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  • हिमालय में बार-बार क्यों आती है तबाही? बाढ़, भूस्खलन और भूकंप का कनेक्शन समझिए

    हिमालय में बार-बार क्यों आती है तबाही? बाढ़, भूस्खलन और भूकंप का कनेक्शन समझिए


    काठमांडू।
    नेपाल में बाढ़ और भूस्खलन ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को सामने ला दिया है। खूबसूरत पहाड़ों और घाटियों के लिए पहचाना जाने वाला हिमालय दरअसल प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है। यहां बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, भूकंप और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं समय-समय पर बड़े संकट में बदल जाती हैं।

    लेकिन आखिर हिमालय से सटे इलाकों में आपदाओं का खतरा इतना ज्यादा क्यों है? इसके पीछे भूगर्भीय बनावट, पहाड़ों की ढलान, भारी बारिश और तेजी से बदलती जलवायु जैसे कई कारण एक साथ काम करते हैं।

    भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर है बड़ी वजह

    हिमालय दुनिया की सबसे युवा प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसका निर्माण भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की लगातार टक्कर से हुआ है। खास बात यह है कि दोनों प्लेटों की गति आज भी जारी है।

    इन प्लेटों की लगातार हलचल पृथ्वी के भीतर भूगर्भीय तनाव पैदा करती है। इसी कारण हिमालयी क्षेत्र तकनीकी रूप से बेहद सक्रिय है और यहां भूकंप का खतरा लगातार बना रहता है।

    हिमालय से जुड़े भारत के कई हिस्से भी उच्च भूकंपीय जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं, खासकर भूकंपीय क्षेत्र IV और V में शामिल इलाके।

    पहाड़ों की युवा संरचना क्यों बढ़ाती है खतरा?

    हिमालय की अपेक्षाकृत युवा भूगर्भीय संरचना का एक परिणाम यह भी है कि यहां कई जगह मिट्टी, चट्टान और तलछट अपेक्षाकृत अस्थिर हैं। तेज बारिश होने पर यही सामग्री ढलानों से नीचे खिसकने लगती है।

    इससे भूस्खलन की घटनाएं होती हैं। जब बड़ी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और मलबा अचानक नीचे आता है तो सड़कें, पुल और बस्तियां इसकी चपेट में आ सकती हैं।

    खड़ी ढलानें पानी को बना देती हैं खतरनाक

    हिमालय का भूभाग बेहद खड़ा है। यहां गहरी घाटियां और तीखी ढलानें हैं। भारी बारिश के दौरान पानी पहाड़ों पर ज्यादा देर ठहरने के बजाय तेजी से नीचे की ओर बहता है और संकरी नदी घाटियों में पहुंच जाता है।

    तेज बहाव अपने साथ चट्टान, मिट्टी, पेड़ और दूसरे मलबे को भी बहाकर ले जा सकता है। यही प्रक्रिया अचानक आने वाली बाढ़ को और ज्यादा विनाशकारी बना देती है।

    संकरी घाटियों में पानी का वेग बहुत तेजी से बढ़ सकता है। इसका सीधा असर नदी किनारे बने घरों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे पर पड़ता है।

    जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई मुश्किल

    हिमालय की प्राकृतिक संवेदनशीलता के ऊपर अब जलवायु परिवर्तन का अतिरिक्त दबाव भी पड़ रहा है। हिमालय को कई बार ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है क्योंकि ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर यहां बड़ी मात्रा में बर्फ और ग्लेशियर मौजूद हैं।

    बढ़ते तापमान के कारण कई ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। इसके साथ ही जमी हुई जमीन और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।

    ग्लेशियर की झील फटी तो तबाही और तेज

    ग्लेशियरों के पिघलने से उनके आसपास बनी झीलों का आकार बढ़ सकता है। इन झीलों को रोकने वाली प्राकृतिक बर्फ, चट्टान या मलबे की दीवार अगर पानी के दबाव, भूस्खलन या किसी अन्य वजह से टूट जाए तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बह सकता है।

    इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है।

    ऐसी बाढ़ कुछ ही समय में निचली घाटियों में बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती है। खासकर उन इलाकों में खतरा ज्यादा होता है जहां बस्तियां और बुनियादी ढांचा नदियों के बेहद करीब बना हुआ है।

    बादल फटने से कुछ मिनटों में बदल सकते हैं हालात

    हिमालयी इलाकों में बादल फटना भी अचानक बड़ी आपदा का कारण बन सकता है। इसमें बेहद कम समय में एक छोटे क्षेत्र में बहुत ज्यादा बारिश होती है।

    पहाड़ी इलाकों में इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। अचानक हुई मूसलाधार बारिश एक साथ भूस्खलन, मलबा प्रवाह और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाओं को जन्म दे सकती है।

    नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है और अतिरिक्त पानी का भार पहले से कमजोर पहाड़ी ढलानों को अस्थिर कर सकता है।

    हिमालय में आपदाएं अलग-अलग नहीं, एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं

    हिमालयी क्षेत्रों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यहां एक प्राकृतिक घटना दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है। भारी बारिश से ढलान कमजोर होता है, भूस्खलन नदी का रास्ता रोक सकता है और बाद में जमा पानी अचानक निकलकर बाढ़ ला सकता है। वहीं ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलों के टूटने पर भी निचले इलाकों में अचानक जलप्रलय आ सकता है।

    यानी हिमालय में भूगर्भीय सक्रियता, खड़ी ढलान, अस्थिर चट्टानें, भारी बारिश, ग्लेशियरों में बदलाव और जलवायु परिवर्तन मिलकर आपदा का जोखिम बढ़ाते हैं।

    इसीलिए नेपाल, भारत, भूटान और हिमालय से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, नदी घाटियों में सुरक्षित निर्माण और संवेदनशील इलाकों की लगातार निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

  • हिमालय में बढ़ रहा ग्लेशियर झीलों का खतरा, इसरो अध्ययन में हुआ खुलासा

    हिमालय में बढ़ रहा ग्लेशियर झीलों का खतरा, इसरो अध्ययन में हुआ खुलासा

    नई दिल्ली। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने के साथ ग्लेशियल झीलों का विस्तार और उनसे जुड़े संभावित खतरे को लेकर चिंता बढ़ रही है। वर्ष 2026 में सामने आए उपग्रह आधारित अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया में ग्लेशियर झीलों के कुल क्षेत्रफल में वर्ष 2016-17 के बाद से 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में 676 ग्लेशियल झीलें ऐसी पाई गई हैं, जिनके आकार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इनमें 130 झीलें भारत में स्थित हैं।

    अध्ययन के अनुसार भारत में विस्तार वाली इन झीलों में 65 सिंधु नदी बेसिन, सात गंगा बेसिन और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लेशियल झीलों का विस्तार इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि कुछ झीलें बर्फ, चट्टान या मलबे से बने प्राकृतिक बांधों के पीछे स्थित होती हैं। ऐसे बांध टूटने की स्थिति में अचानक बड़े पैमाने पर पानी नीचे की ओर आने से बाढ़ और तबाही का खतरा पैदा हो सकता है।

    उच्च हिमालयी एशिया में 31,698 ग्लेशियर झीलें

    नए उपग्रह अध्ययन में उच्च हिमालयी एशिया में कुल 31,698 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है। वर्ष 2016-17 के मुकाबले इनके कुल क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि सामने आई है।

    अध्ययन में पूर्वी हिमालय में ग्लेशियर झीलों के विस्तार को विशेष रूप से उल्लेखनीय पाया गया है। इस क्षेत्र में अकेले झीलों का क्षेत्रफल करीब 14.1 वर्ग किलोमीटर बढ़ा है।

    ग्लेशियल झीलें आम तौर पर ग्लेशियरों के पीछे हटने और बर्फ के पिघलने से निकलने वाले पानी के जमा होने से बनती हैं। इनमें से कई झीलें प्राकृतिक रूप से बर्फ, चट्टान या मलबे से बने बांधों से घिरी होती हैं।

