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  • सनातन धर्म क्यों कहलाता है शाश्वत? जानिए जीवन, कर्म और पुनर्जन्म से जुड़े इसके मूल सिद्धांत

    सनातन धर्म क्यों कहलाता है शाश्वत? जानिए जीवन, कर्म और पुनर्जन्म से जुड़े इसके मूल सिद्धांत


    नई दिल्ली । सनातन धर्म को भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा की आधारशिला माना जाता है। हजारों वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी करोड़ों लोगों के जीवन का मार्गदर्शन कर रही है। सनातन शब्द का अर्थ ही है – जो सदैव बना रहे, जिसका न आदि हो और न अंत। यही कारण है कि सनातन धर्म को शाश्वत धर्म भी कहा जाता है।

    महामंडलेश्वर स्वामी आदित्य कृष्ण गिरि महाराज के अनुसार सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के संपूर्ण जीवन को दिशा देने वाला दर्शन है। उनके अनुसार यह धर्म जीवन के उन मूल प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करता है, जिनके बारे में प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी विचार करता है। जैसे मनुष्य इस संसार में क्यों आया है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है, उसे अपने कर्म कैसे करने चाहिए और जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग क्या है।

    सनातन परंपरा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ माना गया है। इन सिद्धांतों के माध्यम से व्यक्ति को संतुलित और मर्यादित जीवन जीने की प्रेरणा दी जाती है। यही वजह है कि सनातन धर्म को केवल एक धार्मिक व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी माना जाता है।

    सनातन धर्म की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी उत्सव परंपरा भी है। वर्षभर में मनाए जाने वाले विभिन्न पर्व और त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति सम्मान और आध्यात्मिक उन्नति के अवसर भी प्रदान करते हैं। भारतीय संस्कृति में उत्सवों को जीवन में सकारात्मकता, ऊर्जा और सामूहिकता का प्रतीक माना गया है।

    पुनर्जन्म की अवधारणा भी सनातन दर्शन का एक महत्वपूर्ण अंग है। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस मान्यता के अनुसार व्यक्ति के कर्म उसके भविष्य को प्रभावित करते हैं और आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से गुजरती है। मोक्ष को इस चक्र से मुक्ति की अंतिम अवस्था माना गया है।

    स्वामी आदित्य कृष्ण गिरि महाराज का कहना है कि सनातन धर्म प्रकृति के शाश्वत नियमों और जीवन के निरंतर परिवर्तन को स्वीकार करता है। ऋतुओं का बदलना, जीवन और मृत्यु का चक्र तथा सृष्टि के निरंतर परिवर्तन को यह धर्म प्राकृतिक सत्य के रूप में देखता है। इसी कारण यह परंपरा समय के साथ स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखने में सक्षम रही है।

    धार्मिक विद्वानों के अनुसार सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी व्यापकता और समावेशी दृष्टिकोण है। यह विभिन्न विचारधाराओं, आध्यात्मिक मार्गों और उपासना पद्धतियों को स्थान देता है। यही कारण है कि हजारों वर्षों के इतिहास के बाद भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है और यह आज भी करोड़ों लोगों को जीवन के मूल्यों, कर्तव्यों और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखा रहा है।

    सनातन धर्म का मूल संदेश यही है कि मनुष्य अपने कर्मों, नैतिक मूल्यों और आत्मिक विकास के माध्यम से जीवन को श्रेष्ठ बना सकता है। यही विचार इसे एक शाश्वत और निरंतर प्रवाहित होने वाली परंपरा के रूप में स्थापित करते हैं।

  • Amalaki Ekadashi 2026: नोट करें आमलकी एकादशी की पूजा की विधि और शुभ मुहूर्त, भगवान विष्णु के भोग में रखें ये चीजें

    Amalaki Ekadashi 2026: नोट करें आमलकी एकादशी की पूजा की विधि और शुभ मुहूर्त, भगवान विष्णु के भोग में रखें ये चीजें


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में कई व्रत ऐसे हैं जिनसे पुरानी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। एकादशी इन्हीं में से एक है। बता दें कि हर महीने 2 एकादशी पड़ती हैं। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। बता दें कि इस महीने अब आमलकी एकादशी पड़ने वाली है। हिंदू पंचांग के अनुसार आमलकी एकादशी 27 फरवरी को पड़ने वाली है। एकादशी व्रत को लेकर मान्यता है कि अगर सच्चे मन से इस दिन पूजा-अर्चना की जाए और व्रत रखा जाए भगवान विष्णु की कृपा से सारे रूके काम बन पड़ते हैं। भगवान की कृपा से करियर और शादी से जुड़ी बाधाएं दूर होती हैं। नीचे विस्तार से जानें कि इस बार अमालकी एकादशी की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त क्या है? साथ ही जानें पूजा की आसान सी विधि के बारे में…

    आमलकी एकादशी का महत्व
    बता दें कि आमलकी एकादशी हर साल फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि वाले दिन मनाई जाती है। लोग इसे रंगभरी एकादशी के नाम से भी जानते हैं। इस खास दिन पर आंवले के पेड़ की पूजा करना शुभ माना जाता है। दरअसल ऐसा माना जाता है कि आंवले की पूजा भगवान विष्णु के द्वारा ही हुई थी। ऐसे में इस दिन आंवले की पूजा का विशेष महत्व होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार विवाह के बाद पहली बार शिव और पार्वती मां इसी तिथि पर काशी आए थे। ऐसे में काशी में इस दिन लोग रंग खेलते हैं और शिव-पार्वती की धूमधाम के साथ पूजा करते हैं। आमलकी एकादशी व्रत की मान्यता इतनी ज्यादा है कि लोग मानते हैं कि इससे सारे पाप मिट जाते हैं।

    आमलकी एकादशी पूजा शुभ मुहूर्त

    आमलकी एकादशी शुक्रवार के दिन पड़ रहा है और इस वजह से इसका महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की भी पूजाै होगी। बता दें कि हिंदू कैलेंडर के अनुसार एकादशी की तिथि 26 फरवरी की रात 12 बजकर 6 मिनट पर हो रही है। इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी 27 फरवरी को 9 बजकर 48 मिनट पर होगी। ऐसे में आमलकी एकादशी 27 फरवरी को ही मनाई जाएगी। बात करें पूजा के शुभ मुहुर्त की तो आमलकी एकादशी वाले दिन सुबह 6 बजकर 15 मिनट से लेकर 9 बजकर 9 मिनट के बीच पूजा की जा सकती है। व्रत तभी पूरा होता है जब सही तरीके और सही समय पर इसका पारण किया जाए। आमलकी एकादशी का पारण 28 फरवरी को होगा। इसकी पूजा सुबह 7 बजकर 41 मिनट से लेकर 9 बजकर 8 मिनट के बीच किया जा सकता है।

    ऐसे करें आमलकी एकादशी की पूजा
    पूजा वाले दिन सुबह उठकर स्नान करके पीले रंग के कपड़े पहन लें। भगवान विष्णु का प्रिय रंग पीला है। इसी के साथ व्रत का संकप्ल लें। पूजा घर में भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर के आगे दीया और धूपबत्ती जलाएं। इसके बाद पीले रंग के वस्त्र, पीले फूल, अक्षत और तुलसी अर्पित करें। भोग लगाते वक्त उसमें तुलसी का पत्ता डाल दें। इसके बाद भगवान विष्णु के मंत्र जाप के साथ-साथ आमलकी एकादशी व्रत का पाठ कर लें। आरती के साथ ही पूजा संपन्न करें।