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  • कविता से सिनेमा और दर्शन तक होगी चर्चा, इंदौर के वाणी साहित्य उत्सव में जुटेंगे दिग्गज रचनाकार

    कविता से सिनेमा और दर्शन तक होगी चर्चा, इंदौर के वाणी साहित्य उत्सव में जुटेंगे दिग्गज रचनाकार


    इंदौर । इंदौर में शुक्रवार को वाणी साहित्य उत्सव के जरिए साहित्य और कला की विविध विधाओं का संगम देखने को मिलेगा। इस आयोजन में कविता कहानी अनुवाद सिनेमा और दर्शन से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जाएगी। दिनभर चलने वाले अलग-अलग सत्रों में साहित्यकारों फिल्म निर्माताओं और रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े लोगों को अपने विचार रखने का अवसर मिलेगा। कार्यक्रम की शुरुआत सुबह कविता कुंभ और ओपन माइक से होगी जबकि शाम को मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी को समर्पित मुशायरा आयोजित किया जाएगा। इस दौरान पुस्तकों का लोकार्पण भी होगा।

    उत्सव का पहला प्रमुख आयोजन सुबह 9 से 11 बजे तक वाणी कविता कुंभ और मुशायरा ओपन माइक के रूप में होगा। इसका संचालन प्रतीक शर्मा करेंगे। इस मंच पर कविता और शायरी में रुचि रखने वाले प्रतिभागियों को अपनी रचनाएं प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। इसके बाद सुबह 11 से दोपहर 12 बजे तक ज्ञान के नवोन्मेष का वाणी साहित्य विषय पर संवाद होगा। इसमें शम्भूनाथ गरिमा श्रीवास्तव और राधावल्लभ त्रिपाठी शामिल होंगे। इस सत्र का संचालन प्रियंका दुबे करेंगी।

    इस आयोजन का एक खास आकर्षण फ्रांज काफ्का की प्रसिद्ध पुस्तक द ट्रायल का हिंदी अनुवाद होगा। गरिमा श्रीवास्तव ने इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद किया है। इसका लोकार्पण विकास दवे करेंगे। काफ्का की यह रचना विश्व साहित्य की चर्चित कृतियों में शामिल है। हिंदी पाठकों के लिए इसका नया अनुवाद उपलब्ध होना साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दोपहर 12 से 1 बजे तक बच्चों के लिए विशेष कहानी कार्यशाला आयोजित की जाएगी। वाणी त्रिपाठी टिक्कू बच्चों का मौजघर नाम से इस कार्यक्रम का संचालन करेंगी। इसका उद्देश्य बच्चों को कहानी सुनने और अपनी कल्पनाशीलता को रचनात्मक रूप देने का अवसर देना है।

    दोपहर 2 से 3 बजे तक महिला फिल्म निर्माताओं और उनकी अनकही कहानियों पर चर्चा होगी। द रिवोल्यूशनरीज वुमन क्रिएटिंग वुमन स्टोरीज अनटोल्ड नाम के इस सत्र में मोनिशा आडवाणी और मधु भोजवानी बातचीत करेंगी। इसका संचालन वाणी त्रिपाठी टिक्कू करेंगी। इसके बाद दोपहर 3 से 4 बजे तक गुलमेंहदी की झाड़ियां सम्मोहक सरोवर में सत्र आयोजित होगा। इसमें कहानीकार तरुण भटनागर की रचनाओं पर उदय प्रकाश और विवेक चतुर्वेदी के साथ चर्चा होगी। संचालन हरि भटनागर करेंगे।

    शाम 4 से 5 बजे तक रामेश्वर राय का सत्र माट सा’ब की कक्षा आयोजित होगा। इसका संचालन अदिति माहेश्वरी करेंगी। शाम 5 से 6 बजे तक बुद्ध आध्यात्मिक घटना या दुर्घटना विषय पर संवाद होगा। इसमें ओमा द अक् और कृतिका देसाई विचार साझा करेंगे।

