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  • तला-भुना खाना कितना खतरनाक? जानें कैसे कम तेल से सुधर सकती है आपकी हेल्थ

    तला-भुना खाना कितना खतरनाक? जानें कैसे कम तेल से सुधर सकती है आपकी हेल्थ

    नई दिल्ली । आज के समय में तला-भुना और ज्यादा तेल वाला खाना लोगों की डाइट का एक आम हिस्सा बन चुका है। भारतीय रसोई में तड़के से लेकर डीप फ्राई डिशेज तक तेल का इस्तेमाल काफी अधिक होता है, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि जरूरत से ज्यादा तेल का सेवन शरीर के लिए गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है।

    ज्यादा ऑयली खाना सबसे पहले पाचन तंत्र पर असर डालता है। ऐसे भोजन को पचाने में शरीर को अधिक समय और ऊर्जा लगती है, जिससे कई लोगों को पेट भारी लगना, एसिडिटी, ब्लोटिंग और अपच जैसी समस्याएं होने लगती हैं। धीरे-धीरे यह आदत पाचन क्षमता को कमजोर कर सकती है।

    इसके अलावा, ज्यादा तला हुआ खाना मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। प्रोसेस्ड और डीप फ्राइड फूड में मौजूद अनहेल्दी फैट्स शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं, जिसका सीधा संबंध दिमाग के कामकाज और मूड से भी जोड़ा जाता है। कुछ रिसर्च में ऐसे खान-पान को तनाव और मानसिक अस्थिरता से भी जोड़ा गया है।

    लंबे समय तक अधिक तेल वाला भोजन करने से वजन बढ़ने का खतरा भी बढ़ जाता है। फ्राइड फूड में कैलोरी अधिक होती है, जबकि पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम होते हैं, जिससे शरीर में फैट जमा होने लगता है और मोटापा बढ़ सकता है। यही स्थिति आगे चलकर कई अन्य बीमारियों की वजह बन सकती है।

    दिल की सेहत पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव देखा जाता है। अधिक तेल वाला भोजन बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकता है और गुड कोलेस्ट्रॉल को कम कर सकता है। इससे धमनियों में ब्लॉकेज बनने का खतरा बढ़ जाता है, जो आगे चलकर हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी गंभीर स्थितियों को जन्म दे सकता है।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ज्यादा ऑयली डाइट का असर लिवर और ब्लड शुगर पर भी पड़ सकता है। यह इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाकर टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकता है, साथ ही फैटी लिवर जैसी समस्याएं भी पैदा कर सकता है।

    हालांकि अच्छी बात यह है कि छोटे-छोटे बदलावों से सेहत में बड़ा सुधार लाया जा सकता है। डीप फ्राइड खाने की जगह ग्रिल्ड या बेक्ड विकल्प अपनाना, साथ ही डाइट में फल, सब्जियां और साबुत अनाज शामिल करना शरीर को संतुलित और स्वस्थ रखने में मदद करता है।

  • मोटापे और बीमारियों की बड़ी वजह बना तेल, ऐसे करें नियंत्रण..

    मोटापे और बीमारियों की बड़ी वजह बना तेल, ऐसे करें नियंत्रण..


    नई दिल्ली।आज के समय में बदलती जीवनशैली और असंतुलित खानपान ने सेहत से जुड़ी कई समस्याओं को तेजी से बढ़ा दिया है। इनमें सबसे बड़ी समस्या है भोजन में अधिक तेल का इस्तेमाल, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाकर कई गंभीर बीमारियों की जड़ बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरत से ज्यादा तेल का सेवन न केवल वजन बढ़ाता है, बल्कि यह हृदय रोग, डायबिटीज और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम भी बढ़ा देता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मोटापा केवल दिखने की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदर कई बीमारियों की शुरुआत का संकेत भी है। जब खाने में तेल की मात्रा अधिक होती है, तो शरीर में अतिरिक्त कैलोरी जमा होने लगती है, जिससे वजन तेजी से बढ़ता है। धीरे-धीरे यह स्थिति शरीर के अंगों पर दबाव डालने लगती है और स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं पैदा होती हैं।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। खाना बनाते समय तेल को मापकर इस्तेमाल करना, बिना जरूरत के तलने वाले भोजन से दूरी बनाना और हल्के पकाने के तरीकों को अपनाना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है।

