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  • 45°C की आग उगलती गर्मी में ऐसे बचाएं खुद को, नौतपा में भूलकर भी न करें ये गलतियां

    45°C की आग उगलती गर्मी में ऐसे बचाएं खुद को, नौतपा में भूलकर भी न करें ये गलतियां


    नई दिल्ली । नौतपा के नौ दिन साल के सबसे गर्म दिनों में गिने जाते हैं। इस दौरान सूरज की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं और तापमान कई शहरों में 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। तेज धूप, गर्म हवाएं और लू शरीर पर तेजी से असर डालती हैं। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही भी डीहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं की वजह बन सकती है। खासकर उन लोगों के लिए खतरा ज्यादा बढ़ जाता है जिन्हें रोजमर्रा के काम, नौकरी, व्यापार या यात्रा के कारण घर से बाहर निकलना पड़ता है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक नौतपा में सबसे जरूरी है कि शरीर को ज्यादा गर्म होने से बचाया जाए और पानी की कमी न होने दी जाए। डॉक्टरों का कहना है कि अगर सही सावधानी बरती जाए तो इस भीषण गर्मी के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    घर से बाहर निकलते समय कुछ जरूरी चीजें हमेशा साथ रखनी चाहिए। पानी की बोतल, ORS या ग्लूकोज, छाता या टोपी, सनग्लास, गमछा या कॉटन कपड़ा, हल्का स्नैक और जरूरी दवाइयां साथ रखना बेहद जरूरी माना गया है। धूप में निकलते समय सिर और चेहरे को ढंकना लू से बचाने में काफी मदद करता है।

    नौतपा के दौरान सुबह 6 बजे से 10 बजे तक और शाम 5 बजे के बाद बाहर निकलना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक का समय सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। इस दौरान गर्म हवाएं और तेज धूप शरीर का तापमान तेजी से बढ़ा देती हैं। यदि जरूरी काम न हो तो इस समय बाहर निकलने से बचना चाहिए।

    पैदल चलने वालों और बाइक सवारों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। बाइक चलाते समय फुल स्लीव कपड़े, ग्लव्स और हेलमेट का इस्तेमाल करें। हेलमेट के अंदर कॉटन का कपड़ा लगाने से सिर जल्दी गर्म नहीं होता। वहीं पैदल चलने वाले लोग बीच-बीच में छांव में रुककर आराम करें और हर 20 से 30 मिनट में पानी पीते रहें। खाली पेट बाहर निकलना भी खतरनाक हो सकता है।

    डॉक्टरों के अनुसार कुछ शारीरिक संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, ज्यादा पसीना आना या अचानक पसीना बंद हो जाना, तेज कमजोरी, उल्टी, सांस लेने में दिक्कत, शरीर का तापमान बढ़ना, बेहोशी या दिल की धड़कन तेज होना हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत छांव या ठंडी जगह पर जाएं और मेडिकल मदद लें।

    नौतपा में सिर्फ पानी पीना काफी नहीं होता। शरीर से पसीने के साथ जरूरी मिनरल्स भी निकल जाते हैं। इसलिए ORS, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी और बेल या आम पना जैसे देसी पेय शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं। बहुत ज्यादा चाय, कॉफी, शराब और कोल्ड ड्रिंक्स से बचना चाहिए क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकते हैं।

    बच्चों और बुजुर्गों को इस मौसम में खास देखभाल की जरूरत होती है। बच्चों को धूप में खेलने से बचाएं और उन्हें बार-बार पानी या तरल पदार्थ देते रहें। वहीं बुजुर्गों को लंबे समय तक गर्मी में न रहने दें। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट या सांस की बीमारी है उन्हें अतिरिक्त सतर्क रहने की जरूरत है।

    नौतपा के दौरान लाइफस्टाइल में भी बदलाव जरूरी है। हल्का और सुपाच्य भोजन करें। तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और मौसमी फल डाइट में शामिल करें। ढीले और सूती कपड़े पहनें ताकि शरीर में हवा का संचार बना रहे। पर्याप्त नींद और आराम भी शरीर को गर्मी से लड़ने की ताकत देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नौतपा को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। सही सावधानी और जागरूकता ही इस भीषण गर्मी में सबसे बड़ा बचाव है।

  • बारिश से पहले क्यों बढ़ जाते हैं वायरल फीवर के मामले? जानिए मौसम और सेहत का यह अहम संबंध

    बारिश से पहले क्यों बढ़ जाते हैं वायरल फीवर के मामले? जानिए मौसम और सेहत का यह अहम संबंध

