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  • ग्वालियर में सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर हाईकोर्ट सख्त, चीफ इंजीनियर और सब-इंजीनियर को अवमानना नोटिस

    ग्वालियर में सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर हाईकोर्ट सख्त, चीफ इंजीनियर और सब-इंजीनियर को अवमानना नोटिस

    मध्य प्रदेश। के ग्वालियर में सड़क निर्माण की गुणवत्ता और उससे जुड़े सरकारी रिकॉर्ड को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान सड़क निर्माण की मूल फाइल उपलब्ध नहीं होने और अधिकारियों की ओर से दिए गए जवाबों पर अदालत ने नाराजगी जताई। मामले में चीफ इंजीनियर और सब-इंजीनियर को अवमानना का नोटिस जारी करते हुए दो दिन के भीतर जवाब पेश करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही, सड़क निर्माण से संबंधित मूल रिकॉर्ड फाइल को सील कर सरकारी वकील की निगरानी में सौंप दिया गया है।

    यह मामला सड़क निर्माण की गुणवत्ता से संबंधित है, जिसमें अदालत के सामने मूल रिकॉर्ड पेश किया जाना था। सुनवाई के दौरान जब संबंधित फाइल उपलब्ध नहीं कराई जा सकी, तो हाईकोर्ट ने अधिकारियों से इसकी स्थिति स्पष्ट करने को कहा। इस पर चीफ इंजीनियर ने बताया कि मूल फाइल कार्यालय में रखी हुई है। अदालत ने उन्हें निर्देश दिया कि वे तत्काल कार्यालय जाकर फाइल लेकर आएं और उसे कोर्ट में प्रस्तुत करें।

    हालांकि, कार्यालय से लौटने के बाद चीफ इंजीनियर ने अदालत को बताया कि सड़क निर्माण की मूल फाइल सब-इंजीनियर के घर पर रखी हुई है। जवाब में आए इस बदलाव से अदालत की नाराजगी बढ़ गई। सरकारी रिकॉर्ड की उपलब्धता और उसे सुरक्षित रखने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठे। अदालत ने अधिकारियों के बीच समन्वय और उनकी कार्यप्रणाली पर भी गंभीर टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान अदालत ने आशंका जताई कि संबंधित अधिकारी आपस में मिले हुए हैं।

    मूल फाइल को लेकर सामने आई इस स्थिति के बाद हाईकोर्ट ने चीफ इंजीनियर और सब-इंजीनियर को अवमानना का नोटिस जारी किया। दोनों अधिकारियों को दो दिन के भीतर अपना जवाब देने के लिए कहा गया है। अब उन्हें अदालत के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि सड़क निर्माण से जुड़ा महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड निर्धारित स्थान पर उपलब्ध क्यों नहीं था और उसे पेश करने में परेशानी क्यों हुई। हालांकि, अधिकारियों के जवाब और मामले में आगे होने वाली सुनवाई के बाद ही स्थिति और स्पष्ट होगी।

    अदालत ने मामले से संबंधित मूल रिकॉर्ड फाइल को सील कराने का निर्देश भी दिया है। इसके बाद फाइल सरकारी वकील की निगरानी में रखी गई है। इस कदम का उद्देश्य रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना और मामले की सुनवाई के दौरान उससे संबंधित दस्तावेजों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। सड़क निर्माण के रिकॉर्ड को लेकर पैदा हुई स्थिति ने सरकारी विभागों में दस्तावेजों के रखरखाव और जवाबदेही के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बना दिया है।

    मामले में सड़क की गुणवत्ता की जांच करने वाली एजेंसी की भूमिका भी सवालों के घेरे में आई है। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पेश रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई की सड़कों की जांच की प्रक्रिया करीब डेढ़ साल से जारी है। जांच में लग रहे लंबे समय और रिपोर्ट से संबंधित तथ्यों पर हाईकोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की। अदालत ने जांच की प्रक्रिया और रिपोर्ट में सामने आए बिंदुओं पर सवाल उठाए हैं।

    इस मामले में अब दो प्रमुख पहलुओं पर ध्यान रहेगा। पहला, सड़क निर्माण की मूल फाइल उपलब्ध नहीं होने के संबंध में दोनों अधिकारियों की ओर से दिया जाने वाला जवाब और दूसरा, सड़क की गुणवत्ता की जांच तथा उससे संबंधित रिपोर्ट की स्थिति। हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद संबंधित अधिकारियों को तय समय सीमा में अपना पक्ष रखना होगा। सड़क निर्माण की गुणवत्ता, सरकारी रिकॉर्ड का रखरखाव और जांच प्रक्रिया की जवाबदेही इस मामले की सुनवाई के अहम बिंदु बने हुए हैं।

  • जबलपुर हाईकोर्ट में बार अध्यक्ष के व्हाट्सऐप अकाउंट बैन का मामला, मेटा ने कहा विवाद अधिवक्ता और व्हाट्सऐप के बीच

