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  • ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी प्रदर्शन पर नितिन नवीन का हमला, बोले- अर्बन नक्सल सोच वाले देश की शांति और स्थिरता बिगाड़ना चाहते हैं

    ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी प्रदर्शन पर नितिन नवीन का हमला, बोले- अर्बन नक्सल सोच वाले देश की शांति और स्थिरता बिगाड़ना चाहते हैं

    नई दिल्ली । मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के प्रदर्शन को लेकर भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने विपक्षी नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के कुछ नेता देश में अशांति और अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। नितिन नवीन ने राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और विपक्षी गठबंधन को निशाने पर लेते हुए कहा कि ‘अर्बन नक्सल’ सोच रखने वाले लोगों के इरादे सफल नहीं होंगे। उन्होंने इस पूरे मामले को देश की शांति, स्थिरता और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़ते हुए विपक्ष की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठाए।

    नितिन नवीन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों के दौरान देश को भय के माहौल से बाहर निकालने और आतंकवाद तथा नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई करने के प्रयास किए गए हैं। उनके मुताबिक, इन प्रयासों के बावजूद कुछ लोग देश में अशांति और अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने विपक्षी नेताओं के बयानों और उनकी भाषा पर भी सवाल उठाए। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि राहुल गांधी सहित अन्य विपक्षी नेताओं की भाषा पर देश के युवा नजर रख रहे हैं। उन्होंने राजनीतिक दलों से लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा जताई।

    भाजपा अध्यक्ष ने देश के 140 करोड़ नागरिकों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोग शांति और स्थिरता चाहते हैं। उन्होंने दावा किया कि भारत के युवा अपनी संस्कृति, लोकतंत्र और संविधान से जुड़े हुए हैं। नितिन नवीन के अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों को अपने विचार रखने का अधिकार है, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं और महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के प्रति जिम्मेदारी भी जरूरी है। उन्होंने विपक्ष पर इन संस्थाओं और पदों के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली गतिविधियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    नितिन नवीन ने विपक्ष पर विदेशी ताकतों के साथ मिलकर भारत को अस्थिर करने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि देश की शांति और स्थिरता को नुकसान पहुंचाने के प्रयासों से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। हालांकि, इस आरोप के समर्थन में दिए गए विवरण का उल्लेख उपलब्ध जानकारी में नहीं है। उनका बयान ऐसे समय आया है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष विरोध कर रहा है। इस राजनीतिक विवाद में भाजपा अध्यक्ष ने विपक्ष के प्रदर्शन और उसके रुख को देश की स्थिरता से जोड़कर सवाल उठाए हैं।

    विपक्ष की ओर से चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे उठाए जा रहे हैं। वहीं, भाजपा ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर विपक्ष पर निशाना साधा है। नितिन नवीन ने राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और विपक्षी गठबंधन का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में शांति और स्थिरता बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है। उन्होंने विपक्षी नेताओं की भाषा और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति उनके रवैये पर सवाल उठाए। इस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े विवाद ने भाजपा और विपक्ष के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को और तेज कर दिया है।

  • दिल्ली पहुंचते ही कॉकरोच जनता पार्टी के तीन नेता हिरासत में, अभिजीत दीपके बोले- मैं गिरफ्तारी देने ही आया हूं

    दिल्ली पहुंचते ही कॉकरोच जनता पार्टी के तीन नेता हिरासत में, अभिजीत दीपके बोले- मैं गिरफ्तारी देने ही आया हूं

    नई दिल्ली । कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके और पार्टी के दो अन्य नेताओं आशुतोष रांका तथा सौरभ दास को दिल्ली पहुंचते ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया। तीनों नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के इरादे से मुंबई से दिल्ली पहुंचे थे। जानकारी के मुताबिक, पुलिस ने उन्हें हवाई अड्डे पर विमान के अंदर से ही हिरासत में ले लिया। इस कार्रवाई के कारण तीनों नेता हवाई अड्डे से बाहर निकलकर प्रदर्शन स्थल तक भी नहीं पहुंच सके।

