Tag: guru

  • Astro Tips: इस सुगंधित वस्तु से मजबूत होते हैं चंद्र शुक्र गुरु

    Astro Tips: इस सुगंधित वस्तु से मजबूत होते हैं चंद्र शुक्र गुरु


    उज्‍जैन। चंदन सुगंध तो फैलाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही चंदन एक शक्तिशाली वस्तु है जो आपकी कुंडली के तीन ग्रह को एक साथ मजबूत कर कई परेशानियों से उबार सकता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, चंदन जीवन में खुशियां लाने का कारक बन सकता है. इससे जुड़े उपाय धन से लेकर पारिवारिक समस्याओं का भी अंत कर सकता है. इसके साथ ही एक चंद्रमा, गुरु बृहस्पति और शुक्र ग्रह के दोष को कुंडली से दूर कर इन्हें मजबूत कर सकता है. आइए जानते हैं चंदन के प्रभावशाली उपाय क्या हैं, साथ ही ये भी जानेंगे कि चंदन का चंद्रमा, गुरु बृहस्पति और शुक्र ग्रह से क्या संबंध है.

    चंदन और गुरु बृहस्पति ग्रह-
    ज्योतिष शास्त्र में चंदन और गुरु बृहस्पति ग्रह का बहुत गहरा संबंध बताया गया है. गुरु ग्रह भाग्य और ज्ञान के का कारक है. कुंडली में गुरु मजबूत होने का अर्थ है कि भाग्य तेज है और भाग्य तेज होने पर हर ओर से व्यक्ति सफलता प्राप्त करता है. ऐसे व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं. गुरुवार के दिन माथे पर सफेद या पीले चंदन का तिलक नियमित रूप से लगाएं तो इसके लाभ दिखने लगेंगे. मन शांत रहेगा.

    चंदन और शुक्र ग्रह-
    ज्योतिष शास्त्र में सफेद चंदन को शुक्र ग्रह से जोड़ा जाता है. शुक्र ग्रह के मजबूत होने पर जातक को सुख-समृद्धि, प्रेम और सौदर्य प्राप्त होता है. ऐसे में शुक्रवार को नियमित रूप से सफेद चंदन का तिलक लगाएं, चंदन का सुगंध लगाएं और स्नान के पानी में चंदन मिलाएं तो शुक्र मजबूत होगा. जिससे धन और परिवार संबंधी दिक्कतें दूर होने लगेंगी.

    चंदन और चंद्रमा-
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंदन का गहरा संबंध चंद्रमा से भी माना गया है. चंदन और चंद्रमा दोनों ही मानसिक शांति और शीतलता के कारक हैं. मन के कारक चंद्रमा के मजबूत रहने पर जातक भावनात्मक रूप से स्थिर रहता है और धन संबंधी सही निर्णय लेता है. ऐसे में चंद्रमा को मजबूत करने के लिए अगर हर दिन घर से निकलने से पहले ललाट और गले पर सफेद चंदन का तिलक लगाएं तो चंद्रमा को मजबूत किया जा सकता है.

    घर के सुख और समृद्धि के लिए उपाय
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, घर के सुख और समृद्धि के लिए पुष्य नक्षत्र में पड़ने वाले गुरुवार के दिन चंदन के पेड़ की जड़ में सिंदूर, पीले चावल चढ़ाएं और जल अर्पित करें. धूप-दीप दिखाएं और फिर दूसरे दिन उसी चंदन के पेड़ की थोड़ी सी लकड़ी लाल कपड़े में बांधें व घर के मुख्य द्वार पर टांगें. घर में सकारात्मक ऊर्जा, खुशियां व समृद्धि आएगी.

    आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए उपाय
    लाल कपड़े में चंदन की लकड़ी बांधे और इसे मां लक्ष्मी को चढ़ाएं. अब माता लक्ष्मी और चंदन की पूजा करें व कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें. अब इस चंदन को धन वाली जगह पर रखें. आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगेगी और धन-धान्य की कभी कमी नहीं होगी.

    वैवाहिक जीवन में सुख लाने के लिए उपाय
    वैवाहिक जीवन में सुख बढ़े इसके लिए शुभ तिथि या मुहूर्त में चंदन की जड़ को गंगाजल से शुद्ध करें और इसे फिटकरी के साथ छोटी सी पोटली बनाकर कमर में बांधें. सुख और पति पत्नी के बीच का प्रेम बढ़ेगा.

    नजर दोष दूर करने के उपाय
    बच्चे के ऊपर से नजर दोष हटाने के लिए उसे चंदन की छाल का धुआं दिखाए. बुरी शक्तियां दूर होंगी और मन शांत होगा. हर दिन बच्चे को चंदन का तिलक लगाएं.

