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  • सिंगरौली के बसौड़ा गांव में सड़क का अभाव, बीमार आदिवासी को कुर्सी पर बैठाकर अस्पताल पहुंचाने को मजबूर परिजन

    सिंगरौली के बसौड़ा गांव में सड़क का अभाव, बीमार आदिवासी को कुर्सी पर बैठाकर अस्पताल पहुंचाने को मजबूर परिजन

    मध्य प्रदेश: के सिंगरौली जिले में सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव का मामला सामने आया है। देवसर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत जोगियानी के बसौड़ा गांव में रहने वाले 25 आदिवासी परिवारों को आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। गांव तक सड़क नहीं होने के कारण बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाना भी चुनौती बन जाता है। हाल ही में एक ग्रामीण की तबीयत बिगड़ने पर परिजनों को उन्हें कुर्सी पर बैठाकर सड़क तक ले जाना पड़ा। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद गांव में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

    जानकारी के मुताबिक, बसौड़ा गांव के निवासी ईश्वर सिंह गोंड की तबीयत रात के समय अचानक बिगड़ गई। उन्हें उल्टी और दस्त की शिकायत हुई, जिसके बाद उनकी हालत गंभीर हो गई। ऐसे में परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन्हें जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाने की थी। गांव में सड़क नहीं होने के कारण सामान्य वाहन से घर तक पहुंचना संभव नहीं था। मजबूरी में परिजनों ने उन्हें कुर्सी पर बैठाया और उठाकर सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

    इस घटना ने ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने के लिए सड़क की अहमियत को सामने रखा है। सड़क उपलब्ध नहीं होने पर एंबुलेंस और दूसरे वाहनों का गांव तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। ऐसी स्थिति में मरीज को अस्पताल ले जाने में अतिरिक्त समय और मेहनत लगती है। आपातकाल में यह परेशानी और बढ़ जाती है, क्योंकि मरीज को जल्द चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना जरूरी होता है।

    बसौड़ा गांव के ग्रामीणों के मुताबिक, सड़क निर्माण की मांग लंबे समय से की जा रही है। इसके लिए विधायक से लेकर जिला प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों तक आवेदन दिए गए हैं। ग्रामीणों ने कलेक्टर, एसडीएम, तहसीलदार और पंचायत स्तर पर भी अपनी समस्या पहुंचाने की बात कही है। उनके अनुसार, सड़क निर्माण के लिए प्रस्ताव भी भेजे गए, लेकिन अब तक समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।

    गांव के 25 आदिवासी परिवारों के लिए सड़क का अभाव केवल आवागमन की परेशानी नहीं है, बल्कि इसका असर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी पड़ता है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी मांग पर संबंधित अधिकारी ध्यान देंगे और गांव तक सड़क पहुंचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

    इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि गांव तक सड़क नहीं होने की समस्या का समाधान कब होगा। ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी मांग अधिकारियों तक पहुंचा रहे हैं, लेकिन उन्हें अब तक राहत नहीं मिली है। बीमार व्यक्ति को कुर्सी पर बैठाकर सड़क तक ले जाने की घटना ने उनकी परेशानी को उजागर किया है।

    ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क बेहतर होने से लोगों को अस्पताल, बाजार और अन्य जरूरी सेवाओं तक पहुंचने में मदद मिलती है। बसौड़ा में सामने आई स्थिति बताती है कि सड़क निर्माण की मांग स्थानीय लोगों के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में सड़क निर्माण की स्वीकृति, बजट या काम शुरू होने की कोई निश्चित तारीख सामने नहीं आई है।

    फिलहाल, बसौड़ा के ग्रामीणों को सड़क बनने का इंतजार है। अब देखना होगा कि संबंधित प्रशासन उनकी मांग पर कब कार्रवाई करता है और गांव के परिवारों को इस समस्या से राहत मिल पाती है या नहीं।

  • मोहन सरकार ने मध्य प्रदेश में 1.24 लाख पदों को दी मंजूरी, ऊर्जा और स्वास्थ्य विभाग में सबसे ज्यादा पद

    मोहन सरकार ने मध्य प्रदेश में 1.24 लाख पदों को दी मंजूरी, ऊर्जा और स्वास्थ्य विभाग में सबसे ज्यादा पद

    मध्य प्रदेश: में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए राज्य सरकार ने विभिन्न विभागों में बड़े पैमाने पर पदों को मंजूरी दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार ने कैबिनेट के माध्यम से कुल 1.24 लाख पद स्वीकृत किए हैं। इनमें ऊर्जा, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, महिला एवं बाल विकास, गृह और परिवहन विभाग सहित अन्य पद शामिल हैं। इस फैसले से प्रदेश में सरकारी क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने की योजना सामने आई है।

    स्वीकृत पदों की संख्या के लिहाज से ऊर्जा और स्वास्थ्य विभाग सबसे आगे हैं। हालांकि, पदों को मंजूरी मिलने का अर्थ यह नहीं है कि सभी पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया एक साथ शुरू हो जाएगी। उम्मीदवारों को संबंधित विभागों की आधिकारिक भर्ती अधिसूचनाओं और नियुक्ति कार्यक्रम का इंतजार करना होगा।

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, ऊर्जा विभाग में 52 हजार पदों को मंजूरी दी गई है। वहीं, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में 47 हजार पद स्वीकृत किए गए हैं। इन दोनों विभागों में पदों की संख्या सबसे अधिक है। भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ने पर इन क्षेत्रों में विभिन्न योग्यताओं वाले अभ्यर्थियों के लिए अवसर सामने आ सकते हैं। हालांकि, पदों के अनुसार शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और अन्य पात्रता शर्तों की जानकारी संबंधित भर्ती विज्ञापन जारी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

