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  • चौथा बड़ा मंगल आज, हनुमान जी की आराधना का विशेष दिन, जाने पूजा-व्रत और मांगलिक दोष से राहत के उपाय

    चौथा बड़ा मंगल आज, हनुमान जी की आराधना का विशेष दिन, जाने पूजा-व्रत और मांगलिक दोष से राहत के उपाय


    नई दिल्‍ली । ज्‍येष्‍ठ अधिकमास चल रहा है, इसके मंगलवार बहुत खास होते हैं. बड़ा मंगल का व्रत रखना, हनुमान जी की पूजा करना और उपाय करना बहुत लाभ देगा. इससे तमाम तरह की समस्‍याओं का अंत होता है और जीवन में सुख-सम‍ृद्धि आती है.

    जिन लड़के-लड़कियों को मंगल दोष है, वो बड़ा मंगल के दिन गुड़, चने, लाल मसूर की दाल दान करें. ऐसा करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होंगी. साथ ही चौथे बड़ा मंगल पर सुंदरकांड का पाठ करें. यहां देखिए आज की तिथि, योग, नक्षत्र, राहुकाल समेत पूरा पंचाग.
    जिन लड़के-लड़कियों को मंगल दोष है, वो बड़ा मंगल के दिन गुड़, चने, लाल मसूर की दाल दान करें. ऐसा करने से विवाह में आ रही बाधाएं दूर होंगी. साथ ही चौथे बड़ा मंगल पर सुंदरकांड का पाठ करें. यहां देखिए आज की तिथि, योग, नक्षत्र, राहुकाल समेत पूरा पंचाग.

    26 मई 2026 का पंचांग
    आज की तिथि – सुबह 05:11 बजे से ज्‍येष्‍ठ शुक्‍ल एकादशी तिथि प्रारंभ होगी, जो अगले दिन 27 मई तक रहेगी. लिहाजा एकादशी तिथि का व्रत 27 मई को रखा जाएगा.

    आज का वार – मंगलवार.
    आज के ग्रह गोचर – आज चंद्रमा कन्‍या राशि में गोचर करेंगे.
    आज का नक्षत्र – 26 मई 04:08 बजे से हस्‍त नक्षत्र रहेगा और पूरा दिन रहेगा.
    आज के योग – 03:15 बजे से सिद्धि योग प्रारंभ होगा और पूरे दिन रहेगा.

    सूर्य व चंद्रमा का समय
    सूर्योदय – सुबह 05:46 बजे
    सूर्यास्त – शाम 07:01 बजे
    चन्द्रोदय – दोपहर 02:54 बजे
    चन्द्रास्त – 26 व 27 मई की तड़के सुबह 02:46 बजे
    (शहर के हिसाब से उदय व अस्त के समय में कुछ मिनट या सेकेंड का अंतर देखा जा सकता है)

    आज के शुभ काल
    ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04:09 बजे से 04:57 बजे तक
    अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11:57 बजे से दोपहर 12:50 बजे तक
    अमृत काल – रात 11:28 बजे से 01:11 बजे तक

    आज के अशुभ काल
    राहुकाल – दोपहर 03:42 बजे से शाम 05:22 बजे तक
    यम गण्ड – सुबह 09:04 बजे से 10:44 बजे तक
    कुलिक – दोपहर 12:23 बजे से 02:03 बजे तक
    दुर्मुहूर्त – सुबह 08:25 बजे से 09:18 बजे तक, रात 11:19 बजे से 12:02 बजे तक
    वर्ज्यम् – दोपहर 01:09 बजे से 02:52 बजे तक

  • गंगा दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा? जानिए सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा का महत्व

    गंगा दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा? जानिए सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा का महत्व

    नई दिल्ली। सनातन धर्म में गंगा दशहरा का पर्व बेहद पवित्र और पुण्यदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष गंगा दशहरा मनाया जाता है। इस बार गंगा दशहरा की तारीख को लेकर लोगों में असमंजस बना हुआ है कि यह पर्व 25 मई को मनाया जाएगा या 26 मई को।

