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  • अमेरिका-ईरान समझौते पर बना संशय, होर्मुज में ड्रोन कार्रवाई और बंदर अब्बास धमाकों से फिर बढ़ा तनाव

    अमेरिका-ईरान समझौते पर बना संशय, होर्मुज में ड्रोन कार्रवाई और बंदर अब्बास धमाकों से फिर बढ़ा तनाव

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के संबंध एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। दोनों देशों के बीच संभावित शांति समझौते को लेकर हाल के दिनों में उम्मीदें जगी थीं, लेकिन ताजा घटनाक्रमों ने संकेत दिया है कि किसी व्यापक सहमति तक पहुंचने का रास्ता अभी भी जटिल बना हुआ है। कूटनीतिक बयानों, समुद्री गतिविधियों और सुरक्षा घटनाओं ने क्षेत्र की संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है।

    अमेरिकी नेतृत्व की ओर से हाल ही में यह संकेत दिया गया कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव को समाप्त करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण समझौता अंतिम चरण में है। दावा किया गया कि बातचीत में उल्लेखनीय प्रगति हुई है और जल्द ही औपचारिक घोषणा संभव हो सकती है। हालांकि, ईरानी पक्ष ने इन दावों पर सावधानीपूर्ण रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि वार्ता के कई पहलुओं पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और राष्ट्रीय हितों से जुड़े प्रमुख मुद्दों पर उसकी स्थिति यथावत बनी हुई है।

    कूटनीतिक मतभेदों के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा गतिविधियों ने भी चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस रणनीतिक समुद्री मार्ग में ड्रोन गतिविधियों और सैन्य प्रतिक्रिया से जुड़ी घटनाएं सामने आई हैं। अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि समुद्री यातायात की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई की गई, जबकि ईरान की ओर से क्षेत्र में अपने सुरक्षा अधिकारों और निगरानी गतिविधियों को उचित ठहराया गया है। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण इस जलमार्ग की सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

    इसी दौरान दक्षिणी ईरान के बंदर अब्बास और आसपास के समुद्री क्षेत्र से धमाकों की खबरों ने तनाव को और बढ़ा दिया। स्थानीय मीडिया में आई रिपोर्टों के अनुसार, तटीय इलाकों में विस्फोट जैसी आवाजें सुनाई दीं, जिसके बाद विभिन्न संभावनाओं को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया। हालांकि घटनाओं के संबंध में विस्तृत और स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार बना हुआ है।

    समुद्री सुरक्षा के मुद्दे ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब ईरान ने कुछ हालिया घटनाओं को लेकर अमेरिका पर आरोप लगाए। ईरानी अधिकारियों ने दावा किया कि क्षेत्र में संचालित कुछ वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया गया, जबकि अमेरिकी पक्ष ने इन आरोपों पर अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। इस विवाद ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रश्न को फिर प्रमुखता से सामने ला दिया है।

    उधर मानवीय मुद्दे भी चर्चा में बने हुए हैं। गाजा क्षेत्र में चिकित्सा सुविधाओं और मरीजों की निकासी से जुड़े मामलों पर अमेरिकी राजनीतिक हलकों में बहस तेज हुई है। कई सांसदों ने गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए राहत और चिकित्सा सहायता की मांग उठाई है। इससे क्षेत्रीय संघर्षों के मानवीय प्रभावों पर भी ध्यान केंद्रित हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता प्रक्रिया जारी रहने के बावजूद क्षेत्र में मौजूद सुरक्षा चुनौतियां और रणनीतिक हित किसी भी त्वरित समाधान को कठिन बना सकते हैं। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर दोनों देशों के अगले कदमों, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में कूटनीतिक वार्ताओं और सुरक्षा घटनाक्रमों की दिशा ही यह तय करेगी कि तनाव कम होगा या स्थिति और अधिक जटिल रूप लेगी।

  • होर्मुज संकट के बीच केंद्र का बड़ा दांव, असम और नागालैंड से बढ़ेगा तेल-गैस उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया आ

    होर्मुज संकट के बीच केंद्र का बड़ा दांव, असम और नागालैंड से बढ़ेगा तेल-गैस उत्पादन, ऊर्जा सुरक्षा को मिलेगा नया आ