    महिला एवं बाल विकास विभाग में 13,200 पदों को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा गृह विभाग में 9,662 और परिवहन विभाग में 1,800 पद स्वीकृत किए गए हैं। राज्य में तीन नए जिलों के लिए भी 1,240 पदों को मंजूरी मिली है। इन विभागों और नए जिलों से जुड़े पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया किस चरण में और कब शुरू होगी, इसकी जानकारी आगे जारी होने वाले सरकारी आदेशों और भर्ती सूचनाओं से मिलेगी।

    पुलिस में नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए भी भर्ती बोर्ड से जुड़ा प्रस्ताव महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश में पुलिस भर्ती के लिए अलग बोर्ड गठित करने की योजना है। फिलहाल इसका गठन प्रस्तावित है और प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार है। बोर्ड के गठन के बाद पुलिस भर्ती से संबंधित व्यवस्था को स्वतंत्र रूप से संचालित करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, भर्ती बोर्ड के गठन, पदों की संख्या और आवेदन की तारीख को लेकर आधिकारिक घोषणा के बिना किसी निश्चित समयसीमा का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।

    सरकार की योजना में नियमित नियुक्तियों के साथ संविदा और आउटसोर्स पद भी शामिल हैं। इसलिए मंजूर किए गए 1.24 लाख पदों को एक साथ निकलने वाली सरकारी नौकरियों की संख्या समझना सही नहीं होगा। स्वीकृत पदों में से किस विभाग में कितनी नियुक्तियां होंगी और भर्ती किस चरण में आगे बढ़ेगी, यह संबंधित विभागों की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

    सरकारी नौकरी के इच्छुक उम्मीदवारों के लिए अब विभागवार भर्ती विज्ञापनों पर नजर रखना अहम होगा। आवेदन करने से पहले पद का विवरण, शैक्षणिक योग्यता, आयु सीमा, चयन प्रक्रिया और आवेदन की अंतिम तारीख की जानकारी आधिकारिक अधिसूचना से जांचनी चाहिए। पदों को मंजूरी मिलना भर्ती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन वास्तविक अवसरों की स्थिति भर्ती प्रक्रिया शुरू होने और अधिसूचनाएं जारी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • बूढ़े होते भारत में डिमेंशिया का बढ़ता खतरा, 2036 तक 1.69 करोड़ मरीज होने का अनुमान, राष्ट्रीय योजना की जरूरत

    बूढ़े होते भारत में डिमेंशिया का बढ़ता खतरा, 2036 तक 1.69 करोड़ मरीज होने का अनुमान, राष्ट्रीय योजना की जरूरत


    नई दिल्ली ।
    भारत में औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ने के साथ बुजुर्गों के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियां भी गंभीर होती जा रही हैं। कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह जैसी बीमारियों पर व्यापक चर्चा होती है, लेकिन डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश के बढ़ते खतरे और उससे प्रभावित लोगों की देखभाल पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। यह बीमारी केवल याददाश्त को प्रभावित नहीं करती, बल्कि व्यक्ति की पहचान, निर्णय लेने की क्षमता, स्वतंत्रता और रोजमर्रा के जीवन को भी मुश्किल बना सकती है। ऐसे में भारत में एक समर्पित राष्ट्रीय डिमेंशिया योजना की जरूरत महसूस की जा रही है।

    डिमेंशिया ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति की याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। अल्जाइमर रोग इसके प्रमुख कारणों में से एक है, लेकिन डिमेंशिया केवल अल्जाइमर तक सीमित नहीं है। गंभीर अवस्था में मरीज परिचित लोगों को पहचानने, दैनिक गतिविधियां करने और अपने आसपास हो रही घटनाओं को समझने में कठिनाई महसूस कर सकता है। इससे उसकी सुरक्षा के साथ गरिमा और स्वायत्तता बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बन जाता है।

    भारत में इस समस्या का वास्तविक आकार समझने के लिए उपलब्ध आंकड़े महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। वर्ष 2017 से 2020 के बीच जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित एक राष्ट्रीय अध्ययन में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में डिमेंशिया की व्यापकता 7.4 प्रतिशत आंकी गई थी। इस दर को जनसंख्या अनुमानों पर लागू करते हुए शोधकर्ताओं ने वर्ष 2016 में देश में लगभग 88 लाख मामले होने का अनुमान लगाया था। यदि यह दर अपरिवर्तित रहती है, तो वर्ष 2036 तक मरीजों की संख्या बढ़कर 1.69 करोड़ तक पहुंच सकती है।

    दुनिया के अन्य देशों में भी डिमेंशिया गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इंग्लैंड और वेल्स में वर्ष 2025 के दौरान यह सभी मौतों के 12.7 प्रतिशत मामलों से जुड़ा था। महिलाओं की मौतों में इसका हिस्सा 16.5 प्रतिशत बताया गया। अमेरिका में वर्ष 2024 के दौरान लगभग 10 प्रतिशत मौतों के लिए डिमेंशिया जिम्मेदार था। भारत में मृत्यु संबंधी आंकड़ों की विश्वसनीयता सीमित होने के कारण इस बीमारी के प्रभाव का सटीक आकलन करना कठिन है।