    नई दिल्ली । बारिश से ठीक पहले का मौसम शरीर के लिए सबसे संवेदनशील माना जाता है। गर्मी के बाद जब अचानक हवा में नमी बढ़ती है, तापमान बार-बार ऊपर-नीचे होता है और वातावरण अस्थिर हो जाता है, तो वायरस और बैक्टीरिया को फैलने का बेहतर माहौल मिल जाता है। इसी वजह से इस समय वायरल फीवर, फ्लू और इंफेक्शन के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं।

    इस मौसम में शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। दिन में गर्मी और रात में ठंडक के कारण शरीर एडजस्ट नहीं कर पाता, जिससे सर्दी-जुकाम, गले में दर्द और बुखार जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। इसके साथ ही नमी बढ़ने से मच्छरों की संख्या भी बढ़ती है, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

    सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों पर पड़ता है। गंदा पानी, बाहर का खाना और साफ-सफाई की कमी भी पेट से जुड़ी बीमारियों जैसे दस्त, उल्टी और फूड पॉइजनिंग को बढ़ावा देती है।

    कैसे करें बचाव

    इस मौसम में बचाव ही सबसे बड़ा उपाय है। घर के आसपास पानी जमा न होने दें ताकि मच्छर न पनपें। बाहर का खुला या बासी खाना खाने से बचें और हल्का, ताजा भोजन करें। पर्याप्त पानी पिएं और शरीर को हाइड्रेट रखें।

    बारिश में भीगने के बाद तुरंत कपड़े बदलना जरूरी है। बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखें। अगर बुखार, कमजोरी या खांसी लंबे समय तक बनी रहे तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने की बजाय डॉक्टर से सलाह लें।

    थोड़ी सावधानी रखकर इस मौसम की कई गंभीर बीमारियों से आसानी से बचा जा सकता है।
    बारिश से पहले बदलते मौसम, नमी और कमजोर इम्युनिटी के कारण वायरल बीमारियां तेजी से फैलती हैं।

  • हल्दी असली या नकली? घर बैठे इन आसान तरीकों से मिनटों में करें शुद्धता की पहचान

    हल्दी असली या नकली? घर बैठे इन आसान तरीकों से मिनटों में करें शुद्धता की पहचान

    नई दिल्ली । भारतीय रसोई में हल्दी केवल एक मसाला नहीं बल्कि सेहत और परंपरा का अहम हिस्सा मानी जाती है। दाल, सब्जी और कई घरेलू नुस्खों में इसका नियमित उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद में भी हल्दी को इसके औषधीय गुणों के लिए विशेष स्थान दिया गया है। लेकिन बदलते समय के साथ बाजार में मिलने वाली हर हल्दी की शुद्धता पर भरोसा करना अब आसान नहीं रहा है। मिलावट के बढ़ते मामलों ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

    आजकल कई बार हल्दी में चमकदार रंग और बेहतर दिखावट देने के लिए कृत्रिम रंगों और रसायनों का उपयोग किया जाता है। कुछ मामलों में सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले पदार्थ भी मिलाए जाते हैं, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि घर में इस्तेमाल होने वाली हल्दी की शुद्धता की जांच की जाए।

    हल्दी की शुद्धता जांचने का सबसे आसान तरीका पानी का परीक्षण माना जाता है। इसके लिए एक गिलास गुनगुने पानी में थोड़ी मात्रा में हल्दी डालकर कुछ देर के लिए छोड़ दिया जाता है। यदि हल्दी नीचे बैठ जाती है और पानी हल्का पीला रहता है, तो इसे अपेक्षाकृत शुद्ध माना जाता है। लेकिन यदि हल्दी तेजी से घुलने लगे और पानी का रंग गहरा पीला हो जाए, तो यह मिलावट का संकेत हो सकता है।

    इसके अलावा एक और सरल तरीका हथेली परीक्षण है, जिसे घर पर आसानी से किया जा सकता है। इसमें हल्दी की थोड़ी मात्रा हथेली पर रखकर उंगलियों से हल्के से रगड़ा जाता है। यदि हल्दी असली होती है, तो यह हथेली पर हल्का पीला रंग छोड़ती है और उसकी प्राकृतिक खुशबू महसूस होती है। जबकि मिलावटी हल्दी का रंग अक्सर असमान होता है या जल्दी फीका पड़ जाता है।

