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  • फ्रूट जूस भी बन सकता है सेहत का दुश्मन नई स्टडी में बचपन की आदत और हाई बीपी के बीच मिला बड़ा संबंध

    फ्रूट जूस भी बन सकता है सेहत का दुश्मन नई स्टडी में बचपन की आदत और हाई बीपी के बीच मिला बड़ा संबंध


    नई दिल्ली। बच्चों को स्वस्थ रखने की चाह में माता पिता अक्सर उन्हें फ्रूट जूस और मीठे पेय पदार्थ पिलाना बेहतर विकल्प मानते हैं। कई परिवारों में यह धारणा बनी हुई है कि बाजार में मिलने वाले पैक्ड फ्रूट जूस या मीठे ड्रिंक्स सॉफ्ट ड्रिंक से अधिक फायदेमंद होते हैं। लेकिन हाल ही में सामने आई एक बड़ी रिसर्च ने इस सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अध्ययन के अनुसार बचपन में नियमित रूप से अधिक मात्रा में फ्रूट जूस और चीनी वाले पेय पदार्थों का सेवन आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन का खतरा बढ़ा सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ बच्चों के खानपान में संतुलन और प्राकृतिक आहार को प्राथमिकता देने की सलाह दे रहे हैं।

    यह अध्ययन प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल Circulation में प्रकाशित हुआ है। इसमें अमेरिका के 25 हजार से अधिक लोगों के स्वास्थ्य पर लगभग 25 वर्षों तक नजर रखी गई। इसे इस विषय पर अब तक की सबसे लंबी और व्यापक रिसर्च में से एक माना जा रहा है। शोधकर्ताओं ने बचपन और किशोरावस्था में खानपान की आदतों का विश्लेषण किया और फिर वयस्क होने पर उनके स्वास्थ्य परिणामों का मूल्यांकन किया।

    रिसर्च में सामने आया कि जो बच्चे और किशोर प्रतिदिन दो या उससे अधिक बार चीनी वाले ड्रिंक्स पीते थे उनमें बड़े होने पर हाई ब्लड प्रेशर का खतरा उन लोगों की तुलना में लगभग 52 प्रतिशत अधिक पाया गया जो ऐसे पेय सप्ताह में तीन बार से भी कम पीते थे। इसी तरह जो बच्चे प्रतिदिन डेढ़ या उससे अधिक सर्विंग फ्रूट जूस का सेवन करते थे उनमें भी हाई ब्लड प्रेशर का जोखिम लगभग 35 प्रतिशत अधिक देखा गया। यह निष्कर्ष बताता है कि केवल सॉफ्ट ड्रिंक ही नहीं बल्कि अधिक मात्रा में फ्रूट जूस भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि पैक्ड फ्रूट जूस में अक्सर अतिरिक्त चीनी मिलाई जाती है और इनमें प्राकृतिक फाइबर की मात्रा बहुत कम होती है। जब बच्चे पूरा फल खाते हैं तो उन्हें विटामिन खनिज और फाइबर एक साथ मिलते हैं जिससे शरीर में शुगर धीरे धीरे अवशोषित होती है। इसके विपरीत जूस में फाइबर की कमी होने से शरीर में शुगर तेजी से पहुंचती है और लंबे समय तक इसका असर ब्लड प्रेशर मेटाबॉलिज्म और हृदय स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

    बच्चों में मीठे पेय पदार्थों की अधिक आदत मोटापा इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप टू डायबिटीज जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ा सकती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बच्चों को पैक्ड जूस और शुगर युक्त पेय पदार्थों के बजाय ताजे फल सादा पानी नारियल पानी और बिना चीनी वाले प्राकृतिक पेय देने की सलाह देते हैं। यदि जूस देना भी हो तो उसकी मात्रा सीमित रखनी चाहिए और जहां तक संभव हो पूरा फल खिलाना अधिक लाभकारी माना जाता है।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि स्वस्थ जीवनशैली की शुरुआत बचपन से ही होती है। संतुलित आहार नियमित शारीरिक गतिविधि पर्याप्त नींद और कम चीनी वाला भोजन बच्चों को भविष्य में हृदय रोग हाई ब्लड प्रेशर और अन्य गंभीर बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए माता पिता को बच्चों की खानपान संबंधी आदतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए और केवल स्वाद के आधार पर नहीं बल्कि पोषण को प्राथमिकता देकर भोजन का चयन करना चाहिए।

    हालांकि यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण संबंध की ओर संकेत करता है लेकिन किसी भी बच्चे के खानपान में बड़ा बदलाव करने से पहले बाल रोग विशेषज्ञ या पोषण विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा। सही जानकारी और संतुलित भोजन ही बच्चों के स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की मजबूत नींव बन सकता है।

