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  • उच्च शिक्षा या नौकरी के बावजूद परिवार की देखभाल करने वाली महिला 'गृहिणी', कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

    उच्च शिक्षा या नौकरी के बावजूद परिवार की देखभाल करने वाली महिला 'गृहिणी', कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला

    नई दिल्ली ।कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक सड़क हादसे से जुड़े मुआवजे के मामले की सुनवाई करते हुए ‘गृहिणी’ और ‘होममेकर’ शब्द की परिभाषा को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक टिप्पणी की है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने घर पर परिवार के सदस्यों की सेवा और देखभाल करती है, तो उसे कानूनी व सामाजिक रूप से ‘गृहिणी’ ही माना जाएगा। इसके लिए महिला का अनपढ़ होना या केवल घर के कामों तक सीमित रहना बिल्कुल आवश्यक नहीं है, भले ही उसके पास उच्च शैक्षणिक डिग्री हो या वह कोई नौकरी करती हो।

    न्यायमूर्ति चिल्लाकुर सुमलता की एकल पीठ ने यह टिप्पणी कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम से जुड़े एक दुर्घटना मुआवजे के मामले पर सुनवाई के दौरान की। इस मामले में बायोटेक्नोलॉजी में स्नातकोत्तर एक महिला वर्ष 2013 में बस दुर्घटना के दौरान घायल हो गई थी। पीड़िता ने दुर्घटना के कारण हुए आर्थिक नुकसान और अपनी कार्यक्षमता प्रभावित होने का हवाला देते हुए मुआवजा बढ़ाने की मांग की थी। वहीं परिवहन निगम का तर्क था कि महिला की उच्च शिक्षा को देखते हुए उसे केवल एक सामान्य गृहिणी मानकर मुआवजा तय नहीं किया जा सकता।

    उच्च न्यायालय ने परिवहन निगम की इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि कोई महिला कितनी भी पढ़ी-लिखी हो या उसके पास डॉक्टरेट जैसी उच्च उपाधि ही क्यों न हो, यदि वह घर पर अपने परिवार की भलाई के लिए योगदान दे रही है, तो वह गृहिणी की श्रेणी में आती है। पीठ ने माना कि एक पेशेवर या कामकाजी महिला भी अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए गृहिणी की भूमिका निभाती है और उसके इस योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने गृहिणी शब्द के अर्थ को और अधिक विस्तार देते हुए कहा कि जो व्यक्ति बिना थके परिवार के लिए मेहनत करता है, अपने आराम का त्याग करता है और एक खुशहाल घर का आधार बनता है, वह होममेकर है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि यह अवधारणा केवल महिलाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कोई भी व्यक्ति जो घर चलाने और परिवार के पोषण में योगदान देता है, वह इस परिभाषा के दायरे में आता है।

    इस मामले में अदालत ने महिला के चिकित्सकीय स्थिति और उपचार की अवधि का आकलन करते हुए माना कि चोटों के कारण पीड़िता को कम से कम तीन महीने तक पूर्ण विश्राम करना पड़ा। इस दौरान वह अपने परिवार की सेवा करने में असमर्थ रही, जो कि एक प्रत्यक्ष क्षति है। अदालत ने परिस्थितियों को देखते हुए पीड़िता की काल्पनिक आय तय की और निचली अदालत द्वारा निर्धारित राशि के अतिरिक्त 1,96,800 रुपये का बढ़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश जारी किया।

    मध्य प्रदेश सहित देश भर के कानूनी विशेषज्ञों और आम नागरिकों के बीच उच्च न्यायालय के इस फैसले की काफी सराहना हो रही है। इस निर्णय को महिलाओं द्वारा घर और परिवार के प्रति दिए जाने वाले अमूल्य और अनपेक्षित योगदान को कानूनी रूप से मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

  • तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर आमने-सामने आए दोनों गुट, कार्यक्रम की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

    तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर आमने-सामने आए दोनों गुट, कार्यक्रम की अनुमति को लेकर हाईकोर्ट पहुंचा मामला

    नई दिल्ली ।पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन के भीतर चल रहा विवाद अब 28 अगस्त को होने वाले स्थापना दिवस कार्यक्रम को लेकर खुलकर सामने आ गया है। तृणमूल छात्र परिषद के दो गुटों ने मध्य कोलकाता के मेयो रोड स्थित महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति मांगी है। एक ही स्थान और एक ही दिन कार्यक्रम की मांग किए जाने से दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति बन गई है।

