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  • चूहों को बिना मारे घर से भगाने के आसान उपाय, खाने की चीजें सुरक्षित रखने और प्रवेश के रास्ते बंद करने से घटेगा खतरा

    चूहों को बिना मारे घर से भगाने के आसान उपाय, खाने की चीजें सुरक्षित रखने और प्रवेश के रास्ते बंद करने से घटेगा खतरा

    नई दिल्ली । घर में चूहों की मौजूदगी छोटी परेशानी से शुरू होकर धीरे धीरे बड़ी समस्या बन सकती है। चूहे खाने की चीजों को दूषित करने के अलावा कपड़ों, फर्नीचर और बिजली के तारों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में कई लोग उन्हें मारने के बजाय घर से दूर रखने के घरेलू उपाय तलाशते हैं। हालांकि, हर इंटरनेट आधारित नुस्खा सुरक्षित नहीं होता और किसी भी जहरीले या रासायनिक पदार्थ को खाने वाली चीज में मिलाकर चूहों को खिलाना नुकसानदायक हो सकता है।

    चूहों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका उनके लिए घर में भोजन और सुरक्षित ठिकाने की उपलब्धता कम करना है। रसोई में खुले में रखे अनाज, बिस्किट, सूखे मेवे और अन्य खाद्य पदार्थों को ढक्कन वाले मजबूत डिब्बों में रखना चाहिए। खाने के बाद बचे टुकड़ों को तुरंत साफ करना और रात में रसोई को अच्छी तरह साफ करके रखना भी जरूरी है।

    चूहे अक्सर सिंक के नीचे, रसोई की अलमारियों के पीछे, स्टोर रूम, पाइप के आसपास और दरवाजों के नीचे मौजूद छोटे रास्तों से घर में प्रवेश कर सकते हैं। इसलिए इन स्थानों की नियमित जांच करनी चाहिए। दीवार में दिखाई देने वाले छोटे छेद, दरार या पाइप के आसपास की खाली जगह को उपयुक्त सामग्री से बंद करना घर में उनकी आवाजाही रोकने का महत्वपूर्ण उपाय है।

    घर में बेकार सामान, पुराने डिब्बे, कागज और कबाड़ लंबे समय तक जमा रहने पर चूहों को छिपने की जगह मिल सकती है। स्टोर रूम और रसोई के आसपास अनावश्यक सामान को व्यवस्थित रखना चाहिए। सफाई के दौरान उन कोनों और जगहों पर भी ध्यान देना जरूरी है, जहां आमतौर पर पहुंचना मुश्किल होता है।

    कुछ घरेलू उपायों में तेज गंध वाली चीजों का इस्तेमाल चूहों को किसी स्थान से दूर रखने के लिए किया जाता है, लेकिन इनकी प्रभावशीलता हर स्थिति में समान नहीं होती। खासकर फिनाइल, डिटर्जेंट या अन्य रासायनिक पदार्थों को आटे, चीनी या घी जैसी खाने की चीजों में मिलाकर चूहों के लिए रखना सुरक्षित तरीका नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे मिश्रण बच्चों और पालतू जानवरों के लिए भी जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    यदि चूहे पहले से घर में मौजूद हैं, तो उन्हें पकड़कर सुरक्षित तरीके से बाहर छोड़ने वाले उपयुक्त मानवीय ट्रैप का इस्तेमाल किया जा सकता है। ट्रैप को ऐसी जगह रखना चाहिए जहां बच्चे या पालतू जानवर आसानी से न पहुंच सकें। समस्या ज्यादा होने पर प्रशिक्षित कीट नियंत्रण विशेषज्ञ की सहायता लेना बेहतर विकल्प हो सकता है।

    घर में चूहों की संख्या कम करने के लिए केवल उन्हें भगाने पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। यदि भोजन आसानी से उपलब्ध रहेगा और प्रवेश के रास्ते खुले रहेंगे, तो चूहे दोबारा घर में आ सकते हैं। इसलिए सफाई, भोजन का सुरक्षित भंडारण और प्रवेश मार्गों को बंद करना एक साथ जरूरी है।

    रसोई की नियमित सफाई के अलावा कूड़ेदान को खुला नहीं छोड़ना चाहिए। रातभर सिंक में गंदे बर्तन और खाने के अवशेष पड़े रहने से भी चूहों को आकर्षण मिल सकता है। घर के बाहर भी कचरा और भोजन के अवशेष जमा नहीं होने देने चाहिए।

    इस तरह चूहों को बिना मारे दूर रखने के लिए सबसे सुरक्षित रणनीति उनके भोजन, पानी और छिपने की जगहों को सीमित करना है। साथ ही घर में मौजूद संभावित प्रवेश मार्गों को बंद करके समस्या की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है। रासायनिक पदार्थों वाले ऐसे घरेलू नुस्खों से बचना बेहतर है जिनसे चूहों, बच्चों या पालतू जानवरों को नुकसान पहुंचने का खतरा हो।