    हिरासत में लिए जाने के दौरान अभिजीत दीपके का बयान सामने आया। उन्होंने कहा, “मैं अरेस्ट होने के लिए ही आया हूं। कर लो अरेस्ट।” दीपके ने विमान के अंदर से एक वीडियो संदेश जारी कर पुलिस की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस उनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार कर रही है। उन्होंने कहा, “आ जाओ, कर लो अरेस्ट। यह अराजकता है। ऐसा तो इंदिरा गांधी के समय में भी नहीं हुआ। मैं डरने वाला नहीं हूं।” उनके इस बयान के बाद हिरासत की कार्रवाई को लेकर मामला चर्चा में आ गया।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, तीनों नेताओं को हिरासत में लेने के लिए दिल्ली पुलिस की महिला पुलिसकर्मियों को विमान के अंदर भेजा गया था। उनकी मौजूदगी में पुलिस ने अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास को हिरासत में लिया। इसके बाद तीनों को एक वैन में बैठाकर वहां से ले जाया गया। हालांकि, उन्हें हिरासत में लेने के बाद पुलिस किस स्थान पर लेकर गई, इसकी जानकारी स्पष्ट नहीं हो सकी। उनकी हिरासत के स्थान और आगे की कार्रवाई को लेकर भी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई।

    कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने नेताओं को हिरासत में लिए जाने पर विरोध जताया। पार्टी ने इस कार्रवाई से जुड़ा एक वीडियो साझा कर तीनों नेताओं को हिरासत में लिए जाने की जानकारी दी और पुलिस के कदम को शर्मनाक बताया। पार्टी ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाए। सीजेपी के नेता मुंबई से दिल्ली मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने पहुंचे थे, लेकिन पुलिस की कार्रवाई के कारण वे जंतर-मंतर तक नहीं पहुंच पाए। हिरासत को लेकर पार्टी की ओर से विरोध दर्ज कराया गया।

    इस मामले पर आम आदमी पार्टी ने भी केंद्र सरकार की आलोचना की। पार्टी ने आरोप लगाया कि शनिवार को जंतर-मंतर पर सीजेपी के प्रदर्शन में शामिल होने आ रहे कई लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया। इसके बाद आम आदमी पार्टी ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए देश में ‘काला आपातकाल’ लागू होने का आरोप लगाया। पार्टी ने पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने पर सवाल उठाए।

    आम आदमी पार्टी के विधायक गोपाल राय ने आरोप लगाया कि सरकार ने केवल एक व्यक्ति की सुरक्षा के लिए मेट्रो स्टेशन बंद किए और ट्रेनें रद्द कीं। उन्होंने इन कदमों को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में संबंधित मेट्रो स्टेशनों के नाम, ट्रेनों की संख्या और बंद रहने की अवधि का विवरण नहीं दिया गया है। इस तरह सीजेपी नेताओं की हिरासत का मामला राजनीतिक बयानबाजी के बीच सामने आया है। एक ओर अभिजीत दीपके ने पुलिस की कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई, वहीं सीजेपी ने अपने नेताओं की हिरासत का विरोध किया और आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाए।

  • दिल्ली में CJP के जंतर-मंतर प्रदर्शन पर विवाद, मौलाना ने लाउडस्पीकर से मुस्लिम समुदाय से शामिल नहीं होने की अपील की

    दिल्ली में CJP के जंतर-मंतर प्रदर्शन पर विवाद, मौलाना ने लाउडस्पीकर से मुस्लिम समुदाय से शामिल नहीं होने की अपील की


    नई दिल्ली ।दिल्ली में 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन को लेकर विवाद सामने आया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) को रद्द करने की मांग को लेकर पार्टी ने प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने इस कार्यक्रम की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। पुलिस की ओर से प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। इसी बीच दिल्ली के हर्ष विहार स्थित एक मस्जिद से मौलाना ने लाउडस्पीकर के माध्यम से लोगों से प्रदर्शन में शामिल नहीं होने की अपील की है।

    मौलाना ने अपने ऐलान में कहा कि जंतर-मंतर पर होने वाला CJP का प्रदर्शन अवैध है और मुस्लिम समुदाय के लोगों को इसमें शामिल नहीं होना चाहिए। उन्होंने लोगों से प्रशासन का सहयोग करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। मौलाना ने कहा कि सरकार ने जंतर-मंतर पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू की है। ऐसे में लोगों को वहां जाने से बचना चाहिए और प्रशासन के निर्देशों का पालन करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति प्रदर्शन में शामिल होने जाता है और उसके साथ कोई दुर्घटना होती है, तो उसकी जिम्मेदारी सरकार की नहीं होगी। उन्होंने लोगों से इस चेतावनी को गंभीरता से लेने और प्रस्तावित कार्यक्रम से दूर रहने की अपील दोहराई।

    दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं देने के पीछे निर्धारित प्रक्रिया और सूचना देने से जुड़े नियमों का हवाला दिया है। दिल्ली पुलिस की संयुक्त आयुक्त नूपुर प्रसाद ने बताया कि CJP की ओर से सौरव दास के नाम से 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने के संबंध में आवेदन प्राप्त हुआ था। इस प्रदर्शन का उद्देश्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही की मांग करना बताया गया था। पुलिस ने आवेदन पर विचार करने के बाद पाया कि कार्यक्रम की सूचना बहुत कम समय पहले दी गई थी। निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार, प्रस्तावित प्रदर्शन से कम से कम 10 दिन पहले सूचना प्राप्त होनी चाहिए थी। पुलिस के अनुसार, इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जिसके कारण प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई।

    पुलिस ने पार्टी और प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने की योजना बना रहे लोगों को चेतावनी दी है कि नियमों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे में प्रदर्शन की अनुमति नहीं मिलने के बाद कार्यक्रम को लेकर स्थिति स्पष्ट हो गई है कि पुलिस ने इसे आयोजित करने की मंजूरी नहीं दी है। वहीं, मौलाना की अपील भी इसी घटनाक्रम के बीच सामने आई है, जिसमें उन्होंने लोगों से प्रशासन के निर्देशों का पालन करने और किसी भी तरह की परेशानी से बचने को कहा है।

    दूसरी ओर, CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके, सह-संयोजक आशुतोष रांका और सौरव दास ने प्रदर्शन करने के अपने फैसले पर कायम रहने की बात कही है। पार्टी की ओर से कहा गया है कि 10 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जाएगा और उन्हें अपने ऊपर लगाए गए गंभीर आरोपों पर जवाबदेही देनी होगी। अभिजीत दीपके ने कहा कि यदि पुलिस या सुरक्षाकर्मी प्रदर्शनकारियों को रोकेंगे, तो वे जिस स्थान पर रोके जाएंगे, वहीं जंतर-मंतर जैसा प्रदर्शन स्थल बना देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता सरकार के पास हो सकती है, लेकिन सड़कें देश की जनता की हैं। उनके अनुसार, नागरिकों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से नहीं रोका जाना चाहिए। इस तरह, एक ओर पुलिस ने अनुमति नहीं दी है और कार्रवाई की चेतावनी दी है, जबकि दूसरी ओर CJP ने प्रदर्शन करने का ऐलान दोहराया है।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का लंबा आंदोलन, मतदाता सूची विवाद पर देशभर में अभियान की तैयारी

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का लंबा आंदोलन, मतदाता सूची विवाद पर देशभर में अभियान की तैयारी


    नई दिल्ली ।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने आंदोलन को आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष का कहना है कि यह अभियान केवल एक-दो दिन का नहीं होगा, बल्कि लंबे समय तक जारी रहेगा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कांग्रेस के महासचिवों और प्रदेश अध्यक्षों से इस मुद्दे को लगातार उठाने और आंदोलन को व्यापक स्तर तक ले जाने को कहा है। मंगलवार को संसद भवन से चुनाव आयोग तक मार्च और आकाशवाणी भवन में धरने के बाद विपक्ष ने अपने आंदोलन को और तेज करने का संकेत दिया।

    इंडिया गठबंधन के कई दल करीब एक सप्ताह पहले हुई बैठक में मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे पर कई महीने तक अभियान चलाने का ऐलान कर चुके हैं। इसके बाद कांग्रेस ने सोमवार को एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को फिर से जुड़वाने के लिए एक महीने का अभियान शुरू करने की घोषणा की। विपक्षी दलों की ओर से इसे घर-घर तक पहुंचाने की तैयारी है। मंगलवार के मार्च में इंडिया गठबंधन के कई दलों की मौजूदगी के साथ बीजू जनता दल की भागीदारी भी दिखाई दी। विपक्ष इसे अपने अभियान के लिए व्यापक समर्थन के तौर पर देख रहा है।

    इस मुद्दे को राहुल गांधी पिछले एक साल से उठाते रहे हैं। विपक्ष ने पहली बार 7 अगस्त 2025 को इसे प्रमुखता से सामने रखा था। उस समय राहुल गांधी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक का उदाहरण देते हुए मतदाता सूची से जुड़े सवाल उठाए थे। इसके बाद विपक्षी दल लगातार इस विषय को अलग-अलग मंचों पर उठाते रहे। बाद में पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबरों और चुनाव परिणामों के बाद विपक्ष ने इस मुद्दे पर और ज्यादा जोर दिया।

