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  • 2026 का दुर्लभ पंचांग संयोग: दो ज्येष्ठ मास, लेकिन नौतपा देगा सिर्फ एक बार प्रचंड गर्मी

    2026 का दुर्लभ पंचांग संयोग: दो ज्येष्ठ मास, लेकिन नौतपा देगा सिर्फ एक बार प्रचंड गर्मी



    नई दिल्ली(New Delhi)।
     साल 2026 हिंदू पंचांग के लिहाज से बेहद दुर्लभ और चर्चा में रहने वाला वर्ष माना जा रहा है। इस बार अधिक मास (मलमास) के कारण ज्येष्ठ मास दो बार पड़ने वाला है, जिससे लोगों के बीच यह सवाल तेज हो गया है कि क्या नौतपा भी दो बार पड़ेगा और क्या गर्मी पिछले वर्षों से कहीं ज्यादा खतरनाक हो जाएगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह स्थिति पंचांगीय दृष्टि से विशेष जरूर है, लेकिन इसका असर नौतपा पर अलग तरीके से ही देखने को मिलेगा।

    ज्येष्ठ मास दो बार, लेकिन नौतपा नहीं होगा डबल
    ज्योतिष विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि 2026 में ज्येष्ठ मास भले ही दो बार आए, लेकिन नौतपा केवल एक बार ही पड़ेगा। इसका कारण यह है कि नौतपा का संबंध महीनों से नहीं बल्कि सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश से होता है। सूर्य वर्ष में एक बार ही रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है और इसी अवधि में शुरुआती 9 दिन “नौतपा” कहलाते हैं। इसलिए पंचांग में बदलाव होने के बावजूद नौतपा की संख्या नहीं बदलती।

    कब पड़ेगा नौतपा और कितना रहेगा असर
    गणनाओं के अनुसार 2026 में नौतपा 25 मई से शुरू होकर 2 जून तक रहने की संभावना है। इस अवधि को उत्तर और मध्य भारत में सबसे अधिक गर्म माना जाता है। इस दौरान सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं, जिससे तापमान तेजी से बढ़ता है।

    मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस दौरान कई क्षेत्रों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जा सकता है, जबकि कुछ स्थानों पर यह 48 से 50 डिग्री तक भी पहुंच सकता है। तेज धूप के साथ लू (Heatwave) का असर भी बढ़ेगा, जिससे लोगों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होगी।

    2026 का नौतपा क्यों माना जा रहा है खास
    ज्योतिषीय दृष्टि से 2026 का नौतपा एक और कारण से विशेष माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि इस अवधि में दो मंगलवार भी पड़ेंगे, जिसे ज्योतिषीय दृष्टि से “अग्नि तत्व” से जुड़ा माना जाता है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से इसका तापमान पर सीधा प्रभाव साबित नहीं है, लेकिन परंपरागत मान्यताओं में इसे गर्मी की तीव्रता बढ़ाने वाला योग माना जाता है।

    मानसून से भी जुड़ी है मान्यता
    भारतीय परंपराओं में नौतपा को मानसून की तैयारी का संकेत भी माना जाता है। माना जाता है कि इस दौरान तेज गर्मी से लो प्रेशर सिस्टम बनता है, जो आगे चलकर मानसून को सक्रिय करने में मदद करता है। इसलिए नौतपा को सिर्फ गर्मी का समय नहीं बल्कि मौसम परिवर्तन का महत्वपूर्ण चरण भी माना जाता है।

    कुल मिलाकर 2026 का वर्ष पंचांग और मौसम दोनों दृष्टि से खास रहने वाला है। ज्येष्ठ मास के दो बार आने से जहां यह साल अनोखा बन रहा है, वहीं नौतपा अपने तय नियमों के अनुसार केवल एक बार ही भीषण गर्मी का असर दिखाएगा। इस दौरान लोगों को धूप, लू और डिहाइड्रेशन से बचाव के लिए विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी जा रही है।

  • अधिक मास 2026: 15 जून तक थमेंगे शुभ कार्य, जानें क्यों इसे कहा जाता है ‘पुरुषोत्तम मास’

    अधिक मास 2026: 15 जून तक थमेंगे शुभ कार्य, जानें क्यों इसे कहा जाता है ‘पुरुषोत्तम मास’



    नई दिल्ली(New Delhi)। सनातन परंपरा में समय को केवल तारीखों का क्रम नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसी परंपरा में एक विशेष अवधि होती है जिसे अधिक मास कहा जाता है, जो इस वर्ष 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा। इसे अधिक ज्येष्ठ मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 30 दिनों तक चलने वाले इस अतिरिक्त महीने में शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और नामकरण जैसे संस्कार इस अवधि में नहीं किए जाते। माना जाता है कि इस समय किए गए सांसारिक कार्य अपेक्षित शुभ फल नहीं देते।