    कुछ मामलों में हल्दी में खतरनाक रसायनों की मिलावट की भी आशंका होती है। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक परीक्षणों की आवश्यकता पड़ती है, जिनमें रासायनिक प्रतिक्रिया के आधार पर मिलावट की पहचान की जाती है। यह बताया जाता है कि कुछ विशेष रसायनों की मौजूदगी से हल्दी का रंग बदल सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मिलावटी हल्दी लंबे समय में पेट संबंधी समस्याएं, एलर्जी, मतली और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। इसलिए केवल हल्दी ही नहीं बल्कि सभी रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।

    बाजार से हल्दी खरीदते समय उपभोक्ताओं को विश्वसनीय स्रोत और ब्रांड का चयन करना चाहिए। पैक्ड और प्रमाणित उत्पादों को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है। इसके साथ ही समय-समय पर घर में हल्दी की शुद्धता की जांच करना भी एक अच्छी आदत हो सकती है।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो हल्दी जैसी साधारण दिखने वाली चीज भी अगर मिलावटी हो, तो यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। इसलिए थोड़ी सावधानी और जागरूकता अपनाकर हम अपने परिवार की सेहत को सुरक्षित रख सकते हैं।

  • गर्मी का कहर: हीट स्ट्रोक से बचना है तो अपनाएं ये जरूरी उपाय

    गर्मी का कहर: हीट स्ट्रोक से बचना है तो अपनाएं ये जरूरी उपाय


    नई दिल्ली। गर्मी का मौसम अपने चरम पर पहुंचते ही सेहत पर गंभीर असर डालने लगता है। तेज धूप, लू और बढ़ता तापमान शरीर को कमजोर कर देता है, जिससे Heat Stroke यानी लू लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है। अगर समय रहते सावधानी न बरती जाए, तो यह स्थिति गंभीर भी हो सकती है।
    जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है। मौसम विभाग भी आने वाले दिनों में और भीषण गर्मी की चेतावनी दे रहा है, ऐसे में खुद को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। सबसे पहली बात—गर्मी में अपनी सेहत को नजरअंदाज बिल्कुल न करें। यदि आप असहज महसूस करते हैं, तो तुरंत ठंडी जगह पर जाएं और पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
    हीट स्ट्रोक के लक्षण पहचानें
    हीट स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों को समझना बहुत जरूरी है। अचानक चक्कर आना, तेज सिरदर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, अत्यधिक पसीना आना या पसीना बंद हो जाना, शरीर का तापमान बढ़ जाना ये सभी गंभीर संकेत हो सकते हैं। कई मामलों में व्यक्ति को कमजोरी, उलझन या बेहोशी भी महसूस हो सकती है। ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत सतर्क हो जाएं।
    हीट स्ट्रोक में तुरंत क्या करें?
    अगर किसी को लू लगने का शक हो, तो उसे तुरंत ठंडी और हवादार जगह पर ले जाएं। शरीर को ठंडा करने के लिए गीले कपड़े का इस्तेमाल करें और लगातार तापमान पर नजर रखें। इस दौरान शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए Oral Rehydration Solution (ओआरएस), नींबू पानी, छाछ या नमक-शक्कर का घोल देना फायदेमंद होता है।
    यदि हालत में सुधार न हो, तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि गंभीर स्थिति में यह जानलेवा भी हो सकता है।
    बचाव ही सबसे बड़ा उपाय
    हीट स्ट्रोक से बचने के लिए दिन के समय, खासकर दोपहर में धूप में निकलने से बचें। हल्के और ढीले कपड़े पहनें, सिर को ढककर रखें और समय-समय पर पानी पीते रहें। खानपान में तरल पदार्थ और फल शामिल करें, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।
    कुल मिलाकर, गर्मी के इस मौसम में थोड़ी सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। इसलिए सतर्क रहें, लक्षणों को पहचानें और समय रहते सही कदम उठाकर खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखें।
  • कच्चा पपीता है सेहत का पावरहाउस, सूजन और टॉक्सिन दूर करने में असरदार, जानें सही सेवन तरीका

    कच्चा पपीता है सेहत का पावरहाउस, सूजन और टॉक्सिन दूर करने में असरदार, जानें सही सेवन तरीका


    नई दिल्ली । पपीता एक ऐसा फल है जिसे सेहत के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है लेकिन जहां पका हुआ पपीता आमतौर पर ज्यादा खाया जाता है वहीं कच्चा पपीता अपने गुणों के कारण उससे भी अधिक प्रभावी माना जाता है। पोषक तत्वों से भरपूर कच्चा पपीता शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है और आयुर्वेद में इसे औषधि के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि इसके सेवन के दौरान कुछ जरूरी सावधानियों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है।