    चिकित्सा विज्ञान में प्रगति ने लोगों की उम्र बढ़ाने में मदद की है, लेकिन लंबा जीवन हमेशा बेहतर स्वास्थ्य की गारंटी नहीं देता। अल्जाइमर की कुछ नई दवाएं शुरुआती चरण में पहचाने गए चुनिंदा मरीजों में संज्ञानात्मक गिरावट की गति को कुछ हद तक धीमा कर सकती हैं। हालांकि, ये दवाएं डिमेंशिया का पूर्ण इलाज नहीं हैं और न ही गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त मस्तिष्क को पहले जैसी स्थिति में ला सकती हैं। इसलिए शुरुआती पहचान, नियमित देखभाल और परिवारों को सहायता उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।

    डिमेंशिया का प्रभाव मरीज तक सीमित नहीं रहता। गंभीर अवस्था में व्यक्ति को भोजन करने, नहाने, शौचालय जाने और सुरक्षित रहने के लिए लगातार मदद की जरूरत पड़ सकती है। भारत में यह जिम्मेदारी अक्सर पत्नी, बेटी या बहू पर आती है। लंबे समय तक देखभाल करने के कारण परिवार के सदस्यों के रोजगार, आर्थिक स्थिति और अपने स्वास्थ्य पर भी असर पड़ सकता है।

    शहरीकरण, रोजगार के लिए दूसरे शहरों या देशों में पलायन और छोटे होते परिवारों ने पारंपरिक संयुक्त परिवार व्यवस्था की देखभाल संबंधी क्षमता को भी प्रभावित किया है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार पेशेवर देखभाल और आवासीय सुविधाएं ले सकते हैं, लेकिन वहां भी मरीज की स्वतंत्रता और सम्मान बनाए रखना जरूरी है। सुरक्षा के नाम पर उसकी गतिविधियों पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाना नई समस्याएं पैदा कर सकता है।

    भारत सरकार ने वर्ष 2010 में बुजुर्गों की स्वास्थ्य देखभाल के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया था, लेकिन इसमें डिमेंशिया के लिए अलग समर्पित व्यवस्था नहीं है। केरल में डिमेंशिया से संबंधित विशेष सेवाएं शुरू की गई हैं, जबकि कर्नाटक में जिला स्तर पर 32 मस्तिष्क स्वास्थ्य क्लीनिक स्थापित किए गए हैं। इसके बावजूद वर्ष 2025 की एक समीक्षा में राष्ट्रीय डिमेंशिया योजना, समर्पित वित्तपोषण और मापने योग्य लक्ष्यों की कमी सामने आई।

    बढ़ती बुजुर्ग आबादी के बीच डिमेंशिया की चुनौती स्वास्थ्य सेवाओं, परिवारों और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण होती जा रही है। समय पर पहचान, प्रशिक्षित देखभालकर्मियों की उपलब्धता, परिवारों को आर्थिक और मानसिक सहयोग तथा मरीजों की गरिमा की रक्षा पर केंद्रित राष्ट्रीय योजना इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • मन की बात के 139वें एपिसोड में पीएम मोदी ने गिनाए देशवासियों के प्रयास, खेती से स्वास्थ्य और तकनीक तक की उपलब्धियां

    मन की बात के 139वें एपिसोड में पीएम मोदी ने गिनाए देशवासियों के प्रयास, खेती से स्वास्थ्य और तकनीक तक की उपलब्धियां

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के 139वें एपिसोड में देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों की ओर से किए जा रहे सामाजिक, पर्यावरणीय और तकनीकी प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 12 साल पहले विजयदशमी के अवसर पर शुरू हुआ यह कार्यक्रम लगातार आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में देशवासियों की भागीदारी को महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि उनके लिए मन की बात किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं है। यह आम लोगों के परिश्रम, साहस, समर्पण और सेवा भावना को समझने के साथ उनके योगदान को सम्मान देने का अवसर है।

    प्रधानमंत्री ने पंजाब में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि खेती विरासत मिशन नाम की संस्था पारंपरिक कृषि पद्धतियों और जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही है। पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास की प्राकृतिक खेती को आगे बढ़ाने के लिए नव-त्रिन्जन पहल शुरू की गई है। इसके तहत बिना रासायनिक पदार्थों के इस्तेमाल के जैविक कपास उगाई जाती है। प्राकृतिक रंगों वाली कपास से धागे और कपड़े तैयार करने में भी मदद मिलती है, जिससे उन्हें रंगने के लिए अलग से रसायनों की जरूरत कम होती है।

    उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में हेवल नदी को पुनर्जीवित करने के लिए स्थानीय लोगों और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों का भी जिक्र किया गया। प्रधानमंत्री के अनुसार, नदी में पानी कम होने लगा था और आसपास के प्राकृतिक जलस्रोत भी सूख रहे थे। इसके बाद नदी को बचाने के लिए अभियान चलाया गया। वर्षा जल को रोकने, जमीन में पानी के पुनर्भरण और बड़े पैमाने पर पौधारोपण जैसे उपाय अपनाए गए। इन प्रयासों से हेवल नदी को फिर से जीवन देने में मदद मिली और कई प्राकृतिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन का रास्ता भी खुला।

    प्रधानमंत्री ने स्थानीय उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की दिशा में हो रहे कामों को भी रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि बिहार के पूर्णिया का मखाना ग्रीस तक पहुंच रहा है, जबकि कर्नाटक के कलबुर्गी की अरहर दाल मालदीव भेजी जा रही है। महाराष्ट्र में आदिवासी समुदायों ने अपने उत्पादों की पैकेजिंग को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया है। शबरी नेचुरल्स के माध्यम से शहद, महुआ, चिरौंजी और बांस से बने उत्पाद बाजार में लाए जा रहे हैं। इनकी पैकेजिंग पर आदिवासी कला की झलक दिखाई देती है, जिसे जापान के प्रतिष्ठित गुड डिजाइन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।

    डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह और लक्षद्वीप के उदाहरण दिए। बाराटांग द्वीप में जारवा जनजाति के सात वर्षीय बच्चे ओहो-ताहाने को तेज बुखार और सांस लेने में परेशानी हुई थी। स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों ने ई-संजीवनी के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टरों से संपर्क किया। बच्चे को निमोनिया होने का पता चला और विशेषज्ञों की निगरानी में उसकी स्थिति में सुधार हुआ।

    इसी तरह, लक्षद्वीप के कल्पेनी में करीब 60 वर्षीय कुन्ही कोया की तबीयत अचानक बिगड़ने पर ई-संजीवनी के जरिए कवरत्ती में मौजूद अनुभवी डॉक्टरों से सलाह ली गई। डॉक्टरों ने स्थानीय चिकित्सा दल को मार्गदर्शन दिया, जिससे मरीज को राहत पहुंचाने में मदद मिली। इन उदाहरणों के जरिए दूरदराज के इलाकों में डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं की उपयोगिता सामने आई।

    प्रधानमंत्री ने आईआईटी मद्रास में स्थापित सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर का भी उल्लेख किया। इस केंद्र ने मस्तिष्क की उच्च रिजॉल्यूशन वाली डिजिटल त्रिआयामी तस्वीरें तैयार करने के लिए एक तकनीकी मंच विकसित किया है। इसका उद्देश्य आने वाले समय में 100 मानव मस्तिष्कों की 3D मैपिंग करना और उनका विस्तृत अध्ययन करना है। इस पहल को मस्तिष्क अनुसंधान और आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में प्रस्तुत किया गया।

  • पीयूष गोयल ने जर्मन कंपनियों को भारत में निवेश का दिया न्योता, विनिर्माण और नवाचार में बताए बड़े अवसर

    पीयूष गोयल ने जर्मन कंपनियों को भारत में निवेश का दिया न्योता, विनिर्माण और नवाचार में बताए बड़े अवसर


    नई दिल्ली ।
    केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन में प्रमुख उद्योगपतियों और कारोबारी नेताओं के साथ बैठकों के दौरान भारत में निवेश, विनिर्माण और नवाचार की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत जर्मन कंपनियों के लिए बड़े अवसर उपलब्ध कराता है। भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच विश्वास, प्रतिस्पर्धात्मकता और एक-दूसरे की पूरक क्षमताओं के आधार पर मजबूत आर्थिक साझेदारी विकसित करने की भी व्यापक संभावनाएं हैं। गोयल ने दोनों देशों के उद्योग जगत से सहयोग बढ़ाने और नए कारोबारी अवसर तलाशने का आह्वान किया।

    बर्लिन दौरे के दौरान गोयल ने फ्रेसेनियस ग्रुप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी माइकल सेन के साथ बैठक की। इसमें भारत के तेजी से बढ़ते स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र, गुणवत्तापूर्ण और किफायती चिकित्सा सेवाओं की बढ़ती मांग तथा मजबूत विनिर्माण क्षमताओं पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने विचार किया कि इन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर भारतीय बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय जरूरतों को भी पूरा किया जा सकता है।

    गोयल ने भारत की कुशल प्रतिभा और उत्पादन क्षमता को जर्मन कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया। उनके अनुसार, कंपनियां भारत में उपलब्ध योग्य कर्मचारियों और विश्वस्तरीय विनिर्माण सुविधाओं का लाभ उठाकर घरेलू तथा वैश्विक बाजारों में अपनी पहुंच मजबूत कर सकती हैं। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में बढ़ती मांग के कारण चिकित्सा उत्पादों और सेवाओं के विकास में भी सहयोग की संभावनाएं हैं।

    केंद्रीय मंत्री ने बेयर के फार्मास्यूटिकल्स प्रभाग के अध्यक्ष स्टीफन ओएलरिख के साथ भी चर्चा की। इस बैठक में भारत में बेयर की विस्तार योजनाओं और देश के विकसित होते स्वास्थ्य क्षेत्र में अधिक निवेश की संभावनाओं पर विचार किया गया। बातचीत में नवाचार और सहयोग को बढ़ावा देने से जुड़े अवसर भी शामिल रहे। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए इस क्षेत्र में निवेश और तकनीकी सहयोग को महत्वपूर्ण माना गया।

    गोयल ने बर्लिन में नॉफ ग्रुप के ग्लोबल जनरल पार्टनर मुरात अकयिलदिज के साथ बैठक में भी भाग लिया। इसमें भारत में कंपनी के विनिर्माण विस्तार, टिकाऊ निर्माण सामग्री और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़े विषयों पर चर्चा हुई। भारत में तेजी से हो रहे शहरीकरण और आर्थिक बदलावों के बीच निर्माण क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर जोर दिया गया। टिकाऊ निर्माण सामग्री और उत्पादन क्षमता बढ़ाने से जुड़े अवसर इस बातचीत के प्रमुख विषय रहे।

    इससे पहले गोयल ने जर्मन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (डीजीएपी) के इंडिया सेंटर के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लिया। कार्यक्रम में जर्मनी की संघीय आर्थिक मामलों और ऊर्जा मंत्री कैथरीना रीचे भी मौजूद थीं। गोयल ने कहा कि यह केंद्र भारत-जर्मनी संबंधों की बढ़ती मजबूती और आपसी सहयोग को गहरा करने की प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