    अधिक मास का आधार हिंदू पंचांग की खगोल गणना में छिपा है। सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का होता है। दोनों के बीच हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर बनता है, जो तीन वर्षों में लगभग 33 दिनों तक पहुंच जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब यह अतिरिक्त महीना अस्तित्व में आया तो किसी भी देवता ने इसे स्वीकार नहीं किया। सभी महीनों के अपने-अपने अधिपति थे, लेकिन इस अतिरिक्त मास का कोई स्वामी नहीं था। दुखी होकर यह मास भगवान विष्णु के पास पहुंचा, जहां उन्होंने इसे “पुरुषोत्तम मास” का नाम दिया और इसे अपना संरक्षण प्रदान किया। तभी से यह महीना विशेष और अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, यह समय सांसारिक कार्यों की बजाय आत्मिक उन्नति और साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस अवधि में पूजा-पाठ, जप, तप, दान और व्रत को अत्यधिक फलदायी बताया गया है। वहीं व्यापार, निवेश या नए कार्यों की शुरुआत से बचने की सलाह दी जाती है।

    शास्त्रों में वर्णन है कि इस मास में किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है। इसलिए इसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है, जहां भक्ति और आत्मचिंतन को सर्वोच्च महत्व दिया गया है।

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  • भगवान शिव की आराधना का विशेष दिन: मासिक शिवरात्रि पर व्रत और पूजा का महत्व

    भगवान शिव की आराधना का विशेष दिन: मासिक शिवरात्रि पर व्रत और पूजा का महत्व


    नई दिल्ली । मई महीने की मासिक शिवरात्रि को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है, जो भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना का अत्यंत शुभ दिन माना जाता है।

    पंचांग के अनुसार मई 2026 की मासिक शिवरात्रि 14 मई 2026 को मनाई जाएगी। चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 13 मई की रात से होगी और इसका समापन अगले दिन तक रहेगा। इस दिन भक्त व्रत रखकर भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना करेंगे और मंदिरों में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक तथा भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाएगा।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव की उपासना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। विशेष रूप से जो श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और पूरी श्रद्धा से शिवजी की पूजा करते हैं, उन्हें सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

    इस दिन पूजा का विशेष महत्व निशिता काल में माना गया है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार मध्य रात्रि का समय भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे शुभ होता है। इसी समय शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग अर्पित करने की परंपरा है।

    व्रत रखने वाले श्रद्धालु सुबह स्नान कर संकल्प लेते हैं और पूरे दिन उपवास रखते हैं। इसके बाद ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप और शिव चालीसा का पाठ किया जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य लाती है।

    मंदिरों में इस दिन विशेष सजावट की जाती है और भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। कई स्थानों पर रात्रि जागरण और भजन संध्या का भी आयोजन किया जाता है।

  • वैशाख अमावस्या पर रहेगा पंचक का प्रभाव, रखें विशेष सावधानी, भूलकर भी न करें ये काम

    वैशाख अमावस्या पर रहेगा पंचक का प्रभाव, रखें विशेष सावधानी, भूलकर भी न करें ये काम


    नई दिल्ली। अमावस्या तिथि पितरों की पूजा और आत्मिक शुद्धि के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन स्नान और दान करने से पुण्य लाभ प्राप्त होता है। लेकिन इस बार वैशाख अमावस्या पर पंचक का प्रभाव भी रहेगा, जिससे यह समय ज्योतिषीय दृष्टि से अधिक संवेदनशील माना जा रहा है। मान्यताओं के अनुसार इस दौरान की गई गलतियां जीवन में बाधाएं, अशांति और परेशानियां बढ़ा सकती हैं।

    17 अप्रैल को अमावस्या, पहले से चल रहे हैं पंचक

    17 अप्रैल 2026 को वैशाख अमावस्या मनाई जाएगी। पंचक 13 अप्रैल 2026 की तड़के सुबह से शुरू होकर 17 अप्रैल को दोपहर 12:02 बजे समाप्त होंगे। ऐसे में अमावस्या का स्नान-दान और पितृ कर्म पंचक के प्रभाव में संपन्न होंगे।

    इन कार्यों से बचना माना गया आवश्यक
    ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में कुछ कार्यों से बचना बेहद जरूरी है। जैसे कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन या जनेऊ जैसे मांगलिक कार्य टालने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा दक्षिण दिशा की यात्रा से बचना भी शुभ माना गया है।

    लकड़ी, निर्माण और खरीदारी में बरतें सावधानी
    पंचक के दौरान लकड़ी या ज्वलनशील वस्तुओं की खरीदारी से बचने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा पलंग या बिस्तर जैसी वस्तुएं खरीदना भी अशुभ माना जाता है। इसी तरह घर के निर्माण की शुरुआत या छत डालने का काम भी इस समय नहीं करना चाहिए।

