Tag: health awareness

  • खांसी बुखार और शरीर में दर्द को सामान्य समझने की न करें भूल स्वाइन फ्लू के इन संकेतों पर रहें सतर्क

    खांसी बुखार और शरीर में दर्द को सामान्य समझने की न करें भूल स्वाइन फ्लू के इन संकेतों पर रहें सतर्क

    नई दिल्ली। बदलते मौसम के साथ वायरल संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है और इसी दौरान स्वाइन फ्लू को लेकर भी लोगों को सतर्क रहने की जरूरत होती है। स्वाइन फ्लू को एच1एन1 इन्फ्लुएंजा के नाम से भी जाना जाता है। यह एक तरह का श्वसन संक्रमण है जो संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने के दौरान निकलने वाली बूंदों के संपर्क में आने से फैल सकता है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर लंबे समय तक रहने और संक्रमित व्यक्ति के बेहद करीब संपर्क में आने से संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है। यही वजह है कि मौसम बदलने के दौरान स्वास्थ्य को लेकर थोड़ी सी सावधानी भी काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।

    स्वाइन फ्लू के लक्षण कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखाई दे सकते हैं। इसमें बुखार के साथ खांसी गले में खराश नाक बहना शरीर में दर्द सिरदर्द और थकान जैसी समस्या हो सकती है। कुछ लोगों में ठंड लगने और कमजोरी की शिकायत भी देखने को मिल सकती है। बच्चों और कुछ अन्य लोगों में उल्टी या दस्त जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में केवल शुरुआती लक्षण देखकर खुद से बीमारी तय करना सही नहीं माना जाता है। अगर लक्षण ज्यादा समय तक बने रहें या तेजी से बढ़ें तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    स्वाइन फ्लू का खतरा हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। बुजुर्ग छोटे बच्चे गर्भवती महिलाएं और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को श्वसन संक्रमण होने पर अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत हो सकती है। ऐसे लोगों में बुखार या सांस से जुड़ी परेशानी को हल्के में नहीं लेना चाहिए। सांस लेने में परेशानी सीने में दर्द अत्यधिक कमजोरी या हालत तेजी से बिगड़ने जैसे संकेत दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेना जरूरी है।

    संक्रमण से बचाव के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता पर ध्यान देना बेहद महत्वपूर्ण है। खांसते और छींकते समय मुंह और नाक को ढकना चाहिए। हाथों को नियमित रूप से साबुन और पानी से धोना चाहिए और बार बार आंख नाक या मुंह को छूने से बचना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति में फ्लू जैसे लक्षण हैं तो दूसरों से अनावश्यक नजदीकी संपर्क कम करना संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद कर सकता है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर जरूरत के अनुसार मास्क का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

    एक जरूरी बात यह भी है कि स्वाइन फ्लू जैसे संक्रमण में खुद से दवा लेना उचित नहीं है। खासतौर पर एंटीबायोटिक दवाएं वायरल संक्रमण का सीधा इलाज नहीं करतीं। डॉक्टर लक्षणों और मरीज की स्थिति के आधार पर जांच और उपचार की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में डॉक्टर एंटीवायरल दवा देने का निर्णय भी ले सकते हैं।

    स्वाइन फ्लू से बचाव का सबसे अहम तरीका जागरूकता और समय पर चिकित्सा सलाह है। हर बुखार स्वाइन फ्लू नहीं होता लेकिन लगातार बने रहने वाले या गंभीर लक्षणों को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं है। साफ सफाई का ध्यान रखना संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेना संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

  • बीमारी से बचना है तो आज से बदलें अपनी दिनचर्या: सही खानपान नियमित एक्सरसाइज पर्याप्त नींद और तनाव पर काबू रखने से ऐसे रखें अपनी सेहत का ख्याल

    बीमारी से बचना है तो आज से बदलें अपनी दिनचर्या: सही खानपान नियमित एक्सरसाइज पर्याप्त नींद और तनाव पर काबू रखने से ऐसे रखें अपनी सेहत का ख्याल


    नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग काम और जिम्मेदारियों के बीच अपनी सेहत को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। लंबे समय तक बैठकर काम करना अनियमित खानपान नींद की कमी तनाव और शारीरिक गतिविधि का कम होना धीरे धीरे शरीर पर असर डाल सकता है। अच्छी सेहत के लिए किसी एक दिन की मेहनत काफी नहीं होती बल्कि रोजमर्रा की आदतों में छोटे और लगातार बदलाव जरूरी होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वस्थ खानपान नियमित शारीरिक गतिविधि पर्याप्त नींद तंबाकू से दूरी और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल खुद की सेहत संभालने के अहम हिस्से हैं।

    स्वास्थ्य देखभाल की शुरुआत सबसे पहले भोजन से होती है। रोज के खाने में अलग अलग प्रकार के पौष्टिक खाद्य पदार्थ शामिल करना शरीर को जरूरी पोषक तत्व देने में मदद करता है। साबुत अनाज दालें फल सब्जियां और जरूरत के अनुसार प्रोटीन के अच्छे स्रोत भोजन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। दूसरी तरफ बहुत ज्यादा नमक चीनी अस्वास्थ्यकर वसा और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित करना बेहतर माना जाता है। WHO के अनुसार स्वस्थ आहार पर्याप्तता संतुलन संयम और विविधता जैसे सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए।

    इसके साथ शारीरिक गतिविधि को रोज की दिनचर्या में जगह देना बेहद जरूरी है। इसके लिए जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति जिम जाए। तेज चाल से चलना साइकिल चलाना तैरना योग करना खेलना या रोजमर्रा के कामों में सक्रिय रहना भी शारीरिक गतिविधि का हिस्सा हो सकता है। WHO के अनुसार वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट की मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि या उसके बराबर अधिक तीव्र गतिविधि करने की सलाह दी जाती है। जो लोग लंबे समय से सक्रिय नहीं हैं उन्हें अचानक बहुत ज्यादा व्यायाम करने के बजाय धीरे धीरे शुरुआत करनी चाहिए।

    स्वास्थ्य देखभाल में नींद को भी उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए। देर रात तक मोबाइल चलाना लगातार काम करना और सोने का समय बदलते रहना शरीर की दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सोने और जागने का समय नियमित रखने की कोशिश करें। सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करना और शांत वातावरण बनाना भी बेहतर नींद की आदत विकसित करने में मदद कर सकता है। अगर लंबे समय तक नींद से जुड़ी समस्या बनी रहती है तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    मानसिक स्वास्थ्य भी शरीर की सेहत से अलग नहीं है। लगातार तनाव चिंता चिड़चिड़ापन या थकान महसूस होने पर व्यक्ति को अपने काम के बीच आराम और सामाजिक जुड़ाव के लिए समय निकालना चाहिए। परिवार और दोस्तों से बातचीत करना पसंदीदा गतिविधियों के लिए समय निकालना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेना स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। खुद की देखभाल का मतलब यह नहीं है कि बीमारी होने पर डॉक्टर की जरूरत नहीं है। WHO भी स्पष्ट करता है कि self care स्वास्थ्य व्यवस्था और स्वास्थ्यकर्मियों की जगह नहीं लेती बल्कि उनकी देखभाल को बेहतर तरीके से पूरा करती है।