  • होटलों में सफेद तौलिया रखने के पीछे सफाई, लॉन्ड्री और मेहमानों के भरोसे से जुड़े ये व्यावहारिक कारण होते हैं

    होटलों में सफेद तौलिया रखने के पीछे सफाई, लॉन्ड्री और मेहमानों के भरोसे से जुड़े ये व्यावहारिक कारण होते हैं


    नई दिल्ली ।होटल में ठहरने के दौरान सफेद तौलिया एक सामान्य दृश्य होता है। बाथरूम में हाथ पोंछने से लेकर नहाने के लिए इस्तेमाल होने वाले तौलियों का रंग अक्सर सफेद रखा जाता है। इसके पीछे केवल पसंद या सजावट की वजह नहीं होती, बल्कि सफाई, लॉन्ड्री व्यवस्था, रखरखाव और मेहमानों के अनुभव से जुड़े व्यावहारिक कारण भी होते हैं।

    होटल में रोज बड़ी संख्या में तौलिए इस्तेमाल होते हैं और हर मेहमान के बाद उन्हें साफ करके दोबारा तैयार करना पड़ता है। सफेद रंग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उस पर गंदगी, दाग या किसी तरह का निशान आसानी से दिखाई देता है। यदि तौलिया ठीक से साफ नहीं हुआ हो या उस पर दाग रह गया हो तो होटल का कर्मचारी उसे जल्दी पहचान सकता है और दोबारा धुलाई के लिए भेज सकता है।

    रंगीन तौलियों में कुछ दाग या हल्की गंदगी कम दिखाई दे सकती है। ऐसे में सफेद तौलिया होटल की सफाई व्यवस्था में एक तरह के दृश्य निरीक्षण का काम करता है। इससे हाउसकीपिंग टीम को इस्तेमाल किए गए लिनेन की स्थिति समझने और साफ तौलिया उपलब्ध कराने में सुविधा होती है।

    सफेद रंग चुनने का एक महत्वपूर्ण कारण लॉन्ड्री प्रक्रिया भी है। होटल में तौलियों की संख्या काफी अधिक होती है और उन्हें नियमित रूप से उच्च तापमान वाली धुलाई तथा जरूरत के अनुसार उपयुक्त सफाई उत्पादों से धोया जाता है। सफेद कपड़े पर दाग हटाने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान होती है और रंग फीका पड़ने की चिंता रंगीन कपड़ों की तुलना में कम रहती है।

    होटल में सफेद तौलिए का इस्तेमाल इसलिए भी सुविधाजनक माना जाता है क्योंकि सभी तौलिए एक ही रंग के होने पर उन्हें एक साथ धोना आसान होता है। अलग-अलग रंगों के लिनेन को रंग छोड़ने या रंग मिल जाने की आशंका के कारण अलग-अलग संभालना पड़ सकता है। एक समान सफेद लिनेन बड़े होटल की लॉन्ड्री व्यवस्था को व्यवस्थित रखने में मदद करता है।

    इसके अलावा सफेद रंग मेहमानों के मन में स्वच्छता और ताजगी की भावना पैदा करता है। सफेद चादर, तकिया और तौलिया कमरे को साफ, सादा और व्यवस्थित दिखाने में मदद करते हैं। होटल में प्रवेश करने वाले मेहमान के लिए यह दृश्य अनुभव महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि कमरे की साफ-सफाई का आकलन अक्सर दिखाई देने वाली चीजों से ही किया जाता है।

    सफेद तौलिया होटल की पेशेवर छवि से भी जुड़ा हुआ है। अलग-अलग कमरों में एक जैसा लिनेन इस्तेमाल करने से होटल की व्यवस्था एकरूप दिखाई देती है। इससे हाउसकीपिंग, स्टॉक प्रबंधन और तौलियों की गुणवत्ता की निगरानी भी आसान हो सकती है। साथ ही, एक ही रंग के लिनेन से कर्मचारियों को इस्तेमाल, धुलाई और दोबारा कमरे में रखने की प्रक्रिया में पहचान संबंधी सुविधा मिलती है।

    हालांकि हर होटल में सफेद तौलिया होना अनिवार्य नियम नहीं है। कुछ होटल अपनी सजावट, ब्रांड पहचान या डिजाइन के अनुसार दूसरे रंगों के तौलिए भी इस्तेमाल करते हैं। फिर भी सफेद रंग अपनी साफ-सफाई दिखाने, लॉन्ड्री प्रक्रिया को सरल रखने और मेहमानों को ताजगी का एहसास कराने जैसे कारणों से होटल उद्योग में लंबे समय से लोकप्रिय बना हुआ है।

