Tag: HormuzStrait

  • वैश्विक तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट, आपूर्ति सुधरने से बाजार को राहत, फिर भी पश्चिम एशिया के हालात पर बनी हुई है नजर

    वैश्विक तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट, आपूर्ति सुधरने से बाजार को राहत, फिर भी पश्चिम एशिया के हालात पर बनी हुई है नजर

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार नरमी का दौर जारी है। वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव में कमी और प्रमुख समुद्री मार्गों से तेल आपूर्ति सामान्य होने के कारण शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों के दाम दो प्रतिशत तक लुढ़क गए। ऊर्जा बाजार में यह गिरावट ऐसे समय दर्ज की गई है जब निवेशकों का भरोसा आपूर्ति व्यवस्था के स्थिर होने की ओर बढ़ा है। हालांकि पश्चिम एशिया में हाल ही में सामने आई कुछ घटनाओं ने यह संकेत भी दिया है कि बाजार पूरी तरह जोखिम से बाहर नहीं निकला है।

    अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ सप्ताह से उतार-चढ़ाव का मुख्य कारण पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियां रही हैं। पहले संघर्ष और आपूर्ति बाधित होने की आशंका के कारण तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया था, लेकिन अब हालात अपेक्षाकृत सामान्य होने के बाद बाजार में राहत का माहौल बनता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आपूर्ति सुचारु बनी रहती है तो निकट भविष्य में कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है।

    हालांकि इस राहत के बीच ओमान के निकट एक मालवाहक जहाज पर हुए हमले ने ऊर्जा बाजार को फिर से सतर्क कर दिया। इस घटना के बाद कुछ समय के लिए तेल की कीमतों में तेजी आई, क्योंकि निवेशकों को आशंका थी कि यदि समुद्री सुरक्षा प्रभावित हुई तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ सकता है। बाद में बाजार ने स्थिति का आकलन किया और कीमतें दोबारा गिरावट की ओर लौट गईं। इससे स्पष्ट है कि निवेशक अभी भी पश्चिम एशिया की हर गतिविधि पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि, सुरक्षा चुनौती या राजनीतिक तनाव का सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर दिखाई देता है। हाल के दिनों में इस मार्ग से तेल टैंकरों की आवाजाही में सुधार होने से आपूर्ति बाधित होने की आशंका काफी कम हुई है, जिससे कीमतों पर दबाव बना है।

    सप्ताहभर के प्रदर्शन पर नजर डालें तो प्रमुख वैश्विक बेंचमार्क में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। यह संकेत देता है कि बाजार फिलहाल आपूर्ति की स्थिति को लेकर पहले की तुलना में अधिक आश्वस्त है। फिर भी विशेषज्ञ यह मानते हैं कि यदि क्षेत्रीय तनाव दोबारा बढ़ता है या समुद्री मार्गों में किसी प्रकार की बाधा आती है तो कीमतों में फिर तेजी लौट सकती है।

    भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट सकारात्मक मानी जाती है। इससे आयात लागत कम हो सकती है, जिसका असर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों और महंगाई पर भी पड़ सकता है। साथ ही परिवहन, विनिर्माण और ऊर्जा पर निर्भर उद्योगों को भी लागत में राहत मिलने की संभावना बढ़ जाती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह रुझान लंबे समय तक बना रहता है तो इसका सकारात्मक प्रभाव देश की आर्थिक गतिविधियों पर भी दिखाई दे सकता है।

    भारतीय कच्चे तेल बास्केट की औसत कीमतों में भी हाल के समय में उल्लेखनीय कमी आई है। यह संकेत देता है कि वैश्विक बाजार में आई नरमी का असर भारत के आयात बिल पर भी पड़ रहा है। ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार आने वाले समय में यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें नियंत्रित रहती हैं तो इससे विदेशी मुद्रा व्यय में कमी और आर्थिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    फिलहाल वैश्विक तेल बाजार राहत और सतर्कता के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ रहा है। एक ओर आपूर्ति सामान्य होने से कीमतों में गिरावट का माहौल बना है, वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशिया की घटनाएं यह याद दिला रही हैं कि ऊर्जा बाजार अभी भी भू-राजनीतिक जोखिमों से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय हालात, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक मांग की दिशा ही कच्चे तेल की कीमतों का अगला रुख तय करेगी।

