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  • 16 राज्यों में फूड पॉइजनिंग से हड़कंप क्या भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर मंडरा रहा है बड़ा संकट जानिए पूरी सच्चाई

    16 राज्यों में फूड पॉइजनिंग से हड़कंप क्या भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर मंडरा रहा है बड़ा संकट जानिए पूरी सच्चाई


    नई दिल्ली । देश में लगातार सामने आ रहे फूड पॉइजनिंग के मामलों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में 16 राज्यों में भोजन से जुड़ी बीमारियों के मामले दर्ज होने और 11 कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की खबर ने खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। यह घटना केवल किसी एक राज्य या एक कंपनी तक सीमित नहीं है बल्कि यह संकेत देती है कि खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और उनकी निगरानी को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।

    फूड पॉइजनिंग तब होती है जब दूषित भोजन या पेय पदार्थ शरीर में पहुंचकर बैक्टीरिया वायरस परजीवी या हानिकारक रसायनों के माध्यम से संक्रमण फैला देते हैं। इसके कारण उल्टी दस्त पेट दर्द बुखार कमजोरी और कई बार गंभीर स्थिति तक पैदा हो सकती है। छोटे बच्चों बुजुर्गों गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों में इसका खतरा और अधिक बढ़ जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि खराब गुणवत्ता वाले कच्चे पदार्थों का उपयोग स्वच्छता की अनदेखी निर्माण प्रक्रिया में लापरवाही गलत तरीके से पैकेजिंग और खाद्य पदार्थों का अनुचित भंडारण फूड पॉइजनिंग की प्रमुख वजह बनते हैं। यदि किसी कंपनी द्वारा तय मानकों का पालन नहीं किया जाता तो बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य खतरे में पड़ सकता है।

    भारत में खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई पर है। यह संस्था खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता तय करती है और नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करती है। समय समय पर खाद्य नमूनों की जांच भी की जाती है लेकिन देश की विशाल आबादी और तेजी से बढ़ते खाद्य बाजार को देखते हुए निगरानी व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

    उपभोक्ताओं की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पैक्ड फूड खरीदते समय निर्माण तिथि समाप्ति तिथि एफएसएसएआई लाइसेंस नंबर और पैकेज की स्थिति जरूर जांचनी चाहिए। खुले में बिकने वाले खाद्य पदार्थों को खरीदते समय स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। लंबे समय तक खुले में रखा भोजन खाने से बचना चाहिए और हमेशा साफ पानी का ही उपयोग करना चाहिए।

    यदि किसी व्यक्ति को भोजन करने के कुछ समय बाद लगातार उल्टी दस्त तेज बुखार या पेट में असहनीय दर्द जैसी परेशानी हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। समय पर इलाज मिलने से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।

    16 राज्यों में सामने आए मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि खाद्य सुरक्षा केवल सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि कंपनियों विक्रेताओं और उपभोक्ताओं सभी को अपनी भूमिका ईमानदारी से निभानी होगी। सुरक्षित भोजन हर नागरिक का अधिकार है और इसके लिए गुणवत्ता नियंत्रण सख्त निगरानी तथा जनजागरूकता तीनों का मजबूत होना बेहद जरूरी है। यदि सभी स्तरों पर जिम्मेदारी के साथ काम किया जाए तो फूड पॉइजनिंग जैसी घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है और लोगों का स्वास्थ्य बेहतर तरीके से सुरक्षित रखा जा सकता है।

  • 25 वर्षीय गौरव दवे का अंगदान बनेगा जीवन का वरदान इंदौर में 68वें ग्रीन कॉरिडोर की तैयारी लिवर और दोनों किडनी का होगा प्रत्यारोपण

    25 वर्षीय गौरव दवे का अंगदान बनेगा जीवन का वरदान इंदौर में 68वें ग्रीन कॉरिडोर की तैयारी लिवर और दोनों किडनी का होगा प्रत्यारोपण


    इंदौर । इंदौर एक बार फिर मानवता सेवा और अंगदान की भावना का प्रेरणादायी उदाहरण बनने जा रहा है। शहर के खजूरी बाजार निवासी 25 वर्षीय गौरव दवे के अंगदान से कई गंभीर मरीजों को नया जीवन मिलने की उम्मीद जगी है। यदि सभी चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रियाएं तय समय पर पूरी हो जाती हैं तो सोमवार को शहर में 68वां ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाएगा। इसके माध्यम से विभिन्न अस्पतालों तक अंगों को बेहद कम समय में सुरक्षित पहुंचाया जाएगा ताकि जरूरतमंद मरीजों का समय रहते प्रत्यारोपण किया जा सके।