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादलों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने घरेलू ऊर्जा उत्पादन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने असम और नागालैंड सरकारों के साथ हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल को देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक रणनीतिक प्रयास माना जा रहा है।

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों, विशेषकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी प्रकार का व्यवधान देश की ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों पर असर डाल सकता है। इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार घरेलू तेल और गैस उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही है। पूर्वोत्तर भारत को इस रणनीति का प्रमुख केंद्र बनाया जा रहा है, जहां प्राकृतिक संसाधनों की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में खोज और उत्पादन गतिविधियों के विस्तार की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि देश के कुल कच्चे तेल भंडार का लगभग 22 प्रतिशत और प्राकृतिक गैस भंडार का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा अकेले असम में मौजूद है। ऐसे में इस क्षेत्र का विकास भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

    नागालैंड को लेकर भी सरकार काफी आशावादी नजर आ रही है। विशेष रूप से असम-अराकान बेसिन की नागा-शुपेन बेल्ट में हाइड्रोकार्बन संसाधनों की बड़ी संभावनाएं बताई जा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में कई ऐसे भंडार मौजूद हैं जिनका अभी तक पूर्ण दोहन नहीं हो पाया है। नई नीतिगत पहल और निवेश के माध्यम से इन संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जा सकता है।

    सरकार के अनुसार, नए समझौते से तेल उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। वर्तमान में कुछ क्षेत्रों में प्रतिदिन लगभग 1000 से 1500 बैरल उत्पादन हो रहा है, जिसे आने वाले वर्षों में कई गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। यदि यह योजना अपेक्षित परिणाम देती है तो देश के घरेलू उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस समझौते को पूर्वोत्तर के विकास से जोड़ते हुए कहा कि इससे तेल एवं गैस क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि यह पहल क्षेत्रीय आर्थिक विकास, औद्योगिक गतिविधियों और रोजगार सृजन को नई गति प्रदान करेगी। पूर्वोत्तर राज्यों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से और अधिक मजबूती से जोड़ने में भी यह कदम उपयोगी साबित हो सकता है।

    पेट्रोलियम मंत्रालय का मानना है कि यह समझौता केवल संसाधनों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेशकों के लिए भरोसेमंद माहौल तैयार करने में भी मदद करेगा। स्पष्ट नीतिगत ढांचा, बेहतर समन्वय और नियामकीय सहयोग के कारण निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां दीर्घकालिक निवेश के लिए अधिक उत्साहित हो सकती हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि पूर्वोत्तर क्षेत्र में तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने की योजनाएं सफल रहती हैं तो इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ मिलेगा और देश की आयात निर्भरता कम करने के लक्ष्य को भी बल मिलेगा। मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह पहल भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।

  • ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद भड़का तनाव, जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व में फिर से संघर्ष की आशंका गहराई

    ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद भड़का तनाव, जवाबी कार्रवाई से मध्य पूर्व में फिर से संघर्ष की आशंका गहराई

    नई दिल्ली ।  अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है, जिससे मिडिल ईस्ट में बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका तेज हो गई है। हालिया घटनाक्रम में दोनों देशों के बीच सीमित सैन्य हमलों और जवाबी कार्रवाइयों ने क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के कुछ रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई की है, जिसे उसने अपने ड्रोन और सैन्य संपत्तियों की सुरक्षा से जुड़ी प्रतिक्रिया बताया है। इन हमलों में ईरान के तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में स्थित रडार और ड्रोन नियंत्रण प्रणाली को निशाना बनाए जाने की बात सामने आई है।

    इसके बाद स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई जब ईरान की ओर से भी जवाबी कार्रवाई की गई। ईरानी सैन्य इकाइयों ने कथित तौर पर उन ठिकानों को निशाना बनाया, जहां से अमेरिकी सैन्य अभियान संचालित किए जा रहे थे। इस घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि दोनों देशों के बीच पहले से जारी असहमति अब खुले सैन्य टकराव की दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति को जल्द नियंत्रित नहीं किया गया तो यह संघर्ष व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। इस रणनीतिक क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। यही कारण है कि कई वैश्विक शक्तियां दोनों देशों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान अपनाने की अपील कर रही हैं।