    इसरो के पुराने आंकड़े भी दे रहे चेतावनी

    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के उपग्रह आंकड़ों पर आधारित पुराने अध्ययन में भी भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में ग्लेशियल झीलों के विस्तार की तस्वीर सामने आ चुकी है।

    इसरो ने 1984 से अब तक के उपग्रह आंकड़ों के आधार पर 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलों का अध्ययन किया था। इनमें से 676 झीलों के आकार में 1984 के बाद उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

    इन 676 झीलों में 130 भारत में स्थित थीं। अध्ययन के अनुसार इनमें से 601 झीलों का क्षेत्रफल दोगुने से अधिक हो चुका था। यह बदलाव हिमालयी क्षेत्र में जलवायु और ग्लेशियरों में हो रहे परिवर्तन से जुड़े संभावित जोखिम की ओर संकेत करता है।

    26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों पर नजर

    इसरो मानसून के दौरान हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की स्थिति पर लगातार निगरानी कर रहा है। इसके तहत एनएचपीसी की 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद 2,024 ग्लेशियल झीलों की निगरानी की जा रही है।

    उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों की मदद से झीलों के आकार, जलस्तर और आसपास के भूगर्भीय बदलावों पर नजर रखने में मदद मिलती है। इससे संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने और समय रहते चेतावनी व्यवस्था मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।

    ग्लेशियर झीलों के साथ भूस्खलन का खतरा भी

    हिमालय में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार के साथ भूस्खलन का खतरा भी जुड़ा हुआ है। भारी बारिश, चट्टानों का खिसकना और पहाड़ी ढलानों में होने वाले बदलाव कई बार ग्लेशियल झीलों को रोकने वाले प्राकृतिक बांधों पर दबाव बढ़ा सकते हैं।

    इसरो के उपग्रह आधारित आंकड़ों के अनुसार हिमालयी पर्वत श्रृंखला में अब तक 80 हजार से अधिक भूस्खलन के मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

    ग्लेशियर झीलों का बढ़ता विस्तार, प्राकृतिक बांधों की अस्थिरता और भूस्खलन का मेल हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के साथ-साथ जलविद्युत परियोजनाओं और निचले इलाकों के लिए भी जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में उपग्रह निगरानी, समय पर चेतावनी और संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारी को और मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • हिमालय बनने से भी करोड़ों साल पहले यहां था जीवन! तड़ागताल झील में मिले 100-150 करोड़ साल पुराने सबूत

    हिमालय बनने से भी करोड़ों साल पहले यहां था जीवन! तड़ागताल झील में मिले 100-150 करोड़ साल पुराने सबूत

    अल्मोड़ा। उत्तराखंड के चौखुटिया क्षेत्र की तड़ागताल झील से मिले प्राचीन जीवाश्मों ने इस इलाके के भूगर्भीय इतिहास को लेकर वैज्ञानिकों की दिलचस्पी बढ़ा दी है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के सर्वे के दौरान यहां स्ट्रोमैटोलाइट्स के अवशेष मिले हैं। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार, ये अवशेष करीब 100 से 150 करोड़ वर्ष पुराने हो सकते हैं।

    स्ट्रोमैटोलाइट्स को शुरुआती सूक्ष्मजीवन के महत्वपूर्ण प्रमाणों में गिना जाता है। ऐसे में इनका तड़ागताल क्षेत्र में मिलना इस बात का संकेत देता है कि यहां आज से अरबों वर्ष पहले सूक्ष्मजीवों का अस्तित्व रहा होगा।

    झील के विकास के लिए हो रहा था सर्वे

    तड़ागताल झील को पर्यटन और जलस्रोत के रूप में विकसित करने की संभावनाओं को लेकर लगातार सर्वे किए जा रहे हैं। इसी भूगर्भीय अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को झील के आसपास स्ट्रोमैटोलाइट्स की चट्टानें मिलीं।

    वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत कुमार गहलौत के मुताबिक, इन अवशेषों के अध्ययन से उनकी उम्र लगभग 100 से 150 करोड़ वर्ष आंकी गई है। उन्होंने बताया कि स्ट्रोमैटोलाइट्स सूक्ष्मजीवों से जुड़े जीवाश्म हैं और इनका मिलना इस क्षेत्र में प्राचीन सूक्ष्मजीवन की मौजूदगी का संकेत देता है।

    क्या होते हैं स्ट्रोमैटोलाइट्स?

    स्ट्रोमैटोलाइट्स को पृथ्वी पर शुरुआती जीवन के महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक प्रमाणों में माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, शुरुआती दौर में समुद्रों में साइनोबैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव बड़ी संख्या में मौजूद थे। ये सूक्ष्मजीव चिपचिपी परतें बनाते थे। लंबे भूगर्भीय समय में इन परतों के जमा होने से परतदार चट्टानों जैसी संरचनाएं बन गईं, जिन्हें स्ट्रोमैटोलाइट्स कहा जाता है।

    तड़ागताल में इन संरचनाओं का मिलना इसलिए अहम है क्योंकि इनकी उम्र हिमालय के निर्माण से बहुत पहले की बताई जा रही है।

    हिमालय से पहले कैसा था यह इलाका?

    भूवैज्ञानिक इतिहास के मुताबिक हिमालय का निर्माण करीब 5 से 5.5 करोड़ वर्ष पहले भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट की टक्कर के बाद हुआ। इस टक्कर ने धरती की परतों में बड़े बदलाव किए और हिमालयी पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ।

    हिमालय के निर्माण से पहले इस क्षेत्र में टेथिस सागर मौजूद था। टेथिस सागर के बनने की प्रक्रिया लगभग 25 करोड़ वर्ष पहले शुरू हुई मानी जाती है। लेकिन तड़ागताल से मिले स्ट्रोमैटोलाइट्स की अनुमानित उम्र इससे भी कहीं ज्यादा पुरानी है। यानी इन चट्टानों में दर्ज जीवन उस दौर का हो सकता है जब टेथिस सागर भी अस्तित्व में नहीं आया था।

    कुमाऊं की बड़ी झीलों में शामिल है तड़ागताल

    तड़ागताल कुमाऊं क्षेत्र की प्रमुख और बड़ी झीलों में गिनी जाती है। मानसून के दौरान यह पानी से भर जाती है, जबकि सर्दियों में इसका पानी प्राकृतिक रूप से बाहर निकल जाता है। झील के तल में बने पांच प्राकृतिक छिद्रों से पानी रिसकर बाहर निकलता है। पानी निकलने के बाद स्थानीय ग्रामीण झील के तल में गेहूं की खेती भी करते हैं।

    चारों ओर पहाड़ियों से घिरी तड़ागताल प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जानी जाती है। स्थानीय लोग और ताल झील समिति लंबे समय से इसे व्यवस्थित झील और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग कर रहे हैं।

    हिमालय के इतिहास के लिए क्यों अहम है खोज?

    तड़ागताल में मिले स्ट्रोमैटोलाइट्स सिर्फ प्राचीन जीवन की कहानी नहीं बताते, बल्कि इस इलाके के भूगर्भीय अतीत की एक नई कड़ी भी सामने रखते हैं। अगर इन अवशेषों की उम्र और भूगर्भीय संदर्भ आगे के वैज्ञानिक अध्ययनों में भी पुष्ट होते हैं, तो यह खोज हिमालयी क्षेत्र के निर्माण से पहले यहां मौजूद परिस्थितियों को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

  • Hidden Peaks Of India: माउंट एवरेस्ट तो सब जानते हैं, लेकिन देखने लायक हैं भारत की इन 3 चोट‍ियों के व्‍यूज