    तंबाकू से दूरी बनाना भी स्वास्थ्य सुरक्षा का बेहद महत्वपूर्ण कदम है। इसी तरह शराब के सेवन से बचना या उसे सीमित करना कई स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में मदद कर सकता है। जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर डायबिटीज या अन्य पुरानी बीमारी है उन्हें नियमित जांच और डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाओं को अपनी मर्जी से बंद नहीं करना चाहिए। WHO की सलाह के मुताबिक जीवनशैली में बदलाव कई बीमारियों के प्रबंधन में मदद कर सकते हैं लेकिन कई स्थितियों में दवा और चिकित्सकीय निगरानी भी जरूरी रहती है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि स्वस्थ रहने के लिए किसी बड़े बदलाव का इंतजार न करें। रोज थोड़ी शारीरिक गतिविधि पौष्टिक भोजन पर्याप्त आराम तनाव को संभालने की कोशिश और समय पर चिकित्सकीय सलाह जैसी छोटी आदतें लंबे समय में बड़ा अंतर ला सकती हैं। अपने शरीर के संकेतों को समझना और लगातार बनी रहने वाली परेशानी को नजरअंदाज न करना भी उतना ही जरूरी है। स्वास्थ्य की सही देखभाल बीमारी के बाद शुरू नहीं होती बल्कि बीमारी से बचाव और बेहतर जीवनशैली की आदतों से पहले ही शुरू हो जाती है।

  • डेंगू मच्छर से बचाव के लिए बरसात में रखें विशेष सावधानी जानिए कैसे करें खुद और परिवार की सुरक्षा

    डेंगू मच्छर से बचाव के लिए बरसात में रखें विशेष सावधानी जानिए कैसे करें खुद और परिवार की सुरक्षा


    नई दिल्ली । बारिश का मौसम जहां गर्मी से राहत लेकर आता है वहीं कई संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। इनमें डेंगू सबसे गंभीर बीमारियों में से एक माना जाता है। हर साल मानसून के दौरान डेंगू के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिलती है। इसका सबसे बड़ा कारण घरों और आसपास जमा होने वाला साफ पानी है जहां एडीज मच्छर आसानी से पनपता है। यही मच्छर डेंगू वायरस फैलाने का काम करता है। ऐसे में थोड़ी सी सतर्कता और सही आदतें अपनाकर इस बीमारी से खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखा जा सकता है।

    डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर दिन के समय अधिक सक्रिय रहता है। यह सुबह और शाम के समय सबसे ज्यादा काटता है। इसलिए केवल रात में ही नहीं बल्कि दिन में भी मच्छरों से बचाव करना जरूरी है। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें और बच्चों को भी फुल स्लीव्स के कपड़े पहनाएं ताकि मच्छरों के काटने का खतरा कम हो सके।

    घर और आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें। कूलर गमले टायर बाल्टी पानी की टंकी और पुराने बर्तनों में जमा पानी को नियमित रूप से खाली करें या बदलें। यदि पानी लंबे समय तक जमा रहेगा तो मच्छर तेजी से अंडे देंगे और उनकी संख्या बढ़ जाएगी। घर की छत बालकनी और आंगन की नियमित सफाई भी बेहद जरूरी है।

    मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें। साथ ही मच्छर भगाने वाली क्रीम स्प्रे या इलेक्ट्रिक वेपराइजर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। खिड़कियों और दरवाजों पर जाली लगवाना भी एक प्रभावी उपाय माना जाता है जिससे मच्छर घर के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते।

    यदि किसी व्यक्ति को तेज बुखार सिरदर्द आंखों के पीछे दर्द शरीर और जोड़ों में तेज दर्द कमजोरी या त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई दें तो इसे सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज न करें। तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और आवश्यक जांच कराएं। शुरुआती पहचान और समय पर इलाज से डेंगू के गंभीर खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    डेंगू होने पर पर्याप्त मात्रा में पानी नारियल पानी नींबू पानी और अन्य तरल पदार्थ लेते रहना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दर्द निवारक दवा लेने से बचें क्योंकि कुछ दवाएं रक्तस्राव का खतरा बढ़ा सकती हैं। केवल चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही दवा का सेवन करें।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डेंगू से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका मच्छरों को पनपने से रोकना है। यदि हर व्यक्ति अपने घर और आसपास सफाई बनाए रखे तथा पानी जमा न होने दे तो डेंगू के मामलों में बड़ी कमी लाई जा सकती है। बरसात के मौसम में थोड़ी सी जागरूकता और नियमित सावधानी न केवल आपको बल्कि पूरे समाज को इस खतरनाक बीमारी से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • योग दिवस पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भागीदारी, स्वस्थ वृद्धावस्था पर जोर

