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  • देवरहा बाबा के जीवन पर बनेगी फिल्म ‘मचान बाबा’, जॉर्ज पंचम, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से जुड़ी मुलाकातों पर भी होगा फोकस

    देवरहा बाबा के जीवन पर बनेगी फिल्म ‘मचान बाबा’, जॉर्ज पंचम, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी से जुड़ी मुलाकातों पर भी होगा फोकस


    नई दिल्ली ।
    प्रसिद्ध संत देवरहा बाबा के जीवन और उनसे जुड़े रहस्यमयी प्रसंगों को अब बड़े पर्दे पर दिखाने की तैयारी है। उनके जीवन, अनूठी जीवनशैली और देश-विदेश की प्रमुख हस्तियों से जुड़ी मुलाकातों पर आधारित फिल्म ‘मचान बाबा’ का आधिकारिक टाइटल पोस्टर जारी कर दिया गया है। फिल्म का उद्देश्य संत के जीवन के विभिन्न पहलुओं को शोध के आधार पर दर्शकों के सामने प्रस्तुत करना है। इससे पहले नीब करौरी बाबा से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ को मिली सफलता के बाद अब देवरहा बाबा की कहानी को फिल्म के माध्यम से सामने लाने की तैयारी की गई है।

    ‘मचान बाबा’ का निर्माण ओजस फिल्म्स के बैनर तले किया जा रहा है। यह कंपनी सॉफ्टवेयर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में काम करने वाली ओजस सॉफ्टेक की फिल्म और कंटेंट इकाई है। इस परियोजना को ब्रिटेन में स्थापित भारतीय मूल की कारोबारी पूनम गुप्ता और अमेरिका में रहने वाले उद्यमी विकल्प पालीवाल मिलकर प्रोड्यूस कर रहे हैं। फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैयार किया जा रहा है। निर्माताओं के अनुसार, इसकी कहानी में संत के जीवन से जुड़े प्रसंगों को विस्तार से शामिल किया जाएगा।

    फिल्म की खास बात देवरहा बाबा की जीवनशैली और उनसे जुड़ी ऐतिहासिक मुलाकातों पर किया जा रहा शोध है। देवरहा बाबा पेड़ या बांस से बने मचान पर रहने के अपने अनूठे अंदाज के लिए जाने जाते थे। फिल्म में उनकी रहस्यमयी आयु और जीवन से जुड़े पहलुओं को भी दिखाने की तैयारी है। निर्माताओं के अनुसार, इन विषयों को प्रस्तुत करने के लिए शोध किया जा रहा है, ताकि कहानी में संत के जीवन से संबंधित विभिन्न घटनाओं को शामिल किया जा सके।

    शोध के दायरे में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम, भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से जुड़ी ऐतिहासिक मुलाकातों के प्रसंग भी शामिल हैं। इन प्रमुख हस्तियों के साथ देवरहा बाबा के संबंधों और मुलाकातों को फिल्म में जगह देने की योजना है। इसके अलावा, नीब करौरी बाबा और देवरहा बाबा के बीच आत्मीयता तथा आपसी सम्मान से जुड़े प्रसंगों पर भी काम किया जा रहा है। इस तरह फिल्म में संत के आध्यात्मिक जीवन के साथ उन ऐतिहासिक संदर्भों को भी प्रस्तुत करने का प्रयास होगा, जो उनके जीवन से जुड़े बताए जाते हैं।

    निर्माताओं ने कहा है कि ‘मचान बाबा’ केवल चमत्कारों या अंधविश्वास पर केंद्रित फिल्म नहीं होगी। इसे भारतीय आस्था, समृद्ध इतिहास, राजनीति और संत जीवन से जुड़े गूढ़ पहलुओं को सामने लाने वाली कहानी के रूप में तैयार किया जा रहा है। फिल्म में इन विषयों को प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करने पर जोर दिया जाएगा। हालांकि, फिल्म में शामिल किए जाने वाले सभी प्रसंगों और उन्हें पर्दे पर दिखाने के तरीके के बारे में अभी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।

    फिल्म को वर्ष 2027 में सिनेमाघरों में रिलीज करने की योजना बनाई गई है। टाइटल पोस्टर जारी होने के साथ इस परियोजना की औपचारिक घोषणा हो गई है। अब दर्शकों की नजर इस बात पर रहेगी कि देवरहा बाबा के जीवन से जुड़े आध्यात्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रसंगों को फिल्म किस रूप में पेश करती है। निर्माताओं के लिए इस संत के जीवन की विशिष्टताओं को शोध के साथ पर्दे पर उतारना परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

  • ल्हुआन-ड्रे प्रीटोरियस ने T20 में बनाए नाबाद 188 रन…. रचा इतिहास, क्रिस गेल का रिकॉर्ड तोड़ा

    ल्हुआन-ड्रे प्रीटोरियस ने T20 में बनाए नाबाद 188 रन…. रचा इतिहास, क्रिस गेल का रिकॉर्ड तोड़ा


    नई दिल्ली।
    ल्हुआन-ड्रे प्रीटोरियस (Luan-Dre Pretorius) ने उस समय इतिहास रचा जब उन्होंने साउथ अफ्रीका (South Africa) की डोमेस्टिक टी20 लीग (Domestic T20 League) में 188 रनों की नाबाद पारी खेली। इस पारी के दम पर उन्होंने टी20 क्रिकेट (T20 Cricket) में सबसे बड़ी पारी खेलने का वर्ल्ड रिकॉर्ड (World Record) अपने नाम किया। पिछले 13 सालों से यह रिकॉर्ड यूनिवर्स बॉस क्रिस गेल के नाम था, जिन्होंने आईपीएल 2013 में पुणे सुपर जाएंट्स के खिलाफ नाबाद 175 रन बनाए थे, अब प्रीटोरियस ने गेल का यह रिकॉर्ड तोड़ टी20 क्रिकेट में सबसे बड़ी पारी खेलने का वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है।

    लुआन-ड्रे प्रीटोरियस ने शुक्रवार को घरेलू CSA T20 चैलेंज मैच में नाइट्स के खिलाफ साउथ अफ्रीका टाइटन्स फ्रेंचाइजी के लिए 79 गेंदों पर नाबाद 188 रन बनाए। प्रीटोरियस ने अपनी इस पारी में 13 छक्के और 15 चौके लगाए। प्रीटोरियस को डबल सेंचुरी पूरी ना कर पाने का गम जरूर रहेगा, अगर उनके पास एक ओवर भी और होता तो शायद वह नया इतिहास लिख सकते थे।