    गौरव दवे को 13 जुलाई को अचानक गंभीर ब्रेन हेमरेज होने के बाद इलाज के लिए राजश्री अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने लगातार कई दिनों तक उन्हें बचाने का हरसंभव प्रयास किया लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। चिकित्सकीय परीक्षण और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। गौरव फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग कोऑर्डिनेटर के रूप में कार्यरत थे और अपने परिवार के साथ इंदौर में रहते थे।

    परिवार के लिए यह बेहद कठिन समय था लेकिन इसी दुख की घड़ी में उन्होंने ऐसा फैसला लिया जिसने कई परिवारों में उम्मीद की नई किरण जगा दी। गौरव की बहन वैदही राठी बहनोई पल्केश राठी और भाई रितिक चावरे ने परिवार को अंगदान के लिए प्रेरित किया। इसके बाद पिता सतीश दवे और माता कविता दवे ने सहमति देकर मानवता की एक बड़ी मिसाल पेश की। उनके इस निर्णय की हर ओर सराहना हो रही है क्योंकि एक व्यक्ति के अंग कई लोगों को नया जीवन देने वाले हैं।

    अंगदान की पूरी प्रक्रिया में मुस्कान ग्रुप पारमार्थिक ट्रस्ट के सेवादार जीतू बगानी संदीपन आर्य और लकी खत्री ने समन्वय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। ट्रस्ट की टीम ने चिकित्सकीय संस्थानों और परिवार के बीच आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा कराने में सहयोग किया ताकि अंगदान की प्रक्रिया समय पर संपन्न हो सके।

    डॉक्टरों के अनुसार गौरव का लिवर राजश्री अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती एक गंभीर मरीज को प्रत्यारोपित किया जाएगा जबकि उनकी दोनों किडनियां चोइथराम हॉस्पिटल में उपचाराधीन दो अलग अलग मरीजों को नई जिंदगी देंगी। इसके अलावा हृदय फेफड़े हार्ट वाल्व पेनक्रियाज और छोटी आंत के आवंटन की प्रक्रिया राष्ट्रीय स्तर पर जारी है। इन अंगों का आवंटन तकनीकी अनुकूलता और मरीजों की चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर किया जाएगा।

    अंगों को सुरक्षित और समय पर संबंधित अस्पतालों तक पहुंचाने के लिए प्रशासन और पुलिस की मदद से 68वें ग्रीन कॉरिडोर की तैयारी की जा रही है। ग्रीन कॉरिडोर के जरिए ट्रैफिक को कुछ समय के लिए नियंत्रित कर एंबुलेंस को बिना किसी बाधा के अस्पतालों तक पहुंचाया जाता है जिससे अंगों की गुणवत्ता बनी रहती है और प्रत्यारोपण सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।

    इंदौर लंबे समय से देश में अंगदान के क्षेत्र में अग्रणी शहरों में शामिल रहा है। यहां पहले भी कई ग्रीन कॉरिडोर बन चुके हैं और अनेक परिवार अपने प्रियजनों के अंगदान के जरिए जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन दे चुके हैं। गौरव दवे के परिवार का यह निर्णय भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है और यह संदेश देता है कि जीवन भले समाप्त हो जाए लेकिन अंगदान के माध्यम से कई जिंदगियां फिर से मुस्कुरा सकती हैं।

  • गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

    गर्भावस्था में कॉस्मेटिक्स बन सकते हैं खतरे की वजह AIIMS की रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य


    नई दिल्ली । गर्भावस्था का समय किसी भी महिला के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इस दौरान खानपान से लेकर जीवनशैली तक हर छोटी बड़ी बात का सीधा असर मां और गर्भ में पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ता है। अब ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस नई दिल्ली की अगुवाई में हुई एक नई रिसर्च ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। अध्ययन में संकेत मिले हैं कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कुछ कॉस्मेटिक्स पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स और प्लास्टिक से जुड़े रसायन गर्भवती महिलाओं के शरीर में जमा होकर हार्मोन के सामान्य कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर केवल मां तक सीमित नहीं रहता बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के विकास पर भी पड़ सकता है।