  • सावन में नॉनवेज क्यों छोड़ते हैं लोग, जानिए धार्मिक मान्यता के साथ मानसून और खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख कारण

    सावन में नॉनवेज क्यों छोड़ते हैं लोग, जानिए धार्मिक मान्यता के साथ मानसून और खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख कारण

    नई दिल्ली ।सावन का महीना शुरू होते ही देश के कई हिस्सों में लोग खानपान में बदलाव करते हैं। बहुत से परिवारों में इस दौरान मांस, मछली, चिकन और अंडे से दूरी बनाई जाती है। कुछ लोग प्याज और लहसुन का सेवन भी छोड़ देते हैं। आमतौर पर इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके पीछे जीवनशैली, संयम, जीवदया और मानसून के दौरान खाद्य सुरक्षा जैसे पहलुओं को भी समझा जा सकता है।

    हिंदू परंपरा में सावन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं, पूजा करते हैं और ध्यान तथा धार्मिक गतिविधियों में समय देते हैं। धार्मिक दृष्टि से साधना के समय भोजन में सादगी और संयम को महत्व दिया जाता है। इसी सोच के तहत कई लोग मांसाहार छोड़कर हल्का और सात्त्विक भोजन अपनाते हैं।

    सात्त्विक भोजन की अवधारणा ताजे, पौष्टिक और अपेक्षाकृत हल्के भोजन से जुड़ी है। इसका उद्देश्य केवल खानपान को बदलना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और मन को शांत रखने की साधना से भी जोड़ा जाता है। हालांकि धार्मिक ग्रंथों में सावन के दौरान हर व्यक्ति के लिए मांसाहार पूरी तरह प्रतिबंधित होने का सीधा निर्देश नहीं मिलता। यह परंपरा धार्मिक आचार, स्थानीय मान्यताओं और लंबे समय से चली आ रही जीवनशैली का हिस्सा बनी है।

    सावन चातुर्मास की अवधि में भी आता है। परंपरागत रूप से यह समय तप, व्रत, दान और आत्मसंयम के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। वर्षा ऋतु में साधु-संतों द्वारा यात्राएं सीमित करने की परंपरा भी रही है। इसे मौसम की कठिन परिस्थितियों के साथ-साथ छोटे जीवों को अनजाने में नुकसान से बचाने की भावना से भी जोड़ा जाता है।

    बारिश के मौसम में वातावरण में नमी बढ़ जाती है और कई प्रकार के सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। मांस, मछली, चिकन और अंडे जैसे खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होने वाले होते हैं। इनके सुरक्षित भंडारण और उचित तापमान पर रखे जाने की जरूरत होती है। कच्चे मांस को गलत तरीके से रखने या संभालने पर उसमें मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीव दूसरे खाद्य पदार्थों तक भी पहुंच सकते हैं।

    मानसून में जलभराव, दूषित पानी, अस्वच्छ बाजार और बिजली आपूर्ति में बाधा जैसी परिस्थितियां खाद्य पदार्थों की स्वच्छता को प्रभावित कर सकती हैं। पुराने समय में रेफ्रिजरेशन और सुरक्षित परिवहन की सुविधाएं सीमित थीं। ऐसे वातावरण में जल्दी खराब होने वाले भोजन से दूरी बनाना व्यावहारिक सावधानी भी रही होगी।

    हालांकि विज्ञान यह नहीं कहता कि सावन के महीने में मांसाहार अपने आप हानिकारक हो जाता है। बीमारी का जोखिम मुख्य रूप से भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, भंडारण और पकाने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। यदि मांस या मछली ताजा हो, उचित तापमान पर रखी गई हो और पूरी तरह पकाई जाए तो संक्रमण का खतरा कम किया जा सकता है।

    इसी तरह यह दावा भी सही नहीं है कि सावन में हर व्यक्ति की पाचन शक्ति निश्चित रूप से कमजोर हो जाती है। उमस, कम शारीरिक गतिविधि, अनियमित खानपान और बहुत अधिक तला या मसालेदार भोजन कुछ लोगों में अपच और भारीपन बढ़ा सकता है, लेकिन इसका प्रभाव व्यक्ति की स्थिति और खानपान पर निर्भर करता है।

    इसलिए सावन में नॉनवेज खाना या छोड़ना व्यक्तिगत आस्था, पारिवारिक परंपरा और स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिकताओं पर निर्भर कर सकता है। धार्मिक दृष्टि से इसे संयम और जीवदया का माध्यम माना जाता है, जबकि स्वास्थ्य की दृष्टि से मानसून में भोजन की स्वच्छता और सुरक्षित रखरखाव पर विशेष ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।