    अपने संबोधन में गोयल ने दोनों देशों की पूरक क्षमताओं को महत्वाकांक्षी आर्थिक लक्ष्यों के लिए मजबूत आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता आर्थिक साझेदारी को नई गति दे सकता है। उनके अनुसार, भारत और जर्मनी मिलकर वैश्विक स्तर पर मजबूत और लचीली मूल्य शृंखलाएं विकसित कर सकते हैं। इसके लिए दोनों देशों के उद्योगों और निवेशकों को पारस्परिक लाभ वाले क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।

    बर्लिन स्थित ईएसएमटी बर्लिन की ओर से आयोजित बिजनेस लीडर्स राउंडटेबल में भी गोयल ने प्रमुख कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों और उद्योग प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की। उन्होंने भारत और जर्मनी के बीच व्यापारिक तथा आर्थिक संबंधों के भविष्य को लेकर विश्वास जताया। इन बैठकों के जरिए निवेश, उत्पादन, स्वास्थ्य सेवा, निर्माण सामग्री और नवाचार जैसे क्षेत्रों में कारोबारी सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं को सामने रखा गया।

  • शिवपुरी में 68 डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों का अटैचमेंट निरस्त, मूल अस्पतालों में लौटने के आदेश जारी

    शिवपुरी में 68 डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों का अटैचमेंट निरस्त, मूल अस्पतालों में लौटने के आदेश जारी

    मध्य प्रदेश: के शिवपुरी जिले में स्वास्थ्य विभाग ने डॉक्टरों और कर्मचारियों के अटैचमेंट समाप्त करने की कार्रवाई की है। जिला मुख्यालय और अन्य शहरी कार्यालयों में अटैच होकर काम कर रहे 68 डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और दूसरे कर्मचारियों को उनकी मूल पदस्थापना वाले अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में वापस भेजने के आदेश जारी किए गए हैं। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय ऋषीश्वर ने 19 से 21 अक्टूबर के बीच यह कार्रवाई की। इसके बाद जिले की ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में कर्मचारियों की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

    इस कार्रवाई में ब्लॉक मेडिकल ऑफिसरों के अटैचमेंट भी समाप्त किए गए हैं। करैरा के बीएमओ डॉ. प्रदीप शर्मा जिला कार्यालय में जिला क्षय नियंत्रण अधिकारी (डीटीओ) का काम देख रहे थे। वहीं, कोलारस के बीएमओ डॉ. सुनील खण्डोलिया और खनियाधाना के बीएमओ डॉ. रोहित भदकारिया भी जिला मुख्यालय पर जिम्मेदारियां संभाल रहे थे। अब इन अधिकारियों को उनके मूल ब्लॉक में वापस जाकर बीएमओ के रूप में काम करने के निर्देश दिए गए हैं।

    स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं रही। संविदा डॉक्टरों और दूसरे स्वास्थ्य कर्मचारियों को भी उनकी मूल पदस्थापना पर भेजा गया है। इनमें 14 संविदा डॉक्टरों के साथ नर्सिंग ऑफिसर, फार्मासिस्ट, सहायक नर्स मिडवाइफ यानी एएनएम और डाटा एंट्री ऑपरेटर शामिल हैं। इन कर्मचारियों को शहरी कार्यालयों या अन्य स्थानों पर अटैच रखने के बजाय मूल कार्यस्थलों पर सेवाएं देने के लिए कहा गया है।

    इसके अतिरिक्त नेत्र सहायकों, मल्टीपर्पज वर्करों और सहायक ग्रेड-2 के 33 कर्मचारियों का अटैचमेंट भी समाप्त किया गया है। ये कर्मचारी जिला अस्पताल, कलेक्टर कार्यालय और कोल्ड चेन से संबंधित कामों में लगाए गए थे। आदेश के अनुसार, उन्हें वहां से हटाकर उनके मूल उप स्वास्थ्य केंद्रों में वापस भेजा गया है। विभाग ने पिछोर, करैरा और नरवर क्षेत्रों में डॉक्टरों को दिए गए दोहरे प्रभार भी तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिए हैं।

    पोहरी ब्लॉक में भी प्रशासनिक बदलाव किया गया है। यहां संविदा चिकित्सक डॉ. द्वारिका प्रसाद वर्मा से ब्लॉक का प्रभार वापस ले लिया गया है। उनकी जगह नियमित चिकित्सा अधिकारी डॉ. रजत साहू को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस बदलाव के जरिए ब्लॉक की स्वास्थ्य व्यवस्था में नियमित चिकित्सा अधिकारी की भूमिका बढ़ाई गई है।

    सीएमएचओ डॉ. संजय ऋषीश्वर के अनुसार, शासन की मंशा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले मरीजों को उनके गांव और कस्बों के आसपास ही बेहतर इलाज मिल सके। इसके लिए जरूरी है कि डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मचारी अपनी निर्धारित पदस्थापना पर मौजूद रहकर काम करें। विभाग का कहना है कि इसी उद्देश्य से अटैचमेंट समाप्त करने का फैसला लिया गया है।

    ग्रामीण अस्पतालों और उप स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों तथा कर्मचारियों की उपलब्धता स्थानीय मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि स्वीकृत पदों के अनुसार कर्मचारी अपने निर्धारित स्थानों पर सेवाएं देते हैं, तो मरीजों को इलाज के लिए जिला मुख्यालय तक आने की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि, इस कार्रवाई का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संबंधित कर्मचारी मूल स्थानों पर नियमित रूप से काम करते हैं और वहां जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं या नहीं।