  • होर्मुज से जहाजों की लंबी कतार, नियम सख्त कर ईरान ने संभाली स्थिति

    होर्मुज से जहाजों की लंबी कतार, नियम सख्त कर ईरान ने संभाली स्थिति


    नई दिल्ली । होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही एक बार फिर शुरू होते ही इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर भारी भीड़ देखने को मिल रही है। लंबे समय तक सीमित संचालन और सुरक्षा कारणों से बाधित रहने के बाद जब जहाजों को गुजरने की अनुमति मिली तो अचानक बड़ी संख्या में वाणिज्यिक जहाज एक साथ कतार में लग गए। इससे समुद्री मार्ग पर जाम जैसी स्थिति बन गई है और संचालन व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी ने नए और सख्त नियम लागू कर दिए हैं ताकि आवाजाही सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से हो सके।

    नए नियमों के तहत अब किसी भी जहाज को होर्मुज से गुजरने के लिए कम से कम अड़तालीस घंटे पहले ट्रांजिट आवेदन जमा करना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके साथ ही जहाज को पूरी यात्रा के दौरान संबंधित अथॉरिटी से लगातार संपर्क बनाए रखना होगा। यदि किसी भी स्तर पर संपर्क या प्रक्रिया में चूक होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी जहाज के मालिक और ऑपरेटर पर होगी। अथॉरिटी ने यह भी स्पष्ट किया है कि सभी जहाजों को अपनी यात्रा से जुड़ी विस्तृत जानकारी जैसे मार्ग यात्रा समय माल की प्रकृति और संपर्क विवरण पहले से साझा करना होगा।

    होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद बड़ा है। यह वही मार्ग है जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और दुनिया के प्रमुख तेल और गैस निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। वैश्विक स्तर पर खाड़ी देशों के बड़े हिस्से का ऊर्जा निर्यात इसी मार्ग से होकर गुजरता है। भारत चीन जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर हैं। भारत के लिए भी कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से आता है जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है।

    पिछले कुछ महीनों में क्षेत्रीय तनाव और सैन्य गतिविधियों के कारण इस जलमार्ग पर आवाजाही बेहद सीमित हो गई थी। कई जहाजों को सुरक्षा कारणों से रोक दिया गया था और कुछ पर हमले का खतरा भी बना हुआ था। युद्ध जैसी स्थितियों के दौरान समुद्र में माइन्स बिछाने जैसी घटनाओं ने भी जहाजों की सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी थी। अब जब धीरे धीरे संचालन बहाल किया जा रहा है तो एक साथ बड़ी संख्या में जहाजों के पहुंचने से दबाव बढ़ गया है।

    नई व्यवस्था के तहत पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी ने ट्रांजिट प्रक्रिया को डिजिटल और नियंत्रित प्रणाली से जोड़ दिया है। जहाजों को पहले से ऑनलाइन आवेदन करना होगा और यात्रा से जुड़ी सभी जानकारियां सही समय पर उपलब्ध करानी होंगी। इसके बाद ही उन्हें गुजरने की अनुमति दी जाएगी। अथॉरिटी का कहना है कि यह कदम सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसी भी दुर्घटना की संभावना को कम करने के लिए उठाया गया है।

    समझौते के अनुसार शुरुआती साठ दिनों तक किसी भी जहाज से मार्ग उपयोग के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। इस अवधि में सुरक्षा और पर्यावरण प्रबंधन से जुड़ी सभी लागत ईरान सरकार वहन करेगी ताकि व्यापारिक आवाजाही को सुचारू रूप से दोबारा स्थापित किया जा सके।

    हाल के दिनों में कुछ ही जहाज इस मार्ग से गुजर पाए हैं जबकि पहले की तुलना में यह संख्या बहुत कम रही थी। अब जब क्षेत्रीय स्थिति में बदलाव आ रहा है तो होर्मुज फिर से वैश्विक व्यापार का केंद्र बनता दिख रहा है लेकिन इसके साथ ही सुरक्षा और प्रबंधन की चुनौतियां भी लगातार बनी हुई हैं।

  • हॉर्मुज संकट के बीच भारत को बड़ी राहत: तीन महीने बाद 62,370 मीट्रिक टन एलएनजी लेकर दहेज पहुंचा टैंकर ‘दिशा’, ऊर्जा आपूर्ति को मिली नई मजबूती