    भाप में पकाए गए भोजन, ग्रिल्ड या कम तेल में बने व्यंजन न केवल शरीर के लिए हल्के होते हैं बल्कि इनमें पोषक तत्व भी बेहतर तरीके से सुरक्षित रहते हैं। इसके अलावा घर के खाने में संतुलन बनाए रखना और बार-बार तले हुए खाद्य पदार्थों से बचना लंबे समय तक शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि तेल का पूरी तरह त्याग करना जरूरी नहीं है, बल्कि इसका संतुलित उपयोग सबसे महत्वपूर्ण है। सही मात्रा में लिया गया तेल शरीर के लिए ऊर्जा का स्रोत भी होता है, लेकिन जब यह सीमा से अधिक हो जाता है तो यही सेहत के लिए खतरा बन जाता है।

  • सावधान! बचपन का असामान्य वजन बढ़ा सकता है युवावस्था में बीमारियों का खतरा, नई स्टडी में बड़ा खुलासा

    सावधान! बचपन का असामान्य वजन बढ़ा सकता है युवावस्था में बीमारियों का खतरा, नई स्टडी में बड़ा खुलासा


    नई दिल्ली। हर माता पिता अपने बच्चे की लंबाई और वजन को लेकर चिंतित रहते हैं। अक्सर घरों में बच्चे के दुबलेपन या मोटापे को केवल खान पान और खराब लाइफस्टाइल से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन हाल ही में आई एक नई रिसर्च ने इस धारणा को आंशिक रूप से बदल दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों के वजन और बॉडी मास इंडेक्स BMI में होने वाले बदलावों का एक बड़ा हिस्सा उनके जीन्स पर निर्भर करता है।

    ऑस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित द्वारा की गई इस स्टडी में करीब 6 300 बच्चों और वयस्कों के 66 000 से अधिक BMI मापों का विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि 10 वर्ष की आयु तक बच्चे का वजन और 18 वर्ष तक उसकी ग्रोथ की रफ्तार भविष्य में होने वाली बीमारियों का संकेत दे सकती है। यदि बचपन में वजन असामान्य रूप से बढ़ता या घटता है तो आगे चलकर डायबिटीज हाई कोलेस्ट्रॉल और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।

    अध्ययन में यह भी सामने आया कि अलग अलग उम्र में अलग जेनेटिक फैक्टर्स सक्रिय होते हैं। यानी छोटे बच्चों के शारीरिक आकार को प्रभावित करने वाले आनुवंशिक कारक किशोरावस्था में असर डालने वाले कारकों से अलग हो सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि बचपन में हल्का फुल्का मोटापा हमेशा भविष्य में गंभीर मोटापे का संकेत नहीं होता लेकिन लगातार असामान्य ग्रोथ चिंता का विषय हो सकती है।

    शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जीन्स ही जिम्मेदार नहीं हैं। पर्यावरण खान पान शारीरिक गतिविधि और पारिवारिक जीवनशैली भी बच्चे के विकास को प्रभावित करते हैं। यानी जेनेटिक प्रवृत्ति और जीवनशैली मिलकर स्वास्थ्य की दिशा तय करते हैं।

    यह अध्ययन आंशिक रूप से ब्रिटेन की प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल के 90 के दशक के बच्चे स्टडी के डेटा पर भी आधारित है जिसे वैज्ञानिकों के लिए एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य डेटाबेस माना जाता है। इस लंबे समय तक चले अध्ययन ने बच्चों के विकास और भविष्य के स्वास्थ्य जोखिमों को समझने में अहम भूमिका निभाई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किस उम्र में हस्तक्षेप सबसे अधिक प्रभावी हो सकता है। यदि सही समय पर पोषण व्यायाम और स्वास्थ्य निगरानी की जाए तो भविष्य में मोटापे और उससे जुड़ी गंभीर बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है।