    इस शोध में 641 स्वस्थ गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया। गर्भावस्था के अलग अलग चरणों में उनके यूरिन सैंपल की जांच की गई ताकि यह पता लगाया जा सके कि शरीर में कौन कौन से रसायन मौजूद हैं। जांच के दौरान सबसे अधिक मात्रा मिथाइलपैराबेन नामक रसायन की पाई गई। यह एक प्रिजर्वेटिव है जिसका इस्तेमाल सामान्य रूप से स्किन केयर प्रोडक्ट्स लोशन फेस क्रीम शैंपू मेकअप और अन्य पर्सनल केयर उत्पादों में किया जाता है।

    शोधकर्ताओं को मोनोएथाइल फ्थेलेट नामक रसायन भी अधिक मात्रा में मिला। यह रसायन प्लास्टिक उत्पादों और सिंथेटिक खुशबू वाले कई सामानों में इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये दोनों एंडोक्राइन डिसरप्टिंग केमिकल्स की श्रेणी में आते हैं। ऐसे रसायन शरीर के हार्मोन संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और गर्भावस्था के दौरान यह जोखिम और अधिक बढ़ जाता है।

    अध्ययन में यह भी सामने आया कि गर्भावस्था की दूसरी तिमाही के दौरान इन रसायनों का स्तर सबसे अधिक पाया गया। यही वह समय होता है जब गर्भ में पल रहे शिशु के अंगों और शरीर का तेजी से विकास हो रहा होता है। ऐसे संवेदनशील चरण में यदि हार्मोन के कार्य में किसी प्रकार की बाधा आती है तो इसका असर बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ सकता है।

    एम्स के विशेषज्ञों के अनुसार जिन महिलाओं के शरीर में इन रसायनों का स्तर अधिक पाया गया उनके नवजात शिशुओं के जन्म के समय वजन लंबाई और विटामिन डी के स्तर में भी अंतर देखा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल संभावित संबंधों की ओर संकेत करता है। इन निष्कर्षों की पूरी पुष्टि के लिए भविष्य में और बड़े स्तर पर विस्तृत शोध किए जाने की आवश्यकता होगी।

    विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को इस दौरान अनावश्यक कॉस्मेटिक्स के उपयोग से बचना चाहिए और जहां तक संभव हो कम रसायन वाले या सुरक्षित उत्पादों का चयन करना चाहिए। साथ ही प्लास्टिक के बर्तनों और पैकेजिंग में लंबे समय तक भोजन रखने से भी बचना बेहतर हो सकता है। प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्प अपनाने से संभावित जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में ऐसे रसायनों के उपयोग और उनकी निगरानी के लिए स्पष्ट और सख्त नियम बनाए जाने चाहिए ताकि उपभोक्ताओं विशेषकर गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित उत्पाद उपलब्ध हो सकें। जागरूकता बढ़ाने के साथ यदि महिलाएं चिकित्सकीय सलाह के अनुसार उत्पादों का चयन करें तो गर्भावस्था के दौरान मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

  • किडनी कैंसर पर जागरूकता जरूरी शराब और धूम्रपान बढ़ाते हैं जोखिम, समय पर पहचान से बच सकती है जान

    किडनी कैंसर पर जागरूकता जरूरी शराब और धूम्रपान बढ़ाते हैं जोखिम, समय पर पहचान से बच सकती है जान


    नई द‍िल्‍ली । किडनी कैंसर दुनिया भर में तेजी से बढ़ती एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। यह वैश्विक स्तर पर 14वां सबसे आम कैंसर माना जाता है, जिसमें हर साल लाखों नए मामले सामने आते हैं और बड़ी संख्या में लोगों की मौत भी होती है। पुरुषों, बुजुर्गों और विकसित देशों में इसके मामले अधिक देखे जाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी केवल इन्हीं वर्गों तक सीमित नहीं है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर किडनी कैंसर का समय पर पता चल जाए तो सर्जरी, थेरेपी और अन्य आधुनिक उपचारों के माध्यम से मरीज की जान बचाई जा सकती है। समस्या यह है कि अधिकतर मामलों में इसका पता तब चलता है जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है, जिससे इलाज कठिन हो जाता है।