    कच्चे पपीते में फाइबर विटामिन सी और कैरोटीनॉयड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं। इसमें मौजूद पापेन नामक एंजाइम खासतौर पर पाचन तंत्र के लिए बेहद फायदेमंद होता है। यह एंजाइम खाने को खासकर प्रोटीन को तेजी से तोड़ने में मदद करता है जिससे भोजन आसानी से पच जाता है। यही कारण है कि जिन लोगों को गैस अपच या पेट भारी रहने की समस्या होती है उनके लिए कच्चा पपीता एक कारगर उपाय माना जाता है।

    अगर भोजन के बाद पेट में भारीपन महसूस होता है या भूख कम लगने लगी है तो कच्चे पपीते का सेवन लाभदायक हो सकता है। इसे सब्जी के रूप में खाने से पाचन क्रिया बेहतर होती है और भूख भी बढ़ती है। यह कमजोर पाचन शक्ति को मजबूत बनाने में सहायक है जिससे शरीर को जरूरी पोषण सही तरीके से मिल पाता है।

    वजन नियंत्रित करने के लिए भी कच्चा पपीता एक अच्छा विकल्प माना जाता है। इसमें कैलोरी कम होती है और फाइबर की मात्रा अधिक होती है जिससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है। इससे ओवरइटिंग की आदत पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है और धीरे-धीरे वजन संतुलित होने लगता है।

    कच्चा पपीता शरीर की अंदरूनी सूजन को कम करने में भी प्रभावी है। यह शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालने में मदद करता है जिससे रक्त शुद्ध होता है और त्वचा पर भी सकारात्मक असर दिखाई देता है। नियमित और संतुलित मात्रा में सेवन करने से चेहरे पर निखार आता है और शरीर अधिक ऊर्जावान महसूस करता है।

    महिलाओं के लिए भी कच्चा पपीता लाभकारी माना जाता है क्योंकि यह हॉर्मोन संतुलन में मदद करता है लेकिन इसका सेवन सोच समझकर करना जरूरी है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं या जो महिलाएं गर्भधारण की योजना बना रही हैं उन्हें इसका सेवन डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए क्योंकि गलत तरीके से सेवन करने पर यह नुकसान भी पहुंचा सकता है।

    कच्चे पपीते को सीधे खाने के बजाय उबालकर या पकाकर ही सेवन करना बेहतर माना जाता है। इसे सब्जी सूप सलाद या जूस के रूप में लिया जा सकता है लेकिन मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है। अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर पर विपरीत प्रभाव भी पड़ सकता है।

    इस तरह कच्चा पपीता एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करता है जो पाचन सुधारने से लेकर शरीर को अंदर से साफ करने तक कई फायदे देता है लेकिन इसके लाभ तभी मिलते हैं जब इसे सही तरीके और संतुलित मात्रा में सेवन किया जाए।

  • हेल्दी बनने की जल्दी पड़ सकती है भारी, डॉक्टर ने बताए मॉर्निंग रूटीन के सही नियम

    हेल्दी बनने की जल्दी पड़ सकती है भारी, डॉक्टर ने बताए मॉर्निंग रूटीन के सही नियम

    भोपाल । आजकल परफेक्ट मॉर्निंग रूटीन का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जहां लोग सुबह जल्दी उठकर वर्कआउट, ईमेल चेक करना और कॉफी पीने जैसी आदतों को अपनाते हैं। पहली नजर में ये आदतें हेल्दी और प्रोडक्टिव लगती हैं, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार इन्हें गलत तरीके से अपनाने पर ये शरीर पर उल्टा असर डाल सकती हैं। असली समस्या इन आदतों में नहीं, बल्कि उन्हें जल्दबाजी और बिना तैयारी के करने में है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि इंसान का शरीर नींद से जागने के बाद तुरंत एक्टिव मोड में नहीं आता। उसे एक ट्रांजिशन समय यानी एक ब्रिज की जरूरत होती है। अगर यह समय नहीं दिया जाता, तो शरीर अचानक हाई अलर्ट स्थिति में पहुंच जाता है, जिससे तनाव बढ़ सकता है। रिसर्च के अनुसार, अचानक एक्टिव होने से शरीर में कॉर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है, जिसका असर मूड, फोकस और मानसिक स्थिति पर पड़ता है।

    सबसे आम गलती जो लगभग 99 प्रतिशत लोग करते हैं, वह है सुबह उठते ही मोबाइल फोन देखना। अलार्म बंद करते ही लोग नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया या ईमेल चेक करने लगते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक इससे दिमाग तुरंत अलर्ट मोड में चला जाता है और तनाव बढ़ने लगता है। इससे चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और मानसिक थकान जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