    Hidden Peaks Of India: माउंट एवरेस्ट तो सब जानते हैं, लेकिन देखने लायक हैं भारत की इन 3 चोट‍ियों के व्‍यूज

    नई दिल्ली । घूमने फ‍िरने का शौक भला क‍िसे नहीं होता है। हर कोई जैसे ही मौका पाता है, वो बैग उठाकर न‍िकल पड़ता है। क‍िसी को पहाड़ों पर जाना पसंद होता है तो कोई बीच पर सुकून भरे पल ब‍िताने जाता है। घूमने से मन को शांत‍ि म‍िलती है। हमारे यहां भारत में ऐसी कई जगहें हैं जहां का नजारा देखने लायक होता है। वहीं ज‍िन लोगों को एडवेंचर पसंद होता है, वो ट्रेक‍िंग जरूर करते हैं।

    जब भी बात भारत की सबसे खूबसूरत चोट‍ियों की बात आती है तो लोगों के मन में केवल उत्तराखंड और ह‍िमाचल प्रदेश का ही ख्‍याल आता है। ये दोनों राज्‍य वाकई में बहुत खूबसूरत हैं, लेक‍िन हम आपको कुछ ऐसी चोटि‍यों के बारे में बता रहे हैं जहां की ट्रेक‍िंगआपको एक बार जरूर करनी चाह‍िए। ऐसा कहा जाता है क‍ि अगर जीते जी आपको स्‍वर्ग के दर्शन करने हैं तो यहां जरूर जाएं। आइए जानते हैं-

    कलसूबाई पीक, महाराष्‍ट्र

    महाराष्‍ट्र की खूबसूरती से तो हम सभी वाक‍िफ हैं। नास‍िक ज‍िले में स्‍थ‍ित कलसूबाई पीक दुन‍िया के सबसे खूबसूरत पीक में से एक है। ये लगभग 5400 फीट की ऊंचाई पर स्‍थ‍ित है। इसकी ट्रेक‍िंग बरी के बेस गांव से शुरू होती है, जहां जाने के ल‍िए लोहे की सीढ़‍ियां, एडवेंचर ट्रे‍क करके पहुंचा जा सकता है। जब आप इसकी पीक पर पहुंचेंगी तो वहां पर आपको द‍िल थाम देने वाले नजारे देखने को मि‍लेंगे। यहां जाने में आपको भले ही कठ‍िनाइयों का सामना करना पड़े, लेक‍िन यहां की खूबसूरती आपका मन मोह लेगी।

    नेत्रावती पीक, कर्नाटक

    ये पीक भी कर्नाटक राज्‍य की सबसे खूबसूरत चोटी है। चोटी तक पहुंचने के ल‍िए आपको लगभग 6 कि‍लोमीटर की ट्रेक‍िंग करनी पड़ेगी। इस दौरान आपको पहाड़ाें पर हरे भरे नजारे देखने को म‍िलेंगे। जब आप इसके टॉप पर पहुंचेंगी तो आपको खूबसूरत नजारे देखने को म‍िलेंगे।

    कुलकुमलाई पीक, तम‍िलनाडु 
    ये पीक भले ही तम‍िलनाडु में है, लेक‍िन इसकी ट्रेक‍िंग की शुरुआत इडुक्‍क‍ि ज‍िले से होती है। यहां का सानराइज देखने लायक होता है। ऐसे में अगर आप सूर्योदय का खूबसूरत नजारा देखना चाहती हैं तो सुबह 3 बजे आपको न‍िकलना पड़ेगा।

    तो अगर आप भी एडवेंचर लवर हैं, तो भारत के ये Hidden Peaks आपको जरूर एक्‍सप्‍लोर करने चाह‍िए। यहां की खूबसूरती आपका मन मोह लेगी। साथ ही अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