    योग दिवस पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की भागीदारी, स्वस्थ वृद्धावस्था पर जोर


    मध्यप्रदेश । मंदसौर के नूतन स्टेडियम में रविवार को International Yoga Day 2026 के अवसर पर भव्य जिला स्तरीय सामूहिक योगाभ्यास कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस वर्ष की थीम “स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” रखी गई, जिसके तहत बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों ने एक साथ योगाभ्यास कर स्वास्थ्य और संतुलित जीवन का संदेश दिया।

    कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सांसद सुधीर गुप्ता और कलेक्टर अदिति गर्ग उपस्थित रहे। इनके साथ जिला पंचायत अध्यक्ष दुर्गा विजय पाटीदार, नगर पालिका अध्यक्ष रमादेवी बंशीलाल गुर्जर, पूर्व मंत्री कैलाश चावला, पूर्व विधायक यशपाल सिंह सिसोदिया सहित कई जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने भी योगाभ्यास में भाग लिया।

    कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कोलकाता में दिए गए योग दिवस संबोधन का सीधा प्रसारण भी दिखाया गया, जिसे उपस्थित सभी लोगों ने ध्यानपूर्वक सुना। इसके साथ ही राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के योग कार्यक्रमों का भी उल्लेख किया गया।

    इस आयोजन की विशेषता यह रही कि जैन संत प्रणमय सागर ने स्वयं मंच पर योगासन कराए और उपस्थित लोगों को योग के महत्व से अवगत कराया। उन्होंने विभिन्न योग क्रियाओं का अभ्यास कराते हुए बताया कि योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मिक और मानसिक संतुलन का भी साधन है।

    योगाभ्यास के बाद सभी प्रतिभागियों ने नियमित रूप से योग करने का संकल्प लिया। कलेक्टर अदिति गर्ग ने नागरिकों से अपील की कि वे योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, क्योंकि यह स्वस्थ और संतुलित जीवन की कुंजी है।

    सांसद सुधीर गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की प्राचीन योग परंपरा आज पूरे विश्व के लिए प्रेरणा बन चुकी है। उन्होंने बताया कि ऋग्वेद और महर्षि पतंजलि के योग सूत्रों में योग का विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसे आधुनिक समय में वैश्विक पहचान मिली है।

    उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से वर्ष 2015 के बाद योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और आज करोड़ों लोग इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मन, शरीर और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए योग अत्यंत आवश्यक है।

    सांसद ने किसानों से जैविक खेती अपनाने और रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम करने की भी अपील की, यह कहते हुए कि “जब भूमि स्वस्थ होगी तभी समाज भी स्वस्थ रहेगा।”

    कुल मिलाकर, मंदसौर का यह योग कार्यक्रम न केवल स्वास्थ्य जागरूकता का प्रतीक बना, बल्कि इसमें आध्यात्मिकता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संदेश का भी सुंदर समावेश देखने को मिला।