    तृणमूल छात्र परिषद का स्थापना दिवस हर वर्ष 28 अगस्त को मनाया जाता है। इस अवसर पर मेयो रोड पर रैली और सभा का आयोजन किया जाता रहा है। इस बार पार्टी से जुड़े दो छात्र गुटों की अलग-अलग गतिविधियों के कारण स्थापना दिवस का कार्यक्रम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

    ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की ओर से कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति के लिए अदालत का रुख किया जा चुका है। संबंधित याचिका पर सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध भी किया गया। इसके बाद दूसरे गुट ने भी इसी स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं मिलने का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है।

    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट भी 28 अगस्त को मेयो रोड पर कार्यक्रम आयोजित करना चाहता है। इस गुट की ओर से कोलकाता पुलिस से रैली की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन अनुमति नहीं मिलने के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया।

    अदालत ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट की याचिका को तत्काल सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं किया और इसे अगले शुक्रवार के लिए सूचीबद्ध किया है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी समर्थक गुट की याचिका पर पहले ही सुनवाई की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इस वजह से अब दोनों पक्षों की नजर अदालत के अगले रुख पर टिकी हुई है।

    मामले का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या दोनों गुटों को एक ही स्थान पर अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति दी जा सकती है या फिर प्रशासन और अदालत की ओर से कोई वैकल्पिक व्यवस्था तय की जाएगी। एक ही दिन और एक ही स्थान पर दो कार्यक्रम होने की स्थिति में कानून-व्यवस्था से जुड़े पहलुओं पर भी विचार करना होगा।

    मेयो रोड का स्थान तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस कार्यक्रम के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में स्थान को लेकर दोनों पक्षों की दावेदारी ने संगठन के भीतर चल रहे मतभेद को और स्पष्ट कर दिया है। पहले से मौजूद राजनीतिक खींचतान के बीच छात्र संगठन का यह विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बन गया है।

    फिलहाल अदालत के फैसले और प्रशासन की अनुमति पर आगे की तस्वीर निर्भर करेगी। दोनों गुट अपने-अपने कार्यक्रम को लेकर सक्रिय हैं, जबकि 28 अगस्त की तारीख नजदीक आने के साथ विवाद के समाधान को लेकर भी दबाव बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि स्थापना दिवस का आयोजन किस व्यवस्था के तहत होगा और क्या दोनों पक्षों को अलग-अलग कार्यक्रम के लिए स्थान उपलब्ध कराया जाएगा।

  • प्रमोशन में आरक्षण पर नई बहस, सरकार के डेटा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है सामान्‍य वर्ग

    प्रमोशन में आरक्षण पर नई बहस, सरकार के डेटा को कोर्ट में चुनौती दे सकता है सामान्‍य वर्ग

    जबलपुर। मध्य प्रदेश में प्रमोशन में आरक्षण का मामला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। फिलहाल हाईकोर्ट की विशेष खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले की स्थिति साफ होने के बाद ही आगे सुनवाई होगी। अदालत ने सरकार और सभी पक्षों को शीर्ष अदालत में शीघ्र सुनवाई का आग्रह करने की सलाह दी है।

    हालांकि न्यायिक प्रक्रिया फिलहाल रुकी हुई है, लेकिन दोनों पक्ष अपनी कानूनी तैयारियों में जुटे हैं। जानकारी के अनुसार, अगली सुनवाई में सरकार द्वारा प्रस्तुत क्वांटिफिएबल डेटा सबसे बड़ा विवाद का विषय बन सकता है।

    सरकार के आंकड़ों पर उठेंगे सवाल
    सामान्य वर्ग की ओर से अदालत में यह तर्क रखा जाएगा कि कई सरकारी विभागों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) का प्रतिनिधित्व पहले से पर्याप्त है। ऐसे में पदोन्नति में आरक्षण जारी रखने का आधार क्या है, इस पर सरकार से जवाब मांगा जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, सामान्य वर्ग विभिन्न विभागों के आंकड़ों के जरिए यह साबित करने की तैयारी में है कि जहां पर्याप्त प्रतिनिधित्व मौजूद है, वहां भी आरक्षण का लाभ जारी रखा गया।

    X और Y फैक्टर पर रहेगा फोकस
    मामले में सबसे अहम मुद्दा सरकार द्वारा तय किए गए X और Y फैक्टर हैं, जिनके आधार पर प्रमोशन में आरक्षण का प्रतिशत निर्धारित किया गया है।

    SC वर्ग के लिए: कुल पद × (16 × X) ÷ 100
    ST वर्ग के लिए: कुल पद × (20 × Y) ÷ 100

