Tag: History

  • रवींद्र जडेजा ने रचा इतिहास, WTC में 50 टेस्ट खेलने वाले एशिया के पहले क्रिकेटर बने

    रवींद्र जडेजा ने रचा इतिहास, WTC में 50 टेस्ट खेलने वाले एशिया के पहले क्रिकेटर बने


    नई दिल्ली।
    श्रीलंका (Sri Lanka) के खिलाफ कोलंबो के सिंहलीज स्पोर्ट्स क्लब (Sinhalese Sports Club, Colombo) में रविवार को मैच के पहले दिन भारतीय बल्लेबाजों का दमदार प्रदर्शन देखने को मिला. टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने पहले दिन पांच विकेट खोकर 300 रन बना लिए हैं।

    यह टेस्ट मैच भारत (India) के स्टार ऑलराउंडर (Star all-rounder) रवींद्र जडेजा (Ravindra Jadeja) के लिए ऐतिहासिक बन गया है. इस मैच में मैदान पर कदम रखते ही जडेजा ने एक ऐसा रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया जो अब तक कोई भी भारतीय या एशियाई खिलाड़ी नहीं कर पाया था.

    जडेजा वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप (WTC) के इतिहास में 50 मैच खेलने वाले पहले एशियाई और भारतीय क्रिकेटर बन गए हैं. दुनिया के नंबर एक टेस्ट ऑलराउंडर ने अपनी फिरकी और बल्ले के दम पर इस टूर्नामेंट में एक खास मुकाम हासिल किया है।


    WTC में कैसा रहा है जडेजा का सफर?

    साल 2012 में अपना टेस्ट डेब्यू करने वाले जडेजा ने WTC के हर साइकल में भारत के लिए लगातार शानदार प्रदर्शन किया है. अब तक खेले गए अपने 50 मैचों में उन्होंने 2675 रन बनाए हैं और 160 विकेट भी चटकाए हैं. 2019-21 के दौरान उन्होंने 11 मैच खेले, जिसमें 500 रन बनाए और 29 विकेट लिए. दूसरे वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप में साल 2021-23 के दौरान उन्होंने 13 मैचों में अपनी अहम भूमिका निभाते हुए 721 रन ठोके और 47 विकेट झटके।

    तीसरी साइकल 2023-25 के 15 मुकाबलों में जडेजा 664 रन बनाए और 55 शिकार किए. मौजूदा वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप साइकल में वह अब तक 11 मैच खेल चुके हैं, जिसमें उनके नाम 700 से अधिक रन और 29 विकेट दर्ज हो चुके हैं।


    दूसरे भारतीय खिलाड़ियों का हाल

    भारत की तरफ से सबसे ज्यादा WTC मैच खेलने के मामले में जडेजा के बाद तेज गेंदबाज मोहम्मद सिराज दूसरे नंबर पर हैं. कोलंबो में चल रहा टेस्ट सिराज का 47वां मैच है, जिसमें उनके नाम अब तक 141 विकेट हैं. विराट कोहली ने 2019 से 2025 के बीच 46 मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने 2617 रन बनाए हैं।

    कोहली के बाद युवा स्टार शुभमन गिल और विकेटकीपर ऋषभ पंत का नंबर आता है. दोनों ने 42-42 मैच खेले हैं. पंत के नाम इस टूर्नामेंट में 2885 और गिल के नाम 2867 रन दर्ज हैं. दिग्गज स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने 41 मैचों में 195 विकेट चटकाए हैं, जबकि कप्तान रोहित शर्मा 40 मैचों में 2716 रन बना चुके हैं।

  • दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    नई दिल्ली । दिल्ली विश्वविद्यालय ने पोस्टग्रेजुएट इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है। जुलाई 2026 से लागू नए सिलेबस में दिल्ली सल्तनत के इतिहास से जुड़े एक प्रमुख पेपर को तीसरे सत्र की अंतिम सूची से हटा दिया गया है। यह बदलाव नई शिक्षा नीति और नए पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप किए गए पाठ्यक्रम संशोधन का हिस्सा बताया गया है।

    हटाए गए विषय का नाम दिल्ली सल्तनत : मध्यकालीन उत्तर भारत में सत्ता की बनावट था। इस पेपर में 13वीं और 14वीं सदी के दौरान दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था, शासन प्रणाली और सत्ता के स्वरूप का अध्ययन कराया जाता था। विषय के जरिए विद्यार्थियों को उस दौर के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक बदलावों को समझने का अवसर मिलता था।