  • मानसून में बढ़ा जानलेवा खतरा मच्छर के काटने से हो सकती है दिमाग में सूजन जानिए जापानी इंसेफेलाइटिस के लक्षण और बचाव

    मानसून में बढ़ा जानलेवा खतरा मच्छर के काटने से हो सकती है दिमाग में सूजन जानिए जापानी इंसेफेलाइटिस के लक्षण और बचाव


    नई दिल्ली । मानसून का मौसम जहां ठंडक और राहत लेकर आता है वहीं अपने साथ कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। आमतौर पर लोग मच्छरों से होने वाली बीमारियों में डेंगू और मलेरिया को सबसे बड़ा खतरा मानते हैं लेकिन एक ऐसी बीमारी भी है जो इन दोनों से कहीं ज्यादा गंभीर साबित हो सकती है। इस बीमारी का नाम जापानी इंसेफेलाइटिस है। यह एक वायरल संक्रमण है जो सीधे दिमाग को प्रभावित करता है और गंभीर मामलों में मरीज की जान तक ले सकता है। कई बार इस बीमारी से बच जाने वाले लोगों को भी जीवनभर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

    जापानी इंसेफेलाइटिस जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस के कारण होता है। यह वायरस फ्लैविवायरस परिवार का सदस्य है जिसमें डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस भी शामिल हैं। संक्रमण मुख्य रूप से क्यूलेक्स प्रजाति के संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है। ये मच्छर बारिश के मौसम में धान के खेतों तालाबों दलदली क्षेत्रों और लंबे समय तक जमा पानी वाली जगहों पर तेजी से पनपते हैं। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के विपरीत क्यूलेक्स मच्छर शाम से लेकर सुबह तक सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं इसलिए रात के समय विशेष सावधानी जरूरी होती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार जब संक्रमित मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो वायरस सबसे पहले रक्त में प्रवेश करता है। इसके बाद यह ब्लड ब्रेन बैरियर को पार करके मस्तिष्क तक पहुंच सकता है। दिमाग में संक्रमण फैलने के बाद सूजन की स्थिति बनती है जिसे मेडिकल भाषा में इंसेफेलाइटिस कहा जाता है। यही कारण है कि यह बीमारी बेहद खतरनाक मानी जाती है क्योंकि इसका असर सीधे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर पड़ता है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में हर वर्ष लगभग 68000 लोग जापानी इंसेफेलाइटिस से संक्रमित होते हैं। दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र इसके सबसे बड़े प्रभावित इलाके हैं। भारत में भी हर वर्ष इसके मामले सामने आते हैं। बच्चों में इसका खतरा सबसे अधिक माना जाता है। विशेष रूप से 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग धान के खेतों में काम करने वाले किसान और ऐसे यात्री जिन्होंने टीकाकरण नहीं कराया है उनके संक्रमित होने की संभावना अधिक रहती है।

    इस बीमारी की शुरुआत सामान्य वायरल संक्रमण जैसी दिखाई देती है। शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार सिरदर्द उल्टी कमजोरी और अत्यधिक थकान शामिल हो सकते हैं। लेकिन यदि वायरस दिमाग तक पहुंच जाए तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है। मरीज में तेज बुखार के साथ भ्रम की स्थिति बेहोशी दौरे पड़ना गर्दन में अकड़न चलने में कठिनाई और चेतना खोने जैसे लक्षण विकसित हो सकते हैं। ऐसे संकेत दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी होता है क्योंकि इलाज में देरी जानलेवा साबित हो सकती है।

    डॉक्टरों का कहना है कि केवल सीटी स्कैन से हर बार इस बीमारी की पुष्टि नहीं हो पाती। आवश्यकता पड़ने पर एमआरआई रक्त जांच और सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड की जांच के जरिए संक्रमण की पुष्टि की जाती है। फिलहाल इस बीमारी का कोई विशेष एंटीवायरल इलाज उपलब्ध नहीं है। उपचार के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर रखना संक्रमण से होने वाली जटिलताओं को नियंत्रित करना और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की कार्यप्रणाली बनाए रखना ही मुख्य उद्देश्य होता है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बीमारी से बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय है। मच्छरों से बचने के लिए पूरी बांह के कपड़े पहनें रात में मच्छरदानी का उपयोग करें घर और आसपास पानी जमा न होने दें तथा जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। जिन क्षेत्रों में जापानी इंसेफेलाइटिस का खतरा अधिक है वहां स्वास्थ्य विभाग द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले टीकाकरण का लाभ अवश्य लेना चाहिए। थोड़ी सी सावधानी इस गंभीर बीमारी से सुरक्षा का सबसे मजबूत कवच बन सकती है।

