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  • भूपेंद्र पटेल ने न्यू जर्सी अक्षरधाम को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सेवा का वैश्विक प्रकाशस्तंभ बताया, स्वयंसेवकों की सराहना की

    भूपेंद्र पटेल ने न्यू जर्सी अक्षरधाम को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सेवा का वैश्विक प्रकाशस्तंभ बताया, स्वयंसेवकों की सराहना की

    नई दिल्ली । गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान न्यू जर्सी के रॉबिन्सविल स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण अक्षरधाम का दौरा किया। उन्होंने अक्षरधाम को भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक सेवा तथा स्वयंसेवकों के समर्पण का प्रभावशाली वैश्विक प्रतीक बताया। मुख्यमंत्री के साथ गुजरात सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद रहा।

    अक्षरधाम पहुंचने पर बीएपीएस के संतों ने भूपेंद्र पटेल का स्वागत किया। इस दौरान वित्त विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. संजीव कुमार और मुख्यमंत्री के सचिव विक्रांत पांडे सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ने परिसर की वास्तुकला और वहां संचालित गतिविधियों के बारे में जानकारी ली।

    भूपेंद्र पटेल ने निर्माणाधीन अक्षरधाम संग्रहालय का विशेष भ्रमण भी किया। उन्हें बताया गया कि भारतीय विरासत को समर्पित यह संग्रहालय अमेरिका में अपनी तरह के शुरुआती हिंदू सांस्कृतिक संग्रहालयों में शामिल होगा। संग्रहालय में भारत की गौरवशाली विरासत को आधुनिक और दृश्य माध्यमों के जरिए प्रस्तुत करने की योजना है।

    संग्रहालय में 12 वास्तुशिल्प प्रतिकृतियां, 40 मल्टीमीडिया प्रस्तुतियां, 85 डायोरामा और 200 सजीव प्रतिमाओं के माध्यम से भारतीय इतिहास, संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी प्रस्तुति विभिन्न आयु और पृष्ठभूमि के लोगों को भारतीय मूल्यों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    उन्होंने आस्था, सद्भाव, करुणा, पारिवारिक मूल्यों और निःस्वार्थ सेवा जैसे विषयों को सार्वभौमिक महत्व वाला बताया। अक्षरधाम मंदिर की सूक्ष्म नक्काशी, विशाल स्वरूप और शांत वातावरण से भी मुख्यमंत्री प्रभावित हुए। संग्रहालय के भ्रमण के दौरान उन्होंने कहा कि यहां भारत की प्राचीन संस्कृति को प्रभावशाली तरीके से पुनर्जीवित किया गया है।

    मुख्यमंत्री ने अक्षरधाम में सेवा कर रहे स्वयंसेवकों से भी मुलाकात की। उन्होंने स्वयंसेवकों के अनुशासन, विनम्रता, आतिथ्य और सेवा भावना की सराहना की। उन्होंने कहा कि अक्षरधाम के निर्माण में योगदान देने वाले बीएपीएस स्वयंसेवकों की मेहनत और समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा दे सकता है।

    भूपेंद्र पटेल ने कहा कि दुनिया के किसी भी हिस्से से यहां आने वाला व्यक्ति शांति का अनुभव कर सकता है। उनके अनुसार अक्षरधाम केवल एक धार्मिक परिसर नहीं, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने वाला महत्वपूर्ण केंद्र है।

    मुख्यमंत्री की अमेरिका यात्रा वाइब्रेंट गुजरात पहल से जुड़ी गतिविधियों का हिस्सा है। करीब तीन दशकों में गुजरात के किसी मुख्यमंत्री की यह पहली अमेरिका यात्रा बताई गई है। अक्षरधाम के अनुभव का उल्लेख करते हुए पटेल ने कहा कि उनकी यात्रा का केंद्र वाइब्रेंट गुजरात है, लेकिन अक्षरधाम में भारत की संस्कृति स्वयं जीवंत रूप में दिखाई देती है।

    इस अवसर पर अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों और सामुदायिक नेताओं ने भी मुख्यमंत्री का स्वागत किया। यात्रा के दौरान बीएपीएस के सांस्कृतिक संरक्षण के साथ शिक्षा, मानवीय राहत, स्वास्थ्य सेवा, पर्यावरण जागरूकता, युवा विकास और सामाजिक सेवा से जुड़े वैश्विक योगदान को भी रेखांकित किया गया।

    भूपेंद्र पटेल ने अपने अनुभव को प्रेरणादायक और आध्यात्मिक रूप से सुखद बताया। उन्होंने भारतीय समुदाय की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि विदेशों में रहने वाले भारतीय अपनी सांस्कृतिक जड़ों और आध्यात्मिक परंपराओं को जीवित रखने में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने सभी की शांति, भलाई और प्रगति की कामना की।

  • श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर पहुंचीं कुणाल खेमू की बहन, बदली हवेली और बीते दिनों की कहानी की साझा

    श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर पहुंचीं कुणाल खेमू की बहन, बदली हवेली और बीते दिनों की कहानी की साझा