    रात के समय विशेष सतर्कता बरतने की सलाह

    अमावस्या की रात को नकारात्मक शक्तियों की सक्रियता की मान्यता के चलते सुनसान जगहों पर जाने से बचने की सलाह दी गई है। साथ ही बुजुर्गों और पितरों के सम्मान का विशेष ध्यान रखने की बात कही गई है, क्योंकि इस दिन इसका उल्लंघन अत्यंत अशुभ माना जाता है।

    शुभ फल पाने के लिए किए जाने वाले उपाय
    इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण और दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है। पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाना और गंगाजल का छिड़काव करना भी सकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं से बचाव के उपाय के रूप में बताया गया है।

  • खरमास 2026: 15 मार्च से 14 अप्रैल तक मांगलिक कार्यों पर विराम, जानिए धार्मिक मान्यता, महत्व और क्या करना माना जाता है शुभ

    खरमास 2026: 15 मार्च से 14 अप्रैल तक मांगलिक कार्यों पर विराम, जानिए धार्मिक मान्यता, महत्व और क्या करना माना जाता है शुभ


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म और ज्योतिष में समय और ग्रहों की स्थिति को विशेष महत्व दिया गया है। इन्हीं ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर वर्ष में दो बार आने वाले खरमास को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में खरमास की शुरुआत 15 मार्च से होने जा रही है और यह अवधि 14 अप्रैल तक रहेगी। इस दौरान विवाह गृह प्रवेश मुंडन कर्ण छेदन जैसे कई मांगलिक कार्यों पर परंपरागत रूप से विराम लग जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय किए गए शुभ कार्य अपेक्षित फल नहीं देते इसलिए लोगों को इन्हें टालने की सलाह दी जाती है।

    ज्योतिषीय गणना के अनुसार 14 मार्च की रात 1 बजकर 8 मिनट के बाद सूर्य देव कुंभ राशि से निकलकर मीन राशि में प्रवेश करेंगे। जब सूर्य देव बृहस्पति की राशि यानी धनु या मीन में प्रवेश करते हैं तो उनकी स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है। इसी कारण इस अवधि को खरमास कहा जाता है और इस दौरान मांगलिक कार्यों को शुभ नहीं माना जाता। इस बार मीन संक्रांति के साथ शुरू होने वाला खरमास 14 अप्रैल को समाप्त होगा जब सूर्य देव सुबह 9 बजकर 31 मिनट पर मेष राशि में प्रवेश करेंगे। इसके साथ ही मांगलिक कार्यों पर लगा विराम भी समाप्त हो जाएगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार खरमास में विवाह गृह प्रवेश नए घर के निर्माण की शुरुआत मुंडन संस्कार और कर्ण छेदन जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। मान्यता है कि इस समय शुरू किए गए दीर्घकालिक कार्यों में बाधाएं आ सकती हैं या अपेक्षित सुख समृद्धि नहीं मिलती। यही कारण है कि लोग इस अवधि में नया व्यवसाय शुरू करने या बड़े निवेश करने से भी बचते हैं। हालांकि यह समय पूरी तरह निष्क्रिय रहने का नहीं माना जाता बल्कि इसे आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत श्रेष्ठ बताया गया है।

    खरमास के दौरान दान पुण्य जप तप पूजा पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस अवधि में किए गए दान का फल कई गुना अधिक मिलता है। ब्राह्मणों गुरुजनों गायों और साधु संतों की सेवा करना भी पुण्यदायी माना गया है। इसके अलावा तीर्थ यात्रा करना धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना और भगवान के नाम का स्मरण करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।

    खरमास से जुड़ी एक प्रचलित कथा भी बताई जाती है। कथा के अनुसार सूर्य देव अपने सात घोड़ों के रथ पर सवार होकर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं। लगातार चलते रहने से उनके घोड़े थक जाते हैं और प्यास से व्याकुल हो जाते हैं। ऐसे में सूर्य देव उन्हें विश्राम देने के लिए रथ को एक तालाब के पास रोकते हैं और घोड़ों को पानी पिलाते हैं। इस दौरान रथ को चलाने के लिए वे दो ‘खर’ यानी गधों को रथ में जोड़ देते हैं।

    गधों की गति धीमी होने के कारण रथ की चाल भी धीमी हो जाती है लेकिन इस बीच सूर्य के घोड़े आराम कर लेते हैं। इसी कारण इस अवधि को खरमास कहा जाता है और मान्यता है कि इस समय सूर्य के घोड़े विश्राम करते हैं। इस प्रकार धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से खरमास का समय भले ही मांगलिक कार्यों के लिए उपयुक्त न माना जाता हो लेकिन इसे आध्यात्मिक साधना दान पुण्य और भगवान की भक्ति के लिए अत्यंत पवित्र और फलदायी समय माना गया है।