    नए पाठ्यक्रम में केवल दिल्ली सल्तनत से जुड़े पेपर में ही बदलाव नहीं हुआ है। उत्तर भारत के इतिहास से संबंधित लगभग 1400 से 1550 की अवधि वाला एक अन्य विषय भी तीसरे सत्र की अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया है। इससे मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन की संरचना में बदलाव दिखाई देता है।

    पाठ्यक्रम में प्रस्तावित कई अन्य विषयों को भी अंतिम रूप से जगह नहीं मिली है। इनमें शुरुआती भारत में महिलाओं और लिंग से संबंधित इतिहास, प्राचीन भारत में राजनीतिक व्यवस्था तथा प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म और समाज जैसे विषय शामिल हैं। इन बदलावों के कारण इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक विषयों का दायरा पहले की तुलना में अलग हो गया है।

    इतिहास विभाग की ओर से तीसरे सत्र के लिए कुल 38 विशेष वैकल्पिक विषय प्रस्तावित किए गए थे। अंतिम पाठ्यक्रम में इनमें से 16 विषयों को ही शामिल किया गया है। इस तरह 22 प्रस्तावित विषय अंतिम सूची का हिस्सा नहीं बने हैं। विश्वविद्यालय के नए पीजी ढांचे के तहत विषयों के चयन और संरचना को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    दिल्ली सल्तनत से संबंधित पेपर को हटाए जाने को समझने के लिए स्नातक और परास्नातक स्तर के पाठ्यक्रम के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। परास्नातक स्तर पर हटाए गए पेपर में केवल सल्तनत काल की घटनाओं का सामान्य परिचय नहीं दिया जाता था, बल्कि सत्ता, शासन और इतिहास को समझने के अलग-अलग दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता था।

    वहीं स्नातक स्तर पर दिल्ली सल्तनत के इतिहास से संबंधित विषय अभी अलग स्वरूप में पढ़ाया जाता है। इसमें इस कालखंड की प्रमुख घटनाओं, शासकों, राजनीतिक परिस्थितियों और व्यापक ऐतिहासिक विकास का अध्ययन शामिल होता है। इसलिए पीजी के एक विशेष पेपर को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली सल्तनत का इतिहास दिल्ली विश्वविद्यालय की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था से समाप्त हो गया है।

    नए बदलावों के पीछे विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम संरचना को नई शिक्षा नीति और संशोधित पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप तैयार करने की प्रक्रिया बताई गई है। इसमें वैकल्पिक विषयों की संख्या, उनकी विशेषज्ञता और विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध अध्ययन क्षेत्रों को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    इतिहास जैसे विषय में पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव अकादमिक अध्ययन की दिशा को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से परास्नातक स्तर पर विषयों का चयन विद्यार्थियों को किसी ऐतिहासिक कालखंड को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का अवसर देता है। ऐसे में नए पाठ्यक्रम के तहत शामिल विषयों और हटाए गए विषयों को लेकर अकादमिक क्षेत्र में चर्चा होना स्वाभाविक है।

    दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किए गए इस संशोधित पाठ्यक्रम के तहत अब विद्यार्थियों को उपलब्ध अंतिम 16 वैकल्पिक विषयों में से अपने अध्ययन क्षेत्र का चयन करना होगा। विश्वविद्यालय की नई व्यवस्था में इतिहास के विभिन्न कालखंडों और विषयगत क्षेत्रों को नए शैक्षणिक ढांचे के अनुरूप व्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है।

  • Ind vs Eng Test : लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर आज इतिहास रचने उतरेगी भारतीय महिला टीम

    Ind vs Eng Test : लॉर्ड्स के ऐतिहासिक मैदान पर आज इतिहास रचने उतरेगी भारतीय महिला टीम


    लंदन ।
    लॉर्ड्स (Lord’s) के ऐतिहासिक मैदान पर शुक्रवार से भारत और इंग्लैंड की महिला टीमों के बीच टेस्ट मुकाबला खेला जाएगा। भारत की कप्तान (India captain) हरमनप्रीत कौर (Harmanpreet Kaur) ने लॉर्ड्स (Lord’s) में इंग्लैंड (England) के खिलाफ होने वाले ऐतिहासिक महिला टेस्ट (Historic Women’s Test) को टीम के लिए टर्निंग प्वाइंट बताया है. उन्होंने कहा कि इस मुकाबले में जीत T20 वर्ल्ड कप से मिली निराशा को खत्म कर सकती है और टीम का आत्मविश्वास लौटाएगी. कप्तान ने पहली बार लॉर्ड्स में महिला टेस्ट होने, रेड-बॉल क्रिकेट, श्री चरणी और महिला टेस्ट के भविष्य पर भी खुलकर बात की।