    किडनी कैंसर को लेकर समाज में कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं, जो इसके समय पर निदान और उपचार में बाधा बन सकती हैं। एक आम धारणा यह है कि यह बीमारी केवल बुजुर्गों को होती है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार यह पूरी तरह सही नहीं है। हालांकि उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम बढ़ जाता है, लेकिन युवाओं में भी इसके मामले देखे जा रहे हैं। शोध बताते हैं कि 50 वर्ष से कम उम्र के लगभग एक तिहाई मामलों में यह बीमारी पाई जा सकती है। खराब जीवनशैली, धूम्रपान, शराब का सेवन, आनुवांशिक कारण और पहले से मौजूद किडनी संबंधी बीमारियां इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।

    एक और आम मिथक यह है कि पेशाब में खून आना हमेशा किडनी कैंसर का संकेत होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह लक्षण कई अन्य बीमारियों में भी दिख सकता है, जैसे यूटीआई या संक्रमण। हालांकि यदि कई दिनों तक पेशाब का रंग लाल, बरगंडी या गहरा दिखाई दे तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और तुरंत चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए।

    लिंग को लेकर भी एक गलत धारणा है कि महिलाओं में किडनी कैंसर का खतरा अधिक होता है, जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। पुरुषों में इसका जोखिम महिलाओं की तुलना में लगभग दोगुना पाया गया है। इसका एक कारण धूम्रपान और कार्यस्थल पर हानिकारक रसायनों के संपर्क में आना भी माना जाता है। हालांकि बार-बार होने वाले यूटीआई या संक्रमण से ग्रस्त महिलाओं को भी नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहना चाहिए।

    इसके अलावा यह भी एक मिथक है कि शराब का सेवन केवल लिवर को नुकसान पहुंचाता है, किडनी को नहीं। डॉक्टरों के अनुसार शराब और धूम्रपान दोनों ही किडनी कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। ये आदतें शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर कैंसर के विकास की संभावना को बढ़ा देती हैं। अनुमान के अनुसार, इन आदतों के कारण पुरुषों में लगभग 30 प्रतिशत और महिलाओं में लगभग 25 प्रतिशत किडनी कैंसर के मामले जुड़े हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि किडनी कैंसर से बचाव के लिए जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण कदम है। स्वस्थ जीवनशैली, धूम्रपान और शराब से दूरी, नियमित स्वास्थ्य जांच और शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करना इस बीमारी के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है। सही समय पर पहचान और इलाज से इस गंभीर बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

  • DNA बदलकर दिल की बीमारी खत्म करने का दावा! एक इंजेक्शन से 62% घटा खराब कोलेस्ट्रॉल

    DNA बदलकर दिल की बीमारी खत्म करने का दावा! एक इंजेक्शन से 62% घटा खराब कोलेस्ट्रॉल

    नई दिल्ली । दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही दिल की बीमारियों के बीच वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई थेरेपी विकसित करने का दावा किया है, जो भविष्य में हार्ट अटैक के खतरे को हमेशा के लिए कम कर सकती है। खास बात यह है कि इस इलाज में रोज दवाइयां खाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि सिर्फ एक इंजेक्शन शरीर के डीएनए में बदलाव कर लंबे समय तक खराब कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रख सकता है।

    यह नई तकनीक जीन-एडिटिंग यानी डीएनए में बदलाव करने वाली थेरेपी पर आधारित है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The New England Journal of Medicine में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक इस थेरेपी ने शुरुआती ट्रायल में बेहद उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर आगे के बड़े अध्ययनों में भी ऐसे ही नतीजे मिले तो यह दिल की बीमारी के इलाज में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

    इस रिसर्च का नेतृत्व बायोटेक कंपनी Verve Therapeutics के सीईओ और वैज्ञानिक Dr. Sekar Kathiresan ने किया। अध्ययन में शामिल विशेषज्ञों के अनुसार यह थेरेपी शरीर में मौजूद खराब कोलेस्ट्रॉल यानी LDL को लंबे समय तक कम रखने में सक्षम दिखाई दी है।

    रिसर्च के दौरान 85 मरीजों पर ट्रायल किया गया, हालांकि फिलहाल 35 मरीजों के डेटा का विश्लेषण सामने आया है। ये सभी मरीज आनुवंशिक रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल या दिल की बीमारी से जूझ रहे थे। जिन मरीजों को इस नई दवा की सबसे ज्यादा डोज दी गई, उनमें सिर्फ एक इंजेक्शन के बाद LDL कोलेस्ट्रॉल में करीब 62 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। सबसे बड़ी बात यह रही कि जिन मरीजों को 18 महीने पहले यह थेरेपी दी गई थी, उनमें भी कोलेस्ट्रॉल का स्तर लगातार कम बना हुआ है।