    25 मई को मनाया जाएगा गंगा दशहरा
    पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 25 मई 2026 को सुबह 4:30 बजे शुरू होगी और 26 मई 2026 को सुबह 5:10 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि और 25 मई को पूरे दिन रवि योग रहने के कारण गंगा दशहरा का पर्व 25 मई 2026, सोमवार को मनाया जाएगा।

    गंगा स्नान और पूजा के शुभ मुहूर्त
    गंगा दशहरा के दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन के प्रमुख शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-
    ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:04 बजे से 4:45 बजे तक
    प्रातः संध्या मुहूर्त: सुबह 4:24 बजे से 5:26 बजे तक
    हस्त नक्षत्र प्रारंभ: 26 मई सुबह 4:08 बजे से
    रवि योग: 25 मई को पूरे दिन रहेगा

    क्यों खास है गंगा दशहरा?
    धार्मिक कथाओं के अनुसार, राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं। माना जाता है कि इसी कारण इस दिन को भगीरथी जयंती भी कहा जाता है।

    दस प्रकार के पापों से मुक्ति की मान्यता
    ‘दशहरा’ शब्द का अर्थ है दस प्रकार के पापों का नाश करने वाला। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से शरीर, वाणी और मन से जुड़े दस प्रकार के पाप समाप्त हो जाते हैं। यदि गंगा स्नान संभव न हो, तो घर में स्नान के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी शुभ माना जाता है।

    ऐसे करें पूजा
    गंगा दशहरा के दिन सुबह स्नान कर मां गंगा का ध्यान करें और “ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः” मंत्र का जाप करें। इसके बाद धूप, दीप, फूल और नैवेद्य अर्पित करें।

    दान का विशेष महत्व
    इस दिन ठंडा पानी, शरबत, सत्तू, घड़ा, पंखा, वस्त्र और अन्न का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। जरूरतमंदों की सहायता और सेवा करने से विशेष फल प्राप्त होता है।

  • गंगा दशहरा 2026: जानें सही तिथि, ब्रह्म मुहूर्त और स्नान-दान का शुभ समय

    गंगा दशहरा 2026: जानें सही तिथि, ब्रह्म मुहूर्त और स्नान-दान का शुभ समय


    नई दिल्ली। गंगा दशहरा हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी पर्व माना जाता है, जिसे हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन मां गंगा स्वर्ग लोक से धरती पर अवतरित हुई थीं, इसलिए इस दिन गंगा स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने से व्यक्ति के सभी पापों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि का आगमन होता है।

    पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि का आरंभ 25 मई 2026, सोमवार को सुबह 4 बजकर 28 मिनट पर होगा और यह तिथि 26 मई मंगलवार को सुबह 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर इस वर्ष गंगा दशहरा 25 मई को ही मनाया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु सुबह से ही पवित्र नदियों में स्नान कर दान-पुण्य करते हैं और भगवान शिव तथा मां गंगा की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं में ब्रह्म मुहूर्त को अत्यंत शुभ माना गया है। गंगा दशहरा 2026 पर स्नान और दान के लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय सुबह 4 बजकर 30 मिनट से 5 बजकर 30 मिनट तक श्रेष्ठ रहेगा। इस अवधि में स्नान करने और दान देने से पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा भी सुबह के अन्य शुभ मुहूर्तों में स्नान-दान किया जा सकता है।

    इस पावन अवसर पर लोग गंगा स्नान के साथ-साथ जरूरतमंदों को जल, फल, वस्त्र और अन्न का दान करते हैं। धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि गंगा दशहरा के दिन किया गया छोटा सा पुण्य कार्य भी कई जन्मों के पापों को समाप्त करने की क्षमता रखता है। यही कारण है कि यह पर्व देशभर में अत्यंत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है।

    गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक भी माना जाता है, जो मनुष्य को सकारात्मक ऊर्जा और नए जीवन की दिशा प्रदान करता है।

