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  • लखनऊ मेयर विवाद: हाई कोर्ट के आदेश के बाद सपा पार्षद ललित किशोर तिवारी को दिलाई गई शपथ, मेयर के अधिकार पहले ही सीज

    लखनऊ मेयर विवाद: हाई कोर्ट के आदेश के बाद सपा पार्षद ललित किशोर तिवारी को दिलाई गई शपथ, मेयर के अधिकार पहले ही सीज




    नई दिल्ली(New Delhi)।
    लखनऊ नगर निगम में लंबे समय से चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच आखिरकार सपा पार्षद ललित किशोर तिवारी को शपथ दिला दी गई। यह शपथ मेयर सुषमा खर्कवाल द्वारा हाई कोर्ट के आदेश के बाद कराई गई, क्योंकि अदालत ने समय सीमा तय करते हुए शपथ न दिलाने पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी थी।

    दरअसल, पार्षद निर्वाचित होने के करीब 5 महीने बाद भी ललित किशोर तिवारी को शपथ नहीं दिलाई गई थी। मामला लगातार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने सख्त रुख अपनाते हुए आदेश जारी किया था कि 29 मई तक हर हाल में शपथ दिलाई जाए, अन्यथा मेयर को कोर्ट में पेश होना पड़ेगा और व्यक्तिगत हलफनामा देना होगा।

    कोर्ट ने इस मामले में मेयर सुषमा खर्कवाल के अधिकार भी सीज कर दिए थे, जिससे प्रशासनिक स्तर पर दबाव और बढ़ गया था। गुरुवार को आए आदेश के बाद मामला और तेज हो गया और रविवार को मेयर ने स्वयं सपा पार्षद को शपथ दिलाई।

    जानकारी के अनुसार, मेयर ने पहले अपनी तबीयत खराब होने और अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी दी थी, लेकिन शनिवार को डिस्चार्ज होने के बाद उन्होंने शपथ प्रक्रिया पूरी करने की पुष्टि की।

    यह पूरा विवाद 2023 के नगर निकाय चुनाव से जुड़ा है। वार्ड संख्या-73 फैजुल्लागंज-3 में भाजपा प्रत्याशी प्रदीप कुमार शुक्ला ने सपा प्रत्याशी ललित किशोर तिवारी को हराया था। बाद में सपा प्रत्याशी ने भाजपा उम्मीदवार पर शपथ पत्र में गलत जानकारी देने का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी।

    सुनवाई के बाद कोर्ट ने भाजपा प्रत्याशी का नामांकन रद्द करते हुए ललित किशोर तिवारी को विजेता घोषित किया था। इसके बावजूद शपथ न दिलाए जाने को लेकर मामला लगातार विवादों में रहा, जो अब जाकर कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद समाप्त हुआ।

  • जबलपुर में एक साल बाद कब्र से निकाला गया शव, हाईकोर्ट ने जताई सख्ती

    जबलपुर में एक साल बाद कब्र से निकाला गया शव, हाईकोर्ट ने जताई सख्ती


    जबलपुर। मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक साल पुराने मामले ने नया मोड़ ले लिया है। गयासुद्दीन कुरैशी का शव बुधवार को हाईकोर्ट के आदेश के बाद कब्र से निकाला गया। पूरी प्रक्रिया एसडीएम अधारताल की स्वीकृति में कराई गई और शव को गवाहों के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज भेजा गया, जहां उसी दिन जांच कराई जानी है।

    हाईकोर्ट का सख्त रुख: “देरी बर्दाश्त नहीं होगी”

    मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें Justice Vivek Agarwal और Justice AK Singh शामिल थे, ने स्पष्ट कहा कि सच्चाई सामने लाने के लिए तुरंत कार्रवाई जरूरी है। कोर्ट ने आदेश दिया था कि बुधवार दोपहर 1 बजे तक शव को कब्र से निकालकर उसी दिन पोस्टमार्टम कराया जाए। साथ ही प्रशासन को निर्देश दिए गए कि पूरी प्रक्रिया मजिस्ट्रेट की निगरानी में हो।

    परिवार को भी दिए गए थे निर्देश

    कोर्ट ने मृतक के परिवार पत्नी, पुत्र और भाई को सुबह 11 बजे एसडीएम के समक्ष उपस्थित रहने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता कसीमुद्दीन कुरैशी समय पर उपस्थित नहीं होता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