    दिन का प्रमुख साहित्यिक आकर्षण शाम 6 से 7 बजे तक होने वाला मुशायरा रहेगा। यह शीन काफ़ निज़ाम की छाया में आयोजित होगा और रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी को समर्पित रहेगा। इसमें माधव कौशिक ओमा द अक् सतलज राहत इंदौरी और सुनील अटोलिया कालू शामिल होंगे। इसके साथ ही इश्क़ के सात पड़ाव पुस्तक का लोकार्पण भी होगा। इस सत्र में प्रिया मालिक और अदिति माहेश्वरी शामिल रहेंगी तथा संचालन सौम्या कुलश्रेष्ठ करेंगी।

    कुल मिलाकर वाणी साहित्य उत्सव में एक ही दिन के भीतर कविता कहानी अनुवाद सिनेमा और दर्शन के कई पहलुओं पर विचार-विमर्श होगा। यह आयोजन साहित्य प्रेमियों और नए लेखकों के लिए रचनात्मक संवाद का मंच बनेगा।

  • जबलपुर में साहित्य संवाद में भाषा और समाज के बदलते रिश्तों पर मंथन महाभोज और राग दरबारी के किरदारों ने खींचा ध्यान

    जबलपुर में साहित्य संवाद में भाषा और समाज के बदलते रिश्तों पर मंथन महाभोज और राग दरबारी के किरदारों ने खींचा ध्यान


    जबलपुर । जबलपुर में हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित साहित्य संवाद में भाषा और समाज के बदलते रिश्तों पर गंभीर चर्चा हुई। कार्यक्रम में साहित्यकारों और इतिहासकारों ने इस बात पर विचार रखा कि समय के साथ समाज की सोच उसकी परिस्थितियां और जीवनशैली बदलती रहती है और इन बदलावों का सीधा असर भाषा और साहित्य पर भी दिखाई देता है। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है बल्कि वह अपने समय के समाज की तस्वीर भी सामने रखता है। किसी दौर को समझने के लिए उस दौर में लिखे गए साहित्य को पढ़ना बेहद जरूरी है।

    संवाद के दौरान हिंदी साहित्य की चर्चित रचनाओं और उनके यादगार किरदारों को भी चर्चा के केंद्र में रखा गया। मन्नू भंडारी के उपन्यास महाभोज के दा साहब और श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी के रूपन बाबू जैसे पात्रों का उदाहरण देते हुए वक्ताओं ने बताया कि साहित्य में गढ़े गए किरदार केवल कहानी का हिस्सा नहीं होते बल्कि वे अपने समय की सामाजिक व्यवस्था राजनीतिक परिस्थितियों और लोगों की मानसिकता को भी सामने लाते हैं। इन पात्रों के जरिए उस दौर के समाज में मौजूद जटिलताओं और बदलावों को समझने का अवसर मिलता है।

    कार्यक्रम में साहित्य और लेखन के लिए पढ़ने की आदत को बेहद महत्वपूर्ण बताया गया। साहित्यकारों ने कहा कि बेहतर लेखन केवल शब्दों को जोड़ने से नहीं आता बल्कि इसके लिए लगातार पढ़ना और अलग अलग विषयों को समझना जरूरी है। किताबें व्यक्ति को नई जानकारी देने के साथ उसके विचारों को विस्तार देती हैं। पढ़ने से भाषा समृद्ध होती है और किसी विषय को देखने का नजरिया भी व्यापक होता है। यही कारण है कि पुराने साहित्य और क्लासिक किताबों की उपयोगिता आज के दौर में भी बनी हुई है।

    वक्ताओं ने मौजूदा दौर में सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव पर भी चर्चा की। उन्होंने माना कि इन माध्यमों ने कहानी और घटनाओं को देखने और समझने का तरीका काफी बदल दिया है। विजुअल माध्यम किसी घटना या कहानी को तुरंत सामने ला सकते हैं लेकिन किताबें पाठक को उसके भीतर उतरकर सोचने और परिस्थितियों को अलग नजरिए से समझने का अवसर देती हैं। साहित्य के माध्यम से समाज की बारीकियों को जिस गहराई से महसूस किया जा सकता है वह केवल दृश्य माध्यमों से हमेशा संभव नहीं होता।