  • Adhik Maas 2026: पूजा-पाठ और दान का बढ़ेगा महत्व, मिलेगा विशेष फल

    Adhik Maas 2026: पूजा-पाठ और दान का बढ़ेगा महत्व, मिलेगा विशेष फल


    नई दिल्ली।  हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष ज्येष्ठ माह में अधिकमास का संयोग बन रहा है। अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून 2026 तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस महीने के स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में अधिकमास को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है।

    क्यों खास माना जाता है पुरुषोत्तम मास?
    मान्यता है कि अधिकमास में जप, तप, दान, कथा, गीता पाठ, भजन-कीर्तन और तीर्थ यात्रा करने से सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है। इसी वजह से इस महीने आने वाले व्रत और त्योहारों का महत्व भी काफी बढ़ जाता है। भक्त पूरे महीने भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।

    अधिकमास 2026 व्रत-त्योहार कैलेंडर
    17 मई – अधिकमास प्रारंभ
    19 मई – बड़ा मंगल
    20 मई – वरदा चतुर्थी
    21 मई – अधिक स्कंद षष्ठी, गुरु पुष्य नक्षत्र
    23 मई – अधिक मासिक दुर्गाष्टमी
    25 मई – गंगा दशहरा
    26 मई – बड़ा मंगल
    27 मई – अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी, पद्मिनी एकादशी
    28 मई – गुरु प्रदोष व्रत
    31 मई – अधिकमास पूर्णिमा व्रत
    3 जून – विभुवन संकष्टी चतुर्थी
    6 जून – मृत्यु पंचक
    8 जून – अधिक कालाष्टमी
    11 जून – परम एकादशी
    12 जून – शुक्र प्रदोष व्रत
    13 जून – अधिक मासिक शिवरात्रि
    15 जून – ज्येष्ठ अधिकमास अमावस्या, मिथुन संक्रांति, अधिकमास समाप्त

    अधिकमास में तीर्थ यात्रा का विशेष महत्व
    धार्मिक ग्रंथों के अनुसार अधिकमास आत्मचिंतन, साधना और भक्ति का समय माना जाता है। इस दौरान सांसारिक कार्यों से दूरी बनाकर ईश्वर भक्ति में मन लगाने की सलाह दी जाती है। पद्म पुराण के अनुसार इस महीने बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, द्वारका, वृंदावन, हरिद्वार और प्रयागराज जैसे तीर्थों की यात्रा करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    इन दिनों करें भगवान विष्णु की पूजा
    अधिकमास में प्रतिदिन भगवान विष्णु की पूजा करना शुभ माना गया है। यदि प्रतिदिन संभव न हो, तो पद्मिनी एकादशी, परम एकादशी, गुरु प्रदोष, पूर्णिमा और अमावस्या के दिन श्रीहरि की विशेष आराधना करनी चाहिए।

  • Vat Savitri Vrat 2026: घर के पास वट वृक्ष नहीं? जानिए आसान पूजा विधि

    Vat Savitri Vrat 2026: घर के पास वट वृक्ष नहीं? जानिए आसान पूजा विधि


    नई दिल्ली। वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि देवी सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण वट वृक्ष के नीचे ही यमराज से वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण ज्येष्ठ अमावस्या के दिन बरगद यानी वट वृक्ष की पूजा विशेष रूप से की जाती है। इस वर्ष वट सावित्री व्रत 16 मई 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं।

    घर के पास बरगद का पेड़ न हो तो क्या करें?
    आजकल शहरों और हाईराइज सोसायटियों में बरगद के पेड़ आसानी से नहीं मिलते। ऐसे में महिलाएं पूजा को लेकर परेशान हो जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि आसपास वट वृक्ष न हो तो व्रत से एक दिन पहले बरगद की छोटी टहनी लाकर उसे गमले में स्थापित किया जा सकता है। इसके बाद उसी टहनी के पास देवी सावित्री, सत्यवान और यमराज की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा की जा सकती है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा का पूरा फल प्राप्त होता है।

