और जलापूर्ति की निगरानी के साथ पानी का संरक्षण भी जरूरी रहेगा। आने वाले महीनों में नगर निगम की तैयारियों और जलस्रोतों की स्थिति से तय होगा कि शहर के प्रभावित इलाकों में पानी की उपलब्धता कितनी बेहतर हो पाती है। -

फागुन में सिमटती गंगा से बढ़ी चिंता, बिहार में भीषण गर्मी और जल संकट के संकेत
नई दिल्ली ।बिहार में इस बार गर्मी ने समय से पहले ही अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। फागुन के महीने में ही गंगा का जलस्तर घटने लगा है जिससे आने वाले महीनों में भीषण गर्मी और संभावित जल संकट की आशंका गहरा गई है। आमतौर पर वैशाख और जेठ में गंगा की धारा सिमटती है लेकिन इस वर्ष फरवरी में ही शहरी इलाकों से नदी काफी दूर चली गई है। यह बदलाव सामान्य मौसमी चक्र से अलग माना जा रहा है और विशेषज्ञ इसे गंभीर संकेत के रूप में देख रहे हैं।भागलपुर के बरारी स्थित इंटकवेल की स्थिति हालात की गवाही दे रही है। वर्ष 2025 की फरवरी में जिस स्थान से गंगा की धारा से पानी मिल रहा था इस बार वहां से करीब 100 फीट आगे तक अतिरिक्त पाइप लगाकर पानी लेना पड़ रहा है। यानी नदी की धारा पीछे हट चुकी है। इंटकवेल प्रबंधन ने आगे और जलस्तर गिरने की आशंका को देखते हुए अतिरिक्त पाइप मंगाने की तैयारी शुरू कर दी है ताकि शहर की पेयजल आपूर्ति बाधित न हो।
गर्मी के प्रारंभिक संकेत केवल नदी तक सीमित नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशियों को सामान्य से अधिक प्यास लगना और भूख कम होना भी तापमान में संभावित वृद्धि का संकेत माना जा रहा है। यदि मार्च और अप्रैल में वर्षा सामान्य से कम रही तो हालात और बिगड़ सकते हैं। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज कर दी गई हैं।
संभावित पानी संकट को लेकर लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग पीएचईडी विशेष सतर्कता बरत रहा है। विभागीय अभियंताओं से सभी क्षेत्रों के ग्राउंड वाटर लेवल की रिपोर्ट मांगी गई है। कार्यपालक अभियंता दिलीप कुमार ने जूनियर इंजीनियरों को साप्ताहिक अवलोकन के निर्देश दिए हैं ताकि भूजल स्तर में गिरावट की नियमित निगरानी की जा सके और जरूरत पड़ने पर सरकार से समय रहते मदद ली जा सके।
इधर केंद्रीय भूमि जल बोर्ड सीजीडब्ल्यूबी की प्री मानसून बुलेटिन ने भी चिंता बढ़ा दी है। विभागीय सूत्रों के अनुसार जनवरी फरवरी में की गई ग्राउंड सुपरविजन के दौरान भागलपुर समेत गंगा किनारे बसे शहरों और गांवों में भूजल स्तर गिरने की पुष्टि हुई है। सीजीडब्ल्यूबी ने सभी प्रखंडों का जलस्तर रिकॉर्ड किया है और विस्तृत रिपोर्ट मई जून में प्रकाशित की जाएगी। प्रारंभिक संकेत बताते हैं कि भूजल भंडार पर दबाव बढ़ रहा है।
गंगा से सटे जिलों के आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। बक्सर में भूजल स्तर 56138.3 से घटकर 30318.55 हेक्टेयर मीटर हो गया है। पटना में यह 98219.10 से घटकर 37595.63 लखीसराय में 37503.18 से 26462.36 और बेगूसराय में 50675.69 से घटकर 15692.38 हेक्टेयर मीटर रह गया है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि जल संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते वर्षा जल संचयन भूजल पुनर्भरण और जल संरक्षण के ठोस उपाय नहीं किए गए तो आने वाले महीनों में पेयजल संकट गहरा सकता है। फिलहाल प्रशासन सतर्क है लेकिन फागुन में ही सिमटती गंगा यह संकेत दे रही है कि इस बार की गर्मी सामान्य नहीं रहने वाली।