  • 45°C की आग उगलती गर्मी में ऐसे बचाएं खुद को, नौतपा में भूलकर भी न करें ये गलतियां

    45°C की आग उगलती गर्मी में ऐसे बचाएं खुद को, नौतपा में भूलकर भी न करें ये गलतियां


    नई दिल्ली । नौतपा के नौ दिन साल के सबसे गर्म दिनों में गिने जाते हैं। इस दौरान सूरज की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं और तापमान कई शहरों में 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। तेज धूप, गर्म हवाएं और लू शरीर पर तेजी से असर डालती हैं। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही भी डीहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं की वजह बन सकती है। खासकर उन लोगों के लिए खतरा ज्यादा बढ़ जाता है जिन्हें रोजमर्रा के काम, नौकरी, व्यापार या यात्रा के कारण घर से बाहर निकलना पड़ता है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक नौतपा में सबसे जरूरी है कि शरीर को ज्यादा गर्म होने से बचाया जाए और पानी की कमी न होने दी जाए। डॉक्टरों का कहना है कि अगर सही सावधानी बरती जाए तो इस भीषण गर्मी के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    घर से बाहर निकलते समय कुछ जरूरी चीजें हमेशा साथ रखनी चाहिए। पानी की बोतल, ORS या ग्लूकोज, छाता या टोपी, सनग्लास, गमछा या कॉटन कपड़ा, हल्का स्नैक और जरूरी दवाइयां साथ रखना बेहद जरूरी माना गया है। धूप में निकलते समय सिर और चेहरे को ढंकना लू से बचाने में काफी मदद करता है।

    नौतपा के दौरान सुबह 6 बजे से 10 बजे तक और शाम 5 बजे के बाद बाहर निकलना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक का समय सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। इस दौरान गर्म हवाएं और तेज धूप शरीर का तापमान तेजी से बढ़ा देती हैं। यदि जरूरी काम न हो तो इस समय बाहर निकलने से बचना चाहिए।

    पैदल चलने वालों और बाइक सवारों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। बाइक चलाते समय फुल स्लीव कपड़े, ग्लव्स और हेलमेट का इस्तेमाल करें। हेलमेट के अंदर कॉटन का कपड़ा लगाने से सिर जल्दी गर्म नहीं होता। वहीं पैदल चलने वाले लोग बीच-बीच में छांव में रुककर आराम करें और हर 20 से 30 मिनट में पानी पीते रहें। खाली पेट बाहर निकलना भी खतरनाक हो सकता है।

    डॉक्टरों के अनुसार कुछ शारीरिक संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, ज्यादा पसीना आना या अचानक पसीना बंद हो जाना, तेज कमजोरी, उल्टी, सांस लेने में दिक्कत, शरीर का तापमान बढ़ना, बेहोशी या दिल की धड़कन तेज होना हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत छांव या ठंडी जगह पर जाएं और मेडिकल मदद लें।

    नौतपा में सिर्फ पानी पीना काफी नहीं होता। शरीर से पसीने के साथ जरूरी मिनरल्स भी निकल जाते हैं। इसलिए ORS, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी और बेल या आम पना जैसे देसी पेय शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं। बहुत ज्यादा चाय, कॉफी, शराब और कोल्ड ड्रिंक्स से बचना चाहिए क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकते हैं।

    बच्चों और बुजुर्गों को इस मौसम में खास देखभाल की जरूरत होती है। बच्चों को धूप में खेलने से बचाएं और उन्हें बार-बार पानी या तरल पदार्थ देते रहें। वहीं बुजुर्गों को लंबे समय तक गर्मी में न रहने दें। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट या सांस की बीमारी है उन्हें अतिरिक्त सतर्क रहने की जरूरत है।

    नौतपा के दौरान लाइफस्टाइल में भी बदलाव जरूरी है। हल्का और सुपाच्य भोजन करें। तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और मौसमी फल डाइट में शामिल करें। ढीले और सूती कपड़े पहनें ताकि शरीर में हवा का संचार बना रहे। पर्याप्त नींद और आराम भी शरीर को गर्मी से लड़ने की ताकत देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नौतपा को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। सही सावधानी और जागरूकता ही इस भीषण गर्मी में सबसे बड़ा बचाव है।

  • बारिश से पहले क्यों बढ़ जाते हैं वायरल फीवर के मामले? जानिए मौसम और सेहत का यह अहम संबंध

    बारिश से पहले क्यों बढ़ जाते हैं वायरल फीवर के मामले? जानिए मौसम और सेहत का यह अहम संबंध

