तेलंगाना के हैदराबाद से भोपाल पहुंचे कांते सायन्ना ने विधानसभा से नामांकन फॉर्म लिया है। उनका कहना है कि वे चुनाव लड़ने के लिए जरूरी दस्तावेज और शपथ पत्र लेकर आए हैं। हालांकि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नामांकन के लिए जरूरी 10 विधायकों के प्रस्तावकों के हस्ताक्षर जुटाना है। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रस्तावकों का समर्थन अनिवार्य है। सायन्ना के मुताबिक मध्यप्रदेश के कुछ विधायक उनके समर्थन में हस्ताक्षर करने से हिचक रहे हैं। उनका आरोप है कि राजनीतिक दलों के नेताओं को डर है कि उनके समर्थन में हस्ताक्षर करने से उन्हें राजनीतिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
सायन्ना ने उम्मीद जताई है कि सोमवार तक वे जरूरी हस्ताक्षर जुटा लेंगे और नामांकन की प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे। उन्होंने बताया कि कुछ विधायकों ने समर्थन देने की बात कही है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि वे निर्धारित समय तक सभी 10 प्रस्तावकों के हस्ताक्षर जुटा पाएंगे या नहीं। ऐसे में उनकी उम्मीदवारी का भविष्य विधायकों के समर्थन पर निर्भर करेगा।
कांते सायन्ना ने अपने चुनावी सफर के बारे में बताते हुए कहा कि वे अब तक पांच बार लोकसभा और आठ बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। इसके अलावा छह बार विधान परिषद के चुनाव में भी अपनी किस्मत आजमा चुके हैं। राज्यसभा के लिए वे 10 से 12 बार प्रयास करने का दावा करते हैं। उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में भी उन्होंने अपनी दावेदारी पेश की थी। उनका कहना है कि वे किसी एक राजनीतिक दल से बंधे हुए नहीं हैं और चुनाव लड़ने का खर्च भी खुद उठाते हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब सायन्ना को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इसी साल मार्च में तेलंगाना की दो राज्यसभा सीटों के चुनाव के दौरान भी उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल किया था। उस समय भी प्रस्तावकों के जरूरी हस्ताक्षर नहीं मिलने के कारण उनकी उम्मीदवारी पर संकट खड़ा हो गया था। अब मध्यप्रदेश में भी उनके सामने वैसी ही स्थिति बनती नजर आ रही है।
सायन्ना ने 2018 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव का जिक्र करते हुए दावा किया कि उस चुनाव में वे तीसरे स्थान पर रहे थे। उनके मुताबिक उस चुनाव में केसीआर पहले और वंटेरू प्रताप रेड्डी दूसरे स्थान पर थे। उन्होंने बताया कि वे अलग-अलग राज्यों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं और अपने स्तर पर प्रचार करते हैं।
अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर सायन्ना का कहना है कि देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है। उनके मुताबिक राजनीतिक दलों के बी-फॉर्म और पार्टी आधारित व्यवस्था का प्रभाव बहुत ज्यादा है। लोकतंत्र में जनता का वोट सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए। वे ऐसी स्वतंत्र राजनीतिक व्यवस्था की वकालत करते हैं जिसमें उम्मीदवारों की पहचान केवल राजनीतिक दलों के आधार पर न हो। उनका दावा है कि इस विषय पर उन्होंने काफी अध्ययन और लेखन भी किया है। अब देखना होगा कि हरदीप सिंह पुरी के सामने चुनाव लड़ने की उनकी कोशिश कितनी आगे बढ़ पाती है और क्या वे जरूरी विधायकों का समर्थन जुटाकर अपनी उम्मीदवारी कायम रख पाते हैं।







