Tag: health crisis
-

मंडला में स्वास्थ्य सिस्टम की पोल खुली, हाईकोर्ट में पहुंचा मामला-प्रसूति वार्ड में फर्श पर लेटती महिलाएं
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के Jabalpur स्थित हाईकोर्ट में मंडला जिला अस्पताल की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि आदिवासी बहुल जिले में चिकित्सा सुविधाएं बेहद कमजोर हैं और मरीजों को बुनियादी इलाज तक नहीं मिल पा रहा है।याचिकाकर्ता के अनुसार मंडला जिले की आबादी करीब 10 लाख है, जिसमें अधिकांश लोग ग्रामीण और आदिवासी समुदाय से आते हैं, लेकिन जिला अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। 42 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 17 डॉक्टर ही वर्तमान में तैनात हैं।याचिका में यह भी बताया गया है कि कई अहम विशेषज्ञ पद वर्षों से खाली पड़े हैं। कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण गंभीर मरीजों को इलाज के लिए जबलपुर या नागपुर रेफर करना पड़ता है। रेडियोलॉजिस्ट न होने से सोनोग्राफी जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं भी बाधित हैं, जिससे मरीजों को निजी केंद्रों पर महंगे परीक्षण कराने पड़ते हैं।सबसे चिंताजनक स्थिति प्रसूति वार्ड की बताई गई है, जहां बिस्तरों की कमी के कारण गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को फर्श पर लेटने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसे याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है।मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश Sanjeev Sachdeva और न्यायमूर्ति विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग और मंडला सीएमएचओ को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने का आदेश दिया है। अगली सुनवाई जून में होगी।याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि स्थिति सुधारने के लिए कई बार प्रदर्शन और ज्ञापन दिए गए, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि प्रसूति वार्ड में तत्काल अतिरिक्त बिस्तरों की व्यवस्था की जाए, विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति समयबद्ध तरीके से हो और स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए। फिलहाल यह मामला न सिर्फ मंडला की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है, बल्कि पूरे राज्य की ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को भी उजागर कर रहा है। -

हरियाणा के छायंसा गांव में 15 दिनों में 12 मौतों से हड़कंप, स्वास्थ्य विभाग ने गांव में लगाया डेरा
नई दिल्ली । हरियाणा के पलवल जिले के छायंसा गांव में पिछले 15 दिनों में 12 मौतों ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया है। मृतकों में पांच स्कूली बच्चे भी शामिल हैं। लगातार हो रही मौतों ने गांववासियों को दहशत में डाल दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि करीब 15 दिन पहले तीन लोगों की तबीयत बिगड़ी और उनकी मौत हो गई थी। इसके बाद से मौतों का सिलसिला जारी है।ग्रामीणों के मुताबिक गांव में लगभग हर घर में मरीज हैं और कई की हालत गंभीर है। परिजन अस्पतालों के चक्कर काटकर भी अपने बीमार परिवारजनों को ठीक नहीं कर पा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने तुरंत कदम उठाते हुए गांव में टीम डेरा डाला है। विभाग की टीम लगातार लोगों की जांच कर रही है और ब्लड सैंपल जुटा रही है। अब तक 300 ब्लड सैंपल जांच के लिए भेजे जा चुके हैं जबकि 400 से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है।