    भारतीय कप्तान हरमनप्रीत कौर का मानना है कि अगर भारत इस मुकाबले में जीत दर्ज करता है तो हालिया T20 वर्ल्ड कप में ग्रुप स्टेज से बाहर होने का दर्द काफी हद तक कम हो जाएगा और टीम नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ेगी। हरमनप्रीत ने कहा कि T20 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी. कुछ मुकाबलों में टीम ने अच्छा खेल दिखाया, लेकिन पूरे टूर्नामेंट में लगातार बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाई. यही वजह है कि लॉर्ड्स टेस्ट टीम के लिए नई शुरुआत साबित हो सकता है।

    उन्होंने कहा- अगर हम यह टेस्ट जीतते हैं तो टीम के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. वर्ल्ड कप के बाद हर खिलाड़ी निराश था, लेकिन इस टेस्ट के जरिए हम अपना आत्मविश्वास वापस हासिल कर सकते हैं. जीत के बाद आपको महसूस होता है कि आप दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों में शामिल हैं।

    कप्तान ने कहा कि जब परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आते तो खिलाड़ियों का मनोबल गिरता है. ऐसे समय में टीम का एकजुट रहना सबसे ज्यादा जरूरी होता है. उन्होंने भरोसा जताया कि अगर सभी खिलाड़ी एक-दूसरे का साथ दें और टीम के लिए खेलें तो यह जीत आने वाले बड़े टूर्नामेंटों में भी भारत के लिए फायदेमंद साबित होगी।


    142 साल बाद लॉर्ड्स में पहली बार महिला टेस्ट

    लॉर्ड्स में यह पहला महिला टेस्ट मैच होगा. इस ऐतिहासिक मौके पर हरमनप्रीत ने कहा कि हर क्रिकेटर का सपना होता है कि वह लॉर्ड्स में टेस्ट खेले. उन्हें यह जानकर भी हैरानी हुई कि इस प्रतिष्ठित मैदान पर अब तक महिला टेस्ट आयोजित नहीं हुआ था।

    उन्होंने कहा- जब हमें पता चला कि इतने साल बाद यहां पहला महिला टेस्ट होने जा रहा है तो हम सभी हैरान थे. मुझे पहले इसकी जानकारी नहीं थी. लेकिन मैं यही कहूंगी कि देर हुई है, बहुत ज्यादा देर नहीं हुई. मैं खुश हूं कि अपने करियर में मुझे इस ऐतिहासिक मैच का हिस्सा बनने का मौका मिला।

    उन्होंने बताया कि पूरी भारतीय टीम इस मुकाबले को लेकर बेहद उत्साहित है और सभी खिलाड़ी इस ऐतिहासिक अवसर को यादगार बनाना चाहते हैं।


    रेड-बॉल क्रिकेट चुनौती भी, मौका भी

    हरमनप्रीत ने माना कि महिला खिलाड़ियों को रेड-बॉल क्रिकेट खेलने के ज्यादा मौके नहीं मिलते, इसलिए यह फॉर्मेट चुनौतीपूर्ण जरूर है. हालांकि उन्होंने कहा कि टीम ने पिछले कुछ दिनों में कई प्रैक्ट‍िस सेशन किए हैं और खिलाड़ी अच्छी लय में नजर आए। उन्होंने कहा- हम रेड-बॉल क्रिकेट खेलने के आदी नहीं हैं, लेकिन जब किसी चीज को लेकर उत्साह होता है तो खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करते हैं.”


    ज्यादा महिला टेस्ट खेलने की जताई इच्छा

    भारतीय कप्तान ने महिला टेस्ट क्रिकेट के भविष्य पर भी अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि खिलाड़ी के तौर पर वह ज्यादा से ज्यादा टेस्ट मैच खेलना चाहती हैं, लेकिन इसका फैसला ICC और संबंधित क्रिकेट बोर्डों को करना है। हरमनप्रीत ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में महिला क्रिकेट लगातार आगे बढ़ा है. पिछले साल मार्च में भारत ने टेस्ट खेला था और अब लॉर्ड्स में एक और मौका मिला है. उन्हें उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में महिला टेस्ट मैचों की संख्या और बढ़ेगी।


    इंग्लैंड के खिलाफ रिकॉर्ड से बढ़ा भरोसा

    हरमनप्रीत ने कहा कि भारत ने हाल के टेस्ट मुकाबलों में अच्छा प्रदर्शन किया है और इंग्लैंड के खिलाफ भी टीम का रिकॉर्ड मजबूत रहा है. ऐसे में खिलाड़ियों ने तय किया है कि वे एकजुट होकर मैदान पर उतरेंगे और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगे.