    नई दिल्ली । बारिश से ठीक पहले का मौसम शरीर के लिए सबसे संवेदनशील माना जाता है। गर्मी के बाद जब अचानक हवा में नमी बढ़ती है, तापमान बार-बार ऊपर-नीचे होता है और वातावरण अस्थिर हो जाता है, तो वायरस और बैक्टीरिया को फैलने का बेहतर माहौल मिल जाता है। इसी वजह से इस समय वायरल फीवर, फ्लू और इंफेक्शन के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं।

    इस मौसम में शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। दिन में गर्मी और रात में ठंडक के कारण शरीर एडजस्ट नहीं कर पाता, जिससे सर्दी-जुकाम, गले में दर्द और बुखार जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। इसके साथ ही नमी बढ़ने से मच्छरों की संख्या भी बढ़ती है, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

    सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों पर पड़ता है। गंदा पानी, बाहर का खाना और साफ-सफाई की कमी भी पेट से जुड़ी बीमारियों जैसे दस्त, उल्टी और फूड पॉइजनिंग को बढ़ावा देती है।

    कैसे करें बचाव

    इस मौसम में बचाव ही सबसे बड़ा उपाय है। घर के आसपास पानी जमा न होने दें ताकि मच्छर न पनपें। बाहर का खुला या बासी खाना खाने से बचें और हल्का, ताजा भोजन करें। पर्याप्त पानी पिएं और शरीर को हाइड्रेट रखें।

    बारिश में भीगने के बाद तुरंत कपड़े बदलना जरूरी है। बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखें। अगर बुखार, कमजोरी या खांसी लंबे समय तक बनी रहे तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने की बजाय डॉक्टर से सलाह लें।

    थोड़ी सावधानी रखकर इस मौसम की कई गंभीर बीमारियों से आसानी से बचा जा सकता है।
    बारिश से पहले बदलते मौसम, नमी और कमजोर इम्युनिटी के कारण वायरल बीमारियां तेजी से फैलती हैं।

  • हल्दी असली या नकली? घर बैठे इन आसान तरीकों से मिनटों में करें शुद्धता की पहचान

    हल्दी असली या नकली? घर बैठे इन आसान तरीकों से मिनटों में करें शुद्धता की पहचान

    नई दिल्ली । भारतीय रसोई में हल्दी केवल एक मसाला नहीं बल्कि सेहत और परंपरा का अहम हिस्सा मानी जाती है। दाल, सब्जी और कई घरेलू नुस्खों में इसका नियमित उपयोग किया जाता है। आयुर्वेद में भी हल्दी को इसके औषधीय गुणों के लिए विशेष स्थान दिया गया है। लेकिन बदलते समय के साथ बाजार में मिलने वाली हर हल्दी की शुद्धता पर भरोसा करना अब आसान नहीं रहा है। मिलावट के बढ़ते मामलों ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

    आजकल कई बार हल्दी में चमकदार रंग और बेहतर दिखावट देने के लिए कृत्रिम रंगों और रसायनों का उपयोग किया जाता है। कुछ मामलों में सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले पदार्थ भी मिलाए जाते हैं, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि घर में इस्तेमाल होने वाली हल्दी की शुद्धता की जांच की जाए।

    हल्दी की शुद्धता जांचने का सबसे आसान तरीका पानी का परीक्षण माना जाता है। इसके लिए एक गिलास गुनगुने पानी में थोड़ी मात्रा में हल्दी डालकर कुछ देर के लिए छोड़ दिया जाता है। यदि हल्दी नीचे बैठ जाती है और पानी हल्का पीला रहता है, तो इसे अपेक्षाकृत शुद्ध माना जाता है। लेकिन यदि हल्दी तेजी से घुलने लगे और पानी का रंग गहरा पीला हो जाए, तो यह मिलावट का संकेत हो सकता है।

    इसके अलावा एक और सरल तरीका हथेली परीक्षण है, जिसे घर पर आसानी से किया जा सकता है। इसमें हल्दी की थोड़ी मात्रा हथेली पर रखकर उंगलियों से हल्के से रगड़ा जाता है। यदि हल्दी असली होती है, तो यह हथेली पर हल्का पीला रंग छोड़ती है और उसकी प्राकृतिक खुशबू महसूस होती है। जबकि मिलावटी हल्दी का रंग अक्सर असमान होता है या जल्दी फीका पड़ जाता है।