    हॉर्मुज संकट के बीच भारत को बड़ी राहत: तीन महीने बाद 62,370 मीट्रिक टन एलएनजी लेकर दहेज पहुंचा टैंकर ‘दिशा’, ऊर्जा आपूर्ति को मिली नई मजबूती

    नई दिल्ली । मध्य-पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और समुद्री सुरक्षा चुनौतियों के बीच भारत के लिए एक महत्वपूर्ण राहत भरी खबर सामने आई है। लगभग तीन महीने से अधिक समय तक अनिश्चित परिस्थितियों का सामना करने के बाद एलएनजी टैंकर ‘दिशा’ सफलतापूर्वक हॉर्मुज स्ट्रेट पार करते हुए गुजरात के दहेज एलएनजी टर्मिनल पहुंच गया। यह जहाज 62,370 मीट्रिक टन तरलीकृत प्राकृतिक गैस लेकर भारत लौटा है, जिसे देश की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

    शुक्रवार सुबह दहेज टर्मिनल पर पहुंचे इस टैंकर का आगमन ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार मध्य-पूर्व की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। हॉर्मुज स्ट्रेट को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है और यहां किसी भी प्रकार का तनाव तेल तथा गैस की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति को सीधे प्रभावित कर सकता है। ऐसे में ‘दिशा’ का सुरक्षित रूप से भारत पहुंचना रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    जानकारी के अनुसार, यह एलएनजी कार्गो कतर के रास लाफान टर्मिनल से लोड किया गया था। जहाज को भारत तक पहुंचने में सामान्य समय से कहीं अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ी। क्षेत्र में सुरक्षा संबंधी चिंताओं और समुद्री मार्गों पर बढ़ती संवेदनशीलता के कारण इसकी यात्रा लंबे समय तक प्रभावित रही। हालांकि सभी आवश्यक सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन करते हुए जहाज ने अंततः अपनी यात्रा पूरी की और निर्धारित गंतव्य तक पहुंच गया।

    ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सफल आवाजाही भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सकारात्मक संकेत है। भारत अपनी प्राकृतिक गैस जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में एलएनजी आपूर्ति में किसी भी प्रकार की रुकावट का असर उद्योगों, बिजली उत्पादन और अन्य गैस आधारित गतिविधियों पर पड़ सकता है। ‘दिशा’ का आगमन इस बात का संकेत है कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के प्रयास जारी हैं।

    यह जहाज शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले एक कंसोर्टियम द्वारा संचालित किया जा रहा है और इसे पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड के लिए चार्टर किया गया है। भारत में एलएनजी आयात और वितरण के क्षेत्र में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में इस कार्गो की सुरक्षित डिलीवरी ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हितधारकों के लिए भी राहत की खबर मानी जा रही है।

    दहेज एलएनजी टर्मिनल देश का सबसे बड़ा एलएनजी आयात केंद्र माना जाता है। यहां पहुंचने वाली गैस को विभिन्न राज्यों और औद्योगिक क्षेत्रों तक पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से पहुंचाया जाता है। इसलिए इस टर्मिनल पर आने वाले प्रत्येक बड़े कार्गो का सीधा संबंध देश की गैस उपलब्धता और मांग-आपूर्ति संतुलन से जुड़ा होता है।

    हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले भारतीय एलएनजी जहाजों की गतिविधियों पर हाल के महीनों में विशेष नजर रखी जा रही थी। क्षेत्रीय तनाव के कारण ऊर्जा बाजार में आपूर्ति बाधित होने की आशंकाएं लगातार व्यक्त की जा रही थीं। ऐसे माहौल में ‘दिशा’ का सुरक्षित रूप से भारत पहुंचना न केवल एक सफल समुद्री अभियान माना जा रहा है, बल्कि यह देश की ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली की स्थिरता और लचीलापन भी दर्शाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वैश्विक ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर ध्यान और बढ़ेगा। फिलहाल ‘दिशा’ का दहेज पहुंचना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है, जिसने ऊर्जा क्षेत्र को राहत और भरोसे का संदेश दिया है।

  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बीच भारतीय नाविकों का मुद्दा उठा, एफएसयूआई बोली- मृतकों के परिवारों को मिले उचित मुआवजा

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बीच भारतीय नाविकों का मुद्दा उठा, एफएसयूआई बोली- मृतकों के परिवारों को मिले उचित मुआवजा