    विपक्षी रणनीतिकारों के मुताबिक, इस पूरे अभियान में एकजुटता सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। संसद के मानसून सत्र के दौरान भी विपक्षी दलों ने एक साथ कई मुद्दे उठाए थे। अब मतदाता सूची के मुद्दे पर भी अलग-अलग दलों के एक मंच पर आने से आंदोलन को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। विपक्ष का रुख है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो शीतकालीन सत्र के दौरान भी यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया जाएगा और संसद के भीतर विरोध और अधिक तीखा हो सकता है।

    विपक्षी दलों ने केवल संसद और चुनाव आयोग तक सीमित रहने के बजाय आंदोलन को देश के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाने की योजना बनाई है। इंडिया गठबंधन की ओर से पांच बड़ी रैलियों का भी ऐलान किया गया है। इसके साथ ही कांग्रेस का एक महीने का अभियान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर लोगों तक पहुंचने पर केंद्रित रहेगा। विपक्षी नेताओं का मानना है कि इस मुद्दे को स्थानीय स्तर तक ले जाने से मतदाताओं की शिकायतों और आपत्तियों को सामने लाने में मदद मिलेगी।

    विपक्ष एसआईआर को लेकर आम मतदाताओं में पैदा हुई कथित असहजता को भी अपने अभियान का आधार बना रहा है। विपक्षी रणनीतिकारों का दावा है कि मतदाता सूची में नाम हटने और जुड़ने से जुड़े सवालों के कारण चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच चिंता बनी हुई है। इसी वजह से आंदोलन को लंबे समय तक चलाने की तैयारी की जा रही है। फिलहाल विपक्ष का अभियान संसद, चुनाव आयोग, देशव्यापी कार्यक्रमों और घर-घर संपर्क के जरिए आगे बढ़ाने की योजना पर केंद्रित है।

  • राहुल गांधी का ज्ञानेश कुमार पर हमला, बोले- हो गया भाई, अब इस्तीफा देने का समय; चुनाव आयोग के बाहर विपक्ष का धरना

    राहुल गांधी का ज्ञानेश कुमार पर हमला, बोले- हो गया भाई, अब इस्तीफा देने का समय; चुनाव आयोग के बाहर विपक्ष का धरना

    नई दिल्ली। विपक्षी गठबंधन के सांसदों ने मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे समेत अन्य मांगों को लेकर संसद भवन परिसर से चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर मार्च किया। विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी समेत इंडिया ब्लॉक के सांसद चुनाव आयोग मुख्यालय, निर्वाचन सदन की तरफ बढ़े, लेकिन पुलिस ने उन्हें पार्लियामेंट स्ट्रीट पर रोक दिया। इसके बाद सांसद वहीं सड़क पर बैठ गए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर धरना शुरू कर दिया। सांसदों को नीति आयोग कार्यालय के सामने रोका गया, जो नीति आयोग और आकाशवाणी भवन के बीच चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर जाने वाले रास्ते पर स्थित है।

    प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार के आरएसएस यूनिफॉर्म वाले कटआउट लिए और नारे लगाए। इनमें ‘बीजेपी है सीईसी है’, ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ और ‘डेमोक्रेसी बिकाऊ नहीं है’ जैसे नारे शामिल थे। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में ज्ञानेश कुमार को संबोधित करते हुए लिखा, ‘ज्ञानेश, यह हो गया भाई। इस्तीफा देने का समय आ गया है।’ मार्च में तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी और डेरेक ओ ब्रायन, कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और सीपीआई (एम) नेता जॉन ब्रिटास समेत कई सांसद शामिल हुए। सांसदों के पहुंचने से काफी पहले संसद और चुनाव आयोग मुख्यालय के अंदर तथा आसपास भारी सुरक्षा तैनात कर दी गई थी और बैरिकेडिंग की गई थी।

    मार्च से पहले विपक्षी सांसदों ने सुरक्षा इंतजामों पर सवाल उठाए और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज की। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने आरोप लगाया कि कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग के प्रति लोगों का भरोसा कम हुआ है। उन्होंने कहा कि जिस संस्था पर पूरा देश भरोसा करता है और गर्व महसूस करता है, उसकी निष्पक्षता पर पहले कभी सवाल नहीं उठाए गए, लेकिन एक व्यक्ति ने उस भरोसे को तोड़ दिया है। उन्होंने एक पूरे नेक्सस के साथ काम करने का भी आरोप लगाया और कहा कि विपक्ष ज्ञानेश कुमार से सवाल करेगा और बीजेपी के मुख्यमंत्री जवाब देना शुरू करेंगे।