    साहित्य संवाद में युवाओं की भागीदारी भी देखने को मिली। युवाओं ने साहित्यकारों और इतिहासकारों के साथ हिंदी साहित्य की किताबों कहानियों और चर्चित पात्रों को लेकर बातचीत की। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि पुराने साहित्य में दिखाई देने वाला समाज आज के दौर से किस तरह अलग है और किन परिस्थितियों में बदलाव आया है। संवाद के दौरान साहित्य को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने पर भी विचार हुआ।

    वक्ताओं ने कहा कि समय बदलने के बावजूद अच्छा साहित्य अपनी प्रासंगिकता नहीं खोता। कई दशक पहले लिखी गई किताबें आज भी पाठकों को प्रभावित करती हैं क्योंकि उनमें समाज और मनुष्य के व्यवहार से जुड़े ऐसे सवाल मौजूद होते हैं जो समय के साथ खत्म नहीं होते। साहित्य पुरानी पीढ़ियों के अनुभवों से जोड़ने के साथ वर्तमान को समझने की दृष्टि भी देता है। इसलिए भाषा और साहित्य को मजबूत बनाए रखने के लिए पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी है।

  • पद्मश्री प्रख्यात साहित्यकार कैलाश चंद्र पंत पंचतत्व में विलीन, भोपाल के भदभदा घाट पर हुआ अंतिम संस्कार

    पद्मश्री प्रख्यात साहित्यकार कैलाश चंद्र पंत पंचतत्व में विलीन, भोपाल के भदभदा घाट पर हुआ अंतिम संस्कार


    भोपाल। हिंदी साहित्य जगत के वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और कैलाश चंद्र पंत का शनिवार को पूरे राजकीय सम्मान और श्रद्धा के साथ भोपाल के भदभदा विश्राम घाट पर अंतिम संस्कार किया गया। उनका शुक्रवार, 31 जुलाई 2026 को भोपाल स्थित निवास पर हृदय गति रुकने से निधन हो गया था। वे 90 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे।

    परिवार की ओर से उनके छोटे भाई चंद्रशेखर पंत ने उनके निधन की जानकारी देते हुए बताया कि कैलाश चंद्र पंत ‘दादा’ ने अंतिम सांस अपने भोपाल स्थित निवास पर ली। उन्होंने बताया कि अंतिम संस्कार शनिवार को भदभदा विश्राम घाट पर संपन्न हुआ।

    मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पंत के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति सहित अनेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य की उल्लेखनीय सेवा की। उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।

    उत्तराखंड से था पैतृक संबंध
    कैलाश चंद्र पंत का पैतृक गांव उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का खंतोली था। उनका जन्म 26 अप्रैल 1936 को मध्य प्रदेश के महू (इंदौर) में हुआ था। उनके पिता लीलाधर पंत और माता हरिप्रिया पंत रोजगार के सिलसिले में मध्य प्रदेश में आकर बस गए थे।

    उन्होंने अपने शैक्षणिक और साहित्यिक जीवन में इंदौर स्थित यूनियन थियोलॉजिकल सेमिनरी में व्याख्याता तथा भोपाल के पंचायत राज प्रशिक्षण केंद्र में प्राचार्य के रूप में सेवाएं दीं। इसके अलावा वे ‘शिक्षा प्रदीप’, ‘जनधर्म’ और ‘दूरगामी आह्वान’ जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन से भी जुड़े रहे।

    इसी वर्ष मिला था पद्मश्री सम्मान
    हिंदी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2026 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। वे हिंदी भवन, भोपाल के संचालक रहे और भारत कृषक समाज, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति तथा मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति जैसी संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।

    उनकी चर्चित कृतियों में ‘कौन किसका आदमी’, ‘धुंध के आर-पार’, ‘शब्द का विचार-पथ’ और ‘शैलेश मटियानी: सृजन यात्रा’ शामिल हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें साहित्य भूषण सम्मान, निराला साहित्य सम्मान, साहित्य शिरोमणि सम्मान और संस्कृति गौरव सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था।