स्वास्थ्य विभाग की डॉ. सतिंदर वशिष्ठ के मुताबिक मृतकों के मेडिकल रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट में 4 मामलों में हेपेटाइटिस B और C का पता चला जबकि 3 मामलों में मल्टीपल ऑर्गन फेलियर और लिवर इंफेक्शन मिले। दो मरीजों को इलाज के लिए पलवल सिविल अस्पताल में भर्ती किया गया है।
गांव मुस्लिम बाहुल्य है और करीब 5 हजार आबादी वाले इस गांव में पानी की सप्लाई तीन अलग-अलग स्रोतों से होती है। कुछ घरों में सरकारी पानी आता है जबकि कुछ घरों में अंडरग्राउंड टैंक बनाए गए हैं जिनमें पानी भरने के लिए टैंकर मंगाए जाते हैं। हथीन शहर से आरओ प्लांट का पानी लेने वाले भी हैं। अब तक लिए गए 107 पानी के सैंपलों में 23 फेल पाए गए हैं जिनमें बैक्टीरिया की वृद्धि और क्लोरीन की कमी देखी गई है।
स्वास्थ्य विभाग की टीम ने गांव में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने के लिए ओपीडी लगाई है और घर-घर जाकर लोगों की जांच कर रही है। डॉ. वशिष्ठ ने बताया कि मृतकों के परिवारजनों और आसपास के लोगों के सैंपल भी लिए गए हैं ताकि बीमारी फैलने से रोकी जा सके। ग्रामीणों की मुख्य चिंता यह है कि यह हेपेटाइटिस B और C जैसी बीमारियां जल्द नियंत्रण में आएं और मौतों का सिलसिला थमे। यह स्थिति गांववासियों और अधिकारियों दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण बनी हुई है और स्वास्थ्य विभाग लगातार निगरानी और उपचार की प्रक्रिया में लगा हुआ है।
-

इंदौर में दूषित पानी से मौतों का खुलासा: कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर साधा निशाना
नई दिल्ली। इंदौर में दूषित पेयजल के कारण कम से कम 18 लोगों की मौत हुई है। कांग्रेस मीडिया एंड कम्युनिकेशन प्रमुख पवन खेड़ा ने इस घटना को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है और कहा कि यह केवल स्थानीय प्रशासन की नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और मेयर तक की जवाबदेही है।“हर घर जल” की बजाय “हर घर मल” योजना
खेड़ा ने बताया कि इंदौर को स्वच्छ भारत अभियान में कई बार “नंबर-वन शहर” का दर्जा मिला, लेकिन आज वही शहर गंदे पानी और दूषित स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से मौतों का सामना कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि “हर घर जल योजना” के लिए मंजूर पाइपलाइन का काम जुलाई 2022 में शुरू होना था, लेकिन केवल ठेके की फाइनलाइजेशन का इंतजार किया गया।लोगों की जान दांव पर लगाई गई, जबकि अधिकारियों और सरकार ने काम रोक रखा था।प्रशासन और राजनीतिक जिम्मेदारी पर सवाल
खेड़ा ने कहा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव गाने गा रहे हैं, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय पत्रकारों से बदसलूकी कर रहे हैं, और मेयर अलग ही बयान दे रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी अराजकता का खामियाजा छोटे बच्चे और आम लोग भुगत रहे हैं।स्वास्थ्य संकट और राष्ट्रीय पैमाना
पानी, हवा और दवाइयों में मिलावट एक व्यापक समस्या बन गई है।
गुजरात के गांधीनगर और दिल्ली में भी टाइफाइड और दूषित पानी के मामले सामने आए हैं।
लगभग 70% पानी देश में दूषित हो चुका है।हैजा की पुष्टि और नोटिफिकेशन का सवाल
खेड़ा ने सीधे सवाल किया, क्या पानी और प्रभावित नागरिकों के स्टूल सैंपल की कल्चर जांच हुई?
अगर हैजा का बैक्टीरिया मिला, तो क्या इसे आईडीएसपी के तहत नोटिफाई किया गया?