    जबलपुर हाईकोर्ट में बार अध्यक्ष के व्हाट्सऐप अकाउंट बैन का मामला, मेटा ने कहा विवाद अधिवक्ता और व्हाट्सऐप के बीच


    मध्य प्रदेश।
    के जबलपुर हाईकोर्ट में बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मृगेंद्र सिंह का व्हाट्सऐप अकाउंट बंद किए जाने के मामले में सुनवाई हुई। इस दौरान मेटा की ओर से कहा गया कि विवाद का संबंध सीधे तौर पर व्हाट्सऐप और याचिकाकर्ता के बीच है तथा इसमें मेटा की कोई भूमिका नहीं है। अदालत ने व्हाट्सऐप कंपनी को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए तीन दिन का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी।

    सुनवाई जस्टिस विशाल मिश्रा की बेंच के समक्ष हुई। मेटा की ओर से अधिवक्ता मयंक उपाध्याय अदालत में पेश हुए, जबकि वरुण पाठक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कार्यवाही में शामिल हुए। मेटा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि इस मामले में विवाद व्हाट्सऐप और याचिकाकर्ता के बीच का है। वहीं, भारत संघ की ओर से अधिवक्ता सचिन जैन मौजूद रहे। याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अग्रवाल और अधिवक्ता गुंचा रसूल ने पक्ष रखा।

    याचिका के अनुसार, मृगेंद्र सिंह का व्हाट्सऐप अकाउंट 23 अगस्त 2026 को बंद कर दिया गया था। उनका कहना है कि अकाउंट बंद करने से पहले उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया और न ही इसकी वजह बताई गई। सिंह के मुताबिक, वह कई वर्षों से इस नंबर का इस्तेमाल कर रहे थे। उनके पेशे से जुड़े कई जरूरी काम इसी अकाउंट के माध्यम से किए जाते थे। इनमें कानूनी कामकाज, मामलों का प्रबंधन, मुवक्किलों से बातचीत और केस से संबंधित दस्तावेजों का आदान-प्रदान शामिल था।

    मृगेंद्र सिंह ने याचिका में बताया कि अकाउंट बंद होने वाले दिन ही उन्होंने ऐप के माध्यम से इसकी समीक्षा करने का अनुरोध किया था। हालांकि, उनके अनुसार इस प्रक्रिया से कोई समाधान नहीं निकला। उनका कहना है कि अकाउंट बंद होने से उनके नियमित पेशेवर कामकाज पर असर पड़ा। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से राहत देने की मांग की है। उनका पक्ष है कि डिजिटल माध्यम से होने वाला संवाद बाधित होने से कानूनी कार्यों को संचालित करने में परेशानी होती है।

    याचिकाकर्ता ने अकाउंट बंद किए जाने को संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(g) और 21 का उल्लंघन बताया है। इसके अलावा, उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के पालन में भी कथित चूक का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि शिकायत के निपटारे के लिए निर्धारित समयसीमा का पालन नहीं किया गया। ये आरोप याचिका में लगाए गए हैं और मामले में अदालत का अंतिम निर्णय अभी नहीं आया है।

    मेटा और व्हाट्सऐप के संबंधों का मुद्दा भी इस मामले में सामने आया। मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक ने वर्ष 2014 में व्हाट्सऐप के अधिग्रहण की घोषणा की थी और उसी वर्ष यह प्रक्रिया पूरी हुई थी। व्हाट्सऐप एलएलसी मेटा की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है। इसके बावजूद सुनवाई के दौरान मेटा की ओर से कहा गया कि मौजूदा विवाद में उसकी सीधी भूमिका नहीं है।

    हाईकोर्ट ने फिलहाल व्हाट्सऐप को अपना जवाब पेश करने का अवसर दिया है। मृगेंद्र सिंह ने याचिका में अपना अकाउंट बहाल करने, राहत प्रदान करने और कथित नियम उल्लंघन के संबंध में भारत संघ को उचित कार्रवाई के निर्देश देने की मांग की है। अब 15 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में कंपनी का पक्ष सामने आने की उम्मीद है।

  • मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग को तीन महीने में नियुक्ति के निर्देश

    मध्यप्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट का फैसला, 13% होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग को तीन महीने में नियुक्ति के निर्देश

    मध्यप्रदेश। में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने 27 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी नहीं दी और कहा कि ओबीसी वर्ग को 14 प्रतिशत आरक्षण दिया जा सकता है। कोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार 27 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में पर्याप्त आंकड़े प्रस्तुत नहीं कर सकी। अदालत ने यह भी माना कि सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिखाई देता है। आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा से आगे जाने के लिए जरूरी असाधारण परिस्थितियां भी सरकार साबित नहीं कर पाई।

