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  • तमिलनाडु दिवस पर सीएम विजय की अपील, तमिल भाषा और सांस्कृतिक विरासत बचाने के लिए दिया खास संदेश..

    तमिलनाडु दिवस पर सीएम विजय की अपील, तमिल भाषा और सांस्कृतिक विरासत बचाने के लिए दिया खास संदेश..

    नई दिल्ली ।चेन्नई। तमिलनाडु दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री विजय ने राज्य के नागरिकों से तमिल भाषा की रक्षा करने और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की अपील की। रविवार, 1 नवंबर को जारी अपने संदेश में उन्होंने तमिलनाडु की ऐतिहासिक पहचान, मातृभाषा के महत्व और राज्य के गठन के लिए हुए संघर्षों को याद किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि तमिल भाषा और संस्कृति का संरक्षण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने लोगों से अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक गौरव को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का आग्रह किया।

    मुख्यमंत्री विजय ने अपने संदेश में उन लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने तमिल भाषा की रक्षा और तमिल भाषी क्षेत्रों को एक राज्य के अंतर्गत लाने के लिए संघर्ष किया था। उन्होंने कहा कि इन लोगों के प्रयास और बलिदान तमिल समाज की एकता तथा साझा पहचान के लिए हमेशा प्रेरणा बने रहेंगे। उनके संघर्षों ने तमिलनाडु के गठन और उसकी विशिष्ट पहचान को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    उन्होंने तमिलनाडु दिवस को केवल राज्य स्थापना की वर्षगांठ तक सीमित नहीं बताया, बल्कि इसे राज्य के इतिहास, भाषा और सांस्कृतिक विरासत को याद करने का अवसर भी माना। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह दिन उन ऐतिहासिक प्रयासों को सम्मान देने का मौका है, जिनके माध्यम से तमिल भाषी लोगों की पहचान को एकजुट स्वरूप मिला।

    विजय ने नागरिकों से तमिल थाई यानी मातृ तमिल भाषा के प्रति सम्मान बनाए रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि भाषा किसी भी समाज के इतिहास, संस्कृति और सामूहिक पहचान से गहराई से जुड़ी होती है। इसलिए तमिल भाषा की रक्षा करना अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने के समान है। उन्होंने लोगों से भाषा से जुड़ी परंपराओं को निरंतर आगे बढ़ाने का आग्रह किया।

    मुख्यमंत्री ने उन शहीदों और संघर्षकर्ताओं के योगदान को भी याद किया, जिन्होंने तमिल भाषी क्षेत्रों को एकजुट करने तथा मातृभाषा के सम्मान के लिए प्रयास किए। उन्होंने कहा कि उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूक करता रहेगा। ऐसे ऐतिहासिक प्रयासों को याद रखना समाज में एकता और अपनत्व की भावना को मजबूत करने के लिए जरूरी है।

    तमिलनाडु दिवस का संबंध राज्यों के भाषाई आधार पर पुनर्गठन और राज्य के गठन की ऐतिहासिक प्रक्रिया से है। हर साल 1 नवंबर को यह दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर राज्य के गठन में योगदान देने वाले लोगों और उन संघर्षों को याद किया जाता है, जिन्होंने तमिल भाषी क्षेत्रों को एक अलग पहचान दिलाने में भूमिका निभाई।

    मुख्यमंत्री विजय ने अपने शुभकामना संदेश में इस ऐतिहासिक अवसर को तमिलनाडु की विशिष्ट पहचान और गौरव से जोड़ते हुए नागरिकों से अपनी विरासत के प्रति प्रतिबद्ध रहने का आह्वान किया। उन्होंने भाषा, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण को राज्य की पहचान बनाए रखने का महत्वपूर्ण आधार बताया। उनका संदेश तमिलनाडु दिवस के ऐतिहासिक महत्व के साथ मातृभाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को सम्मान देने पर केंद्रित रहा।

  • नरवर किले को ASI के अधीन करने की पहल, रणथंभौर-कूनो से खजुराहो तक पर्यटन सर्किट बनाने का प्रस्ताव

    नरवर किले को ASI के अधीन करने की पहल, रणथंभौर-कूनो से खजुराहो तक पर्यटन सर्किट बनाने का प्रस्ताव

    मध्य प्रदेश: के शिवपुरी जिले में स्थित ऐतिहासिक नरवर किले के संरक्षण और पर्यटन विकास की दिशा में पहल की गई है। शिवपुरी-गुना क्षेत्र के सांसद और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किले को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन करने, यहां तक पहुंचने के लिए बेहतर सड़क बनाने और इसे प्रमुख पर्यटन स्थलों से जोड़ने के प्रस्ताव पर कार्रवाई की अनुशंसा की है। इस संबंध में उन्होंने केंद्रीय संस्कृति मंत्री जी. किशन रेड्डी और मध्य प्रदेश की पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर को अर्धशासकीय पत्र भेजे हैं। यह पहल भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य संदीप माहेश्वरी और नगर परिषद अध्यक्ष पद्मा संदीप माहेश्वरी की ओर से उठाई गई मांगों के बाद सामने आई है।

    नरवर का किला अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के कारण क्षेत्र की महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है। इससे राजा नल और रानी दमयंती की कथाएं, प्राचीन राजवंशों का इतिहास और ढोला-मारू की प्रेमकथा जैसी लोकपरंपराएं जुड़ी हुई हैं। किले को लेकर प्रचलित मान्यताओं में इसे राजा नल की राजधानी नलपुर से भी जोड़ा जाता है। यहां पसरा देवी और लोढ़ी माता से संबंधित धार्मिक आस्थाएं भी स्थानीय परंपरा का हिस्सा हैं। इन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहलुओं के चलते किले के संरक्षण और व्यवस्थित पर्यटन विकास की मांग लंबे समय से उठती रही है।