    नई दिल्ली ।अभिनेता कुणाल खेमू के परिवार का श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर एक बार फिर चर्चा में है। वर्षों बाद उनकी बहन करिश्मा खेमू अपने परिवार के साथ इस घर पहुंचीं और वहां बिताए गए बचपन के दिनों से जुड़ी यादों को साझा किया। इस यात्रा का एक भावनात्मक वीडियो सामने आया है, जिसमें परिवार अपने पुराने घर के हर हिस्से को देखते हुए अतीत की स्मृतियों को दोबारा जीता नजर आता है। यह दौरा केवल एक मकान तक लौटने का नहीं, बल्कि उन यादों और भावनाओं से दोबारा जुड़ने का अवसर बन गया, जो समय के साथ पीछे छूट गई थीं।

    वीडियो में करिश्मा खेमू अपने पुश्तैनी घर के अलग-अलग हिस्सों को दिखाते हुए बताती हैं कि कभी यह पूरा भवन उनके परिवार का था, लेकिन अब समय के साथ इसकी संरचना और उपयोग दोनों बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले जिन कमरों में परिवार के सदस्य साथ रहते थे, वे अब अलग-अलग हिस्सों में विभाजित हो चुके हैं और उनमें अन्य लोग निवास करते हैं। इसके बावजूद घर का हर कोना उनके बचपन की किसी न किसी याद को आज भी संजोए हुए है।

    करिश्मा की मां ने भी इस यात्रा के दौरान घर से जुड़ी कई पुरानी स्मृतियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि विवाह के बाद परिवार की शुरुआती जिंदगी इसी घर की ऊपरी मंजिल पर बीती थी। उन्होंने उन कमरों की ओर इशारा करते हुए पुराने दिनों को याद किया, जहां परिवार एक साथ समय बिताता था। घर की सीढ़ियां, आंगन और कमरे आज भी उन्हें बीते वर्षों की घटनाओं की याद दिलाते हैं। परिवार ने बताया कि इस मकान का हर हिस्सा किसी न किसी व्यक्तिगत अनुभव और पारिवारिक रिश्ते से जुड़ा हुआ है।

    समय के प्रभाव की छाप भी इस पुश्तैनी भवन पर स्पष्ट दिखाई देती है। हवेली की दीवारों का रंग फीका पड़ चुका है, लकड़ी की संरचनाओं पर उम्र के निशान साफ नजर आते हैं और कई हिस्सों में मरम्मत की आवश्यकता महसूस होती है। पारंपरिक कश्मीरी स्थापत्य शैली में बने इस मकान की लकड़ी की बालकनी, नक्काशीदार खंभे और पुराने दरवाजे आज भी इसकी ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखते हैं। हालांकि लंबे समय के दौरान भवन की स्थिति में काफी परिवर्तन आया है, लेकिन इसकी मूल संरचना अब भी अतीत की कहानी बयान करती है।

    करिश्मा ने बताया कि कभी पूरा परिवार जिस विशाल घर में एक साथ रहता था, आज वह कई छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हो चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि कई कमरे अब बंद रहते हैं और कुछ हिस्सों में किरायेदार निवास करते हैं। घर की सीढ़ियों और गलियारों में पहले जैसी रौनक नहीं रही, लेकिन वहां पहुंचते ही बचपन की अनेक यादें स्वतः ताजा हो गईं। परिवार के लिए यह यात्रा भावनात्मक अनुभव साबित हुई, क्योंकि वर्षों बाद वे अपने उस घर की दहलीज पर लौटे, जहां उनके जीवन की शुरुआती स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।

    कुणाल खेमू का जन्म श्रीनगर में हुआ था और बचपन में ही उनका परिवार घाटी छोड़कर मुंबई आ गया था। इसके बाद उन्होंने फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। हालांकि जीवन की नई यात्रा शुरू होने के बावजूद श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर उनके परिवार की पहचान और विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा। करिश्मा खेमू की इस यात्रा ने एक बार फिर उन भावनात्मक संबंधों को सामने लाया है, जो किसी व्यक्ति और उसके पैतृक घर के बीच वर्षों बाद भी कायम रहते हैं। यह कहानी केवल एक भवन की नहीं, बल्कि स्मृतियों, पारिवारिक विरासत और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना को भी दर्शाती है।

  • केसरिया रंग पर छिड़ा घमासान, भारतीय हॉकी की पहचान और नीली जर्सी के इतिहास पर उठा बड़ा सवाल।

    केसरिया रंग पर छिड़ा घमासान, भारतीय हॉकी की पहचान और नीली जर्सी के इतिहास पर उठा बड़ा सवाल।

    नई दिल्ली। खेल जगत में किसी भी राष्ट्रीय टीम की जर्सी केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी दशकों पुरानी पहचान, विरासत और प्रशंसकों के भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक होती है। भारतीय खेल इतिहास में ‘मैन इन ब्लू’ और ‘विमेन इन ब्लू’ की अवधारणा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर भारत की खेल पहचान बन चुकी है। आगामी एफआईएच विश्व कप से ठीक पहले हॉकी इंडिया द्वारा भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीम की प्राथमिक जर्सी का रंग पारंपरिक नीले से बदलकर केसरिया करने के फैसले ने देश में एक नया विवाद और गहन वैचारिक बहस छेड़ दी है।

    हॉकी इंडिया ने जर्सी का रंग बदलने के पीछे तकनीकी और खेल विज्ञान से जुड़े कारणों का हवाला दिया है। महासंघ का तर्क है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं में अधिकांश सिंथेटिक एस्ट्रोटर्फ नीले रंग की होती हैं। मैचों के दौरान नीली जर्सी पहनकर खेलने से खिलाड़ियों के कपड़े नीले टर्फ के रंग में मिल जाते हैं, जिससे मैदान पर साथी खिलाड़ियों की दृश्यता में बाधा आती है और त्वरित निर्णय लेने में परेशानी होती है। सपोर्ट स्टाफ और खिलाड़ियों के परामर्श से दृश्यता में सुधार के उद्देश्य से ही यह बदलाव किया गया है।

