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  • जहां जन्मा था एडोल्फ हिटलर, उसी ऐतिहासिक इमारत में खुला पुलिस स्टेशन, चरमपंथी गतिविधियों पर लगेगी रोक

    जहां जन्मा था एडोल्फ हिटलर, उसी ऐतिहासिक इमारत में खुला पुलिस स्टेशन, चरमपंथी गतिविधियों पर लगेगी रोक

    नई दिल्ली । ऑस्ट्रिया ने इतिहास के सबसे विवादित और कुख्यात तानाशाह एडोल्फ हिटलर के जन्मस्थान को नई पहचान देते हुए वहां आधिकारिक तौर पर पुलिस स्टेशन शुरू कर दिया है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य उस इमारत को नव-नाजी समर्थकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने से रोकना और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करना है। वर्षों तक विवादों में रही इस इमारत का व्यापक पुनर्निर्माण करने के बाद इसे पुलिस प्रशासन के उपयोग के लिए तैयार किया गया है।

    यह ऐतिहासिक भवन ऑस्ट्रिया के ब्राउनाउ-एम-इन शहर में स्थित है, जहां 20 अप्रैल 1889 को एडोल्फ हिटलर का जन्म हुआ था। 17वीं सदी में बने इस भवन को लंबे समय तक लेकर यह बहस चलती रही कि इसका भविष्य क्या होना चाहिए। कई विशेषज्ञों का मानना था कि यदि इसे ऐतिहासिक स्मारक का रूप दिया जाता है तो यह चरमपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के लिए प्रतीकात्मक स्थल बन सकता है। इसी आशंका को देखते हुए सरकार ने इसे सार्वजनिक प्रशासन के उपयोग में लाने का निर्णय लिया।

    इमारत के पुनर्निर्माण पर लगभग 20 मिलियन यूरो, यानी भारतीय मुद्रा में करीब 220 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यह परियोजना तय समय से लगभग तीन वर्ष की देरी से पूरी हुई। बाहरी स्वरूप में भी बदलाव किए गए हैं ताकि भवन की पुरानी पहचान कम दिखाई दे और उसे सामान्य सरकारी भवन जैसा रूप दिया जा सके। अब मुख्य प्रवेश द्वार पर पुलिस स्टेशन का आधिकारिक चिन्ह लगाया गया है।

    हालांकि भवन के बाहर स्थित स्मारक पत्थर को यथावत रखा गया है। इस स्मारक पर शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र का संदेश अंकित है तथा फासीवाद की पुनरावृत्ति न होने की चेतावनी दी गई है। सरकार का मानना है कि यह स्मारक इतिहास की त्रासदी को याद रखने और भविष्य के लिए सीख लेने का महत्वपूर्ण माध्यम बना रहेगा।

    इतिहास के अनुसार, हिटलर के शासनकाल में लाखों लोगों ने उत्पीड़न और नरसंहार का सामना किया। ऑस्ट्रिया भी उस दौर की घटनाओं को लेकर लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं का सामना करता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि आधुनिक ऑस्ट्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था, कानून के शासन और मानवाधिकारों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

    इस भवन का स्वामित्व कई दशकों तक एक निजी परिवार के पास रहा। बाद में सरकार इसे लीज पर लेकर सामाजिक कार्यों के लिए इस्तेमाल करती रही, लेकिन भविष्य को लेकर विवाद लगातार बना रहा। निजी मालिक और सरकार के बीच कानूनी प्रक्रिया भी चली, जिसके बाद सरकार ने कानून के तहत भवन का अधिग्रहण किया और मुआवजा देकर इसे अपने नियंत्रण में लिया।

    भवन के उपयोग को लेकर कई विकल्पों पर विचार किया गया था। कुछ लोगों ने इसे संग्रहालय बनाने का सुझाव दिया, जबकि कुछ ने भवन को पूरी तरह ध्वस्त करने की वकालत की। हालांकि इतिहासकारों और विशेषज्ञों की राय थी कि भवन को मिटाने के बजाय उसका ऐसा उपयोग किया जाए जिससे चरमपंथी विचारधारा को किसी प्रकार का प्रतीकात्मक लाभ न मिले। विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर अंततः इसे पुलिस स्टेशन में बदलने का निर्णय लिया गया।