    सावन की इस परंपरा को केवल डर या बीमारी से जोड़कर देखने के बजाय इसके व्यापक भाव को समझना जरूरी है। इसमें कुछ समय के लिए स्वाद और इच्छाओं पर नियंत्रण, सादगी अपनाने, प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहने और भोजन को लेकर सावधानी बरतने की भावना शामिल है।

  • मेघालय और ओडिशा की तीन खाद्य कंपनियों पर कार्रवाई, निरीक्षण में स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी

    मेघालय और ओडिशा की तीन खाद्य कंपनियों पर कार्रवाई, निरीक्षण में स्वच्छता मानकों और खाद्य सुरक्षा नियमों की गंभीर अनदेखी

    नई दिल्ली ।भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तीन खाद्य व्यवसाय संचालकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की है। नियामक ने मेघालय की ए.बी. एंटरप्राइज तथा ओडिशा की जाइका ऑर्गेनिक्स और नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के खाद्य कारोबार लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं।

    नियामक के अनुसार इन कंपनियों के खिलाफ निरीक्षण के दौरान खाद्य सुरक्षा नियमों के गंभीर उल्लंघन सामने आए। इनमें भ्रामक स्वास्थ्य संबंधी दावे, खराब स्वच्छता व्यवस्था, अनुचित भंडारण, कीट नियंत्रण की कमियां और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन से जुड़ी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन नहीं करना शामिल है।

    ए.बी. एंटरप्राइज के मामले में उत्पादों के लेबल और प्रचार सामग्री पर स्वास्थ्य लाभ से जुड़े ऐसे दावे पाए गए, जिन्हें खाद्य सुरक्षा एवं मानक विज्ञापन और दावे संबंधी नियमों का उल्लंघन माना गया। जांच में यह भी पाया गया कि कंपनी आवश्यक विनिर्माण स्वीकृति के बिना खाद्य उत्पादों का कारोबार कर रही थी।

    कंपनी को सुधार नोटिस जारी करने के साथ अपना पक्ष रखने के लिए व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर भी दिया गया था। हालांकि, नियामक के मुताबिक कंपनी की ओर से कोई जवाब या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। इसके बाद खाद्य कारोबार से जुड़ी सभी गतिविधियों को अगले आदेश तक रोकने का निर्देश दिया गया।

    ओडिशा स्थित जाइका ऑर्गेनिक्स के संयंत्र में निरीक्षण के दौरान स्वच्छता और सैनिटेशन से संबंधित कई गंभीर कमियां सामने आईं। खाद्य पदार्थों के निर्माण, पैकेजिंग और भंडारण की परिस्थितियों को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया।

    निरीक्षण में खराब हाउसकीपिंग, कीट नियंत्रण की समस्याएं, जंग लगे उपकरण, कच्चे माल और तैयार उत्पादों का अनुचित भंडारण तथा उत्पादन प्रक्रिया में आवश्यक नियंत्रण की कमी पाई गई। कुछ उत्पादों और सामग्रियों पर निर्माण तिथि, बैच नंबर और उपयोग की अंतिम तिथि जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां भी अंकित नहीं थीं।

    अनुपालन मूल्यांकन में जाइका ऑर्गेनिक्स को 90 में से केवल 10 अंक मिले। 12 प्रतिशत के इस स्कोर के आधार पर कंपनी को गैर-अनुपालन श्रेणी में रखा गया। नियामक ने कहा कि ऐसी परिस्थितियां खाद्य पदार्थों में भौतिक, रासायनिक और जैविक जोखिम पैदा कर सकती हैं।

    नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज के उत्पादन परिसर में भी स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा प्रबंधन व्यवस्था में गंभीर कमियां पाई गईं। निरीक्षण के दौरान प्रसंस्करण और भंडारण क्षेत्रों में मक्खियां, मकड़ी के जाले, कीटों के प्रवेश के रास्ते और जल स्रोतों के आसपास शैवाल की मौजूदगी दर्ज की गई।

    इसके अलावा जंग लगे उपकरण, खाद्य सामग्री के पास कचरे का जमाव और तैयार उत्पादों के अनुचित भंडारण जैसी कमियां भी सामने आईं। कंपनी के रिकॉर्ड में खाद्य सुरक्षा प्रशिक्षण और नियंत्रण नमूनों से संबंधित आवश्यक दस्तावेजों का भी अभाव पाया गया।

    नारायणी फूड्स एंड बेवरेजेज को अनुपालन मूल्यांकन में 80 में से 20 अंक मिले, यानी कंपनी का स्कोर 25 प्रतिशत रहा। इसे भी गैर-अनुपालन श्रेणी में रखा गया और लाइसेंस तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।