    वैज्ञानिकों के मुताबिक यह थेरेपी शरीर में एक खास जीन-एडिटिंग “मशीन” की तरह काम करती है। इंजेक्शन के जरिए इसे शरीर में पहुंचाया जाता है, जहां यह खून के रास्ते सीधे लिवर तक पहुंचती है। इसके बाद यह लिवर सेल के डीएनए में मौजूद PCSK9 नाम के जीन को टारगेट करती है। यही जीन खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। थेरेपी इस जीन में बदलाव कर LDL को नियंत्रित कर देती है।

    दिल के विशेषज्ञ Dr. John H. P. Alexander ने इस शोध को बेहद महत्वपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि यदि कोलेस्ट्रॉल और दिल की बीमारी का स्थायी इलाज संभव हो जाता है तो यह मेडिकल साइंस में गेम चेंजर साबित होगा।

    हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और इसे पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी साबित करने के लिए बड़े स्तर पर और अध्ययन किए जाएंगे। इसके बावजूद शुरुआती नतीजों ने दुनियाभर के मेडिकल समुदाय का ध्यान खींचा है।

    आमतौर पर जीन थेरेपी बेहद महंगी मानी जाती है, लेकिन रिसर्च टीम का दावा है कि भविष्य में इस दवा को आम लोगों की पहुंच में लाने की कोशिश की जाएगी। कंपनी इसे सिर्फ दुर्लभ इलाज नहीं बल्कि सामान्य हार्ट ट्रीटमेंट का हिस्सा बनाना चाहती है।

    भारत जैसे देश के लिए यह शोध बेहद अहम माना जा रहा है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल करीब 28 लाख लोगों की मौत दिल की बीमारियों से होती है। ऐसे में अगर यह थेरेपी सफल होती है तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है और हार्ट अटैक के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • इलाज या लापरवाही ,खजुराहो क्लिनिक में इंजेक्शन के बाद बच्चे की मौत, पर उठा सवाल

    इलाज या लापरवाही ,खजुराहो क्लिनिक में इंजेक्शन के बाद बच्चे की मौत, पर उठा सवाल


    खजुराहो । मध्य प्रदेश के खजुराहो से एक बेहद दर्दनाक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है जिसने निजी क्लिनिक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक मामूली चोट के इलाज के लिए पहुंचे 14 वर्षीय बच्चे की अचानक मौत हो जाने से इलाके में हड़कंप मच गया है। परिजनों का आरोप है कि क्लिनिक में लगाए गए इंजेक्शन के कारण ही बच्चे की जान गई है।

    जानकारी के अनुसार जटकरा गांव का रहने वाला यह बच्चा साइकिल चलाते समय गिर गया था जिससे उसे हल्की चोट आई थी। परिवार वाले उसे इलाज के लिए सेवाग्राम स्थित एक निजी क्लिनिक ले गए जहां सामान्य प्राथमिक उपचार किया जा रहा था। परिजनों का कहना है कि स्थिति ज्यादा गंभीर नहीं थी और बच्चा सामान्य रूप से बात कर रहा था।

    आरोप है कि इलाज के दौरान क्लिनिक संचालक ने बच्चे को एक इंजेक्शन लगाया जिसके तुरंत बाद उसकी हालत अचानक बिगड़ने लगी। बच्चे के दादा राजू पटेल के मुताबिक इंजेक्शन लगते ही उसे बेचैनी महसूस होने लगी और कुछ ही मिनटों में उसकी तबीयत इतनी खराब हो गई कि उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। इस घटना ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है और परिजन इसे सीधे तौर पर मेडिकल लापरवाही बता रहे हैं।

    घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को संभाला। पुलिस ने बच्चे के शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए राजनगर स्वास्थ्य केंद्र भेज दिया है। अधिकारियों का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के असली कारणों का खुलासा हो सकेगा।

    इस घटना के बाद इलाके में लोगों के बीच गुस्सा और डर दोनों देखने को मिल रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या निजी क्लिनिक में इलाज के दौरान जरूरी सावधानियां बरती जा रही हैं या नहीं। अगर परिजनों के आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं में गंभीर लापरवाही का उदाहरण बन सकता है।

    फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटी हुई है और क्लिनिक से जुड़े दस्तावेजों और इलाज की प्रक्रिया की भी पड़ताल की जा रही है। वहीं परिवार न्याय की मांग कर रहा है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की उम्मीद कर रहा है।

    यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि मामूली दिखने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में भी सही और सुरक्षित इलाज कितना जरूरी है। एक छोटी सी लापरवाही किसी परिवार के लिए जीवन भर का दर्द बन सकती है।

  • सर्दियों में शरीर का सुरक्षा कवच है ब्राउन फैट मोटापा बढ़ाने नहींकैलोरी जलाने में करता है मदद

    सर्दियों में शरीर का सुरक्षा कवच है ब्राउन फैट मोटापा बढ़ाने नहींकैलोरी जलाने में करता है मदद


    नई दिल्ली । आमतौर पर फैट या वसा शब्द सुनते ही हमारे मन में मोटापे और बीमारियों का ख्याल आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके शरीर में एक ऐसा गुड फैट भी है जो आपको मोटा करने के बजाय पतला रखने और बीमारियों से बचाने में मदद करता है मेडिकल साइंस की भाषा में इसे ब्राउन फैट कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसारसर्दियों के मौसम में यह शरीर के लिए किसी सुरक्षा कवच से कम नहीं है।

    व्हाइट फैट बनाम ब्राउन फैट क्या है अंतर

    हमारे शरीर में मुख्य रूप से दो प्रकार के फैट पाए जाते हैं। पहला व्हाइट फैटजिसका काम शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा को जमा करना है। जब हम जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेते हैंतो वह व्हाइट फैट के रूप में जमा होकर मोटापे का कारण बनती है इसके विपरीतब्राउन फैट एक सक्रिय ऊतक है। इसमें प्रचुर मात्रा में माइटोकॉन्ड्रिया होते हैंजो इसे गहरा रंग देते हैं। ब्राउन फैट का मुख्य कार्य कैलोरी को स्टोर करना नहींबल्कि उसे जलाकर शरीर के लिए ऊष्मा पैदा करना है। जब शरीर को ठंड लगती हैतो यही ब्राउन फैट बर्न होकर हमें भीतर से गर्माहट देता है।

    सेहत के लिए क्यों है यह जरूरी

    ब्राउन फैट केवल शरीर को गर्म ही नहीं रखताबल्कि इसके कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं मेटाबॉलिज्म में सुधार यह शरीर की चयापचय दर को बढ़ाता हैजिससे वजन नियंत्रित रहता है। ब्लड शुगर पर नियंत्रण ब्राउन फैट इंसुलिन सेंसिटिविटी को सुधारता है जिससे टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम होता है। तेजी से कैलोरी बर्न रिसर्च के अनुसारसक्रिय ब्राउन फैट सामान्य फैट की तुलना में कई गुना तेजी से कैलोरी जला सकता है। हृदय स्वास्थ्य यह खून से ट्राइग्लिसराइड्स और खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में भी सहायक हो सकता है।

    ब्राउन फैट की कमी के संकेत

    यदि किसी व्यक्ति के शरीर में ब्राउन फैट की कमी है और व्हाइट फैट की अधिकता हैतो उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे लोगों को ठंड अधिक लगती हैवे जल्दी थक जाते हैं और उनका वजन तेजी से बढ़ने लगता है। मेटाबॉलिज्म धीमा होने के कारण उन्हें सुस्ती और इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

    कैसे करें इसे एक्टिवेट

    ब्राउन फैट किसी भोजन के जरिए सीधे शरीर में नहीं डाला जा सकताबल्कि इसे जीवनशैली के माध्यम से सक्रिय करना पड़ता हैठंड का संपर्क हल्की ठंड में रहने या ठंडे पानी से स्नान करने से शरीर का ब्राउन फैट सक्रिय हो जाता है। नियमित व्यायाम वर्कआउट करने से शरीर में इरिसिन नामक हार्मोन निकलता हैजो व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में बदलने में मदद करता है।  संतुलित आहार पोषण युक्त भोजन और सही मात्रा में कैलोरी का सेवन इसे स्वस्थ बनाए रखता है। ब्राउन फैट हमारे शरीर की वह आंतरिक भट्टी है जो न केवल हमें कड़ाके की ठंड से बचाती हैबल्कि आधुनिक जीवनशैली की बीमारियों जैसे मोटापा और डायबिटीज से लड़ने में भी सक्षम है। फिट रहने के लिए जरूरी है कि हम अपनी जीवनशैली में सुधार कर इस गुड फैट को एक्टिव रखें।

