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  • संसद में हंगामे पर किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी को घेरा, कहा बहस छोड़कर राजनीतिक दबाव की रणनीति नहीं चलेगी

    संसद में हंगामे पर किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी को घेरा, कहा बहस छोड़कर राजनीतिक दबाव की रणनीति नहीं चलेगी

    नई दिल्ली ।केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद के मॉनसून सत्र में लगातार हुए हंगामे और सदन की कार्यवाही बाधित होने को लेकर विपक्ष पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि संसद किसी एक दल की नहीं, बल्कि देश की जनता की संस्था है और इसका इस्तेमाल राजनीतिक दबाव या ब्लैकमेल के लिए नहीं किया जाना चाहिए। रिजिजू ने विपक्ष से सदन में सार्थक बहस और संवाद के जरिए मुद्दे उठाने की अपील की।

    रिजिजू ने संसद की कार्यवाही बाधित किए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रश्नकाल को रोकना, मंत्रियों की बात नहीं सुनना और चर्चा के प्रस्तावों को स्वीकार नहीं करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए उचित नहीं है। उनका कहना था कि एक तरफ विपक्ष सदन में चर्चा नहीं होने की शिकायत करता है और दूसरी तरफ जब विस्तृत बहस का अवसर दिया जाता है तो उसे स्वीकार नहीं करता।

    संसदीय कार्य मंत्री ने मॉनसून सत्र की कार्यवाही के आंकड़ों का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक लोकसभा निर्धारित समय का करीब 15 प्रतिशत और राज्यसभा लगभग 33 प्रतिशत ही चल सकी। बार-बार होने वाले व्यवधानों के कारण दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। रिजिजू ने कहा कि संसद में जनता से जुड़े विषयों पर चर्चा होना जरूरी है और लगातार हंगामे से लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचता है।

    रिजिजू ने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन से जुड़े मुद्दे को लेकर भी राहुल गांधी पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में इस विषय पर विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय देने और सवालों के जवाब देने का प्रस्ताव रखा था। रिजिजू के अनुसार, राहुल गांधी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि जब चर्चा का अवसर उपलब्ध कराया जा रहा हो तो उसे अस्वीकार करने के बाद संसद में पर्याप्त चर्चा नहीं होने की शिकायत करना उचित नहीं है।

    केंद्रीय मंत्री ने राहुल गांधी की संसदीय उपस्थिति को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि 17वीं लोकसभा में राहुल गांधी की उपस्थिति 51 प्रतिशत रही। रिजिजू ने कहा कि संसद में लंबी बहस के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करने वाले नेता को सदन में पर्याप्त समय नहीं मिलने की शिकायत नहीं करनी चाहिए।

    उन्होंने राहुल गांधी के विदेश दौरों का उल्लेख करते हुए भी उन पर निशाना साधा। रिजिजू ने आरोप लगाया कि विदेशों में भारतीय लोकतंत्र को लेकर सवाल उठाने के बजाय संसद के भीतर जवाबदेही और चर्चा की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता हंगामा नहीं, बल्कि संवाद और तथ्य आधारित बहस है।

    रिजिजू ने राहुल गांधी के हालिया पितृसत्ता संबंधी बयान को लेकर भी सवाल उठाए। राहुल गांधी ने पुणे में एक कार्यक्रम के दौरान महिलाओं की स्वतंत्रता और पितृसत्तात्मक सोच पर बात की थी। उन्होंने मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए महिलाओं को पिता, पति और बच्चों की संपत्ति मानने वाली सोच की आलोचना की थी।

    इसी बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए रिजिजू ने पूछा कि कांग्रेस और राहुल गांधी हिंदू परंपराओं को ही निशाना क्यों बनाते हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक महिलाओं की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाया और कहा कि समाज को बांटने के बजाय बेटियों को समान अवसर और सम्मान मिलना चाहिए। दोनों नेताओं के बयानों से संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस तेज होने के संकेत हैं।

  • नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग फिर तेज, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का दिया प्रस्ताव

    नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग फिर तेज, पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का दिया प्रस्ताव

    नई दिल्ली । नेपाल में एक बार फिर देश को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के गुट के राष्ट्रीय सम्मेलन में देश की पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर महत्वपूर्ण प्रस्ताव सामने आया। सम्मेलन में सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने की बात कही गई, जिसके बाद वहां के राजनीतिक माहौल में नई बहस शुरू हो गई है।