  • बढ़ती परेशानियों के बीच खाने पर असर, हर निवाले से पहले सोचने को मजबूर लोग

    बढ़ती परेशानियों के बीच खाने पर असर, हर निवाले से पहले सोचने को मजबूर लोग


    नई दिल्ली । आजकल कई लोग ऐसी परेशानी से जूझ रहे हैं, जिसमें खाना खाते ही तुरंत वॉशरूम जाने की जरूरत महसूस होने लगती है। बाहर खाना हो, ऑफिस में लंच करना हो या किसी फंक्शन में बैठना—हर बार मन में यही डर बना रहता है कि कहीं अचानक टॉयलेट न जाना पड़ जाए। डॉक्टरों के मुताबिक यह समस्या मामूली लग सकती है, लेकिन लंबे समय तक बनी रहे तो बड़ी बीमारी का संकेत भी हो सकती है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि इस स्थिति को मेडिकल भाषा में गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स (Gastrocolic Reflex) कहा जाता है। यह शरीर की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें खाना पेट में पहुंचते ही आंतें सक्रिय हो जाती हैं। हालांकि अगर यह प्रतिक्रिया जरूरत से ज्यादा होने लगे और हर बार दस्त, पेट दर्द या गैस की समस्या पैदा करे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    डॉक्टरों के अनुसार, कई बार पेट ठीक से साफ न होने, खराब खानपान, ज्यादा मसालेदार भोजन, तनाव या कमजोर पाचन तंत्र के कारण यह समस्या बढ़ जाती है। खाना खाते ही पेट में मरोड़, गैस और टॉयलेट जाने की तीव्र इच्छा होने लगती है। लंबे समय तक ऐसा होना आंतों में संक्रमण या पाचन संबंधी बीमारी की तरफ इशारा कर सकता है।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अगर यह समस्या लगातार बनी रहे, तो लिवर और आंतों की जांच करवाना जरूरी हो जाता है। समय रहते इलाज न कराने पर शरीर में पोषक तत्वों की कमी, कमजोरी और गंभीर पाचन समस्याएं हो सकती हैं।

    इस परेशानी से जुड़ी कुछ प्रमुख बीमारियां भी सामने आती हैं। इनमें इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS) प्रमुख है, जिसमें खाना खाते ही पेट दर्द और गैस बनने लगती है। वहीं कुछ लोगों को दूध या डेयरी उत्पादों से एलर्जी होती है, जिसे लैक्टोज इंटॉलरेंस कहा जाता है। ऐसे लोगों को दूध पीते ही दस्त या पेट खराब होने लगता है। इसके अलावा सीलिएक डिजीज में गेहूं या ग्लूटेन से बनी चीजें खाने पर आंतें प्रभावित होती हैं और बार-बार दस्त की समस्या हो सकती है।

    डॉक्टरों की सलाह है कि अगर खाना खाते ही बार-बार टॉयलेट जाना पड़ रहा है, पेट में लगातार दर्द रहता है, वजन कम हो रहा है या कमजोरी महसूस हो रही है, तो तुरंत विशेषज्ञ से जांच करवानी चाहिए। खानपान में सुधार, पर्याप्त पानी, फाइबर युक्त भोजन और तनाव कम करके इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

  • World Thalassaemia Day: थकान, कमजोरी और एनीमिया को न करें नजरअंदाज

    World Thalassaemia Day: थकान, कमजोरी और एनीमिया को न करें नजरअंदाज


    नई दिल्ली । हर साल 8 मई को मनाया जाने वाला World Thalassemia Day लोगों को एक गंभीर आनुवंशिक रक्त विकार Thalassemia के प्रति जागरूक करने का महत्वपूर्ण अवसर देता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार थकान महसूस होना, कमजोरी आना, शरीर में खून की कमी, पीली त्वचा या बार-बार बीमार पड़ना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है। कई बार ये संकेत थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी की ओर इशारा करते हैं।

    नेशनल हेल्थ मिशन के अनुसार, थैलेसीमिया एक आनुवंशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता। हीमोग्लोबिन की कमी के कारण शरीर में ऑक्सीजन का संचार प्रभावित होता है, जिससे मरीज को लगातार कमजोरी, थकान और एनीमिया जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह बीमारी माता-पिता से बच्चों में आनुवंशिक रूप से पहुंचती है, इसलिए इसकी समय पर पहचान बेहद जरूरी मानी जाती है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि थैलेसीमिया मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—थैलेसीमिया माइनर और थैलेसीमिया मेजर। थैलेसीमिया माइनर में व्यक्ति बीमारी का वाहक होता है और सामान्य जीवन जी सकता है। कई मामलों में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं या दिखाई ही नहीं देते। वहीं, थैलेसीमिया मेजर इसका गंभीर रूप है, जिसमें मरीज को नियमित रूप से ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है। लगातार इलाज, दवाओं और चिकित्सकीय निगरानी के बिना मरीज के लिए सामान्य जीवन जीना मुश्किल हो सकता है।