    इस फैसले से सरकारी भर्तियों में लंबे समय से अटके 13 प्रतिशत पदों को लेकर स्थिति स्पष्ट हुई है। हाईकोर्ट ने इन होल्ड पदों पर अनारक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने सरकार को तीन महीने के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने को कहा है। इन पदों पर नियुक्तियां लंबे समय से लंबित थीं, जिससे संबंधित अभ्यर्थियों को इंतजार करना पड़ रहा था। फैसले के बाद अनारक्षित वर्ग के उन उम्मीदवारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनकी नियुक्तियां आरक्षण विवाद के कारण रुकी हुई थीं।

    अदालत ने पहले से नियुक्त उम्मीदवारों को भी राहत दी है। फैसले के अनुसार, मार्च 2019 से 29 सितंबर 2022 के बीच हुई कुछ नियुक्तियां रद्द नहीं की जाएंगी। इस अवधि में 14 प्रतिशत से अधिक ओबीसी आरक्षण के आधार पर नियुक्ति पाने वाले उम्मीदवारों की नौकरी पर भी फैसले का असर नहीं पड़ेगा। इस तरह अदालत ने लंबित पदों पर नियुक्तियों के साथ पहले से कार्यरत अभ्यर्थियों की स्थिति को लेकर भी निर्देश दिए हैं।

    यह फैसला जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की डबल बेंच ने सुनाया। दोनों न्यायाधीशों ने लाइव कोर्ट में पांच प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से निर्णय का सार समझाया। इनमें ओबीसी वर्ग के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण को सही मानना, 27 प्रतिशत आरक्षण के समर्थन में पर्याप्त आंकड़े नहीं होना, 50 प्रतिशत की सीमा पार करने के लिए असाधारण परिस्थितियों का साबित नहीं होना, 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर नियुक्तियां और पहले से नियुक्त उम्मीदवारों को राहत देना शामिल है।

    मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का विवाद वर्ष 2019 से चल रहा है। तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने मार्च 2019 में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का फैसला लिया था। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर हुईं और बढ़े हुए आरक्षण को लागू करने पर कानूनी रोक लगी। जुलाई 2019 में राज्य सरकार ने संबंधित आरक्षण कानून में संशोधन कर 27 प्रतिशत आरक्षण को वैधानिक आधार देने की कोशिश की, लेकिन विवाद जारी रहा।

    भर्तियों के परिणाम अटकने के बीच सितंबर 2022 में सरकार ने 87-13 प्रतिशत का फार्मूला अपनाया। इसके तहत 14 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण के आधार पर 87 प्रतिशत पदों के परिणाम जारी करने और शेष 13 प्रतिशत पदों को होल्ड रखने की व्यवस्था की गई। इससे कई भर्तियों में नियुक्तियों का मामला लंबित रहा। ओबीसी वर्ग की ओर से प्रदेश में अपनी आबादी लगभग 52 प्रतिशत होने का दावा करते हुए 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग की जाती रही, जबकि सामान्य वर्ग के कुछ संगठनों ने इसका विरोध किया।

    यह मुद्दा राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा में रहा। राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण लागू करने और होल्ड किए गए 13 प्रतिशत पदों पर निर्णय लेने की मांग की थी। इंदौर में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के बाद भी यह मुद्दा उठाया गया था। अब हाईकोर्ट के फैसले से आरक्षण और नियुक्तियों से जुड़े विवाद में महत्वपूर्ण दिशा सामने आई है। हालांकि, फैसले के सभी कानूनी प्रभावों की विस्तृत स्थिति लिखित आदेश के सामने आने के बाद स्पष्ट होगी।

  • उज्जैन शाही मस्जिद मामले में इंदौर हाईकोर्ट में सुनवाई, केवल तीन फीट हिस्सा हटाने और टीडीआर-एफएआर आश्वासनों के पालन की मांग

    उज्जैन शाही मस्जिद मामले में इंदौर हाईकोर्ट में सुनवाई, केवल तीन फीट हिस्सा हटाने और टीडीआर-एफएआर आश्वासनों के पालन की मांग

    मध्य प्रदेश: के उज्जैन में सिंहस्थ मेले की तैयारियों के तहत मास्टर प्लान के अनुसार सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है। इसी योजना के तहत सड़क की सीमा में बाधा बन रहे निर्माणों को हटाने की कार्रवाई नगर निगम की ओर से की जा रही है। शाही मस्जिद के बाधक हिस्से को हटाने का मामला भी इसी कार्रवाई से जुड़ा है। इस मामले में दायर रिट अपील पर सोमवार को इंदौर हाईकोर्ट में सुनवाई हुई।

    मस्जिद के निर्माण से जुड़े विवाद में पहले 9 सितंबर को एक याचिका दायर की गई थी। मास्टर प्लान की सड़क का हवाला देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया गया था। इसके बाद एडवोकेट अशहर वारसी की ओर से अदालत के फैसले के खिलाफ रिट अपील दायर की गई। सोमवार को इसी अपील पर सुनवाई के दौरान मस्जिद के बाधक हिस्से को हटाने और नगर निगम की ओर से पहले दिए गए आश्वासनों के पालन का मुद्दा उठाया गया।

    सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि शाही मस्जिद का केवल तीन फीट हिस्सा ही हटाया जाए। बताया गया कि इस सीमित हिस्से को हटाने को लेकर पहले भी चर्चा हो चुकी थी। अपीलकर्ता की ओर से मांग रखी गई कि मस्जिद के बाकी हिस्से के संबंध में पहले हुई बातचीत और दिए गए आश्वासनों को ध्यान में रखा जाए।

    इसके साथ ही नगर निगम की ओर से पूर्व में दिए गए टीडीआर और एफएआर से संबंधित आश्वासनों का पूरी तरह पालन कराने की मांग भी अदालत के सामने रखी गई। अपीलकर्ता ने अदालत से इन आश्वासनों के शत-प्रतिशत क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए आदेश देने का अनुरोध किया। सुनवाई के दौरान मामला मुख्य रूप से मस्जिद के कितने हिस्से को हटाया जाना है और नगर निगम के पूर्व आश्वासनों का पालन किस तरह सुनिश्चित होगा, इन मुद्दों पर केंद्रित रहा।

    इसी सुनवाई के दौरान नई कमिटी की ओर से भी एक अलग याचिका दायर की गई थी। हालांकि, प्रशासन के साथ बातचीत होने के बाद कमिटी ने अपनी याचिका वापस ले ली। इस तरह नई कमिटी की ओर से दायर याचिका पर आगे कार्यवाही नहीं की गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, याचिका वापस लेने का फैसला प्रशासन के साथ हुई बातचीत के बाद लिया गया।

    उज्जैन में सिंहस्थ मेले को ध्यान में रखते हुए मास्टर प्लान की सड़क चौड़ीकरण योजना पर काम जारी है। इस योजना के तहत सड़क के विस्तार में बाधा बन रहे निर्माणों को हटाने की कार्रवाई की जा रही है। शाही मस्जिद का मामला भी इसी प्रक्रिया के दौरान सामने आया है और अब इससे संबंधित विवाद हाईकोर्ट में पहुंच चुका है।

    इससे पहले इसी मास्टर प्लान के तहत सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के पैतृक घर का बाधक हिस्सा भी हटाया गया था। यह कार्रवाई रविवार को हुई थी। शाही मस्जिद मामले में सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता ने तीन फीट हिस्सा हटाने और टीडीआर-एफएआर से जुड़े आश्वासनों के पालन की मांग रखी। मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया अदालत में जारी है।

  • धीरेंद्र शास्त्री के भाई शालिग्राम उर्फ छोटे सरकार को हाईकोर्ट से सशर्त जमानत, दो महीने बाद जेल से रिहाई का रास्ता साफ

    धीरेंद्र शास्त्री के भाई शालिग्राम उर्फ छोटे सरकार को हाईकोर्ट से सशर्त जमानत, दो महीने बाद जेल से रिहाई का रास्ता साफ

    मध्य प्रदेश: बागेश्वर धाम के पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के भाई शालिग्राम उर्फ छोटे सरकार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। हाईकोर्ट ने उन्हें 50 हजार रुपये के निजी मुचलके पर सशर्त जमानत देने का आदेश दिया है। जमानत मंजूर होने के बाद करीब दो महीने से जेल में बंद शालिग्राम की रिहाई का रास्ता साफ हो गया है। यह फैसला जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की बेंच ने सुनाया।

    मामला मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के रघुराजनगर थाना क्षेत्र से जुड़ा है। आरोप है कि मोतीलाल कुशवाहा को स्कूल के पास रोककर उनके साथ मारपीट की गई थी। इस मामले में शालिग्राम उर्फ छोटे सरकार पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने गाली-गलौज की और साथ मौजूद सह-आरोपियों को हमला करने के लिए उकसाया।

    मामले में मोतीलाल कुशवाहा के पेट में गोली लगने का भी आरोप है। घटना के बाद पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई। शालिग्राम की ओर से इन आरोपों का विरोध किया गया था। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को गलत बताते हुए कहा था कि राजनीतिक दबाव और पुरानी रंजिश के कारण उन्हें इस मामले में फंसाया गया है।

    बचाव पक्ष की ओर से अदालत में घटना से संबंधित मोबाइल वीडियो होने की बात भी रखी गई। मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 109(1), 296(B), 351(3) और 3(5) के साथ आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया था।

    शालिग्राम उर्फ छोटे सरकार को 15 जुलाई 2026 से जेल में रखा गया है। इससे पहले जिला अदालत में जमानत के लिए आवेदन किया गया था, लेकिन वहां से जमानत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की शरण ली।

    जबलपुर स्थित मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की पीठ में जमानत याचिका पर 10 सितंबर को सुनवाई हुई थी। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सामने रखी गईं, जिसके बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब अदालत ने जमानत याचिका मंजूर करते हुए 50 हजार रुपये के निजी मुचलके पर सशर्त रिहाई का आदेश दिया है।

    इस मामले में शालिग्राम पर मुख्य आरोप सह-आरोपियों को हमला करने के लिए उकसाने और घटना से जुड़े होने को लेकर लगाए गए हैं। वहीं, बचाव पक्ष ने आरोपों से इनकार करते हुए राजनीतिक दबाव और पुरानी रंजिश का हवाला दिया है। अदालत के समक्ष घटना से संबंधित मोबाइल वीडियो होने की बात भी रखी गई थी।

    जिला अदालत से जमानत नहीं मिलने के बाद हाईकोर्ट में दाखिल याचिका पर सुनवाई पूरी होने के बाद अब शालिग्राम को राहत मिली है। अदालत के आदेश के अनुसार निजी मुचलका और निर्धारित शर्तों के आधार पर उनकी जेल से रिहाई हो सकेगी। वह 15 जुलाई से न्यायिक हिरासत में थे और जमानत मिलने के बाद करीब दो महीने बाद बाहर आएंगे।

  • कचरे और गंदगी से बेहाल मुंबई पर हाईकोर्ट नाराज, 26 वार्डों के अधिकारियों की सूची मांगकर दी कड़ी चेतावनी

    कचरे और गंदगी से बेहाल मुंबई पर हाईकोर्ट नाराज, 26 वार्डों के अधिकारियों की सूची मांगकर दी कड़ी चेतावनी

    नई दिल्ली ।मुंबई में कचरे और गंदगी की समस्या को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका यानी BMC की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। कंजूरमार्ग डंपिंग ग्राउंड के आसपास प्रदूषण से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने शहर की सफाई व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए नगर निकाय को सख्त चेतावनी दी। न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की खंडपीठ ने कहा कि मुंबई को अंतरराष्ट्रीय शहर कहा जाता है, लेकिन सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर कचरे की स्थिति इस दावे पर सवाल खड़े करती है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि शहर में जगह-जगह कचरा और गंदगी दिखाई दे रही है। अदालत ने BMC की व्यवस्था पर नाराजगी जताते हुए सवाल किया कि क्या नगर निकाय की मशीनरी पूरी तरह निष्क्रिय हो गई है। अदालत के मुताबिक, सफाई व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी की स्थिति पैदा न हो और जिम्मेदार अधिकारी अपने कर्तव्यों का प्रभावी तरीके से पालन करें।

    हाईकोर्ट ने BMC को मुंबई के सभी 26 वार्डों में सार्वजनिक सड़कों की सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी करने वाले अधिकारियों की सूची पेश करने को कहा है। अदालत का यह निर्देश शहर की सफाई व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के उद्देश्य से दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर वार्ड स्तर पर जिम्मेदार अधिकारी अपना काम नहीं कर रहे हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

    अदालत ने सुनवाई के दौरान लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की चेतावनी भी दी। कोर्ट ने कहा कि यदि वार्ड अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करते हैं तो अवमानना की कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इसके साथ ही BMC को सफाई व्यवस्था में सुधार के लिए आखिरी मौका दिए जाने की बात कही गई।

    कचरे की समस्या पर नाराजगी जताते हुए अदालत ने सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने की प्रवृत्ति का भी जिक्र किया। कोर्ट ने इस संदर्भ में सिंगापुर के सख्त नियमों का उदाहरण दिया। अदालत ने कहा कि वहां लोग केवल निर्धारित स्थानों पर ही कचरा डालते हैं और नियमों के पालन पर जोर दिया जाता है। मुंबई में भी सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की जरूरत पर अदालत ने जोर दिया।

    हाईकोर्ट ने सफाई व्यवस्था के लिए स्पष्ट और प्रभावी मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP तैयार करने की आवश्यकता बताई। अदालत ने सवाल उठाया कि जब शहर की सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर लगातार गंदगी दिखाई दे रही है, तो मुंबई को अंतरराष्ट्रीय शहर कहने का आधार क्या है। अदालत की सख्ती से स्पष्ट है कि सफाई व्यवस्था में लापरवाही को अब नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।

    कंजूरमार्ग डंपिंग ग्राउंड से जुड़े प्रदूषण के मामलों की सुनवाई के दौरान सामने आई टिप्पणियों में अदालत ने नगर निकाय की जिम्मेदारी और अधिकारियों की जवाबदेही को प्रमुखता दी। BMC के सामने अब शहर की सफाई व्यवस्था में सुधार करने और वार्ड स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका सुनिश्चित करने की चुनौती है।

  • नरसिंहपुर किसानों की जमीन मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर को तीन दिन में सड़क सामग्री हटाकर खेत लौटाने का आदेश

    नरसिंहपुर किसानों की जमीन मामले में हाईकोर्ट सख्त, कलेक्टर को तीन दिन में सड़क सामग्री हटाकर खेत लौटाने का आदेश

    मध्यप्रदेश। हाईकोर्ट ने नरसिंहपुर जिले के छह किसानों की निजी कृषि भूमि से सड़क निर्माण सामग्री हटाने को लेकर जिला प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कलेक्टर को आदेश दिया कि किसानों के खेतों में रखी निर्माण सामग्री तीन दिन के भीतर हटाई जाए और जमीन को उसकी मूल स्थिति में बहाल कर किसानों को वापस सौंपा जाए।

    यह मामला जामुन पानी और भोरपानी गांवों से जुड़ा है। किसानों ने वर्ष 2021 में अपनी निजी कृषि भूमि पर बिना अनुमति सड़क निर्माण से संबंधित गतिविधियां किए जाने का आरोप लगाते हुए न्यायालय का रुख किया था। किसानों की शिकायत थी कि उनकी जमीन का इस्तेमाल उनकी सहमति के बिना किया जा रहा है और लंबे समय से उन्हें अपनी भूमि का सामान्य उपयोग करने में परेशानी हो रही है।

    मामले की सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन की ओर से यह दलील रखी गई थी कि संबंधित स्थान पर सड़क निर्माण का काम सीधे तौर पर नहीं किया जा रहा है। प्रशासन के अनुसार लोक निर्माण विभाग ने वहां केवल सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री अस्थायी रूप से रखी थी। अदालत के समक्ष इस स्थिति को प्रशासन की ओर से अपने बचाव में प्रस्तुत किया गया।

    हालांकि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने प्रशासन की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिला कलेक्टर पूरे जिले के समग्र प्रशासनिक प्रभारी होते हैं। किसी समस्या से संबंधित विभाग अलग होने मात्र से कलेक्टर अपनी जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकते। न्यायालय ने जनहित से जुड़े मामलों में जिला प्रशासन की जवाबदेही को महत्वपूर्ण माना।

    अदालत की सख्ती के बाद कलेक्टर को किसानों की जमीन से निर्माण सामग्री हटाने के लिए स्पष्ट समय सीमा दी गई है। निर्देश के अनुसार तीन दिन के भीतर खेतों से सभी संबंधित सामग्री हटाकर भूमि को पहले जैसी स्थिति में लाना होगा। इसके बाद किसानों को उनकी जमीन वापस सौंपने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

    न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की है। उस दौरान कलेक्टर को अदालत के निर्देशों के अनुपालन की रिपोर्ट पेश करनी होगी। इससे यह स्पष्ट होगा कि निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्माण सामग्री हटाने और जमीन बहाल करने की कार्रवाई पूरी हुई या नहीं।

    किसानों के लिए अदालत का यह आदेश लंबे समय से चल रही कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण राहत के रूप में सामने आया है। वर्ष 2021 से भूमि के इस्तेमाल को लेकर चल रहे विवाद में अब प्रशासन को निश्चित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करनी होगी।

    इस मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी जिला प्रशासन की जिम्मेदारी को लेकर भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने संकेत दिया कि किसी विभागीय कार्रवाई या प्रशासनिक व्यवस्था का हवाला देकर जिला स्तर पर नागरिकों की शिकायतों से जिम्मेदारी नहीं टाली जा सकती। कलेक्टर को जिले का समग्र प्रभारी मानते हुए न्यायालय ने समस्या के समाधान की जिम्मेदारी तय की है।

    किसानों की निजी कृषि भूमि से जुड़ा यह विवाद सरकारी निर्माण गतिविधियों और नागरिकों के भूमि अधिकारों के बीच संतुलन का विषय भी सामने लाता है। अदालत के आदेश के बाद अब प्रशासन को न केवल निर्माण सामग्री हटानी होगी, बल्कि जमीन को वास्तविक रूप से उपयोग योग्य स्थिति में वापस करना भी सुनिश्चित करना होगा।

    अगली सुनवाई में पेश होने वाली अनुपालन रिपोर्ट इस मामले में महत्वपूर्ण होगी। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि आदेश के अनुरूप तीन दिन की समय सीमा में कार्रवाई पूरी की गई है या नहीं। फिलहाल हाईकोर्ट के निर्देश से छह किसानों को अपनी जमीन वापस मिलने की उम्मीद बनी है और जिला प्रशासन के सामने तय समय में आदेश लागू करने की जिम्मेदारी है।

  • उच्च शिक्षा या नौकरी के बावजूद परिवार की देखभाल करने वाली महिला 'गृहिणी', कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

    उच्च शिक्षा या नौकरी के बावजूद परिवार की देखभाल करने वाली महिला 'गृहिणी', कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

    नई दिल्ली ।कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक सड़क हादसे से जुड़े मुआवजे के मामले की सुनवाई करते हुए ‘गृहिणी’ और ‘होममेकर’ शब्द की परिभाषा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक टिप्पणी की है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने घर पर परिवार के सदस्यों की सेवा और देखभाल करती है, तो उसे कानूनी व सामाजिक रूप से ‘गृहिणी’ ही माना जाएगा। इसके लिए महिला का अनपढ़ होना या केवल घर के कामों तक सीमित रहना बिल्कुल आवश्यक नहीं है, भले ही उसके पास उच्च शैक्षणिक डिग्री हो या वह कोई नौकरी करती हो।

    न्यायमूर्ति चिल्लाकुर सुमलता की एकल पीठ ने यह टिप्पणी कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम से जुड़े एक दुर्घटना मुआवजे के मामले पर सुनवाई के दौरान की। इस मामले में बायोटेक्नोलॉजी में स्नातकोत्तर एक महिला वर्ष 2013 में बस दुर्घटना के दौरान घायल हो गई थी। पीड़िता ने दुर्घटना के कारण हुए आर्थिक नुकसान और अपनी कार्यक्षमता प्रभावित होने का हवाला देते हुए मुआवजा बढ़ाने की मांग की थी। वहीं परिवहन निगम का तर्क था कि महिला की उच्च शिक्षा को देखते हुए उसे केवल एक सामान्य गृहिणी मानकर मुआवजा तय नहीं किया जा सकता।

    उच्च न्यायालय ने परिवहन निगम की इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि कोई महिला कितनी भी पढ़ी-लिखी हो या उसके पास डॉक्टरेट जैसी उच्च उपाधि ही क्यों न हो, यदि वह घर पर अपने परिवार की भलाई के लिए योगदान दे रही है, तो वह गृहिणी की श्रेणी में आती है। पीठ ने माना कि एक पेशेवर या कामकाजी महिला भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए गृहिणी की भूमिका निभाती है और उसके इस योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने गृहिणी शब्द के अर्थ को और अधिक विस्तार देते हुए कहा कि जो व्यक्ति बिना थके परिवार के लिए मेहनत करता है, अपने आराम का त्याग करता है और एक खुशहाल घर का आधार बनता है, वह होममेकर है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यह अवधारणा केवल महिलाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कोई भी व्यक्ति जो घर चलाने और परिवार के पोषण में योगदान देता है, वह इस परिभाषा के दायरे में आता है।

    इस मामले में अदालत ने महिला के चिकित्सकीय स्थिति और उपचार की अवधि का आकलन करते हुए माना कि चोटों के कारण पीड़िता को कम से कम तीन महीने तक पूर्ण विश्राम करना पड़ा। इस दौरान वह अपने परिवार की सेवा करने में असमर्थ रही, जो कि एक प्रत्यक्ष क्षति है। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए पीड़िता की काल्पनिक आय तय की और निचली अदालत द्वारा निर्धारित राशि के अतिरिक्त 1,96,800 रुपये का बढ़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश जारी किया।

    मध्य प्रदेश सहित देश भर के कानूनी विशेषज्ञों और आम नागरिकों के बीच उच्च न्यायालय के इस फैसले की काफी सराहना हो रही है। इस निर्णय को महिलाओं द्वारा घर और परिवार के प्रति दिए जाने वाले अमूल्य और अनपेक्षित योगदान को कानूनी रूप से मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

  • तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर आमने-सामने आए दोनों गुट, कार्यक्रम की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

    तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर आमने-सामने आए दोनों गुट, कार्यक्रम की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन के भीतर चल रहा विवाद अब 28 अगस्त को होने वाले स्थापना दिवस कार्यक्रम को लेकर खुलकर सामने आ गया है। तृणमूल छात्र परिषद के दो गुटों ने मध्य कोलकाता के मेयो रोड स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी है। एक ही स्थान और एक ही दिन कार्यक्रम की मांग किए जाने से दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है।

    तृणमूल छात्र परिषद का स्थापना दिवस हर वर्ष 28 अगस्त को मनाया जाता है। इस अवसर पर मेयो रोड पर रैली और सभा का आयोजन किया जाता रहा है। इस बार पार्टी से जुड़े दो छात्र गुटों की अलग-अलग गतिविधियों के कारण स्थापना दिवस का कार्यक्रम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

    ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की ओर से कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति के लिए अदालत का रुख किया जा चुका है। संबंधित याचिका पर सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध भी किया गया। इसके बाद दूसरे गुट ने भी इसी स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं मिलने का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट भी 28 अगस्त को मेयो रोड पर कार्यक्रम आयोजित करना चाहता है। इस गुट की ओर से कोलकाता पुलिस से रैली की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन अनुमति नहीं मिलने के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।

    अदालत ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया और इसे अगले शुक्रवार के लिए सूचीबद्ध किया है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी समर्थक गुट की याचिका पर पहले ही सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस वजह से अब दोनों पक्षों की नजर अदालत के अगले रुख पर टिकी हुई है।

    मामले का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या दोनों गुटों को एक ही स्थान पर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी जा सकती है या फिर प्रशासन और अदालत की ओर से कोई वैकल्पिक व्यवस्था तय की जाएगी। एक ही दिन और एक ही स्थान पर दो कार्यक्रम होने की स्थिति में कानून-व्यवस्था से जुड़े पहलुओं पर भी विचार करना होगा।