    कुछ मामलों में हल्दी में खतरनाक रसायनों की मिलावट की भी आशंका होती है। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक परीक्षणों की आवश्यकता पड़ती है, जिनमें रासायनिक प्रतिक्रिया के आधार पर मिलावट की पहचान की जाती है। यह बताया जाता है कि कुछ विशेष रसायनों की मौजूदगी से हल्दी का रंग बदल सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मिलावटी हल्दी लंबे समय में पेट संबंधी समस्याएं, एलर्जी, मतली और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है। इसलिए केवल हल्दी ही नहीं बल्कि सभी रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर ध्यान देना बेहद जरूरी है।

    बाजार से हल्दी खरीदते समय उपभोक्ताओं को विश्वसनीय स्रोत और ब्रांड का चयन करना चाहिए। पैक्ड और प्रमाणित उत्पादों को प्राथमिकता देना बेहतर माना जाता है। इसके साथ ही समय-समय पर घर में हल्दी की शुद्धता की जांच करना भी एक अच्छी आदत हो सकती है।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो हल्दी जैसी साधारण दिखने वाली चीज भी अगर मिलावटी हो, तो यह स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। इसलिए थोड़ी सावधानी और जागरूकता अपनाकर हम अपने परिवार की सेहत को सुरक्षित रख सकते हैं।

  • गर्मी का कहर: हीट स्ट्रोक से बचना है तो अपनाएं ये जरूरी उपाय

    गर्मी का कहर: हीट स्ट्रोक से बचना है तो अपनाएं ये जरूरी उपाय


    नई दिल्ली। गर्मी का मौसम अपने चरम पर पहुंचते ही सेहत पर गंभीर असर डालने लगता है। तेज धूप, लू और बढ़ता तापमान शरीर को कमजोर कर देता है, जिससे Heat Stroke यानी लू लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है। अगर समय रहते सावधानी न बरती जाए, तो यह स्थिति गंभीर भी हो सकती है।
    जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है। मौसम विभाग भी आने वाले दिनों में और भीषण गर्मी की चेतावनी दे रहा है, ऐसे में खुद को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। सबसे पहली बात—गर्मी में अपनी सेहत को नजरअंदाज बिल्कुल न करें। यदि आप असहज महसूस करते हैं, तो तुरंत ठंडी जगह पर जाएं और पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
    हीट स्ट्रोक के लक्षण पहचानें
    हीट स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों को समझना बहुत जरूरी है। अचानक चक्कर आना, तेज सिरदर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, अत्यधिक पसीना आना या पसीना बंद हो जाना, शरीर का तापमान बढ़ जाना ये सभी गंभीर संकेत हो सकते हैं। कई मामलों में व्यक्ति को कमजोरी, उलझन या बेहोशी भी महसूस हो सकती है। ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत सतर्क हो जाएं।
    हीट स्ट्रोक में तुरंत क्या करें?
    अगर किसी को लू लगने का शक हो, तो उसे तुरंत ठंडी और हवादार जगह पर ले जाएं। शरीर को ठंडा करने के लिए गीले कपड़े का इस्तेमाल करें और लगातार तापमान पर नजर रखें। इस दौरान शरीर को हाइड्रेट रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए Oral Rehydration Solution (ओआरएस), नींबू पानी, छाछ या नमक-शक्कर का घोल देना फायदेमंद होता है।
    यदि हालत में सुधार न हो, तो बिना देरी किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि गंभीर स्थिति में यह जानलेवा भी हो सकता है।
    बचाव ही सबसे बड़ा उपाय
    हीट स्ट्रोक से बचने के लिए दिन के समय, खासकर दोपहर में धूप में निकलने से बचें। हल्के और ढीले कपड़े पहनें, सिर को ढककर रखें और समय-समय पर पानी पीते रहें। खानपान में तरल पदार्थ और फल शामिल करें, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।
    कुल मिलाकर, गर्मी के इस मौसम में थोड़ी सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। इसलिए सतर्क रहें, लक्षणों को पहचानें और समय रहते सही कदम उठाकर खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखें।
  • कच्चा पपीता है सेहत का पावरहाउस, सूजन और टॉक्सिन दूर करने में असरदार, जानें सही सेवन तरीका

    कच्चा पपीता है सेहत का पावरहाउस, सूजन और टॉक्सिन दूर करने में असरदार, जानें सही सेवन तरीका


    नई दिल्ली । पपीता एक ऐसा फल है जिसे सेहत के लिए बेहद लाभकारी माना जाता है लेकिन जहां पका हुआ पपीता आमतौर पर ज्यादा खाया जाता है वहीं कच्चा पपीता अपने गुणों के कारण उससे भी अधिक प्रभावी माना जाता है। पोषक तत्वों से भरपूर कच्चा पपीता शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है और आयुर्वेद में इसे औषधि के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि इसके सेवन के दौरान कुछ जरूरी सावधानियों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है।