    नेपाल लंबे समय तक हिंदू राष्ट्र के रूप में पहचाना जाता था, लेकिन वर्ष 2008 में राजशाही के अंत और राजनीतिक परिवर्तन के बाद देश को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित किया गया। इसके बाद से हिंदू राष्ट्र की मांग अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक समूहों की ओर से समय-समय पर उठती रही है। हाल के दिनों में मधेश और तराई क्षेत्रों में सामने आए सांप्रदायिक तनाव तथा सामाजिक असंतोष के बीच इस मांग ने फिर जोर पकड़ा है।

    देउबा गुट के सम्मेलन में पारित प्रस्ताव में नेपाल की पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं को राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया। प्रस्ताव में सनातन धर्म की पहचान को आगे बढ़ाने के साथ हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति आधारित धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की बात भी कही गई। इसके साथ ही सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता, सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने पर जोर दिया गया।

    सम्मेलन के समापन समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ने अपने धार्मिक विश्वास को लेकर खुलकर बयान दिया। उन्होंने कहा कि वह हिंदू हैं और उन्हें यह कहने का अधिकार होना चाहिए कि वह हिंदू हैं। देउबा ने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि उनका रुख किसी समुदाय के विरोध में नहीं है। उनके इस बयान को नेपाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सम्मेलन में नेपाल के मौजूदा संविधान को लेकर भी चर्चा हुई। प्रस्ताव में कहा गया कि संविधान में जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप आवश्यक बदलाव किए जाने चाहिए। हालांकि, ऐसे किसी भी बदलाव के लिए सभी संबंधित समूहों के साथ बातचीत और सहमति की प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया गया। इससे संकेत मिलता है कि संविधान में धार्मिक पहचान से जुड़े किसी बदलाव को लेकर व्यापक राजनीतिक संवाद की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

    नेपाल में हिंदू राष्ट्र की बहाली का मुद्दा केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध देश की राजनीति, संविधान और सामाजिक संरचना से भी है। नेपाल में हिंदू और बौद्ध परंपराओं का ऐतिहासिक प्रभाव रहा है, जबकि देश में अन्य धार्मिक समुदाय भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं। ऐसे में हिंदू राष्ट्र की मांग के साथ धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों को लेकर भी बहस तेज होने की संभावना है।

    देउबा गुट की ओर से सामने आया प्रस्ताव नेपाली कांग्रेस के भीतर भी राजनीतिक चर्चा को प्रभावित कर सकता है। नेपाल की मुख्यधारा की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता, संवैधानिक व्यवस्था और पारंपरिक धार्मिक पहचान के बीच संतुलन को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। अब सम्मेलन में हिंदू राष्ट्र की पहचान को लेकर उठी आवाज ने इस बहस को फिर राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है। हालांकि, नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए संवैधानिक और राजनीतिक स्तर पर व्यापक प्रक्रिया से गुजरना होगा।

  • रविवार दोष से बढ़ सकती हैं आर्थिक और पारिवारिक परेशानियां, जानें इसके संकेत कारण और दूर करने के प्रभावी उपाय

    रविवार दोष से बढ़ सकती हैं आर्थिक और पारिवारिक परेशानियां, जानें इसके संकेत कारण और दूर करने के प्रभावी उपाय


    नई दिल्ली। रविवार का दिन सूर्य देव की उपासना के लिए सबसे शुभ माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा ऊर्जा नेतृत्व सम्मान और सफलता का कारक ग्रह माना गया है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य कमजोर हो या उससे जुड़ा रविवार दोष बनता हो तो जीवन के कई क्षेत्रों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रविवार दोष के कारण व्यक्ति को बार बार मेहनत के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिलती और सम्मान तथा आत्मविश्वास में भी कमी महसूस हो सकती है। हालांकि नियमित पूजा और कुछ पारंपरिक उपायों को अपनाकर इसके प्रभाव को कम करने की मान्यता है।

    ज्योतिष के अनुसार रविवार दोष बनने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। यदि कुंडली में सूर्य नीच राशि में हो शत्रु ग्रहों से पीड़ित हो या राहु और शनि जैसे ग्रहों का अशुभ प्रभाव हो तो रविवार दोष बनने की संभावना मानी जाती है। इसके अलावा सूर्य की कमजोर स्थिति व्यक्ति के आत्मबल और निर्णय क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है। ऐसे लोगों को करियर में बार बार बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है और सरकारी कार्यों में भी देरी होने की संभावना रहती है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रविवार दोष का असर केवल करियर या आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं रहता बल्कि इसका प्रभाव स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन पर भी पड़ सकता है। बार बार थकान महसूस होना आंखों से जुड़ी परेशानी आत्मविश्वास की कमी पिता के साथ मतभेद या समाज में सम्मान में कमी जैसी स्थितियों को भी सूर्य की कमजोरी से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि यह सभी बातें धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं।