    सीएमएचओ ने बताया कि पूरी कार्रवाई की रिपोर्ट भोपाल भेजी जा रही है। अब विभाग के सामने आदेशों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाए रखने की जिम्मेदारी होगी।

  • कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में मिलने पर उठे सवाल

    कैंसर की दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ₹3,000 की दवा ₹27,000 में मिलने पर उठे सवाल

    नई दिल्ली: में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ऊंची कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने दवाओं के प्राइस टू रिटेलर यानी PTR और अधिकतम खुदरा मूल्य यानी MRP के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताई। सुनवाई के दौरान कैंसर की एक दवा का उदाहरण देते हुए बताया गया कि करीब 3,000 रुपये की PTR वाली दवा का MRP 27,000 रुपये है। अदालत ने सवाल किया कि जब दवा की कीमत रिटेलर के लिए करीब 3,000 रुपये है, तो उसका अधिकतम खुदरा मूल्य 27,000 रुपये क्यों रखा गया है। अदालत ने यह भी पूछा कि आवश्यक दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है।

    सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी DPCO के तहत आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर पर भी सवाल उठाए। पीठ ने पूछा कि जरूरी दवाओं के लिए एक समान मूल्य निर्धारण मानदंड क्यों नहीं अपनाया जा सकता। अदालत ने कॉरपोरेट अस्पतालों में दवाओं की बिक्री की व्यवस्था का मुद्दा भी उठाया। पीठ ने कहा कि मरीजों को अक्सर अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए कहा जाता है। अदालत ने सरकारी योजनाओं के तहत इलाज करा रहे मरीजों की दवाओं के खर्च को लेकर भी सवाल किया और कहा कि अंततः इसका बोझ करदाताओं पर पड़ता है।

    केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसा समाधान तलाशने की जरूरत है, जिसमें सभी पक्षों के हितों के बीच संतुलन बना रहे। अदालत ने दवाओं की कीमतों में अंतर और आवश्यक दवाओं के मूल्य नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई जारी रखी। कैंसर की दवा के PTR और MRP के बीच सामने आए भारी अंतर को लेकर अदालत ने यह जानने की कोशिश की कि दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था में इतना बड़ा अंतर क्यों मौजूद है। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

    दूसरी ओर, केरल हाई कोर्ट ने भी सस्ती जीवनरक्षक कैंसर दवाओं की उपलब्धता को लेकर केंद्र सरकार की शक्तियों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने पेटेंट अधिनियम, 1970 का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक हित में केंद्र सरकार के पास जीवनरक्षक दवाओं के निर्माण और आपूर्ति की व्यवस्था करने की शक्ति है। जरूरत पड़ने पर सरकार किसी कंपनी को दवा बनाने के लिए निर्देश दे सकती है। यह मामला महंगी कैंसर दवाओं को लेकर जून 2022 में दाखिल याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता की सुनवाई पूरी होने से पहले ही मृत्यु हो गई थी। अदालत ने कहा कि सरकार को सस्ती दवाओं की जरूरत, मरीजों की संख्या और सब्सिडी से होने वाले लाभ का आकलन करना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने तत्काल दवाओं का उत्पादन शुरू करने का आदेश नहीं दिया।

    इन दोनों मामलों में कैंसर के इलाज की बढ़ती लागत, दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और आम मरीजों के लिए सस्ती जीवनरक्षक दवाओं की उपलब्धता से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दवाओं के PTR और MRP के बीच बड़े अंतर पर सवाल उठे हैं, जबकि केरल हाई कोर्ट ने सार्वजनिक हित में सरकार के पास मौजूद कानूनी शक्तियों पर टिप्पणी की है। दोनों सुनवाइयों में दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था और मरीजों पर पड़ने वाले खर्च से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा हुई है।

  • खंडवा में ट्रेन की चपेट में आया युवक, एक घंटे तक एंबुलेंस का इंतजार, मजबूरी में बाइक से पहुंचाया अस्पताल

    खंडवा में ट्रेन की चपेट में आया युवक, एक घंटे तक एंबुलेंस का इंतजार, मजबूरी में बाइक से पहुंचाया अस्पताल

    मध्य प्रदेश: के खंडवा जिले में रेलवे ट्रैक के पास हुए हादसे के बाद आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को लेकर सवाल उठे हैं। मूंदी थाना क्षेत्र के बीड़ गांव में ट्रेन की चपेट में आने से एक युवक घायल हो गया। हादसे के बाद मौके पर मौजूद लोगों ने उसे अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेंस को सूचना दी, लेकिन करीब एक घंटे तक इंतजार करने के बावजूद एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंची। आखिरकार लोगों को घायल युवक को मोटरसाइकिल से जिला अस्पताल ले जाना पड़ा।

    घायल युवक की पहचान कुलदीप के रूप में हुई है। जानकारी के मुताबिक, कुलदीप बीड़ गांव में रेलवे ट्रैक के पास घूम रहा था। इसी दौरान अचानक ट्रेन आ गई और वह उसकी चपेट में आ गया। ट्रेन की टक्कर लगने से युवक घायल हो गया। हादसे के बाद घटनास्थल पर मौजूद लोगों ने उसकी मदद की और तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास शुरू किया।

    घटना की गंभीरता को देखते हुए लोगों ने एंबुलेंस सेवा को सूचना दी, ताकि घायल को बिना देरी के अस्पताल पहुंचाया जा सके। रेलवे ट्रैक के पास दुर्घटना होने के कारण घायल को तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत थी। ऐसे में मौके पर मौजूद लोगों को उम्मीद थी कि सूचना मिलने के बाद एंबुलेंस जल्द पहुंच जाएगी और युवक को सुरक्षित तरीके से अस्पताल ले जाया जा सकेगा।