    नरवर किले का इतिहास अलग-अलग राजवंशों और शासकों से जुड़ा रहा है। प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर नाग राजाओं का शासन होने के उल्लेख मिलते हैं। बाद के दौर में कछवाह राजपूतों ने किले का पुनर्निर्माण कराया। इसके बाद यहां परिहार और तोमर राजपूतों का अधिकार रहा। 16वीं शताब्दी की शुरुआत में सिकंदर लोदी ने किले पर कब्जा किया। आगे चलकर मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में यह मालवा सूबे के प्रशासनिक ढांचे का हिस्सा बना। 19वीं शताब्दी की शुरुआत में मराठा सिंधिया राजवंश ने इस पर अधिकार कर लिया। किले के ऐतिहासिक भवनों में कचहरी महल भी शामिल है, जिसके जीर्णोद्धार का उल्लेख वर्ष 1925 में महाराजा माधवराव सिंधिया के समय से जुड़ा है।

    किला विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। कस्बे से इसकी खड़ी ऊंचाई लगभग 500 फीट बताई जाती है, जबकि समुद्र तल से इसकी ऊंचाई करीब 1,600 फीट है। इसकी भौगोलिक स्थिति और प्राचीन संरचना इसे विशेष पहचान देती है, लेकिन ऊंचाई पर स्थित होने के कारण पर्यटकों के लिए पहुंच आसान बनाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बेहतर पहुंच मार्ग, नियमित रखरखाव और आवश्यक पर्यटक सुविधाओं की कमी लंबे समय से स्थानीय स्तर पर चिंता का विषय रही है। किले तक सड़क बनाने के लिए वन विभाग और लोक निर्माण विभाग के समन्वय की जरूरत भी उठाई जाती रही है।

    किले को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन करने का प्रस्ताव संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य ऐतिहासिक संरचनाओं का व्यवस्थित रखरखाव करना और पुरातात्विक महत्व के अनुरूप उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि, प्रस्ताव पर संबंधित विभागों की नियमानुसार कार्रवाई और निर्णय के बाद ही इसके क्रियान्वयन की स्थिति स्पष्ट होगी।

    पर्यटन विकास के लिए रणथंभौर, कूनो, शिवपुरी, नरवर, ओरछा और खजुराहो को जोड़कर एक सर्किट विकसित करने का सुझाव दिया गया है। इन स्थलों को एक मार्ग से जोड़ने पर पर्यटकों को वन्यजीव पर्यटन, ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक स्थलों को एक ही यात्रा में देखने का अवसर मिल सकता है। इससे नरवर को भी व्यापक पर्यटन मानचित्र पर पहचान मिलने की संभावना है।

    पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंच सकता है। गाइड सेवा, होटल, होम-स्टे, परिवहन, खानपान और अन्य पर्यटन सुविधाओं से जुड़े रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। स्थानीय दुकानदारों और छोटे कारोबारियों को भी इसका फायदा मिल सकता है। फिलहाल, किले के संरक्षण, पहुंच मार्ग और पर्यटन सर्किट से जोड़ने के प्रस्तावों पर संबंधित स्तरों पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

  • सिंगापुर के पर्यटन मंच पर छाया मध्यप्रदेश, टाइगर स्टेट से मोगली लैंड और लजीज व्यंजनों तक दुनिया को न्योता

    सिंगापुर के पर्यटन मंच पर छाया मध्यप्रदेश, टाइगर स्टेट से मोगली लैंड और लजीज व्यंजनों तक दुनिया को न्योता

    नई दिल्ली । मध्यप्रदेश ने सिंगापुर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय पर्यटन व्यापार प्रदर्शनी आईटीबी एशिया में अपनी प्राकृतिक सुंदरता, वन्यजीव संपदा, सांस्कृतिक विविधता, ऐतिहासिक धरोहरों और पारंपरिक व्यंजनों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत किया। सैंड्स एक्सपो एंड कन्वेंशन सेंटर में आयोजित राष्ट्रीय पर्यटन संगठनों के विशेष सत्र में मध्यप्रदेश पर्यटन बोर्ड के प्रबंध संचालक डॉ. इलैयाराजा टी ने अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों और टूर ऑपरेटरों को राज्य की यात्रा करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने कहा कि जो पर्यटक स्थापित और भीड़भाड़ वाले पर्यटन स्थलों से अलग हटकर वास्तविक, प्राकृतिक और स्थानीय जीवन से जुड़े अनुभव चाहते हैं, उनके लिए मध्यप्रदेश एक आकर्षक विकल्प है।

    डॉ. इलैयाराजा टी ने मध्यप्रदेश को भारत का दिल बताते हुए कहा कि राज्य की पहचान केवल उसकी भौगोलिक स्थिति तक सीमित नहीं है। यहां की सांस्कृतिक विविधता, स्थानीय परंपराएं और लोगों का आत्मीय व्यवहार पर्यटकों को अलग अनुभव प्रदान करते हैं। उनके अनुसार, बदलते वैश्विक पर्यटन परिदृश्य में यात्रियों की रुचि नए स्थानों और स्थानीय जीवनशैली को करीब से जानने में बढ़ रही है। ऐसे में मध्यप्रदेश अपनी विविध पर्यटन संभावनाओं के जरिए अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को आकर्षित कर सकता है।

    उन्होंने अत्यधिक पर्यटन दबाव की समस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया के कई प्रमुख पर्यटन स्थलों पर सीमित स्थानों और खास समय के दौरान पर्यटकों की भीड़ बढ़ जाती है। इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान पर्यटन गतिविधियों को नए क्षेत्रों तक पहुंचाना और कम चर्चित स्थलों की खोज को प्रोत्साहित करना है। उनके मुताबिक, नए गंतव्यों को पर्यटन मानचित्र पर लाने से यात्रियों को अलग अनुभव मिल सकते हैं और लोकप्रिय स्थानों पर भीड़ का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