    विश्व थैलेसीमिया दिवस का सबसे बड़ा उद्देश्य युवाओं को शादी से पहले थैलेसीमिया जांच कराने के लिए प्रेरित करना है। डॉक्टरों के अनुसार अगर पति और पत्नी दोनों थैलेसीमिया माइनर के वाहक हों, तो उनके बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा काफी बढ़ जाता है। ऐसे में समय रहते जांच और जागरूकता इस बीमारी की रोकथाम में अहम भूमिका निभा सकती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ लोगों से अपील कर रहे हैं कि यदि किसी व्यक्ति में लगातार कमजोरी, भूख कम लगना, थकान, पीली त्वचा या बार-बार संक्रमण जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और आवश्यक रक्त जांच कराएं। सही समय पर पहचान और उचित इलाज से बीमारी की जटिलताओं को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

    थैलेसीमिया मेजर के मरीजों को नियमित रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। यही वजह है कि इस अवसर पर स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने पर भी विशेष जोर दिया जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि एक यूनिट रक्त किसी मरीज के लिए नई जिंदगी साबित हो सकता है।

    हालांकि थैलेसीमिया का पूरी तरह इलाज संभव नहीं है, लेकिन समय पर जांच, नियमित उपचार, संतुलित देखभाल और जागरूकता के जरिए मरीज सामान्य और बेहतर जीवन जी सकते हैं।

  • नींद की कमी पर अनोखी पहल: सियोल में ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’, 80 साल के बुजुर्ग ने मारी बाजी

    नींद की कमी पर अनोखी पहल: सियोल में ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’, 80 साल के बुजुर्ग ने मारी बाजी


    नई दिल्ली। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में एक अनोखा और दिलचस्प आयोजन देखने को मिला, जहां लोगों को सोने के लिए आमंत्रित किया गया। ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ नाम की इस प्रतियोगिता का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि देश में बढ़ती नींद की कमी की गंभीर समस्या की ओर ध्यान खींचना था। सियोल मेट्रोपॉलिटन गवर्नमेंट द्वारा आयोजित इस इवेंट में हजारों युवा हान नदी किनारे स्थित पार्क में पहुंचे और खुले आसमान के नीचे सुकून की नींद लेने की कोशिश की।

    तेज-रफ्तार जिंदगी और काम के भारी दबाव के लिए मशहूर दक्षिण कोरिया में युवाओं के बीच नींद की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। यही वजह है कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए प्रतिभागियों को थका हुआ और पेट भरकर आने की शर्त दी गई थी, ताकि वे गहरी नींद ले सकें। कई प्रतिभागी मजेदार वेशभूषा में पहुंचे। कोई ‘स्लीपिंग ब्यूटी’ बना तो कोई ‘स्लीपिंग प्रिंस’।

    प्रतियोगिता में शामिल 20 वर्षीय छात्र पार्क जून-सियोक पारंपरिक शाही पोशाक पहनकर आए और बताया कि पढ़ाई और पार्ट-टाइम जॉब के कारण उन्हें रोजाना सिर्फ 3-4 घंटे ही नींद मिल पाती है। वहीं, अनिद्रा से जूझ रही एक शिक्षिका कोआला की ड्रेस में नजर आईं, ताकि वह इस मौके पर सुकून से सो सकें।

    इस अनोखे मुकाबले में प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता को मापने के लिए उनकी हार्ट रेट मॉनिटर की गई, जिससे पता चल सके कि कौन सबसे गहरी और शांत नींद ले रहा है। प्रतियोगिता की शुरुआत दोपहर में हुई और कुछ ही देर में पूरे पार्क में सन्नाटा छा गया, मानो शहर की भागदौड़ थम गई हो।

    सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इस ‘नींद की जंग’ में 80 वर्षीय बुजुर्ग ने बाजी मार ली, जबकि दूसरे स्थान पर एक 37 वर्षीय ऑफिस वर्कर रहे, जो नाइट शिफ्ट और काम के दबाव से बेहद थके हुए थे।

    यह प्रतियोगिता सिर्फ एक इवेंट नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश है कि आधुनिक जीवनशैली में नींद की अनदेखी किस हद तक बढ़ चुकी है। OECD देशों में सबसे कम सोने वाले देशों में शामिल दक्षिण कोरिया अब इस समस्या को लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और यह ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ उसी दिशा में एक अनोखी पहल बनकर सामने आया है।

  • नमिता थापर विवाद ने खड़े किए गंभीर सवाल, क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी का है भारी अभाव?