    हालांकि, बताया जा रहा है कि एंबुलेंस पहुंचने में करीब एक घंटे का समय बीत गया। इस दौरान घायल युवक को अस्पताल ले जाने के लिए लोगों को इंतजार करना पड़ा। काफी समय गुजरने के बाद भी जब एंबुलेंस मौके पर नहीं पहुंची, तो लोगों ने खुद ही घायल को अस्पताल पहुंचाने का फैसला किया।

    इसके बाद स्थानीय लोगों ने घायल कुलदीप को मोटरसाइकिल पर बैठाया और खंडवा जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। आपात स्थिति में निजी वाहन के रूप में बाइक का सहारा लेकर घायल को अस्पताल पहुंचाने की इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में तत्काल चिकित्सा सहायता की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ा दी है। दुर्घटना के बाद शुरुआती समय में घायल को चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाना महत्वपूर्ण होता है, ऐसे में एंबुलेंस के लिए लंबा इंतजार परेशानी का कारण बना।

    जिला अस्पताल पहुंचने के बाद कुलदीप को उपचार दिया गया। अस्पताल में इलाज मिलने के बाद उसकी हालत में सुधार बताया गया है। फिलहाल युवक खतरे से बाहर है और उसकी स्थिति ठीक बताई जा रही है। समय पर अस्पताल पहुंचने और उपचार मिलने के बाद उसकी हालत में सुधार होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, हादसे में उसे किस तरह की चोटें आईं और उपचार की विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।

    इस घटना के बाद खंडवा जिले में एंबुलेंस सेवा और आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। खासकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में दुर्घटना या अन्य गंभीर चिकित्सा स्थिति के दौरान एंबुलेंस की तत्काल उपलब्धता को लेकर चिंता जताई जा रही है। आपातकालीन परिस्थितियों में समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना स्वास्थ्य सेवाओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

    बीड़ गांव में हुई इस घटना ने यह सवाल फिर सामने ला दिया है कि दुर्घटना के समय जरूरतमंद मरीजों तक एंबुलेंस कितनी जल्दी पहुंच पा रही है। फिलहाल कुलदीप की हालत खतरे से बाहर बताई गई है, लेकिन एंबुलेंस के लिए करीब एक घंटे तक इंतजार और फिर बाइक से अस्पताल पहुंचाने की परिस्थितियों ने जिले की आपातकालीन सेवाओं पर चर्चा तेज कर दी है।

  • कोलकाता में 2,000 बेड वाले गैर-लाभकारी अस्पताल का शिलान्यास, गौतम अदाणी बोले- बंगाल का चिकित्सा भविष्य होगा बेहतर

    कोलकाता में 2,000 बेड वाले गैर-लाभकारी अस्पताल का शिलान्यास, गौतम अदाणी बोले- बंगाल का चिकित्सा भविष्य होगा बेहतर

    नई दिल्ली ।अदाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अदाणी ने गुरुवार को कोलकाता में 2,000 बेड वाले गैर-लाभकारी अस्पताल अदाणी आरोग्य मंदिर के शिलान्यास के मौके पर इसे पश्चिम बंगाल के चिकित्सा क्षेत्र के भविष्य से जुड़ी महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने कहा कि यह संस्थान आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के साथ टेक्नोलॉजी और डिजिटल हेल्थ के इस्तेमाल पर भी केंद्रित होगा।

    गौतम अदाणी ने अस्पताल की शुरुआत के अवसर को विशेष दिन बताते हुए कहा कि 2,000 बेड वाला यह गैर-लाभकारी संस्थान आधुनिक मेडिकल कॉलेज, उन्नत शोध और स्वास्थ्य सेवाओं की सुविधाओं से जुड़ा होगा। उनका कहना है कि टेक्नोलॉजी और डिजिटल हेल्थ को इसमें महत्वपूर्ण स्थान दिया जाएगा, जिससे बंगाल में चिकित्सा व्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

    उन्होंने कहा कि अदाणी आरोग्य मंदिर बंगाल के प्रति समूह की व्यापक प्रतिबद्धता का हिस्सा है। इसके तहत विश्वस्तरीय भौतिक और डिजिटल बुनियादी ढांचे के निर्माण के साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में योगदान देने की बात कही गई है।

    शिलान्यास कार्यक्रम में गौतम अदाणी ने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए उनका आभार भी जताया। इस दौरान उन्होंने अस्पताल की प्रस्तावित सुविधाओं और इसके सामाजिक उद्देश्य को लेकर जानकारी साझा की।

    अदाणी के अनुसार अदाणी आरोग्य मंदिर एक विश्वस्तरीय और गैर-लाभकारी चिकित्सा संस्थान होगा। इसमें कुल 2,000 बेड होंगे। इनमें से 1,000 बेड आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए निर्धारित किए जाएंगे। ऐसे लोग जो राज्य और केंद्र की स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के तहत पात्र हैं, उनके लिए इन बेड की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना बताई गई है।

    अस्पताल के केंद्र में एक मेडिकल कॉलेज भी होगा। इसके साथ उन्नत शोध और चिकित्सा देखभाल से जुड़ी सुविधाएं विकसित की जाएंगी। गौतम अदाणी ने कहा कि इस व्यवस्था से बंगाल में कुशल स्वास्थ्यकर्मियों को तैयार करने की नींव रखी जाएगी।