    यदि X या Y का मान 1 रखा जाता है तो पूरा आरक्षण लागू होता है, जबकि कम मान होने पर आरक्षण का प्रतिशत भी घट जाता है। सामान्य वर्ग का आरोप है कि कई विभागों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने के बावजूद X और Y का मान कम नहीं किया गया, जिससे आरक्षण का प्रतिशत अधिक बना रहा।

    प्रक्रिया पर भी उठेंगे सवाल
    याचिकाकर्ताओं का कहना है कि X और Y तय करने के लिए कोई स्पष्ट और समान मानक नहीं अपनाया गया। समान परिस्थितियों वाले विभागों में अलग-अलग मान निर्धारित किए गए, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।

    प्रशासनिक दक्षता भी बनेगी मुद्दा

    अगली सुनवाई में प्रशासनिक दक्षता का मुद्दा भी प्रमुख रहेगा। सामान्य वर्ग का पक्ष है कि केवल एसीआर (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) के आधार पर दक्षता का आकलन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। उनका तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद-335 के अनुरूप कार्यक्षमता का व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए।

    पांच साल तक एक ही फॉर्मूले पर आपत्ति

    सरकार द्वारा X और Y फैक्टर को पांच वर्ष तक लागू रखने के प्रावधान पर भी सवाल उठाए जाएंगे। सामान्य वर्ग का कहना है कि प्रतिनिधित्व की स्थिति समय के साथ बदलती रहती है, इसलिए पुराने आंकड़ों के आधार पर लंबे समय तक एक ही व्यवस्था लागू रखना उचित नहीं है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर
    फिलहाल पूरे मामले की दिशा सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर निर्भर है। हाईकोर्ट ने भी संकेत दिया है कि शीर्ष अदालत की स्थिति स्पष्ट होने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। हालांकि, माना जा रहा है कि अगली सुनवाई में सरकार के डेटा, X-Y फैक्टर और प्रशासनिक दक्षता जैसे मुद्दों पर विस्तृत और अहम बहस देखने को मिल सकती है, जिसका असर हजारों सरकारी कर्मचारियों पर पड़ सकता है।

  • अवैध बैनर पोस्टरों पर कार्रवाई अधूरी, कलेक्टोरेट के सामने ही नियमों की उड़ रही धज्जियां, जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठे सवाल

    अवैध बैनर पोस्टरों पर कार्रवाई अधूरी, कलेक्टोरेट के सामने ही नियमों की उड़ रही धज्जियां, जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठे सवाल


    इंदौर । हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद इंदौर शहर में अवैध राजनीतिक धार्मिक और सामाजिक बैनर पोस्टरों पर कार्रवाई अधूरी नजर आ रही है। आदेश के तीसरे दिन भी शहर के प्रमुख मार्गों और सरकारी कार्यालयों के बाहर बड़ी संख्या में अवैध होर्डिंग्स और पोस्टर लगे दिखाई दिए। सबसे ज्यादा चर्चा कलेक्टोरेट परिसर के बाहर बने विशाल प्रवेश द्वार की हो रही है जो जिम्मेदार अधिकारियों की नजरों से अब तक ओझल बना हुआ है।

    कलेक्टोरेट के सामने बना यह बड़ा प्रवेश द्वार ऐसे स्थान पर स्थित है जहां से रोजाना कलेक्टर सहित कई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी गुजरते हैं। इसके बावजूद अब तक इसे हटाने की कोई कार्रवाई नहीं होना प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकारी कार्यालयों के सामने ही नियमों का पालन नहीं होगा तो शहरभर में अभियान की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    नगर निगम की ओर से दावा किया गया है कि शहरभर से अब तक करीब एक हजार अवैध बैनर पोस्टर हटाए जा चुके हैं और अभियान लगातार जारी है। बुधवार को भी कई इलाकों में कार्रवाई कर अवैध पोस्टर और बैनर हटाए गए। हालांकि शहर के कई प्रमुख मार्गों पर अब भी बड़ी संख्या में राजनीतिक धार्मिक और सामाजिक आयोजनों से जुड़े पोस्टर और होर्डिंग्स लगे हुए दिखाई दिए।

    एबी रोड और एमजी रोड जैसे व्यस्त मार्गों पर भी यूनीपोल मिनी पोल और लॉलीपॉप पोल पर बड़ी संख्या में बैनर पोस्टर लगे मिले। इनमें राजनीतिक कार्यक्रमों धार्मिक आयोजनों और सामाजिक गतिविधियों के प्रचार संबंधी सामग्री शामिल थी। बताया जा रहा है कि इनमें से कई होर्डिंग्स के लिए नगर निगम में निर्धारित शुल्क भी जमा नहीं कराया गया है।