    नमिता थापर विवाद ने खड़े किए गंभीर सवाल, क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी का है भारी अभाव?


    नई दिल्ली। उद्यमिता और टेलीविजन जगत की जानी मानी हस्ती नमिता थापर हाल ही में सोशल मीडिया पर अपने एक वीडियो को लेकर विवादों में आ गई हैं। नमाज के स्वास्थ्य लाभों पर जानकारी साझा करने के बाद उन्हें ऑनलाइन ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संवाद की मर्यादा और जिम्मेदारी को लेकर बहस को तेज कर दिया है।

    मार्च के अंतिम सप्ताह में साझा किए गए एक वीडियो में नमिता थापर ने नमाज को एक शारीरिक गतिविधि के रूप में समझाते हुए उसके संभावित स्वास्थ्य लाभों पर चर्चा की थी। उन्होंने इसे एक नियमित व्यायाम की तरह बताया जो शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकता है। उनका कहना था कि यह जानकारी पूरी तरह स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई थी और इसका किसी भी धार्मिक भावना से कोई नकारात्मक संबंध नहीं था।

    हालांकि इस वीडियो के बाद उन्हें लगातार कई हफ्तों तक आलोचना और अपमानजनक प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि इस दौरान न केवल उन्हें बल्कि उनकी मां को भी निशाना बनाया गया और सोशल मीडिया पर असम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जताई और इस तरह के व्यवहार को गलत ठहराया।

    उन्होंने यह भी कहा कि वे पहले भी कई सांस्कृतिक और पारंपरिक विषयों पर स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी साझा करती रही हैं, जिनमें योग और सूर्य नमस्कार जैसे विषय शामिल हैं। ऐसे विषयों पर कभी इस प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं मिली, जिससे उन्होंने यह सवाल उठाया कि अलग अलग परिस्थितियों में लोगों की प्रतिक्रिया इतनी भिन्न क्यों हो जाती है।

    नमिता थापर ने इस पूरे मामले को महिलाओं के प्रति ऑनलाइन व्यवहार से भी जोड़ा और कहा कि समाज में महिलाओं के सम्मान की बात तो की जाती है, लेकिन वास्तविकता में कई बार उन्हें अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन उसे व्यक्त करने का तरीका सभ्य और मर्यादित होना चाहिए।

    अपने बयान में उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान को लेकर भी स्पष्ट रुख अपनाया और कहा कि वे अपने विश्वासों पर गर्व करती हैं। साथ ही उन्होंने यह दोहराया कि उनका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी साझा करना था, न कि किसी धर्म या समुदाय को लेकर कोई टिप्पणी करना।

    यह पूरा घटनाक्रम सोशल मीडिया पर बढ़ती असहिष्णुता और संवाद के स्तर को लेकर गंभीर चिंताओं को उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ साथ जिम्मेदारी और सम्मान बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है, ताकि स्वस्थ और संतुलित संवाद संभव हो सके।

  • राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दी शुभकामनाएं

    राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दी शुभकामनाएं


    भोपाल । राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि स्वस्थ नागरिक ही एक समृद्ध और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला होते हैं और इस दिशा में टीकाकरण की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

    मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि माताओं और शिशुओं का समय पर टीकाकरण सुनिश्चित करना समाज और देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक है। टीकाकरण न केवल बच्चों को गंभीर बीमारियों से बचाता है बल्कि समाज में स्वास्थ्य सुरक्षा का मजबूत आधार भी तैयार करता है।