    ऐसे करें वट सावित्री पूजा
    पूजा के दौरान सबसे पहले वट वृक्ष या उसकी टहनी को जल और दूध अर्पित करें। इसके बाद रोली, हल्दी, अक्षत और फूल चढ़ाएं। फिर कच्चा सूत लेकर वट वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें और पति की लंबी आयु की कामना करें। पूजा के बाद वट सावित्री व्रत कथा सुनना भी शुभ माना जाता है।

    पूजा के समय जरूर बोलें यह मंत्र
    बरगद की पूजा करते समय इस मंत्र का जाप करना शुभ माना गया है-
    “मम सौभाग्यं देहि, आयुष्यम् आरोग्यं देहि मे।
    पतिसुखं च देहि त्वं, वटवृक्ष नमोऽस्तु ते॥”

    मान्यता है कि इस मंत्र के जाप से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

  • शनि अमावस्या का विशेष आयोजन, नर्मदा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने की पूजा

    शनि अमावस्या का विशेष आयोजन, नर्मदा स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने की पूजा


    नई दिल्ली। बड़वानी जिले में शनिवार को शनि अमावस्या और शनि जयंती के दुर्लभ संयोग पर धार्मिक आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक स्थित शनि मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। साईं शनेश्वर शनि मंदिर, सेंगाव बाईपास स्थित शनि मंदिर और अंजड़ के श्री नवग्रह शनि मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए।

    पूरे दिन मंदिर परिसर “जय शनिदेव” के जयकारों और वैदिक मंत्रोच्चार से गूंजते रहे। भक्तों ने तेल, फूल, काली उड़द और प्रसाद अर्पित कर शनिदेव की विशेष पूजा की।

    51 किलो तेल से शनिदेव का अभिषेक, नवग्रह पूजन भी सम्पन्न
    साईं शनेश्वर शनि मंदिर समिति के अनुसार, सुबह से ही वैदिक विधि-विधान के साथ शनिदेव का 51 किलो तेल से अभिषेक किया गया। इसके बाद नवग्रह पूजन, हवन और विशेष आरती संपन्न हुई। अंजड़ स्थित श्री नवग्रह शनि मंदिर, जिसे जिले का प्रमुख धार्मिक केंद्र माना जाता है, वहां भी सुबह से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। यहां नवग्रह देवताओं का विशेष पूजन कर हवन किया गया, जिससे वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक हो गया।

    भंडारे और प्रसादी से भक्तों का स्वागत
    श्रद्धालुओं के लिए कई स्थानों पर भंडारे और प्रसादी का आयोजन किया गया। अंजड़ मंदिर में लगभग एक क्विंटल पूरी-चना प्रसाद वितरित किया गया, जबकि सेंगाव बाईपास मंदिर में छप्पन भोग के साथ प्रसादी बांटी गई। कुछ स्थानों पर साबूदाने की खिचड़ी भी श्रद्धालुओं को दी गई। मंदिरों में दिनभर भक्तों का आना-जाना जारी रहा और शाम तक माहौल पूरी तरह भक्ति में डूबा रहा।

    नर्मदा घाटों पर आस्था की डुबकी, सुरक्षा व्यवस्था कड़ी
    शनि अमावस्या के अवसर पर नर्मदा नदी के घाटों, विशेषकर राजघाट पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। लोगों ने पवित्र स्नान कर दान-पुण्य और पितरों के तर्पण की विधि पूरी की। भीषण गर्मी के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। प्रशासन द्वारा घाटों पर पुलिस और होमगार्ड जवानों की तैनाती की गई ताकि भीड़ को नियंत्रित रखा जा सके और किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो।

    शाम को होगी महाआरती, दिनभर जारी रहा उत्सव
    शाम 7 बजे सभी प्रमुख शनि मंदिरों में संगीतमय महाआरती का आयोजन किया जाएगा, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। पूरे जिले में यह दिन पूरी तरह धार्मिक उल्लास और आस्था के रंग में रंगा रहा।