    इसके अलावा, आजकल प्रोडक्टिव दिखने का दबाव भी लोगों पर हावी हो गया है। लोग मानते हैं कि जितना ज्यादा काम सुबह में कर लिया जाए, दिन उतना बेहतर होगा। लेकिन शरीर इस तरह काम नहीं करता। बिना तैयारी के तुरंत वर्कआउट शुरू करना या लगातार डिजिटल गतिविधियों में लग जाना शरीर के लिए तनाव का कारण बन सकता है।

    एक और बड़ी गलती है खराब नींद के बावजूद जल्दी उठना। अगर रात में पर्याप्त नींद नहीं ली गई या देर तक फोन इस्तेमाल किया गया, तो सुबह की शुरुआत खराब हो जाती है। नींद की कमी का असर याददाश्त, मूड और निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ता है। इसलिए अच्छी सुबह की शुरुआत के लिए अच्छी नींद बेहद जरूरी है।

    कई लोग सुबह उठते ही कॉफी पीना शुरू कर देते हैं, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार 6 से 8 घंटे की नींद के बाद शरीर हल्का डिहाइड्रेट हो जाता है। ऐसे में सबसे पहले पानी पीना ज्यादा जरूरी होता है। पानी पीने से शरीर हाइड्रेट होता है, दिमाग बेहतर तरीके से काम करता है और थकान कम होती है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि सुबह उठने के बाद का पहला एक घंटा बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसी समय शरीर का सर्केडियन रिदम सेट होता है, जो पूरे दिन की ऊर्जा और मूड को प्रभावित करता है। अगर इस समय जल्दबाजी की जाए, तो दिनभर थकान और फोकस की कमी बनी रह सकती है।

    एक सही और संतुलित मॉर्निंग रूटीन के लिए डॉक्टर कुछ आसान आदतें अपनाने की सलाह देते हैं। सुबह उठकर तुरंत भागदौड़ करने के बजाय कुछ मिनट शांत बैठें, गहरी सांस लें और शरीर को धीरे-धीरे एक्टिव करें। सबसे पहले पानी पिएं, हल्की धूप लें और हल्की स्ट्रेचिंग से शुरुआत करें। इसके बाद ही वर्कआउट करें।

    साथ ही, सुबह उठते ही फोन इस्तेमाल करने से बचें और दिन की शुरुआत शांत और सकारात्मक गतिविधियों से करें। अगर इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाए, तो न केवल दिन की शुरुआत बेहतर होगी बल्कि पूरे दिन की ऊर्जा, फोकस और मानसिक स्थिति भी संतुलित बनी रहेगी।

  • माइग्रेन का आसान टेस्ट घर पर, समझें 5-4-3-2-1 फॉर्मूला और बचाव..

    माइग्रेन का आसान टेस्ट घर पर, समझें 5-4-3-2-1 फॉर्मूला और बचाव..


    नई दिल्ली। आज के डिजिटल दौर में सिरदर्द एक आम समस्या बन चुकी है लेकिन हर सिरदर्द को नजरअंदाज करना सही नहीं होता क्योंकि यह माइग्रेन भी हो सकता है यह एक जटिल न्यूरोलॉजिकल समस्या है जिसकी समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है

    विशेषज्ञों के अनुसार माइग्रेन को पहचानने के लिए 5-4-3-2-1 का एक आसान फॉर्मूला अपनाया जाता है जिसे आम व्यक्ति भी समझ सकता है इस फॉर्मूले के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को जीवन में कम से कम 5 बार तेज सिरदर्द का अटैक आया हो और यह दर्द 4 घंटे से लेकर 3 दिन तक बना रहता हो तो यह एक संकेत हो सकता है

    इसके अलावा दर्द की 4 खासियतों में से कम से कम 2 मौजूद हों जैसे सिर के एक तरफ दर्द होना धड़कन जैसा दर्द होना दर्द बहुत तेज होना या रोजमर्रा के काम में बाधा आना तो माइग्रेन की संभावना बढ़ जाती है साथ ही 2 में से 1 लक्षण जैसे मतली उल्टी या तेज रोशनी और आवाज से परेशानी भी इसका अहम संकेत माना जाता है