    प्रीटोरियस की इस पारी के दम पर टाइटन्स ने 267 रन बोर्ड पर लगाए। 20 साल का यह खब्बू बल्लेबाज इस समय जबरदस्त फॉर्म में है। हाल ही में नामीबिया, जिम्बाब्वे और साउथ अफ्रीका के बीच हुई ट्राई सीरीज में उन्होंने 53 गेंदों पर 101 रनों की शानदार पारी खेली थी।


    प्रीटोरियस ने 24 गेंदों में ठोकी फिफ्टी, 40 गेंदों में पूरा किया शतक

    प्रीटोरियस ने अपनी इस पारी की शुरुआत तेज तर्रा की और 24 गेंदों में अपना पचास रन पूरे किए। उन्हें अपना शतक बनाने में सिर्फ 16 और गेंदें लगीं। वहीं 150 का आंकड़ा 58 गेंदों में छुआ। प्रीटोरियस ने पुरुषों के T20 में सबसे लंबी पारियों के मामले में एरॉन फिंच और मार्कस स्टोइनिस की बराबरी भी की।

    प्रीटोरियस के दम पर टाइटन्स ने 3 विकेट पर 267 रन बनाए, जो कॉम्पिटिशन के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा स्कोर है। इससे पहले उन्होंने 2022 में इसी टीम के खिलाफ 3 विकेट पर 271 रन बनाए थे उस मैच में डेवाल्ड ब्रेविस ने 162 रनों की पारी खेली थी, जो CSA T20 चैलेंज का सबसे बड़ा इंडिविजुअल स्कोर भी था। हालांकि अब यह रिकॉर्ड प्रीटोरियस के नाम हो गया है। वहीं टाइटन्स के पास अब CSA T20 चैलेंज के इतिहास के पांच सबसे बड़े टीम टोटल हैं।

    यह 2026-27 सीजन में प्रिटोरियस का पहला गेम था, और वह कुछ जबरदस्त फॉर्म के साथ कॉम्पिटिशन में आए थे। अपने पिछले दो मैचों में, उन्होंने सितंबर में ट्राई-सीरीज में ज़िम्बाब्वे और नामीबिया के ख़िलाफ़ क्रमशः 94 और 101 रन बनाए थे। उन्होंने सभी फॉर्मेट में सिर्फ 22 इंटरनेशनल मैच खेले हैं, लेकिन यह प्रिटोरियस का 91वां T20 था, एक ऐसा फॉर्मेट जिसमें वह 150.44 की स्ट्राइक रेट से बैटिंग करते हैं।

  • राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की 72 साल की कहानी, सत्यजीत रे के 36 सम्मान से शबाना आजमी के रिकॉर्ड तक

    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की 72 साल की कहानी, सत्यजीत रे के 36 सम्मान से शबाना आजमी के रिकॉर्ड तक

    नई दिल्ली ।राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भारतीय सिनेमा के सबसे महत्वपूर्ण सम्मानों में शामिल हैं। 1954 में शुरू हुई इस पुरस्कार व्यवस्था ने सात दशकों से अधिक समय में फिल्मों, कलाकारों, निर्देशकों और तकनीकी विशेषज्ञों के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी है। 22 सितंबर 2026 को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का आयोजन गुजरात के एकता नगर में हो रहा है। यह पहली बार है जब यह समारोह दिल्ली से बाहर आयोजित किया जा रहा है।

    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरुआत 1954 में हुई थी। उस समय 1953 में रिलीज हुई फिल्मों को सम्मान के लिए चुना गया था। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे और सूचना एवं प्रसारण मंत्री बीवी केसकर थे। शुरुआत में इन पुरस्कारों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार नहीं, बल्कि स्टेट अवॉर्ड फॉर फिल्म के नाम से जाना जाता था।

    इससे पहले 1949 में भारत सरकार ने फिल्म जांच समिति का गठन किया था। समिति का उद्देश्य भारतीय फिल्म उद्योग की स्थिति, फिल्मों की गुणवत्ता और उनके सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव का अध्ययन करना था। समिति की सिफारिशों के बाद फिल्मों को सरकारी स्तर पर सम्मान देने की व्यवस्था शुरू की गई।

    शुरुआती दौर में पुरस्कार मुख्य रूप से फीचर फिल्म, डॉक्यूमेंट्री और बच्चों की फिल्मों पर केंद्रित थे। उस समय कलाकारों के लिए अलग-अलग पुरस्कार नहीं दिए जाते थे। शुरुआत से ही अलग-अलग भारतीय भाषाओं की फिल्मों को इसमें जगह देने की नीति अपनाई गई। यही व्यवस्था आगे चलकर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की प्रमुख विशेषता बनी।

    पहला पुरस्कार समारोह 10 अक्टूबर 1954 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में हुआ था। सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मराठी फिल्म श्यामची आई को मिला था। सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फिल्म का पुरस्कार महाबलीपुरम को दिया गया। दो बीघा जमीन और भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य को भी ऑल इंडिया सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट से सम्मानित किया गया था। बच्चों की फिल्म खेला घर को भी सम्मान मिला था।

    कलाकारों और तकनीशियनों के लिए अलग पुरस्कारों की शुरुआत 1967 में रिलीज फिल्मों के लिए हुई और 1968 में विजेताओं को सम्मानित किया गया। उत्तम कुमार पहले सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बने, जबकि नरगिस दत्त पहली सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री चुनी गईं। उस समय इन पुरस्कारों को भारत अवॉर्ड और उर्वशी अवॉर्ड कहा जाता था।

    1969 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार शुरू हुआ और देविका रानी इसकी पहली प्राप्तकर्ता बनीं। 1973 से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के प्रशासन की जिम्मेदारी डायरेक्टरेट ऑफ फिल्म फेस्टिवल ने संभाली। 2022 में इसके पुनर्गठन के दौरान इसका राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम में विलय कर दिया गया।

    समय के साथ पुरस्कारों का दायरा भी बढ़ता गया। सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, संगीत, प्लेबैक सिंगिंग, स्क्रीनप्ले, कॉस्ट्यूम, मेकअप, साउंड, कोरियोग्राफी, स्टंट और विजुअल इफेक्ट्स जैसे क्षेत्रों को भी इसमें शामिल किया गया।