क्या इस मामले की जानकारी केंद्र सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय और WHO को दी गई?वित्तीय अनियमितताएं
वर्ष 2003 में एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) से 200 मिलियन डॉलर का लोन भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के लिए आया।सवाल उठाया गया कि यह पैसा कहाँ गया और क्या योजनाओं को पूरा करने में इसका सही इस्तेमाल हुआ।
खेड़ा ने कहा, 18 मौतें किसी हादसे का नतीजा नहीं हैं, यह शासन की विफलता और भ्रष्टाचार का परिणाम हैं। जनता जानना चाहती है कि क्या कोई जिम्मेदारी लेगा या यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा। -

इंदौर दूषित पानी से न केवल जानें गईं. छोटे कारोबारियों की रोजी-रोटी भी प्रभावित
इंदौर । इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी के कारण अब तक 18 लोगों की जान जा चुकी है. और सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। वहीं. इस भयावह स्थिति का असर केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं. बल्कि यहां के छोटे कारोबारों पर भी गहरा पड़ा है। दूषित पानी के कारण लोग बाहर का खाना खाने से बचने लगे हैं. जिसके कारण फास्ट फूड. चाय-नाश्ता और ठेले-खोमचों पर ग्राहकी पूरी तरह से ठप हो गई है।राजवीर सिंह कुशवाह. जो भागीरथपुरा में बर्गर. पिज्जा और चायनीज आइटम बेचते थे. बताते हैं कि नए साल की छुट्टियों में उनके कारोबार की सबसे ज्यादा कमाई होती थी। 31 दिसंबर और 1 जनवरी के बीच उनका बिजनेस बहुत अच्छा चलता था. लेकिन इस बार 28 दिसंबर से 5 जनवरी तक दुकान पूरी तरह बंद रही। “हमारे फास्ट फूड आइटम्स में पानी का इस्तेमाल होता है. और खराब पानी के कारण हमें दुकान बंद रखनी पड़ी। अब दुकान तो खोली है. लेकिन ग्राहक बिल्कुल नहीं आ रहेउन्होंने कहा।
इसी तरह. महेश हार्डिया. जो पानीपुरी और चाट बेचते हैं. बताते हैं कि 8-10 दिनों से उनका ठेला बंद है। पानी की गंदगी के कारण प्रशासन ने ठेला बंद करने का आदेश दिया था। “हम रोज 700-800 रुपये कमाते थे. लेकिन अब काम नहीं हो रहा। अब तक जितनी सेविंग्स हैं. उससे काम चल रहा है। जब तक पानी की समस्या ठीक नहीं होती. काम में सुधार की उम्मीद कम हैमहेश ने कहा।नाश्ते की दुकान चलाने वाली सीमा सिकरवार भी परेशान हैं। दूषित पानी के कारण ग्राहक बहुत कम हो गए हैं। पहले की तरह ज्यादा ग्राहक नहीं आ रहे हैं। अब बोरिंग का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा समस्या हो रही है सीमा ने बताया।
दूसरी ओर. इस संकट का असर अब परिवारों पर भी पड़ने लगा है। रोशनी कोरी. जो कपड़े की दुकान पर काम करती थीं. ने बताया कि उनके परिवार ने भागीरथपुरा छोड़ने का फैसला किया है।मेरे बेटे की तबीयत खराब हो गई थी. अब ठीक हो गया है. लेकिन इस गंदे पानी के कारण हम सागर लौटने का सोच रहे हैं। हम यहां 8-9 महीने से किराए पर रह रहे थे. लेकिन अब हमें यहां से पलायन करना पड़ रहा हैउन्होंने कहा।इस क्षेत्र में दूषित पानी का असर गहरा है और इससे छोटे व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनका कहना है कि जब तक पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं होती. उनका कारोबार ठीक से नहीं चल पाएगा।