    कच्चे पपीते में फाइबर विटामिन सी और कैरोटीनॉयड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो शरीर को अंदर से मजबूत बनाते हैं। इसमें मौजूद पापेन नामक एंजाइम खासतौर पर पाचन तंत्र के लिए बेहद फायदेमंद होता है। यह एंजाइम खाने को खासकर प्रोटीन को तेजी से तोड़ने में मदद करता है जिससे भोजन आसानी से पच जाता है। यही कारण है कि जिन लोगों को गैस अपच या पेट भारी रहने की समस्या होती है उनके लिए कच्चा पपीता एक कारगर उपाय माना जाता है।

    अगर भोजन के बाद पेट में भारीपन महसूस होता है या भूख कम लगने लगी है तो कच्चे पपीते का सेवन लाभदायक हो सकता है। इसे सब्जी के रूप में खाने से पाचन क्रिया बेहतर होती है और भूख भी बढ़ती है। यह कमजोर पाचन शक्ति को मजबूत बनाने में सहायक है जिससे शरीर को जरूरी पोषण सही तरीके से मिल पाता है।

    वजन नियंत्रित करने के लिए भी कच्चा पपीता एक अच्छा विकल्प माना जाता है। इसमें कैलोरी कम होती है और फाइबर की मात्रा अधिक होती है जिससे पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है। इससे ओवरइटिंग की आदत पर नियंत्रण पाने में मदद मिलती है और धीरे-धीरे वजन संतुलित होने लगता है।

    कच्चा पपीता शरीर की अंदरूनी सूजन को कम करने में भी प्रभावी है। यह शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालने में मदद करता है जिससे रक्त शुद्ध होता है और त्वचा पर भी सकारात्मक असर दिखाई देता है। नियमित और संतुलित मात्रा में सेवन करने से चेहरे पर निखार आता है और शरीर अधिक ऊर्जावान महसूस करता है।

    महिलाओं के लिए भी कच्चा पपीता लाभकारी माना जाता है क्योंकि यह हॉर्मोन संतुलन में मदद करता है लेकिन इसका सेवन सोच समझकर करना जरूरी है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं या जो महिलाएं गर्भधारण की योजना बना रही हैं उन्हें इसका सेवन डॉक्टर की सलाह के बाद ही करना चाहिए क्योंकि गलत तरीके से सेवन करने पर यह नुकसान भी पहुंचा सकता है।

    कच्चे पपीते को सीधे खाने के बजाय उबालकर या पकाकर ही सेवन करना बेहतर माना जाता है। इसे सब्जी सूप सलाद या जूस के रूप में लिया जा सकता है लेकिन मात्रा का ध्यान रखना जरूरी है। अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर पर विपरीत प्रभाव भी पड़ सकता है।

    इस तरह कच्चा पपीता एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करता है जो पाचन सुधारने से लेकर शरीर को अंदर से साफ करने तक कई फायदे देता है लेकिन इसके लाभ तभी मिलते हैं जब इसे सही तरीके और संतुलित मात्रा में सेवन किया जाए।

  • हेल्दी बनने की जल्दी पड़ सकती है भारी, डॉक्टर ने बताए मॉर्निंग रूटीन के सही नियम

    हेल्दी बनने की जल्दी पड़ सकती है भारी, डॉक्टर ने बताए मॉर्निंग रूटीन के सही नियम

    भोपाल । आजकल परफेक्ट मॉर्निंग रूटीन का ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जहां लोग सुबह जल्दी उठकर वर्कआउट, ईमेल चेक करना और कॉफी पीने जैसी आदतों को अपनाते हैं। पहली नजर में ये आदतें हेल्दी और प्रोडक्टिव लगती हैं, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार इन्हें गलत तरीके से अपनाने पर ये शरीर पर उल्टा असर डाल सकती हैं। असली समस्या इन आदतों में नहीं, बल्कि उन्हें जल्दबाजी और बिना तैयारी के करने में है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि इंसान का शरीर नींद से जागने के बाद तुरंत एक्टिव मोड में नहीं आता। उसे एक ट्रांजिशन समय यानी एक ब्रिज की जरूरत होती है। अगर यह समय नहीं दिया जाता, तो शरीर अचानक हाई अलर्ट स्थिति में पहुंच जाता है, जिससे तनाव बढ़ सकता है। रिसर्च के अनुसार, अचानक एक्टिव होने से शरीर में कॉर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है, जिसका असर मूड, फोकस और मानसिक स्थिति पर पड़ता है।

    सबसे आम गलती जो लगभग 99 प्रतिशत लोग करते हैं, वह है सुबह उठते ही मोबाइल फोन देखना। अलार्म बंद करते ही लोग नोटिफिकेशन, सोशल मीडिया या ईमेल चेक करने लगते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक इससे दिमाग तुरंत अलर्ट मोड में चला जाता है और तनाव बढ़ने लगता है। इससे चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और मानसिक थकान जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

