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  • निर्मला सप्रे दल-बदल मामले में कांग्रेस को झटका, विधायकी रद्द करने की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की..

    निर्मला सप्रे दल-बदल मामले में कांग्रेस को झटका, विधायकी रद्द करने की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की..

    मध्य प्रदेश: की राजनीति में चर्चित विधायक निर्मला सप्रे के कथित दल-बदल मामले में कांग्रेस को बड़ा कानूनी झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसे पर्याप्त और आधिकारिक साक्ष्य नहीं हैं, जिनके आधार पर यह माना जा सके कि विधायक ने औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली है या उन्हें कांग्रेस से निष्कासित किया गया है। ऐसे में इस स्तर पर हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

    यह मामला कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को निर्देश देने की मांग की थी कि बीना विधानसभा क्षेत्र की विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता दल-बदल कानून के तहत समाप्त की जाए। उनका तर्क था कि विधायक ने लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में सक्रिय प्रचार किया और पार्टी से जुड़ी गतिविधियों में भाग लिया, जिससे उनकी सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए।

    मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे यह प्रमाणित हो कि निर्मला सप्रे को आधिकारिक रूप से कांग्रेस से निष्कासित किया गया है। अदालत ने यह भी कहा कि भाजपा की विधिवत सदस्यता ग्रहण करने का भी कोई प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। केवल आरोपों या सार्वजनिक गतिविधियों के आधार पर तत्काल कार्रवाई का निर्देश देना उचित नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि दल-बदल से संबंधित कार्यवाही पहले से विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित है। ऐसे मामलों में निर्णय लेने का अधिकार संविधान और कानून के तहत विधानसभा अध्यक्ष को प्राप्त है। इसलिए न्यायालय इस स्तर पर विधानसभा अध्यक्ष को किसी निश्चित समय सीमा में निर्णय लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अदालत ने माना कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की कोई ऐसी असाधारण परिस्थिति नहीं है, जो न्यायिक आदेश की आवश्यकता पैदा करे।

    पूरा विवाद वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान सामने आया था। कांग्रेस का आरोप था कि निर्मला सप्रे ने भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार किया और पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मई 2024 में विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की थी। जब इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ तो मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी दावा किया कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर मौजूद तस्वीरें एवं वीडियो विधायक के भाजपा से जुड़ाव को दर्शाते हैं। हालांकि अदालत ने माना कि इस प्रकार की सामग्री अपने आप में औपचारिक सदस्यता का पर्याप्त कानूनी प्रमाण नहीं मानी जा सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दल-बदल से जुड़े मामलों में निर्णय तथ्यों और वैधानिक प्रक्रिया के आधार पर ही लिया जाएगा।

    निर्मला सप्रे ने वर्ष 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंची थीं। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार महेश राय को 6,155 मतों के अंतर से पराजित किया था। हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद फिलहाल उनकी विधानसभा सदस्यता बरकरार रहेगी, जबकि दल-बदल से जुड़ी आगे की प्रक्रिया विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष जारी रहेगी।

  • मध्य प्रदेश नर्सिंग घोटाले में हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, केवल फिट घोषित कॉलेजों के छात्र ही दे सकेंगे जीएनएम थर्ड ईयर परीक्षा

    मध्य प्रदेश नर्सिंग घोटाले में हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, केवल फिट घोषित कॉलेजों के छात्र ही दे सकेंगे जीएनएम थर्ड ईयर परीक्षा

     
     मध्य प्रदेश : में चर्चित नर्सिंग कॉलेज मामले में हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हजारों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दे पर स्पष्टता प्रदान कर दी है। अदालत ने निर्देश दिया है कि केवल वे नर्सिंग कॉलेज, जिन्हें जांच और निर्धारित मानकों के आधार पर फिट घोषित किया गया है, उनके छात्र ही जीएनएम थर्ड ईयर की परीक्षा में शामिल हो सकेंगे। इसके साथ ही सत्र 2022-23 के जीएनएम फर्स्ट ईयर के परिणाम जारी करने का रास्ता भी खुल गया है।

    मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जिन संस्थानों को जांच में अनफिट पाया गया है, उन्हें परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा बनने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अदालत ने कहा कि शैक्षणिक गुणवत्ता और छात्रों के हितों से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। ऐसे संस्थानों को परीक्षा संबंधी किसी भी लाभ का पात्र नहीं माना जाएगा।