  • सीता नवमी पर करें ये विधि पूरी होगी हर मनोकामना जानिए 2026 की डेट और शुभ समय

    सीता नवमी पर करें ये विधि पूरी होगी हर मनोकामना जानिए 2026 की डेट और शुभ समय


    नई दिल्ली । भारतीय परंपरा में बच्चों को नजर दोष से बचाने के लिए कई धार्मिक और ज्योतिषीय उपाय बताए गए हैं और इनमें कालाष्टमी का दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह दिन भगवान काल भैरव को समर्पित होता है जिन्हें संकटों का नाश करने वाला और समय का स्वामी माना जाता है। मान्यता है कि कालाष्टमी के दिन किए गए उपाय नकारात्मक शक्तियों को दूर करते हैं और बच्चों को बुरी नजर से सुरक्षित रखते हैं। वर्ष 2026 में 10 अप्रैल को कालाष्टमी का व्रत मनाया जा रहा है और इस दिन किए गए सरल उपाय बेहद प्रभावी माने जाते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कालाष्टमी हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आती है और इस दिन भगवान काल भैरव की पूजा विशेष फलदायी होती है। काशी में काल भैरव को कोतवाल कहा जाता है और उन्हें सुरक्षा और न्याय का देवता माना जाता है। इस दिन उनकी पूजा करने से भय संकट और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है। ज्योतिष शास्त्र में भी इस दिन को तंत्र मंत्र और रक्षा उपायों के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना गया है।

    यदि आपके घर में छोटे बच्चे हैं और आपको लगता है कि उन्हें बार बार नजर लग जाती है तो कालाष्टमी के दिन कुछ आसान उपाय जरूर करने चाहिए। सबसे पहले घर के मुख्य द्वार पर सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाएं। दीपक जलाने के बाद उसकी लौ से काजल तैयार करें और इस काजल को बच्चे के माथे या कान के पीछे हल्का सा लगा दें। ऐसा करने से नजर दोष से बचाव होता है और बच्चे के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का घेरा बनता है।

    इसके अलावा आप मंदिर जाकर भगवान काल भैरव के चरणों में काला धागा अर्पित कर सकते हैं। इस धागे पर थोड़ा सा सिंदूर लगाकर इसे बच्चे के हाथ या गले में बांध दें। मान्यता है कि यह काला धागा एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और बुरी नजर के प्रभाव को दूर करता है। इस दौरान ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं मंत्र का जाप करना भी अत्यंत लाभकारी माना गया है।

    कालाष्टमी के दिन रात 9 बजे से 11 बजे के बीच पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है। इस समय की गई पूजा जल्दी फल देती है और भगवान काल भैरव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। भक्त इस दौरान व्रत रखते हैं दीप जलाते हैं और भगवान से अपने परिवार विशेषकर बच्चों की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। यह दिन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है बल्कि यह विश्वास और आस्था का प्रतीक भी है। ऐसे उपाय लोगों को मानसिक शांति और सुरक्षा का एहसास देते हैं। हालांकि इन उपायों के साथ साथ बच्चों की देखभाल स्वच्छता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।

    कालाष्टमी पर किए गए ये सरल उपाय न केवल परंपरा का हिस्सा हैं बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे विश्वास का प्रतीक भी हैं जो आज भी लोगों के जीवन में उतने ही प्रभावी माने जाते हैं।नई दिल्ली । हिंदू धर्म में वैशाख मास का विशेष महत्व होता है और इसी पावन महीने में सीता नवमी का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह दिन माता सीता के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है जिन्हें त्याग धैर्य और आदर्श नारीत्व का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 2026 में सीता नवमी 25 अप्रैल को मनाई जाएगी और इस दिन व्रत और पूजा करने से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

    वैदिक पंचांग के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि की शुरुआत 24 अप्रैल 2026 को रात 07 बजकर 21 मिनट पर होगी और इसका समापन 25 अप्रैल 2026 को शाम 06 बजकर 27 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार यह पर्व 25 अप्रैल को ही मनाया जाएगा। इस दिन कई शुभ मुहूर्त भी बन रहे हैं जो पूजा पाठ और व्रत के लिए अत्यंत फलदायी माने जाते हैं। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 51 मिनट से 5 बजकर 35 मिनट तक रहेगा जो साधना और ध्यान के लिए श्रेष्ठ है। अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 19 मिनट से 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगा वहीं विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 52 मिनट से 3 बजकर 43 मिनट तक का समय सफलता और शुभ कार्यों के लिए उत्तम माना गया है। इसके अलावा अमृत काल शाम 6 बजकर 29 मिनट से रात 8 बजकर 04 मिनट तक रहेगा जो विशेष रूप से पूजा के लिए अनुकूल है।