    सीपीआई सांसद पी संदोष कुमार ने कहा कि सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से वोटर रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के दौरान फॉर्म 6 से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा को लेकर विपक्ष की आपत्तियां मजबूत हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि 26 सितंबर को चुनाव आयोग की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि फॉर्म 6 से जुड़ी पूरी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी है, जबकि उनके मुताबिक यह बयान गुमराह करने वाला साबित हुआ है। सीपीआई नेता ने सीईसी को ‘धोखेबाज चुनाव कमिश्नर’ कहा और दावा किया कि विपक्षी पार्टियां 2025 से इन नियमों के खिलाफ आंदोलन कर रही हैं तथा अपना आंदोलन और तेज करेंगी।

    शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने भी मार्च से पहले बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सांसद शांतिपूर्वक आगे बढ़ना चाहते थे और वे देश के नागरिक होने के साथ संसद के सदस्य भी हैं। राउत ने सवाल किया कि उन्हें रोकने के लिए इतनी बड़ी फोर्स की क्या जरूरत है और कहा कि उनके पास हथियार नहीं हैं। उन्होंने बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स और सीआईएसएफ के जवानों की तैनाती तथा मंत्रियों के घरों के बाहर सुरक्षा बढ़ाए जाने का दावा किया। राउत ने फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट की स्थिति को लेकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि सीईसी को पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा था कि उसने फॉर्म 6 के किसी भी बदले हुए वर्जन को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने यह पता लगाने के लिए चुनाव आयोग के रिकॉर्ड की जांच करने की बात कही कि क्या बदलाव किए गए थे और उन्हें किसने मंजूरी दी थी। यह टिप्पणी ज्ञानेश कुमार के कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान हुई। 26 सितंबर के बयान में आयोग ने कहा था कि एसआईआर के लिए फॉर्म 6 के साथ जुड़ी घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। यह विरोध एसआईआर प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों और तीन सदस्यों वाले आयोग के भीतर मतभेदों की खबरों को लेकर विपक्ष के अभियान के बीच हुआ। चुनाव आयोग ने आयोग में बंटवारे के सुझावों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर से जुड़े फैसले एकमत से लिए गए थे।

  • SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का CEC ज्ञानेश कुमार को नोटिस, निलंबन से इनकार; कानून टूटा तो फैसलों पर रोक संभव

    SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का CEC ज्ञानेश कुमार को नोटिस, निलंबन से इनकार; कानून टूटा तो फैसलों पर रोक संभव

    नई दिल्ली ।स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से जुड़े फैसलों में कथित एकतरफा कार्रवाई के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी किया है। हालांकि, अदालत ने उन्हें निलंबित करने की मांग पर फिलहाल तत्काल अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसले संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सर्वसम्मति या बहुमत से लिए गए थे या नहीं।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि केवल किसी समाचार रिपोर्ट के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि चुनाव आयोग में फैसले एकतरफा तरीके से लिए गए। अदालत ने कहा कि इस मामले में उसे चुनाव आयोग से प्रमाणित जानकारी और संबंधित रिकॉर्ड की आवश्यकता है। पीठ ने चुनाव आयोग के फैसलों की प्रक्रिया को लेकर उसके जवाब को महत्वपूर्ण माना।

    मामला चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कथित तौर पर उठाई गई आपत्तियों से जुड़ा है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पिछले 10 महीनों में मतदाता सूची, मतदाता पंजीकरण और आयोग की तकनीकी प्रणालियों से संबंधित मामलों में कम से कम 14 मौकों पर आपत्तियां दर्ज की गईं। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा है कि मसौदा चरण में सवाल, सुझाव और आपत्तियां उठना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, SIR की समय-सारणी से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के फैसले पूरी संस्था की संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार लिए गए या मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल किया, जो आयोग के सामूहिक निर्णय से संबंधित हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर होने चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड से पता चलता है कि संबंधित फैसले न तो सर्वसम्मति से और न ही बहुमत से लिए गए, तो वह उन फैसलों पर रोक लगाने या उन्हें प्रभावित करने वाला आदेश दे सकती है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता से यह भी पूछा कि क्या वह अपनी मांग के समर्थन में समाचार रिपोर्ट पर निर्भर कर रहा है। पीठ ने कहा कि किसी रिपोर्ट के सही, आंशिक रूप से सही या गलत होने की संभावना हो सकती है। इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर तत्काल आदेश जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि वह चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और संबंधित रिकॉर्ड देखना चाहेगी। यदि रिकॉर्ड से कानून या निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो अदालत उचित कार्रवाई पर विचार कर सकती है।