    उन्होंने बताया कि अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और रिसर्च सुविधाओं के निर्माण में 4,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया जाएगा। उनके अनुसार इस संस्थान से राज्य के स्वास्थ्य क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र में 10,000 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

    गौतम अदाणी ने कार्यक्रम के दौरान पश्चिम बंगाल में समूह के व्यापक निवेश की योजना भी साझा की। उन्होंने कहा कि 2035 तक बंगाल में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया जाएगा।

    प्रस्तावित निवेश में कई अलग-अलग क्षेत्र शामिल होंगे। इनमें बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, बिजली उत्पादन, बिजली ट्रांसमिशन और वितरण, सड़कें, पुल और रोपवे के साथ ग्रीन सीमेंट तथा हाइपरस्केल डेटा सेंटर जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

    अदाणी ने कहा कि स्वास्थ्य क्षेत्र की इस परियोजना के साथ राज्य में बुनियादी ढांचे और अन्य क्षेत्रों में भी निवेश की योजना आगे बढ़ाई जाएगी। 2,000 बेड वाला अदाणी आरोग्य मंदिर अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और रिसर्च सुविधाओं के साथ विकसित किया जाएगा।

    परियोजना में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए प्रस्तावित 1,000 बेड की व्यवस्था को भी प्रमुख हिस्सा बताया गया है। इसके अलावा मेडिकल शिक्षा और उन्नत शोध के जरिए स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए कुशल कार्यबल तैयार करने पर जोर दिया गया है।

    इस तरह शिलान्यास कार्यक्रम में अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं, मेडिकल शिक्षा, शोध, डिजिटल तकनीक और रोजगार से जुड़ी योजनाओं की जानकारी सामने रखी गई। साथ ही पश्चिम बंगाल में 2035 तक 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश की योजना भी बताई गई।

  • आयुष्मान भारत के आठ साल पूरे, 60 करोड़ से ज्यादा लोगों को मिला पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर, जानें बड़े आंकड़े

    आयुष्मान भारत के आठ साल पूरे, 60 करोड़ से ज्यादा लोगों को मिला पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर, जानें बड़े आंकड़े

    नई दिल्ली । आयुष्मान भारत योजना के बुधवार को आठ साल पूरे हो गए। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना से जुड़े लाभार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए इसके अब तक के सफर और उपलब्धियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि योजना के तहत देश के 60 करोड़ से अधिक लोगों को सालाना पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिल रहा है।

    प्रधानमंत्री के अनुसार आयुष्मान भारत की शुरुआत आठ साल पहले इस उद्देश्य के साथ की गई थी कि देश के प्रत्येक नागरिक को बेहतर और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो सकें। योजना के विस्तार के साथ बड़ी संख्या में लोगों को अस्पताल में इलाज कराने के दौरान आर्थिक सहायता मिली है।

    प्रधानमंत्री ने कहा कि आयुष्मान भारत के तहत 60 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को सालाना पांच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिल रहा है। उनके अनुसार, इस वजह से यह योजना दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल हो गई है।

    उन्होंने यह भी कहा कि योजना की वजह से इलाज पर होने वाले खर्च में बड़ी बचत संभव हुई है। इसका लाभ विशेष रूप से गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को मिलने की बात कही गई। स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों के घरों के करीब पहुंचाने की दिशा में भी योजना के तहत काम किए जाने का उल्लेख किया गया।

    आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का भी इस अवसर पर उल्लेख किया गया। प्रधानमंत्री के अनुसार, इन केंद्रों पर अब तक 500 करोड़ से अधिक बार लोगों की विजिट दर्ज की जा चुकी है। इन केंद्रों के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को जमीनी स्तर पर मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

    केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी योजना के आठ वर्ष पूरे होने पर इसके विस्तार और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को लेकर जानकारी साझा की। उन्होंने कहा कि आठ साल पहले स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को बदलने के उद्देश्य से शुरू की गई पहल ने बड़ी संख्या में लोगों को लाभ पहुंचाया है।

    योजना के तहत अब तक 48.54 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड बनाए जाने की जानकारी दी गई है। इसके अलावा 13 करोड़ से अधिक लोगों को इलाज का लाभ मिलने की बात कही गई। योजना के दायरे में आने वाले लाभार्थियों को देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है।

    आंकड़ों के अनुसार, देशभर में 39 हजार से अधिक सरकारी और निजी अस्पताल योजना के तहत सूचीबद्ध हैं। इन अस्पतालों के माध्यम से दो लाख करोड़ रुपये से अधिक के अस्पताल में भर्ती और इलाज संबंधी लाभ का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी दी गई है।

    केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी आयुष्मान भारत योजना के आठ वर्ष पूरे होने पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि योजना ने करोड़ों परिवारों के लिए बेहतर इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को आसान बनाने में मदद की है।

    उन्होंने यह भी कहा कि गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए इलाज के खर्च की चिंता कम करने में योजना सहायक रही है। उनके अनुसार, स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी इस पहल ने बड़ी संख्या में परिवारों को आर्थिक सहारा उपलब्ध कराया है।

    आयुष्मान भारत योजना के आठ वर्ष पूरे होने के मौके पर सामने आए आंकड़े इसके विस्तार को दर्शाते हैं। 60 करोड़ से अधिक लाभार्थियों का स्वास्थ्य कवर, 48.54 करोड़ से अधिक कार्ड और 13 करोड़ से अधिक लोगों को उपचार का लाभ योजना के अब तक के क्रियान्वयन से जुड़े प्रमुख आंकड़े हैं।