    हालांकि, इस तकनीकी दलील के बावजूद खेल जगत के कई दिग्गजों और पूर्व कप्तानों ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। पूर्व दिग्गजों का कहना है कि भारतीय हॉकी का गौरवशाली इतिहास नीली जर्सी के साथ जुड़ा हुआ है और विश्व पटल पर भारत की पहचान इसी रंग से बनती रही है। खेल के अंतरराष्ट्रीय जानकारों का मानना है कि ब्राजील की पीली, न्यूजीलैंड की काली या इटली की नीली जर्सी की तरह भारतीय टीम का नीला रंग भी दशकों की मेहनत के बाद एक वैश्विक ब्रांड बना था, जिसे एक झटके में बदलना अनुचित है।

    राजनीतिक गलियारों में भी इस बदलाव को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। विपक्षी दलों के नेताओं ने इस फैसले को सांस्कृतिक और वैचारिक ब्रांडिंग का हिस्सा बताते हुए सवाल उठाए हैं, जबकि खेल प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि खेलों में जर्सी के डिजाइन और रंग समय-समय पर बदलते रहे हैं और इस निर्णय को किसी राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।

    वैश्विक खेलों में जर्सी के रंग और राष्ट्रीय ध्वज के बीच अंतर होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी स्थापित खेल राष्ट्र की प्राथमिक पहचान को अचानक बदल देना हमेशा से चर्चा का विषय बनता रहा है। 1928 से लेकर अब तक ओलंपिक और विश्व कप के मंचों पर भारतीय हॉकी ने जो स्वर्णिम अध्याय लिखे हैं, वे किसी एक रंग से कहीं बढ़कर हैं। फिलहाल, यह बहस केवल एक रंग तक सीमित न रहकर खेल की ब्रांडिंग, विरासत और संस्थागत फैसलों में पारदर्शिता के इर्द-गिर्द घूम रही है।

  • एंटीलिया के मंदिर और भारतीय कला ने खींचा सबका ध्यान, वीडियो में दिखी भव्य सजावट और आध्यात्मिक विरासत की झलक

    एंटीलिया के मंदिर और भारतीय कला ने खींचा सबका ध्यान, वीडियो में दिखी भव्य सजावट और आध्यात्मिक विरासत की झलक

    नई दिल्ली ।देश के प्रमुख उद्योगपति मुकेश अंबानी का निवास एंटीलिया अपनी भव्यता, आधुनिक सुविधाओं और अनूठी वास्तुकला के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। हाल ही में सामने आए एक वीडियो में नीता अंबानी ने इस प्रतिष्ठित भवन के उस हिस्से की झलक दिखाई, जहां भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा और शिल्पकला का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। वीडियो के सामने आने के बाद एंटीलिया के इस विशेष हिस्से की चर्चा सोशल मीडिया पर तेज हो गई।

    वीडियो की शुरुआत एंटीलिया के भव्य पूजा स्थल से होती है। मंदिर में चांदी की नक्काशी से सजे विशाल दरवाजे, भगवान श्रीकृष्ण की आकर्षक प्रतिमा और फूलों से सजी सजावट पूरे वातावरण को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करती है। सफेद संगमरमर से तैयार फर्श, विशाल झूमर और शांत वातावरण मंदिर की भव्यता को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र ही नहीं बल्कि भारतीय पारंपरिक कला का भी उत्कृष्ट उदाहरण दिखाई देता है।

    एंटीलिया के इंटीरियर में सफेद संगमरमर का व्यापक उपयोग किया गया है। दीवारों, स्तंभों और अन्य हिस्सों पर की गई बारीक नक्काशी भवन की शिल्पकला को अलग पहचान देती है। फर्श पर उकेरे गए आकर्षक डिजाइन और पारंपरिक शैली की सजावट पूरे परिसर को शाही महल जैसा स्वरूप प्रदान करती है। वास्तुकला में आधुनिकता और भारतीय परंपरा का संतुलित मेल स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

    वीडियो में एक विशाल दीवार पर बनी राधा-कृष्ण और कमल के फूलों से प्रेरित कलाकृति भी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। हल्के रंगों और पारंपरिक शैली में तैयार यह पेंटिंग पूरे कक्ष को शांत और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करती है। भारतीय संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों को प्रमुखता देने वाली यह कलाकृति एंटीलिया की आंतरिक सजावट को विशिष्ट पहचान देती है।

    बैठक कक्ष में रखे गए क्लासिक शैली के फर्नीचर ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। सिल्वर फिनिश वाले सोफे, आकर्षक कुशन और नक्काशीदार डिजाइन आधुनिक विलासिता के साथ पारंपरिक सौंदर्य का संतुलन प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा दीवारों पर लगी भारतीय लोक जीवन और भगवान श्रीकृष्ण से प्रेरित पेंटिंग्स भवन के सांस्कृतिक पक्ष को और मजबूत बनाती हैं।