    अभिनय की श्रेणी में शबाना आजमी ने पांच बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतकर रिकॉर्ड बनाया है। उन्हें अंकुर, अर्थ, खंडहर, पार और गॉडमदर के लिए सम्मान मिला। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में अमिताभ बच्चन ने चार पुरस्कार जीते हैं, जबकि ममूटी ने ब्रमायुगम के लिए अपना चौथा राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया।

    प्लेबैक गायन में के. जे. येसुदास के नाम आठ राष्ट्रीय पुरस्कार हैं। संगीतकार ए. आर. रहमान ने सात राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते हैं। महान फिल्मकार सत्यजीत रे के नाम भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में 36 सम्मानों का उल्लेख किया जाता है। उनके योगदान ने भारतीय सिनेमा को देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अलग पहचान दिलाई।

    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का उद्देश्य केवल फिल्मों को सम्मान देना नहीं रहा है। इनका लक्ष्य कलात्मक और तकनीकी उत्कृष्टता वाली फिल्मों को प्रोत्साहित करना तथा भारत की विविध संस्कृतियों और भाषाओं को राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना भी रहा है।

  • ट्रॉय की खोज: जहां इतिहास, प्रेम और युद्ध की सदियों पुरानी कहानियां आज भी जिंदा हैं

    ट्रॉय की खोज: जहां इतिहास, प्रेम और युद्ध की सदियों पुरानी कहानियां आज भी जिंदा हैं


    इंदौर!
    दुनिया के इतिहास में कुछ शहर ऐसे हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनके खंडहरों से नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी कहानियों से होती है। तुर्किये का प्राचीन शहर ट्रॉय भी ऐसा ही एक ऐतिहासिक स्थल है। होमर के महाकाव्य इलियड और ओडिसी से लेकर आधुनिक सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजनों तक, ट्रॉय की कहानी आज भी लोगों की कल्पना को आकर्षित करती है। उत्तरी एजियन क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन नगरी यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है।

    ट्रॉय की विरासत को दुनिया के सामने नए रूप में प्रस्तुत करने के लिए हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इनमें रोम के ऐतिहासिक कोलोसियम में शुरू हुई पुरातात्विक प्रदर्शनी विशेष महत्व रखती है। यह आयोजन ट्रॉय के इतिहास, कला और संस्कृति को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाने का एक बड़ा माध्यम बना है।

    रोम के कोलोसियम में सजी ट्रॉय की ऐतिहासिक धरोहर

    11 जून को रोम के कोलोसियम में ट्रॉय की पुरातात्विक विरासत पर आधारित एक भव्य प्रदर्शनी शुरू हुई। इस प्रदर्शनी में तुर्किये के 19 संग्रहालयों से चुनी गईं 221 ऐतिहासिक कलाकृतियां शामिल की गई हैं। इनमें चानक्कले स्थित ट्रॉय संग्रहालय की महत्वपूर्ण वस्तुएं भी रखी गई हैं।

    प्रदर्शनी की खास बात यह है कि इसमें शामिल 50 कलाकृतियां पहली बार इटली में प्रदर्शित की जा रही हैं। इसके अलावा इतालवी संग्रहालयों के संग्रह से 80 अन्य कलाकृतियां भी प्रदर्शनी का हिस्सा हैं। इस तरह यह आयोजन ट्रॉय की पुरातात्विक संपदा को एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान करता है।

    रोम जैसे ऐतिहासिक शहर में ट्रॉय की धरोहर का प्रदर्शन केवल पुरानी वस्तुओं को देखने का अवसर नहीं है। यह उस सभ्यता की कहानी को समझने का माध्यम भी है, जिसने साहित्य, कला और इतिहास पर गहरा प्रभाव छोड़ा। प्रदर्शनी के जरिए ट्रॉय की पहचान को वैश्विक सांस्कृतिक विरासत के रूप में और मजबूती मिल रही है।

    दुनिया के अलग-अलग देशों में ट्रॉय की कहानी

    ट्रॉय की विरासत को लेकर अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक और अकादमिक कार्यक्रमों की श्रृंखला भी जारी है। न्यूयॉर्क स्थित तुर्किश हाउस में सम्मेलन और फोटोग्राफी प्रदर्शनी के बाद नीदरलैंड्स में भी ट्रॉय से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है।

    28 जून को एम्स्टर्डम स्थित यूनुस एमरे इंस्टीट्यूट में ट्रॉय पर विशेष फोटोग्राफी प्रदर्शनी शुरू होने की जानकारी दी गई है। इसके अगले दिन 29 जून को लीडेन यूनिवर्सिटी में ट्रॉय उत्खनन के प्रमुख पुरातत्वविद् प्रोफेसर रुस्तेम असलान सम्मेलन को संबोधित करेंगे।

    इन आयोजनों का उद्देश्य ट्रॉय के इतिहास और पुरातात्विक महत्व को नए दर्शकों तक पहुंचाना है। हालांकि, किसी प्रदर्शनी या सम्मेलन में ट्रॉय की कहानी जानना एक बात है और स्वयं उस प्राचीन शहर की गलियों में घूमकर उसकी परतों को महसूस करना दूसरी।

    इसीलिए तुर्किये यात्रियों को ट्रॉय की वास्तविक यात्रा का निमंत्रण देता है। यह प्राचीन शहर चानक्कले के केंद्र से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

    चानक्कले: समुद्र, पहाड़ और इतिहास का संगम

    ट्रॉय की यात्रा को यादगार बनाने के लिए चानक्कले क्षेत्र अपने आप में कई अनुभव समेटे हुए है। उत्तरी एजियन सागर के प्रवेश द्वार पर बसा चानक्कले, डार्डानेल्स जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित है। यह इलाका प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है।

    यहां आने वाले पर्यटकों को समुद्र तटों, जल क्रीड़ाओं, कैंपिंग स्थलों और साइकिलिंग मार्गों का आनंद लेने का अवसर मिलता है। क्षेत्र में बुटीक वाइन रूट्स भी यात्रियों को आकर्षित करते हैं।

    इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए चानक्कले प्रथम विश्व युद्ध के गैलीपोली या डार्डानेल्स अभियान से जुड़े स्थलों की यात्रा का अवसर देता है। समुद्र की गहराइयों में युद्धकालीन जहाजों के मलबे को देखने के लिए डाइविंग गतिविधियां भी उपलब्ध हैं।

    प्रकृति प्रेमी माउंट इडा की हरी-भरी ढलानों का आनंद ले सकते हैं। वहीं असोस के साफ पानी और बोज़जाआडा तथा गोक्चेआडा द्वीपों की खूबसूरती इस यात्रा को और खास बना देती है।

