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  • 24 हफ्ते का गर्भ होने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग को मां बनने की अनुमति

    24 हफ्ते का गर्भ होने पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग को मां बनने की अनुमति


    मध्य प्रदेश । मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में 16 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को बच्चे को जन्म देने की अनुमति प्रदान करते हुए राज्य सरकार को नवजात के पालन-पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जिम्मेदारियां उठाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता और उसके परिवार की इच्छा का सम्मान करना आवश्यक है, क्योंकि उन्होंने गर्भपात कराने से स्पष्ट रूप से इनकार किया था।

    मामला खरगोन जिले के बालकवाड़ा थाना क्षेत्र का है, जहां एक नाबालिग किशोरी के साथ दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया था। घटना के बाद किशोरी गर्भवती हो गई। जब मामला न्यायालय के समक्ष पहुंचा, तब गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक हो चुकी थी। चूंकि पीड़िता नाबालिग थी और गर्भावस्था उन्नत अवस्था में थी, इसलिए मंडलेश्वर स्थित पॉक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश ने उचित दिशा-निर्देश और आदेश के लिए मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट को भेज दिया।

    हाईकोर्ट ने मामले को याचिका के रूप में दर्ज कर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान बालकवाड़ा थाना के सब-इंस्पेक्टर मिथुन चौबे की उपस्थिति में पीड़िता और उसके माता-पिता अदालत में पेश हुए। पहचान की पुष्टि के बाद न्यायालय ने पीड़िता और उसके परिजनों की राय जानी। इस दौरान पीड़िता ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह गर्भपात नहीं कराना चाहती और बच्चे को जन्म देना चाहती है। उसके माता-पिता ने भी इस निर्णय का समर्थन किया।

    शनिवार को जस्टिस राजेंद्र कुमार वाणी की वेकेशन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए पीड़िता की इच्छा को महत्व दिया। अदालत ने माना कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़िता की राय और उसकी स्वतंत्र इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए। इसी आधार पर न्यायालय ने बच्चे को जन्म देने की अनुमति प्रदान की।

    साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को कई महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए। आदेश के अनुसार गर्भावस्था के दौरान पीड़िता को सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। प्रसव, उपचार, पोषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्त खर्च सरकार वहन करेगी। इसके अलावा नवजात के जन्म के बाद उसकी देखभाल, शिक्षा, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा और अन्य आवश्यक जरूरतों की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार पर होगी।

    हाईकोर्ट ने संबंधित कलेक्टर को निर्देश दिया है कि नवजात के 16 वर्ष की आयु तक उसके समुचित विकास और आवश्यक सुविधाओं को सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि आर्थिक या सामाजिक परिस्थितियां बच्चे और उसकी मां के भविष्य में बाधा नहीं बननी चाहिए।

    कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला उन मामलों में महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है, जहां दुष्कर्म पीड़िता गर्भपात के बजाय बच्चे को जन्म देने का निर्णय लेती है। न्यायालय ने एक ओर पीड़िता की इच्छा और अधिकारों की रक्षा की है, वहीं दूसरी ओर जन्म लेने वाले बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए राज्य की जिम्मेदारी भी तय की है।

    यह निर्णय न्यायिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें पीड़िता, उसके परिवार और नवजात के हितों को संतुलित रूप से ध्यान में रखा गया है।

  • गर्भवती दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति से हाईकोर्ट का इनकार: 31 सप्ताह के गर्भ को देखते हुए दिया फैसला

    गर्भवती दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति से हाईकोर्ट का इनकार: 31 सप्ताह के गर्भ को देखते हुए दिया फैसला


    मध्य प्रदेश । जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में दुष्कर्म से गर्भवती हुई 16 वर्षीय नाबालिग को गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 31 सप्ताह की गर्भावस्था में भ्रूण का विकास ऐसे स्तर पर पहुंच चुका है कि गर्भपात को शिशु के जीवन को समाप्त करने के समान माना जाएगा। जस्टिस विवेक जैन की वेकेशन बेंच ने यह आदेश देते हुए याचिका खारिज कर दी और राज्य सरकार को पीड़िता के उपचार, प्रसव और नवजात शिशु की देखभाल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

    शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का आरोप
    मामला मंडला जिले के घुघरी थाना क्षेत्र का है। आरोप है कि ग्राम बहरा निवासी एक युवक ने 16 वर्षीय किशोरी को शादी का झांसा देकर 15 अक्टूबर 2025 से कई बार दुष्कर्म किया, जिसके चलते वह गर्भवती हो गई। गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक होने के कारण मामला कानूनी रूप से हाईकोर्ट में पहुंचा।

    मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर एनीमिया का खुलासा
    सुनवाई के दौरान अदालत के सामने जिला अस्पताल मंडला की विशेषज्ञ चिकित्सकीय रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि पीड़िता 31 सप्ताह की गर्भवती है और उसका हीमोग्लोबिन स्तर 7.5 ग्राम है, जो गंभीर एनीमिया की स्थिति को दर्शाता है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गर्भस्थ शिशु जीवित और सामान्य रूप से विकसित हो रहा है, और इस अवस्था में गर्भपात कराना पीड़िता के लिए भी अत्यधिक जोखिमपूर्ण हो सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
    हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के ‘X बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि 24 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था को केवल असाधारण परिस्थितियों में ही समाप्त किया जा सकता है, जैसे मां के जीवन को गंभीर खतरा या भ्रूण में गंभीर विकृति। इस मामले में ऐसी कोई चिकित्सकीय या कानूनी परिस्थिति नहीं पाई गई, जिसके आधार पर गर्भपात की अनुमति दी जा सके।

    राज्य सरकार को सौंपी जिम्मेदारी
    अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पीड़िता को अस्पताल में उचित चिकित्सा सुविधा, निगरानी और देखभाल उपलब्ध कराई जाए। साथ ही, जन्म के बाद बच्चे की सुरक्षा और पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार निभाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पीड़िता या उसके परिजन बच्चे का पालन नहीं करना चाहते, तो वे कानूनी प्रक्रिया के तहत गोद देने की प्रक्रिया अपना सकते हैं।

  • 242 पन्नों के फैसले का होगा कानूनी परीक्षण, मुस्लिम पक्ष ने जताई अपील की बात

    242 पन्नों के फैसले का होगा कानूनी परीक्षण, मुस्लिम पक्ष ने जताई अपील की बात

    इंदौर/धार। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच द्वारा भोजशाला मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले के बाद अब यह कानूनी विवाद एक नए चरण में प्रवेश करता नजर आ रहा है। फैसले के खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी शुरू कर दी है। पक्षकारों का कहना है कि वे 242 पन्नों के विस्तृत फैसले का गहन अध्ययन करने के बाद इसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देंगे।

    हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका को स्वीकार करते हुए भोजशाला परिसर में हिंदू पक्ष को पूजा का विशेष अधिकार प्रदान किया है। साथ ही, वर्ष 2003 में दिए गए उस आदेश को भी निरस्त कर दिया गया है, जिसमें मुस्लिम पक्ष को सीमित समय के लिए नमाज की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट को इस फैसले का प्रमुख आधार माना है।

    ASI की रिपोर्ट को मामले में निर्णायक माना गया है, जिसमें 98 दिनों के सर्वे और लगभग 2100 पन्नों की जांच रिपोर्ट शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर ऐतिहासिक रूप से मां वाग्देवी और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। कोर्ट ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर परिसर को हिंदू धार्मिक स्वरूप से जुड़ा माना है।

    हिंदू पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अदालत ने स्पष्ट रूप से माना है कि भोजशाला का स्वरूप मंदिर जैसा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद से अलग प्रकृति का है, क्योंकि यह रिट याचिका के रूप में सुना गया था।

    मुस्लिम पक्ष की ओर से कहा गया है कि वे इस निर्णय को स्वीकार नहीं करते और सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती देंगे। उनका कहना है कि पूरे फैसले का कानूनी और तथ्यात्मक विश्लेषण करने के बाद ही अगला कदम तय किया जाएगा।

    इस बीच, हिंदू पक्ष ने इस फैसले को अपनी बड़ी जीत बताते हुए इसे ऐतिहासिक न्याय करार दिया है। वहीं, क्षेत्र में फिलहाल स्थिति शांत बनी हुई है, लेकिन कानूनी लड़ाई के अगले चरण को लेकर दोनों पक्षों में सक्रियता बढ़ गई है।