    खाद्य नियामक ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। नियमों का उल्लंघन करने वाले खाद्य कारोबारियों के खिलाफ निरीक्षण और नियामकीय कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।

  • तेज डिलीवरी के पीछे की चुनौतियां उजागर, डार्क स्टोर की स्वच्छता और गिग वर्कर्स की सुरक्षा पर बढ़ी सरकारी सख्ती

    तेज डिलीवरी के पीछे की चुनौतियां उजागर, डार्क स्टोर की स्वच्छता और गिग वर्कर्स की सुरक्षा पर बढ़ी सरकारी सख्ती


    नई दिल्ली । शहरी जीवन में क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म ने खरीदारी का तरीका तेजी से बदल दिया है। दूध, सब्जियां, ब्रेड, स्नैक्स और रोजमर्रा की जरूरत का सामान अब कुछ ही मिनटों में घर तक पहुंचने लगा है। Blinkit, Zepto और Swiggy Instamart जैसी सेवाओं ने तेज डिलीवरी को अपनी पहचान बनाया, लेकिन इस मॉडल की चुनौतियां भी अब सामने आ रही हैं।

    सबसे बड़ा सवाल डिलीवरी की रफ्तार को लेकर है। जनवरी 2026 में केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय ने प्रमुख क्विक कॉमर्स कंपनियों के साथ चर्चा कर 10 मिनट की डिलीवरी के प्रचार से पीछे हटने को कहा था। इसके पीछे डिलीवरी पार्टनर्स पर पड़ने वाले समय के दबाव और उनकी सड़क सुरक्षा को लेकर चिंता प्रमुख थी। इसके बाद कंपनियों ने अपने प्रचार और ब्रांडिंग से 10 मिनट में डिलीवरी के दावे हटाने शुरू किए।

    इस कदम ने यह सवाल खड़ा किया कि ग्राहक को सामान जल्दी उपलब्ध कराने की होड़ का वास्तविक दबाव किस पर पड़ता है। डिलीवरी पार्टनर को ऑर्डर स्वीकार करने, डार्क स्टोर तक पहुंचने, सामान लेने और ट्रैफिक के बीच ग्राहक तक पहुंचने के लिए सीमित समय में कई काम करने होते हैं। ऐसे माहौल में जल्दबाजी सड़क सुरक्षा के लिए जोखिम बढ़ा सकती है।

    क्विक कॉमर्स की दूसरी बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा और डार्क स्टोर की स्वच्छता से जुड़ी है। डार्क स्टोर ऐसे केंद्र होते हैं जहां ग्राहकों के लिए सामान रखा, संभाला और पैक किया जाता है। ग्राहक इन जगहों पर सीधे खरीदारी नहीं करते, लेकिन उनके घर पहुंचने वाले खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता काफी हद तक इन्हीं केंद्रों की व्यवस्था पर निर्भर करती है।

    हाल में मुंबई के मलाड वेस्ट स्थित Blinkit से जुड़े एक डार्क स्टोर पर महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने कार्रवाई की। निरीक्षण के दौरान परिसर में स्वच्छता से जुड़ी गंभीर कमियां और कॉकरोच की मौजूदगी सामने आने के बाद खाद्य लाइसेंस निलंबित किया गया। यह कार्रवाई इस बात को रेखांकित करती है कि तेज डिलीवरी के साथ भंडारण और साफ सफाई के मानकों का पालन भी जरूरी है।

    इसी तरह बेंगलुरु के होस्कोटे क्षेत्र में Zepto से जुड़े एक वेयरहाउस पर भी खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने कार्रवाई की। निरीक्षण में खाद्य पदार्थों की स्टोरेज और हैंडलिंग, लेबलिंग तथा स्वच्छता से संबंधित कई कमियां पाई गईं। इसके बाद संबंधित वेयरहाउस को सील किया गया। इन घटनाओं ने क्विक कॉमर्स कंपनियों की सप्लाई चेन और डार्क स्टोर संचालन पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत को सामने रखा है।

    क्विक कॉमर्स मॉडल में सुविधा और गति दोनों महत्वपूर्ण हैं, लेकिन खाद्य पदार्थों के मामले में केवल कम डिलीवरी समय पर्याप्त नहीं है। दूध, फल, सब्जियां, ब्रेड और पैकेज्ड फूड जैसे उत्पादों की सही स्थिति बनाए रखने के लिए उचित तापमान, साफ-सफाई, स्टोरेज और हैंडलिंग जरूरी है। यदि इन मानकों में कमी रहती है तो कुछ मिनट की बचत ग्राहक के लिए वास्तविक लाभ नहीं रह जाती।