    लेकिन इन तमाम आकर्षणों के बीच चानक्कले की यात्रा का सबसे बड़ा केंद्र ट्रॉय ही है। शहर के मध्य में खड़ा विशाल लकड़ी का घोड़ा पर्यटकों को उस प्राचीन नगरी की याद दिलाता है, जिसकी कहानी सदियों से लोगों के बीच सुनाई जाती रही है।

    ट्रॉय की जमीन में छिपी हैं सभ्यताओं की कई परतें

    तेवफिकिये गांव में स्थित ट्रॉय को आमतौर पर होमर के महाकाव्य इलियड से जोड़ा जाता है। ट्रोजन युद्ध की कथा ने इस शहर को दुनिया भर में प्रसिद्ध किया। लेकिन ट्रॉय का इतिहास केवल युद्ध और पौराणिक पात्रों तक सीमित नहीं है।

    यहां करीब 5,000 वर्षों से मानव बसावट के प्रमाण मिलते हैं। प्राचीन शहर में प्रारंभिक कांस्य युग से लेकर पूर्वी रोमन काल तक की दस और उससे अधिक विशिष्ट सभ्यतागत परतें मौजूद हैं।

    इसका अर्थ है कि ट्रॉय में अलग-अलग समय में विभिन्न संस्कृतियों ने निवास किया और अपने पीछे स्थापत्य, किलेबंदी तथा जीवनशैली के निशान छोड़े। आज जब पर्यटक इन अवशेषों के बीच चलते हैं, तो उन्हें एक ही शहर में इतिहास के कई दौर दिखाई देते हैं।

    ट्रॉय के प्रवेश द्वार पर बना विशाल लकड़ी का ट्रोजन हॉर्स पर्यटकों का स्वागत करता है। इसके बाद यात्रा प्राचीन पत्थर की दीवारों और गलियों के बीच आगे बढ़ती है। कभी इन रास्तों पर जिन लोगों का जीवन बसा होगा, उनके निशान आज खंडहरों के रूप में दिखाई देते हैं।

    एनीयस की कथा से रोम तक जुड़ा ट्रॉय

    ट्रॉय की कहानी का संबंध केवल यूनानी महाकाव्यों से नहीं है। रोमन साहित्य में भी इस प्राचीन शहर का उल्लेख महत्वपूर्ण रूप से मिलता है।

    वर्जिल की प्रसिद्ध रचना एनीड के अनुसार, ट्रॉय के पतन के बाद राजकुमार एनीयस ने एक नए ट्रॉय की तलाश में लंबी यात्रा शुरू की। माना जाता है कि उनकी यात्रा आगे चलकर इटली के लैटियम क्षेत्र तक पहुंची।

    एनीयस से जुड़ा यह मार्ग आज एनीयस रूट के नाम से जाना जाता है। यूरोप की परिषद ने भी इसे सांस्कृतिक मार्ग के रूप में मान्यता दी है। रोमन परंपरा के अनुसार, एनीयस के वंशजों ने आगे चलकर 753 ईसा पूर्व में रोम की स्थापना की।

    हालांकि यह कथा पौराणिक और साहित्यिक परंपराओं का हिस्सा है, लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि ट्रॉय की कहानी का प्रभाव अनातोलिया से निकलकर यूरोप की सांस्कृतिक स्मृति तक पहुंचा।

    खंडहरों से आगे ट्रॉय संग्रहालय का अनुभव

    ट्रॉय की यात्रा सिर्फ खुले पुरातात्विक स्थल तक सीमित नहीं रहती। यहां स्थित ट्रॉय संग्रहालय पर्यटकों को प्राचीन शहर की धरोहर को आधुनिक तरीके से समझने का अवसर देता है।

    पुरस्कार विजेता ट्रॉय संग्रहालय अपनी सादगीपूर्ण और प्रभावशाली वास्तुकला के लिए जाना जाता है। संग्रहालय में ट्रॉय से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री को तीन स्तरों पर प्रस्तुत किया गया है।

    यहां आने वाले पर्यटक प्राचीन शहर के इतिहास, वहां रहने वाली सभ्यताओं और खुदाई में मिली वस्तुओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। संग्रहालय का उद्देश्य केवल कलाकृतियां दिखाना नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी सभ्यता और जीवन की कहानी को समझाना भी है।

    प्राचीन अवशेषों और आधुनिक संग्रहालय का यह मेल ट्रॉय को एक अलग अनुभव प्रदान करता है। यहां इतिहास को केवल किताबों में पढ़ने के बजाय उसके प्रमाणों के साथ समझने का अवसर मिलता है।

    इतिहास से जुड़ने का निमंत्रण

    ट्रॉय की कहानी ने साहित्य, कला, सिनेमा और अकादमिक शोध को लंबे समय से प्रेरित किया है। रोम में आयोजित प्रदर्शनी और विभिन्न देशों में होने वाले सम्मेलन इस विरासत को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।

    लेकिन ट्रॉय की असली पहचान उसके खंडहरों, प्राचीन दीवारों, सभ्यताओं की परतों और संग्रहालय में सुरक्षित धरोहरों के बीच जाकर महसूस की जा सकती है। चानक्कले की प्राकृतिक सुंदरता के साथ ट्रॉय की यात्रा इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले यात्रियों के लिए एक खास अनुभव बन सकती है।

    तुर्किये का यह प्राचीन शहर आज भी एक सवाल की तरह सामने खड़ा है—कितनी सभ्यताएं यहां बसीं, कितनी कहानियां यहां जन्मीं और कितनी पीढ़ियां इस धरती से होकर गुजरीं? शायद यही ट्रॉय का सबसे बड़ा आकर्षण है कि इसके खंडहर अतीत की कहानी सुनाते हुए आज के यात्रियों को भी अपने करीब बुलाते हैं।

  • रवींद्र जडेजा ने रचा इतिहास, WTC में 50 टेस्ट खेलने वाले एशिया के पहले क्रिकेटर बने

    रवींद्र जडेजा ने रचा इतिहास, WTC में 50 टेस्ट खेलने वाले एशिया के पहले क्रिकेटर बने


    नई दिल्ली।
    श्रीलंका (Sri Lanka) के खिलाफ कोलंबो के सिंहलीज स्पोर्ट्स क्लब (Sinhalese Sports Club, Colombo) में रविवार को मैच के पहले दिन भारतीय बल्लेबाजों का दमदार प्रदर्शन देखने को मिला. टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने पहले दिन पांच विकेट खोकर 300 रन बना लिए हैं।

    यह टेस्ट मैच भारत (India) के स्टार ऑलराउंडर (Star all-rounder) रवींद्र जडेजा (Ravindra Jadeja) के लिए ऐतिहासिक बन गया है. इस मैच में मैदान पर कदम रखते ही जडेजा ने एक ऐसा रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया जो अब तक कोई भी भारतीय या एशियाई खिलाड़ी नहीं कर पाया था.