    यह मामला पटना निवासी राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका के बाद सामने आया। याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या CEC ज्ञानेश कुमार व्यक्तिगत रूप से उन शक्तियों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कानून और संविधान के तहत पूरे चुनाव आयोग से संबंधित हैं। इसमें Form 6 में कथित तौर पर बिना अनुमति बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस को केंद्रीकृत करने और ECINet सिस्टम के जरिए नाम बहाल नहीं किए जाने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। इन आरोपों पर अंतिम स्थिति चुनाव आयोग के जवाब और अदालत के सामने पेश किए जाने वाले रिकॉर्ड के बाद स्पष्ट होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने CEC के निलंबन की मांग पर अंतरिम राहत नहीं दी है।

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  • 30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की संभावित बैठक, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर चर्चा

    30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की संभावित बैठक, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर चर्चा

    नई दिल्ली । विपक्षी दलों का INDIA ब्लॉक 30 सितंबर को नई दिल्ली में बैठक कर सकता है। इस संभावित बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल इन विषयों पर आगे की संयुक्त रणनीति तैयार करने के लिए आपसी समन्वय बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

    बैठक का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली हो सकता है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां उठा रहे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई की रणनीति पर विचार कर रहे हैं।

    इस घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल की राजनीति से जुड़े तृणमूल कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का एक मुद्दे पर साथ आना भी महत्वपूर्ण है। दोनों दल राज्य में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर समन्वित कार्रवाई की जरूरत जता रहे हैं।

    मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एमए बेबी ने विपक्षी दलों को पत्र लिखकर बैठक बुलाने का अनुरोध किया था। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी बातचीत की। ममता बनर्जी ने इस मामले से निपटने के लिए समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता जताई है।

    विपक्षी दलों में कांग्रेस और वामपंथी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने तथा SIR प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर विपक्ष संसद के दोनों सदनों में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। इसके कानूनी पहलुओं पर विशेषज्ञों से राय ली जा रही है।

    कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक 29 सितंबर को प्रस्तावित है। इस बैठक में पार्टी चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े विवाद पर अपना रुख स्पष्ट कर सकती है। इसके बाद 30 सितंबर को होने वाली संभावित विपक्षी बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा हो सकती है।

    विपक्ष की मौजूदा लामबंदी के पीछे चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों पर कथित मतभेद की खबर भी एक वजह बताई जा रही है। सामने आई जानकारी में दावा किया गया था कि आयोग के अन्य आयुक्तों ने पुनरीक्षण से संबंधित कुछ फैसलों पर आपत्तियां जताई थीं।

    हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचार सामने आना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग ने अपने आदेशों को वैधानिक बताया है। इस मुद्दे पर विपक्ष और चुनाव आयोग के रुख में अंतर बना हुआ है।

    इससे पहले 23 विपक्षी दलों और एक सांसद ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग की थी। विपक्षी दल अब संसद में प्रस्ताव लाने और आपसी समन्वय के जरिए आगे की कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं।

    30 सितंबर की संभावित बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव से जुड़े मुद्दे चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं। बैठक में शामिल होने वाले दलों और अंतिम एजेंडे को लेकर आगे की जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

  • अभिजीत दीपके ने विपक्ष पर उठाए सवाल, कहा- चुनाव में गड़बड़ी मानते हैं तो फिर लगातार हिस्सा क्यों लेते हैं

    अभिजीत दीपके ने विपक्ष पर उठाए सवाल, कहा- चुनाव में गड़बड़ी मानते हैं तो फिर लगातार हिस्सा क्यों लेते हैं


    नई दिल्ली ।
    कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी के आरोपों को लेकर विपक्षी दलों पर निशाना साधा है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि विपक्ष को लगता है कि चुनाव सही तरीके से नहीं हो रहे हैं, तो वह लगातार ऐसे चुनावों में हिस्सा क्यों ले रहा है। दीपके ने कहा कि विपक्ष को संभवतः इस बात का डर है कि चुनाव से दूर रहने पर उसका राजनीतिक अस्तित्व खत्म हो सकता है।