    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब शहरभर में अवैध होर्डिंग्स हटाने का अभियान चलाया जा रहा है तो सरकारी कार्यालयों के बाहर लगे बैनर पोस्टरों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। कलेक्टोरेट जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र के बाहर अवैध प्रवेश द्वार और पोस्टरों का बने रहना अभियान की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है।

    शहर के विभिन्न इलाकों में भी हालात लगभग एक जैसे हैं। कई स्थानों पर धार्मिक और राजनीतिक संगठनों के बैनर अब भी सार्वजनिक स्थलों पर लगे हुए हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि हाईकोर्ट के आदेश का पूरी गंभीरता से पालन कराया जाए तो अभियान की शुरुआत सबसे पहले सरकारी परिसरों और प्रमुख प्रशासनिक भवनों के बाहर से होनी चाहिए।

    अब लोगों की नजरें नगर निगम और जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी सरकारी परिसरों के बाहर लगे अवैध होर्डिंग्स और प्रवेश द्वारों पर भी समान रूप से कार्रवाई करते हैं या फिर अभियान केवल चुनिंदा स्थानों तक ही सीमित रह जाता है।

  • जबलपुर हाईकोर्ट का बेहद भावुक और ऐतिहासिक फैसला, 52 वर्ष की उम्र में महिला को मिली आईवीएफ के जरिए मां बनने की इजाजत

    जबलपुर हाईकोर्ट का बेहद भावुक और ऐतिहासिक फैसला, 52 वर्ष की उम्र में महिला को मिली आईवीएफ के जरिए मां बनने की इजाजत

    मध्यप्रदेश: उच्च न्यायालय ने मातृत्व की इच्छा रखने वाली एक अधेड़ उम्र की महिला के पक्ष में बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने एक 52 वर्षीय महिला को ‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ यानी आईवीएफ तकनीक के जरिए गर्भधारण करने की कानूनी मंजूरी दे दी है। न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला शारीरिक और चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह स्वस्थ है, तो उसे महज कानून में निर्धारित आयु सीमा पार कर लेने के आधार पर मां बनने के नैसर्गिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस विशाल मिश्रा की एकल पीठ ने जबलपुर में याचिकाकर्ता दंपत्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। यह याचिका एक ऐसे दंपत्ति द्वारा दायर की गई थी, जिनके इकलौते 21 वर्षीय बेटे की पीलिया की बीमारी के कारण असामयिक मृत्यु हो गई थी। इस गहरे सदमे से उबरने और अपने जीवन में दोबारा खुशियां लाने के उद्देश्य से इस दंपत्ति ने फिर से संतान प्राप्ति का प्रयास शुरू किया था। हालांकि, बढ़ती उम्र और शारीरिक जटिलताओं के कारण महिला के लिए प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करना संभव नहीं हो पा रहा था।

    स्वाभाविक रूप से गर्भधारण करने में असफल रहने के बाद इस पीड़ित दंपत्ति ने चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक तकनीक आईवीएफ का सहारा लेने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने एक विशेषज्ञ अस्पताल से संपर्क किया, जहां शुरुआती चिकित्सकीय परीक्षणों में दोनों को शारीरिक रूप से इस प्रक्रिया के अनुकूल और पूरी तरह स्वस्थ पाया गया। इसके बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के कड़े कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए इस दंपत्ति का आईवीएफ उपचार करने से साफ इनकार कर दिया था।

    मौजूदा कानून के तहत भारत में आईवीएफ कराने वाली महिला की आयु सीमा न्यूनतम 21 वर्ष और अधिकतम 50 वर्ष तय की गई है, जबकि पुरुष के लिए यह सीमा 21 से 55 वर्ष के बीच निर्धारित है। चूंकि महिला की आयु 52 वर्ष हो चुकी थी, इसलिए तकनीकी रूप से वह इस कानून के दायरे से बाहर हो रही थीं। इस कानूनी बाधा के खिलाफ दंपत्ति ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि कानून की बहुत ज्यादा कठोर व्याख्या करके उनसे माता-पिता बनने का आखिरी मौका नहीं छीना जाना चाहिए।