    सरकार का मानना है कि भवन में स्थायी पुलिस उपस्थिति यह स्पष्ट संदेश देगी कि नाजी विचारधारा या उसके किसी भी प्रकार के महिमामंडन के लिए समाज में कोई स्थान नहीं है। साथ ही यह कदम इतिहास की संवेदनशील विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास भी माना जा रहा है।

  • हिटलर से बच निकली थी एनी फ्रैंक की बहन, 96 साल की उम्र में निधन

    हिटलर से बच निकली थी एनी फ्रैंक की बहन, 96 साल की उम्र में निधन

    पोलैंड। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर ने यहूदियों का जिस तरह से नरसंहार किया और उन्हें यातनाएं दीं, उसकी कहानी जाकर भी रूह कांप उठती है। दूसरे विश्वयुद्ध की प्रसिद्ध घटनाओं में से एक है जिसे ‘एनी फ्रैंक का धोखा’ नाम से जाना जाता है। एनी फ्रैंक होलोकॉस्ट में सबसे चर्चित पीड़ित थीं। उनके एक करीबी ने ही फ्रैंक को परिवार सहित धोखा देकर पकड़वा दिया था। उन्होंने एक डायरी लिखी जिसको बाद में ‘द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल’ के नाम से प्रकाशित किया गया । मात्र 15 साल की उम्र में ही एनी की मौत हो गई। उनकी एक सौतेली बहन इवा स्क्लॉस की 96 साल की उम्र में सोमवार को मौत हो गई है। इवा स्क्लॉस भी लंबे समय तक हिटलर के बनाए ऑस्त्विच यातना शिविर में रहीं। हालांकि रूस के हमले के बाद वह बच गईं।

    मौत का दरवाजा
    जानकारी के मुताबिक दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड में नाजियों के यातना शिविरों में करीब 10 लाख लोगों की मौत हो गई थी जिनमें से ज्यादातर यहूदी ही थे। ऑस्त्विच के यातना शिविर को ‘मौत का दरवाजा कहा जाता है। कहा जाता है कि नाजी लोग जब बंदियों को यातना शिविर में ले जाते थे तो उनके बाल तक काट लेते थे ताकि वे किसी भी तरीके से कपड़े ना बना सकें।

    एनी फ्रैंक की सौतेली बहन इवा लंदन में एनी फ्रैंक ट्रस्ट चलाती थीं। ब्रिटेन के महाराज किंग चार्ल्स थर्ड ने इस ट्रस्ट को बनाने में मदद की थी। हिटलर के यातना शिविर से बचने के बाद इवा ने ठान लिया था कि बाकी बचा हुआ जीवन वह लोगों की मदद करने और ऐसा काम करने में बिताएंगी जिससे नफरत कम हो और प्रेम को बल मिले।

    इवा का जन्म 1929 में विएना में हुआ था। ऑस्ट्रिया पर नाजियों के कब्जे के बाद वे भागकर ऐम्सटर्डम चले गए। वहीं इवा की दोस्ती एी से हुई थी। फ्रैंक की तरह इवा का परिवार भी दो साल तक यातना शिविर में रहा। 1945 में जब रूस की सेना ने शिविर से बंदियों को छुड़वाया तो इवा और उनकी मां की जान बच गई। उनके परिवार के बाकी लोग यातना शिविर में मारे गए थे। इवा के पिता भी ऑस्त्विच में ही मारे गए थे। 1953 में इवा की मां फ्रिजी ने एनी फ्रैंक के पिता से शादी कर ली। एनी फ्रैंक की मौत बेलसन बेलसन कैंप में पहले ही हो चुकी थी।

    इवा ने लगभग एक दशक तक यातना शिविर के बारे में किसी से बात ही नहीं की। वह युद्ध की उस विभीषिका से बाहर ही नहीं आ पा रही थीं। ऐसे में वह ज्यादातर चुप ही रहती थीं। 1986 में एनी फ्रैंक एग्जिबिशन शुरू होने के बाद उन्होंने फैसला किया कि वह नई पीढञी को नाजियों के अत्याचार के बारे में बताएँगी। इसके बाद उन्होंने यातना शिविर के बारे में बताना शुरू किया। इवा ने पूरा जीवन लोगों की सेवा में लगा दिया।