    दीपके ने कहा कि एक तरफ विपक्ष चुनावों में गड़बड़ी के आरोप लगाता है और दूसरी तरफ उन्हीं चुनावों में लगातार हिस्सा लेता है। उनके अनुसार, ऐसी स्थिति में चुनावी प्रक्रिया पर लगाए जा रहे आरोपों और चुनाव में भागीदारी के बीच विरोधाभास दिखाई देता है। उन्होंने विपक्ष से देश और लोकतंत्र को राजनीतिक अस्तित्व से ऊपर रखने की अपील की।

    उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी दल को चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति है, तो उसे अपने रुख पर स्पष्टता दिखानी चाहिए। दीपके के मुताबिक, चुनावों में लगातार भाग लेने से लोगों के बीच यह संदेश जा सकता है कि चुनावी प्रक्रिया सामान्य और प्रतिस्पर्धी है, जबकि विपक्ष खुद उस पर सवाल उठा रहा है।

    दीपके ने विपक्षी दलों की आंतरिक स्थिति को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेताओं को तोड़ा जा रहा है और पार्टियों में विभाजन हो रहे हैं। उनके मुताबिक, ऐसे माहौल में केवल चुनाव लड़ते रहना राजनीतिक ताकत को बनाए रखने का पर्याप्त तरीका नहीं है। उन्होंने विपक्ष से व्यापक लोकतांत्रिक हितों को ध्यान में रखते हुए अपने रुख पर विचार करने को कहा।

    अपनी बात समझाने के लिए दीपके ने चुनावों की तुलना क्रिकेट के एक फिक्स मैच से की। उन्होंने कहा कि ऐसे मैच में हर कैच जानबूझकर नहीं छोड़ा जाता। कुछ कैच पकड़े भी जा सकते हैं और मुकाबले को अंतिम ओवर तक ले जाया जा सकता है, जिससे लोगों को मुकाबला बराबरी का दिखाई दे।

    दीपके ने इसी उदाहरण के आधार पर दावा किया कि यदि चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी हो, तो विपक्ष को कुछ स्थानों पर जीत भी मिल सकती है। उनके मुताबिक, ऐसी जीतें विपक्ष को चुनाव लड़ते रहने के लिए पर्याप्त हो सकती हैं और इससे लोगों के बीच वास्तविक प्रतिस्पर्धा होने का विश्वास बना रह सकता है। यह उनका चुनावी प्रक्रिया को लेकर दिया गया तर्क है।

    उन्होंने कहा कि विपक्ष यदि चुनावों को कथित तौर पर तय या प्रभावित मानता है तो उसे उसी प्रक्रिया का हिस्सा बने रहने के बजाय अपने रुख पर विचार करना चाहिए। दीपके ने विपक्ष से राजनीतिक अस्तित्व की चिंता से आगे बढ़कर देश और लोकतंत्र के बारे में सोचने की अपील की।

    दीपके की यह टिप्पणी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे विवाद के बीच सामने आई है। इससे पहले उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की थी और 48 घंटे का समय देने की बात कही थी। उनका ताजा बयान भी चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे सवालों और विपक्ष की चुनावी रणनीति पर केंद्रित है।

    उन्होंने विपक्ष से कहा कि यदि उसे चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है तो उसे लगातार उसमें भाग लेने के बजाय स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। दीपके का कहना है कि चुनाव में भागीदारी जारी रखने से उस व्यवस्था को वैधता मिलती है, जिस पर विपक्ष स्वयं सवाल उठा रहा है। उन्होंने इसी आधार पर विपक्ष की चुनावी रणनीति और राजनीतिक अस्तित्व को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग, वकील ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर कार्रवाई की अनुमति मांगी

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग, वकील ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर कार्रवाई की अनुमति मांगी

    नई दिल्ली ।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकील ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने इस कार्रवाई के लिए आवश्यक अनुमति देने का अनुरोध किया है। यह मांग ऐसे समय सामने आई है, जब चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की कथित असहमतियों पर चर्चा तेज है।

    ब्रजेश सिंह ने अपने पत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से जुड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने मीडिया में सामने आई जानकारी का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग का संचालन इस तरह हुआ, मानो महत्वपूर्ण फैसले एक ही व्यक्ति द्वारा लिए जा रहे हों। पत्र में इसे सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में बताई गई चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से अलग बताया गया है।

    आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित सहमति आवश्यक होती है। मौजूदा स्थिति में ब्रजेश सिंह का पत्र इसी अनुमति के लिए भेजा गया है। यानी अभी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कोई आपराधिक अवमानना मामला शुरू नहीं हुआ है और पत्र के आधार पर आगे की प्रक्रिया अटॉर्नी जनरल की अनुमति पर निर्भर करेगी।