    न्यायालय में सुनवाई के दौरान दंपत्ति ने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए एक औपचारिक हलफनामा भी प्रस्तुत किया। इस हलफनामे में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि वे इस उम्र में आईवीएफ प्रक्रिया से जुड़े सभी संभावित चिकित्सकीय जोखिमों और उनके परिणामों को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर उठाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इस भावुक और तार्किक पक्ष को देखने के बाद अदालत ने माना कि मातृत्व की राह में केवल तकनीकी नियम आड़े नहीं आने चाहिए।

    उच्च न्यायालय ने याचिका को स्वीकार करते हुए अपने निर्णय में रेखांकित किया कि संबंधित कानून में दंपत्ति के लिए कोई संयुक्त आयु सीमा निर्धारित नहीं की गई है। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता दंपत्ति किसी भी मान्यता प्राप्त चिकित्सा संस्थान में जाकर अपनी आईवीएफ प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने इस मामले में डॉक्टरों की विशेषज्ञता का सम्मान करते हुए अस्पताल को यह स्वतंत्रता भी दी है कि वे महिला की तात्कालिक चिकित्सकीय स्थिति का आकलन करने के बाद ही उपचार का अंतिम निर्णय लें।

  • सरकारी वकीलों की भर्ती पर हाई कोर्ट का सख्त रुख, पांचवीं बार भी जवाब नहीं देने पर महाधिवक्ता को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश

    सरकारी वकीलों की भर्ती पर हाई कोर्ट का सख्त रुख, पांचवीं बार भी जवाब नहीं देने पर महाधिवक्ता को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश

    मध्य प्रदेश में सरकारी वकीलों की नियुक्ति को लेकर उठे विवाद पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। लॉ ऑफिसर्स की नियुक्ति प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार की ओर से बार-बार जवाब प्रस्तुत नहीं किए जाने पर नाराजगी जताई। लगातार कई अवसर दिए जाने के बावजूद जवाब दाखिल नहीं होने पर हाई कोर्ट ने महाधिवक्ता को अगली सुनवाई में स्वयं उपस्थित होकर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए हैं।

    मामला हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के संयुक्त सचिव योगेश सोनी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में महाधिवक्ता कार्यालय के अंतर्गत 157 सरकारी लॉ ऑफिसर्स की नियुक्तियों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि चयन प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया और नियुक्तियों में मनमानी, पक्षपात तथा पात्रता संबंधी मानकों की अनदेखी की गई। याचिकाकर्ता ने पूरी भर्ती प्रक्रिया की न्यायिक जांच की मांग भी की है।

    याचिका में कहा गया है कि सरकारी लॉ ऑफिसर नियुक्त किए जाने के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार कम से कम दस वर्ष का अधिवक्ता अनुभव होना आवश्यक है। आरोप है कि नियुक्त किए गए कुछ लोगों के पास निर्धारित अनुभव उपलब्ध नहीं था, फिर भी उन्हें सरकारी वकील नियुक्त कर दिया गया। इन आरोपों के आधार पर याचिकाकर्ता ने नियुक्तियों की वैधता पर प्रश्न उठाते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की है।

    सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी सामने आया कि पूर्व में जारी न्यायालय के नोटिस संबंधित पक्षों तक पहुंचाने में भी कठिनाई आई। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि कुछ अवसरों पर नोटिस स्वीकार नहीं किए गए। अदालत ने इस तथ्य को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की गंभीरता पर चिंता व्यक्त की। इसके बाद राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए कई अवसर दिए गए, लेकिन निर्धारित समय में जवाब प्रस्तुत नहीं किया जा सका।

    लगातार देरी पर असंतोष जताते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब मामले में और विलंब स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने महाधिवक्ता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया है कि अब तक जवाब क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया और नियुक्तियों से जुड़े आरोपों पर सरकार का आधिकारिक पक्ष क्या है। अदालत का यह रुख इस मामले को गंभीरता से लिए जाने का संकेत माना जा रहा है।

    मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को निर्धारित की गई है। इस दौरान महाधिवक्ता की व्यक्तिगत उपस्थिति के साथ राज्य सरकार से विस्तृत जवाब अपेक्षित रहेगा। अदालत में प्रस्तुत होने वाले उत्तर के आधार पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया तय होगी। फिलहाल इस मामले में किसी भी पक्ष के आरोपों पर न्यायालय ने अंतिम टिप्पणी नहीं की है और विवाद विचाराधीन है।

    यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सरकारी लॉ ऑफिसर्स राज्य सरकार की ओर से विभिन्न न्यायालयों में महत्वपूर्ण मामलों की पैरवी करते हैं। ऐसे में उनकी नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता, पात्रता और नियमों के पालन को लेकर उठे प्रश्नों पर न्यायिक परीक्षण की प्रक्रिया अब आगे बढ़ेगी। अगली सुनवाई में अदालत के समक्ष प्रस्तुत होने वाले जवाब पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