    माइग्रेन को ट्रिगर करने वाले कारण भी काफी अहम होते हैं तेज धूप चमकदार रोशनी और शोर इस समस्या को बढ़ा सकते हैं वहीं कुछ खाने की चीजें जैसे चीज चॉकलेट कॉफी और चाइनीज फूड भी इसे ट्रिगर कर सकते हैं तेज परफ्यूम या गंध भी कई लोगों में माइग्रेन का कारण बनती है महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है खासकर हार्मोनल बदलाव के दौरान

    डॉक्टरों का मानना है कि माइग्रेन को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है क्योंकि इसका असर याददाश्त और ध्यान क्षमता पर पड़ सकता है लंबे समय में यह स्ट्रेस और डिप्रेशन का कारण बन सकता है और गंभीर मामलों में ब्रेन स्ट्रोक का जोखिम भी बढ़ा सकता है

    इससे बचाव के लिए कुछ आसान आदतें अपनाना जरूरी है रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लें स्क्रीन टाइम कम करें और उन फूड्स से दूरी बनाए रखें जो माइग्रेन को बढ़ाते हैं नियमित दिनचर्या और संतुलित जीवनशैली इस समस्या को काफी हद तक कंट्रोल करने में मदद कर सकती है

    अगर सिरदर्द बार बार हो रहा है या ऊपर बताए गए लक्षण दिख रहे हैं तो बिना देरी किए डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है क्योंकि सही समय पर पहचान ही सबसे बड़ा बचाव है

  • करेला: कड़वा जरूर, लेकिन सेहत का खजाना; जानें किन बीमारियों में है रामबाण

    करेला: कड़वा जरूर, लेकिन सेहत का खजाना; जानें किन बीमारियों में है रामबाण


    नई दिल्ली: करेला का नाम सुनते ही अधिकतर लोग मुंह बना लेते हैं, लेकिन यही कड़वा करेला सेहत के लिहाज से किसी वरदान से कम नहीं है। आयुर्वेद में करेला को औषधि के रूप में माना गया है और इसे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में लाभकारी बताया गया है। सिर्फ खाने से ही नहीं, बल्कि बाहरी रूप से लगाने पर भी करेला शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है।

    आयुर्वेद में करेले को करवेल्लक कहा जाता है। इसे ऐसा पौधा माना गया है जो दूषित रक्त को शुद्ध करने, बढ़ी हुई शर्करा को नियंत्रित करने और शरीर में मौजूद कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। करेला विटामिन A, B और C का अच्छा स्रोत है, जो इम्युनिटी को मजबूत करने के साथ-साथ त्वचा और आंखों की सेहत के लिए भी जरूरी माने जाते हैं।करेला अग्नि और अग्न्याशय तक प्रभाव डालता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर होता है। यह आंतों की गहराई से सफाई कर वहां मौजूद कीड़े, हानिकारक बैक्टीरिया और विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है। जिन लोगों को बार-बार पेट साफ न होने, गैस, अपच या भूख न लगने की समस्या रहती है उनके लिए करेले का जूस या सलाद बेहद फायदेमंद हो सकता है।

    अगर शरीर में लंबे समय से कब्ज की समस्या बनी रहे, तो इससे आंतों में कीड़े पनप सकते हैं और पोषक तत्व शरीर में ठीक से अवशोषित नहीं हो पाते। ऐसे में करेला शरीर का प्राकृतिक डिटॉक्स करता है और पाचन तंत्र को फिर से सक्रिय बनाता है। इसके कड़वे स्वाद को कम करने के लिए इसे काटकर नमक लगाकर कुछ घंटों के लिए छोड़ दिया जाए, तो इसका कड़वापन काफी हद तक कम हो जाता है।त्वचा संबंधी समस्याओं में भी करेला बेहद उपयोगी माना जाता है। चेहरे पर मुंहासे, एक्ने, खुजली या रूखापन अक्सर रक्त की अशुद्धि का संकेत होते हैं। रोजाना सीमित मात्रा में करेले के जूस का सेवन रक्त को शुद्ध करता है, जिससे त्वचा में निखार आता है और एक्ने की समस्या कम होती है। साथ ही यह शरीर की खुद को ठीक करने की क्षमता को भी बढ़ाता है।

    करेला स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए भी लाभकारी बताया गया है, क्योंकि यह दूध बनाने वाले हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि, इस दौरान इसका सेवन डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए। वहीं, अगर शरीर पर कोई घाव, फोड़ा या सूजन हो जाए, तो करेले का लेप लगाने से घाव जल्दी भरता है और संक्रमण का खतरा कम होता है।कुल मिलाकर करेला भले ही स्वाद में कड़वा हो, लेकिन इसके फायदे इतने ज्यादा हैं कि इसे अपनी डाइट में शामिल करना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।