    इस मांग की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी जानकारी भी है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा सामने आया है। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म 6 में बदलाव तथा मतदाता सूची से जुड़े दूसरे विषयों पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई है।

    विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की चर्चा हुई है। सामने आई जानकारी के मुताबिक, कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर उन्होंने सवाल उठाए तथा यह दावा किया कि कुछ निर्णय उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए। मतदाता सूची के डिजिटल डाटा और उसके प्रबंधन से जुड़े विषय भी इन आपत्तियों में शामिल बताए गए हैं।

    इन घटनाक्रमों के बाद विपक्षी दलों की ओर से भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सवाल उठाए गए हैं। कुछ विपक्षी दलों ने उनके इस्तीफे की मांग की है और एसआईआर की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई है। पहले दिए गए महाभियोग नोटिस को लेकर भी राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इस नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण सहित कई आरोप लगाए गए थे।

    हालांकि, चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद या फैसलों में असहमति के दावों को अलग तरीके से प्रस्तुत किया है। आयोग का कहना है कि उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जा रहे हैं और एसआईआर से जुड़े निर्णयों को भी सभी तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त है। आयोग ने यह भी कहा है कि वैचारिक मतभेद को टकराव नहीं माना जाना चाहिए।

    आयोग के अनुसार, व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देना केवल चुनाव आयुक्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी अपने सुझाव देने के लिए अधिकृत है। इस तरह एक ओर कथित लिखित आपत्तियों और दूसरी ओर आयोग की सर्वसम्मति वाली सफाई के बीच विवाद बना हुआ है।

    अब ब्रजेश सिंह द्वारा अटॉर्नी जनरल को भेजे गए पत्र के बाद मामले का कानूनी पहलू भी चर्चा में आ गया है। पत्र में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय व्यवस्था का हवाला देते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की अनुमति मांगी गई है। आगे की स्थिति अटॉर्नी जनरल की ओर से लिए जाने वाले निर्णय पर निर्भर करेगी।

  • ज्ञानेश कुमार पर सिंघवी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ा सियासी विवाद

    ज्ञानेश कुमार पर सिंघवी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ा सियासी विवाद

    नई दिल्ली ।मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े कुछ मुद्दों पर कथित मतभेद सामने आने के बाद कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई है। उन्होंने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने सहयोगी चुनाव आयुक्तों को पर्याप्त जानकारी दिए बिना कई महत्वपूर्ण फैसले लिए।

    सिंघवी ने आरोप लगाया कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त पर देश को भ्रमित करने का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की। कांग्रेस ने दिल्ली और हरियाणा में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग भी उठाई।

    कांग्रेस नेता ने Form 6 में किए गए बदलाव का मुद्दा भी उठाया। Form 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सामने आई जानकारी के अनुसार, इसमें नए आवेदकों से उनके या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने SIR रिकॉर्ड में मौजूद होने से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।

    इस बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्ति दर्ज की थी। दोनों चुनाव आयुक्तों ने SIR की प्रक्रिया, नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे मुद्दों पर अपनी चिंताएं सामने रखीं।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में अलग-अलग मामलों को लेकर 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील और चुनावी डेटा की सुरक्षा जैसे विषय शामिल थे।

    मतदाता सूची से संबंधित डिजिटल व्यवस्था और अधिकारियों की सिस्टम तक पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए गए। आपत्तियों में यह चिंता सामने आई कि मतदाता डेटा और उससे जुड़े निर्णयों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और विकेंद्रीकृत है।

    पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों ने भी विवाद को और बढ़ाया है। वहां बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने से संबंधित मामलों में अपील की है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ऐसे मामलों की संख्या 38 लाख से अधिक बताई गई है।

    सिंघवी ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है। उनके मुताबिक, महत्वपूर्ण निर्णयों में सभी चुनाव आयुक्तों की भूमिका और सहमति का महत्व है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

    दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से एक व्यक्ति के नियंत्रण में संस्था के काम करने के आरोपों को खारिज किया गया है। आयोग के पक्ष के अनुसार, महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था के तहत लिए जाते हैं और SIR से संबंधित निर्णय सामूहिक प्रक्रिया के अनुसार किए गए हैं।

    इस पूरे विवाद का केंद्र मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था बनी हुई है। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जोड़ रही है, जबकि आयोग की ओर से निर्णय प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताया गया है।