  • कलकत्ता हाई कोर्ट से TMC को बड़ी राहत, फ्रीज बैंक खातों के संचालन की मिली अनुमति, निगरानी के लिए स्पेशल ऑफिसर नियुक्त

    कलकत्ता हाई कोर्ट से TMC को बड़ी राहत, फ्रीज बैंक खातों के संचालन की मिली अनुमति, निगरानी के लिए स्पेशल ऑफिसर नियुक्त

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को पार्टी फंड से जुड़े विवाद के बीच कलकत्ता हाई कोर्ट से महत्वपूर्ण राहत मिली है। अदालत ने पार्टी के तीन फ्रीज बैंक खातों के संचालन के लिए एक स्पेशल ऑफिसर नियुक्त करने का आदेश दिया है। इस व्यवस्था के तहत तृणमूल कांग्रेस अपने आवश्यक वित्तीय लेनदेन कर सकेगी, लेकिन सभी गतिविधियां अदालत द्वारा नियुक्त अधिकारी की निगरानी में संपन्न होंगी।

    यह मामला पार्टी के बैंक खातों को फ्रीज किए जाने से जुड़ा है। संबंधित खातों पर रोक लगाए जाने के बाद पार्टी की नियमित वित्तीय और संगठनात्मक गतिविधियां प्रभावित होने लगी थीं। अदालत ने सुनवाई के दौरान इस पहलू पर विचार करते हुए कहा कि जांच प्रक्रिया जारी रहने के बावजूद किसी राजनीतिक दल के नियमित प्रशासनिक और वित्तीय कार्य पूरी तरह बाधित नहीं होने चाहिए। इसी आधार पर निगरानी व्यवस्था के साथ खातों के संचालन की अनुमति दी गई।

    मामले की शुरुआत उस शिकायत से हुई थी जिसमें पार्टी फंड के कथित दुरुपयोग का आरोप लगाया गया था। शिकायत के आधार पर जांच शुरू की गई और उसके बाद संबंधित बैंक खातों को फ्रीज करने की कार्रवाई की गई। इस निर्णय के कारण पार्टी के नियमित भुगतान और अन्य वित्तीय दायित्वों के निर्वहन में कठिनाइयां सामने आने लगी थीं।

    हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि स्पेशल ऑफिसर की निगरानी में ही खातों से लेनदेन किया जाएगा। इसका उद्देश्य एक ओर जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखना है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के आवश्यक प्रशासनिक कार्यों को भी जारी रखना है। अदालत की यह व्यवस्था जांच और नियमित वित्तीय संचालन के बीच संतुलन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आदेश तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रशासनिक दृष्टि से राहत लेकर आया है। पार्टी अब अपने संगठनात्मक खर्च, नियमित भुगतान और अन्य आवश्यक वित्तीय दायित्वों को अदालत की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार पूरा कर सकेगी। हालांकि मामले की जांच पहले की तरह जारी रहेगी और अंतिम निष्कर्ष जांच के आधार पर ही सामने आएंगे।

    इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीतिक दलों के वित्तीय प्रबंधन और फंड संचालन से जुड़े नियमों पर भी ध्यान आकर्षित किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत का आदेश यह सुनिश्चित करता है कि जांच प्रभावित हुए बिना आवश्यक वित्तीय गतिविधियां भी बाधित न हों। इससे जांच एजेंसियों और संबंधित पक्षों के बीच संतुलित प्रक्रिया बनाए रखने में मदद मिलेगी।

    फिलहाल हाई कोर्ट के आदेश के बाद तृणमूल कांग्रेस को अपने फ्रीज बैंक खातों के सीमित संचालन की अनुमति मिल गई है। अब सभी वित्तीय लेनदेन अदालत द्वारा नियुक्त स्पेशल ऑफिसर की देखरेख में किए जाएंगे। आने वाले समय में मामले की जांच की प्रगति और अदालत में होने वाली अगली सुनवाई इस पूरे विवाद की आगे की दिशा तय करेगी।

  • निर्मला सप्रे दल-बदल मामले में कांग्रेस को झटका, विधायकी रद्द करने की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की..

    निर्मला सप्रे दल-बदल मामले में कांग्रेस को झटका, विधायकी रद्द करने की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की..