    मध्यप्रदेश की प्राकृतिक संपदा को प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि राज्य के 25 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में जंगल हैं। वन्यजीवों के मामले में मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट के रूप में विशेष पहचान मिली हुई है। इसके अलावा राज्य चीता, तेंदुआ, गिद्ध और घड़ियाल जैसे वन्यजीवों के लिए भी जाना जाता है। यहां के राष्ट्रीय उद्यान, वन क्षेत्र और प्राकृतिक रास्ते वन्यजीव प्रेमियों तथा प्रकृति के बीच समय बिताने के इच्छुक पर्यटकों के लिए खास आकर्षण हैं।

    पेंच राष्ट्रीय उद्यान को मोगली और जंगल बुक की कहानियों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया। यहां की प्रकृति भ्रमण गतिविधियां पर्यटकों को जंगल और वन्यजीवों के वातावरण को करीब से समझने का अवसर देती हैं। ऐतिहासिक ओरछा में बेतवा नदी पर रिवर राफ्टिंग भी पर्यटन के प्रमुख आकर्षणों में शामिल है। राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत में सांची स्तूप, खजुराहो के मंदिर और भीमबेटका के शैलचित्रों का विशेष स्थान है। प्रस्तुति में मध्यप्रदेश के 22 यूनेस्को धरोहर स्थलों का भी उल्लेख किया गया।

    राज्य की पहचान उसके पारंपरिक हस्तशिल्प और जनजातीय संस्कृति से भी जुड़ी है। मध्यप्रदेश में सात प्रमुख जनजातियों और 45 उप-जनजातियों की सांस्कृतिक परंपराएं मौजूद हैं। चंदेरी और महेश्वरी वस्त्र, गोंड चित्रकला तथा भोपाल की जरी-जरदोजी कला स्थानीय शिल्प की विशिष्ट पहचान हैं। इन परंपराओं के माध्यम से पर्यटक राज्य की सांस्कृतिक विरासत और कारीगरों के कौशल को समझ सकते हैं।

    पर्यटन के नए अवसर विकसित करने के लिए राज्य में हेली पर्यटन सेवा का विस्तार किया जा रहा है, ताकि कम पहुंच वाले पर्यटन स्थलों तक पहुंच आसान हो सके। मध्यप्रदेश ने स्पेनिश फिल्म आयोग के साथ समझौता कर अंतरराष्ट्रीय फिल्म पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल भी की है। महिला सफारी चालकों और महिलाओं द्वारा संचालित होटलों को सुरक्षित तथा जिम्मेदार पर्यटन के प्रयासों के रूप में प्रस्तुत किया गया।

    डॉ. इलैयाराजा टी ने ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने पर जोर देते हुए कहा कि किसी स्थान की असली सुंदरता केवल उसकी इमारतों और ऐतिहासिक स्थलों में नहीं, बल्कि वहां के लोगों के व्यवहार और आतिथ्य में भी दिखाई देती है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को स्थानीय जीवन, संस्कृति और परंपराओं का अनुभव लेने के लिए आमंत्रित किया।

    मध्यप्रदेश के खानपान को भी प्रस्तुति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया। मालवा का पोहा-जलेबी, रतलामी सेव, पारंपरिक दाल-बाफला, मुरैना और ग्वालियर की गजक तथा नवाबी और बुंदेली शैली की मटन करी का उल्लेख किया गया। उन्होंने विश्वास जताया कि हेलीकॉप्टर संपर्क, सालभर आयोजित होने वाले सांस्कृतिक उत्सव और सुरक्षित पर्यटन वातावरण राज्य की यात्रा को यादगार बनाने में मदद करेंगे।

  • पेरिस में जान्हवी कपूर ने पहनी मलमल खादी साड़ी, रिया कपूर ने इसे भारतीय धरोहर के सम्मान से जोड़ा

    पेरिस में जान्हवी कपूर ने पहनी मलमल खादी साड़ी, रिया कपूर ने इसे भारतीय धरोहर के सम्मान से जोड़ा


    नई दिल्ली ।
    बॉलीवुड अभिनेत्री जान्हवी कपूर अपने फैशन अंदाज के लिए जानी जाती हैं और इस बार पेरिस में उनका पारंपरिक भारतीय लुक चर्चा में रहा। बीओएफ 500 गाला में जान्हवी कपूर ने आधुनिक फैशन के बीच भारतीय परिधान और पारंपरिक कारीगरी को खास अंदाज में पेश किया। इस अवसर के लिए उन्होंने पंकज एस हेरिटेज का कस्टम आउटफिट पहना, जिसे फैशन स्टाइलिस्ट रिया कपूर ने तैयार और स्टाइल किया था। जान्हवी ऑफ-व्हाइट साड़ी में नजर आईं, जिसमें भारतीय टेक्सटाइल की खासियत साफ दिखाई दी।

    रिया कपूर ने सोशल मीडिया पर जान्हवी के इस लुक से जुड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि अभिनेत्री की साड़ी 460 काउंट बंगाल मलमल से तैयार की गई थी। इस खास मलमल को बाफ्त-ए-हवा, शबनमी और चांदनी जैसे नामों से भी जाना जाता है। रिया के अनुसार, यह मलमल पूरी तरह भारत में ही बुनी गई है। उन्होंने इस साड़ी को भारत की धरोहर के सम्मान से जोड़ा। इस तरह जान्हवी के पहनावे में फैशन के साथ भारतीय कपड़ा परंपरा को भी प्रमुखता मिली।

    जान्हवी की छह गज लंबी ऑफ-व्हाइट साड़ी में पारंपरिक भारतीय टेक्सटाइल और कारीगरी के साथ आधुनिक डिजाइन का मेल देखने को मिला। साड़ी की फ्लोइंग ड्रेपिंग को गोल्ड डिटेलिंग से सजाया गया था। इसके अलावा मोती, शेल्स और टैसल्स का इस्तेमाल किया गया, जिससे परिधान को अलग रूप मिला। साड़ी की बनावट और सजावट ने पूरे पहनावे को आकर्षक और पारंपरिक स्वरूप के साथ आधुनिक प्रस्तुति दी।