  • जनवरी में बर्फबारी का मज़ा: भारत की 7 खूबसूरत और बजट-फ्रेंडली जगहें

    जनवरी में बर्फबारी का मज़ा: भारत की 7 खूबसूरत और बजट-फ्रेंडली जगहें

     सर्दियों में बर्फ और ठंडी हवा का आनंद लेना किसी भी ट्रैवलर का सपना होता है। जनवरी में हिमालय की चोटियों पर बर्फ की सफेद चादर, पहाड़ों की ठंडी हवा और प्रकृति की सुंदरता किसी का भी मन मोह लेती है। अगर आप कम बजट में सफर करना चाहते हैं, तो ये सात जगहें आपके लिए परफेक्ट हैं:

    1. औली (Uttarakhand)
    औली बर्फबारी और स्कीइंग के लिए सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है। यहां चेयर-लिफ्ट और पहाड़ी नज़ारे बेहद खूबसूरत हैं। दिल्ली से ऋषिकेश या हरिद्वार तक सस्ती ट्रेन या बस से आसानी से पहुंचा जा सकता है, वहां से शेयर टैक्सी या बस औली के लिए उपलब्ध हैं। होमस्टे और हॉस्टल बजट ट्रैवलर्स के लिए बेहतरीन विकल्प हैं।

    2. चोपता (Uttarakhand)
    प्रकृति के करीब महसूस करना हो तो चोपता बेस्ट है। जनवरी में यहां बर्फबारी और ट्रेकिंग का मज़ा लिया जा सकता है। ऋषिकेश और हरिद्वार से सस्ती जीप और बसें मिलती हैं। टेंट में ठहरना बजट-फ्रेंडली और रोमांचक अनुभव देता है।

    3. कुल्लू-मनाली (Himachal Pradesh)
    सोलंग वैली और रोहतांग पास बर्फबारी के लिए मशहूर हैं। दिल्ली से HRTC की सस्ती बसें आसानी से मिल जाती हैं। बजट 5000 रुपये के अंदर हो तो डॉर्मिटरी, होस्टल और बजट होटल सबसे अच्छे विकल्प हैं।

    4. शिमला (Himachal Pradesh)
    शिमला का जादू सर्दियों में अलग ही होता है। कुफरी में जनवरी में जबरदस्त बर्फबारी होती है। चंडीगढ़ और दिल्ली से बस या ट्रेन आसानी से मिल जाती है। कालका से शिमला तक की टॉय ट्रेन यात्रा को और खास बनाती है। आसपास के गांवों में रहकर खर्च कम किया जा सकता है।

    5. गुलमर्ग (Jammu & Kashmir)
    असली कड़क ठंड और गहरी बर्फ का अनुभव चाहिए तो गुलमर्ग परफेक्ट है। यहां की सुंदरता फिल्मी सीन जैसी लगती है। स्नो स्कीइंग, स्नोबोर्डिंग और गोंडोला केबल कार इसकी खासियत हैं। जनवरी में यह भारत की सबसे ठंडी और खूबसूरत बर्फबारी वाली जगहों में गिना जाता है।

    6. मसूरी (Uttarakhand)
    मसूरी का मौसम जनवरी में किसी जन्नत से कम नहीं लगता। बर्फ से ढकी सड़कों पर घूमना बेहद शांत और रोमांचक अनुभव देता है। केम्प्टी फॉल्स, कंपनी गार्डन, मॉल रोड, लेक मिस्ट और मॉस्सी फॉल्स घूमने लायक हैं। बजट में रहने के लिए कई किफायती होटल और होमस्टे उपलब्ध हैं।

    7. तवांग (Arunachal Pradesh)
    तवांग बर्फबारी और ठंड के लिए प्रसिद्ध है। जनवरी में बर्फ की मोटी परतें और सेला पास, माधुरी झील, नूरानांग फॉल्स यहां की खास पहचान हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े बौद्ध मठों में से एक का घर भी है। जनवरी–फरवरी यहां घूमने का सबसे बेहतरीन समय है।

    जनवरी में इन जगहों पर जाकर आप बर्फबारी का मज़ा, रोमांच और सुकून एक साथ ले सकते हैं। ये सभी डेस्टिनेशन बजट-फ्रेंडली होने के साथ प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर हैं।