    मध्य प्रदेश: की राजनीति में चर्चित विधायक निर्मला सप्रे के कथित दल-बदल मामले में कांग्रेस को बड़ा कानूनी झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसे पर्याप्त और आधिकारिक साक्ष्य नहीं हैं, जिनके आधार पर यह माना जा सके कि विधायक ने औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली है या उन्हें कांग्रेस से निष्कासित किया गया है। ऐसे में इस स्तर पर हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

    यह मामला कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की मांग की थी कि बीना विधानसभा क्षेत्र की विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता दल-बदल कानून के तहत समाप्त की जाए। उनका तर्क था कि विधायक ने लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में सक्रिय प्रचार किया और पार्टी से जुड़ी गतिविधियों में भाग लिया, जिससे उनकी सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए।

    मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे यह प्रमाणित हो कि निर्मला सप्रे को आधिकारिक रूप से कांग्रेस से निष्कासित किया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि भाजपा की विधिवत सदस्यता ग्रहण करने का भी कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। केवल आरोपों या सार्वजनिक गतिविधियों के आधार पर तत्काल कार्रवाई का निर्देश देना उचित नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि दल-बदल से संबंधित कार्यवाही पहले से विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित है। ऐसे मामलों में निर्णय लेने का अधिकार संविधान और कानून के तहत विधानसभा अध्यक्ष को प्राप्त है। इसलिए न्यायालय इस स्तर पर विधानसभा अध्यक्ष को किसी निश्चित समय सीमा में निर्णय लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अदालत ने माना कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की कोई ऐसी असाधारण परिस्थिति नहीं है, जो न्यायिक आदेश की आवश्यकता पैदा करे।

    पूरा विवाद वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सामने आया था। कांग्रेस का आरोप था कि निर्मला सप्रे ने भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार किया और पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मई 2024 में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की थी। जब इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ तो मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी दावा किया कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर मौजूद तस्वीरें एवं वीडियो विधायक के भाजपा से जुड़ाव को दर्शाते हैं। हालांकि अदालत ने माना कि इस प्रकार की सामग्री अपने आप में औपचारिक सदस्यता का पर्याप्त कानूनी प्रमाण नहीं मानी जा सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दल-बदल से जुड़े मामलों में निर्णय तथ्यों और वैधानिक प्रक्रिया के आधार पर ही लिया जाएगा।

    निर्मला सप्रे ने वर्ष 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंची थीं। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार महेश राय को 6,155 मतों के अंतर से पराजित किया था। हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद फिलहाल उनकी विधानसभा सदस्यता बरकरार रहेगी, जबकि दल-बदल से जुड़ी आगे की प्रक्रिया विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष जारी रहेगी।

  • मध्य प्रदेश नर्सिंग घोटाले में हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, केवल फिट घोषित कॉलेजों के छात्र ही दे सकेंगे जीएनएम थर्ड ईयर परीक्षा

    मध्य प्रदेश नर्सिंग घोटाले में हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, केवल फिट घोषित कॉलेजों के छात्र ही दे सकेंगे जीएनएम थर्ड ईयर परीक्षा

     
     मध्य प्रदेश : में चर्चित नर्सिंग कॉलेज मामले में हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हजारों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दे पर स्पष्टता प्रदान कर दी है। अदालत ने निर्देश दिया है कि केवल वे नर्सिंग कॉलेज, जिन्हें जांच और निर्धारित मानकों के आधार पर फिट घोषित किया गया है, उनके छात्र ही जीएनएम थर्ड ईयर की परीक्षा में शामिल हो सकेंगे। इसके साथ ही सत्र 2022-23 के जीएनएम फर्स्ट ईयर के परिणाम जारी करने का रास्ता भी खुल गया है।

    मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जिन संस्थानों को जांच में अनफिट पाया गया है, उन्हें परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा बनने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अदालत ने कहा कि शैक्षणिक गुणवत्ता और छात्रों के हितों से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। ऐसे संस्थानों को परीक्षा संबंधी किसी भी लाभ का पात्र नहीं माना जाएगा।

    यह पूरा मामला राज्य में संचालित नर्सिंग कॉलेजों की गुणवत्ता और वैधता को लेकर उठे गंभीर सवालों के बाद सामने आया था। जांच प्रक्रिया के दौरान यह पाया गया कि कई संस्थान आवश्यक आधारभूत सुविधाओं, प्रशिक्षित शिक्षकों और निर्धारित संसाधनों के बिना संचालित हो रहे थे। इसके बाद व्यापक स्तर पर सत्यापन और निरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