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए शांति समझौते का स्वागत करते हुए फॉरवर्ड सीमेन्स यूनियन ऑफ इंडिया ने होर्मुज क्षेत्र में जान गंवाने वाले चार भारतीय नाविकों के परिवारों के लिए मुआवजे की मांग उठाई है। संगठन का कहना है कि क्षेत्र में हुई सैन्य घटनाओं और सुरक्षा संकट के कारण भारतीय नागरिकों की जान गई, इसलिए प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाना अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता होनी चाहिए।

    यूनियन ने अमेरिकी प्रशासन से अपील करते हुए कहा है कि मृतक भारतीय नाविकों के परिजनों को कम से कम 50 लाख डॉलर का मुआवजा दिया जाए। संगठन का तर्क है कि यह केवल आर्थिक सहायता का विषय नहीं बल्कि उन परिवारों के प्रति नैतिक और मानवीय दायित्व का मामला भी है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया।

    एफएसयूआई ने अपने बयान में कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बनी नई समझ क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सकारात्मक कदम है। हालांकि संगठन का मानना है कि स्थायी शांति तभी सार्थक होगी जब संघर्ष और सैन्य कार्रवाई से प्रभावित निर्दोष नागरिकों तथा समुद्री कर्मियों के साथ न्याय सुनिश्चित किया जाए। इसी संदर्भ में भारतीय नाविकों के परिवारों को मुआवजा देने की मांग को प्रमुखता से उठाया गया है।

    यूनियन के अनुसार, चीफ इंजीनियर पतनाला सुरेश, डेक कैडेट आदित्य शर्मा और फिटर शिवानंद चौरेसिया की मौत मिसाइल हमले से जुड़ी घटना में हुई थी। वहीं दूसरे अधिकारी निशांत उर्थनाथन की मृत्यु के लिए संगठन ने समय पर चिकित्सीय सहायता नहीं मिल पाने और क्षेत्रीय नाकेबंदी से उत्पन्न परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराया है। संगठन का कहना है कि इन घटनाओं की निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियों को रोका जा सके।

    घटना जून माह में ओमान तट के निकट होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास हुई थी। उस समय एमटी सेटेबेलो नामक तेल टैंकर क्षेत्रीय तनाव और सैन्य गतिविधियों के बीच प्रभावित हुआ था। जहाज पर कुल 24 भारतीय चालक दल के सदस्य मौजूद थे। हादसे में चार भारतीय नाविकों की मौत हो गई, जबकि अन्य सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया था।

    इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और वाणिज्यिक नौवहन पर भी देखा गया था। भारतीय समुद्री समुदाय ने उस समय चालक दल की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के पालन को लेकर चिंता व्यक्त की थी।

    घटना के बाद भारत सरकार ने भी संबंधित पक्षों के समक्ष अपनी चिंता दर्ज कराई थी और वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया था। भारत का मानना रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर काम करने वाले नागरिक कर्मियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

    एफएसयूआई का कहना है कि मृतक नाविक किसी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं थे, बल्कि वे पेशेवर दायित्व निभाते हुए अपने परिवारों के लिए काम कर रहे थे। ऐसे में उनकी मृत्यु को केवल एक आकस्मिक घटना मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। संगठन ने मांग की है कि जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ प्रभावित परिवारों को सम्मानजनक सहायता और न्याय उपलब्ध कराया जाए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक समुद्री सुरक्षा व्यवस्था, संघर्ष क्षेत्रों में नागरिक जहाजों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में इस विषय पर होने वाली कूटनीतिक और कानूनी प्रक्रियाओं पर सभी की नजरें बनी रहेंगी।

  • अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर बढ़ी वैश्विक नजरें, ट्रंप ने आज हस्ताक्षर का जताया भरोसा, तेहरान ने कहा- अंतिम सहमति में लग सकते हैं कुछ और दिन

    अमेरिका-ईरान शांति समझौते पर बढ़ी वैश्विक नजरें, ट्रंप ने आज हस्ताक्षर का जताया भरोसा, तेहरान ने कहा- अंतिम सहमति में लग सकते हैं कुछ और दिन