    इसके साथ ही गिग वर्कर्स के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा भी चर्चा के केंद्र में हैं। सरकार की ओर से क्विक कॉमर्स और अन्य प्लेटफॉर्म से जुड़े गिग वर्कर्स को ई-श्रम व्यवस्था से जोड़ने तथा सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि इस क्षेत्र का भविष्य केवल तेज डिलीवरी पर नहीं, बल्कि सुरक्षित कामकाज और बेहतर नियमन पर भी निर्भर करेगा।

    क्विक कॉमर्स उद्योग के लिए अब चुनौती यह है कि वह सुविधा और गति के साथ सुरक्षा, स्वच्छता और श्रमिक हितों के बीच संतुलन बनाए। ग्राहक के लिए कुछ मिनट कम महत्वपूर्ण हैं, यदि उसके बदले डिलीवरी पार्टनर की सुरक्षा या खाद्य उत्पाद की गुणवत्ता से समझौता करना पड़े। आने वाले समय में इस क्षेत्र की विश्वसनीयता इसी संतुलन से तय होगी।

  • बारिश के मौसम में बढ़ जाता है पेट की बीमारियों का खतरा, इन आसान उपायों से रखें डाइजेशन बेहतर और शरीर फिट

    बारिश के मौसम में बढ़ जाता है पेट की बीमारियों का खतरा, इन आसान उपायों से रखें डाइजेशन बेहतर और शरीर फिट

    नई दिल्ली । मानसून का मौसम गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन इसके साथ पाचन तंत्र से जुड़ी कई स्वास्थ्य चुनौतियां भी लेकर आता है। वातावरण में बढ़ी नमी के कारण बैक्टीरिया और वायरस तेजी से पनप सकते हैं, जिससे फूड पॉइजनिंग, गैस, अपच, दस्त, पेट दर्द और एसिडिटी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे समय में खानपान और व्यक्तिगत स्वच्छता पर विशेष ध्यान देकर इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, बारिश के मौसम में हमेशा ताजा और गर्म भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए। लंबे समय तक खुले में रखा हुआ या बासी भोजन बैक्टीरिया की वृद्धि का कारण बन सकता है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। बाहर मिलने वाले खुले खाद्य पदार्थ, पहले से कटे फल और बिना ढके रखे भोजन से बचना बेहतर माना जाता है। घर पर ताजा तैयार किया गया भोजन पाचन तंत्र के लिए अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित होता है।

    मानसून में सुरक्षित पेयजल का सेवन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दूषित पानी पेट संबंधी संक्रमण का प्रमुख कारण बन सकता है। इसलिए फिल्टर किया हुआ या अच्छी तरह उबाला गया पानी पीने की सलाह दी जाती है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर हाइड्रेट रहता है और पाचन प्रक्रिया सामान्य रूप से काम करती है। यदि घर से बाहर जा रहे हों, तो अपने साथ साफ पानी की बोतल रखना एक अच्छी आदत हो सकती है।

    पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रोबायोटिक खाद्य पदार्थों को भी आहार में शामिल किया जा सकता है। दही और छाछ जैसे खाद्य पदार्थ आंतों में लाभकारी बैक्टीरिया के संतुलन को बनाए रखने में सहायक माने जाते हैं। इसके साथ ही खिचड़ी, दलिया, सूप, उबली सब्जियां और अन्य हल्के भोजन का सेवन पाचन तंत्र पर अतिरिक्त दबाव नहीं डालता और भोजन आसानी से पचने में मदद करता है।

    स्वच्छता का पालन मानसून में बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। भोजन करने से पहले और शौचालय के उपयोग के बाद साबुन से हाथ धोना, फल और सब्जियों को अच्छी तरह साफ करना तथा रसोई और बर्तनों की नियमित सफाई बनाए रखना संक्रमण के खतरे को कम कर सकता है। छोटी-छोटी स्वच्छता संबंधी आदतें भी स्वास्थ्य की दृष्टि से बड़ा अंतर पैदा कर सकती हैं।

    बारिश के मौसम में तली-भुनी और अत्यधिक मसालेदार चीजें खाने की इच्छा बढ़ जाती है, लेकिन इनका अधिक सेवन पाचन संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकता है। अधिक तेल और मसाले वाला भोजन एसिडिटी, गैस और अपच जैसी परेशानियों का कारण बन सकता है। इसलिए संतुलित, पौष्टिक और हल्का भोजन चुनना अधिक लाभदायक माना जाता है।

    यदि लगातार पेट दर्द, दस्त, उल्टी, तेज बुखार या निर्जलीकरण जैसे लक्षण दिखाई दें, तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है। समय पर उपचार गंभीर जटिलताओं से बचाने में मदद कर सकता है। संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, स्वच्छता और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर मानसून के मौसम में पाचन तंत्र को बेहतर स्थिति में रखा जा सकता है और पूरे मौसम का आनंद स्वस्थ रहकर लिया जा सकता है।