    जडेजा वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) के इतिहास में 50 मैच खेलने वाले पहले एशियाई और भारतीय क्रिकेटर बन गए हैं. दुनिया के नंबर एक टेस्ट ऑलराउंडर ने अपनी फिरकी और बल्ले के दम पर इस टूर्नामेंट में एक खास मुकाम हासिल किया है।


    WTC में कैसा रहा है जडेजा का सफर?

    साल 2012 में अपना टेस्ट डेब्यू करने वाले जडेजा ने WTC के हर साइकल में भारत के लिए लगातार शानदार प्रदर्शन किया है. अब तक खेले गए अपने 50 मैचों में उन्होंने 2675 रन बनाए हैं और 160 विकेट भी चटकाए हैं. 2019-21 के दौरान उन्होंने 11 मैच खेले, जिसमें 500 रन बनाए और 29 विकेट लिए. दूसरे वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप में साल 2021-23 के दौरान उन्होंने 13 मैचों में अपनी अहम भूमिका निभाते हुए 721 रन ठोके और 47 विकेट झटके।

    तीसरी साइकल 2023-25 के 15 मुकाबलों में जडेजा 664 रन बनाए और 55 शिकार किए. मौजूदा वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप साइकल में वह अब तक 11 मैच खेल चुके हैं, जिसमें उनके नाम 700 से अधिक रन और 29 विकेट दर्ज हो चुके हैं।


    दूसरे भारतीय खिलाड़ियों का हाल

    भारत की तरफ से सबसे ज्यादा WTC मैच खेलने के मामले में जडेजा के बाद तेज गेंदबाज मोहम्मद सिराज दूसरे नंबर पर हैं. कोलंबो में चल रहा टेस्ट सिराज का 47वां मैच है, जिसमें उनके नाम अब तक 141 विकेट हैं. विराट कोहली ने 2019 से 2025 के बीच 46 मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने 2617 रन बनाए हैं।

    कोहली के बाद युवा स्टार शुभमन गिल और विकेटकीपर ऋषभ पंत का नंबर आता है. दोनों ने 42-42 मैच खेले हैं. पंत के नाम इस टूर्नामेंट में 2885 और गिल के नाम 2867 रन दर्ज हैं. दिग्गज स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने 41 मैचों में 195 विकेट चटकाए हैं, जबकि कप्तान रोहित शर्मा 40 मैचों में 2716 रन बना चुके हैं।

  • दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    नई दिल्ली । दिल्ली विश्वविद्यालय ने पोस्टग्रेजुएट इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है। जुलाई 2026 से लागू नए सिलेबस में दिल्ली सल्तनत के इतिहास से जुड़े एक प्रमुख पेपर को तीसरे सत्र की अंतिम सूची से हटा दिया गया है। यह बदलाव नई शिक्षा नीति और नए पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप किए गए पाठ्यक्रम संशोधन का हिस्सा बताया गया है।

    हटाए गए विषय का नाम दिल्ली सल्तनत : मध्यकालीन उत्तर भारत में सत्ता की बनावट था। इस पेपर में 13वीं और 14वीं सदी के दौरान दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था, शासन प्रणाली और सत्ता के स्वरूप का अध्ययन कराया जाता था। विषय के जरिए विद्यार्थियों को उस दौर के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक बदलावों को समझने का अवसर मिलता था।

    नए पाठ्यक्रम में केवल दिल्ली सल्तनत से जुड़े पेपर में ही बदलाव नहीं हुआ है। उत्तर भारत के इतिहास से संबंधित लगभग 1400 से 1550 की अवधि वाला एक अन्य विषय भी तीसरे सत्र की अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया है। इससे मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन की संरचना में बदलाव दिखाई देता है।

    पाठ्यक्रम में प्रस्तावित कई अन्य विषयों को भी अंतिम रूप से जगह नहीं मिली है। इनमें शुरुआती भारत में महिलाओं और लिंग से संबंधित इतिहास, प्राचीन भारत में राजनीतिक व्यवस्था तथा प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म और समाज जैसे विषय शामिल हैं। इन बदलावों के कारण इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक विषयों का दायरा पहले की तुलना में अलग हो गया है।

    इतिहास विभाग की ओर से तीसरे सत्र के लिए कुल 38 विशेष वैकल्पिक विषय प्रस्तावित किए गए थे। अंतिम पाठ्यक्रम में इनमें से 16 विषयों को ही शामिल किया गया है। इस तरह 22 प्रस्तावित विषय अंतिम सूची का हिस्सा नहीं बने हैं। विश्वविद्यालय के नए पीजी ढांचे के तहत विषयों के चयन और संरचना को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    दिल्ली सल्तनत से संबंधित पेपर को हटाए जाने को समझने के लिए स्नातक और परास्नातक स्तर के पाठ्यक्रम के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। परास्नातक स्तर पर हटाए गए पेपर में केवल सल्तनत काल की घटनाओं का सामान्य परिचय नहीं दिया जाता था, बल्कि सत्ता, शासन और इतिहास को समझने के अलग-अलग दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता था।

    वहीं स्नातक स्तर पर दिल्ली सल्तनत के इतिहास से संबंधित विषय अभी अलग स्वरूप में पढ़ाया जाता है। इसमें इस कालखंड की प्रमुख घटनाओं, शासकों, राजनीतिक परिस्थितियों और व्यापक ऐतिहासिक विकास का अध्ययन शामिल होता है। इसलिए पीजी के एक विशेष पेपर को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली सल्तनत का इतिहास दिल्ली विश्वविद्यालय की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था से समाप्त हो गया है।

    नए बदलावों के पीछे विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम संरचना को नई शिक्षा नीति और संशोधित पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप तैयार करने की प्रक्रिया बताई गई है। इसमें वैकल्पिक विषयों की संख्या, उनकी विशेषज्ञता और विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध अध्ययन क्षेत्रों को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    इतिहास जैसे विषय में पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव अकादमिक अध्ययन की दिशा को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से परास्नातक स्तर पर विषयों का चयन विद्यार्थियों को किसी ऐतिहासिक कालखंड को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का अवसर देता है। ऐसे में नए पाठ्यक्रम के तहत शामिल विषयों और हटाए गए विषयों को लेकर अकादमिक क्षेत्र में चर्चा होना स्वाभाविक है।

    दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किए गए इस संशोधित पाठ्यक्रम के तहत अब विद्यार्थियों को उपलब्ध अंतिम 16 वैकल्पिक विषयों में से अपने अध्ययन क्षेत्र का चयन करना होगा। विश्वविद्यालय की नई व्यवस्था में इतिहास के विभिन्न कालखंडों और विषयगत क्षेत्रों को नए शैक्षणिक ढांचे के अनुरूप व्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है।

  • Ind vs Eng Test : लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर आज इतिहास रचने उतरेगी भारतीय महिला टीम

    Ind vs Eng Test : लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर आज इतिहास रचने उतरेगी भारतीय महिला टीम


    लंदन ।
    लॉर्ड्स (Lord’s) के ऐतिहासिक मैदान पर शुक्रवार से भारत और इंग्लैंड की महिला टीमों के बीच टेस्ट मुकाबला खेला जाएगा। भारत की कप्तान (India captain) हरमनप्रीत कौर (Harmanpreet Kaur) ने लॉर्ड्स (Lord’s) में इंग्लैंड (England) के खिलाफ होने वाले ऐतिहासिक महिला टेस्ट (Historic Women’s Test) को टीम के लिए टर्निंग प्वाइंट बताया है. उन्होंने कहा कि इस मुकाबले में जीत T20 वर्ल्ड कप से मिली निराशा को खत्म कर सकती है और टीम का आत्मविश्वास लौटाएगी. कप्तान ने पहली बार लॉर्ड्स में महिला टेस्ट होने, रेड-बॉल क्रिकेट, श्री चरणी और महिला टेस्ट के भविष्य पर भी खुलकर बात की।

    भारतीय कप्तान हरमनप्रीत कौर का मानना है कि अगर भारत इस मुकाबले में जीत दर्ज करता है तो हालिया T20 वर्ल्ड कप में ग्रुप स्टेज से बाहर होने का दर्द काफी हद तक कम हो जाएगा और टीम नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ेगी। हरमनप्रीत ने कहा कि T20 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी. कुछ मुकाबलों में टीम ने अच्छा खेल दिखाया, लेकिन पूरे टूर्नामेंट में लगातार बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई. यही वजह है कि लॉर्ड्स टेस्ट टीम के लिए नई शुरुआत साबित हो सकता है।

    उन्होंने कहा- अगर हम यह टेस्ट जीतते हैं तो टीम के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. वर्ल्ड कप के बाद हर खिलाड़ी निराश था, लेकिन इस टेस्ट के जरिए हम अपना आत्मविश्वास वापस हासिल कर सकते हैं. जीत के बाद आपको महसूस होता है कि आप दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों में शामिल हैं।

    कप्तान ने कहा कि जब परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आते तो खिलाड़ियों का मनोबल गिरता है. ऐसे समय में टीम का एकजुट रहना सबसे ज्यादा जरूरी होता है. उन्होंने भरोसा जताया कि अगर सभी खिलाड़ी एक-दूसरे का साथ दें और टीम के लिए खेलें तो यह जीत आने वाले बड़े टूर्नामेंटों में भी भारत के लिए फायदेमंद साबित होगी।


    142 साल बाद लॉर्ड्स में पहली बार महिला टेस्ट

    लॉर्ड्स में यह पहला महिला टेस्ट मैच होगा. इस ऐतिहासिक मौके पर हरमनप्रीत ने कहा कि हर क्रिकेटर का सपना होता है कि वह लॉर्ड्स में टेस्ट खेले. उन्हें यह जानकर भी हैरानी हुई कि इस प्रतिष्ठित मैदान पर अब तक महिला टेस्ट आयोजित नहीं हुआ था।

    उन्होंने कहा- जब हमें पता चला कि इतने साल बाद यहां पहला महिला टेस्ट होने जा रहा है तो हम सभी हैरान थे. मुझे पहले इसकी जानकारी नहीं थी. लेकिन मैं यही कहूंगी कि देर हुई है, बहुत ज्यादा देर नहीं हुई. मैं खुश हूं कि अपने करियर में मुझे इस ऐतिहासिक मैच का हिस्सा बनने का मौका मिला।

    उन्होंने बताया कि पूरी भारतीय टीम इस मुकाबले को लेकर बेहद उत्साहित है और सभी खिलाड़ी इस ऐतिहासिक अवसर को यादगार बनाना चाहते हैं।


    रेड-बॉल क्रिकेट चुनौती भी, मौका भी

    हरमनप्रीत ने माना कि महिला खिलाड़ियों को रेड-बॉल क्रिकेट खेलने के ज्यादा मौके नहीं मिलते, इसलिए यह फॉर्मेट चुनौतीपूर्ण जरूर है. हालांकि उन्होंने कहा कि टीम ने पिछले कुछ दिनों में कई प्रैक्ट‍िस सेशन किए हैं और खिलाड़ी अच्छी लय में नजर आए। उन्होंने कहा- हम रेड-बॉल क्रिकेट खेलने के आदी नहीं हैं, लेकिन जब किसी चीज को लेकर उत्साह होता है तो खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करते हैं.”


    ज्यादा महिला टेस्ट खेलने की जताई इच्छा

    भारतीय कप्तान ने महिला टेस्ट क्रिकेट के भविष्य पर भी अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि खिलाड़ी के तौर पर वह ज्यादा से ज्यादा टेस्ट मैच खेलना चाहती हैं, लेकिन इसका फैसला ICC और संबंधित क्रिकेट बोर्डों को करना है। हरमनप्रीत ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में महिला क्रिकेट लगातार आगे बढ़ा है. पिछले साल मार्च में भारत ने टेस्ट खेला था और अब लॉर्ड्स में एक और मौका मिला है. उन्हें उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में महिला टेस्ट मैचों की संख्या और बढ़ेगी।


    इंग्लैंड के खिलाफ रिकॉर्ड से बढ़ा भरोसा

    हरमनप्रीत ने कहा कि भारत ने हाल के टेस्ट मुकाबलों में अच्छा प्रदर्शन किया है और इंग्लैंड के खिलाफ भी टीम का रिकॉर्ड मजबूत रहा है. ऐसे में खिलाड़ियों ने तय किया है कि वे एकजुट होकर मैदान पर उतरेंगे और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगे.