    सीता नवमी का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। माता सीता को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है और उनकी पूजा करने से घर में सुख समृद्धि और शांति का वास होता है। यह दिन विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इस व्रत को करने से अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन में खुशहाली बनी रहती है।

    पूजा विधि की बात करें तो इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। घर के मंदिर में माता सीता और भगवान राम की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। इसके बाद उन्हें पीले फूल शृंगार की सामग्री और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। श्रद्धा के साथ ‘श्री जानकी रामाभ्यां नमः’ मंत्र का 108 बार जप किया जाता है और सीता नवमी की कथा का पाठ किया जाता है। अंत में आरती कर भगवान से सुख समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की जाती है।

    इस दिन ॐ सीतायै नमः और ॐ श्री सीता रामाय नमः जैसे मंत्रों का जाप करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से इस दिन व्रत और पूजा करता है उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी कष्ट दूर होते हैं। सीता नवमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि यह नारी शक्ति सहनशीलता और समर्पण का भी प्रतीक है। यह दिन हमें जीवन में धैर्य और मर्यादा का महत्व सिखाता है और परिवार के प्रति समर्पण की भावना को मजबूत करता है।

  • नवरात्रि का अंतिम दिन: मां सिद्धिदात्री की महिमा और कथा से मिलेगा सुख समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद

    नवरात्रि का अंतिम दिन: मां सिद्धिदात्री की महिमा और कथा से मिलेगा सुख समृद्धि और सफलता का आशीर्वाद


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन महानवमी पर मां सिद्धिदात्री पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। यह दिन मां दुर्गा के नौवें और पूर्ण स्वरूप की आराधना का होता है, जिसे सिद्धियों की दात्री कहा गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधिवत पूजा के बाद उनकी कथा का पाठ करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

    धर्म शास्त्रों के अनुसार मां सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी हैं। कहा जाता है कि शिवने भी मां की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें अष्टसिद्धियां प्रदान कीं। यही कारण है कि भगवान शिव का एक रूप अर्धनारीश्वर कहलाता है, जिसमें वे आधे शिव और आधी शक्ति के रूप में विराजमान हैं।

    पौराणिक कथा के अनुसार जब असुरों का अत्याचार बढ़ गया और देवता परेशान हो उठे, तब सभी देवताओं ने विष्णुऔर भगवान शिव से सहायता की प्रार्थना की। इसके बाद सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसे मां सिद्धिदात्री कहा गया। यह स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और कल्याणकारी माना जाता है, जो भक्तों के जीवन से भय और बाधाओं को दूर करता है।

    ऐसी मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की आराधना के बिना किसी भी देवी-देवता की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। देवी हिमालय के शिखर पर विराजमान होकर समस्त सिद्धियों की रक्षा करती हैं और अपने भक्तों को ज्ञान, बुद्धि, स्वास्थ्य और धन का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

    महानवमी के दिन भक्त पूरे श्रद्धा भाव से मां की पूजा करते हैं, कथा सुनते और पढ़ते हैं तथा अंत में आरती कर भोग अर्पित करते हैं। पूजा के समापन पर मां से क्षमा याचना करना भी अत्यंत आवश्यक माना गया है। भक्त विनम्र भाव से प्रार्थना करते हैं कि पूजा में हुई किसी भी त्रुटि को मां क्षमा करें और अपने आशीर्वाद से जीवन को सुखमय बनाएं।

    यह पावन दिन हमें यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धा, भक्ति और समर्पण से जीवन की हर बाधा दूर की जा सकती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। महानवमी पर मां सिद्धिदात्री की कथा और पूजा से न केवल आध्यात्मिक बल मिलता है बल्कि जीवन में सफलता और संतुलन भी प्राप्त होता है।