  • बारिश में जूतों से आने वाली बदबू से हैं परेशान? घर की 4 आसान चीजें मिनटों में दूर करें नमी, बैक्टीरिया और दुर्गंध की समस्या

    बारिश में जूतों से आने वाली बदबू से हैं परेशान? घर की 4 आसान चीजें मिनटों में दूर करें नमी, बैक्टीरिया और दुर्गंध की समस्या

    नई दिल्ली । मानसून का मौसम गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन इसके साथ कई छोटी-बड़ी परेशानियां भी लेकर आता है। इनमें जूतों से आने वाली बदबू एक आम समस्या है, जिससे कई लोग रोजमर्रा की जिंदगी में असहज महसूस करते हैं। ऑफिस, स्कूल, कॉलेज या किसी सामाजिक कार्यक्रम में जूते उतारते समय अगर उनमें से तेज दुर्गंध आने लगे तो यह शर्मिंदगी का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी मुख्य वजह बारिश के मौसम में बढ़ी हुई नमी और बैक्टीरिया का तेजी से पनपना है।

    बारिश के दिनों में पैर अक्सर पसीने या पानी के संपर्क में रहते हैं। जब नमी लंबे समय तक जूतों के अंदर बनी रहती है तो बैक्टीरिया और फंगस विकसित होने लगते हैं। यही सूक्ष्म जीव दुर्गंध पैदा करते हैं। यदि समय रहते जूतों की सफाई और देखभाल न की जाए तो समस्या और बढ़ सकती है।

    इस परेशानी से राहत पाने के लिए महंगे उत्पादों की जरूरत नहीं होती। घर में मौजूद कुछ सामान्य चीजों का सही तरीके से उपयोग कर जूतों की बदबू को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सबसे प्रभावी उपायों में बेकिंग सोडा शामिल है। रात में सोने से पहले जूतों के अंदर थोड़ा-सा बेकिंग सोडा छिड़कने से यह अतिरिक्त नमी और दुर्गंध को सोख लेता है। सुबह जूतों को अच्छी तरह झाड़कर साफ कर दें। इससे जूते अधिक ताजगी भरे महसूस होते हैं।

    सूखी चाय की पत्ती या इस्तेमाल किए गए और अच्छी तरह सुखाए गए टी-बैग भी इस समस्या में उपयोगी साबित हो सकते हैं। इन्हें कुछ घंटों के लिए जूतों के अंदर रखने से नमी कम होती है और दुर्गंध पैदा करने वाले बैक्टीरिया की सक्रियता घटती है। यह तरीका विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभदायक है जो रोजाना लंबे समय तक जूते पहनते हैं।

    अगर बारिश में जूते भीग गए हों तो उन्हें तुरंत सुखाना बेहद जरूरी है। इसके लिए पुराने अखबार का इस्तेमाल किया जा सकता है। अखबार को मोड़कर जूतों के अंदर भर देने से वह तेजी से नमी सोख लेता है। यदि अखबार पूरी तरह गीला हो जाए तो उसे बदलकर दूसरा सूखा अखबार रख दें। इससे जूतों के अंदर नमी जमा नहीं होती और बैक्टीरिया के पनपने की संभावना कम हो जाती है।

    इसके अलावा, जब भी मौसम साफ हो और धूप निकले, जूतों को कुछ समय के लिए खुली हवा और धूप में जरूर रखें। सूर्य की किरणें प्राकृतिक रूप से नमी कम करने के साथ बैक्टीरिया और फंगस की वृद्धि को भी रोकने में मदद करती हैं। नियमित रूप से जूतों को हवा लगने देने से उनमें ताजगी बनी रहती है और दुर्गंध की समस्या दोबारा होने की संभावना कम होती है।

    मानसून के दौरान जूतों की साफ-सफाई और सही देखभाल पर थोड़ा-सा ध्यान देकर बदबू की समस्या से आसानी से बचा जा सकता है। घरेलू उपाय न केवल किफायती हैं, बल्कि नियमित उपयोग से जूतों की स्वच्छता बनाए रखने और पैरों को संक्रमण से सुरक्षित रखने में भी मददगार साबित होते हैं।

  • बच्चों में दस्त बन सकता है गंभीर खतरा, समय पर इलाज और देखभाल से बचाई जा सकती है जान

    बच्चों में दस्त बन सकता है गंभीर खतरा, समय पर इलाज और देखभाल से बचाई जा सकती है जान