    इसके अलावा, आजकल प्रोडक्टिव दिखने का दबाव भी लोगों पर हावी हो गया है। लोग मानते हैं कि जितना ज्यादा काम सुबह में कर लिया जाए, दिन उतना बेहतर होगा। लेकिन शरीर इस तरह काम नहीं करता। बिना तैयारी के तुरंत वर्कआउट शुरू करना या लगातार डिजिटल गतिविधियों में लग जाना शरीर के लिए तनाव का कारण बन सकता है।

    एक और बड़ी गलती है खराब नींद के बावजूद जल्दी उठना। अगर रात में पर्याप्त नींद नहीं ली गई या देर तक फोन इस्तेमाल किया गया, तो सुबह की शुरुआत खराब हो जाती है। नींद की कमी का असर याददाश्त, मूड और निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ता है। इसलिए अच्छी सुबह की शुरुआत के लिए अच्छी नींद बेहद जरूरी है।

    कई लोग सुबह उठते ही कॉफी पीना शुरू कर देते हैं, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार 6 से 8 घंटे की नींद के बाद शरीर हल्का डिहाइड्रेट हो जाता है। ऐसे में सबसे पहले पानी पीना ज्यादा जरूरी होता है। पानी पीने से शरीर हाइड्रेट होता है, दिमाग बेहतर तरीके से काम करता है और थकान कम होती है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि सुबह उठने के बाद का पहला एक घंटा बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसी समय शरीर का सर्केडियन रिदम सेट होता है, जो पूरे दिन की ऊर्जा और मूड को प्रभावित करता है। अगर इस समय जल्दबाजी की जाए, तो दिनभर थकान और फोकस की कमी बनी रह सकती है।

    एक सही और संतुलित मॉर्निंग रूटीन के लिए डॉक्टर कुछ आसान आदतें अपनाने की सलाह देते हैं। सुबह उठकर तुरंत भागदौड़ करने के बजाय कुछ मिनट शांत बैठें, गहरी सांस लें और शरीर को धीरे-धीरे एक्टिव करें। सबसे पहले पानी पिएं, हल्की धूप लें और हल्की स्ट्रेचिंग से शुरुआत करें। इसके बाद ही वर्कआउट करें।

    साथ ही, सुबह उठते ही फोन इस्तेमाल करने से बचें और दिन की शुरुआत शांत और सकारात्मक गतिविधियों से करें। अगर इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाए, तो न केवल दिन की शुरुआत बेहतर होगी बल्कि पूरे दिन की ऊर्जा, फोकस और मानसिक स्थिति भी संतुलित बनी रहेगी।

  • माइग्रेन का आसान टेस्ट घर पर, समझें 5-4-3-2-1 फॉर्मूला और बचाव..

    माइग्रेन का आसान टेस्ट घर पर, समझें 5-4-3-2-1 फॉर्मूला और बचाव..


    नई दिल्ली। आज के डिजिटल दौर में सिरदर्द एक आम समस्या बन चुकी है लेकिन हर सिरदर्द को नजरअंदाज करना सही नहीं होता क्योंकि यह माइग्रेन भी हो सकता है यह एक जटिल न्यूरोलॉजिकल समस्या है जिसकी समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है

    विशेषज्ञों के अनुसार माइग्रेन को पहचानने के लिए 5-4-3-2-1 का एक आसान फॉर्मूला अपनाया जाता है जिसे आम व्यक्ति भी समझ सकता है इस फॉर्मूले के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को जीवन में कम से कम 5 बार तेज सिरदर्द का अटैक आया हो और यह दर्द 4 घंटे से लेकर 3 दिन तक बना रहता हो तो यह एक संकेत हो सकता है

    इसके अलावा दर्द की 4 खासियतों में से कम से कम 2 मौजूद हों जैसे सिर के एक तरफ दर्द होना धड़कन जैसा दर्द होना दर्द बहुत तेज होना या रोजमर्रा के काम में बाधा आना तो माइग्रेन की संभावना बढ़ जाती है साथ ही 2 में से 1 लक्षण जैसे मतली उल्टी या तेज रोशनी और आवाज से परेशानी भी इसका अहम संकेत माना जाता है

    माइग्रेन को ट्रिगर करने वाले कारण भी काफी अहम होते हैं तेज धूप चमकदार रोशनी और शोर इस समस्या को बढ़ा सकते हैं वहीं कुछ खाने की चीजें जैसे चीज चॉकलेट कॉफी और चाइनीज फूड भी इसे ट्रिगर कर सकते हैं तेज परफ्यूम या गंध भी कई लोगों में माइग्रेन का कारण बनती है महिलाओं में यह समस्या ज्यादा देखी जाती है खासकर हार्मोनल बदलाव के दौरान