  • ठंड और बढ़ता वायु प्रदूषण बना सेहत के लिए खतरा, आयुर्वेदिक उपाय बन सकते हैं सुरक्षा कवच

    ठंड और बढ़ता वायु प्रदूषण बना सेहत के लिए खतरा, आयुर्वेदिक उपाय बन सकते हैं सुरक्षा कवच


    नई दिल्ली  /प्रदेश में जैसे-जैसे ठंड बढ़ रही है, वैसे-वैसे वायु प्रदूषण का स्तर भी चिंताजनक होता जा रहा है। राजधानी समेत कई जिलों में हवा की गुणवत्ता खराब हो चुकी है, जिसका सीधा असर लोगों की सेहत पर दिखाई दे रहा है। अस्पतालों में छींक, खांसी, गले में खराश, सांस लेने में दिक्कत, कब्ज और एलर्जी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह मौसम खासतौर पर उन लोगों के लिए ज्यादा जोखिम भरा है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या जो पहले से ही अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं। ऐसे में आयुर्वेदिक उपाय ठंड और प्रदूषण दोनों से बचाव का प्रभावी, सुरक्षित और किफायती विकल्प बनकर सामने आ रहे हैं।

    सही दिनचर्या से मिलेगा दोहरी सुरक्षा
    राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के रोग एवं विकृति विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह बताते हैं कि सर्दियों में यदि ऋतु के अनुसार दिनचर्या और भोजन अपनाया जाए, तो ठंड और प्रदूषण से होने वाले दुष्प्रभावों को काफी हद तक रोका जा सकता है। उनके अनुसार, रोजाना सरसों के तेल से हल्की मालिश सिर से पांव तक करने से शरीर में गर्माहट बनी रहती है और त्वचा भी सुरक्षित रहती है। इसके साथ ही सुबह नाक में अणु तेल या सरसों तेल की 1–2 बूंद डालने से नाक और फेफड़ों को प्रदूषण से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

    सूर्यस्नान, योग और भाप के लाभ

    सर्दियों में रोजाना कम से कम 30 मिनट धूप में बैठना शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। विशेषज्ञों की सलाह से अनुलोम-विलोम, कपालभाति और भ्रामरी प्राणायाम करने से श्वसन तंत्र सशक्त होता है और फेफड़े बेहतर तरीके से काम करते हैं। रात में भाप लेना भी बेहद फायदेमंद माना गया है। इससे नाक और सांस की नलियां साफ होती हैं, बलगम निकलता है और सर्दी-जुकाम में राहत मिलती है।

    सर्दियों में सही भोजन बनेगा सेहत की ढाल
    आयुर्वेद में हेमंत और शिशिर ऋतु में उष्ण, तरल और स्नेही आहार को लाभकारी बताया गया है। बाल रोग विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया के अनुसार बच्चों को रोज हल्दी वाला दूध देना चाहिए, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इस मौसम में आसानी से मिलने वाला आंवला विटामिन-सी और आयरन का बेहतरीन स्रोत है। इसके अलावा गुड़, अदरक, कच्ची हल्दी, तिल और सोंठ से बने व्यंजन शरीर को अंदर से गर्म रखते हैं और ठंड के असर को कम करते हैं।

    पाचन ठीक रहेगा तो बीमारियां रहेंगी दूर
    प्रभारी अधीक्षक डॉ. अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि ठंड के मौसम में पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है, जिससे कब्ज, गैस और अपच की समस्या बढ़ जाती है। इससे बचने के लिए दिनभर गुनगुना पानी पीना, रात को दूध में एक चम्मच घी लेना और सुबह भिगोया हुआ मेथी दाना खाना फायदेमंद होता है।

    आयुर्वेदिक जीवनशैली है सबसे आसान समाधान
    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग नियमित योग, संतुलित आहार और आयुर्वेदिक उपायों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, तो ठंड और प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। यह न केवल बीमारी से बचाव करता है, बल्कि शरीर को अंदर से मजबूत भी बनाता है।