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  • Pitru Paksha 2026: कब करें पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण, 15 दिनों की पूरी तिथि सूची के साथ जानें मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

    Pitru Paksha 2026: कब करें पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण, 15 दिनों की पूरी तिथि सूची के साथ जानें मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का महत्व


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का अत्यंत महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत माता पिता और पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्राद्ध तर्पण पिंडदान और दान पुण्य जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। साल 2026 में पितृपक्ष सितंबर के अंतिम सप्ताह में शुरू होगा और अक्टूबर में सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। ऐसे में परिवारों के लिए श्राद्ध पक्ष की सभी तिथियों की जानकारी रखना बेहद जरूरी है ताकि वे अपने पूर्वजों का श्राद्ध सही दिन पर कर सकें।

    वर्ष 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर शनिवार से होगी। इस दिन भाद्रपद पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। इसके बाद 27 सितंबर रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध होगा और क्रमशः अलग अलग तिथियों पर पूर्वजों के निमित्त धार्मिक कर्म किए जाएंगे। पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है क्योंकि इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर उनका श्राद्ध नहीं हो पाया हो।

    पितृपक्ष की प्रमुख तिथियों की बात करें तो 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा जबकि 27 सितंबर को प्रतिपदा और 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध किया जाएगा। 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध होगा। इस बार 30 सितंबर बुधवार को एक विशेष स्थिति बनेगी क्योंकि इसी दिन चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध किया जाएगा। जिन परिवारों में किसी पूर्वज का निधन चतुर्थी या पंचमी तिथि को हुआ था वे इस दिन उनका श्राद्ध कर्म कर सकेंगे।

    इसके बाद 1 अक्टूबर को षष्ठी 2 अक्टूबर को सप्तमी 3 अक्टूबर को अष्टमी और 4 अक्टूबर को नवमी तिथि का श्राद्ध होगा। 4 अक्टूबर को मातृ नवमी भी मानी जाएगी जिसका अपना विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन दिवंगत माताओं और परिवार की अन्य महिलाओं के निमित्त श्राद्ध तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। श्रद्धालु इस दिन मातृ पक्ष के पूर्वजों का स्मरण कर उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करते हैं।

    पितृपक्ष की आगे की तिथियों में 5 अक्टूबर को दशमी 6 अक्टूबर को एकादशी 7 अक्टूबर को द्वादशी 8 अक्टूबर को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी का श्राद्ध किया जाएगा। इसके बाद 10 अक्टूबर को अमावस्या के दिन सर्वपितृ श्राद्ध के साथ इस पावन पक्ष का समापन होगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार मृत्यु की तिथि होती है। जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो पितृपक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध करना उचित माना जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी पूर्वज की मृत्यु प्रतिपदा तिथि को हुई थी तो पितृपक्ष में प्रतिपदा के दिन उनका श्राद्ध किया जाता है। वहीं जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं होती उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या विशेष अवसर मानी जाती है।

    पितृपक्ष केवल धार्मिक कर्मकांड का समय नहीं बल्कि अपनी जड़ों और पूर्वजों को याद करने का भी अवसर है। इस अवधि में श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार तर्पण पिंडदान भोजन और दान पुण्य करने की परंपरा रही है। वर्ष 2026 में 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलने वाला यह पितृपक्ष श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगा।

  • सिर्फ भाई की कलाई नहीं भाभी की चूड़ियों पर भी सजती है राखी जानिए लुंबा राखी की खास परंपरा और महत्व

    सिर्फ भाई की कलाई नहीं भाभी की चूड़ियों पर भी सजती है राखी जानिए लुंबा राखी की खास परंपरा और महत्व


    नई दिल्ली। रक्षाबंधन का त्योहार भाई और बहन के बीच प्रेम स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसकी सुख समृद्धि तथा लंबी उम्र की कामना करती है। लेकिन भारत के अलग अलग हिस्सों में रक्षाबंधन से जुड़ी कई ऐसी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराएं भी हैं जो इस त्योहार को और खास बनाती हैं। इन्हीं में से एक है भाभी के लिए लुंबा राखी बांधने की परंपरा। सामान्य राखी से अलग दिखाई देने वाली लुंबा राखी खास तौर पर भाभी के लिए तैयार की जाती है और इसे कलाई के बजाय चूड़ियों या कंगन के साथ सजाया जाता है।

    लुंबा राखी का डिजाइन इसकी सबसे खास पहचान होता है। इसमें मोतियों लटकन कुंदन सजावटी धागों और अन्य खूबसूरत चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। सामान्य राखी की तरह इसे सीधे कलाई पर बांधने के बजाय भाभी की चूड़ियों या कंगन के साथ लटकाया जाता है। यही वजह है कि यह देखने में राखी और पारंपरिक आभूषण का खूबसूरत मेल लगती है। अलग अलग परिवारों और क्षेत्रों में इसके डिजाइन और इसे पहनने का तरीका अलग हो सकता है।