    डॉ. यादव ने कहा कि सरकार द्वारा संचालित टीकाकरण कार्यक्रमों के माध्यम से प्रदेश में मातृ और शिशु स्वास्थ्य को मजबूत बनाने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे टीकाकरण कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाएं और अपने बच्चों का निर्धारित समय पर टीकाकरण अवश्य कराएं।

    मुख्यमंत्री ने टीकाकरण अभियान को सफल बनाने में योगदान देने वाले स्वास्थ्यकर्मियों आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं स्वयंसेवी संस्थाओं और सभी संबंधित टीमों के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस की शुभकामनाएं भी दीं।

  • होटल में साइलेंट अटैक से मालिक की मौत: थाली में सब्जी रखते ही गिरा, भाई की CPR भी काम नहीं आई

    होटल में साइलेंट अटैक से मालिक की मौत: थाली में सब्जी रखते ही गिरा, भाई की CPR भी काम नहीं आई


    नई दिल्ली। नर्मदापुरम के ग्वालटोली रेलवे स्टेशन के पास स्थित एक होटल में गुरुवार रात एक दर्दनाक हादसा हुआ, जिसमें होटल संचालक अशोक नवलानी (60) का साइलेंट अटैक से निधन हो गया। घटना उस समय हुई जब अशोक नवलानी ग्राहकों को खाना परोस रहे थे। जैसे ही उन्होंने एक थाली में सब्जी रखी, अचानक वह जमीन पर गिर पड़े। घटना का सीसीटीवी वीडियो शनिवार सुबह सामने आया, जिसमें साफ दिखाई दे रहा है कि गिरते ही आसपास के लोग समझ नहीं पाए कि क्या हुआ। कुछ ही पलों में अशोक के भाई पप्पन नवलानी और अन्य कर्मचारी दौड़कर उन्हें उठाने पहुंचे और तुरंत सीपीआर देने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
     
    अशोक नवलानी गोकुलपुरी की सिंधी कॉलोनी के निवासी थे और अपने भाई पप्पन नवलानी के साथ मिलकर ‘चाचा-भतीजा’ नाम से होटल चला रहे थे। पप्पन ने बताया कि गुरुवार रात दोनों दुकान पर ही थे। वह सब्जी बना रहे थे और अशोक ग्राहकों को टेबल पर खाना परोस रहे थे। थाली में सब्जी रखते ही अचानक गिरने के बाद उन्होंने सीपीआर की कोशिश की, लेकिन अशोक अचेत हो गए। डॉक्टरों ने अस्पताल पहुंचते ही उन्हें मृत घोषित कर दिया।

    पप्पन ने आगे बताया कि अशोक परिवार में सबसे बड़े भाई थे, उनके छह भाई-बहन हैं, और उनकी एक बेटी की शादी हो चुकी है। पिछले तीन साल में गर्मियों में उन्हें दो-तीन बार हल्की घबराहट और बीपी कम होने की समस्या हुई थी, लेकिन हार्ट की कोई गंभीर बीमारी नहीं थी।

    नर्मदापुरम जिला अस्पताल के क्लिनिकल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. सुनील जैन ने कहा कि आजकल असीमित दिनचर्या, तनाव, बिगड़ा खानपान और व्यायाम की कमी से हार्ट अटैक की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। उन्होंने सभी से कहा कि स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें, नियमित रूटीन चेकअप कराएं, 7-8 घंटे की नींद लें और रोजाना व्यायाम या योग से तनाव कम करें।

    होटल में हुए इस हादसे ने स्थानीय लोगों और परिवार में शोक की लहर फैला दी है। अशोक नवलानी का निधन इस बात का भी संदेश देता है कि व्यस्त दिनचर्या और स्वास्थ्य पर ध्यान न देना गंभीर परिणाम ला सकता है।

    इस घटना की वजह से लोगों में चेतना बढ़ी है कि कार्यस्थल पर भी स्वास्थ्य और आराम को महत्व देना जरूरी है, खासकर व्यवसायिक जीवन में तनाव और थकान के बीच।