वहीं. कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर लगातार हालात का जायजा ले रहे हैं और पानी की सप्लाई को सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन जब तक लोग भरोसा नहीं करते. व्यापारियों की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही है।इंदौर में हुई इस जलसंकट की घटना ने ना सिर्फ स्वास्थ्य को प्रभावित किया है. बल्कि रोजी-रोटी के संकट को भी जन्म दिया है। इस गंभीर स्थिति में छोटे कारोबारी अपनी दिक्कतें साझा कर रहे हैं. और प्रशासन से जल्द सुधार की उम्मीद लगाए बैठे हैं।इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी के कारण अब तक 18 लोगों की जान जा चुकी है. और सैकड़ों लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। वहीं. इस भयावह स्थिति का असर केवल स्वास्थ्य पर ही नहीं. बल्कि यहां के छोटे कारोबारों पर भी गहरा पड़ा है।दूषित पानी के कारण लोग बाहर का खाना खाने से बचने लगे हैं. जिसके कारण फास्ट फूड. चाय-नाश्ता और ठेले-खोमचों पर ग्राहकी पूरी तरह से ठप हो गई है।राजवीर सिंह कुशवाह. जो भागीरथपुरा में बर्गर. पिज्जा और चायनीज आइटम बेचते थे. बताते हैं कि नए साल की छुट्टियों में उनके कारोबार की सबसे ज्यादा कमाई होती थी। 31 दिसंबर और 1 जनवरी के बीच उनका बिजनेस बहुत अच्छा चलता था. लेकिन इस बार 28 दिसंबर से 5 जनवरी तक दुकान पूरी तरह बंद रही। “हमारे फास्ट फूड आइटम्स में पानी का इस्तेमाल होता है. और खराब पानी के कारण हमें दुकान बंद रखनी पड़ी। अब दुकान तो खोली है. लेकिन ग्राहक बिल्कुल नहीं आ रहेउन्होंने कहा।इसी तरह. महेश हार्डिया. जो पानीपुरी और चाट बेचते हैं. बताते हैं कि 8-10 दिनों से उनका ठेला बंद है। पानी की गंदगी के कारण प्रशासन ने ठेला बंद करने का आदेश दिया था। हम रोज 700-800 रुपये कमाते थे. लेकिन अब काम नहीं हो रहा। अब तक जितनी सेविंग्स हैं. उससे काम चल रहा है। जब तक पानी की समस्या ठीक नहीं होती. काम में सुधार की उम्मीद कम हैमहेश ने कहा।नाश्ते की दुकान चलाने वाली सीमा सिकरवार भी परेशान हैं।दूषित पानी के कारण ग्राहक बहुत कम हो गए हैं। पहले की तरह ज्यादा ग्राहक नहीं आ रहे हैं। अब बोरिंग का पानी इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा समस्या हो रही है सीमा ने बताया।दूसरी ओर. इस संकट का असर अब परिवारों पर भी पड़ने लगा है।रोशनी कोरी. जो कपड़े की दुकान पर काम करती थीं. ने बताया कि उनके परिवार ने भागीरथपुरा छोड़ने का फैसला किया है। मेरे बेटे की तबीयत खराब हो गई थी. अब ठीक हो गया है. लेकिन इस गंदे पानी के कारण हम सागर लौटने का सोच रहे हैं। हम यहां 8-9 महीने से किराए पर रह रहे थे. लेकिन अब हमें यहां से पलायन करना पड़ रहा हैउन्होंने कहा।इस क्षेत्र में दूषित पानी का असर गहरा है और इससे छोटे व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनका कहना है कि जब तक पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं होती. उनका कारोबार ठीक से नहीं चल पाएगा।वहीं. कलेक्टर और नगर निगम कमिश्नर लगातार हालात का जायजा ले रहे हैं और पानी की सप्लाई को सुधारने के प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन जब तक लोग भरोसा नहीं करते. व्यापारियों की स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही है। इंदौर में हुई इस जलसंकट की घटना ने ना सिर्फ स्वास्थ्य को प्रभावित किया है. बल्कि रोजी-रोटी के संकट को भी जन्म दिया है। इस गंभीर स्थिति में छोटे कारोबारी अपनी दिक्कतें साझा कर रहे हैं. और प्रशासन से जल्द सुधार की उम्मीद लगाए बैठे हैं। -

इंदौर में दूषित पानी से मौतों का मामला हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी दोषियों पर कार्रवाई के संकेत
इंदौर । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने मंगलवार को दूषित पेयजल के कारण होने वाली मौतों और बीमारियों को लेकर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने यह कहा कि इस घटना ने इंदौर की छवि को बुरी तरह से नुकसान पहुंचाया है। जो शहर देश का सबसे स्वच्छ माना जाता था आज वही दूषित पानी के कारण पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वच्छ पेयजल सिर्फ इंदौर के लिए नहीं बल्कि पूरे राज्य का मौलिक अधिकार है और इसे किसी भी स्थिति में नकारा नहीं जा सकता।कोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को निर्देश दिया कि इस मामले में जवाब दाखिल कर स्थिति की रिपोर्ट पेश करें। इसके साथ ही यह भी कहा कि अगर भविष्य में दोषी अधिकारियों के खिलाफ सिविल और क्रिमिनल जिम्मेदारी तय करनी पड़ी तो अदालत इसमें कोई संकोच नहीं करेगी। यदि पीड़ितों को मुआवजा कम दिया गया है तो अदालत उचित निर्देश भी जारी करेगी।