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है और दोनों देशों के बीच प्रस्तावित शांति समझौता अब अंतिम चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है। हालांकि समझौते को लेकर दोनों पक्षों के सार्वजनिक बयानों में समयसीमा को लेकर अंतर देखने को मिला है। अमेरिका ने जहां रविवार को समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना जताई है, वहीं ईरान ने संकेत दिया है कि दस्तावेज को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में अभी कुछ और समय लग सकता है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि समझौते पर हस्ताक्षर होते ही क्षेत्रीय समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी जहाजों के लिए पूरी तरह खोल दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान वार्ता का स्वरूप पूर्व की सरकारों के दौरान हुई बातचीत से अलग है और दोनों देशों के बीच इस बार अधिक व्यावहारिक तथा संतुलित समझ विकसित हुई है।

    दूसरी ओर, ईरान ने समझौते की दिशा में हुई प्रगति को स्वीकार किया है, लेकिन तत्काल हस्ताक्षर की संभावना को लेकर सतर्क रुख अपनाया है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन समझौता रविवार को ही अंतिम रूप ले लेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी। उनके अनुसार आने वाले दिनों में समझौता ज्ञापन को अंतिम रूप दिए जाने की पूरी संभावना है।

    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी समझौते के स्वरूप और प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित दस्तावेज लगभग डेढ़ से दो पृष्ठों का है, जिसमें 14 प्रमुख बिंदुओं को शामिल किया गया है। इस दस्तावेज पर पिछले दो महीनों से अधिक समय से दोनों देशों के बीच गहन वार्ताएं चल रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समझौते के प्रत्येक प्रावधान की समीक्षा ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और सैन्य नेतृत्व द्वारा की गई है।

    प्रस्तावित समझौते के पहले चरण में क्षेत्रीय संघर्षों को समाप्त करने पर विशेष जोर दिया गया है। इसके तहत लेबनान सहित विभिन्न मोर्चों पर चल रहे संघर्षों के औपचारिक अंत की रूपरेखा तय की गई है। साथ ही दोनों पक्षों द्वारा भविष्य में किसी नए सैन्य टकराव की शुरुआत नहीं करने की प्रतिबद्धता भी शामिल है। इसके अतिरिक्त ईरानी बंदरगाहों पर लागू अमेरिकी नौसैनिक प्रतिबंधों को हटाने तथा ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करने के लिए एक ढांचा तैयार करने का प्रस्ताव रखा गया है।

    समझौते में होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन को लेकर भी विशेष व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। इसके तहत 60 दिनों की एक संक्रमणकालीन अवधि निर्धारित की जा सकती है, जिसके दौरान समुद्री यातायात और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं को स्थिर किया जाएगा। यह कदम वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दूसरे चरण में अगले 60 दिनों तक व्यापक वार्ताओं का दौर जारी रखने की योजना बनाई गई है। इन चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य परमाणु कार्यक्रम, यूरेनियम संवर्धन और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर स्थायी समाधान तलाशना होगा। साथ ही दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी प्रश्नों पर भी चर्चा की जाएगी।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो इससे न केवल पश्चिम एशिया में तनाव कम होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दोनों पक्ष अंतिम सहमति तक कब पहुंचते हैं और औपचारिक हस्ताक्षर की प्रक्रिया कब पूरी होती है।

  • अमेरिका-ईरान समझौते पर बना संशय, होर्मुज में ड्रोन कार्रवाई और बंदर अब्बास धमाकों से फिर बढ़ा तनाव

    अमेरिका-ईरान समझौते पर बना संशय, होर्मुज में ड्रोन कार्रवाई और बंदर अब्बास धमाकों से फिर बढ़ा तनाव

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के संबंध एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। दोनों देशों के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर हाल के दिनों में उम्मीदें जगी थीं, लेकिन ताजा घटनाक्रमों ने संकेत दिया है कि किसी व्यापक सहमति तक पहुंचने का रास्ता अभी भी जटिल बना हुआ है। कूटनीतिक बयानों, समुद्री गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं ने क्षेत्र की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है।

    अमेरिकी नेतृत्व की ओर से हाल ही में यह संकेत दिया गया कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव को समाप्त करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता अंतिम चरण में है। दावा किया गया कि बातचीत में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और जल्द ही औपचारिक घोषणा संभव हो सकती है। हालांकि, ईरानी पक्ष ने इन दावों पर सावधानीपूर्ण रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि वार्ता के कई पहलुओं पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और राष्ट्रीय हितों से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर उसकी स्थिति यथावत बनी हुई है।