    श्री चरणी पर कप्तान को पूरा भरोसा

    कप्तान ने बाएं हाथ की स्पिनर श्री चरणी की जमकर तारीफ की, जो लॉर्ड्स टेस्ट में डेब्यू करने जा रही हैं. T20 वर्ल्ड कप में भारत की सबसे सफल गेंदबाज रहीं चरणी को लेकर हरमनप्रीत ने कहा कि वह टीम की सबसे अहम गेंदबाजों में से एक हैं.

    उन्होंने कहा कि चरणी ने केवल वर्ल्ड कप ही नहीं, उससे पहले भी लगातार शानदार प्रदर्शन किया है. जब भी टीम को विकेट की जरूरत होती है, वह कप्तान की उम्मीदों पर खरी उतरती हैं. ऐसे खिलाड़ी कप्तान का आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं और टीम को मुश्किल परिस्थितियों से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाते हैं।

  • मुगल-ए-आजम के सेट से सामने आया इतिहास का अनसुना पन्ना: मधुबाला के हुस्न के दीवाने थे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो

    मुगल-ए-आजम के सेट से सामने आया इतिहास का अनसुना पन्ना: मधुबाला के हुस्न के दीवाने थे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में अपनी बेमिसाल खूबसूरती और जीवंत अभिनय से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री मधुबाला का जादू सिर्फ देश की सीमाओं तक ही सीमित नहीं था। हाल ही में सामने आए ऐतिहासिक और सिनेमाई संस्मरणों के अनुसार, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो भी इस कदर हुस्न की मल्लिका के दीवाने थे कि वे अक्सर उनसे मिलने के लिए भारत आया करते थे। यह उस दौर की बात है जब मधुबाला अपनी सर्वकालिक महान फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ की शूटिंग में व्यस्त थीं। उस समय जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान की राजनीति में कोई बहुत बड़ा नाम नहीं थे, बल्कि एक बेहद पढ़े-लिखे, हैंडसम और उभरते हुए युवा राजनेता के तौर पर मुंबई के दौरों पर आते-जाते रहते थे।

    मध्य प्रदेश। इस ऐतिहासिक और दिलचस्प किस्से की पृष्ठभूमि साल 1950 के दशक के अंतिम वर्षों से जुड़ती है। यह वह दौर था जब एक तरफ मधुबाला और महानायक दिलीप कुमार के बीच के रिश्तों में गंभीर तल्खी आ चुकी थी और उनका सालों पुराना संबंध टूटने की कगार पर था। ठीक उसी समय जुल्फिकार अली भुट्टो की जिंदगी में मधुबाला की एंट्री हुई। भुट्टो अक्सर मुंबई प्रवास के दौरान ‘मुगल-ए-आजम’ के भव्य सेट पर पहुंच जाते थे, जहां वे घंटों बैठकर मधुबाला को अभिनय करते हुए निहारते थे। धीरे-धीरे दोनों के बीच मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा और यह दोस्ती गहरी होती चली गई। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, दोनों अक्सर फिल्म के सेट पर ही एक साथ दोपहर का भोजन करते थे और भुट्टो हमेशा मधुबाला के करीब रहने का बहाना ढूंढते थे।

    इस रिश्ते का सबसे जटिल पहलू यह था कि जब जुल्फिकार अली भुट्टो मधुबाला के करीब आ रहे थे, तब वे पहले से ही शादीशुदा थे और उनकी शादी शिरीन नामक महिला से हो चुकी थी। इसके बावजूद मधुबाला की जादुई शख्सियत के आकर्षण में बंधकर भुट्टो ने अपनी शादीशुदा जिंदगी की परवाह नहीं की। मीडिया रिपोर्ट्स और उस दौर के राजनैतिक-सिनेमाई गलियारों के दावों के अनुसार, भुट्टो ने एक दिन अपने दिल की बात खुलकर मधुबाला के सामने रख दी थी और उनके समक्ष बकायदा विवाह का प्रस्ताव भी पेश किया था। वे हर हाल में मधुबाला को अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहते थे और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे।

    मधुबाला उस दौर में जुल्फिकार भुट्टो की बुद्धिमत्ता और उनके व्यक्तित्व का सम्मान जरूर करती थीं और उनके साथ पर्याप्त समय भी बिताती थीं, लेकिन वे एक बेहद व्यावहारिक महिला भी थीं। उन्हें इस बात का पूरा संज्ञान था कि भुट्टो न सिर्फ शादीशुदा हैं बल्कि एक दूसरे देश की सक्रिय राजनीति का हिस्सा भी हैं। ऐसे किसी संवेदनशील मोड़ पर शादी जैसा बड़ा और गंभीर फैसला लेना उनके करियर और व्यक्तिगत जीवन के लिए सही नहीं था। यही कारण रहा कि मधुबाला ने भुट्टो के प्रेम प्रस्ताव को बेहद शालीनता से ठुकरा दिया और अपने रिश्ते को एक सीमित दायरे से आगे नहीं बढ़ने दिया। आखिरकार उन्होंने भुट्टो से अपनी दूरियां बना लीं और इस तरह राजनीति और कला का यह अध्याय हमेशा के लिए अधूरा रह गया।

    इस अधूरी प्रेम कहानी के अंत के बाद दोनों की राहें पूरी तरह जुदा हो गईं। जुल्फिकार अली भुट्टो से अलग होने के तुरंत बाद साल 1960 में मधुबाला ने मशहूर गायक और अभिनेता किशोर कुमार से शादी कर ली। इसके कुछ समय बाद ही वे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ गईं और महज 36 वर्ष की अल्पायु में साल 1969 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। दूसरी ओर, जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान की राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे और देश के विदेश मंत्री, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बने। हालांकि, नियति को कुछ और ही मंजूर था और साल 1979 में तख्तापलट के बाद महज 51 वर्ष की आयु में भुट्टो को पाकिस्तान में फांसी दे दी गई।

  • क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून

    क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून


    नई दिल्ली। भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मंजूरी देते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला Harish Rana vs Union of India मामले में आया, जिसमें 32 वर्षीय हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अपील स्वीकार कर ली गई।

    Supreme Court of India की जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में हैं। बेटे की लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए उनके माता-पिता ने अदालत से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

    इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    आइए जानते हैं कि इच्छामृत्यु क्या है और दुनिया में इसका इतिहास क्या रहा है।