उधर कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की अगुवाई में पार्टी कार्यकर्ता मंगलवार को भागीरथपुरा पहुंचे। पुलिस की तगड़ी सुरक्षा के बीच कांग्रेसी नेता वहां मृतकों के परिजनों से मिले और सरकार के खिलाफ अपना आक्रोश व्यक्त किया। पटवारी ने इंदौर के प्रभारी मंत्री महापौर और अन्य नेताओं से इस्तीफा भी मांगा।
अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है और 110 से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हैं। बीमार होने वाले 421 लोगों में से 311 मरीजों को अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी है जबकि 15 मरीज आईसीयू में हैं। अस्पतालों में उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए हैं।
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने पहले से की गई शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया जिससे यह संकट उत्पन्न हुआ। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट में बताया कि 2022 में महापौर द्वारा नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव पारित किया गया था लेकिन फंड न मिलने के कारण इस काम में देरी हो रही है। इसके अलावा 2017-18 में किए गए पानी के 60 सैंपल टेस्ट में से 59 पीने योग्य नहीं पाए गए थे लेकिन इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को 15 जनवरी को एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पेयजल का अधिकार शामिल है और इसे नज़रअंदाज़ करना गंभीर मामला है।
अगली सुनवाई 15 जनवरी को होगी जिसमें मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं। इस मामले से जुड़े मुद्दों को सात श्रेणियों में बांटा गया है जिनमें प्रभावित लोगों के लिए तत्काल निर्देश सुधारात्मक उपाय जिम्मेदारी तय करना अनुशासनात्मक कार्रवाई मुआवजा स्थानीय निकायों को निर्देश और जन-जागरूकता और पारदर्शिता शामिल हैं।
-

भोपाल के जेपी अस्पताल में मरीज को दी फफूंद लगी दवा सीनियर डॉक्टर नदारद ओपीडी में इंटर्न डॉक्टरों के भरोसे इलाज
भोपाल । भोपाल के जेपी अस्पताल जिला चिकित्सालय में एक गंभीर घटना सामने आई है जहां शुक्रवार शाम एक मरीज को फफूंद लगी दवा दी गई। यह मामला दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है और अस्पताल प्रशासन की लापरवाही को उजागर करता है। मरीज ने दवा लेने से पहले उसे देखा जिससे किसी बड़ी दुर्घटना से बचा जा सका। यदि मरीज ने दवा की स्थिति का ध्यान नहीं किया होता तो यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्या बन सकती थी।मरीज सतीष सेन ने बताया कि वे शुक्रवार शाम करीब पांच बजे पैर में फ्रैक्चर की आशंका के चलते जेपी अस्पताल की आर्थोपेडिक ओपीडी में पहुंचे थे। ओपीडी में उस वक्त कोई सीनियर डॉक्टर मौजूद नहीं थे और इंटर्न डॉक्टरों ने उनका परीक्षण किया। इसके बाद मरीज को एक्स-रे की सिफारिश की गई और दर्द की दवा लिखी गई जो बाद में फफूंद लगी हुई मिली।
इस घटना ने अस्पताल में चिकित्सा गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मरीज को अगर दवा की स्थिति का पता न चलता तो इसे स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा माना जा सकता था। इसके अलावा सीनियर डॉक्टरों की अनुपस्थिति ने भी ओपीडी में इलाज के स्तर को प्रभावित किया।