    इस खास आउटफिट के साथ जान्हवी ने मैचिंग बस्टियर स्टाइल ब्लाउज पहना। ब्लाउज में पतली स्ट्रैप्स और स्वीटहार्ट नेकलाइन दी गई थी। साड़ी के साथ इसे इस तरह रखा गया कि पारंपरिक परिधान और आधुनिक फैशन का संतुलन बना रहे। जान्हवी के पूरे लुक में सादगी के साथ बारीक कारीगरी और सजावटी विवरणों पर विशेष ध्यान दिखाई दिया। ऑफ-व्हाइट रंग ने भी पूरे परिधान को एक अलग और सौम्य रूप दिया।

    लुक को और खास बनाने के लिए साड़ी के साथ ऑर्नेट स्लीव्स जोड़ी गई थीं। इन स्लीव्स में पोल्की, गार्नेट और एमराल्ड जैसे कीमती पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। इसके साथ सराफा टैसल्स, किरण और रेशम की फ्रिंजिंग शामिल की गई। इन बारीक सजावटी तत्वों ने परिधान में रॉयल टच जोड़ा और पारंपरिक भारतीय शिल्प की खूबसूरती को उभारा। जान्हवी का यह पहनावा भारतीय कारीगरी और समकालीन फैशन के संयोजन के तौर पर सामने आया।

    पेरिस के इस आयोजन में जान्हवी कपूर का लुक इसलिए भी खास रहा क्योंकि इसमें भारतीय परिधान को अंतरराष्ट्रीय फैशन मंच के अनुरूप प्रस्तुत किया गया। बंगाल मलमल से तैयार साड़ी, पारंपरिक कारीगरी, कीमती पत्थरों से सजी स्लीव्स और आधुनिक ब्लाउज डिजाइन ने उनके पूरे लुक को अलग पहचान दी। रिया कपूर द्वारा साझा की गई जानकारी के मुताबिक, इस परिधान का उद्देश्य भारतीय विरासत और टेक्सटाइल की खूबसूरती को सामने लाना था। जान्हवी का यह अंदाज आधुनिक फैशन और पारंपरिक भारतीय क्राफ्ट के मेल को दर्शाता नजर आया।

  • भूपेंद्र पटेल ने न्यू जर्सी अक्षरधाम को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सेवा का वैश्विक प्रकाशस्तंभ बताया, स्वयंसेवकों की सराहना की

    भूपेंद्र पटेल ने न्यू जर्सी अक्षरधाम को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और सेवा का वैश्विक प्रकाशस्तंभ बताया, स्वयंसेवकों की सराहना की

    नई दिल्ली । गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान न्यू जर्सी के रॉबिन्सविल स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण अक्षरधाम का दौरा किया। उन्होंने अक्षरधाम को भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक सेवा तथा स्वयंसेवकों के समर्पण का प्रभावशाली वैश्विक प्रतीक बताया। मुख्यमंत्री के साथ गुजरात सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद रहा।

    अक्षरधाम पहुंचने पर बीएपीएस के संतों ने भूपेंद्र पटेल का स्वागत किया। इस दौरान वित्त विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. संजीव कुमार और मुख्यमंत्री के सचिव विक्रांत पांडे सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। यात्रा के दौरान मुख्यमंत्री ने परिसर की वास्तुकला और वहां संचालित गतिविधियों के बारे में जानकारी ली।

    भूपेंद्र पटेल ने निर्माणाधीन अक्षरधाम संग्रहालय का विशेष भ्रमण भी किया। उन्हें बताया गया कि भारतीय विरासत को समर्पित यह संग्रहालय अमेरिका में अपनी तरह के शुरुआती हिंदू सांस्कृतिक संग्रहालयों में शामिल होगा। संग्रहालय में भारत की गौरवशाली विरासत को आधुनिक और दृश्य माध्यमों के जरिए प्रस्तुत करने की योजना है।

    संग्रहालय में 12 वास्तुशिल्प प्रतिकृतियां, 40 मल्टीमीडिया प्रस्तुतियां, 85 डायोरामा और 200 सजीव प्रतिमाओं के माध्यम से भारतीय इतिहास, संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी प्रस्तुति विभिन्न आयु और पृष्ठभूमि के लोगों को भारतीय मूल्यों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    उन्होंने आस्था, सद्भाव, करुणा, पारिवारिक मूल्यों और निःस्वार्थ सेवा जैसे विषयों को सार्वभौमिक महत्व वाला बताया। अक्षरधाम मंदिर की सूक्ष्म नक्काशी, विशाल स्वरूप और शांत वातावरण से भी मुख्यमंत्री प्रभावित हुए। संग्रहालय के भ्रमण के दौरान उन्होंने कहा कि यहां भारत की प्राचीन संस्कृति को प्रभावशाली तरीके से पुनर्जीवित किया गया है।

    मुख्यमंत्री ने अक्षरधाम में सेवा कर रहे स्वयंसेवकों से भी मुलाकात की। उन्होंने स्वयंसेवकों के अनुशासन, विनम्रता, आतिथ्य और सेवा भावना की सराहना की। उन्होंने कहा कि अक्षरधाम के निर्माण में योगदान देने वाले बीएपीएस स्वयंसेवकों की मेहनत और समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा दे सकता है।

    भूपेंद्र पटेल ने कहा कि दुनिया के किसी भी हिस्से से यहां आने वाला व्यक्ति शांति का अनुभव कर सकता है। उनके अनुसार अक्षरधाम केवल एक धार्मिक परिसर नहीं, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति, अध्यात्म और मानवीय मूल्यों को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने वाला महत्वपूर्ण केंद्र है।