    वास्तु दोष दूर करने का उपाय
    घर का वास्तु दोष दूर करना है तो चंदन का चूरा, अश्वगंधा और गोखरू चूर्ण लें और इसमें कपूर मिला लें और इसी चूर्ण से नियमिक 40 दिन तक हवन करें. लाभ दिखेगा. इसके अलावा घर के पश्चिम या दक्षिण दिशा में एक चंदन का पेड़ लगाने से भी घर का वास्तु ठीक हो जाएगा.

  • अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम

    अघोरी बाबा बनने की कठिन साधना: 12 साल की तपस्या और 5 कठिन नियम


    नई दिल्ली । अघोरी बाबा हिंदू धर्म के सबसे रहस्यमयी और कठिन आध्यात्मिक पंथों में से एक माने जाते हैं। भगवान शिव के भैरव रूप के उपासक अघोरी अपनी कठोर साधना भूत-प्रेत से संबंधित क्रियाओं और सनातन मार्ग से अलग हटकर जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध हैं। अघोर शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है जो घोर न हो यानी एक ऐसा व्यक्ति जो संसार की जटिलताओं से ऊपर उठकर अत्यधिक सरल और सहज जीवन जीता हो। हालांकि इस सहजता तक पहुंचने का मार्ग अत्यंत कठिन है और इसके लिए एक कठोर साधना की आवश्यकता होती है।

    अघोरी बनने के लिए 12 वर्षों की कठिन तपस्या

    अघोरी बनने के लिए सबसे पहली शर्त है 12 वर्षों की तपस्या। यह तपस्या किसी साधारण साधना से कहीं अधिक कठोर होती है। अघोरी बनने के इच्छुक व्यक्ति को पहले अपने गुरु के पास जाकर उनका दीक्षा ग्रहण करना होता है। इस दौरान गुरु के मार्गदर्शन में शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर कठिन साधनाएं की जाती हैं। अघोरी बनने के इस रास्ते में व्यक्ति को अपने शरीर और आत्मा को नियंत्रित करने की अत्यधिक कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। गुरु की उपस्थिति में 12 साल की साधना के दौरान, अघोरी ने अपनी चेतना को शुद्ध करने के लिए व्रत, उपवास और अन्य कठिन तपों का पालन करना होता है। यह तपस्या आत्मा को शुद्ध करने और शिव भक्ति में गहरे उतरने के लिए की जाती है।

    सांसारिक मृत्यु और नया जन्म

    अघोरी बनने से पूर्व व्यक्ति को एक मानसिक और शारीरिक मृत्यु का अनुभव करना होता है। इसका अर्थ है कि वह अपने परिवार और समाज के लिए पूरी तरह से मृत हो चुका है और उसे एक नए जन्म की आवश्यकता होती है। यह मृत्यु एक प्रकार का ‘पिंडदान’ होती है जिसमें व्यक्ति अपने पुराने अहंकार और सांसारिक आकर्षण को छोड़कर केवल शिव भक्ति की ओर अग्रसर होता है। अघोरी बनने के बाद उनका जीवन पूरी तरह से गुरु और शिव की सेवा में समर्पित हो जाता है। उनके द्वारा किए गए कार्यों और साधनाओं में कोई भी परंपरागत या सामाजिक बंधन नहीं होते। वे अपने मार्ग में जाने वाले हर कार्य को भैरव रूप में स्वीकार करते हैं।

    अघोरी जीवन के 5 कठिन नियम

    शरीर की तपस्या: अघोरी के लिए शरीर केवल एक माध्यम होता है, और इसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाता है। शरीर को संयमित और तपस्वी जीवन जीने के लिए तैयार किया जाता है। सांसारिक मोह-माया से दूर रहना: अघोरी के लिए यह आवश्यक है कि वह सांसारिक सुख-साधनों से दूर रहे। उन्हें अपनी इच्छाओं और भौतिक सुखों से कोई आकर्षण नहीं होता। मृत्यु और जीवन के बीच की सीमा को समझना: अघोरी प्राचीन परंपराओं के अनुसार मृत्यु को एक प्राकृतिक प्रक्रिया मानते हैं और वे उसे शिव के रूप में स्वीकार करते हैं। इसके कारण वे शवों के पास बैठकर साधना करते हैं और शमशान भूमि को भी अपने साधना स्थल के रूप में चुनते हैं।

    नकारात्मक ऊर्जा से संवाद अघोरी अक्सर भूत-प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से संवाद करते हैं। इसका उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और सच्चे शिव दर्शन को प्राप्त करना होता है। निर्विकल्प समर्पण: अघोरी बाबा के लिए समर्पण सबसे बड़ा साधना है। उन्हें अपने जीवन में कोई दुराव या स्वार्थ नहीं होता वे पूर्ण रूप से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। घोरी बनने की साधना को आम तौर पर एक अत्यंत कठिन और जोखिमपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है, लेकिन इसके जरिए व्यक्ति अपनी आत्मा की शुद्धि और शिव के निकटता प्राप्त करने का प्रयास करता है। यह एक ऐसा मार्ग है जिसमें शरीर, मन, और आत्मा की पूरी तपस्या और बलिदान शामिल होता है।