    वीडियो में नीता अंबानी पारंपरिक परिधान में नजर आईं। उन्होंने हल्के रंग की साड़ी पहनी थी, जिस पर श्रीकृष्ण, कमल और भारतीय संस्कृति से जुड़े कलात्मक डिजाइन बने हुए थे। साधारण मेकअप, हीरे के आभूषण और फूलों से सजा जूड़ा उनके पारंपरिक और शालीन व्यक्तित्व को और निखारता दिखाई दिया। उनका यह लुक एंटीलिया की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक थीम के अनुरूप नजर आया।

    वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर एंटीलिया के मंदिर, वास्तुकला, कलात्मक सजावट और भारतीय विरासत से प्रेरित इंटीरियर की व्यापक चर्चा हो रही है। कई लोगों ने इसकी भव्यता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों को प्रमुखता देने वाले डिजाइन की सराहना की। यह झलक बताती है कि एंटीलिया केवल आधुनिक सुविधाओं वाला आलीशान भवन ही नहीं, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति और परंपराओं को सहेजने वाला एक विशिष्ट स्थापत्य भी है।

  • दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    नई दिल्ली । भारतीय वास्तुकला और प्राचीन इतिहास हमेशा से ही अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। समकालीन दुनिया में जब भी समय यात्रा या ‘टाइम ट्रेवल’ का उल्लेख होता है, तो सामान्यतः हॉलीवुड की फिल्मों या विज्ञान कथाओं का ध्यान आता है। लेकिन दक्षिण भारत के कुछ बेहद प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों ने आधुनिक विज्ञान और अनुसंधानकर्ताओं को एक नए विमर्श पर मजबूर कर दिया है। इन ऐतिहासिक स्थलों की वास्तुकला और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी इस सीमा तक विस्मयकारी है कि इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उस दौर के शिल्पकारों को भविष्य की तकनीकों का आभास था या उनके पास कोई अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक समझ मौजूद थी।

    तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में स्थित पंचवर्णस्वामी मंदिर इस अनूठे रहस्य का एक अत्यंत सटीक उदाहरण प्रस्तुत करता है। लगभग दो हजार वर्ष प्राचीन माने जाने वाले इस ऐतिहासिक मंदिर की एक दीवार पर एक ऐसी नक्काशी देखने को मिलती है जो आधुनिक इतिहासकारों को चकित कर देती है। इस नक्काशी में एक मानव आकृति को स्पष्ट रूप से दो पहियों वाली साइकिल जैसी सवारी चलाते हुए प्रदर्शित किया गया है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, आधुनिक दुनिया में साइकिल का आविष्कार उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सदियों पहले के मूर्तिकारों ने एक ऐसी सवारी की परिकल्पना कैसे की, जिसे पैडल मारकर चलाया जाता है। इसे लेकर विभिन्न विशेषज्ञ प्राचीन विज्ञान के उन्नत होने के कयास लगा रहे हैं।

    इसी प्रकार का तकनीकी कौतूहल कर्नाटक के प्रसिद्ध होयसलेश्वर मंदिर में भी देखने को मिलता है। इस मंदिर की दीवारों पर स्थापित कुछ मूर्तियों के हाथों में ऐसे उपकरण और आकृतियां दिखाई देती हैं, जो वर्तमान समय के आधुनिक गैजेट्स, गियर अथवा यांत्रिक पुर्जों से अत्यधिक मेल खाती हैं। कुछ विशिष्ट आकृतियों में इतनी सूक्ष्मता से काम किया गया है कि वे किसी दूरबीन या सूक्ष्मदर्शी यंत्र जैसी प्रतीत होती हैं। ग्रेनाइट जैसे अत्यंत कठोर पत्थरों पर इतनी फिनिशिंग और सटीकता के साथ आकृतियों को उकेरना आज की अत्याधुनिक मशीनों के बिना अत्यंत कठिन माना जाता है, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि प्राचीन काल में निर्माण तकनीक हमारी वर्तमान सोच से कहीं अधिक विकसित थी।

    इन सबमें सबसे अधिक चौंकाने वाला रहस्य कुछ मंदिरों के स्तंभों पर मिली वह नक्काशी है, जो आधुनिक अंतरिक्ष यात्री यानी एस्ट्रोनॉट की वेशभूषा से मिलती-जुलती है। इस विशिष्ट आकृति के सिर पर एक गोल हेलमेट जैसी संरचना है और पीठ पर एक ऐसा उपकरण बंधा हुआ दिखाई देता है जो आधुनिक स्पेससूट के ऑक्सीजन टैंक जैसा प्रतीत होता है। उस प्राचीन काल में, जब विमानन तकनीक का विकास नहीं हुआ था, पत्थरों पर ऐसी आकृति का पाया जाना शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी पहेली बना हुआ है। यही कारण है कि जिज्ञासु और विश्लेषक इन प्राचीन धरोहरों को समय यात्रा के विजुअल साक्ष्यों से जोड़कर देखने लगे हैं।

    वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक और इतिहासकार इन प्राचीन कलाकृतियों के पीछे छिपे वास्तविक कारणों का पता लगाने में जुटे हैं। जहां कुछ विश्लेषक इसे केवल एक संयोग या कलात्मक कल्पना का परिणाम मानते हैं, वहीं विशेषज्ञों का एक वर्ग यह तर्क देता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान और विमानन शास्त्र का स्तर अत्यंत उच्च था। प्राचीन ग्रंथों और संहिताओं में भी ऐसी उन्नत तकनीकों के सांकेतिक संदर्भ मिलते हैं। कारण चाहे जो भी हो, दक्षिण भारत के ये ऐतिहासिक मंदिर इस तथ्य की पुष्टि अवश्य करते हैं कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत में ऐसे अनेक रहस्य छिपे हैं, जिनकी पूर्ण व्याख्या करने में आधुनिक विज्ञान को अभी लंबा समय लगेगा।