    हालांकि दोनों पक्षों की ओर से अभी तक औपचारिक रूप से पूर्ण युद्ध की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन सीमित हमलों और जवाबी कार्रवाइयों की श्रृंखला ने हालात को बेहद संवेदनशील बना दिया है। क्षेत्रीय देशों में भी इस स्थिति को लेकर चिंता का माहौल है और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है।

    विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यह टकराव केवल सैन्य स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव भी वैश्विक स्तर पर देखने को मिल सकते हैं। खासकर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    वर्तमान हालात को देखते हुए यह स्पष्ट है कि यदि दोनों देशों के बीच बातचीत और कूटनीति के रास्ते को मजबूत नहीं किया गया, तो मिडिल ईस्ट एक बार फिर बड़े संकट की ओर बढ़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है और स्थिति को नियंत्रण में लाने के प्रयास तेज हो गए हैं।

  • होर्मुज संकट के बीच भारत का बड़ा आर्थिक कदम, पेट्रोल-डीजल निर्यात शुल्क में बदलाव से वैश्विक तेल बाजार पर असर की उम्मीद

    होर्मुज संकट के बीच भारत का बड़ा आर्थिक कदम, पेट्रोल-डीजल निर्यात शुल्क में बदलाव से वैश्विक तेल बाजार पर असर की उम्मीद

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते दबाव और होर्मुज क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति के बीच भारत सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से जुड़े नियमों में अहम बदलाव करते हुए निर्यात शुल्क में संशोधन का निर्णय लिया है। इस कदम को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों के उतार-चढ़ाव और घरेलू आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेट्रोल, डीजल और विमानन टरबाइन ईंधन पर नई दरें 1 जून से प्रभावी होंगी, जिससे ऊर्जा व्यापार और निर्यात नीति पर सीधा असर पड़ेगा।

    इस निर्णय के बाद पेट्रोल पर निर्यात शुल्क घटकर 1.5 रुपये प्रति लीटर तय किया गया है, जबकि डीजल पर यह 13.5 रुपये प्रति लीटर रहेगा। विमानन टरबाइन ईंधन पर 9.5 रुपये प्रति लीटर का शुल्क लागू किया गया है। यह बदलाव विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के रूप में लागू होगा और इसके तहत रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को शामिल नहीं किया जाएगा, जिससे कर ढांचे में आंशिक सरलता देखने को मिलेगी।

    सरकार का कहना है कि निर्यात शुल्क की समीक्षा हर पखवाड़े की जाती है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति स्थिति का आकलन शामिल होता है। पिछले संशोधन के बाद अब नई दरों की घोषणा मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता को ध्यान में रखकर की गई है।

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर अनिश्चितता के चलते सरकार का फोकस इस बात पर है कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और किसी भी प्रकार का घरेलू संकट उत्पन्न न हो। इसी उद्देश्य से निर्यात नीति में समय-समय पर संशोधन किया जाता है ताकि घरेलू जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संतुलन बना रहे।

    इससे पहले भी इसी वर्ष मार्च में निर्यात शुल्क प्रणाली को लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य निर्यात प्रवाह को नियंत्रित करना और घरेलू खपत के लिए पर्याप्त भंडार सुनिश्चित करना था। मई में हुए पिछले संशोधन के बाद अब एक बार फिर नई दरों की घोषणा की गई है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार की मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप मानी जा रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नीतिगत निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को मजबूत करते हैं और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के बीच घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। आने वाले समय में तेल कीमतों और अंतरराष्ट्रीय हालात के आधार पर इस नीति में और बदलाव संभव हैं, क्योंकि सरकार हर पखवाड़े समीक्षा प्रक्रिया के जरिए स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखती है।

  • ट्रंप का बड़ा बयान: ‘पागलों के हाथ में एटम बम नहीं दे सकते’, ईरान को लेकर फिर सख्त रुख