    कूटनीतिक मतभेदों के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा गतिविधियों ने भी चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस रणनीतिक समुद्री मार्ग में ड्रोन गतिविधियों और सैन्य प्रतिक्रिया से जुड़ी घटनाएं सामने आई हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि समुद्री यातायात की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई की गई, जबकि ईरान की ओर से क्षेत्र में अपने सुरक्षा अधिकारों और निगरानी गतिविधियों को उचित ठहराया गया है। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण इस जलमार्ग की सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

    इसी दौरान दक्षिणी ईरान के बंदर अब्बास और आसपास के समुद्री क्षेत्र से धमाकों की खबरों ने तनाव को और बढ़ा दिया। स्थानीय मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार, तटीय इलाकों में विस्फोट जैसी आवाजें सुनाई दीं, जिसके बाद विभिन्न संभावनाओं को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया। हालांकि घटनाओं के संबंध में विस्तृत और स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार बना हुआ है।

    समुद्री सुरक्षा के मुद्दे ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब ईरान ने कुछ हालिया घटनाओं को लेकर अमेरिका पर आरोप लगाए। ईरानी अधिकारियों ने दावा किया कि क्षेत्र में संचालित कुछ वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया गया, जबकि अमेरिकी पक्ष ने इन आरोपों पर अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। इस विवाद ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रश्न को फिर प्रमुखता से सामने ला दिया है।

    उधर मानवीय मुद्दे भी चर्चा में बने हुए हैं। गाजा क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं और मरीजों की निकासी से जुड़े मामलों पर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में बहस तेज हुई है। कई सांसदों ने गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए राहत और चिकित्सा सहायता की मांग उठाई है। इससे क्षेत्रीय संघर्षों के मानवीय प्रभावों पर भी ध्यान केंद्रित हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता प्रक्रिया जारी रहने के बावजूद क्षेत्र में मौजूद सुरक्षा चुनौतियां और रणनीतिक हित किसी भी त्वरित समाधान को कठिन बना सकते हैं। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर दोनों देशों के अगले कदमों, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक वार्ताओं और सुरक्षा घटनाक्रमों की दिशा ही यह तय करेगी कि तनाव कम होगा या स्थिति और अधिक जटिल रूप लेगी।

  • होर्मुज संकट के बीच केंद्र का बड़ा दांव, असम और नागालैंड से बढ़ेगा तेल-गैस उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया आ

    होर्मुज संकट के बीच केंद्र का बड़ा दांव, असम और नागालैंड से बढ़ेगा तेल-गैस उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया आ

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादलों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने घरेलू ऊर्जा उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने असम और नागालैंड सरकारों के साथ हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल को देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक रणनीतिक प्रयास माना जा रहा है।

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों, विशेषकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी प्रकार का व्यवधान देश की ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर असर डाल सकता है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार घरेलू तेल और गैस उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही है। पूर्वोत्तर भारत को इस रणनीति का प्रमुख केंद्र बनाया जा रहा है, जहां प्राकृतिक संसाधनों की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में खोज और उत्पादन गतिविधियों के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि देश के कुल कच्चे तेल भंडार का लगभग 22 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस भंडार का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा अकेले असम में मौजूद है। ऐसे में इस क्षेत्र का विकास भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

    नागालैंड को लेकर भी सरकार काफी आशावादी नजर आ रही है। विशेष रूप से असम-अराकान बेसिन की नागा-शुपेन बेल्ट में हाइड्रोकार्बन संसाधनों की बड़ी संभावनाएं बताई जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में कई ऐसे भंडार मौजूद हैं जिनका अभी तक पूर्ण दोहन नहीं हो पाया है। नई नीतिगत पहल और निवेश के माध्यम से इन संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जा सकता है।

    सरकार के अनुसार, नए समझौते से तेल उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। वर्तमान में कुछ क्षेत्रों में प्रतिदिन लगभग 1000 से 1500 बैरल उत्पादन हो रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में कई गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह योजना अपेक्षित परिणाम देती है तो देश के घरेलू उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस समझौते को पूर्वोत्तर के विकास से जोड़ते हुए कहा कि इससे तेल एवं गैस क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि यह पहल क्षेत्रीय आर्थिक विकास, औद्योगिक गतिविधियों और रोजगार सृजन को नई गति प्रदान करेगी। पूर्वोत्तर राज्यों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से और अधिक मजबूती से जोड़ने में भी यह कदम उपयोगी साबित हो सकता है।