    सड़क हादसे के बाद हुई थी मौत, भाई ने जताई हत्या की आशंका

    गयासुद्दीन कुरैशी 26 मार्च 2025 को सड़क हादसे में घायल हुए थे। पहले उनका इलाज जबलपुर में और बाद में नागपुर में कराया गया, जहां 27 मार्च को उनकी मौत हो गई। इसके बाद बिना विस्तृत जांच के शव को दफना दिया गया था।
    हालांकि, मृतक के भाई कसीमुद्दीन कुरैशी ने मौत को संदिग्ध बताते हुए हत्या की आशंका जताई। उनका कहना है कि डिस्चार्ज रिपोर्ट में सीने पर चोट के निशान थे, जिससे मामले में संदेह पैदा हुआ। पुलिस से शिकायत के बावजूद कार्रवाई न होने पर उन्होंने जनवरी 2026 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

    सुनवाई में दोनों पक्षों ने रखे तर्क

    राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता वीर विक्रांत सिंह ने कहा कि अपीलकर्ता जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। वहीं, याचिकाकर्ता के वकील अभिनव उमाशंकर तिवारी ने मौत को संदिग्ध बताते हुए पोस्टमार्टम की मांग की। अन्य पक्षों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष दत्त और अधिवक्ता मयंक शर्मा भी उपस्थित रहे।

    अब पोस्टमार्टम से खुलेगा राज

    इस पूरे मामले में अब सबसे अहम कड़ी पोस्टमार्टम रिपोर्ट होगी, जिससे यह साफ हो सकेगा कि गयासुद्दीन की मौत सामान्य दुर्घटना थी या इसके पीछे कोई साजिश थी।

    पुलिस जांच पर भी उठे सवाल

    मृतक के भाई का आरोप है कि हादसे के बाद पुलिस ने बिना पोस्टमार्टम के शव को दफना दिया, जिससे कई सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने पहले जबलपुर एसपी से जांच की मांग की थी, लेकिन कार्रवाई न होने पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

  • हाईकोर्ट की सख्ती छिंदवाड़ा कलेक्टर को फटकार 50 हजार का जुर्माना

    हाईकोर्ट की सख्ती छिंदवाड़ा कलेक्टर को फटकार 50 हजार का जुर्माना


    जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए छिंदवाड़ा के कलेक्टर पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है साथ ही उनके द्वारा जारी आदेश को भी निरस्त कर दिया गया है यह फैसला प्रशासनिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर अहम माना जा रहा है

    मामले के अनुसार कलेक्टर ने खनन विभाग की रिपोर्ट को बिना ठीक से जांचे मंजूरी दे दी थी जिस पर छिंदवाड़ा निवासी सारंग रघुवंशी ने आपत्ति जताते हुए इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि संबंधित आदेश में गंभीर लापरवाही बरती गई है और बिना उचित जांच के निर्णय लिया गया

    हाईकोर्ट ने कलेक्टर के इस व्यवहार पर कड़ी नाराजगी जताई और इसे प्रशासनिक जिम्मेदारी का उल्लंघन माना अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी निर्णय से पहले सभी तथ्यों और रिपोर्टों की गहन जांच आवश्यक होती है ताकि किसी निर्दोष व्यक्ति को नुकसान न पहुंचे

    यह मामला वर्ष 2025 का बताया जा रहा है जब परिवहन विभाग ने अवैध परिवहन के एक ट्रक को जब्त किया था इस दौरान ट्रक के असली मालिक की पहचान किए बिना याचिकाकर्ता को ही ट्रक मालिक मान लिया गया था याचिकाकर्ता ने बार बार अपनी सफाई पेश की लेकिन विभाग ने उनकी बात को अनसुना कर दिया जिससे उन्हें न्याय के लिए अदालत का रुख करना पड़ा

    हाईकोर्ट ने अपने आदेश में न केवल कलेक्टर के निर्णय को निरस्त किया बल्कि यह भी निर्देश दिया कि जुर्माने की राशि याचिकाकर्ता को दी जाए यह फैसला इस बात का संकेत है कि न्यायालय प्रशासनिक मनमानी और लापरवाही के मामलों में सख्त रुख अपनाए हुए है

    इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकारी अधिकारियों को अपने निर्णयों में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए और नियमों का पालन करते हुए ही किसी भी प्रकार का आदेश जारी करना चाहिए अन्यथा उन्हें न्यायालय की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है