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  • HSBC ने वोडाफोन आइडिया पर रिड्यूस रेटिंग बरकरार रखी, 8.25 रुपये के लक्ष्य से शेयर में 47 प्रतिशत गिरावट का अनुमान

    HSBC ने वोडाफोन आइडिया पर रिड्यूस रेटिंग बरकरार रखी, 8.25 रुपये के लक्ष्य से शेयर में 47 प्रतिशत गिरावट का अनुमान

    नई दिल्ली । वोडाफोन आइडिया के शेयरों को लेकर ब्रोकरेज फर्म HSBC ने चिंता जताई है। HSBC ने कंपनी के शेयर पर रिड्यूस रेटिंग बरकरार रखते हुए 8.25 रुपये प्रति शेयर का लक्ष्य मूल्य दिया है। यह पिछले कारोबारी सत्र के बंद भाव की तुलना में करीब 47 प्रतिशत की संभावित गिरावट को दर्शाता है। मंगलवार को वोडाफोन आइडिया के शेयरों में गिरावट देखने को मिली।

    वोडाफोन आइडिया के शेयर 15.40 रुपये के आसपास कारोबार कर रहे थे। इससे पहले लगातार दो कारोबारी सत्रों में शेयर में करीब 8 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई थी। वहीं, 2026 में अब तक कंपनी के शेयर में 32 प्रतिशत से अधिक की बढ़त देखी गई है। कंपनी का बाजार पूंजीकरण करीब 1.68 लाख करोड़ रुपये बताया गया है।

    HSBC की मुख्य चिंता वोडाफोन आइडिया की स्पेक्ट्रम से जुड़ी देनदारियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नकदी जुटाने की क्षमता को लेकर है। ब्रोकरेज का अनुमान है कि मोबाइल टैरिफ में संभावित बढ़ोतरी से कंपनी की कमाई में सुधार हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद ऑपरेटिंग कैश फ्लो स्पेक्ट्रम भुगतान की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।

    HSBC के अनुसार, कैलेंडर वर्ष 2027 की पहली तिमाही में मोबाइल टैरिफ बढ़ने की संभावना है। इसके बावजूद वित्त वर्ष 2029 में कंपनी का ऑपरेटिंग कैश फ्लो स्पेक्ट्रम भुगतान की आवश्यकताओं से कम रहने का अनुमान है। ब्रोकरेज का कहना है कि इन जरूरतों को पूरा करने के लिए वोडाफोन आइडिया को अगले तीन वर्षों में अपने ऑपरेटिंग कैश फ्लो को करीब तीन गुना करना होगा।

    कंपनी के नेटवर्क में होने वाला निवेश उसके बाजार हिस्सेदारी को स्थिर रखने में मदद कर सकता है। हालांकि, HSBC को उम्मीद नहीं है कि नेटवर्क पर निवेश से कंपनी की बाजार हिस्सेदारी में कोई बड़ी बढ़ोतरी होगी। ब्रोकरेज के अनुमान के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 से वित्त वर्ष 2029 के बीच कंपनी के EBITDA में सालाना आधार पर करीब 15 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वृद्धि हो सकती है।

    इस अनुमान के पीछे मुख्य वजह मोबाइल टैरिफ में बढ़ोतरी की संभावना बताई गई है। यानी टैरिफ बढ़ने से कंपनी की कमाई और EBITDA में सुधार की उम्मीद है, लेकिन इससे पैदा होने वाला अतिरिक्त कैश स्पेक्ट्रम भुगतान की जरूरतों को पूरी तरह संभालने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।

    वोडाफोन आइडिया के लिए चुनौती केवल वित्त वर्ष 2029 के स्पेक्ट्रम भुगतान तक सीमित नहीं रहने की आशंका है। HSBC ने कहा है कि वर्ष 2030 से शुरू होने वाले स्पेक्ट्रम रिन्यूअल के लिए भी कंपनी को अतिरिक्त पूंजी की जरूरत होगी। इससे आने वाले वर्षों में कंपनी के सामने फंडिंग की जरूरत बनी रह सकती है।

    स्पेक्ट्रम भुगतान और भविष्य के रिन्यूअल के लिए पूंजी जुटाने की क्षमता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी को एक साथ नेटवर्क निवेश और अन्य परिचालन जरूरतों को भी पूरा करना है। HSBC की रिपोर्ट में इन्हीं वित्तीय जरूरतों को शेयर के लिए प्रमुख चुनौती के तौर पर देखा गया है।