  • सर्दियों में शरीर का सुरक्षा कवच है ब्राउन फैट मोटापा बढ़ाने नहींकैलोरी जलाने में करता है मदद

    सर्दियों में शरीर का सुरक्षा कवच है ब्राउन फैट मोटापा बढ़ाने नहींकैलोरी जलाने में करता है मदद


    नई दिल्ली । आमतौर पर फैट या वसा शब्द सुनते ही हमारे मन में मोटापे और बीमारियों का ख्याल आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके शरीर में एक ऐसा गुड फैट भी है जो आपको मोटा करने के बजाय पतला रखने और बीमारियों से बचाने में मदद करता है मेडिकल साइंस की भाषा में इसे ब्राउन फैट कहा जाता है। विशेषज्ञों के अनुसारसर्दियों के मौसम में यह शरीर के लिए किसी सुरक्षा कवच से कम नहीं है।

    व्हाइट फैट बनाम ब्राउन फैट क्या है अंतर

    हमारे शरीर में मुख्य रूप से दो प्रकार के फैट पाए जाते हैं। पहला व्हाइट फैटजिसका काम शरीर में अतिरिक्त ऊर्जा को जमा करना है। जब हम जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेते हैंतो वह व्हाइट फैट के रूप में जमा होकर मोटापे का कारण बनती है इसके विपरीतब्राउन फैट एक सक्रिय ऊतक है। इसमें प्रचुर मात्रा में माइटोकॉन्ड्रिया होते हैंजो इसे गहरा रंग देते हैं। ब्राउन फैट का मुख्य कार्य कैलोरी को स्टोर करना नहींबल्कि उसे जलाकर शरीर के लिए ऊष्मा पैदा करना है। जब शरीर को ठंड लगती हैतो यही ब्राउन फैट बर्न होकर हमें भीतर से गर्माहट देता है।

    सेहत के लिए क्यों है यह जरूरी

    ब्राउन फैट केवल शरीर को गर्म ही नहीं रखताबल्कि इसके कई स्वास्थ्य लाभ भी हैं मेटाबॉलिज्म में सुधार यह शरीर की चयापचय दर को बढ़ाता हैजिससे वजन नियंत्रित रहता है। ब्लड शुगर पर नियंत्रण ब्राउन फैट इंसुलिन सेंसिटिविटी को सुधारता है जिससे टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम होता है। तेजी से कैलोरी बर्न रिसर्च के अनुसारसक्रिय ब्राउन फैट सामान्य फैट की तुलना में कई गुना तेजी से कैलोरी जला सकता है। हृदय स्वास्थ्य यह खून से ट्राइग्लिसराइड्स और खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने में भी सहायक हो सकता है।

    ब्राउन फैट की कमी के संकेत

    यदि किसी व्यक्ति के शरीर में ब्राउन फैट की कमी है और व्हाइट फैट की अधिकता हैतो उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे लोगों को ठंड अधिक लगती हैवे जल्दी थक जाते हैं और उनका वजन तेजी से बढ़ने लगता है। मेटाबॉलिज्म धीमा होने के कारण उन्हें सुस्ती और इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

    कैसे करें इसे एक्टिवेट

    ब्राउन फैट किसी भोजन के जरिए सीधे शरीर में नहीं डाला जा सकताबल्कि इसे जीवनशैली के माध्यम से सक्रिय करना पड़ता हैठंड का संपर्क हल्की ठंड में रहने या ठंडे पानी से स्नान करने से शरीर का ब्राउन फैट सक्रिय हो जाता है। नियमित व्यायाम वर्कआउट करने से शरीर में इरिसिन नामक हार्मोन निकलता हैजो व्हाइट फैट को ब्राउन फैट में बदलने में मदद करता है।  संतुलित आहार पोषण युक्त भोजन और सही मात्रा में कैलोरी का सेवन इसे स्वस्थ बनाए रखता है। ब्राउन फैट हमारे शरीर की वह आंतरिक भट्टी है जो न केवल हमें कड़ाके की ठंड से बचाती हैबल्कि आधुनिक जीवनशैली की बीमारियों जैसे मोटापा और डायबिटीज से लड़ने में भी सक्षम है। फिट रहने के लिए जरूरी है कि हम अपनी जीवनशैली में सुधार कर इस गुड फैट को एक्टिव रखें।