    नई दिल्ली। बच्चों में होने वाली सबसे आम लेकिन बेहद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है दस्त, जिसे चिकित्सा भाषा में Diarrhea कहा जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या जितनी सामान्य लगती है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है, यदि समय पर ध्यान न दिया जाए। विशेषकर छोटे बच्चों में दस्त के कारण शरीर में पानी और आवश्यक पोषक तत्वों की तेजी से कमी हो जाती है, जिससे निर्जलीकरण (Dehydration), कमजोरी और कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नेशनल हेल्थ मिशन के दिशा-निर्देशों के अनुसार National Health Mission लगातार लोगों को जागरूक कर रहा है कि बच्चों में दस्त को हल्के में लेना गंभीर भूल साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शुरुआती लक्षणों की पहचान और तुरंत उपचार ही बच्चे की जान बचाने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि दस्त से बचाव के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम है शिशु को शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध देना। स्तनपान बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है और कई संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह प्राकृतिक रूप से बच्चे के शरीर को मजबूत आधार देता है।

    दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है स्वच्छता का पालन। गंदगी और अस्वच्छ वातावरण दस्त फैलाने वाले प्रमुख कारणों में से एक है। इसलिए बच्चों के आसपास साफ-सफाई रखना, हाथों को नियमित धोना और सुरक्षित पेयजल का उपयोग करना बेहद जरूरी माना गया है। इसके साथ ही रोटावायरस और खसरा जैसी बीमारियों के खिलाफ समय पर टीकाकरण भी बच्चों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।

    तीसरा और सबसे जरूरी कदम है—यदि बच्चे को दस्त हो जाए तो तुरंत उपचार शुरू करना। डॉक्टरों के अनुसार हर बार दस्त होने पर बच्चे को Oral Rehydration Solution (ओआरएस) देना चाहिए ताकि शरीर में पानी और नमक की कमी पूरी हो सके। इसके साथ ही चिकित्सक की सलाह पर जिंक की गोली 14 दिनों तक देना भी लाभकारी माना जाता है, जो दस्त की अवधि और गंभीरता को कम करने में मदद करता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि माता-पिता समय पर इन उपायों को अपनाएं तो बच्चों को गंभीर स्थिति में पहुंचने से बचाया जा सकता है। दस्त के दौरान सबसे बड़ी चुनौती शरीर में तेजी से होने वाला पानी का नुकसान होता है, जिसे समय रहते रोका जाए तो स्थिति सामान्य की जा सकती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि बच्चों को हल्का, सुपाच्य और पौष्टिक आहार दिया जाए तथा किसी भी तरह की लापरवाही न बरती जाए। दस्त के लक्षण दिखते ही डॉक्टर से संपर्क करना सबसे सुरक्षित विकल्प है।

    कुल मिलाकर, जागरूकता, स्वच्छता और सही उपचार ही बच्चों को इस खतरनाक लेकिन नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी से सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी कुंजी है।

  • नोएडा में पिज्जा शॉप पर बड़ा बवाल: थूककर खाना बनाने का आरोप, मालिक गिरफ्तार; वायरल वीडियो से मचा हड़कंप

    नोएडा में पिज्जा शॉप पर बड़ा बवाल: थूककर खाना बनाने का आरोप, मालिक गिरफ्तार; वायरल वीडियो से मचा हड़कंप



    नई दिल्ली। नोएडा के सेक्टर-22 स्थित चौड़ा गांव में एक पिज्जा शॉप को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में दुकान पर काम करने वाले शख्स मुजम्मिल पर पिज्जा तैयार करने के दौरान कथित तौर पर अनुचित व्यवहार करने का आरोप लगा है। वीडियो सामने आने के बाद इलाके में गुस्सा भड़क गया और लोगों ने मौके पर पहुंचकर हंगामा किया।

    जानकारी के मुताबिक, वायरल वीडियो में मुजम्मिल नाम का व्यक्ति पिज्जा तैयार करते समय संदिग्ध हरकत करता दिखाई दे रहा है। हालांकि आरोपी का दावा है कि वह आटे से धूल हटाने के लिए फूंक मार रहा था, लेकिन वीडियो के आधार पर स्थानीय लोगों और कुछ संगठनों ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कार्रवाई की मांग की।

    मामला बढ़ने पर पुलिस ने तत्काल संज्ञान लेते हुए आरोपी को हिरासत में ले लिया और उससे पूछताछ शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि वीडियो की फॉरेंसिक जांच और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    घटना के बाद स्थानीय लोगों में रोष है और वे खाद्य सुरक्षा व स्वच्छता नियमों के सख्त पालन की मांग कर रहे हैं। वहीं प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि मामले की निष्पक्ष जांच की जाएगी और अगर कोई दोषी पाया गया तो कड़ी कार्रवाई होगी।