    वोडाफोन आइडिया के शेयर ने 2026 में अब तक मजबूत प्रदर्शन किया है, लेकिन HSBC का आकलन कंपनी के भविष्य के कैश फ्लो और स्पेक्ट्रम देनदारियों पर केंद्रित है। ब्रोकरेज के मुताबिक, टैरिफ बढ़ोतरी से परिचालन प्रदर्शन में सुधार संभव है, लेकिन स्पेक्ट्रम से जुड़ी मौजूदा और भविष्य की भुगतान जरूरतों के लिए कंपनी को अपनी नकदी क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करनी होगी।

  • जुलाई में भारत के निजी क्षेत्र की रफ्तार धीमी, कंपोजिट पीएमआई 54.3 पर; निर्यात मांग ने मैन्युफैक्चरिंग को दिया मजबूत सहारा

    जुलाई में भारत के निजी क्षेत्र की रफ्तार धीमी, कंपोजिट पीएमआई 54.3 पर; निर्यात मांग ने मैन्युफैक्चरिंग को दिया मजबूत सहारा

    नई दिल्ली । जुलाई महीने में भारत के निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि का क्रम जारी रहा, हालांकि इसकी रफ्तार जून की तुलना में कुछ धीमी दर्ज की गई। ताजा आंकड़ों के अनुसार जुलाई में कंपोजिट परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) 54.3 रहा। यह स्तर इस बात का संकेत है कि देश की आर्थिक गतिविधियां अब भी विस्तार के चरण में हैं, क्योंकि पीएमआई का 50 से ऊपर रहना आर्थिक वृद्धि का संकेत माना जाता है। हालांकि जून में यह सूचकांक 57.1 था, जिससे स्पष्ट है कि जुलाई में विकास की गति कुछ कम हुई है।

    जुलाई के दौरान निजी क्षेत्र के प्रदर्शन में सर्विस सेक्टर की सुस्ती प्रमुख कारण रही। कारोबार से जुड़े नए ऑर्डरों की रफ्तार कमजोर पड़ी और ग्राहकों की ओर से पूछताछ में कमी देखने को मिली। कई कंपनियों ने मांग में नरमी और कुछ ऑर्डर रद्द होने की वजह से सेवा गतिविधियों में अपेक्षाकृत धीमी बढ़ोतरी दर्ज की। इसके चलते सर्विस सेक्टर का बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स घटकर 53.1 पर पहुंच गया, जो पिछले 53 महीनों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।

    इसके विपरीत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। वैश्विक बाजारों से लगातार मिल रही मजबूत मांग और निर्यात ऑर्डरों में बढ़ोतरी के कारण उत्पादन गतिविधियां मजबूत बनी रहीं। मुख्य मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई में मामूली गिरावट के बावजूद फैक्ट्री उत्पादन सूचकांक में सुधार दर्ज किया गया। इससे संकेत मिलता है कि औद्योगिक उत्पादन की गति बनी हुई है और विनिर्माण क्षेत्र देश की आर्थिक गतिविधियों को सहारा देता रहा।

    व्यापारिक संस्थानों ने भविष्य की संभावित चुनौतियों को देखते हुए अपनी तैयारियां भी तेज कर दी हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ने वाले संभावित असर को ध्यान में रखते हुए कंपनियों ने कच्चे माल की खरीद बढ़ाई है। इसके साथ ही तैयार माल और इनपुट इन्वेंट्री में भी वृद्धि दर्ज की गई है, ताकि किसी भी आपूर्ति व्यवधान की स्थिति में उत्पादन प्रभावित न हो।

    सर्वेक्षण के अनुसार लागत का दबाव भी जुलाई में बढ़ा है। कच्चे माल और अन्य इनपुट की कीमतों में वृद्धि के कारण कंपनियों की लागत बढ़ी, जिसका असर उत्पादों और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दिया। कई कंपनियों ने बढ़ती लागत के बीच अपने लाभ मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए कीमतों में आवश्यक बदलाव किए। इसके बावजूद रोजगार के मोर्चे पर स्थिति सकारात्मक बनी रही और कंपनियों ने कर्मचारियों की नियुक्ति जारी रखी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का निजी क्षेत्र अभी भी मजबूती का संकेत दे रहा है। निर्यात आधारित मांग, उत्पादन गतिविधियों की स्थिरता और रोजगार सृजन जैसे कारक आर्थिक विस्तार को समर्थन दे रहे हैं। हालांकि घरेलू मांग में सुधार और सर्विस सेक्टर की गति बढ़ाना आने वाले महीनों में आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

    कुल मिलाकर जुलाई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था विस्तार के मार्ग पर बनी हुई है, लेकिन विकास की गति को बनाए रखने के लिए घरेलू मांग को मजबूत करना, निवेश बढ़ाना और वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रभाव को सीमित करना आवश्यक होगा। यदि आने वाले महीनों में मांग और कारोबारी विश्वास में सुधार होता है तो निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां फिर से तेज रफ्तार पकड़ सकती हैं।