    इस स्टडी का संदेश स्पष्ट है बच्चों के वजन को लेकर न तो अनावश्यक घबराहट जरूरी है और न ही लापरवाही। नियमित स्वास्थ्य जांच संतुलित आहार और सक्रिय जीवनशैली अपनाकर बचपन से ही बेहतर स्वास्थ्य की नींव रखी जा सकती है।

  • दिल्ली की सेहत पर खतरा: 2024 में सांस की बीमारियों से 9,211 मौतें

    दिल्ली की सेहत पर खतरा: 2024 में सांस की बीमारियों से 9,211 मौतें


    नई दिल्ली । दिल्ली सरकार द्वारा जारी 2024 की ताजा हेल्थ रिपोर्ट राजधानी की सेहत को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में जहरीली हवा और बिगड़ते पर्यावरण का सीधा असर नागरिकों के फेफड़ों पर पड़ रहा है। साल 2024 में सांस संबंधी बीमारियों से होने वाली मौतों का आंकड़ा बढ़कर 9,211 तक पहुंच गया है, जो कि 2023 में 8,801 था। विशेषज्ञों ने इस वृद्धि को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक ‘रेड सिग्नल’ माना है और वायु गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ चिकित्सा सुविधाओं को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में मौतों का सबसे बड़ा कारण दिल और रक्त संचार से जुड़ी बीमारियां बनकर उभरी हैं। साल 2024 में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और धमनियों में रुकावट जैसी समस्याओं के कारण 21,262 लोगों ने अपनी जान गंवाई, जबकि पिछले साल यह संख्या 15,714 थी। एक ही साल में हृदय रोगों से होने वाली मौतों में आई यह भारी उछाल बदलती जीवनशैली और पर्यावरणीय तनाव की ओर इशारा करती है। हालांकि, राहत की बात यह रही कि संक्रामक और परजीवी रोगों से होने वाली मौतों में कमी आई है। 2023 में जहां इन बीमारियों से 20,781 मौतें हुई थीं, वहीं 2024 में यह घटकर 16,060 रह गईं, जो सार्वजनिक स्वच्छता के क्षेत्र में किए गए सुधारों का परिणाम माना जा रहा है।

    शिशु स्वास्थ्य के मोर्चे पर दिल्ली ने मामूली लेकिन सकारात्मक प्रगति की है। राजधानी में शिशु मृत्यु दर 2023 के 23.61 से घटकर 2024 में 22.4 प्रति हजार रह गई है। यह गिरावट प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल और टीकाकरण की सफलता को दर्शाती है। इसके साथ ही, एक और उत्साहजनक आंकड़ा यह सामने आया कि दिल्ली में 5 वर्ष से कम उम्र के 99.1 प्रतिशत बच्चों के पास जन्म प्रमाण पत्र मौजूद है, जो नागरिक पंजीकरण प्रणाली की मजबूती का प्रतीक है।

    आबादी के मोर्चे पर रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली का विस्तार तेजी से हो रहा है और अनुमान है कि 2036 तक राजधानी की जनसंख्या 2.65 करोड़ तक पहुंच जाएगी। साल 2024 में कुल 3,06,459 जन्म दर्ज किए गए, जबकि कुल मौतों की संख्या 1,39,480 रही। मृत्यु दर में 6.16 से 6.37 की मामूली वृद्धि दर्ज की गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि बढ़ती आबादी और प्रदूषण के दोहरे दबाव के बीच दिल्ली को अपने हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना होगा।

  • AIIMS की सबसे बड़ी स्टडी: कोविड वैक्सीन और युवाओं की अचानक मौत में 'कोई संबंध नहीं'