    क्या होती है इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु (Euthanasia) का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना, जो असाध्य या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और असहनीय दर्द झेल रहा हो। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है।

    इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है।

    1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)

    इसमें मरीज की मृत्यु लाने के लिए डॉक्टर या कोई व्यक्ति सक्रिय कदम उठाता है, जैसे घातक दवा या इंजेक्शन देना। उदाहरण के तौर पर मरीज को ऐसा इंजेक्शन देना जिससे वह गहरी नींद में चला जाए और उसकी दर्दरहित मृत्यु हो जाए।

    2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)

    इसमें मरीज को जिंदा रखने वाले इलाज या जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि उपचार बंद कर देते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त होता है।

    प्राचीन काल में इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु का विचार बहुत पुराना है। लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व के महाकाव्य Iliad में घायल योद्धाओं के दर्द से मुक्ति के लिए दया मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

    भारतीय परंपरा में भी तपस्वियों द्वारा प्रायोपवेश (आमरण अनशन के माध्यम से प्राण त्यागना) की परंपरा रही है, जिसका उल्लेख Mahabharata में मिलता है।

    प्राचीन यूनान में दार्शनिक Plato ने अपनी पुस्तक Republic में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था।

    हालांकि करीब 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली Hippocratic Oath ने सक्रिय इच्छामृत्यु का विरोध किया और कहा कि डॉक्टर किसी मरीज को घातक दवा नहीं देंगे।

    मध्यकाल में धार्मिक प्रतिबंध

    ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को पाप और हत्या के समान माना गया। धार्मिक विचारक Augustine of Hippo और Thomas Aquinas ने इसे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया।

    इस्लाम और यहूदी धर्म में भी सक्रिय इच्छामृत्यु को प्रतिबंधित किया गया, हालांकि कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार रोकने की अनुमति दी गई।

    19वीं और 20वीं सदी में बहस

    19वीं सदी में आधुनिक चिकित्सा के विकास के साथ इच्छामृत्यु पर फिर से बहस शुरू हुई। 1870 में डॉक्टर Samuel D. Williams ने अंतिम अवस्था के मरीजों को क्लोरोफॉर्म देने का सुझाव दिया था।

    20वीं सदी में नाजी जर्मनी के कुख्यात Aktion T4 program के कारण इच्छामृत्यु की अवधारणा विवादित हो गई। 1939-1945 के बीच नाजी शासन ने इस कार्यक्रम के नाम पर हजारों लोगों की हत्या कर दी थी।

    आज किन देशों में मान्य है इच्छामृत्यु

    समय के साथ कई देशों ने सख्त नियमों के तहत इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को कानूनी मान्यता दी है।

    Netherlands (2001) और Belgium (2002) ने सक्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया।

    Canada ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया।

    Switzerland में 1942 से सहायता प्राप्त आत्महत्या कानूनी है।

    United States के कुछ राज्यों में “Death with Dignity” कानून लागू है, जिसकी शुरुआत Oregon में 1997 में हुई।

    Spain, Austria, Australia, New Zealand, Colombia और Ecuador में भी विभिन्न रूपों में इसे अनुमति मिली है।

    किन देशों में सख्त प्रतिबंध

    कई इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी रूप पर प्रतिबंध है। वहीं France और United Kingdom जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है, बल्कि मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए पालीएटिव केयर और सिडेशन पर जोर दिया जाता है।

    भारत में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इच्छामृत्यु के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक बहस को नई दिशा देता है। हालांकि यह केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु तक सीमित है, लेकिन इससे भविष्य में चिकित्सा नैतिकता और मरीज के अधिकारों पर व्यापक चर्चा की संभावना बढ़ गई है।

  • सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस और टीएमसी को इतिहास पर घेरा..

    सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस और टीएमसी को इतिहास पर घेरा..


    नई दिल्ली: भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर नई दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कांग्रेस तथा तृणमूल कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा उन्होंने कहा कि सुभाष चंद्र बोस के कारण अंग्रेजों का भारत पर कब्जा करने का सपना चकनाचूर हो गया

    सुधांशु त्रिवेदी ने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कटाक्ष किया उन्होंने कहा कि आपकी पार्टी भी कांग्रेस से निकली है आप भी कांग्रेस में थीं इतने सालों तक क्यों नहीं याद आया कि नेताजी को सम्मान और उचित स्थान मिलना चाहिए अगर टीएमसी के मन में नेताजी के प्रति सम्मान है तो उन्हें अपने नाम से कांग्रेस हटा देना चाहिए अन्यथा बंगाल की प्रबुद्ध जनता उन्हें जड़-मूल से खत्म कर देगीउन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सबसे सच्चा सम्मान दिया 2018 में आजाद हिंद की निर्वासित सरकार के 75 वर्ष पूरे होने पर सभी जीवित सेनानियों को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल किया गया और उनका सम्मान किया गया किसी भी राजनीतिक दल ने इससे पहले ऐसा सम्मान नहीं दिया इंडिया गेट पर 1968 तक जॉर्ज पंचम की मूर्ति रही थी वहां नेताजी की मूर्ति पुनर्स्थापित की गई

    सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कहा कि भारत की स्वतंत्रता में कई लोगों ने योगदान दिया लेकिन सुभाष चंद्र बोस का योगदान अग्रणी और अविस्मरणीय है इसे भुलाने के अनेक कुत्सित प्रयास हुए हैं उन्होंने डॉ भीमराव अंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि 1955 में दिए साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय सेना की निष्ठा अंग्रेजों के प्रति बदल चुकी थी और नेताजी के नेतृत्व ने ब्रिटिश शासन की धारणा को तोड़ दिया

    त्रिवेदी ने 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के बाद नेताजी द्वारा इसे ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने का अवसर बताया और सवाल उठाया कि उस समय कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन पर दबाव क्यों नहीं बनाया उन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 14 जुलाई 1942 के रेजोल्यूशन का हवाला दिया जिसमें कहा गया कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नकारात्मक भाव को सहयोग और सकारात्मक में बदला जाएगा और कांग्रेस पूरी स्वेच्छा से ब्रिटिश फौजों के समर्थन के लिए तैयार थी यही कारण था कि कांग्रेस ने 1931 से 1947 तक 1942 को छोड़कर कोई आंदोलन नहीं किया

    सुधांशु त्रिवेदी का कहना है कि इतिहास में नेताजी के योगदान को सही रूप में प्रस्तुत करना और उनका सम्मान करना आवश्यक है यह केवल भारत के गौरव के लिए नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जरूरी है