    रविवार दोष से राहत पाने के लिए सूर्य देव की नियमित उपासना को विशेष महत्व दिया गया है। रविवार की सुबह स्नान के बाद तांबे के लोटे में जल लाल फूल रोली और अक्षत डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य देना शुभ माना जाता है। इसके साथ आदित्य हृदय स्तोत्र या गायत्री मंत्र का जाप करना भी लाभकारी माना जाता है। सूर्य मंत्र का नियमित जप आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में सहायक माना जाता है।

    धार्मिक मान्यता है कि रविवार के दिन गेहूं गुड़ तांबे के बर्तन लाल वस्त्र या लाल फल का दान करना शुभ फल देता है। जरूरतमंद लोगों की सहायता करना और बुजुर्गों विशेष रूप से पिता या पिता तुल्य व्यक्तियों का सम्मान करना भी सूर्य को मजबूत करने वाला उपाय माना गया है। इस दिन क्रोध अहंकार और असत्य से दूर रहने की भी सलाह दी जाती है।

    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार रविवार को सूर्यास्त के बाद तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से बचना चाहिए। नियमित रूप से सूर्य नमस्कार करने से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर होता है बल्कि मानसिक ऊर्जा और आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है। यदि किसी व्यक्ति को अपनी कुंडली में सूर्य की स्थिति को लेकर संदेह हो तो किसी योग्य ज्योतिष विशेषज्ञ से परामर्श लेकर ही उपाय करना उचित माना जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा विश्वास और सकारात्मक सोच के साथ किए गए उपाय व्यक्ति के जीवन में शुभ परिणाम ला सकते हैं। सूर्य देव की कृपा से मान सम्मान आत्मबल और सफलता प्राप्त होने की मान्यता है। इसलिए रविवार को आध्यात्मिक साधना आत्मअनुशासन और सेवा भाव के साथ बिताना शुभ माना जाता है।

  • बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षा पर बड़ा बयान: मंत्री ने दी इस्तीफे की चेतावनी, हिंदू हिंसा के दावों से बढ़ा तनाव

    बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षा पर बड़ा बयान: मंत्री ने दी इस्तीफे की चेतावनी, हिंदू हिंसा के दावों से बढ़ा तनाव



    नई दिल्ली। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। देश के धार्मिक मामलों के मंत्री काजी शाह मोफज्जल हुसैन कैकोबाद ने स्पष्ट कहा है कि वे अल्पसंख्यकों पर किसी भी तरह के अत्याचार या भेदभाव को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे और अगर जरूरत पड़ी तो अपने पद से इस्तीफा देने से भी पीछे नहीं हटेंगे। यह बयान उन्होंने ढाका में बांग्लादेश सेक्रेटेरिएट रिपोर्टर्स फोरम (BSRF) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दिया।

    मंत्री ने कहा कि देश में सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार और सुरक्षा मिलनी चाहिए और किसी भी समुदाय के खिलाफ हिंसा को राज्य स्तर पर गंभीरता से लिया जाएगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी दूसरे देश में होने वाली घटनाओं के आधार पर बांग्लादेश में किसी भी समुदाय के खिलाफ प्रतिक्रिया या हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय के खिलाफ कथित हमलों को लेकर विभिन्न संगठनों द्वारा चिंता जताई जा रही है। बांग्लादेश हिंदू-बौद्ध-ईसाई एकता परिषद (BHBCUC) के अनुसार, 4 अगस्त 2024 से 30 जून 2025 के बीच देश में 2,400 से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें हिंसा, घरों और संपत्तियों पर हमले और अन्य विवाद शामिल बताए गए हैं।

    वहीं, कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भी अल्पसंख्यक समुदाय पर हमलों में वृद्धि का दावा किया गया है, हालांकि सरकार की ओर से कई मामलों को स्थानीय विवाद या आपराधिक घटनाएं बताकर खारिज किया गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कुछ कट्टरपंथी समूहों की ओर से क्षेत्रीय स्तर पर तनावपूर्ण टिप्पणियां सामने आई हैं, जिससे हालात और संवेदनशील बन गए हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि वह सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी तरह की सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षा का मुद्दा केवल घरेलू नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति से भी जुड़ गया है, खासकर भारत-बांग्लादेश संबंधों के संदर्भ में। ऐसे में दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग इस मुद्दे को स्थिर करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि सरकार की ओर से सख्त संदेश के बावजूद अल्पसंख्यक सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है और इस मुद्दे पर निगरानी और संवाद दोनों की जरूरत महसूस की जा रही है।