    मुख्यमंत्री की अमेरिका यात्रा वाइब्रेंट गुजरात पहल से जुड़ी गतिविधियों का हिस्सा है। करीब तीन दशकों में गुजरात के किसी मुख्यमंत्री की यह पहली अमेरिका यात्रा बताई गई है। अक्षरधाम के अनुभव का उल्लेख करते हुए पटेल ने कहा कि उनकी यात्रा का केंद्र वाइब्रेंट गुजरात है, लेकिन अक्षरधाम में भारत की संस्कृति स्वयं जीवंत रूप में दिखाई देती है।

    इस अवसर पर अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों और सामुदायिक नेताओं ने भी मुख्यमंत्री का स्वागत किया। यात्रा के दौरान बीएपीएस के सांस्कृतिक संरक्षण के साथ शिक्षा, मानवीय राहत, स्वास्थ्य सेवा, पर्यावरण जागरूकता, युवा विकास और सामाजिक सेवा से जुड़े वैश्विक योगदान को भी रेखांकित किया गया।

    भूपेंद्र पटेल ने अपने अनुभव को प्रेरणादायक और आध्यात्मिक रूप से सुखद बताया। उन्होंने भारतीय समुदाय की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि विदेशों में रहने वाले भारतीय अपनी सांस्कृतिक जड़ों और आध्यात्मिक परंपराओं को जीवित रखने में योगदान दे रहे हैं। उन्होंने सभी की शांति, भलाई और प्रगति की कामना की।

  • श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर पहुंचीं कुणाल खेमू की बहन, बदली हवेली और बीते दिनों की कहानी की साझा

    श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर पहुंचीं कुणाल खेमू की बहन, बदली हवेली और बीते दिनों की कहानी की साझा

    नई दिल्ली ।अभिनेता कुणाल खेमू के परिवार का श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर एक बार फिर चर्चा में है। वर्षों बाद उनकी बहन करिश्मा खेमू अपने परिवार के साथ इस घर पहुंचीं और वहां बिताए गए बचपन के दिनों से जुड़ी यादों को साझा किया। इस यात्रा का एक भावनात्मक वीडियो सामने आया है, जिसमें परिवार अपने पुराने घर के हर हिस्से को देखते हुए अतीत की स्मृतियों को दोबारा जीता नजर आता है। यह दौरा केवल एक मकान तक लौटने का नहीं, बल्कि उन यादों और भावनाओं से दोबारा जुड़ने का अवसर बन गया, जो समय के साथ पीछे छूट गई थीं।

    वीडियो में करिश्मा खेमू अपने पुश्तैनी घर के अलग-अलग हिस्सों को दिखाते हुए बताती हैं कि कभी यह पूरा भवन उनके परिवार का था, लेकिन अब समय के साथ इसकी संरचना और उपयोग दोनों बदल चुके हैं। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले जिन कमरों में परिवार के सदस्य साथ रहते थे, वे अब अलग-अलग हिस्सों में विभाजित हो चुके हैं और उनमें अन्य लोग निवास करते हैं। इसके बावजूद घर का हर कोना उनके बचपन की किसी न किसी याद को आज भी संजोए हुए है।

    करिश्मा की मां ने भी इस यात्रा के दौरान घर से जुड़ी कई पुरानी स्मृतियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि विवाह के बाद परिवार की शुरुआती जिंदगी इसी घर की ऊपरी मंजिल पर बीती थी। उन्होंने उन कमरों की ओर इशारा करते हुए पुराने दिनों को याद किया, जहां परिवार एक साथ समय बिताता था। घर की सीढ़ियां, आंगन और कमरे आज भी उन्हें बीते वर्षों की घटनाओं की याद दिलाते हैं। परिवार ने बताया कि इस मकान का हर हिस्सा किसी न किसी व्यक्तिगत अनुभव और पारिवारिक रिश्ते से जुड़ा हुआ है।

    समय के प्रभाव की छाप भी इस पुश्तैनी भवन पर स्पष्ट दिखाई देती है। हवेली की दीवारों का रंग फीका पड़ चुका है, लकड़ी की संरचनाओं पर उम्र के निशान साफ नजर आते हैं और कई हिस्सों में मरम्मत की आवश्यकता महसूस होती है। पारंपरिक कश्मीरी स्थापत्य शैली में बने इस मकान की लकड़ी की बालकनी, नक्काशीदार खंभे और पुराने दरवाजे आज भी इसकी ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखते हैं। हालांकि लंबे समय के दौरान भवन की स्थिति में काफी परिवर्तन आया है, लेकिन इसकी मूल संरचना अब भी अतीत की कहानी बयान करती है।

    करिश्मा ने बताया कि कभी पूरा परिवार जिस विशाल घर में एक साथ रहता था, आज वह कई छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित हो चुका है। उन्होंने यह भी बताया कि कई कमरे अब बंद रहते हैं और कुछ हिस्सों में किरायेदार निवास करते हैं। घर की सीढ़ियों और गलियारों में पहले जैसी रौनक नहीं रही, लेकिन वहां पहुंचते ही बचपन की अनेक यादें स्वतः ताजा हो गईं। परिवार के लिए यह यात्रा भावनात्मक अनुभव साबित हुई, क्योंकि वर्षों बाद वे अपने उस घर की दहलीज पर लौटे, जहां उनके जीवन की शुरुआती स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।

    कुणाल खेमू का जन्म श्रीनगर में हुआ था और बचपन में ही उनका परिवार घाटी छोड़कर मुंबई आ गया था। इसके बाद उन्होंने फिल्म जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। हालांकि जीवन की नई यात्रा शुरू होने के बावजूद श्रीनगर स्थित पुश्तैनी घर उनके परिवार की पहचान और विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा। करिश्मा खेमू की इस यात्रा ने एक बार फिर उन भावनात्मक संबंधों को सामने लाया है, जो किसी व्यक्ति और उसके पैतृक घर के बीच वर्षों बाद भी कायम रहते हैं। यह कहानी केवल एक भवन की नहीं, बल्कि स्मृतियों, पारिवारिक विरासत और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना को भी दर्शाती है।