    श्री चरणी पर कप्तान को पूरा भरोसा

    कप्तान ने बाएं हाथ की स्पिनर श्री चरणी की जमकर तारीफ की, जो लॉर्ड्स टेस्ट में डेब्यू करने जा रही हैं. T20 वर्ल्ड कप में भारत की सबसे सफल गेंदबाज रहीं चरणी को लेकर हरमनप्रीत ने कहा कि वह टीम की सबसे अहम गेंदबाजों में से एक हैं.

    उन्होंने कहा कि चरणी ने केवल वर्ल्ड कप ही नहीं, उससे पहले भी लगातार शानदार प्रदर्शन किया है. जब भी टीम को विकेट की जरूरत होती है, वह कप्तान की उम्मीदों पर खरी उतरती हैं. ऐसे खिलाड़ी कप्तान का आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं और टीम को मुश्किल परिस्थितियों से बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाते हैं।

  • मुगल-ए-आजम के सेट से सामने आया इतिहास का अनसुना पन्ना: मधुबाला के हुस्न के दीवाने थे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो

    मुगल-ए-आजम के सेट से सामने आया इतिहास का अनसुना पन्ना: मधुबाला के हुस्न के दीवाने थे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में अपनी बेमिसाल खूबसूरती और जीवंत अभिनय से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री मधुबाला का जादू सिर्फ देश की सीमाओं तक ही सीमित नहीं था। हाल ही में सामने आए ऐतिहासिक और सिनेमाई संस्मरणों के अनुसार, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो भी इस कदर हुस्न की मल्लिका के दीवाने थे कि वे अक्सर उनसे मिलने के लिए भारत आया करते थे। यह उस दौर की बात है जब मधुबाला अपनी सर्वकालिक महान फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ की शूटिंग में व्यस्त थीं। उस समय जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान की राजनीति में कोई बहुत बड़ा नाम नहीं थे, बल्कि एक बेहद पढ़े-लिखे, हैंडसम और उभरते हुए युवा राजनेता के तौर पर मुंबई के दौरों पर आते-जाते रहते थे।

    मध्य प्रदेश। इस ऐतिहासिक और दिलचस्प किस्से की पृष्ठभूमि साल 1950 के दशक के अंतिम वर्षों से जुड़ती है। यह वह दौर था जब एक तरफ मधुबाला और महानायक दिलीप कुमार के बीच के रिश्तों में गंभीर तल्खी आ चुकी थी और उनका सालों पुराना संबंध टूटने की कगार पर था। ठीक उसी समय जुल्फिकार अली भुट्टो की जिंदगी में मधुबाला की एंट्री हुई। भुट्टो अक्सर मुंबई प्रवास के दौरान ‘मुगल-ए-आजम’ के भव्य सेट पर पहुंच जाते थे, जहां वे घंटों बैठकर मधुबाला को अभिनय करते हुए निहारते थे। धीरे-धीरे दोनों के बीच मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा और यह दोस्ती गहरी होती चली गई। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, दोनों अक्सर फिल्म के सेट पर ही एक साथ दोपहर का भोजन करते थे और भुट्टो हमेशा मधुबाला के करीब रहने का बहाना ढूंढते थे।

    इस रिश्ते का सबसे जटिल पहलू यह था कि जब जुल्फिकार अली भुट्टो मधुबाला के करीब आ रहे थे, तब वे पहले से ही शादीशुदा थे और उनकी शादी शिरीन नामक महिला से हो चुकी थी। इसके बावजूद मधुबाला की जादुई शख्सियत के आकर्षण में बंधकर भुट्टो ने अपनी शादीशुदा जिंदगी की परवाह नहीं की। मीडिया रिपोर्ट्स और उस दौर के राजनैतिक-सिनेमाई गलियारों के दावों के अनुसार, भुट्टो ने एक दिन अपने दिल की बात खुलकर मधुबाला के सामने रख दी थी और उनके समक्ष बकायदा विवाह का प्रस्ताव भी पेश किया था। वे हर हाल में मधुबाला को अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहते थे और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे।