  • ‘हम लोग’ और ‘बुनियाद’ का जादू: मनोहर श्याम जोशी की कलम की ताकत

    ‘हम लोग’ और ‘बुनियाद’ का जादू: मनोहर श्याम जोशी की कलम की ताकत


    नई दिल्ली :1980 के दशक में जब भारतीय टेलीविजन अपने शुरुआती दौर में था, तब एक शो ने हर घर की दुनिया बदल दी। उसका नाम था ‘हम लोग’। झल्लाहट भरे बसेसर राम से लेकर भगवंती का त्याग और अंत में दादामुनि यानी अशोक कुमार की सूत्रधार वाली भूमिका तक, इस धारावाहिक ने दर्शकों के दिलों में घर कर लिया। इस जादू को संभव बनाने वाले लेखक कोई और नहीं बल्कि मनोहर श्याम जोशी थे।

    9 अगस्त 1933 को अजमेर में जन्मे जोशी की जड़ें उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सुसंस्कृत कुमाऊंनी ब्राह्मण परिवार में थीं। दिलचस्प बात यह है कि इस हिंदी साहित्य के पुरोधा ने अपने करियर की शुरुआत विज्ञान से की। लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी करने वाले जोशी की सोच में तार्किकता और विश्लेषण का वो दम था जो बाद में उनके साहित्य में नजर आया। उनका लेखन भावनाओं का रुदन नहीं बल्कि समाज का सर्जिकल विश्लेषण पेश करता था।

    लखनऊ में उनकी मुलाकात हिंदी साहित्य के दिग्गज अमृतलाल नागर से हुई। नागर के मार्गदर्शन में उन्होंने सीखा कि महान साहित्य वह है जो सीधे आम आदमी के दिल तक पहुंचे। यहीं से मनोहर श्याम जोशी के भीतर ‘किस्सागो’ की आत्मा जन्मी।

    लेखक बनने से पहले वे पत्रकार थे। ऑल इंडिया रेडियो में काम करते हुए उन्होंने आवाज की शक्ति को महसूस किया और फिल्म्स डिवीजन में वृत्तचित्र लिखते हुए सिनेमाई दृष्टि पाई। साहित्यकार अज्ञेय ने उन्हें ‘दिनमान’ पत्रिका का सहायक संपादक बनाया। इसके बाद जब वे ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादक बने, तो हिंदी पट्टी के हर घर में उनकी लेखनी की मौजूदगी महसूस होने लगी।

    1984 में आए 154 एपिसोड तक चलने वाले ‘हम लोग’ ने उन्हें भारतीय सोप ओपेरा का जनक बना दिया। अगर ‘हम लोग’ टीवी का रामायण था, तो 1986 में आई ‘बुनियाद’ उसका महाभारत थी। भारत-पाकिस्तान विभाजन की पीड़ा और विस्थापन को उन्होंने मास्टर हवेलीराम और लाजो की कहानी के माध्यम से जिस शिद्दत से पेश किया, उसने पूरे देश को रुला दिया। निर्देशक रमेश सिप्पी ने भी माना कि ‘बुनियाद’ की सफलता की असली बुनियाद मनोहर श्याम जोशी की कलम ही थी।

    इसके बाद उन्होंने ‘कक्काजी कहिन’, ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ और कई अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से टीवी पर व्यंग्य, हास्य और मनोवैज्ञानिक गहराई का अनोखा मिश्रण पेश किया। उनकी शैली हमेशा पारंपरिक व्याकरण और शब्दों की सीमाओं को चुनौती देती रही।

    उनका पहला उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ (1980) साहित्य जगत में तहलका मचा गया। ‘कसप’ और ‘क्याप’ जैसे उपन्यासों ने उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलाया। उनके उपन्यासों में सिनेमा का असर भी साफ दिखाई देता है; कैमरा, साइलेंट शॉट और म्यूट फेस जैसे शब्दों से पाठक मानो फिल्म देख रहे हों। कमल हासन की फिल्म ‘हे राम’ के हिंदी संवाद भी उनकी ही देन हैं।

    30 मार्च 2006 को 72 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में मनोहर श्याम जोशी ने अंतिम सांस ली। लेकिन उनके साहित्य और टीवी के योगदान ने हिंदी सिनेमा और टेलीविजन को एक नई दिशा दी, और उन्हें ‘किस्सागोई’ का उस्ताद बना दिया।