  • केसरिया रंग पर छिड़ा घमासान, भारतीय हॉकी की पहचान और नीली जर्सी के इतिहास पर उठा बड़ा सवाल।

    केसरिया रंग पर छिड़ा घमासान, भारतीय हॉकी की पहचान और नीली जर्सी के इतिहास पर उठा बड़ा सवाल।

    नई दिल्ली। खेल जगत में किसी भी राष्ट्रीय टीम की जर्सी केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि उसकी दशकों पुरानी पहचान, विरासत और प्रशंसकों के भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक होती है। भारतीय खेल इतिहास में ‘मैन इन ब्लू’ और ‘विमेन इन ब्लू’ की अवधारणा केवल एक शब्द नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर भारत की खेल पहचान बन चुकी है। आगामी एफआईएच विश्व कप से ठीक पहले हॉकी इंडिया द्वारा भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीम की प्राथमिक जर्सी का रंग पारंपरिक नीले से बदलकर केसरिया करने के फैसले ने देश में एक नया विवाद और गहन वैचारिक बहस छेड़ दी है।

    हॉकी इंडिया ने जर्सी का रंग बदलने के पीछे तकनीकी और खेल विज्ञान से जुड़े कारणों का हवाला दिया है। महासंघ का तर्क है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिताओं में अधिकांश सिंथेटिक एस्ट्रोटर्फ नीले रंग की होती हैं। मैचों के दौरान नीली जर्सी पहनकर खेलने से खिलाड़ियों के कपड़े नीले टर्फ के रंग में मिल जाते हैं, जिससे मैदान पर साथी खिलाड़ियों की दृश्यता में बाधा आती है और त्वरित निर्णय लेने में परेशानी होती है। सपोर्ट स्टाफ और खिलाड़ियों के परामर्श से दृश्यता में सुधार के उद्देश्य से ही यह बदलाव किया गया है।

    हालांकि, इस तकनीकी दलील के बावजूद खेल जगत के कई दिग्गजों और पूर्व कप्तानों ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। पूर्व दिग्गजों का कहना है कि भारतीय हॉकी का गौरवशाली इतिहास नीली जर्सी के साथ जुड़ा हुआ है और विश्व पटल पर भारत की पहचान इसी रंग से बनती रही है। खेल के अंतरराष्ट्रीय जानकारों का मानना है कि ब्राजील की पीली, न्यूजीलैंड की काली या इटली की नीली जर्सी की तरह भारतीय टीम का नीला रंग भी दशकों की मेहनत के बाद एक वैश्विक ब्रांड बना था, जिसे एक झटके में बदलना अनुचित है।

    राजनीतिक गलियारों में भी इस बदलाव को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। विपक्षी दलों के नेताओं ने इस फैसले को सांस्कृतिक और वैचारिक ब्रांडिंग का हिस्सा बताते हुए सवाल उठाए हैं, जबकि खेल प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि खेलों में जर्सी के डिजाइन और रंग समय-समय पर बदलते रहे हैं और इस निर्णय को किसी राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।

    वैश्विक खेलों में जर्सी के रंग और राष्ट्रीय ध्वज के बीच अंतर होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी स्थापित खेल राष्ट्र की प्राथमिक पहचान को अचानक बदल देना हमेशा से चर्चा का विषय बनता रहा है। 1928 से लेकर अब तक ओलंपिक और विश्व कप के मंचों पर भारतीय हॉकी ने जो स्वर्णिम अध्याय लिखे हैं, वे किसी एक रंग से कहीं बढ़कर हैं। फिलहाल, यह बहस केवल एक रंग तक सीमित न रहकर खेल की ब्रांडिंग, विरासत और संस्थागत फैसलों में पारदर्शिता के इर्द-गिर्द घूम रही है।

  • एंटीलिया के मंदिर और भारतीय कला ने खींचा सबका ध्यान, वीडियो में दिखी भव्य सजावट और आध्यात्मिक विरासत की झलक

    एंटीलिया के मंदिर और भारतीय कला ने खींचा सबका ध्यान, वीडियो में दिखी भव्य सजावट और आध्यात्मिक विरासत की झलक

    नई दिल्ली ।देश के प्रमुख उद्योगपति मुकेश अंबानी का निवास एंटीलिया अपनी भव्यता, आधुनिक सुविधाओं और अनूठी वास्तुकला के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। हाल ही में सामने आए एक वीडियो में नीता अंबानी ने इस प्रतिष्ठित भवन के उस हिस्से की झलक दिखाई, जहां भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा और शिल्पकला का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। वीडियो के सामने आने के बाद एंटीलिया के इस विशेष हिस्से की चर्चा सोशल मीडिया पर तेज हो गई।

    वीडियो की शुरुआत एंटीलिया के भव्य पूजा स्थल से होती है। मंदिर में चांदी की नक्काशी से सजे विशाल दरवाजे, भगवान श्रीकृष्ण की आकर्षक प्रतिमा और फूलों से सजी सजावट पूरे वातावरण को आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करती है। सफेद संगमरमर से तैयार फर्श, विशाल झूमर और शांत वातावरण मंदिर की भव्यता को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं। यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र ही नहीं बल्कि भारतीय पारंपरिक कला का भी उत्कृष्ट उदाहरण दिखाई देता है।

    एंटीलिया के इंटीरियर में सफेद संगमरमर का व्यापक उपयोग किया गया है। दीवारों, स्तंभों और अन्य हिस्सों पर की गई बारीक नक्काशी भवन की शिल्पकला को अलग पहचान देती है। फर्श पर उकेरे गए आकर्षक डिजाइन और पारंपरिक शैली की सजावट पूरे परिसर को शाही महल जैसा स्वरूप प्रदान करती है। वास्तुकला में आधुनिकता और भारतीय परंपरा का संतुलित मेल स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