    मधुबाला उस दौर में जुल्फिकार भुट्टो की बुद्धिमत्ता और उनके व्यक्तित्व का सम्मान जरूर करती थीं और उनके साथ पर्याप्त समय भी बिताती थीं, लेकिन वे एक बेहद व्यावहारिक महिला भी थीं। उन्हें इस बात का पूरा संज्ञान था कि भुट्टो न सिर्फ शादीशुदा हैं बल्कि एक दूसरे देश की सक्रिय राजनीति का हिस्सा भी हैं। ऐसे किसी संवेदनशील मोड़ पर शादी जैसा बड़ा और गंभीर फैसला लेना उनके करियर और व्यक्तिगत जीवन के लिए सही नहीं था। यही कारण रहा कि मधुबाला ने भुट्टो के प्रेम प्रस्ताव को बेहद शालीनता से ठुकरा दिया और अपने रिश्ते को एक सीमित दायरे से आगे नहीं बढ़ने दिया। आखिरकार उन्होंने भुट्टो से अपनी दूरियां बना लीं और इस तरह राजनीति और कला का यह अध्याय हमेशा के लिए अधूरा रह गया।

    इस अधूरी प्रेम कहानी के अंत के बाद दोनों की राहें पूरी तरह जुदा हो गईं। जुल्फिकार अली भुट्टो से अलग होने के तुरंत बाद साल 1960 में मधुबाला ने मशहूर गायक और अभिनेता किशोर कुमार से शादी कर ली। इसके कुछ समय बाद ही वे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ गईं और महज 36 वर्ष की अल्पायु में साल 1969 में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। दूसरी ओर, जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान की राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे और देश के विदेश मंत्री, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बने। हालांकि, नियति को कुछ और ही मंजूर था और साल 1979 में तख्तापलट के बाद महज 51 वर्ष की आयु में भुट्टो को पाकिस्तान में फांसी दे दी गई।

  • क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून

    क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून


    नई दिल्ली। भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मंजूरी देते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला Harish Rana vs Union of India मामले में आया, जिसमें 32 वर्षीय हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अपील स्वीकार कर ली गई।

    Supreme Court of India की जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में हैं। बेटे की लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए उनके माता-पिता ने अदालत से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

    इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    आइए जानते हैं कि इच्छामृत्यु क्या है और दुनिया में इसका इतिहास क्या रहा है।

    क्या होती है इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु (Euthanasia) का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना, जो असाध्य या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और असहनीय दर्द झेल रहा हो। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है।

    इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है।

    1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)

    इसमें मरीज की मृत्यु लाने के लिए डॉक्टर या कोई व्यक्ति सक्रिय कदम उठाता है, जैसे घातक दवा या इंजेक्शन देना। उदाहरण के तौर पर मरीज को ऐसा इंजेक्शन देना जिससे वह गहरी नींद में चला जाए और उसकी दर्दरहित मृत्यु हो जाए।

    2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)

    इसमें मरीज को जिंदा रखने वाले इलाज या जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि उपचार बंद कर देते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त होता है।

    प्राचीन काल में इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु का विचार बहुत पुराना है। लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व के महाकाव्य Iliad में घायल योद्धाओं के दर्द से मुक्ति के लिए दया मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

    भारतीय परंपरा में भी तपस्वियों द्वारा प्रायोपवेश (आमरण अनशन के माध्यम से प्राण त्यागना) की परंपरा रही है, जिसका उल्लेख Mahabharata में मिलता है।

    प्राचीन यूनान में दार्शनिक Plato ने अपनी पुस्तक Republic में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था।

    हालांकि करीब 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली Hippocratic Oath ने सक्रिय इच्छामृत्यु का विरोध किया और कहा कि डॉक्टर किसी मरीज को घातक दवा नहीं देंगे।

    मध्यकाल में धार्मिक प्रतिबंध

    ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को पाप और हत्या के समान माना गया। धार्मिक विचारक Augustine of Hippo और Thomas Aquinas ने इसे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया।

    इस्लाम और यहूदी धर्म में भी सक्रिय इच्छामृत्यु को प्रतिबंधित किया गया, हालांकि कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार रोकने की अनुमति दी गई।

    19वीं और 20वीं सदी में बहस

    19वीं सदी में आधुनिक चिकित्सा के विकास के साथ इच्छामृत्यु पर फिर से बहस शुरू हुई। 1870 में डॉक्टर Samuel D. Williams ने अंतिम अवस्था के मरीजों को क्लोरोफॉर्म देने का सुझाव दिया था।