    पेट्रोलियम मंत्रालय का मानना है कि यह समझौता केवल संसाधनों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेशकों के लिए भरोसेमंद माहौल तैयार करने में भी मदद करेगा। स्पष्ट नीतिगत ढांचा, बेहतर समन्वय और नियामकीय सहयोग के कारण निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां दीर्घकालिक निवेश के लिए अधिक उत्साहित हो सकती हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने की योजनाएं सफल रहती हैं तो इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा और देश की आयात निर्भरता कम करने के लक्ष्य को भी बल मिलेगा। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह पहल भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।

  • ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद भड़का तनाव, जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व में फिर से संघर्ष की आशंका गहराई

    ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद भड़का तनाव, जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व में फिर से संघर्ष की आशंका गहराई

    नई दिल्ली ।  अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है, जिससे मिडिल ईस्ट में बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका तेज हो गई है। हालिया घटनाक्रम में दोनों देशों के बीच सीमित सैन्य हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के कुछ रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई की है, जिसे उसने अपने ड्रोन और सैन्य संपत्तियों की सुरक्षा से जुड़ी प्रतिक्रिया बताया है। इन हमलों में ईरान के तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में स्थित रडार और ड्रोन नियंत्रण प्रणाली को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है।

    इसके बाद स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई जब ईरान की ओर से भी जवाबी कार्रवाई की गई। ईरानी सैन्य इकाइयों ने कथित तौर पर उन ठिकानों को निशाना बनाया, जहां से अमेरिकी सैन्य अभियान संचालित किए जा रहे थे। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले से जारी असहमति अब खुले सैन्य टकराव की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया तो यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। इस रणनीतिक क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। यही कारण है कि कई वैश्विक शक्तियां दोनों देशों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान अपनाने की अपील कर रही हैं।

    हालांकि दोनों पक्षों की ओर से अभी तक औपचारिक रूप से पूर्ण युद्ध की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन सीमित हमलों और जवाबी कार्रवाइयों की श्रृंखला ने हालात को बेहद संवेदनशील बना दिया है। क्षेत्रीय देशों में भी इस स्थिति को लेकर चिंता का माहौल है और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है।

    विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यह टकराव केवल सैन्य स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव भी वैश्विक स्तर पर देखने को मिल सकते हैं। खासकर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    वर्तमान हालात को देखते हुए यह स्पष्ट है कि यदि दोनों देशों के बीच बातचीत और कूटनीति के रास्ते को मजबूत नहीं किया गया, तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े संकट की ओर बढ़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है और स्थिति को नियंत्रण में लाने के प्रयास तेज हो गए हैं।

  • होर्मुज संकट के बीच भारत का बड़ा आर्थिक कदम, पेट्रोल-डीजल निर्यात शुल्क में बदलाव से वैश्विक तेल बाजार पर असर की उम्मीद

    होर्मुज संकट के बीच भारत का बड़ा आर्थिक कदम, पेट्रोल-डीजल निर्यात शुल्क में बदलाव से वैश्विक तेल बाजार पर असर की उम्मीद

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते दबाव और होर्मुज क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति के बीच भारत सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से जुड़े नियमों में अहम बदलाव करते हुए निर्यात शुल्क में संशोधन का निर्णय लिया है। इस कदम को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों के उतार-चढ़ाव और घरेलू आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेट्रोल, डीजल और विमानन टरबाइन ईंधन पर नई दरें 1 जून से प्रभावी होंगी, जिससे ऊर्जा व्यापार और निर्यात नीति पर सीधा असर पड़ेगा।

    इस निर्णय के बाद पेट्रोल पर निर्यात शुल्क घटकर 1.5 रुपये प्रति लीटर तय किया गया है, जबकि डीजल पर यह 13.5 रुपये प्रति लीटर रहेगा। विमानन टरबाइन ईंधन पर 9.5 रुपये प्रति लीटर का शुल्क लागू किया गया है। यह बदलाव विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के रूप में लागू होगा और इसके तहत रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को शामिल नहीं किया जाएगा, जिससे कर ढांचे में आंशिक सरलता देखने को मिलेगी।