    AIIMS की सबसे बड़ी स्टडी: कोविड वैक्सीन और युवाओं की अचानक मौत में 'कोई संबंध नहीं'


    नई दिल्ली/ दिल्ली स्थित AIIMS ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज की हालिया स्टडी में यह पुष्टि हुई है कि कोरोना वायरस के टीकाकरण और युवाओं 18-45 साल में अचानक मौतों के बीच कोई वैज्ञानिक संबंध नहीं है। यह अध्ययन फोरेंसिक और पैथोलॉजिकल जांच पर आधारित है और कोविड वैक्सीन की सुरक्षा को दोहराता है। स्टडी में एक वर्ष के दौरान अचानक मौत के 2,214 मामलों का अध्ययन किया गया, जिनमें से 180 मामलों को अचानक मौत माना गया। इसमें दुर्घटना, आत्महत्या, हत्या और ड्रग्स से मौत के केस बाहर रखे गए। हर मामले में परिवार से बातचीत करके मृतक की पुरानी बीमारियों, कोविड संक्रमण का इतिहास, वैक्सीनेशन स्टेटस, धूम्रपान-शराब की आदतें जैसी जानकारियां जुटाई गईं। अध्ययन में मौखिक ऑटोप्सी, पोस्ट-मॉर्टम इमेजिंग, पारंपरिक ऑटोप्सी और हिस्टोपैथोलॉजिकल जांच शामिल थी। शोध टीम में फोरेंसिक विशेषज्ञ, पैथोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और क्लिनिशियन शामिल थे।

    मुख्य निष्कर्ष:

    कोविड वैक्सीन सुरक्षित: टीकाकरण की स्थिति और अचानक मौतों के बीच कोई सांख्यिकीय संबंध नहीं पाया गया। हृदय रोग प्रमुख कारण: युवाओं में अचानक मौत का सबसे आम कारण अस्पष्ट हृदय रोग रहा। इसके बाद श्वसन प्रणाली और अन्य गैर-हृदय संबंधी कारण जिम्मेदार थे। युवाओं और बड़ों की तुलना: 18-45 साल के युवाओं और 46-65 साल के बड़ों में कोविड-19 का इतिहास और टीकाकरण लगभग समान पाया गया। सुरक्षा और जागरूकता: डॉक्टरों ने कहा कि अचानक मौतों के पीछे छिपे हृदय रोग और जीवनशैली संबंधी कारण ज़्यादातर जिम्मेदार हैं। इसलिए समय पर जांच, स्वस्थ जीवनशैली और इलाज जरूरी है। AIIMS के प्रोफेसर डॉ. सुधीर अरावा ने कहा, झूठे दावों और अफवाहों के बीच यह स्टडी बहुत जरूरी थी। इससे साबित होता है कि युवाओं में अचानक मौतें कोविड-19 टीकाकरण से संबंधित नहीं हैं। इस अध्ययन के नतीजे दुनिया भर के वैज्ञानिक अध्ययनों से मेल खाते हैं, जो कोविड-19 वैक्सीन को सुरक्षित और प्रभावी बताते हैं।

    स्टडी की अवधि और तरीका:

    समय: मई 2023 से अप्रैल 2024 कुल मामले: 2,214 लाशों में से 180 अचानक मौत छानबीन: पारिवारिक जानकारी, स्वास्थ्य इतिहास, ऑटोप्सी, पोस्ट-मॉर्टम इमेजिंग निष्कर्ष: टीकाकरण और अचानक मौत में कोई संबंध नहीं युवाओं में अचानक मौतें मुख्य रूप से अस्पष्ट हृदय रोगों और जीवनशैली से संबंधित कारणों से होती हैं, न कि कोविड-19 वैक्सीन से। विशेषज्ञों का कहना है कि जल्दी जांच, सही जीवनशैली और समय पर इलाज से इन मौतों को रोका जा सकता है।