Tag: historic decision

  • केरल अब केरलम: जानिए नाम बदलने पीछे किसका था आइडिया, ये है पूरी कहानी

    केरल अब केरलम: जानिए नाम बदलने पीछे किसका था आइडिया, ये है पूरी कहानी


    नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने हाल ही में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए केरल राज्य का नाम बदलकर आधिकारिक तौर पर केरलम करने की मंजूरी दे दी है। इस फैसले के साथ ही अब सरकारी दस्तावेजों रिपोर्टों और आम बोलचाल में राज्य को उसके पारंपरिक और भाषाई रूप में पहचान मिलेगी।

    नाम बदलने का आइडिया और सूत्रधार
    इस बदलाव के सबसे बड़े सूत्रधार के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री और केरल भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर का नाम सामने आया है। सूत्रों के अनुसार चंद्रशेखर ने कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राज्य का नाम बदलकर केरलम करने का आग्रह किया था। कैबिनेट की हरी झंडी मिलने के बाद उन्होंने न केवल खुद इस नए नाम का इस्तेमाल शुरू कर दिया है बल्कि दूसरों को भी केरल की जगह केरलम कहने के लिए टोकते और सही करते हैं। चंद्रशेखर का तर्क है कि केरलम शब्द राज्य की मलयाली पहचान संस्कृति और इतिहास को अधिक सटीक रूप से दर्शाता है। उनका कहना है कि यह केवल नाम का बदलाव नहीं है बल्कि क्षेत्रीय गौरव को सम्मान देने का प्रयास है।

    रेल मंत्री के कार्यक्रम में केरलम का जश्न

    कैबिनेट के इस फैसले का असर दिल्ली के गलियारों में भी दिखा। गुरुवार को रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रेलवे सुधारों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की लेकिन वहां का सबका ध्यान केरलम लंच ने खींचा। अधिकारियों और मीडियाकर्मियों के लिए केरलम की पारंपरिक रसोई सजाई गई थी। दोपहर के भोजन में अप्पम इडियप्पम वेजिटेबल स्टू और लाल चावल के साथ केरल शैली का वरथु अर्चा सांभर और रसम परोसा गया। इसके अलावा मेन्यू में थोर्न एरीसेरी पापड़म दही और तीन तरह के अचार भी शामिल थे।

    क्यों बदला गया नाम
    राज्य का नाम बदलने की मांग लंबे समय से लंबित थी। मलयालम भाषा में राज्य को हमेशा से केरलम कहा जाता रहा है जबकि अंग्रेजी और हिंदी में इसे केरल के रूप में जाना जाता था। संविधान की पहली अनुसूची में बदलाव के जरिए अब इसे हर भाषा में केरलम के रूप में स्थापित किया जा रहा है। नाम बदलने की इस प्रक्रिया को सांस्कृतिक पुनरुद्धार के रूप में देखा जा रहा है। राजीव चंद्रशेखर जैसे नेताओं का मानना है कि यह कदम मलयाली गौरव को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान देगा। अब केंद्र की मंजूरी मिलने के बाद आने वाले समय में सभी आधिकारिक संचार और महत्वपूर्ण मील के पत्थरों पर यह बदलाव नजर आएगा।

  • SC का ऐहितासिक फैसला, कहा- सलवार का नाड़ा खोलना महज 'छेड़छाड़' नहीं, बल्कि सीधे 'रेप का प्रयास'

    SC का ऐहितासिक फैसला, कहा- सलवार का नाड़ा खोलना महज 'छेड़छाड़' नहीं, बल्कि सीधे 'रेप का प्रयास'


    नई दिल्ली।
    यौन अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता (Sensitivity) और कानूनी व्याख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक ऐतिहासिक और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के एक बेहद विवादित फैसले को पलटते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी महिला को गलत नीयत से पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलना महज ‘छेड़छाड़’ या ‘रेप की तैयारी’ नहीं, बल्कि सीधे तौर पर ‘रेप का प्रयास’ (Attempt) है।

    अदालत ने कहा कि ऐसे कृत्य को कम गंभीर अपराध मानकर आरोपी को हल्की सजा देना न्याय की भावना के खिलाफ है। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मार्च 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कोर्ट ने इसे केवल महिला की लज्जा भंग करने का मामला माना था।


    क्या है पूरा मामला?

    मामला काफी गंभीर था, जिसमें आरोपियों ने महिला के साथ न केवल अश्लील हरकतें कीं बल्कि उसके कपड़े उतारने का प्रयास भी किया। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक अजीबोगरीब तर्क देते हुए इसे ‘रेप का प्रयास’ मानने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि यह कृत्य ‘रेप की तैयारी’ के अंतर्गत आता है, जिसके लिए सजा कम होती है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद आक्रोश फैल गया था। महिला अधिकार संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की थी।


    सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान

    हाईकोर्ट के इस विवादास्पद फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। यह कदम एनजीओ ‘वी द वुमन’ की संस्थापक और वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता द्वारा लिखे गए एक पत्र के बाद उठाया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के साथ-साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल थे, ने इस मामले की सुनवाई की।


    SC की तीखी टिप्पणी और फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सिरे से खारिज करते हुए आरोपियों के खिलाफ पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत ‘रेप के प्रयास’ के मूल और सख्त आरोपों को बहाल कर दिया है। फैसला सुनाते हुए CJI सूर्यकांत ने न्यायिक संवेदनशीलता पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि जब कोई न्यायाधीश यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा हो, तो उसे मामले की तथ्यात्मक हकीकत और पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील होना चाहिए।

    बेंच ने अपनी टिप्पणी में कहा, “कोई भी जज या किसी भी अदालत का फैसला तब तक पूर्ण न्याय नहीं कर सकता, जब तक कि वह मुकदमे के तथ्यों की वास्तविकताओं और अदालत का रुख करने वाली पीड़िता की कमजोरियों के प्रति विचारशील न हो।” अदालत ने यह भी साफ किया कि न्यायाधीशों का प्रयास न केवल संवैधानिक और कानूनी सिद्धांतों के ठोस अनुप्रयोग पर आधारित होना चाहिए, बल्कि उसमें करुणा और सहानुभूति का भाव भी होना चाहिए। इन स्तंभों के अभाव में न्यायिक संस्थान अपने महत्वपूर्ण कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से नहीं कर पाएंगे।

    सुप्रीम कोर्ट ने केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को पलटने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि भविष्य के लिए एक व्यापक सुधार का खाका भी खींचा है। कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में जजों को अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। इसके लिए, सर्वोच्च न्यायालय ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक और पूर्व जस्टिस अनिरुद्ध बोस से विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का अनुरोध किया है। यह समिति यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायाधीशों के लिए ‘संवेदनशीलता और करुणा’ विकसित करने हेतु दिशा-निर्देश तैयार करेगी। अदालत ने यह विशेष निर्देश दिया कि ये दिशा-निर्देश सरल भाषा में होने चाहिए, न कि विदेशी अदालतों के जटिल कानूनी शब्दों से भरे हुए।