    ट्रंप का बड़ा बयान: ‘पागलों के हाथ में एटम बम नहीं दे सकते’, ईरान को लेकर फिर सख्त रुख


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को लेकर बेहद सख्त और विवादित बयान दिया है। फ्लोरिडा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा, क्योंकि यह पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि मिडिल ईस्ट को उन्होंने एक बड़े परमाणु संकट से बचाया है।

    ईरान को परमाणु हथियार से रोकने पर जोर

    ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिका ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो ईरान के पास परमाणु हथियार होते और इसका असर इजराइल, यूरोप और पूरे मिडिल ईस्ट पर विनाशकारी हो सकता था। उनके मुताबिक, हम ऐसे लोगों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं जाने दे सकते जिन्हें वह ‘पागल’ बता रहे हैं।

    उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान को बातचीत से पहले अपने एनरिच्ड यूरेनियम को सौंपना होगा, तभी किसी भी तरह की डिप्लोमैटिक प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

    ईरान के प्रस्ताव पर असहमति

    व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, ईरान ने हाल ही में जो नया प्रस्ताव भेजा था, उसमें परमाणु कार्यक्रम का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। इसी बात से ट्रंप प्रशासन असंतुष्ट है। वहीं ईरान का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत खोलने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जबकि परमाणु मुद्दे पर बाद में बातचीत की जा सकती है।ट्रंप का रुख है कि दोनों मुद्दों को एक साथ हल किया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग।

    सैन्य कार्रवाई पर भी सख्त संकेत

    ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने ऐसे मांग करने वालों को “देशभक्त नहीं” बताया। यह बयान अमेरिकी राजनीतिक हलकों में नए विवाद को जन्म दे सकता है।

    मिडिल ईस्ट तनाव और वैश्विक असर

    अमेरिका ने दावा किया है कि ईरान से जुड़े तनाव के चलते होर्मुज जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही करीब 90% तक कम हो गई है। पहले जहां रोजाना लगभग 130 जहाज गुजरते थे, अब यह संख्या 10 से भी कम रह गई है। इस स्थिति ने वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार पर गंभीर असर डाला है।

    इसके अलावा अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो भी कंपनियां ईरान को इस क्षेत्र से गुजरने के लिए वित्तीय सहायता देंगी, उन पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, चाहे वह सहायता किसी चैरिटी के नाम पर ही क्यों न हो।

    स्थिति अभी भी तनावपूर्ण

    व्हाइट हाउस ने हालांकि यह भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष में कुछ हद तक कमी आई है, लेकिन अमेरिकी सेना अभी भी क्षेत्र में सक्रिय है। इसी बीच ट्रंप प्रशासन लगातार यह संदेश दे रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार किसी भी कीमत पर नहीं मिलने दिए जाएंगे।

  • मध्य पूर्व तनाव के बीच यूएन महासचिव का बड़ा बयान अकेले अमेरिका से नहीं सुलझेगा संकट

    मध्य पूर्व तनाव के बीच यूएन महासचिव का बड़ा बयान अकेले अमेरिका से नहीं सुलझेगा संकट


    नई दिल्ली: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने वैश्विक शांति और सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता जताई है उन्होंने खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट में जारी संकट और डोनाल्ड ट्रंप की बोर्ड ऑफ पीस पहल पर सवाल उठाते हुए इसे मौजूदा हालात के लिए पर्याप्त नहीं बताया

    ब्रुसेल्स में यूरोपीय काउंसिल की एक अहम बैठक के दौरान गुटेरेस ने कहा कि ईरान अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव ने क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता को गंभीर खतरे में डाल दिया है उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे जटिल संकटों का समाधान किसी एक देश या व्यक्ति के प्रयासों से नहीं बल्कि बहुपक्षीय सहयोग से ही संभव है

    गुटेरेस ने स्पष्ट किया कि उन्होंने हालिया तनाव के बाद ट्रंप से सीधे बातचीत नहीं की है हालांकि उनकी चर्चा अमेरिकी प्रशासन के अन्य अधिकारियों से जरूर हुई है उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र लगातार खाड़ी देशों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के संपर्क में है ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके

    होर्मुज स्ट्रेट के महत्व को रेखांकित करते हुए गुटेरेस ने कहा कि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम मार्ग है और यहां किसी भी तरह का व्यवधान पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र इस समुद्री मार्ग को फिर से सुरक्षित और सुचारु बनाने के लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है

    उन्होंने अतीत का उदाहरण देते हुए ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव का जिक्र किया जिसके तहत रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के दौरान खाद्यान्न और उर्वरकों के निर्यात को संभव बनाया गया था हालांकि बाद में यह समझौता ज्यादा समय तक टिक नहीं सका फिर भी यह बहुपक्षीय प्रयासों की प्रभावशीलता का एक उदाहरण माना जाता है

    ट्रंप की बोर्ड ऑफ पीस पहल पर टिप्पणी करते हुए गुटेरेस ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र इस पहल के साथ सहयोग कर रहा है लेकिन केवल एकतरफा दृष्टिकोण इतने बड़े और जटिल संकट का समाधान नहीं कर सकता उन्होंने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का पालन किसी भी शांति प्रक्रिया के लिए अनिवार्य है

    उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में यह पहल काफी हद तक एक व्यक्तिगत परियोजना के रूप में दिखाई दे रही है जिसमें व्यापक वैश्विक भागीदारी की कमी है ऐसे में स्थायी शांति के लिए जरूरी है कि सभी संबंधित पक्षों को साथ लाया जाए और संवाद के जरिए समाधान खोजा जाए

  • समुद्र से आसमान तक एक्शन, अमेरिका ने ईरान के मिसाइल ठिकानों पर बरसाए भारी बम

    समुद्र से आसमान तक एक्शन, अमेरिका ने ईरान के मिसाइल ठिकानों पर बरसाए भारी बम

    नई दिल्ली। मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंचता नजर आ रहा है जब अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमला किया है यह कार्रवाई ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत की जा रही है जिसे अब और तेज कर दिया गया है

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी CENTCOM के अनुसार इन हमलों में भारी क्षमता वाले बमों का इस्तेमाल किया गया जो मजबूत और सुरक्षित ठिकानों को भी तबाह करने में सक्षम हैं ये मिसाइल ठिकाने ईरान के तटीय इलाके में स्थित थे और यहां तैनात एंटी शिप मिसाइलें अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए बड़ा खतरा बन रही थीं

    होर्मुज स्ट्रेट जिसे वैश्विक तेल आपूर्ति का सबसे अहम मार्ग माना जाता है इस समय अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया है इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार और तेल बाजार को प्रभावित कर सकता है

    रिपोर्ट्स के मुताबिक इस अभियान के दौरान अमेरिकी नौसेना और वायुसेना ने सैकड़ों लड़ाकू उड़ानें भरी हैं अब तक 28 फरवरी से शुरू हुए इस ऑपरेशन में 7000 से ज्यादा लक्ष्यों पर हमले किए जा चुके हैं और 6500 से अधिक लड़ाकू उड़ानें भरी जा चुकी हैं

    हमलों में कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया है जिनमें बैलिस्टिक मिसाइल साइट एंटी शिप मिसाइल ठिकाने IRGC के मुख्यालय एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य संचार नेटवर्क शामिल हैं

    अमेरिका ने इस अभियान में अपनी अत्याधुनिक सैन्य ताकत का व्यापक इस्तेमाल किया है जिसमें बी 1 बी 2 और बी 52 जैसे बमवर्षक विमान एफ 22 और एफ 35 जैसे फाइटर जेट ड्रोन और निगरानी विमान शामिल हैं इसके अलावा समुद्र में परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक पोत पनडुब्बियां और मिसाइल से लैस युद्धपोत तैनात किए गए हैं

    जमीन पर भी पैट्रियट और थाड जैसे उन्नत मिसाइल रक्षा सिस्टम के साथ रॉकेट आर्टिलरी और एंटी ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे साफ है कि यह ऑपरेशन हवा जमीन और समुद्र तीनों स्तरों पर एक साथ चलाया जा रहा है

    इस पूरे घटनाक्रम ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है आने वाले दिनों में इस क्षेत्र की स्थिति और भी संवेदनशील बनी रह सकती है