  • माइग्रेन से राहत पाने के लिए दवा के बिना करें लाइफस्टाइल में ये बदलाव

    माइग्रेन से राहत पाने के लिए दवा के बिना करें लाइफस्टाइल में ये बदलाव


    नई दिल्ली । माइग्रेन सिरदर्द का एक गंभीर रूप है जो सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी प्रभावित कर सकता है। यह न केवल व्यक्ति की कार्य क्षमता को प्रभावित करता है बल्कि जीवनशैली को भी चुनौतीपूर्ण बना सकता है। माइग्रेन में सिर के एक हिस्से में तेज दर्द मतली उल्टी तेज रोशनी और शोर से परेशानी जैसी समस्याएं होती हैं। यह आम सिरदर्द से कहीं अधिक होता है और कई बार माइग्रेन के लक्षण सामान्य सिरदर्द से बढ़कर हो सकते हैं। हालांकि माइग्रेन का इलाज दवाओं से किया जाता है लेकिन अगर कुछ लाइफस्टाइल बदलाव किए जाएं तो बिना दवा के भी राहत पाई जा सकती है।

    माइग्रेन के दर्द को बढ़ाने वाली आदतें  अनहेल्दी डाइट

    कुछ खाने-पीने की चीजें माइग्रेन को ट्रिगर कर सकती हैं जैसे चॉकलेट कैफीन शराब और कुछ प्रोसेस्ड फूड्स। अगर आप यह महसूस करते हैं कि इन चीजों के सेवन से आपका माइग्रेन बढ़ता है तो इन्हें अपनी डाइट से हटा दें।

    नींद की कमी

    कम नींद या अत्यधिक नींद भी माइग्रेन का कारण बन सकती है। यदि आप नियमित रूप से नींद की कमी महसूस करते हैं तो दिन में कम से कम 7-8 घंटे की नींद लेना आवश्यक है।

    तनाव

    मानसिक तनाव माइग्रेन के दर्द को और बढ़ा सकता है। इसलिए मानसिक शांति बनाए रखना जरूरी है। काम के दबाव और तनाव से बचने के लिए ध्यान योग या गहरी सांस लेने की तकनीकें अपनाई जा सकती हैं।

    माइग्रेन से राहत के लिए लाइफस्टाइल में बदलाव  नियमित व्यायाम 

    हल्का-फुल्का व्यायाम जैसे योग स्विमिंग या चलना माइग्रेन से राहत देने में मदद कर सकता है। व्यायाम से शरीर में एंडोर्फिन  रिलीज होते हैं जो दर्द को कम करने में मदद करते हैं।

    हाइड्रेशन 

    शरीर में पानी की कमी से भी माइग्रेन की समस्या बढ़ सकती है। दिनभर में पर्याप्त पानी पीना जरूरी है। यदि शरीर में पानी की कमी होती है तो सिरदर्द और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

    सही खानपान

    सही और पोषण से भरपूर आहार लेना माइग्रेन की समस्या को कम करने में मदद कर सकता है। ताजे फल हरी सब्जियां साबुत अनाज और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करें। कैफीन और शराब से बचें।

    नींद का पैटर्न ठीक करें

    एक नियमित सोने का समय बनाएं और रोजाना 7-8 घंटे की नींद लें। सही समय पर सोना और जागना आपके शरीर को आराम देने के लिए महत्वपूर्ण है।

    तनाव कम करें

    तरीका है तनाव कम करना। ध्यान प्राणायाम गहरी सांस लेने की तकनीकें और हल्की-फुल्की चहलकदमी करने से मानसिक तनाव कम हो सकता है। इसके अलावा आपको जो पसंदीदा एक्टिविटी करें जैसे किताबें पढ़ना या संगीत सुनना वह भी तनाव को कम करने में मदद कर सकता है।

    कर्मस्थल पर आराम

    लंबे समय तक कंप्यूटर या स्मार्टफोन का उपयोग माइग्रेन का कारण बन सकता है। इसलिए यदि आप लंबे समय तक स्क्रीन पर काम करते हैं तो आंखों को आराम देने के लिए बीच-बीच में ब्रेक लें। माइग्रेन एक गंभीर समस्या हो सकती है लेकिन अगर आप अपनी जीवनशैली में कुछ छोटे बदलाव करते हैं तो आप बिना दवा के भी इससे राहत पा सकते हैं। सही खानपान पर्याप्त नींद नियमित व्यायाम और तनावमुक्त जीवन के साथ माइग्रेन के दर्द को कम किया जा सकता है। इन सरल उपायों को अपनाकर आप बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं और माइग्रेन को नियंत्रित कर सकते हैं।