    डॉक्टरों का मानना है कि माइग्रेन को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है क्योंकि इसका असर याददाश्त और ध्यान क्षमता पर पड़ सकता है लंबे समय में यह स्ट्रेस और डिप्रेशन का कारण बन सकता है और गंभीर मामलों में ब्रेन स्ट्रोक का जोखिम भी बढ़ा सकता है

    इससे बचाव के लिए कुछ आसान आदतें अपनाना जरूरी है रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लें स्क्रीन टाइम कम करें और उन फूड्स से दूरी बनाए रखें जो माइग्रेन को बढ़ाते हैं नियमित दिनचर्या और संतुलित जीवनशैली इस समस्या को काफी हद तक कंट्रोल करने में मदद कर सकती है

    अगर सिरदर्द बार बार हो रहा है या ऊपर बताए गए लक्षण दिख रहे हैं तो बिना देरी किए डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है क्योंकि सही समय पर पहचान ही सबसे बड़ा बचाव है

  • करेला: कड़वा जरूर, लेकिन सेहत का खजाना; जानें किन बीमारियों में है रामबाण

    करेला: कड़वा जरूर, लेकिन सेहत का खजाना; जानें किन बीमारियों में है रामबाण


    नई दिल्ली: करेला का नाम सुनते ही अधिकतर लोग मुंह बना लेते हैं, लेकिन यही कड़वा करेला सेहत के लिहाज से किसी वरदान से कम नहीं है। आयुर्वेद में करेला को औषधि के रूप में माना गया है और इसे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में लाभकारी बताया गया है। सिर्फ खाने से ही नहीं, बल्कि बाहरी रूप से लगाने पर भी करेला शरीर को कई तरह से फायदा पहुंचाता है।

    आयुर्वेद में करेले को करवेल्लक कहा जाता है। इसे ऐसा पौधा माना गया है जो दूषित रक्त को शुद्ध करने, बढ़ी हुई शर्करा को नियंत्रित करने और शरीर में मौजूद कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। करेला विटामिन A, B और C का अच्छा स्रोत है, जो इम्युनिटी को मजबूत करने के साथ-साथ त्वचा और आंखों की सेहत के लिए भी जरूरी माने जाते हैं।करेला अग्नि और अग्न्याशय तक प्रभाव डालता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर होता है। यह आंतों की गहराई से सफाई कर वहां मौजूद कीड़े, हानिकारक बैक्टीरिया और विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करता है। जिन लोगों को बार-बार पेट साफ न होने, गैस, अपच या भूख न लगने की समस्या रहती है उनके लिए करेले का जूस या सलाद बेहद फायदेमंद हो सकता है।

    अगर शरीर में लंबे समय से कब्ज की समस्या बनी रहे, तो इससे आंतों में कीड़े पनप सकते हैं और पोषक तत्व शरीर में ठीक से अवशोषित नहीं हो पाते। ऐसे में करेला शरीर का प्राकृतिक डिटॉक्स करता है और पाचन तंत्र को फिर से सक्रिय बनाता है। इसके कड़वे स्वाद को कम करने के लिए इसे काटकर नमक लगाकर कुछ घंटों के लिए छोड़ दिया जाए, तो इसका कड़वापन काफी हद तक कम हो जाता है।त्वचा संबंधी समस्याओं में भी करेला बेहद उपयोगी माना जाता है। चेहरे पर मुंहासे, एक्ने, खुजली या रूखापन अक्सर रक्त की अशुद्धि का संकेत होते हैं। रोजाना सीमित मात्रा में करेले के जूस का सेवन रक्त को शुद्ध करता है, जिससे त्वचा में निखार आता है और एक्ने की समस्या कम होती है। साथ ही यह शरीर की खुद को ठीक करने की क्षमता को भी बढ़ाता है।

    करेला स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए भी लाभकारी बताया गया है, क्योंकि यह दूध बनाने वाले हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाने में मदद करता है। हालांकि, इस दौरान इसका सेवन डॉक्टर की सलाह से ही करना चाहिए। वहीं, अगर शरीर पर कोई घाव, फोड़ा या सूजन हो जाए, तो करेले का लेप लगाने से घाव जल्दी भरता है और संक्रमण का खतरा कम होता है।कुल मिलाकर करेला भले ही स्वाद में कड़वा हो, लेकिन इसके फायदे इतने ज्यादा हैं कि इसे अपनी डाइट में शामिल करना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।