    यह पूरा मामला राज्य में संचालित नर्सिंग कॉलेजों की गुणवत्ता और वैधता को लेकर उठे गंभीर सवालों के बाद सामने आया था। जांच प्रक्रिया के दौरान यह पाया गया कि कई संस्थान आवश्यक आधारभूत सुविधाओं, प्रशिक्षित शिक्षकों और निर्धारित संसाधनों के बिना संचालित हो रहे थे। इसके बाद व्यापक स्तर पर सत्यापन और निरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

    जांच में सामने आए तथ्यों ने पूरे शिक्षा क्षेत्र को झकझोर दिया। प्रदेश में संचालित 695 नर्सिंग कॉलेजों की समीक्षा के दौरान केवल 165 संस्थान ही निर्धारित मानकों पर पूरी तरह खरे उतर सके। यह आंकड़ा इस बात की ओर संकेत करता है कि बड़ी संख्या में कॉलेज आवश्यक शैक्षणिक और प्रशासनिक मानकों का पालन नहीं कर रहे थे।

    हालांकि, अदालत ने उन संस्थानों को राहत देने का अवसर भी दिया जिन्होंने अपनी कमियों को दूर करने के लिए सुधारात्मक कदम उठाए थे। ऐसे 89 कॉलेजों को अतिरिक्त अवसर प्रदान किया गया और बाद में उन्हें आवश्यक शर्तें पूरी करने के बाद फिट घोषित कर दिया गया। इस निर्णय से उन छात्रों को राहत मिली है जो मान्यता प्राप्त संस्थानों में अध्ययन कर रहे हैं और लंबे समय से परीक्षा तथा परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

    दूसरी ओर, जांच में गंभीर अनियमितताओं वाले और मानकों पर खरे न उतरने वाले शेष कॉलेजों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया गया है। ऐसे संस्थानों को संचालन के लिए अयोग्य मानते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए गुणवत्ता संबंधी मानकों का पालन अनिवार्य है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल वर्तमान छात्रों के हितों की रक्षा करेगा, बल्कि भविष्य में नर्सिंग शिक्षा के स्तर को सुधारने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित होगा। स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रशिक्षित और योग्य नर्सिंग पेशेवरों की आवश्यकता को देखते हुए संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक माना जा रहा है।

    अदालत के इस आदेश के बाद अब फिट घोषित कॉलेजों में अध्ययनरत छात्रों के लिए परीक्षा और परिणामों से जुड़ी अनिश्चितता काफी हद तक समाप्त हो गई है। वहीं, राज्य में नर्सिंग शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मानक आधारित बनाने की दिशा में यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

  • कोर्ट की सख्ती के बाद लखनऊ में सपा पार्षद को मिली शपथ, मेयर के अधिकार सीमित होने से प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज


    नई दिल्ली। लखनऊ नगर निगम में लंबे समय से चल रहे पार्षद शपथ विवाद का अंत आखिरकार न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद हो गया। हाई कोर्ट के सख्त निर्देशों के अनुपालन में नगर निगम प्रशासन ने सपा पार्षद ललित किशोर तिवारी को औपचारिक रूप से शपथ दिलाई। यह मामला केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और कानूनी बहस का भी बड़ा विषय बन गया था, जिसने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

    पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब निकाय चुनाव के परिणामों के बाद विजयी घोषित सपा पार्षद को शपथ दिलाने में देरी की गई। लगभग पांच महीने तक शपथ ग्रहण की प्रक्रिया लंबित रहने के कारण मामला धीरे-धीरे अदालत तक पहुंच गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने आरोप लगाया कि जानबूझकर शपथ ग्रहण में देरी की जा रही है, जिससे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा है। मामला पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां से प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए गए।

    हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल शपथ दिलाने का आदेश दिया, बल्कि लखनऊ नगर निगम के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारों पर भी सख्ती दिखाई। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि निर्धारित समय सीमा के भीतर आदेश का पालन किया जाए, अन्यथा संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह माना जाएगा। इसी आदेश के बाद नगर निगम प्रशासन हरकत में आया और शपथ ग्रहण की प्रक्रिया को पूरा किया गया।

    शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मेयर सुषमा खर्कवाल ने सपा पार्षद को पद की शपथ दिलाई। यह कदम न्यायालय के आदेश के अनुपालन के रूप में देखा गया, जिससे यह संदेश भी गया कि संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना संभव नहीं है। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने नगर निगम के भीतर चल रहे प्रशासनिक तनाव और राजनीतिक खींचतान को भी उजागर कर दिया है।