    अब सवाल उठता है कि आखिर भाभी को लुंबा राखी क्यों बांधी जाती है। दरअसल कुछ पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं में भाभी को परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। शादी के बाद भाई के जीवन में उसकी पत्नी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और इसी रिश्ते को सम्मान देने के लिए कई परिवारों में बहन भाई के साथ भाभी को भी रक्षाबंधन के उत्सव में शामिल करती है। ननद द्वारा भाभी को लुंबा राखी देना उनके बीच स्नेह अपनापन और पारिवारिक जुड़ाव को दर्शाने वाली परंपरा के रूप में देखा जाता है।

    इस परंपरा का एक भावनात्मक पक्ष यह भी है कि भाई और उसकी पत्नी को परिवार में एक साथ सम्मान और अपनापन दिया जाए। रक्षाबंधन केवल भाई बहन के रिश्ते तक सीमित न रहकर परिवार के दूसरे रिश्तों को भी प्रेम के धागे से जोड़ने का अवसर बन जाता है। लुंबा राखी इसी भावना का प्रतीक मानी जाती है। इसके जरिए ननद अपनी भाभी के प्रति स्नेह और सम्मान व्यक्त करती है और दोनों के रिश्ते में अपनापन बढ़ाने का अवसर मिलता है।

    हालांकि यह समझना जरूरी है कि लुंबा राखी बांधने की परंपरा पूरे भारत में एक समान नहीं है। यह विशेष रूप से कुछ समुदायों क्षेत्रों और परिवारों में अधिक प्रचलित है। इसलिए इसे रक्षाबंधन की अनिवार्य रस्म नहीं माना जाता बल्कि क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपरा के तौर पर समझना बेहतर है। जिन परिवारों में यह परंपरा निभाई जाती है वहां लुंबा राखी त्योहार की खुशियों को और बढ़ा देती है।

    इस तरह रक्षाबंधन पर लुंबा राखी केवल एक खूबसूरत सजावटी राखी नहीं है बल्कि यह रिश्तों को सम्मान देने और परिवार में प्रेम तथा अपनापन बढ़ाने का माध्यम भी बनती है। भाई की कलाई पर बंधी राखी जहां भाई बहन के रिश्ते की मजबूती का प्रतीक है वहीं भाभी की चूड़ियों पर सजी लुंबा राखी ननद भाभी के रिश्ते में स्नेह और सम्मान की खूबसूरत कड़ी जोड़ती है।

  • नाग पंचमी 2026 की तारीख को लेकर दूर करें कन्फ्यूजन, 17 अगस्त को करें पूजा; जानें तिथि से लेकर जरूरी नियम तक

    नाग पंचमी 2026 की तारीख को लेकर दूर करें कन्फ्यूजन, 17 अगस्त को करें पूजा; जानें तिथि से लेकर जरूरी नियम तक


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में नाग पंचमी का पर्व भगवान शिव और नाग देवता की आराधना से जुड़ा महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। हर साल सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी मनाई जाती है। इस बार पंचमी तिथि 16 अगस्त 2026 की शाम करीब 4 बजकर 52 मिनट से शुरू होकर 17 अगस्त की शाम करीब 5 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के नियम के अनुसार नाग पंचमी का पर्व 17 अगस्त 2026 सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन सावन सोमवार भी पड़ रहा है जिसके कारण भगवान शिव और नाग देवता की पूजा का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। 17 अगस्त की तारीख की पुष्टि कई पंचांग आधारित स्रोतों ने भी की है।

    नाग पंचमी की पूजा के लिए 17 अगस्त को सुबह 5 बजकर 51 मिनट से लेकर सुबह 8 बजकर 29 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। यह मुहूर्त नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार है और दूसरे शहरों में सूर्योदय तथा स्थानीय पंचांग के आधार पर समय में अंतर हो सकता है। इसलिए अगर आप किसी दूसरे शहर में रहते हैं तो स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का समय देखना बेहतर रहेगा।

    नाग पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद भगवान शिव तथा नाग देवता का ध्यान करके पूजा का संकल्प लिया जा सकता है। इसके बाद शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करें। नाग देवता की प्रतिमा पर भी जल अर्पित करके चंदन अक्षत और पुष्प चढ़ाए जा सकते हैं। इसके बाद भगवान शिव को बेलपत्र अर्पित करें और दीपक जलाकर आरती करें। धार्मिक परंपरा के अनुसार ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करते हुए भगवान शिव और नाग देवता से सुख शांति और परिवार की मंगलकामना की जाती है।

    कई स्थानों पर नाग पंचमी के दिन नाग देवता की प्रतिमा पर दूध अर्पित करने की परंपरा भी है। हालांकि जीवित सांपों को पकड़कर उन्हें दूध पिलाना या उनके मुंह को दूध में डुबोना उचित नहीं है। सांप सामान्य रूप से दूध पीने वाले जीव नहीं होते और जबरदस्ती दूध पिलाने से उन्हें नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए नाग देवता की प्रतिमा का पूजन करना अधिक सुरक्षित और उचित तरीका है। नाग पंचमी की परंपराएं भी सांपों और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देती हैं।