इस मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों और स्वास्थ्य संगठनों नेप्रशासन से कार्रवाई की मांग की है ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही से बचा जासके और मरीजों को बेहतर इलाज और दवाइयां मिल सकें। अस्पताल प्रशासन को इस गंभीर मुद्दे पर तुरंत कदम उठाने चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि मरीजों को गुणवत्ता वाली दवाइयां और इलाज मिले।
-

इंदौर दूषित पानी कांड: 5 महीने के मासूम अव्यान की मौत, 1,100 से अधिक लोग बीमार
इंदौर। मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पीने के पानी से फैल रही गंभीर बीमारी ने एक परिवार की खुशियाँ छीन लीं। पांच महीने के मासूम अव्यान साहू की मौत दस्त और उल्टी से हुई। बच्चे के परिवार ने बताया कि घर में गाढ़े दूध में नगर निगम के नल का पानी मिलाकर पिलाया गया था, लेकिन वही पानी जहरीला साबित हुआ। स्थानीय निवासियों और अधिकारियों के अनुसार, दूषित पानी ने पूरे इलाके में व्यापक स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया।अव्यान का परिवार पिछले 10 सालों से उसकी उपस्थिति का इंतजार कर रहा था, लेकिन यह खुशी मातम में बदल गई। पिता सुनील साहू ने मीडिया से बताया कि बच्चे को उल्टी और दस्त की शिकायत शुरू हुई थी। चिकित्सक से परामर्श के बाद घर पर दवाइयां दी जा रही थीं, लेकिन हालत बिगड़ती चली गई। उन्होंने कहा कि दूध गाढ़ा था, इसलिए वे इसे नगर निगम के नल के पानी में मिलाकर पिला रहे थे, लेकिन वही पानी उनके बच्चे के लिए जानलेवा साबित हुआ।
सरकारी आंकड़ों और स्थानीय बयानों के अनुसार, अब तक भागीरथपुरा में दूषित पानी के कारण कम-से-कम सात लोगों की मौत हो चुकी है और 1,100 से अधिक लोग पेट और दस्त जैसी बीमारियों से प्रभावित हैं। कई गंभीर मरीज शहर के विभिन्न सरकारी और निजी अस्पतालों में भर्ती हैं।प्रारंभिक जांच में पता चला है कि मुख्य जलापूर्ति लाइन में लीकेज के कारण नालों का गंदा पानी पीने के पानी की पाइपलाइन में मिला। नगर निगम के कर्मचारियों ने मंगलवार देर शाम इस लीकेज का पता लगाया। फिलहाल प्रभावित क्षेत्रों में आवश्यक एहतियाती उपाय किए जा रहे हैं ताकि स्थिति और अधिक गंभीर न हो।
इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने अब तक सात मौतों की पुष्टि की है, जबकि स्थानीय लोग यह दावा कर रहे हैं कि नौ लोगों की मौत दूषित पानी की वजह से हुई। अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और जांच जारी है।स्थानीय निवासियों ने बताया कि इलाके में गंदा पानी नल से बहते देखा गया है और पहले भी अस्वस्थ जल आपूर्ति पर शिकायतें दर्ज कराई गई थीं। लेकिन यह समस्या पिछले एक सप्ताह में जानलेवा रूप ले चुकी है। प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्रों में सर्वे और जांच अभियान शुरू किया है, और प्राथमिक उपचार तथा अस्पतालों में भर्ती की सुविधा प्रदान की जा रही है।
यह मामला इंदौर जैसे “सबसे स्वच्छ शहर” के दावे पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। जल स्रोत की सुरक्षा और जलापूर्ति अवसंरचना की निगरानी में खामियों ने स्थानीय निवासियों को भारी कीमत चुकाई। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा कि दूषित पानी के फैलाव को रोकने, नियमित जांच करने और सार्वजनिक जल आपूर्ति की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाना आवश्यक हैअदालत और उच्च प्रशासन ने भी इस स्थिति पर संज्ञान लिया है। व्यापक जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए रिपोर्ट मांगी गई है। पीड़ित परिवारों को मुआवजा और चिकित्सा सहायता देने की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है।