  • बाबा बागेश्वर की हिन्दुओं से अपील… बोले- चार बच्चे पैदा करो…. एक RSS को समर्पित करो

    बाबा बागेश्वर की हिन्दुओं से अपील… बोले- चार बच्चे पैदा करो…. एक RSS को समर्पित करो

    नागपुर। महाराष्ट्र (Maharashtra) के नागपुर (Nagpur) में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान बागेश्वर धाम (Bageshwar Dham) के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र शास्त्री (Pandit Dhirendra Shastri) ने एक बड़ा बयान दिया है, जो चर्चा का विषय बन गया है. भारत दुर्गा मंदिर के शिलान्यास कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने लोगों से अपील की कि वो चार बच्चे पैदा करें और उनमें से एक को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के लिए समर्पित करें.

    कार्यक्रम के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जमकर तारीफ भी की. उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि बच्चे चार पैदा करो, जिस में एक स्वयंसेवक संघ को दो. उनके इस बयान के बाद कार्यक्रम में मौजूद लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई।

    इस कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इसमें संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत खुद मौजूद थे. इसके अलावा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी कार्यक्रम में शामिल हुए. कार्यक्रम में कई साधु संतों की भी मौजूदगी रही।


    बयान के बाद अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं

    भारत दुर्गा मंदिर के शिलान्यास के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे. बागेश्वर बाबा के बयान के बाद यह मामला चर्चा में आ गया है. फिलहाल उनके इस बयान को लेकर अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

  • शिमला के राम मंदिर में ‘निकाह’ को लेकर विवाद, हिंदू संगठनों का विरोध

    शिमला के राम मंदिर में ‘निकाह’ को लेकर विवाद, हिंदू संगठनों का विरोध


    शिमला। शिमला में राम मंदिर परिसर में प्रस्तावित एक निकाह समारोह को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। हिंदू संगठनों ने मंदिर के हॉल में मुस्लिम परिवार के विवाह समारोह की बुकिंग पर आपत्ति जताते हुए विरोध की चेतावनी दी है। यह मामला पहले से चर्चा में रहे संजौली मस्जिद विवाद के बाद सामने आया है, जिससे शहर में धार्मिक बहस तेज हो गई है।

    हॉल बुकिंग से शुरू हुआ विवाद

    राम बाजार स्थित मंदिर के हॉल में 11 अप्रैल को प्रस्तावित निकाह की जानकारी सामने आने के बाद हिंदू संघर्ष समिति ने विरोध दर्ज कराया।

    समिति का कहना है कि मंदिर परिसर में इस तरह का आयोजन धार्मिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। संगठन ने मंदिर प्रबंधन से कार्यक्रम रद्द करने की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है।

    सूद सभा की बैठक आज

    मंदिर परिसर का संचालन करने वाली सूद सभा के अध्यक्ष राजीव सूद ने बताया कि इस मुद्दे पर मंगलवार को आपात बैठक बुलाई गई है।

    उन्होंने कहा कि सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान करते हुए निर्णय लिया जाएगा। उनके अनुसार पिछले पांच वर्षों में 15 से अधिक मुस्लिम परिवारों के निकाह इसी हॉल में हो चुके हैं और परिसर में मांस, मछली व मदिरा पर पहले से प्रतिबंध है।

    पहले भी हो चुका है विवाद

    अक्टूबर 2024 में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मंदिर परिसर में साईं बाबा की मूर्ति पर आपत्ति जताते हुए कार्यक्रम का बहिष्कार किया था। इसके बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा।

    शहर का प्रमुख धार्मिक केंद्र

    राम बाजार में स्थित यह मंदिर शिमला का प्रमुख धार्मिक और सामाजिक स्थल माना जाता है। मंदिर की बहुमंजिला इमारत के ऊपरी तल पर भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मूर्तियां स्थापित हैं, जबकि नीचे बने बड़े हॉल में वर्षों से सामाजिक कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं।
    अब सबकी नजर सूद सभा की बैठक पर है, जिसमें तय होगा कि प्रस्तावित निकाह समारोह को अनुमति दी जाएगी या नहीं।