    नाग पंचमी को लेकर धार्मिक मान्यताओं में कहा जाता है कि इस दिन नाग देवता की पूजा करने से भय दूर होता है और परिवार में सुख समृद्धि आती है। कुछ ज्योतिषीय परंपराओं में नाग पूजा को राहु केतु और कालसर्प दोष से जुड़े उपायों के साथ भी जोड़ा जाता है। हालांकि कालसर्प दोष और उससे जुड़े उपाय ज्योतिषीय मान्यताओं का विषय हैं और इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अलग अलग ज्योतिषीय परंपराओं में इसके प्रभाव और उपायों को लेकर मतभेद भी पाए जाते हैं।

    नाग पंचमी से जुड़ी धार्मिक कथाओं में राजा जनमेजय और आस्तिक मुनि का प्रसंग भी प्रमुख माना जाता है। मान्यता है कि राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु के बाद नागों के विनाश के लिए नाग यज्ञ कराया था। इसी दौरान आस्तिक मुनि ने यज्ञ को रोककर नागों की रक्षा की। इस कथा को नाग पंचमी की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है और इसके माध्यम से जीवों के प्रति दया तथा संरक्षण का संदेश भी मिलता है।

    इस तरह 17 अगस्त को नाग पंचमी के अवसर पर भगवान शिव और नाग देवता की श्रद्धापूर्वक पूजा की जा सकती है। इस बार सावन सोमवार और नाग पंचमी का एक ही दिन पड़ना भक्तों के लिए धार्मिक दृष्टि से विशेष अवसर माना जा रहा है। पूजा में आस्था के साथ स्वच्छता और जीवों के प्रति संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी जरूरी है।

  • हरियाली तीज कब है? 14 अगस्त की शाम से शुरू होगी तृतीया, 15 अगस्त को रखा जाएगा व्रत

    हरियाली तीज कब है? 14 अगस्त की शाम से शुरू होगी तृतीया, 15 अगस्त को रखा जाएगा व्रत

    नई दिल्ली। सनातन धर्म में हरियाली तीज का पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर महिलाएं पति की लंबी आयु सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने की परंपरा है। सावन में चारों ओर दिखाई देने वाली हरियाली के कारण इस पर्व को हरियाली तीज कहा जाता है। इस दिन महिलाएं हरे रंग के कपड़े पहनती हैं हरी चूड़ियां धारण करती हैं मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करके झूला झूलने के साथ तीज के लोकगीत गाती हैं।

    इस बार हरियाली तीज की तारीख को लेकर 14 और 15 अगस्त के बीच कंफ्यूजन बना हुआ है। पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 14 अगस्त से शुरू हो रही है लेकिन उदया तिथि के आधार पर हरियाली तीज का व्रत 15 अगस्त 2026 शनिवार को रखा जाएगा। दिल्ली के लिए द्रिक पंचांग भी 15 अगस्त को ही हरियाली तीज का पर्व बता रहा है। हालांकि अलग अलग शहरों के पंचांग में तिथि शुरू होने और समाप्त होने के समय में अंतर हो सकता है।

    पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 14 अगस्त को सुबह 9 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर 15 अगस्त को सुबह 7 बजकर 58 मिनट तक रहेगी।因此 15 अगस्त को सूर्योदय के समय तृतीया तिथि होने के कारण इसी दिन व्रत और पर्व मनाया जाएगा। अपने शहर के अनुसार पूजा का सटीक समय जानने के लिए स्थानीय पंचांग देखना उचित रहेगा।

    हरियाली तीज के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लेती हैं। इसके बाद पूजा स्थल की साफ सफाई करके भगवान शिव माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। कुछ परंपराओं में बालू या मिट्टी से शिव पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाने का भी विधान बताया गया है। पूजा में माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है जबकि भगवान शिव को बेलपत्र फल और अन्य पूजन सामग्री चढ़ाई जाती है। इसके बाद धूप दीप जलाकर आरती की जाती है और हरियाली तीज की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार हरियाली तीज का संबंध माता पार्वती की कठोर तपस्या से है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक तप किया था और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया। इसी वजह से विवाहित महिलाएं इस दिन शिव और पार्वती की पूजा करके अपने दांपत्य जीवन में प्रेम सुख और स्थिरता की कामना करती हैं।

    इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी परंपरा के अनुसार निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं। हालांकि निर्जला व्रत हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर व्रत की कठोरता से बचना और अपनी सेहत को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है। पूजा के साथ महिलाएं सास या घर की वरिष्ठ महिलाओं को सुहाग सामग्री और उपहार देकर उनका आशीर्वाद भी ले सकती हैं।

    हरियाली तीज पर हरे रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। हरे वस्त्र और हरी चूड़ियां पहनना इस पर्व की पारंपरिक पहचान है। इसके अलावा पौधरोपण को भी इस दिन शुभ माना जाता है। सावन और हरियाली से जुड़े इस पर्व पर एक पौधा लगाकर प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी दिया जा सकता है।

    इस तरह 14 अगस्त से तृतीया तिथि शुरू होने के बावजूद हरियाली तीज 15 अगस्त 2026 शनिवार को मनाई जाएगी। इसलिए 14 या 15 अगस्त को लेकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। व्रत रखने वाली महिलाएं 15 अगस्त को अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती की विधि पूर्वक पूजा कर सकती हैं।

  • चैत्र नवरात्रि 2026 दुर्गाष्टमी पर ऐसे करें मां महागौरी की पूजा हर मनोकामना होगी पूर्ण

    चैत्र नवरात्रि 2026 दुर्गाष्टमी पर ऐसे करें मां महागौरी की पूजा हर मनोकामना होगी पूर्ण


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है और इसके आठवें दिन आने वाली दुर्गाष्टमी या महाष्टमी का विशेष महत्व होता है यह दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी को समर्पित माना जाता है जो शुद्धता शांति और सौभाग्य की प्रतीक हैं इस दिन विधि विधान से पूजा करने पर भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है

    दृक पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि 25 मार्च 2026 को दोपहर 1 बजकर 50 मिनट से प्रारंभ होगी और 26 मार्च 2026 को सुबह 11 बजकर 48 मिनट तक रहेगी उदय तिथि के अनुसार दुर्गाष्टमी 26 मार्च को मनाई जाएगी इसलिए इस दिन पूजा और कन्या पूजन का विशेष महत्व रहेगा

    दुर्गाष्टमी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए इसके बाद पूजा स्थल को साफ कर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मां महागौरी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें पूजा के दौरान कुमकुम रोली अक्षत चंदन और पुष्प अर्पित करें तथा घी या कपूर का दीपक जलाएं इसके बाद पूरे श्रद्धा भाव से मां का ध्यान करते हुए उनके मूल मंत्र ॐ देवी महागौर्यै नमः का कम से कम 108 बार जाप करें साथ ही दुर्गा सप्तशती या महागौरी स्तोत्र का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है

    मां महागौरी का स्वरूप अत्यंत शांत और दिव्य माना जाता है वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं और वृषभ पर विराजमान रहती हैं उनके चार हाथों में त्रिशूल और डमरू शोभा देते हैं उनकी पूजा करने से जीवन के पापों का नाश होता है मन की शुद्धि होती है और भय तथा नकारात्मकता दूर होती है

    इस दिन मां को सफेद वस्तुएं अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है जैसे खीर नारियल केले पंचामृत और अन्य सात्विक मिठाइयां भोग लगाते समय मंत्र जाप करना चाहिए और बाद में प्रसाद सभी में बांटना चाहिए इससे मां की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख समृद्धि बनी रहती है

    दुर्गाष्टमी के दिन कन्या पूजन का भी अत्यधिक महत्व है इस दिन छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है उनके पैर धोकर तिलक लगाया जाता है और उन्हें चुनरी फूल मिठाई और दक्षिणा भेंट की जाती है ऐसा करने से मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण करती हैं

    इसके अलावा इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से भी जीवन की बाधाएं दूर होती हैं पितृ दोष या कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए चांदी के नाग नागिन की पूजा कर उन्हें नदी में प्रवाहित करना शुभ माना जाता है साथ ही पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाकर सरसों के तेल का दीपक जलाने से घर में सुख शांति और समृद्धि का वास होता है

    दुर्गाष्टमी का यह पावन दिन भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और आस्था का प्रतीक है यदि इस दिन पूरी श्रद्धा और नियम के साथ मां महागौरी की पूजा की जाए तो जीवन में शांति सफलता और खुशहाली का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है

  • नवरात्रि का छठा दिन ऐसे करें मां कात्यायनी की आराधना हर बाधा होगी दूर और मनोकामना होगी पूर्ण

    नवरात्रि का छठा दिन ऐसे करें मां कात्यायनी की आराधना हर बाधा होगी दूर और मनोकामना होगी पूर्ण

    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का छठा दिन मां दुर्गा के शक्तिशाली स्वरूप मां कात्यायनी को समर्पित होता है और वर्ष 2026 में यह पावन दिन 24 मार्च को मनाया जाएगा धार्मिक ग्रंथों में मां कात्यायनी को आदिशक्ति का तेजस्वी और पराक्रमी रूप बताया गया है इनकी उपासना करने से भक्तों को साहस शक्ति और हर प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिलती है साथ ही जीवन में विजय और सफलता का मार्ग भी प्रशस्त होता है

    मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और प्रभावशाली माना जाता है उनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला होता है और वे सिंह पर सवार रहती हैं उनके चार हाथों में तलवार कमल अभय मुद्रा और वर मुद्रा सुशोभित होती हैं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था इसी कारण उन्हें कात्यायनी कहा जाता है यह देवी दानवों का संहार करने वाली और धर्म की रक्षा करने वाली मानी जाती हैं

    नवरात्रि के इस दिन पूजा करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ लाल या नारंगी रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए इसके बाद पूजा स्थान को साफ कर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मां कात्यायनी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें पूजा में कुमकुम रोली अक्षत चंदन और गेंदा जैसे नारंगी फूल अर्पित करें एक पान चढ़ाकर अपनी मनोकामना मां के सामने व्यक्त करें और घी का दीपक तथा अगरबत्ती जलाकर विधिपूर्वक पूजा करें इसके बाद मां की कथा सुनना या पढ़ना और आरती करना शुभ माना जाता है

    मां कात्यायनी को शहद विशेष रूप से प्रिय माना जाता है इसलिए इस दिन शहद का भोग अवश्य लगाना चाहिए इसके अलावा हलवा खीर मीठा पान और मौसमी फल भी अर्पित किए जा सकते हैं भोग हमेशा सात्विक होना चाहिए और लहसुन प्याज से परहेज करना चाहिए भोग लगाने के बाद प्रसाद को सभी में बांटना चाहिए इससे घर में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है

    मंत्र जाप का इस दिन विशेष महत्व होता है मां कात्यायनी के मूल मंत्र ॐ देवी कात्यायन्यै नमः का 108 या 1008 बार जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है इसके साथ ही प्रार्थना और स्तुति मंत्रों का उच्चारण भी किया जा सकता है मंत्र जाप करते समय मन को एकाग्र रखना चाहिए और माला का उपयोग करना लाभकारी होता है इससे मानसिक शक्ति बढ़ती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है

    नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा करने से भय शत्रु और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जो जीवन में साहस और आत्मविश्वास की कमी महसूस करते हैं विवाहित महिलाओं के लिए यह पूजा सौभाग्य और सुख समृद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है

    इस दिन कुछ विशेष उपाय भी किए जा सकते हैं जैसे मां को नारंगी फूलों की माला अर्पित करना शहद का दान करना और पूरे दिन मां के मंत्रों का जाप करना इन उपायों से माता रानी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं धीरे धीरे समाप्त होने लगती हैं पूरी श्रद्धा और नियम के साथ मां कात्यायनी की पूजा करने से भक्तों को न केवल आध्यात्मिक शक्ति मिलती है बल्कि जीवन में सफलता और संतुलन भी प्राप्त होता है

  • चैत्र नवरात्रि 2026: पहला और अष्टमी व्रत रखने वाले जान लें ये जरूरी नियम, तभी मिलेगा पूजा का पूरा फल

    चैत्र नवरात्रि 2026: पहला और अष्टमी व्रत रखने वाले जान लें ये जरूरी नियम, तभी मिलेगा पूजा का पूरा फल

    नई दिल्ली । आदिशक्ति दुर्गा को समर्पित चैत्र नवरात्रि का पर्व इस वर्ष 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च 2026 तक चलेगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग केवल पहला दिन और अष्टमी का व्रत रखते हैं।धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्र का पहला दिन संकल्प का प्रतीक होता है, जबकि अष्टमी पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है। इन दोनों दिनों का व्रत नियम और श्रद्धा के साथ करने से पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है।

    पहले दिन के व्रत का महत्व
    नवरात्र के पहले दिन सुबह स्नान कर साफ कपड़े पहनने के बाद कलश स्थापना के साथ व्रत की शुरुआत की जाती है। इस दिन भक्त मां दुर्गा की पूजा कर अपने संकल्प लेते हैं। घर में अखंड ज्योति जलाने और नियमित आरती करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और यह पूरे नवरात्र की आध्यात्मिक यात्रा की नींव माना जाता है।

    अष्टमी व्रत का महत्व

    चैत्र नवरात्रि में अष्टमी को महाष्टमी कहा जाता है। इस दिन विशेष रूप से Mahagauri की पूजा की जाती है। अष्टमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है, जिसमें छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर भोजन कराया जाता है। मान्यता है कि इससे नवरात्रि का व्रत पूर्ण माना जाता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

    व्रत के दौरान रखें इन बातों का ध्यान

    नवरात्रि में व्रत रखने वाले भक्तों को सात्विक आहार का पालन करना चाहिए। फलाहार, साबूदाना, कुट्टू का आटा और फल ऊर्जा देने में सहायक होते हैं। व्रत के दौरान अधिक नमक और मसालों से बचने की सलाह दी जाती है ताकि मन शांत और स्थिर बना रहे। धार्मिक मान्यता है कि संयम, श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत ही भक्तों को मां दुर्गा का आशीर्वाद दिलाता है और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाता है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: 19 मार्च से शुरू होंगे व्रत, जानें घटस्थापना मुहूर्त, पूजा विधि और नौ दिनों का पूरा कैलेंडर

    चैत्र नवरात्रि 2026: 19 मार्च से शुरू होंगे व्रत, जानें घटस्थापना मुहूर्त, पूजा विधि और नौ दिनों का पूरा कैलेंडर


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का पर्व अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व रखता है। इस दौरान भक्त पूरे नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा अर्चना करते हैं और व्रत रखकर सुख शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च गुरुवार से होगी और इसका समापन 26 मार्च को होगा। इसी दिन महानवमी के साथ साथ राम नवमी का पावन पर्व भी मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि चैत्र नवरात्रि से ही हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी मानी जाती है।

    नवरात्रि के पहले दिन घरों और मंदिरों में घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है जिसे देवी पूजा का प्रारंभ माना जाता है। वर्ष 2026 में घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह लगभग 6:23 बजे से 7:32 बजे तक रहेगा। इसके अलावा यदि किसी कारणवश इस समय स्थापना न हो सके तो अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक भी घटस्थापना की जा सकती है। इस समय विधि विधान से कलश स्थापना करके मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है और नौ दिनों तक नियमित पूजा की जाती है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि जिस वार से शुरू होती है उसी आधार पर माता दुर्गा के आगमन का वाहन तय होता है। वर्ष 2026 में नवरात्रि गुरुवार से शुरू हो रही है इसलिए मान्यता है कि माता दुर्गा का आगमन हाथी पर होगा। हाथी को समृद्धि अच्छी वर्षा और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। विशेष बात यह है कि इस बार अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग भी एक ही दिन पड़ रहा है। 26 मार्च को अष्टमी और नवमी का संयुक्त पूजन कन्या पूजन और हवन किया जाएगा। इसी दिन राम नवमी का पर्व भी मनाया जाएगा जिससे यह दिन और भी अधिक शुभ माना जा रहा है।

    नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन मां शैलपुत्री दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी तीसरे दिन मां चंद्रघंटा चौथे दिन मां कूष्मांडा पांचवें दिन मां स्कंदमाता छठे दिन मां कात्यायनी सातवें दिन मां कालरात्रि आठवें दिन मां महागौरी और नवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। भक्त इन दिनों में अलग अलग भोग अर्पित करते हैं और मां से सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

    नवरात्रि के अंतिम दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार छोटी कन्याओं में देवी का स्वरूप माना जाता है। इस दिन कन्याओं को भोजन कराया जाता है उन्हें उपहार और दक्षिणा दी जाती है तथा हवन भी किया जाता है।

    पूजा विधि के अनुसार घटस्थापना से पहले घर और पूजा स्थान की साफ सफाई की जाती है। मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं कलश में जल सुपारी और सिक्का रखा जाता है तथा ऊपर आम के पत्ते और नारियल स्थापित किया जाता है। इसके बाद दीप जलाकर मां दुर्गा का ध्यान किया जाता है और दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है।

    नवरात्रि के दौरान भक्तों को सात्विक भोजन करना चाहिए रोज सुबह शाम मां दुर्गा की आरती करनी चाहिए और दान पुण्य करना चाहिए। वहीं मांस मदिरा का सेवन झूठ बोलना और क्रोध करने से बचने की सलाह दी जाती है। श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया नवरात्रि पर्व जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।

  • होलिका दहन पर वामपंथी कलुष

    होलिका दहन पर वामपंथी कलुष


    – कैलाश चन्द्र
    भारत की सांस्कृतिक स्मृति पर जितने हमले बाहरी आक्रांताओं ने नहीं किए, उससे कहीं अधिक गहरे और कहीं अधिक धूर्त हमले आज के वैचारिक उपनिवेशवादियों ने किए हैं। यह हमला तलवारों का नहीं, शब्दों का है। यह आक्रमण सीमाओं का नहीं, स्मृति का है।

    वस्‍तुत: आज जो लोग होली, होलिका दहन और प्रह्लाद की कथा को “ब्राह्मणवाद द्वारा एक दलित नारी को जलाए जाने” की घटना बताकर प्रस्तुत करते हैं, वे न परंपरा जानते हैं और न कथा समझते हैं। वे सिर्फ भारत की सांस्कृतिक संचेतना को उसकी अपनी कहानी से काट देना चाहते हैं।

    होलिका की वास्तविक कथा

    होलिका की कथा जितनी सरल है, उतनी ही गहन भी। कश्यप ऋषि और दिति की पुत्री तथा दिति की संतानों को स्वभाव वैचित्र्य के कारण दैत्य कहा गया है। सम्पूर्ण कथा श्रीमद्भागवत पुराण में बहुत विस्तार से कही गई है। भारतवर्ष में होने वाली अधिकांश भागवत कथाओं में भागवताचार्य अपनी कथा का प्रारम्भ यहीं से करते हैं। इस आधार पर होलिका दैत्यकुल की राजकुमारी व प्रिचिति की पत्नी और स्वरभानु की माता थी। वह एक संपूर्ण दैत्यवंशी, राक्षसी चरित्र है। उसका भाई हिरण्यकश्यप न केवल राजा था बल्कि अत्याचारी, अहंकारी और असुर प्रवृत्ति वाला शासक भी था।

    उसके सामने किसी “शोषित समुदाय” की कथा गढ़ना या उसे “दलित नारी उत्पीड़न” में बदल देना केवल अज्ञान नहीं एक सुनियोजित बौद्धिक छल है, जो भारतीय मिथकीय चेतना को वर्गीय, जातीय और जेंडरवादी चश्मे से दूषित करना चाहता है।

    धर्म और अधर्म का स्पष्ट संदेश

    यहां सत्य सरल है। होलिका किसी “अबला स्त्री” की कथा नहीं है। वह वरदान से सशक्त, छल से प्रेरित और अधर्म की सहायक थी। ब्रह्मा ने उसे अग्नि प्रतिरोध का वरदान दिया था, किन्तु वह वरदान धर्म विरोधी कर्मों के लिए नहीं था। जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठती है तो उसका जलना कर्मफल है। यह अन्याय के अंत, अधर्म की पराजय और सत्य की विजय का प्रतीक है।

    यही पुराणों का स्वर है और यही भारतीय संस्कृति की जीवंतता का मूलाधार भी है। पर आज इस कथा को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने वाले “कल्चरल मार्क्सिज्म” के प्रशिक्षित कार्यकर्ता इसे “ब्राह्मणों द्वारा स्त्री दहन” का उदाहरण बताते हैं। ये उनकी चाल पुरानी है। हर परंपरा को उत्पीडन का प्रमाण बनाओ। हर कथा को वर्ग संघर्ष के ढांचे में फिट करो। हर मूल्य को अपराधबोध में बदलो।

    वे राक्षसी को पीड़‍िता बना देते हैं, दैत्यकुल को जाति समूह कह देते हैं और धर्म-अधर्म की अनंत कथा को सत्ता विरोध के रंग में विकृत कर देते हैं। यही मानसिकता श्रीराम को साम्राज्यवादी, श्रीकृष्ण को चालबाज, माता दुर्गा को पीड़ित स्त्री और श्रीगणेश को उपहास का पात्र बना देती है।

    होलिका दहन का सांस्कृतिक अर्थ

    होलिका दहन का अर्थ किसी व्यक्ति, कुल या जाति का दमन नहीं है। यह जीवन की नकारात्मकता के दहन का संदेश है। यह नव वसंत, नवहर्ष, नई शुरुआत और सत्य के धारण एवं संरक्षण का पर्व है। इसमें प्रह्लाद की विजय, भक्ति की शक्ति और अधर्म के अंत का संदेश निहित है। इसे महिला विरोध, समाज विरोध या सत्ता विरोध की कहानी में बदलना हमारी परंपरा का नहीं बल्कि हमारी स्मृति का अपमान है।

    इतिहास के नाम पर फैलाया गया भ्रम

    भारतीय समाज को बांटने के लिए आज एक विचित्र वैचारिक नाटक रचा जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि ‘हिरण्यकश्यप’ शूद्र था, शूद्र तप नहीं कर सकते और गुरुकुल नहीं जा सकते। यह इतिहास नहीं बल्कि वैचारिक क्षुद्रता का प्रमाण है। जिन लोगों ने न शास्त्र पढ़े और न पुराण समझे, वे आज सोशल मीडिया की अधूरी जानकारी के आधार पर एक संपूर्ण सभ्यता को अपराधी सिद्ध करने में लगे हैं।

    भारतीय चेतना का मूल सत्य

    वास्तविकता यह है कि होलिका और हिरण्यकश्यप भारतीय चेतना में सदियों से अहंकार और अधर्म के प्रतीक रहे हैं। गुरुकुलों की शिक्षा में शस्त्र और शास्त्र का अध्ययन करने के बाद अहंकार के कारण वे अधर्म के मार्ग पर चले और भक्त प्रह्लाद सत्य के प्रतीक बने। जो लोग इस सरल सत्य को भी “सामाजिक न्याय” के चश्मे से विकृत करते हैं, वे न्याय के पक्षधर नहीं बल्कि भारतीय समाज को भीतर से तोड़ने वाले मानसिक उपनिवेशवाद के वाहक हैं।

    स्मृति और परंपरा की पुनर्स्थापना

    आज आवश्यकता किसी प्रतिक्रिया या प्रतिशोध की नहीं है। आवश्यकता है तथ्यों की पुनर्स्थापना की। हमें अपनी चेतना में सांस्कृतिक स्मृति को पुनः प्रखर करना होगा। परंपरा को आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों के ढांचे में कैद करने के स्थान पर उसके कालातीत संदेश को समझना होगा। यह संघर्ष एक कथा का न होकर भारतीय तत्वज्ञान, वांग्मय, दर्शन और वैचारिक संप्रभुता का है। इसलिए यह समझना सभी के लिए समान रूप से आवश्‍यक है कि ‘होलिका’ का जलना किसी स्त्री का दहन नहीं है। यह अत्याचार, असहिष्णुता, अधर्म, अनीति और असत्य के दहन का प्रतीक है। उसका अंत किसी समाज पर अत्याचार का नहीं बल्कि अधर्म की पराजय का उत्सव है।

    आज भारत की सभ्यता इस वैचारिक आक्रमण को पहचान चुकी है। वह जानती है कि हमारी परंपराएं हिंसा की नहीं बल्कि समरसता की उपज हैं। होलिका दहन उसी समरसता का उत्सव है, अहंकार के अंत और सत्य के आरंभ का पर्व। अत: हमेशा ही अपने समय में वर्तमान काल की हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस वैचारिक धुंध में भी स्पष्ट देख सकें और यह कह सकें कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए भारतीयता चाहिए, न कि वह वैचारिक चश्मा जो हर कथा को संघर्ष, हर पात्र को पीड़‍ित और हर पर्व को अपराध में बदल देता है।

    अंत में यही कि होलिका दहन पर कलुष केवल परंपरा का नहीं बल्कि विवेक का अपमान है। इसे समझना और इस भ्रम को तोड़ना आज केवल सांस्कृतिक कर्तव्य नहीं यह हम सभी की राष्ट्रीय आवश्यकता है।

    (लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्‍ठ स्‍तम्‍भकार हैं)

  • Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नाराज हो सकते हैं भोलेनाथ!

    Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नाराज हो सकते हैं भोलेनाथ!


    नई दिल्ली । महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित सबसे पावन पर्वों में से एक है. इस दिन भक्त व्रत रखकर रात्रि जागरण कर और शिवलिंग पर जल-अभिषेक कर भोलेनाथ की विशेष कृपा पाने की कामना करते हैं. पंचांग के अनुसार साल 2026 में 15 फरवरी को महाशिवरात्रि का व्रत रखा जाएगा. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं लेकिन अगर पूजा-व्रत में कुछ गलतियां हो जाएं तो इसका फल उल्टा भी हो सकता है. आइए जानते हैं महाशिवरात्रि के दिन कौन-सी गलतियां भूलकर भी नहीं करनी चाहिए.

    महाशिवरात्रि के दिन न करें ये काम!

    केतकी के फूल: पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने केतकी के फूल को अपनी पूजा से वर्जित कर दिया था. इसलिए भूलकर भी इसे शिवलिंग पर न अर्पित करें. सिंदूर या कुमकुम: शिवजी वैरागी हैं और सिंदूर सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है जिसे महादेव पर नहीं चढ़ाया जाता. उनकी पूजा में भस्म का उपयोग सही माना जाता है. तुलसी दल: भगवान शिव की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित है. इसकी जगह आप बेलपत्र का इस्तेमाल करें. हल्दी: हल्दी का संबंध स्त्री सौंदर्य से है जबकि शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है. इसलिए शिवजी को हल्दी नहीं चढ़ानी चाहिए.

    बेलपत्र चढ़ाते समय रखें ध्यान

    हमेशा तीन पत्तियों वाला बेलपत्र ही चढ़ाएं. पत्तियां कहीं से कटी-फटी या सूखी नहीं होनी चाहिए. वहीं बेलपत्र का चिकना हिस्सा शिवलिंग की तरफ होना चाहिए.

    शंख से जल अर्पित करना
    भगवान विष्णु की पूजा में शंख अनिवार्य है लेकिन शिवजी की पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित है. शास्त्रों के अनुसार महादेव ने शंखचूड़ नामक असुर का वध किया था इसलिए शिवलिंग का अभिषेक शंख से नहीं करना चाहिए. इसके लिए तांबे या पीतल के लोटे का उपयोग करें.

    खान-पान और व्यवहार की सावधानियां

    तामसिक भोजन: महाशिवरात्रि के दिन प्याज लहसुन मांस या मदिरा का सेवन बिल्कुल न करें. काले कपड़े: पूजा के दौरान काले रंग के वस्त्र पहनने से बचना चाहिए. इस दिन हरा सफेद या पीला रंग शुभ माना जाता है. अनुशासन: इस दिन किसी का अपमान न करें न ही घर में क्लेश करें. शिव भक्ति में मन को शांत रखें.

    शिवलिंग की आधी परिक्रमा न करें?

    अक्सर लोग जोश में आकर शिवलिंग की पूरी परिक्रमा कर लेते हैं लेकिन नियम के अनुसार शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती. जहां से अभिषेक का जल बाहर निकलता है (जिसे जलाधारी या निर्मली कहते हैं) उसे लांघना अशुभ माना जाता है. हमेशा वहीं से वापस मुड़ जाना चाहिए.