    सरकार का कहना है कि निर्यात शुल्क की समीक्षा हर पखवाड़े की जाती है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति स्थिति का आकलन शामिल होता है। पिछले संशोधन के बाद अब नई दरों की घोषणा मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता को ध्यान में रखकर की गई है।

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर अनिश्चितता के चलते सरकार का फोकस इस बात पर है कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और किसी भी प्रकार का घरेलू संकट उत्पन्न न हो। इसी उद्देश्य से निर्यात नीति में समय-समय पर संशोधन किया जाता है ताकि घरेलू जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संतुलन बना रहे।

    इससे पहले भी इसी वर्ष मार्च में निर्यात शुल्क प्रणाली को लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य निर्यात प्रवाह को नियंत्रित करना और घरेलू खपत के लिए पर्याप्त भंडार सुनिश्चित करना था। मई में हुए पिछले संशोधन के बाद अब एक बार फिर नई दरों की घोषणा की गई है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार की मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप मानी जा रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नीतिगत निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को मजबूत करते हैं और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के बीच घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। आने वाले समय में तेल कीमतों और अंतरराष्ट्रीय हालात के आधार पर इस नीति में और बदलाव संभव हैं, क्योंकि सरकार हर पखवाड़े समीक्षा प्रक्रिया के जरिए स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखती है।

  • ट्रंप का बड़ा बयान: ‘पागलों के हाथ में एटम बम नहीं दे सकते’, ईरान को लेकर फिर सख्त रुख

    ट्रंप का बड़ा बयान: ‘पागलों के हाथ में एटम बम नहीं दे सकते’, ईरान को लेकर फिर सख्त रुख


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को लेकर बेहद सख्त और विवादित बयान दिया है। फ्लोरिडा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा, क्योंकि यह पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि मिडिल ईस्ट को उन्होंने एक बड़े परमाणु संकट से बचाया है।

    ईरान को परमाणु हथियार से रोकने पर जोर

    ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिका ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो ईरान के पास परमाणु हथियार होते और इसका असर इजराइल, यूरोप और पूरे मिडिल ईस्ट पर विनाशकारी हो सकता था। उनके मुताबिक, हम ऐसे लोगों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं जाने दे सकते जिन्हें वह ‘पागल’ बता रहे हैं।

    उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान को बातचीत से पहले अपने एनरिच्ड यूरेनियम को सौंपना होगा, तभी किसी भी तरह की डिप्लोमैटिक प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

    ईरान के प्रस्ताव पर असहमति

    व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, ईरान ने हाल ही में जो नया प्रस्ताव भेजा था, उसमें परमाणु कार्यक्रम का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। इसी बात से ट्रंप प्रशासन असंतुष्ट है। वहीं ईरान का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत खोलने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जबकि परमाणु मुद्दे पर बाद में बातचीत की जा सकती है।ट्रंप का रुख है कि दोनों मुद्दों को एक साथ हल किया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग।

    सैन्य कार्रवाई पर भी सख्त संकेत

    ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने ऐसे मांग करने वालों को “देशभक्त नहीं” बताया। यह बयान अमेरिकी राजनीतिक हलकों में नए विवाद को जन्म दे सकता है।

    मिडिल ईस्ट तनाव और वैश्विक असर

    अमेरिका ने दावा किया है कि ईरान से जुड़े तनाव के चलते होर्मुज जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही करीब 90% तक कम हो गई है। पहले जहां रोजाना लगभग 130 जहाज गुजरते थे, अब यह संख्या 10 से भी कम रह गई है। इस स्थिति ने वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार पर गंभीर असर डाला है।

    इसके अलावा अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो भी कंपनियां ईरान को इस क्षेत्र से गुजरने के लिए वित्तीय सहायता देंगी, उन पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, चाहे वह सहायता किसी चैरिटी के नाम पर ही क्यों न हो।

    स्थिति अभी भी तनावपूर्ण

    व्हाइट हाउस ने हालांकि यह भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष में कुछ हद तक कमी आई है, लेकिन अमेरिकी सेना अभी भी क्षेत्र में सक्रिय है। इसी बीच ट्रंप प्रशासन लगातार यह संदेश दे रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार किसी भी कीमत पर नहीं मिलने दिए जाएंगे।