    वीडियो में एक विशाल दीवार पर बनी राधा-कृष्ण और कमल के फूलों से प्रेरित कलाकृति भी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। हल्के रंगों और पारंपरिक शैली में तैयार यह पेंटिंग पूरे कक्ष को शांत और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करती है। भारतीय संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों को प्रमुखता देने वाली यह कलाकृति एंटीलिया की आंतरिक सजावट को विशिष्ट पहचान देती है।

    बैठक कक्ष में रखे गए क्लासिक शैली के फर्नीचर ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। सिल्वर फिनिश वाले सोफे, आकर्षक कुशन और नक्काशीदार डिजाइन आधुनिक विलासिता के साथ पारंपरिक सौंदर्य का संतुलन प्रस्तुत करते हैं। इसके अलावा दीवारों पर लगी भारतीय लोक जीवन और भगवान श्रीकृष्ण से प्रेरित पेंटिंग्स भवन के सांस्कृतिक पक्ष को और मजबूत बनाती हैं।

    वीडियो में नीता अंबानी पारंपरिक परिधान में नजर आईं। उन्होंने हल्के रंग की साड़ी पहनी थी, जिस पर श्रीकृष्ण, कमल और भारतीय संस्कृति से जुड़े कलात्मक डिजाइन बने हुए थे। साधारण मेकअप, हीरे के आभूषण और फूलों से सजा जूड़ा उनके पारंपरिक और शालीन व्यक्तित्व को और निखारता दिखाई दिया। उनका यह लुक एंटीलिया की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक थीम के अनुरूप नजर आया।

    वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर एंटीलिया के मंदिर, वास्तुकला, कलात्मक सजावट और भारतीय विरासत से प्रेरित इंटीरियर की व्यापक चर्चा हो रही है। कई लोगों ने इसकी भव्यता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों को प्रमुखता देने वाले डिजाइन की सराहना की। यह झलक बताती है कि एंटीलिया केवल आधुनिक सुविधाओं वाला आलीशान भवन ही नहीं, बल्कि भारतीय कला, संस्कृति और परंपराओं को सहेजने वाला एक विशिष्ट स्थापत्य भी है।

  • दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    नई दिल्ली । भारतीय वास्तुकला और प्राचीन इतिहास हमेशा से ही अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। समकालीन दुनिया में जब भी समय यात्रा या ‘टाइम ट्रेवल’ का उल्लेख होता है, तो सामान्यतः हॉलीवुड की फिल्मों या विज्ञान कथाओं का ध्यान आता है। लेकिन दक्षिण भारत के कुछ बेहद प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों ने आधुनिक विज्ञान और अनुसंधानकर्ताओं को एक नए विमर्श पर मजबूर कर दिया है। इन ऐतिहासिक स्थलों की वास्तुकला और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी इस सीमा तक विस्मयकारी है कि इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उस दौर के शिल्पकारों को भविष्य की तकनीकों का आभास था या उनके पास कोई अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक समझ मौजूद थी।

    तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में स्थित पंचवर्णस्वामी मंदिर इस अनूठे रहस्य का एक अत्यंत सटीक उदाहरण प्रस्तुत करता है। लगभग दो हजार वर्ष प्राचीन माने जाने वाले इस ऐतिहासिक मंदिर की एक दीवार पर एक ऐसी नक्काशी देखने को मिलती है जो आधुनिक इतिहासकारों को चकित कर देती है। इस नक्काशी में एक मानव आकृति को स्पष्ट रूप से दो पहियों वाली साइकिल जैसी सवारी चलाते हुए प्रदर्शित किया गया है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, आधुनिक दुनिया में साइकिल का आविष्कार उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सदियों पहले के मूर्तिकारों ने एक ऐसी सवारी की परिकल्पना कैसे की, जिसे पैडल मारकर चलाया जाता है। इसे लेकर विभिन्न विशेषज्ञ प्राचीन विज्ञान के उन्नत होने के कयास लगा रहे हैं।

    इसी प्रकार का तकनीकी कौतूहल कर्नाटक के प्रसिद्ध होयसलेश्वर मंदिर में भी देखने को मिलता है। इस मंदिर की दीवारों पर स्थापित कुछ मूर्तियों के हाथों में ऐसे उपकरण और आकृतियां दिखाई देती हैं, जो वर्तमान समय के आधुनिक गैजेट्स, गियर अथवा यांत्रिक पुर्जों से अत्यधिक मेल खाती हैं। कुछ विशिष्ट आकृतियों में इतनी सूक्ष्मता से काम किया गया है कि वे किसी दूरबीन या सूक्ष्मदर्शी यंत्र जैसी प्रतीत होती हैं। ग्रेनाइट जैसे अत्यंत कठोर पत्थरों पर इतनी फिनिशिंग और सटीकता के साथ आकृतियों को उकेरना आज की अत्याधुनिक मशीनों के बिना अत्यंत कठिन माना जाता है, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि प्राचीन काल में निर्माण तकनीक हमारी वर्तमान सोच से कहीं अधिक विकसित थी।

    इन सबमें सबसे अधिक चौंकाने वाला रहस्य कुछ मंदिरों के स्तंभों पर मिली वह नक्काशी है, जो आधुनिक अंतरिक्ष यात्री यानी एस्ट्रोनॉट की वेशभूषा से मिलती-जुलती है। इस विशिष्ट आकृति के सिर पर एक गोल हेलमेट जैसी संरचना है और पीठ पर एक ऐसा उपकरण बंधा हुआ दिखाई देता है जो आधुनिक स्पेससूट के ऑक्सीजन टैंक जैसा प्रतीत होता है। उस प्राचीन काल में, जब विमानन तकनीक का विकास नहीं हुआ था, पत्थरों पर ऐसी आकृति का पाया जाना शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी पहेली बना हुआ है। यही कारण है कि जिज्ञासु और विश्लेषक इन प्राचीन धरोहरों को समय यात्रा के विजुअल साक्ष्यों से जोड़कर देखने लगे हैं।

    वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक और इतिहासकार इन प्राचीन कलाकृतियों के पीछे छिपे वास्तविक कारणों का पता लगाने में जुटे हैं। जहां कुछ विश्लेषक इसे केवल एक संयोग या कलात्मक कल्पना का परिणाम मानते हैं, वहीं विशेषज्ञों का एक वर्ग यह तर्क देता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान और विमानन शास्त्र का स्तर अत्यंत उच्च था। प्राचीन ग्रंथों और संहिताओं में भी ऐसी उन्नत तकनीकों के सांकेतिक संदर्भ मिलते हैं। कारण चाहे जो भी हो, दक्षिण भारत के ये ऐतिहासिक मंदिर इस तथ्य की पुष्टि अवश्य करते हैं कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत में ऐसे अनेक रहस्य छिपे हैं, जिनकी पूर्ण व्याख्या करने में आधुनिक विज्ञान को अभी लंबा समय लगेगा।

  • भारत-इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई: 1170 साल पुराने प्राम्बानन शिव मंदिर के जीर्णोद्धार में तकनीक और एआई की मदद देगा भारत

    भारत-इंडोनेशिया के सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई: 1170 साल पुराने प्राम्बानन शिव मंदिर के जीर्णोद्धार में तकनीक और एआई की मदद देगा भारत

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक साझेदारी को एक नई और अभूतपूर्व मजबूती मिलने जा रही है। वैश्विक भू-राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच दोनों देश अपने प्राचीन संबंधों को रणनीतिक दिशा देने में जुट गए हैं। इस महत्वपूर्ण राजनयिक पहल के तहत भारत, इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर स्थित 1170 साल पुराने ऐतिहासिक प्राम्बानन शिव मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार और संरक्षण कार्य में अपना तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा। यह प्राचीन हिंदू मंदिर परिसर वर्तमान में यूनेस्को (UNESCO) का एक प्रतिष्ठित विश्व धरोहर स्थल है।

    इस विशाल मंदिर परिसर के इतिहास की खोज का सफर काफी दिलचस्प रहा है। वर्ष 1733 में डच औपनिवेशिक शासन के दौरान एक अधिकारी ने जावा के जंगलों में पत्थरों का एक विशाल ढेर देखा था, जिसे स्थानीय लोग ‘रोरो जोंग्रांग’ नामक राजकुमारी की लोककथा से जोड़कर देखते थे। इसके बाद 19वीं और 20वीं शताब्दी में जब इस स्थान पर वैज्ञानिक पद्धति से खुदाई की गई, तब वहां पत्थरों पर प्राचीन संस्कृत और पुरानी जावानीज भाषा में लिखे कई महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुए। इन शिलालेखों में इस स्थान को ‘शिवगृह’ के रूप में संबोधित किया गया था और इस पर वर्ष 856 अंकित था, जिससे इसके शिव मंदिर होने की आधिकारिक पुष्टि हुई।

    ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस भव्य मंदिर का निर्माण मातरम साम्राज्य के हिंदू संजय वंश के राजाओं द्वारा करवाया गया था। इसकी शुरुआत राजा राकाई पिकातन ने वर्ष 850 के आसपास की थी, जबकि मुख्य शिव मंदिर का उद्घाटन उनके उत्तराधिकारी राजा लोकपाल ने वर्ष 856 में संपन्न कराया था। यह परिसर केवल भगवान शिव को ही समर्पित नहीं है, बल्कि यह हिंदू धर्म के तीनों मुख्य देवताओं—ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित होने के कारण ‘त्रिमूर्ति मंदिर’ भी कहलाता है। परिसर का मुख्य शिव मंदिर लगभग 47 मीटर ऊंचा है और इसकी दीवारों पर पत्थरों को तराशकर रामायण की संपूर्ण गाथा अत्यंत खूबसूरती से उकेरी गई है।

    ऐतिहासिक शोधों से स्पष्ट होता है कि इंडोनेशिया में हिंदू धर्म का प्रसार किसी सैन्य आक्रमण या बलप्रयोग के कारण नहीं, बल्कि ईसा की पहली शताब्दी में भारत के दक्षिणी छोर (वर्तमान तमिलनाडु) से समुद्री जहाजों द्वारा पहुंचे व्यापारियों के माध्यम से हुआ था। इन व्यापारियों के साथ गई हिंदू संस्कृति, कला, संस्कृत भाषा और पूजा पद्धतियों ने स्थानीय राजाओं को काफी प्रभावित किया, जिसके बाद उन्होंने भारत से विद्वान ब्राह्मणों को अपने राज्य में आमंत्रित किया। बाद में 10वीं शताब्दी के दौरान पास के मेरापी ज्वालामुखी में हुए भीषण विस्फोट और भूकंप के कारण इस क्षेत्र की आबादी को पूर्व की ओर पलायन करना पड़ा, जिससे यह संस्कृति मुख्य रूप से बाली द्वीप तक ही सीमित रह गई।

    अब इस नए दौर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के विशेषज्ञ इस प्राचीन धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए इंडोनेशियाई प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इस जीर्णोद्धार कार्य में ‘अनास्टाइलोसिस’ तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिसके तहत परिसर में बिखरे मूल पत्थरों को ही आपस में जोड़कर मंदिर को उसकी पुरानी शक्ल दी जाएगी। इस जटिल कार्य को सुगम बनाने के लिए आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक का भी सहारा लिया जाएगा, जो पत्थरों के सटीक मिलान में मदद करेगी। शुरुआत में इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत एक या दो छोटे मंदिरों पर काम शुरू किया जाएगा। वैश्विक पटल पर यह अनूठी पहल दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश और सबसे बड़ी हिंदू आबादी वाले देश के बीच आपसी सौहार्द का एक बेजोड़ उदाहरण पेश कर रही है।