    इस विवाद की पृष्ठभूमि 2023 के निकाय चुनावों से जुड़ी हुई है, जहां एक सीट पर चुनाव परिणाम को लेकर कानूनी चुनौती दी गई थी। आरोप-प्रत्यारोप के बीच अदालत ने अंतिम रूप से सपा प्रत्याशी को विजयी घोषित किया, लेकिन शपथ ग्रहण में देरी के कारण मामला फिर से विवादों में आ गया। इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक संतुलन दोनों पर प्रभाव डाला है।

    अब शपथ ग्रहण के बाद यह मामला औपचारिक रूप से समाप्त माना जा रहा है, लेकिन इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी या हस्तक्षेप न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है। प्रशासनिक स्तर पर इस घटना को एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा।

  • हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: आयुष चिकित्सा अधिकारियों की भर्ती प्रक्रिया पर लगी रोक

    हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: आयुष चिकित्सा अधिकारियों की भर्ती प्रक्रिया पर लगी रोक


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने आयुष चिकित्सा अधिकारियों (आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी) की भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह आदेश 31 दिसंबर 2025 को जारी विज्ञापनों के तहत चल रही भर्ती प्रक्रिया पर लागू होगा, जिससे फिलहाल सभी आगे की कार्रवाई रोक दी गई है।

    मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने यह फैसला तीन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने राज्य सरकार और मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 23 जून 2026 तय की गई है।

    विवाद का मुख्य मुद्दा 50 प्रतिशत आरक्षण से जुड़ा है, जो उन संविदा आयुष चिकित्सा अधिकारियों को देने का प्रावधान है जिन्होंने पांच साल की सेवा पूरी कर ली है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि समान पद पर कार्यरत होने के बावजूद उन्हें इस लाभ से वंचित किया जा रहा है।

    सरकार की 11 मार्च 2025 की अधिसूचना में यह प्रावधान किया गया था कि ऐसे संविदा चिकित्सक, जो निर्धारित सेवा अवधि पूरी कर चुके हैं, उन्हें नियमित भर्ती में आरक्षण का लाभ मिलेगा, बशर्ते वे समकक्ष पद पर कार्यरत हों।

    याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे उसी पद पर काम कर रहे हैं, जिसके लिए भर्ती निकाली गई है, और केवल वेतनमान के आधार पर भेदभाव उचित नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि राज्य सरकार पहले ही कुछ मामलों में संविदा चिकित्सकों के वेतनमान को नियमित स्तर पर लाने की प्रक्रिया स्वीकार कर चुकी है।

    हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश से प्रदेश भर के हजारों संविदा आयुष चिकित्सकों को फिलहाल राहत मिली है, जबकि भर्ती प्रक्रिया अनिश्चितकाल के लिए रुक गई है। अब सरकार के जवाब के बाद ही इस मामले में आगे की दिशा तय होगी।

  • भोजशाला मामले पर हाईकोर्ट का फैसला आज, इंदौर-धार में हाई अलर्ट

    भोजशाला मामले पर हाईकोर्ट का फैसला आज, इंदौर-धार में हाई अलर्ट


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के बहुचर्चित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर आज हाईकोर्ट की इंदौर बेंच का अहम फैसला आ सकता है। वर्षों से चल रहे इस संवेदनशील मामले में कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित रखा था, जिसके चलते पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ा दिया गया है।

    फैसले को देखते हुए इंदौर और धार जिले में प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है। खास बात यह है कि आज शुक्रवार का दिन है और इसी दिन भोजशाला परिसर में जुमे की नमाज अदा की जाती है, जिससे स्थिति की संवेदनशीलता और बढ़ गई है। प्रशासन ने दोनों समुदायों से शांति बनाए रखने और किसी भी तरह की अफवाहों से दूर रहने की अपील की है।

    धार शहर में करीब 1200 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को 12 लेयर में बांटा गया है, जिसमें रिजर्व पुलिस फोर्स और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) को भी शामिल किया गया है। पुलिस कंट्रोल रूम से लगातार निगरानी की जा रही है और संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त बल तैनात है।

    भोजशाला परिसर और आसपास के क्षेत्रों में कलेक्टर और एसपी ने खुद सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया है। सोशल मीडिया पर भी कड़ी नजर रखी जा रही है ताकि किसी भी तरह की भड़काऊ पोस्ट या अफवाह को फैलने से रोका जा सके।