    जांच में सामने आए तथ्यों ने पूरे शिक्षा क्षेत्र को झकझोर दिया। प्रदेश में संचालित 695 नर्सिंग कॉलेजों की समीक्षा के दौरान केवल 165 संस्थान ही निर्धारित मानकों पर पूरी तरह खरे उतर सके। यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि बड़ी संख्या में कॉलेज आवश्यक शैक्षणिक और प्रशासनिक मानकों का पालन नहीं कर रहे थे।

    हालांकि, अदालत ने उन संस्थानों को राहत देने का अवसर भी दिया जिन्होंने अपनी कमियों को दूर करने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए थे। ऐसे 89 कॉलेजों को अतिरिक्त अवसर प्रदान किया गया और बाद में उन्हें आवश्यक शर्तें पूरी करने के बाद फिट घोषित कर दिया गया। इस निर्णय से उन छात्रों को राहत मिली है जो मान्यता प्राप्त संस्थानों में अध्ययन कर रहे हैं और लंबे समय से परीक्षा तथा परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

    दूसरी ओर, जांच में गंभीर अनियमितताओं वाले और मानकों पर खरे न उतरने वाले शेष कॉलेजों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया है। ऐसे संस्थानों को संचालन के लिए अयोग्य मानते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए गुणवत्ता संबंधी मानकों का पालन अनिवार्य है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल वर्तमान छात्रों के हितों की रक्षा करेगा, बल्कि भविष्य में नर्सिंग शिक्षा के स्तर को सुधारने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रशिक्षित और योग्य नर्सिंग पेशेवरों की आवश्यकता को देखते हुए संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है।

    अदालत के इस आदेश के बाद अब फिट घोषित कॉलेजों में अध्ययनरत छात्रों के लिए परीक्षा और परिणामों से जुड़ी अनिश्चितता काफी हद तक समाप्त हो गई है। वहीं, राज्य में नर्सिंग शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मानक आधारित बनाने की दिशा में यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • कोर्ट की सख्ती के बाद लखनऊ में सपा पार्षद को मिली शपथ, मेयर के अधिकार सीमित होने से प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज


    नई दिल्ली। लखनऊ नगर निगम में लंबे समय से चल रहे पार्षद शपथ विवाद का अंत आखिरकार न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद हो गया। हाई कोर्ट के सख्त निर्देशों के अनुपालन में नगर निगम प्रशासन ने सपा पार्षद ललित किशोर तिवारी को औपचारिक रूप से शपथ दिलाई। यह मामला केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और कानूनी बहस का भी बड़ा विषय बन गया था, जिसने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

    पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब निकाय चुनाव के परिणामों के बाद विजयी घोषित सपा पार्षद को शपथ दिलाने में देरी की गई। लगभग पांच महीने तक शपथ ग्रहण की प्रक्रिया लंबित रहने के कारण मामला धीरे-धीरे अदालत तक पहुंच गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने आरोप लगाया कि जानबूझकर शपथ ग्रहण में देरी की जा रही है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा है। मामला पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां से प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए गए।

    हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल शपथ दिलाने का आदेश दिया, बल्कि लखनऊ नगर निगम के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारों पर भी सख्ती दिखाई। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि निर्धारित समय सीमा के भीतर आदेश का पालन किया जाए, अन्यथा संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह माना जाएगा। इसी आदेश के बाद नगर निगम प्रशासन हरकत में आया और शपथ ग्रहण की प्रक्रिया को पूरा किया गया।

    शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मेयर सुषमा खर्कवाल ने सपा पार्षद को पद की शपथ दिलाई। यह कदम न्यायालय के आदेश के अनुपालन के रूप में देखा गया, जिससे यह संदेश भी गया कि संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना संभव नहीं है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने नगर निगम के भीतर चल रहे प्रशासनिक तनाव और राजनीतिक खींचतान को भी उजागर कर दिया है।

    इस विवाद की पृष्ठभूमि 2023 के निकाय चुनावों से जुड़ी हुई है, जहां एक सीट पर चुनाव परिणाम को लेकर कानूनी चुनौती दी गई थी। आरोप-प्रत्यारोप के बीच अदालत ने अंतिम रूप से सपा प्रत्याशी को विजयी घोषित किया, लेकिन शपथ ग्रहण में देरी के कारण मामला फिर से विवादों में आ गया। इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक संतुलन दोनों पर प्रभाव डाला है।

    अब शपथ ग्रहण के बाद यह मामला औपचारिक रूप से समाप्त माना जा रहा है, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी या हस्तक्षेप न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है। प्रशासनिक स्तर पर इस घटना को एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा।