Tag: Hindu festivals

  • चैत्र नवरात्रि 2026 दुर्गाष्टमी पर ऐसे करें मां महागौरी की पूजा हर मनोकामना होगी पूर्ण

    चैत्र नवरात्रि 2026 दुर्गाष्टमी पर ऐसे करें मां महागौरी की पूजा हर मनोकामना होगी पूर्ण


    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है और इसके आठवें दिन आने वाली दुर्गाष्टमी या महाष्टमी का विशेष महत्व होता है यह दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी को समर्पित माना जाता है जो शुद्धता शांति और सौभाग्य की प्रतीक हैं इस दिन विधि विधान से पूजा करने पर भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है

    दृक पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि 25 मार्च 2026 को दोपहर 1 बजकर 50 मिनट से प्रारंभ होगी और 26 मार्च 2026 को सुबह 11 बजकर 48 मिनट तक रहेगी उदय तिथि के अनुसार दुर्गाष्टमी 26 मार्च को मनाई जाएगी इसलिए इस दिन पूजा और कन्या पूजन का विशेष महत्व रहेगा

    दुर्गाष्टमी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए इसके बाद पूजा स्थल को साफ कर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मां महागौरी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें पूजा के दौरान कुमकुम रोली अक्षत चंदन और पुष्प अर्पित करें तथा घी या कपूर का दीपक जलाएं इसके बाद पूरे श्रद्धा भाव से मां का ध्यान करते हुए उनके मूल मंत्र ॐ देवी महागौर्यै नमः का कम से कम 108 बार जाप करें साथ ही दुर्गा सप्तशती या महागौरी स्तोत्र का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है

    मां महागौरी का स्वरूप अत्यंत शांत और दिव्य माना जाता है वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं और वृषभ पर विराजमान रहती हैं उनके चार हाथों में त्रिशूल और डमरू शोभा देते हैं उनकी पूजा करने से जीवन के पापों का नाश होता है मन की शुद्धि होती है और भय तथा नकारात्मकता दूर होती है

    इस दिन मां को सफेद वस्तुएं अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है जैसे खीर नारियल केले पंचामृत और अन्य सात्विक मिठाइयां भोग लगाते समय मंत्र जाप करना चाहिए और बाद में प्रसाद सभी में बांटना चाहिए इससे मां की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख समृद्धि बनी रहती है

    दुर्गाष्टमी के दिन कन्या पूजन का भी अत्यधिक महत्व है इस दिन छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है उनके पैर धोकर तिलक लगाया जाता है और उन्हें चुनरी फूल मिठाई और दक्षिणा भेंट की जाती है ऐसा करने से मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण करती हैं

    इसके अलावा इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से भी जीवन की बाधाएं दूर होती हैं पितृ दोष या कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए चांदी के नाग नागिन की पूजा कर उन्हें नदी में प्रवाहित करना शुभ माना जाता है साथ ही पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाकर सरसों के तेल का दीपक जलाने से घर में सुख शांति और समृद्धि का वास होता है

    दुर्गाष्टमी का यह पावन दिन भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और आस्था का प्रतीक है यदि इस दिन पूरी श्रद्धा और नियम के साथ मां महागौरी की पूजा की जाए तो जीवन में शांति सफलता और खुशहाली का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है

  • नवरात्रि का छठा दिन ऐसे करें मां कात्यायनी की आराधना हर बाधा होगी दूर और मनोकामना होगी पूर्ण

    नवरात्रि का छठा दिन ऐसे करें मां कात्यायनी की आराधना हर बाधा होगी दूर और मनोकामना होगी पूर्ण

    नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का छठा दिन मां दुर्गा के शक्तिशाली स्वरूप मां कात्यायनी को समर्पित होता है और वर्ष 2026 में यह पावन दिन 24 मार्च को मनाया जाएगा धार्मिक ग्रंथों में मां कात्यायनी को आदिशक्ति का तेजस्वी और पराक्रमी रूप बताया गया है इनकी उपासना करने से भक्तों को साहस शक्ति और हर प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिलती है साथ ही जीवन में विजय और सफलता का मार्ग भी प्रशस्त होता है

    मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और प्रभावशाली माना जाता है उनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला होता है और वे सिंह पर सवार रहती हैं उनके चार हाथों में तलवार कमल अभय मुद्रा और वर मुद्रा सुशोभित होती हैं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया था इसी कारण उन्हें कात्यायनी कहा जाता है यह देवी दानवों का संहार करने वाली और धर्म की रक्षा करने वाली मानी जाती हैं

    नवरात्रि के इस दिन पूजा करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ लाल या नारंगी रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए इसके बाद पूजा स्थान को साफ कर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मां कात्यायनी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें पूजा में कुमकुम रोली अक्षत चंदन और गेंदा जैसे नारंगी फूल अर्पित करें एक पान चढ़ाकर अपनी मनोकामना मां के सामने व्यक्त करें और घी का दीपक तथा अगरबत्ती जलाकर विधिपूर्वक पूजा करें इसके बाद मां की कथा सुनना या पढ़ना और आरती करना शुभ माना जाता है

    मां कात्यायनी को शहद विशेष रूप से प्रिय माना जाता है इसलिए इस दिन शहद का भोग अवश्य लगाना चाहिए इसके अलावा हलवा खीर मीठा पान और मौसमी फल भी अर्पित किए जा सकते हैं भोग हमेशा सात्विक होना चाहिए और लहसुन प्याज से परहेज करना चाहिए भोग लगाने के बाद प्रसाद को सभी में बांटना चाहिए इससे घर में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है

    मंत्र जाप का इस दिन विशेष महत्व होता है मां कात्यायनी के मूल मंत्र ॐ देवी कात्यायन्यै नमः का 108 या 1008 बार जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है इसके साथ ही प्रार्थना और स्तुति मंत्रों का उच्चारण भी किया जा सकता है मंत्र जाप करते समय मन को एकाग्र रखना चाहिए और माला का उपयोग करना लाभकारी होता है इससे मानसिक शक्ति बढ़ती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है

    नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा करने से भय शत्रु और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है यह दिन विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जो जीवन में साहस और आत्मविश्वास की कमी महसूस करते हैं विवाहित महिलाओं के लिए यह पूजा सौभाग्य और सुख समृद्धि प्रदान करने वाली मानी जाती है

    इस दिन कुछ विशेष उपाय भी किए जा सकते हैं जैसे मां को नारंगी फूलों की माला अर्पित करना शहद का दान करना और पूरे दिन मां के मंत्रों का जाप करना इन उपायों से माता रानी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं धीरे धीरे समाप्त होने लगती हैं पूरी श्रद्धा और नियम के साथ मां कात्यायनी की पूजा करने से भक्तों को न केवल आध्यात्मिक शक्ति मिलती है बल्कि जीवन में सफलता और संतुलन भी प्राप्त होता है

  • चैत्र नवरात्रि 2026: पहला और अष्टमी व्रत रखने वाले जान लें ये जरूरी नियम, तभी मिलेगा पूजा का पूरा फल

    चैत्र नवरात्रि 2026: पहला और अष्टमी व्रत रखने वाले जान लें ये जरूरी नियम, तभी मिलेगा पूजा का पूरा फल

    नई दिल्ली । आदिशक्ति दुर्गा को समर्पित चैत्र नवरात्रि का पर्व इस वर्ष 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च 2026 तक चलेगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग केवल पहला दिन और अष्टमी का व्रत रखते हैं।धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्र का पहला दिन संकल्प का प्रतीक होता है, जबकि अष्टमी पूर्णता का प्रतीक मानी जाती है। इन दोनों दिनों का व्रत नियम और श्रद्धा के साथ करने से पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है।

    पहले दिन के व्रत का महत्व
    नवरात्र के पहले दिन सुबह स्नान कर साफ कपड़े पहनने के बाद कलश स्थापना के साथ व्रत की शुरुआत की जाती है। इस दिन भक्त मां दुर्गा की पूजा कर अपने संकल्प लेते हैं। घर में अखंड ज्योति जलाने और नियमित आरती करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और यह पूरे नवरात्र की आध्यात्मिक यात्रा की नींव माना जाता है।

    अष्टमी व्रत का महत्व

    चैत्र नवरात्रि में अष्टमी को महाष्टमी कहा जाता है। इस दिन विशेष रूप से Mahagauri की पूजा की जाती है। अष्टमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है, जिसमें छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर भोजन कराया जाता है। मान्यता है कि इससे नवरात्रि का व्रत पूर्ण माना जाता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

    व्रत के दौरान रखें इन बातों का ध्यान

    नवरात्रि में व्रत रखने वाले भक्तों को सात्विक आहार का पालन करना चाहिए। फलाहार, साबूदाना, कुट्टू का आटा और फल ऊर्जा देने में सहायक होते हैं। व्रत के दौरान अधिक नमक और मसालों से बचने की सलाह दी जाती है ताकि मन शांत और स्थिर बना रहे। धार्मिक मान्यता है कि संयम, श्रद्धा और नियमों के साथ किया गया व्रत ही भक्तों को मां दुर्गा का आशीर्वाद दिलाता है और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाता है।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: 19 मार्च से शुरू होंगे व्रत, जानें घटस्थापना मुहूर्त, पूजा विधि और नौ दिनों का पूरा कैलेंडर

    चैत्र नवरात्रि 2026: 19 मार्च से शुरू होंगे व्रत, जानें घटस्थापना मुहूर्त, पूजा विधि और नौ दिनों का पूरा कैलेंडर


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का पर्व अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक महत्व रखता है। इस दौरान भक्त पूरे नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा अर्चना करते हैं और व्रत रखकर सुख शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च गुरुवार से होगी और इसका समापन 26 मार्च को होगा। इसी दिन महानवमी के साथ साथ राम नवमी का पावन पर्व भी मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि चैत्र नवरात्रि से ही हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी मानी जाती है।

    नवरात्रि के पहले दिन घरों और मंदिरों में घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है जिसे देवी पूजा का प्रारंभ माना जाता है। वर्ष 2026 में घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह लगभग 6:23 बजे से 7:32 बजे तक रहेगा। इसके अलावा यदि किसी कारणवश इस समय स्थापना न हो सके तो अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक भी घटस्थापना की जा सकती है। इस समय विधि विधान से कलश स्थापना करके मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है और नौ दिनों तक नियमित पूजा की जाती है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि जिस वार से शुरू होती है उसी आधार पर माता दुर्गा के आगमन का वाहन तय होता है। वर्ष 2026 में नवरात्रि गुरुवार से शुरू हो रही है इसलिए मान्यता है कि माता दुर्गा का आगमन हाथी पर होगा। हाथी को समृद्धि अच्छी वर्षा और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। विशेष बात यह है कि इस बार अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग भी एक ही दिन पड़ रहा है। 26 मार्च को अष्टमी और नवमी का संयुक्त पूजन कन्या पूजन और हवन किया जाएगा। इसी दिन राम नवमी का पर्व भी मनाया जाएगा जिससे यह दिन और भी अधिक शुभ माना जा रहा है।

    नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन मां शैलपुत्री दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी तीसरे दिन मां चंद्रघंटा चौथे दिन मां कूष्मांडा पांचवें दिन मां स्कंदमाता छठे दिन मां कात्यायनी सातवें दिन मां कालरात्रि आठवें दिन मां महागौरी और नवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। भक्त इन दिनों में अलग अलग भोग अर्पित करते हैं और मां से सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

    नवरात्रि के अंतिम दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार छोटी कन्याओं में देवी का स्वरूप माना जाता है। इस दिन कन्याओं को भोजन कराया जाता है उन्हें उपहार और दक्षिणा दी जाती है तथा हवन भी किया जाता है।

    पूजा विधि के अनुसार घटस्थापना से पहले घर और पूजा स्थान की साफ सफाई की जाती है। मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं कलश में जल सुपारी और सिक्का रखा जाता है तथा ऊपर आम के पत्ते और नारियल स्थापित किया जाता है। इसके बाद दीप जलाकर मां दुर्गा का ध्यान किया जाता है और दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है।

    नवरात्रि के दौरान भक्तों को सात्विक भोजन करना चाहिए रोज सुबह शाम मां दुर्गा की आरती करनी चाहिए और दान पुण्य करना चाहिए। वहीं मांस मदिरा का सेवन झूठ बोलना और क्रोध करने से बचने की सलाह दी जाती है। श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया नवरात्रि पर्व जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।

  • होलिका दहन पर वामपंथी कलुष

    होलिका दहन पर वामपंथी कलुष


    – कैलाश चन्द्र
    भारत की सांस्कृतिक स्मृति पर जितने हमले बाहरी आक्रांताओं ने नहीं किए, उससे कहीं अधिक गहरे और कहीं अधिक धूर्त हमले आज के वैचारिक उपनिवेशवादियों ने किए हैं। यह हमला तलवारों का नहीं, शब्दों का है। यह आक्रमण सीमाओं का नहीं, स्मृति का है।

    वस्‍तुत: आज जो लोग होली, होलिका दहन और प्रह्लाद की कथा को “ब्राह्मणवाद द्वारा एक दलित नारी को जलाए जाने” की घटना बताकर प्रस्तुत करते हैं, वे न परंपरा जानते हैं और न कथा समझते हैं। वे सिर्फ भारत की सांस्कृतिक संचेतना को उसकी अपनी कहानी से काट देना चाहते हैं।

    होलिका की वास्तविक कथा

    होलिका की कथा जितनी सरल है, उतनी ही गहन भी। कश्यप ऋषि और दिति की पुत्री तथा दिति की संतानों को स्वभाव वैचित्र्य के कारण दैत्य कहा गया है। सम्पूर्ण कथा श्रीमद्भागवत पुराण में बहुत विस्तार से कही गई है। भारतवर्ष में होने वाली अधिकांश भागवत कथाओं में भागवताचार्य अपनी कथा का प्रारम्भ यहीं से करते हैं। इस आधार पर होलिका दैत्यकुल की राजकुमारी व प्रिचिति की पत्नी और स्वरभानु की माता थी। वह एक संपूर्ण दैत्यवंशी, राक्षसी चरित्र है। उसका भाई हिरण्यकश्यप न केवल राजा था बल्कि अत्याचारी, अहंकारी और असुर प्रवृत्ति वाला शासक भी था।

    उसके सामने किसी “शोषित समुदाय” की कथा गढ़ना या उसे “दलित नारी उत्पीड़न” में बदल देना केवल अज्ञान नहीं एक सुनियोजित बौद्धिक छल है, जो भारतीय मिथकीय चेतना को वर्गीय, जातीय और जेंडरवादी चश्मे से दूषित करना चाहता है।

    धर्म और अधर्म का स्पष्ट संदेश

    यहां सत्य सरल है। होलिका किसी “अबला स्त्री” की कथा नहीं है। वह वरदान से सशक्त, छल से प्रेरित और अधर्म की सहायक थी। ब्रह्मा ने उसे अग्नि प्रतिरोध का वरदान दिया था, किन्तु वह वरदान धर्म विरोधी कर्मों के लिए नहीं था। जब वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठती है तो उसका जलना कर्मफल है। यह अन्याय के अंत, अधर्म की पराजय और सत्य की विजय का प्रतीक है।

    यही पुराणों का स्वर है और यही भारतीय संस्कृति की जीवंतता का मूलाधार भी है। पर आज इस कथा को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने वाले “कल्चरल मार्क्सिज्म” के प्रशिक्षित कार्यकर्ता इसे “ब्राह्मणों द्वारा स्त्री दहन” का उदाहरण बताते हैं। ये उनकी चाल पुरानी है। हर परंपरा को उत्पीडन का प्रमाण बनाओ। हर कथा को वर्ग संघर्ष के ढांचे में फिट करो। हर मूल्य को अपराधबोध में बदलो।

    वे राक्षसी को पीड़‍िता बना देते हैं, दैत्यकुल को जाति समूह कह देते हैं और धर्म-अधर्म की अनंत कथा को सत्ता विरोध के रंग में विकृत कर देते हैं। यही मानसिकता श्रीराम को साम्राज्यवादी, श्रीकृष्ण को चालबाज, माता दुर्गा को पीड़ित स्त्री और श्रीगणेश को उपहास का पात्र बना देती है।

    होलिका दहन का सांस्कृतिक अर्थ

    होलिका दहन का अर्थ किसी व्यक्ति, कुल या जाति का दमन नहीं है। यह जीवन की नकारात्मकता के दहन का संदेश है। यह नव वसंत, नवहर्ष, नई शुरुआत और सत्य के धारण एवं संरक्षण का पर्व है। इसमें प्रह्लाद की विजय, भक्ति की शक्ति और अधर्म के अंत का संदेश निहित है। इसे महिला विरोध, समाज विरोध या सत्ता विरोध की कहानी में बदलना हमारी परंपरा का नहीं बल्कि हमारी स्मृति का अपमान है।

    इतिहास के नाम पर फैलाया गया भ्रम

    भारतीय समाज को बांटने के लिए आज एक विचित्र वैचारिक नाटक रचा जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि ‘हिरण्यकश्यप’ शूद्र था, शूद्र तप नहीं कर सकते और गुरुकुल नहीं जा सकते। यह इतिहास नहीं बल्कि वैचारिक क्षुद्रता का प्रमाण है। जिन लोगों ने न शास्त्र पढ़े और न पुराण समझे, वे आज सोशल मीडिया की अधूरी जानकारी के आधार पर एक संपूर्ण सभ्यता को अपराधी सिद्ध करने में लगे हैं।

    भारतीय चेतना का मूल सत्य

    वास्तविकता यह है कि होलिका और हिरण्यकश्यप भारतीय चेतना में सदियों से अहंकार और अधर्म के प्रतीक रहे हैं। गुरुकुलों की शिक्षा में शस्त्र और शास्त्र का अध्ययन करने के बाद अहंकार के कारण वे अधर्म के मार्ग पर चले और भक्त प्रह्लाद सत्य के प्रतीक बने। जो लोग इस सरल सत्य को भी “सामाजिक न्याय” के चश्मे से विकृत करते हैं, वे न्याय के पक्षधर नहीं बल्कि भारतीय समाज को भीतर से तोड़ने वाले मानसिक उपनिवेशवाद के वाहक हैं।

    स्मृति और परंपरा की पुनर्स्थापना

    आज आवश्यकता किसी प्रतिक्रिया या प्रतिशोध की नहीं है। आवश्यकता है तथ्यों की पुनर्स्थापना की। हमें अपनी चेतना में सांस्कृतिक स्मृति को पुनः प्रखर करना होगा। परंपरा को आधुनिक राजनीतिक सिद्धांतों के ढांचे में कैद करने के स्थान पर उसके कालातीत संदेश को समझना होगा। यह संघर्ष एक कथा का न होकर भारतीय तत्वज्ञान, वांग्मय, दर्शन और वैचारिक संप्रभुता का है। इसलिए यह समझना सभी के लिए समान रूप से आवश्‍यक है कि ‘होलिका’ का जलना किसी स्त्री का दहन नहीं है। यह अत्याचार, असहिष्णुता, अधर्म, अनीति और असत्य के दहन का प्रतीक है। उसका अंत किसी समाज पर अत्याचार का नहीं बल्कि अधर्म की पराजय का उत्सव है।

    आज भारत की सभ्यता इस वैचारिक आक्रमण को पहचान चुकी है। वह जानती है कि हमारी परंपराएं हिंसा की नहीं बल्कि समरसता की उपज हैं। होलिका दहन उसी समरसता का उत्सव है, अहंकार के अंत और सत्य के आरंभ का पर्व। अत: हमेशा ही अपने समय में वर्तमान काल की हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस वैचारिक धुंध में भी स्पष्ट देख सकें और यह कह सकें कि भारतीय संस्कृति को समझने के लिए भारतीयता चाहिए, न कि वह वैचारिक चश्मा जो हर कथा को संघर्ष, हर पात्र को पीड़‍ित और हर पर्व को अपराध में बदल देता है।

    अंत में यही कि होलिका दहन पर कलुष केवल परंपरा का नहीं बल्कि विवेक का अपमान है। इसे समझना और इस भ्रम को तोड़ना आज केवल सांस्कृतिक कर्तव्य नहीं यह हम सभी की राष्ट्रीय आवश्यकता है।

    (लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्‍ठ स्‍तम्‍भकार हैं)

  • Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नाराज हो सकते हैं भोलेनाथ!

    Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर भूलकर भी न करें ये गलतियां, वरना नाराज हो सकते हैं भोलेनाथ!


    नई दिल्ली । महाशिवरात्रि भगवान शिव को समर्पित सबसे पावन पर्वों में से एक है. इस दिन भक्त व्रत रखकर रात्रि जागरण कर और शिवलिंग पर जल-अभिषेक कर भोलेनाथ की विशेष कृपा पाने की कामना करते हैं. पंचांग के अनुसार साल 2026 में 15 फरवरी को महाशिवरात्रि का व्रत रखा जाएगा. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं लेकिन अगर पूजा-व्रत में कुछ गलतियां हो जाएं तो इसका फल उल्टा भी हो सकता है. आइए जानते हैं महाशिवरात्रि के दिन कौन-सी गलतियां भूलकर भी नहीं करनी चाहिए.

    महाशिवरात्रि के दिन न करें ये काम!

    केतकी के फूल: पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने केतकी के फूल को अपनी पूजा से वर्जित कर दिया था. इसलिए भूलकर भी इसे शिवलिंग पर न अर्पित करें. सिंदूर या कुमकुम: शिवजी वैरागी हैं और सिंदूर सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है जिसे महादेव पर नहीं चढ़ाया जाता. उनकी पूजा में भस्म का उपयोग सही माना जाता है. तुलसी दल: भगवान शिव की पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित है. इसकी जगह आप बेलपत्र का इस्तेमाल करें. हल्दी: हल्दी का संबंध स्त्री सौंदर्य से है जबकि शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है. इसलिए शिवजी को हल्दी नहीं चढ़ानी चाहिए.

    बेलपत्र चढ़ाते समय रखें ध्यान

    हमेशा तीन पत्तियों वाला बेलपत्र ही चढ़ाएं. पत्तियां कहीं से कटी-फटी या सूखी नहीं होनी चाहिए. वहीं बेलपत्र का चिकना हिस्सा शिवलिंग की तरफ होना चाहिए.

    शंख से जल अर्पित करना
    भगवान विष्णु की पूजा में शंख अनिवार्य है लेकिन शिवजी की पूजा में शंख का प्रयोग वर्जित है. शास्त्रों के अनुसार महादेव ने शंखचूड़ नामक असुर का वध किया था इसलिए शिवलिंग का अभिषेक शंख से नहीं करना चाहिए. इसके लिए तांबे या पीतल के लोटे का उपयोग करें.

    खान-पान और व्यवहार की सावधानियां

    तामसिक भोजन: महाशिवरात्रि के दिन प्याज लहसुन मांस या मदिरा का सेवन बिल्कुल न करें. काले कपड़े: पूजा के दौरान काले रंग के वस्त्र पहनने से बचना चाहिए. इस दिन हरा सफेद या पीला रंग शुभ माना जाता है. अनुशासन: इस दिन किसी का अपमान न करें न ही घर में क्लेश करें. शिव भक्ति में मन को शांत रखें.

    शिवलिंग की आधी परिक्रमा न करें?

    अक्सर लोग जोश में आकर शिवलिंग की पूरी परिक्रमा कर लेते हैं लेकिन नियम के अनुसार शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती. जहां से अभिषेक का जल बाहर निकलता है (जिसे जलाधारी या निर्मली कहते हैं) उसे लांघना अशुभ माना जाता है. हमेशा वहीं से वापस मुड़ जाना चाहिए.

  • बसंत पंचमी पर इन 5 स्थानों पर जरूर जलाएं दीपक

    बसंत पंचमी पर इन 5 स्थानों पर जरूर जलाएं दीपक


    नई दिल्ली ।माँ सरस्वती के सम्मुख पूजा स्थानसबसे पहला दीपक अपने घर के मंदिर में माँ सरस्वती की प्रतिमा या चित्र के सामने जलाएं। यह दीपक घी का होना चाहिए। दीपक जलाते समय अपनी करियर संबंधी बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करें। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक स्पष्टता आती है।

    अध्ययन कक्ष या स्टडी टेबल विद्यार्थियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए यह स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। अपनी स्टडी टेबल या जिस स्थान पर आप बैठकर काम करते हैं, वहाँ एक छोटा दीपक जलाएं। वास्तु के अनुसार, इससे उस स्थान की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और पढ़ाई या काम में एकाग्रताबढ़ती है। घर की उत्तर-पूर्व दिशा ईशान कोणवास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व दिशा को देवताओं का स्थान माना गया है। बसंत पंचमी की शाम को इस कोने में एक शुद्ध घी का दीपक जलाने से करियर में नए अवसर प्राप्त होते हैं और अटके हुए काम बनने लगते हैं।

    तुलसी के पौधे के पास तुलसी को देवी लक्ष्मी का रूप माना जाता है और माँ सरस्वती के पूजन वाले दिन तुलसी के पास दीपक जलाने से सुख-समृद्धि और ज्ञान का संगम होता है। शाम के समय तुलसी के पास दीपक जलाने से पारिवारिक शांति बनी रहती है और करियर में आने वाले उतार-चढ़ाव कम होते हैं मुख्य द्वार के दोनों ओर घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाना ‘देहरी पूजन’ का हिस्सा है। मान्यता है कि बसंत पंचमी की शाम मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी का घर में आगमन होता है। यह आपके जीवन से अंधकार और असफलता को दूर कर सफलता के मार्ग प्रशस्त करता है।

    सफलता के लिए विशेष टिप
    दीपक जलाते समय उसमें थोड़ी सी हल्दी या केसर डालना बेहद शुभ माना जाता है, क्योंकि पीला रंग माँ सरस्वती को अत्यंत प्रिय है और यह गुरु ग्रह बृहस्पति को मजबूत करता है, जो करियर और पद-प्रतिष्ठा का कारक है।

  • Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति से जुड़े 7 जरूरी काम जो पुण्य की प्राप्ति के लिए हर किसी को करने चाहिए

    Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति से जुड़े 7 जरूरी काम जो पुण्य की प्राप्ति के लिए हर किसी को करने चाहिए

    नई दिल्ली| Makar Sankranti 2026 Puja Ke Upay: सनातन परंपरा में हर साल 14 या 15 जनवरी को मकर संक्रांति का महापर्व मनाया जाता है. हिंदू मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान सूर्य धनु राशि से निकलकर अपने पुत्र शनिदेव की राशि मकर में प्रवेश करते हैं. इस दिन स्नान, ध्यान और दान करने का बहुत ज्यादा महत्व होता है. मान्यता है कि इस दिन व्यक्ति सूर्य रश्मियों के पुण्य प्रभाव से पूरे साल सुख, सौभाग्य और आरोग्य को प्राप्त करता है. अलग-अलग प्रां​तों में अलग-अलग नाम से मनाए जाने वाले इस पावन पर्व को उत्तर भारत में खिचड़ी के नाम से जाना जाता है. आइए जानते हैं कि मकर संक्रांति के दिन व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति के लिए कौन से 7 काम जरूर करने चाहिए.

    1. तिल के तेल से करें मालिश

    हिंदू मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के पर्व पर तिल का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. मान्यता है कि संक्रांति के दिन व्यक्ति द्वारा तिल के तेल से मालिश करने से शुभता सूर्य की कृपा प्राप्त होती है. मान्यता है कि सूर्य देव की कृपा से पूरे साल व्यक्ति स्वस्थ रहता है.

    2. तिल का उबटन लगाएं

    हिंदू मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन गुडलक को पाने के लिए न सिर्फ तिल का तेल बल्कि तिल का उबटन भी लगाना चाहिए. मान्यता है कि तिल का उबटन लगाने से व्यक्ति कांतिवान बनता है.

    3. गंगा स्नान

    हिंदू मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. मान्यता कि संक्रांति के दिन पुण्यदायिनी मां गंगा के अमृतजल में लगाई गई तीन डुबकी अनंत पुण्य प्रदान करने वाली होती है.

    4. तिलयुक्त जल से करें स्नान

    हिंदू मान्यता के अनुसार यदि आप तिल के तेल से मालिश या उससे बना उबटन न लगा पाएं तो कम से कम अपने नहाने के पानी में तिल डालकर स्नान करें. मान्यता है​ कि ​मकर संक्रांति पर तिलयुक्त जल से स्नान करने पर व्यक्ति को सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है.

    5. पूजा में तिल से करें हवन

    हिंदू मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन स्नान-ध्यान के बाद हवन करने पर विशेष फल की प्राप्ति होती है. मकर संक्रांति के दिन आपके द्वारा की जाने वाली साधना-आराधना का पुण्यफल तब और बढ़ जाता है जब आप हवन सामग्री में तिल मिलाकर देवताओं के लिए विशेष रूप से हवन करते हैं. मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन तिल से हवन करने पर व्यक्ति पर लक्ष्मी और नारायण दोनों की कृपा बरसती है.

    6. जरूरतमंद लोगों को करें तिल का दान

    मकर संक्रांति के पावन पर्व पर स्नान के साथ दान का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन काले तिल के साथ गुड़ का दान करने पर न सिर्फ भगवान सूर्य बल्कि शनिदेव की कृपा भी अवश्य प्राप्त होती है.

    7. जरूर करें तिल से बना भोजन

    मकर संक्रांति पर पूजा के तमाम उपायों की तरह तिल से बना भोजन भी शुभ फल प्रदान करता है. ऐसे में आप इस दिन तिल से बने लड्डू, गजक, रेवड़ी आदि का सेवन अवश्य करें. मान्यता है कि प्रसाद स्वरूप तिल से बनी चीजों का सेवन करने पर सूर्य देव की विशेष कृपा बरसती है.