    20वीं सदी में नाजी जर्मनी के कुख्यात Aktion T4 program के कारण इच्छामृत्यु की अवधारणा विवादित हो गई। 1939-1945 के बीच नाजी शासन ने इस कार्यक्रम के नाम पर हजारों लोगों की हत्या कर दी थी।

    आज किन देशों में मान्य है इच्छामृत्यु

    समय के साथ कई देशों ने सख्त नियमों के तहत इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को कानूनी मान्यता दी है।

    Netherlands (2001) और Belgium (2002) ने सक्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया।

    Canada ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया।

    Switzerland में 1942 से सहायता प्राप्त आत्महत्या कानूनी है।

    United States के कुछ राज्यों में “Death with Dignity” कानून लागू है, जिसकी शुरुआत Oregon में 1997 में हुई।

    Spain, Austria, Australia, New Zealand, Colombia और Ecuador में भी विभिन्न रूपों में इसे अनुमति मिली है।

    किन देशों में सख्त प्रतिबंध

    कई इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी रूप पर प्रतिबंध है। वहीं France और United Kingdom जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है, बल्कि मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए पालीएटिव केयर और सिडेशन पर जोर दिया जाता है।

    भारत में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इच्छामृत्यु के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक बहस को नई दिशा देता है। हालांकि यह केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु तक सीमित है, लेकिन इससे भविष्य में चिकित्सा नैतिकता और मरीज के अधिकारों पर व्यापक चर्चा की संभावना बढ़ गई है।

  • सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस और टीएमसी को इतिहास पर घेरा..

    सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस और टीएमसी को इतिहास पर घेरा..


    नई दिल्ली: भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर नई दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कांग्रेस तथा तृणमूल कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा उन्होंने कहा कि सुभाष चंद्र बोस के कारण अंग्रेजों का भारत पर कब्जा करने का सपना चकनाचूर हो गया

    सुधांशु त्रिवेदी ने विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर कटाक्ष किया उन्होंने कहा कि आपकी पार्टी भी कांग्रेस से निकली है आप भी कांग्रेस में थीं इतने सालों तक क्यों नहीं याद आया कि नेताजी को सम्मान और उचित स्थान मिलना चाहिए अगर टीएमसी के मन में नेताजी के प्रति सम्मान है तो उन्हें अपने नाम से कांग्रेस हटा देना चाहिए अन्यथा बंगाल की प्रबुद्ध जनता उन्हें जड़-मूल से खत्म कर देगीउन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सबसे सच्चा सम्मान दिया 2018 में आजाद हिंद की निर्वासित सरकार के 75 वर्ष पूरे होने पर सभी जीवित सेनानियों को गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल किया गया और उनका सम्मान किया गया किसी भी राजनीतिक दल ने इससे पहले ऐसा सम्मान नहीं दिया इंडिया गेट पर 1968 तक जॉर्ज पंचम की मूर्ति रही थी वहां नेताजी की मूर्ति पुनर्स्थापित की गई

    सुधांशु त्रिवेदी ने आगे कहा कि भारत की स्वतंत्रता में कई लोगों ने योगदान दिया लेकिन सुभाष चंद्र बोस का योगदान अग्रणी और अविस्मरणीय है इसे भुलाने के अनेक कुत्सित प्रयास हुए हैं उन्होंने डॉ भीमराव अंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि 1955 में दिए साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय सेना की निष्ठा अंग्रेजों के प्रति बदल चुकी थी और नेताजी के नेतृत्व ने ब्रिटिश शासन की धारणा को तोड़ दिया

    त्रिवेदी ने 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के बाद नेताजी द्वारा इसे ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाने का अवसर बताया और सवाल उठाया कि उस समय कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन पर दबाव क्यों नहीं बनाया उन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 14 जुलाई 1942 के रेजोल्यूशन का हवाला दिया जिसमें कहा गया कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ नकारात्मक भाव को सहयोग और सकारात्मक में बदला जाएगा और कांग्रेस पूरी स्वेच्छा से ब्रिटिश फौजों के समर्थन के लिए तैयार थी यही कारण था कि कांग्रेस ने 1931 से 1947 तक 1942 को छोड़कर कोई आंदोलन नहीं किया

    सुधांशु त्रिवेदी का कहना है कि इतिहास में नेताजी के योगदान को सही रूप में प्रस्तुत करना और उनका सम्मान करना आवश्यक है यह केवल भारत के गौरव के लिए नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जरूरी है