    मेयो रोड का स्थान तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस कार्यक्रम के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में स्थान को लेकर दोनों पक्षों की दावेदारी ने संगठन के भीतर चल रहे मतभेद को और स्पष्ट कर दिया है। पहले से मौजूद राजनीतिक खींचतान के बीच छात्र संगठन का यह विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बन गया है।

    फिलहाल अदालत के फैसले और प्रशासन की अनुमति पर आगे की तस्वीर निर्भर करेगी। दोनों गुट अपने-अपने कार्यक्रम को लेकर सक्रिय हैं, जबकि 28 अगस्त की तारीख नजदीक आने के साथ विवाद के समाधान को लेकर भी दबाव बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि स्थापना दिवस का आयोजन किस व्यवस्था के तहत होगा और क्या दोनों पक्षों को अलग-अलग कार्यक्रम के लिए स्थान उपलब्ध कराया जाएगा।

  • प्रमोशन में आरक्षण पर नई बहस, सरकार के डेटा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है सामान्‍य वर्ग

    प्रमोशन में आरक्षण पर नई बहस, सरकार के डेटा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है सामान्‍य वर्ग

    जबलपुर। मध्य प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण का मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। फिलहाल हाईकोर्ट की विशेष खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले की स्थिति साफ होने के बाद ही आगे सुनवाई होगी। अदालत ने सरकार और सभी पक्षों को शीर्ष अदालत में शीघ्र सुनवाई का आग्रह करने की सलाह दी है।

    हालांकि न्यायिक प्रक्रिया फिलहाल रुकी हुई है, लेकिन दोनों पक्ष अपनी कानूनी तैयारियों में जुटे हैं। जानकारी के अनुसार, अगली सुनवाई में सरकार द्वारा प्रस्तुत क्वांटिफिएबल डेटा सबसे बड़ा विवाद का विषय बन सकता है।

    सरकार के आंकड़ों पर उठेंगे सवाल
    सामान्य वर्ग की ओर से अदालत में यह तर्क रखा जाएगा कि कई सरकारी विभागों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) का प्रतिनिधित्व पहले से पर्याप्त है। ऐसे में पदोन्नति में आरक्षण जारी रखने का आधार क्या है, इस पर सरकार से जवाब मांगा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, सामान्य वर्ग विभिन्न विभागों के आंकड़ों के जरिए यह साबित करने की तैयारी में है कि जहां पर्याप्त प्रतिनिधित्व मौजूद है, वहां भी आरक्षण का लाभ जारी रखा गया।

    X और Y फैक्टर पर रहेगा फोकस
    मामले में सबसे अहम मुद्दा सरकार द्वारा तय किए गए X और Y फैक्टर हैं, जिनके आधार पर प्रमोशन में आरक्षण का प्रतिशत निर्धारित किया गया है।

    SC वर्ग के लिए: कुल पद × (16 × X) ÷ 100
    ST वर्ग के लिए: कुल पद × (20 × Y) ÷ 100

    यदि X या Y का मान 1 रखा जाता है तो पूरा आरक्षण लागू होता है, जबकि कम मान होने पर आरक्षण का प्रतिशत भी घट जाता है। सामान्य वर्ग का आरोप है कि कई विभागों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने के बावजूद X और Y का मान कम नहीं किया गया, जिससे आरक्षण का प्रतिशत अधिक बना रहा।

    प्रक्रिया पर भी उठेंगे सवाल
    याचिकाकर्ताओं का कहना है कि X और Y तय करने के लिए कोई स्पष्ट और समान मानक नहीं अपनाया गया। समान परिस्थितियों वाले विभागों में अलग-अलग मान निर्धारित किए गए, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।

    प्रशासनिक दक्षता भी बनेगी मुद्दा

    अगली सुनवाई में प्रशासनिक दक्षता का मुद्दा भी प्रमुख रहेगा। सामान्य वर्ग का पक्ष है कि केवल एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) के आधार पर दक्षता का आकलन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उनका तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद-335 के अनुरूप कार्यक्षमता का व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए।

    पांच साल तक एक ही फॉर्मूले पर आपत्ति

    सरकार द्वारा X और Y फैक्टर को पांच वर्ष तक लागू रखने के प्रावधान पर भी सवाल उठाए जाएंगे। सामान्य वर्ग का कहना है कि प्रतिनिधित्व की स्थिति समय के साथ बदलती रहती है, इसलिए पुराने आंकड़ों के आधार पर लंबे समय तक एक ही व्यवस्था लागू रखना उचित नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर
    फिलहाल पूरे मामले की दिशा सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर निर्भर है। हाईकोर्ट ने भी संकेत दिया है कि शीर्ष अदालत की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। हालांकि, माना जा रहा है कि अगली सुनवाई में सरकार के डेटा, X-Y फैक्टर और प्रशासनिक दक्षता जैसे मुद्दों पर विस्तृत और अहम बहस देखने को मिल सकती है, जिसका असर हजारों सरकारी कर्मचारियों पर पड़ सकता है।