    यह विवाद 2022 में दायर याचिकाओं के बाद और अधिक चर्चा में आया था, जिसमें भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर अदालत में मांगें रखी गई थीं। हिंदू पक्ष ने इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर बताते हुए नियमित पूजा का अधिकार मांगा है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे लंबे समय से उपयोग में रही मस्जिद बताता है।

    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने भी इस मामले में 98 दिन का वैज्ञानिक सर्वे किया था, जिसकी रिपोर्ट को लेकर दोनों पक्षों में अलग-अलग दावे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले कुछ व्यवस्थाओं को लेकर अनुमति दी थी, जिसके बाद यह मामला और संवेदनशील हो गया।

    फिलहाल प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि कानून-व्यवस्था सर्वोपरि है और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए सभी सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह तैयार हैं।

  • हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के मामलों में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाने पर ब्रेक अफसर करेंगे नाम विलोपन

    हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के मामलों में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाने पर ब्रेक अफसर करेंगे नाम विलोपन


    भोपाल । मध्यप्रदेश में प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर एक अहम बदलाव की तैयारी शुरू हो गई है जहां बीते तीन महीनों में लगातार बढ़ते मामलों ने सरकार को नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है दरअसल हाल के आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विभिन्न निकायों से जुड़े मुकदमों में मुख्य सचिव को बार बार पक्षकार बनाया जा रहा है जिससे न केवल प्रशासनिक दबाव बढ़ रहा है बल्कि अनावश्यक कानूनी जटिलताएं भी उत्पन्न हो रही हैं

    इसी स्थिति को देखते हुए अब अफसरों ने तय किया है कि ऐसे मामलों में मुख्य सचिव का नाम हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी इसके तहत अपर मुख्य सचिव प्रमुख सचिव सचिव और कलेक्टर स्तर के अधिकारी संबंधित अदालतों में आवेदन प्रस्तुत कर मुख्य सचिव का नाम विलोपित कराने की पहल करेंगे इस कदम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मुख्य सचिव को सीधे तौर पर नोटिस जारी न हों और प्रशासनिक कार्यों पर अनावश्यक प्रभाव न पड़े

    जानकारी के अनुसार वर्तमान में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में निकायों से जुड़े कई मामले विचाराधीन हैं जिनमें याचिकाकर्ताओं द्वारा मुख्य सचिव को भी पक्षकार बनाया गया है जबकि प्रशासन का मानना है कि मुख्य सचिव किसी एक विभाग के प्रभारी नहीं होते इसलिए उन्हें ऐसे मामलों में शामिल करना उचित नहीं है

    सामान्य प्रशासन विभाग ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सभी विभागों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि जहां भी मुख्य सचिव का नाम पक्षकार के रूप में जोड़ा गया है वहां उसे हटाने की कार्रवाई की जाए अधिकारियों का तर्क है कि इससे न केवल कानूनी प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और सुव्यवस्थित होगी बल्कि जिम्मेदारी भी सीधे संबंधित विभागों तक सीमित रहेगी

    आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2026 में अब तक 38 मामलों में से 9 में मुख्य सचिव को रिसपोंडेंट बनाया गया है जबकि दो मामलों में उनके नाम से अवमानना के प्रकरण भी दर्ज हैं वहीं वर्ष 2025 में कुल 88 मामलों में से 15 में मुख्य सचिव को पक्षकार बनाया गया था ये आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि समय के साथ यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है

    इस पूरी कवायद को प्रशासनिक सुधार और जिम्मेदारियों के स्पष्ट निर्धारण के रूप में देखा जा रहा है माना जा रहा है कि यदि यह रणनीति सफल होती है तो भविष्य में उच्च स्तर के अधिकारियों को अनावश्यक कानूनी उलझनों से राहत मिलेगी और शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगी

  • भोजशाला विवाद में तीन पक्षों की जंग, हिंदू मुस्लिम के बाद जैन समाज की एंट्री, हाईकोर्ट में 2 अप्रैल को सुनवाई

    भोजशाला विवाद में तीन पक्षों की जंग, हिंदू मुस्लिम के बाद जैन समाज की एंट्री, हाईकोर्ट में 2 अप्रैल को सुनवाई


    मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रहा विवाद एक नए और अहम मोड़ पर पहुंच गया है। इस मामले में अब जैन समुदाय की एंट्री ने पूरे प्रकरण को और अधिक जटिल बना दिया है। इंदौर स्थित हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस संबंध में दायर एक नई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार समेत सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को निर्धारित की गई है।

    इस नई याचिका में दावा किया गया है कि भोजशाला परिसर के भीतर प्राचीन जैन मंदिर और गुरुकुल के अवशेष मौजूद हैं। याचिकाकर्ता दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सलेक चंद जैन हैं, जिन्होंने मांग की है कि जैन समुदाय को भी इस स्थान पर पूजा-अर्चना का अधिकार दिया जाए। उनका कहना है कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर इस स्थल का जैन धर्म से भी गहरा संबंध हो सकता है।

    यह पूरा परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई द्वारा संरक्षित है, और इसके धार्मिक स्वरूप को लेकर पहले से ही हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है। अब जैन समुदाय के इस दावे के जुड़ने से मामला और अधिक संवेदनशील और बहुस्तरीय हो गया है।

    भोजशाला विवाद नया नहीं है। हिंदू पक्ष इसे देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है और यहां पूजा-अर्चना के अधिकार की मांग करता है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है और अपने धार्मिक अधिकारों की रक्षा की बात करता है। यह स्थल 11वीं शताब्दी का बताया जाता है, जिसके ऐतिहासिक स्वरूप को लेकर विभिन्न मत मौजूद हैं। अब तक इस मामले से जुड़ी कई याचिकाएं पहले से ही हाईकोर्ट में लंबित हैं।

    अब जैन समुदाय के दावे के बाद इस विवाद में एक और आयाम जुड़ गया है, जिससे यह मामला और भी जटिल हो गया है। अदालत के समक्ष अब तीन अलग-अलग पक्ष अपने-अपने दावे प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की अहमियत और बढ़ गई है।

    हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी करते हुए उनसे विस्तृत जवाब मांगा है। आने वाली सुनवाई में यह तय करने की कोशिश की जाएगी कि इस ऐतिहासिक स्थल का वास्तविक स्वरूप क्या है और किन-किन समुदायों को यहां धार्मिक गतिविधियां करने का अधिकार मिल सकता है।

    यह मामला केवल एक स्थल का विवाद नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा संवेदनशील विषय बन चुका है। अब सभी की नजरें 2 अप्रैल को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस बहुचर्चित मामले में आगे की दिशा तय हो सकती है

  • दिव्यांगों के 22 हजार खाली पदों पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब अगली सुनवाई 15 अप्रैल

    दिव्यांगों के 22 हजार खाली पदों पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब अगली सुनवाई 15 अप्रैल


    जबलपुर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांगों के रिक्त पदों को लेकर सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस डीडी बंसल की एकल पीठ ने शुक्रवार को सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव संजय शुक्ला और मध्य प्रदेश वेयरहाउस एंड लॉजिस्टिक कार्पोरेशन के प्रबंध निदेशक अनुराग वर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने जवाब 15 अप्रैल तक देने का निर्देश दिया है।

    कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से पूछा कि पूर्व आदेश के बावजूद विभिन्न विभागों में दिव्यांगों के रिक्त पद अब तक क्यों नहीं भरे गए। यह मामला करीब 22 हजार खाली पदों का है। कोर्ट ने 30 जनवरी 2024 को दिए गए आदेशों के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

    दरअसल, नरसिंहपुर निवासी दिव्यांग अभ्यर्थी राजेंद्र मेहरा ने याचिका दायर की थी। उन्होंने बताया कि प्रदेश के विभिन्न विभागों में दिव्यांगों के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। इससे पहले भी इसी संबंध में याचिका दायर की गई थी, जिस पर हाईकोर्ट ने रिक्त पद भरने के आदेश दिए थे।

    सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील शिवम त्रिपाठी ने दावा किया कि संबंधित अधिकारी जानबूझकर अदालत के आदेश की अवहेलना कर रहे हैं। उन्होंने इसे अवमानना का मामला बताया। कोर्ट ने प्रमुख सचिव सहित अन्य अधिकारियों को 15 अप्रैल तक जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं।

    अगली सुनवाई में हाईकोर्ट इस बात का जायजा लेगा कि कितने पद भरे गए और किन कारणों से अभी तक रिक्त पदों को भरने में देरी हो रही है। यह मामला दिव्यांगों के अधिकारों और सरकारी जवाबदेही की दिशा में अहम माना जा रहा है।