  • भारत-इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई: 1170 साल पुराने प्राम्बानन शिव मंदिर के जीर्णोद्धार में तकनीक और एआई की मदद देगा भारत

    भारत-इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई: 1170 साल पुराने प्राम्बानन शिव मंदिर के जीर्णोद्धार में तकनीक और एआई की मदद देगा भारत

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक साझेदारी को एक नई और अभूतपूर्व मजबूती मिलने जा रही है। वैश्विक भू-राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच दोनों देश अपने प्राचीन संबंधों को रणनीतिक दिशा देने में जुट गए हैं। इस महत्वपूर्ण राजनयिक पहल के तहत भारत, इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित 1170 साल पुराने ऐतिहासिक प्राम्बानन शिव मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार और संरक्षण कार्य में अपना तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा। यह प्राचीन हिंदू मंदिर परिसर वर्तमान में यूनेस्को (UNESCO) का एक प्रतिष्ठित विश्व धरोहर स्थल है।

    इस विशाल मंदिर परिसर के इतिहास की खोज का सफर काफी दिलचस्प रहा है। वर्ष 1733 में डच औपनिवेशिक शासन के दौरान एक अधिकारी ने जावा के जंगलों में पत्थरों का एक विशाल ढेर देखा था, जिसे स्थानीय लोग ‘रोरो जोंग्रांग’ नामक राजकुमारी की लोककथा से जोड़कर देखते थे। इसके बाद 19वीं और 20वीं शताब्दी में जब इस स्थान पर वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई की गई, तब वहां पत्थरों पर प्राचीन संस्कृत और पुरानी जावानीज भाषा में लिखे कई महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुए। इन शिलालेखों में इस स्थान को ‘शिवगृह’ के रूप में संबोधित किया गया था और इस पर वर्ष 856 अंकित था, जिससे इसके शिव मंदिर होने की आधिकारिक पुष्टि हुई।

    ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण मातरम साम्राज्य के हिंदू संजय वंश के राजाओं द्वारा करवाया गया था। इसकी शुरुआत राजा राकाई पिकातन ने वर्ष 850 के आसपास की थी, जबकि मुख्य शिव मंदिर का उद्घाटन उनके उत्तराधिकारी राजा लोकपाल ने वर्ष 856 में संपन्न कराया था। यह परिसर केवल भगवान शिव को ही समर्पित नहीं है, बल्कि यह हिंदू धर्म के तीनों मुख्य देवताओं—ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित होने के कारण ‘त्रिमूर्ति मंदिर’ भी कहलाता है। परिसर का मुख्य शिव मंदिर लगभग 47 मीटर ऊंचा है और इसकी दीवारों पर पत्थरों को तराशकर रामायण की संपूर्ण गाथा अत्यंत खूबसूरती से उकेरी गई है।

    ऐतिहासिक शोधों से स्पष्ट होता है कि इंडोनेशिया में हिंदू धर्म का प्रसार किसी सैन्य आक्रमण या बलप्रयोग के कारण नहीं, बल्कि ईसा की पहली शताब्दी में भारत के दक्षिणी छोर (वर्तमान तमिलनाडु) से समुद्री जहाजों द्वारा पहुंचे व्यापारियों के माध्यम से हुआ था। इन व्यापारियों के साथ गई हिंदू संस्कृति, कला, संस्कृत भाषा और पूजा पद्धतियों ने स्थानीय राजाओं को काफी प्रभावित किया, जिसके बाद उन्होंने भारत से विद्वान ब्राह्मणों को अपने राज्य में आमंत्रित किया। बाद में 10वीं शताब्दी के दौरान पास के मेरापी ज्वालामुखी में हुए भीषण विस्फोट और भूकंप के कारण इस क्षेत्र की आबादी को पूर्व की ओर पलायन करना पड़ा, जिससे यह संस्कृति मुख्य रूप से बाली द्वीप तक ही सीमित रह गई।

    अब इस नए दौर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के विशेषज्ञ इस प्राचीन धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए इंडोनेशियाई प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इस जीर्णोद्धार कार्य में ‘अनास्टाइलोसिस’ तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिसके तहत परिसर में बिखरे मूल पत्थरों को ही आपस में जोड़कर मंदिर को उसकी पुरानी शक्ल दी जाएगी। इस जटिल कार्य को सुगम बनाने के लिए आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक का भी सहारा लिया जाएगा, जो पत्थरों के सटीक मिलान में मदद करेगी। शुरुआत में इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत एक या दो छोटे मंदिरों पर काम शुरू किया जाएगा। वैश्विक पटल पर यह अनूठी पहल दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश और सबसे बड़ी हिंदू आबादी वाले देश के बीच आपसी सौहार्द का एक बेजोड़ उदाहरण पेश कर रही है।

  • इंडोनेशिया के 1100 साल पुराने प्रम्बानन मंदिर पहुंचेंगे पीएम मोदी, हिंदू विरासत और रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया आयाम

    इंडोनेशिया के 1100 साल पुराने प्रम्बानन मंदिर पहुंचेंगे पीएम मोदी, हिंदू विरासत और रणनीतिक साझेदारी को मिलेगा नया आयाम

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीन देशों की विदेश यात्रा के पहले चरण में इंडोनेशिया पहुंचे हैं। इस दौरे का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव योग्यकर्ता स्थित 9वीं शताब्दी का ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर माना जा रहा है। यह मंदिर न केवल दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे महत्वपूर्ण हिंदू धरोहरों में शामिल है, बल्कि भारत और इंडोनेशिया के हजारों वर्ष पुराने सांस्कृतिक संबंधों का भी जीवंत प्रतीक है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    प्रम्बानन मंदिर का निर्माण लगभग 850 ईस्वी के आसपास हुआ माना जाता है। यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है, जहां भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित हैं। परिसर का सबसे ऊंचा मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, जिसकी ऊंचाई लगभग 47 मीटर है। शिव मंदिर के भीतर माता पार्वती, भगवान गणेश और महर्षि अगस्त्य की प्राचीन मूर्तियां भी स्थापित हैं, जो इस परिसर की धार्मिक और ऐतिहासिक महत्ता को और बढ़ाती हैं।

    मंदिर की दीवारों पर रामायण और भागवत पर आधारित विस्तृत शिल्पांकन आज भी आकर्षण का केंद्र हैं। इन कलाकृतियों में भारतीय संस्कृति और पौराणिक परंपराओं की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। मंदिर परिसर में नियमित रूप से रामायण बैले का मंचन भी किया जाता है, जो स्थानीय संस्कृति और भारतीय महाकाव्य की गहरी ऐतिहासिक कड़ी को दर्शाता है।

    प्रम्बानन मंदिर को वर्ष 1991 में विश्व धरोहर का दर्जा मिला था। यह स्थल आज भी लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। भारतीय और इंडोनेशियाई विशेषज्ञों के सहयोग से मंदिर परिसर के कुछ पुराने और क्षतिग्रस्त हिस्सों के संरक्षण और जीर्णोद्धार की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान इस सहयोग को आगे बढ़ाने से जुड़े महत्वपूर्ण कदमों की भी घोषणा होने की संभावना है।

    इंडोनेशिया दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है, लेकिन यहां हिंदू और बौद्ध सभ्यता की विरासत आज भी सुरक्षित है। इस्लाम के आगमन से पहले यहां कई शक्तिशाली हिंदू-बौद्ध राजवंशों का शासन रहा, जिनकी छाप आज भी मंदिरों, स्मारकों और सांस्कृतिक परंपराओं में दिखाई देती है। जावा, बाली, सुमात्रा और अन्य द्वीपों पर स्थित अनेक प्राचीन मंदिर इस ऐतिहासिक विरासत के साक्षी हैं।

    बाली द्वीप आज भी हिंदू संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां बड़ी संख्या में हिंदू आबादी निवास करती है। वहीं इंडोनेशिया की सांस्कृतिक पहचान में रामायण, महाभारत, भगवान हनुमान और गरुड़ जैसे पात्रों का विशेष स्थान है। इनका प्रभाव स्थानीय कला, नृत्य, साहित्य और सांस्कृतिक आयोजनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

    प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल सांस्कृतिक महत्व तक सीमित नहीं है। दोनों देशों के बीच रक्षा, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, निवेश, डिजिटल सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी को भी आगे बढ़ाने पर विशेष जोर रहेगा। दोनों देशों के साझा हितों को देखते हुए यह दौरा व्यापक द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐतिहासिक विरासत और आधुनिक रणनीतिक सहयोग के इस संतुलन से भारत और इंडोनेशिया के संबंधों को नई गति मिलेगी। प्रम्बानन मंदिर का दौरा इस बात का भी प्रतीक होगा कि सांस्कृतिक जुड़ाव आज भी दोनों देशों की साझेदारी की मजबूत नींव बना हुआ है।

  • ब्रिटिश दौर से सत्ता के गलियारों तक: दिल्ली जिमखाना क्लब की चमकदार विरासत अब बड़े बदलाव के मोड़ पर

    ब्रिटिश दौर से सत्ता के गलियारों तक: दिल्ली जिमखाना क्लब की चमकदार विरासत अब बड़े बदलाव के मोड़ पर


    नई दिल्ली। देश की राजधानी के सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली संस्थानों में गिने जाने वाले दिल्ली जिमखाना क्लब का नाम एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया है। ब्रिटिश दौर से लेकर आधुनिक भारत तक सत्ता, प्रशासन और प्रभावशाली वर्ग की पहचान रहे इस ऐतिहासिक क्लब के भविष्य को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। सरकार ने सुरक्षा और सार्वजनिक आवश्यकताओं का हवाला देते हुए क्लब के परिसर को अपने नियंत्रण में लेने का निर्णय किया है। इस फैसले ने न केवल एक संस्थान बल्कि एक लंबे इतिहास, परंपरा और रसूख के प्रतीक को नई बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।

    करीब एक सदी से भी अधिक पुराने इस क्लब की पहचान केवल एक सामाजिक संस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह देश के प्रभावशाली लोगों की गतिविधियों और मेलजोल का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी रहा है। ब्रिटिश अधिकारियों और सैन्य अफसरों के लिए स्थापित यह स्थान समय के साथ भारत के शीर्ष नौकरशाहों, राजनयिकों, सैन्य अधिकारियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के लिए एक खास जगह बन गया। राजधानी के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थित यह परिसर लंबे समय तक अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखने में सफल रहा।

    दिल्ली जिमखाना क्लब की सबसे बड़ी पहचान उसकी सदस्यता व्यवस्था रही है। इस क्लब की सदस्यता को प्रतिष्ठा और सामाजिक प्रभाव का प्रतीक माना जाता था। एक समय ऐसा भी रहा जब यहां सदस्य बनने के लिए लोगों को वर्षों नहीं बल्कि कई दशकों तक इंतजार करना पड़ता था। कुछ लोगों को सदस्यता पाने के लिए 30 से 40 वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में रहना पड़ा। सीमित सदस्य संख्या और विशेष चयन प्रक्रिया ने इसे देश के सबसे विशिष्ट क्लबों की सूची में शामिल कर दिया था। निजी श्रेणी के आवेदकों के लिए लाखों रुपये तक की सदस्यता प्रक्रिया भी इसकी विशिष्टता को और बढ़ाती रही।

    हालांकि वर्षों के दौरान क्लब कई विवादों से भी घिरा रहा। समय-समय पर वित्तीय अनियमितताओं, प्रशासनिक निर्णयों और सदस्यता प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठते रहे। जांच और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद क्लब के संचालन और व्यवस्थाओं पर कई बार गंभीर चर्चाएं हुईं। बीते वर्षों में इन विवादों ने इसकी छवि को भी प्रभावित किया और प्रशासनिक स्तर पर निगरानी बढ़ाई गई।

    अब सरकार द्वारा परिसर वापस लेने के फैसले ने पूरे घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। बताया जा रहा है कि यह निर्णय सुरक्षा, रणनीतिक जरूरतों और सार्वजनिक परियोजनाओं से जुड़ी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। राजधानी के अत्यंत संवेदनशील इलाके में स्थित यह स्थान प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है और इसी कारण इसे लेकर कार्रवाई तेज हुई है।

    दिल्ली जिमखाना क्लब की कहानी केवल एक भवन या क्लब की कहानी नहीं है बल्कि यह बदलते भारत, सत्ता के गलियारों और सामाजिक प्रतिष्ठा के लंबे सफर की कहानी भी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि आने वाले समय में यह ऐतिहासिक विरासत किस दिशा में आगे बढ़ती है और इसका भविष्य किस नए अध्याय की शुरुआत करता है।

  • 30 साल का इंतजार, सत्ता से लेकर समाज तक असर… आखिर क्यों देश की सबसे खास पहचान बना दिल्ली जिमखाना क्लब?

    30 साल का इंतजार, सत्ता से लेकर समाज तक असर… आखिर क्यों देश की सबसे खास पहचान बना दिल्ली जिमखाना क्लब?

    नई दिल्ली। देश की राजधानी में स्थित दिल्ली जिमखाना क्लब एक बार फिर सुर्खियों में है। सरकार की ओर से क्लब परिसर खाली करने के निर्देश के बाद इस प्रतिष्ठित संस्था को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। दशकों से देश के सबसे प्रभावशाली और प्रतिष्ठित सामाजिक क्लबों में गिने जाने वाले इस संस्थान की पहचान केवल एक क्लब के रूप में नहीं रही, बल्कि यह देश के सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव का एक अहम केंद्र भी माना जाता रहा है। लंबे समय से यह जगह उन लोगों की पहचान बन चुकी थी, जिन्हें समाज के प्रभावशाली और चुनिंदा वर्ग का हिस्सा माना जाता था।

    दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना वर्ष 1913 में हुई थी। शुरुआत में यह एक विशेष सामाजिक और खेल गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। समय के साथ इस क्लब ने केवल खेल और मनोरंजन की सीमाओं को पार किया और एक ऐसी जगह बन गया, जहां देश की कई बड़ी हस्तियों की मौजूदगी सामान्य बात मानी जाने लगी। आजादी से पहले और बाद के दौर में इस क्लब का नाम कई प्रभावशाली लोगों के साथ जुड़ता रहा। देश के राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास के कई महत्वपूर्ण अध्यायों के दौरान यह स्थान चर्चाओं और मुलाकातों का केंद्र रहा।

    इस क्लब की एक सबसे बड़ी पहचान इसकी सदस्यता रही है। आम तौर पर किसी भी क्लब में सदस्य बनने की प्रक्रिया सीमित समय में पूरी हो जाती है, लेकिन दिल्ली जिमखाना क्लब का मामला बिल्कुल अलग रहा है। यहां सदस्यता के लिए लोगों को कई बार 20 से 30 वर्षों तक इंतजार करना पड़ता रहा। इतनी लंबी प्रतीक्षा सूची अपने आप में इसकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को दर्शाती है। सदस्यता को सिर्फ सुविधा पाने का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और विशेष पहचान के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है।

    दिल्ली जिमखाना क्लब की इमारत और उसका परिसर भी अपनी अलग ऐतिहासिक पहचान रखते हैं। राजधानी के महत्वपूर्ण इलाके में फैला इसका विशाल परिसर वर्षों से विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसकी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व इसे सामान्य संस्थानों से अलग पहचान देते हैं। यही वजह रही कि यह स्थान केवल क्लब गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा बल्कि देश की विरासत का भी हिस्सा माना जाता रहा है।

    अब सरकार के हालिया फैसले ने इस ऐतिहासिक संस्थान को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। क्लब परिसर को सार्वजनिक जरूरतों और प्रशासनिक कारणों से वापस लेने के फैसले के बाद कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कुछ लोग इसे प्रशासनिक जरूरत मान रहे हैं तो कुछ इसे एक ऐतिहासिक अध्याय के बदलते दौर के रूप में देख रहे हैं। हालांकि इतना तय है कि दिल्ली जिमखाना क्लब केवल एक इमारत या क्लब नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसी पहचान बन चुका है जिसने कई पीढ़ियों तक सामाजिक प्रतिष्ठा, प्रभाव और विशिष्टता की अलग कहानी लिखी है। आज बदलते समय में यह फैसला केवल एक संस्थान से जुड़ा मुद्दा नहीं बल्कि देश की ऐतिहासिक और सामाजिक विरासत से जुड़ी एक बड़ी चर्चा बन चुका है।

  • मुख्यमंत्री डॉ. यादव शुजालपुर नगरपालिका परिषद ने जन सेवा और लोक कल्याण के 100 वर्ष पूर्ण किए हैं

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव शुजालपुर नगरपालिका परिषद ने जन सेवा और लोक कल्याण के 100 वर्ष पूर्ण किए हैं


    भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि नगरपालिका परिषद का शताब्दी वर्ष शुजालपुर के हर नागरिक के सम्मान का उत्सव है। यह हमारी विरासत, उपलब्धियों और सामूहिक संकल्प का पर्व है। जटाशंकर महादेव की असीम कृपा से शुजालपुर नगरपालिका ने जन सेवा और लोक कल्याण के 100 वर्ष पूर्ण किए हैं।
    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने शुजालपुर नगरपालिका के नए भवन के लिए 3 करोड़ रुपए और नगरपालिका क्षेत्र में सड़कों सहित अन्य विकास कार्य के लिए दो करोड़ रुपए नगरपालिका परिषद शुजालपुर को उपलब्ध कराने की घोषणा की। मुख्यमंत्री डॉ. यादव गुरूवार को शुजालपुर नगरपालिका परिषद के 100 वर्ष पूर्ण होने पर शुजालपुर में आयोजित शताब्दी वर्ष समारोह को मंत्रालय भोपाल से वर्चुअली संबोधित कर रहे थे। शुजालपुर में हुए कार्यक्रम में उच्च शिक्षा मंत्री श्री इंदर सिंह सिंह परमार, नगरपालिका अध्यक्ष श्रीमती बबीता परमार उपस्थित रही।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि शुजालपुर में स्वच्छता से संबंधित गतिविधियों में निरंतर प्रगति हो रही है। नगर को राष्ट्रीय रैंकिंग में और बेहतर स्थान पर लाने के लिए आगामी वर्षों में अतिरिक्त प्रयास किए जाएंगे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बताया कि गत 2 वर्षों में शुजालपुर में ऑडिटोरियम और सीसी रोड के लिए 5 करोड़ रुपए, कायाकल्प योजना के अंतर्गत सड़क निर्माण के लिए 6 करोड़ 60 लाख रुपए, अमृत 2 के अंतर्गत जलप्रदाय के लिए 12 करोड़ रुपए की राशि उपलब्ध कराई गई है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि शुजालपुर वीरों की भूमि रही है। जब पेशवा बाजीराव प्रथम ने मालवा में विजय का परचम लहराया तब शुजालपुर उनकी रणनीतिक प्राथमिकता में था। इस पावन धरा पर पेशवाओं की सेना का नेतृत्व करते हुए राणो जी शिंदे ने मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। उनकी स्मृति में बना भव्य शिव मंदिर और ऐतिहासिक छतरी आज भी हमें शौर्य की प्रेरणा देते हैं।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि शौर्य और संकल्प की नींव पर आज से ठीक 100 वर्ष पहले 1926 में नगरपालिका परिषद का गठन शुजालपुर में हुआ था। एक उज्जवल भविष्य का संकल्प आज वट वृक्ष बन चुका है। वर्तमान में शुजालपुर विकास का मॉडल बन रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राज्य में जारी गतिविधियों के परिणाम स्वरूप शुजालपुर क्षेत्र में सड़कों, स्वास्थ्य, शिक्षा सुविधाओं, व्यापार-व्यवसाय गतिविधियों आदि में निरंतर प्रगति हो रही है।

    परिषद के माध्यम से राज्य सरकार हर घर तक सड़क-बिजली और पानी पहुंचाने के संकल्प को सिद्ध कर रही है। शहर की पेयजल समस्या का समाधान काफी हद तक करने का प्रयास किया गया है। नगर में 21 करोड़ 55 लाख रुपए की लागत से जमघड़ नदी को साफ रखने की तैयारी है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उपहार के समान होगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने शुजालपुर को विकास के शिखर पर ले जाने के लिए जन भागीदारी को प्रोत्साहित करने का आहवान किया।

    उच्च शिक्षा मंत्री श्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में गत 2 वर्षों में विकास और जनकल्याण की दृष्टि से क्षेत्र का कायाकल्प हुआ है। मंत्री श्री परमार ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव से नए और बड़े बस स्टैंड के लिए भूमि आवंटित करने का अनुरोध किया। कार्यक्रम को नगरपालिका अध्यक्ष श्रीमती बबीता परमार ने भी संबोधित किया। शुजालपुर के कार्यक्रम में पूर्व मंत्री श्री विजेंद्र सिंह सिसोदिया, जिला पंचायत अध्यक्ष श्री हेमराज सिंह सिसोदिया, जनप्रतिनिधि, समाजसेवी और बड़ी संख्या में स्थानीय जन उपस्थित थे।