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  • मक्का पैक्ट से बदल सकते हैं मध्य पूर्व के समीकरण, IMEC को लेकर भारत के सामने उभरी नई रणनीतिक चुनौती

    मक्का पैक्ट से बदल सकते हैं मध्य पूर्व के समीकरण, IMEC को लेकर भारत के सामने उभरी नई रणनीतिक चुनौती

    नई दिल्ली ।मध्य पूर्व में बदलते रणनीतिक समीकरणों के बीच तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच उभर रहा मक्का पैक्ट अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। इस समझौते को क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोग की नई व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। वहीं, इसके साथ भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे यानी IMEC की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मक्का पैक्ट और IMEC के पीछे क्षेत्रीय प्रभाव तथा संपर्क मार्गों को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण काम कर रहे हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर IMEC को रोकने के लिए बनाया गया गठबंधन मानने के पर्याप्त आधार अभी स्पष्ट नहीं हैं।

    IMEC में भारत के साथ संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, जॉर्डन, इजरायल और यूरोपीय देशों की भागीदारी की परिकल्पना है। इस आर्थिक गलियारे का उद्देश्य भारत को मध्य पूर्व के रास्ते यूरोप से जोड़ना है। इसके तहत समुद्री और रेल संपर्क के माध्यम से व्यापार तथा परिवहन को बेहतर बनाने की योजना है। दूसरी ओर, मक्का पैक्ट से जुड़े क्षेत्रीय संपर्क और सुरक्षा सहयोग को लेकर अलग तरह की रणनीतिक चर्चाएं सामने आ रही हैं।

    इस पूरे घटनाक्रम में तुर्की की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। IMEC की प्रस्तावित रूपरेखा में तुर्की को शामिल नहीं किया गया है। इस कारण क्षेत्रीय संपर्क व्यवस्था में उसकी स्थिति को लेकर पहले भी चर्चा होती रही है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन की क्षेत्रीय नीतियों और मध्य पूर्व में प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों को भी इस संदर्भ में देखा जा रहा है।

    अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के कुछ विशेषज्ञों ने मक्का पैक्ट और IMEC के बीच संभावित प्रतिस्पर्धा का विश्लेषण किया है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में बन रही नई व्यवस्था को केवल आर्थिक गलियारों या रक्षा सहयोग तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे क्षेत्रीय नेतृत्व, व्यापारिक संपर्क और राजनीतिक प्रभाव जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।

    मक्का रक्षा समझौते के तहत तीनों देशों ने सामूहिक रक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई है। समझौते की एक प्रमुख शर्त के अनुसार, किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला बाकी सदस्यों पर हमला माना जाएगा। इसमें खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, रक्षा उद्योग में सहयोग, संयुक्त हथियार निर्माण और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी जैसे विषय भी शामिल हैं। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक भूमिका और प्रभाव को लेकर आगे के घटनाक्रम महत्वपूर्ण होंगे।

    इस रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम 15 अक्टूबर को अजरबैजान की राजधानी बाकू में देखने को मिला। एक क्षेत्रीय सम्मेलन के दौरान इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने संबोधन शुरू किया तो तुर्की के विदेश मंत्री हकन फिदान कार्यक्रम से बाहर चले गए। उनके साथ ईरान, पाकिस्तान, कुवैत, सऊदी अरब और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के कुछ अधिकारी भी बाहर निकल गए। हालांकि, अजरबैजान के अधिकारी कार्यक्रम में मौजूद रहे।

    इस घटनाक्रम में मध्य एशिया के पांच देशों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। उनके प्रतिनिधि सम्मेलन में मौजूद रहे और कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव ने इजरायली राष्ट्रपति के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की। इससे संकेत मिला कि मध्य एशिया के देश तुर्की की क्षेत्रीय प्राथमिकताओं से अलग अपने कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों को भी महत्व दे रहे हैं।

    मध्य पूर्व में अमेरिका की भूमिका को लेकर भी चर्चा हो रही है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय देश अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अधिक स्वतंत्र विकल्प तलाश रहे हैं। ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन से जुड़ी एसली आयदिनताशबाश ने मक्का पैक्ट को अमेरिका के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने की दिशा में एक शुरुआती प्रयोग के रूप में देखा है। वहीं, सोनार कागाप्टे ने समझौते में शामिल नहीं किए गए देशों के आधार पर इसके रणनीतिक उद्देश्य समझने की बात कही है।

    इस चर्चा में भारत, ईरान और इजरायल को तीन महत्वपूर्ण देशों के रूप में देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का तर्क है कि इन देशों को नई क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था से बाहर रखने की रणनीति हो सकती है। हालांकि, यह सभी विशेषज्ञों की एक समान राय नहीं है। मक्का पैक्ट को लेकर अलग-अलग आकलन मौजूद हैं और इसके वास्तविक प्रभाव का पता आगे के फैसलों तथा सदस्य देशों के आपसी सहयोग से ही चलेगा।

    भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का महत्व इसलिए भी है क्योंकि IMEC में सऊदी अरब शामिल है, जबकि मक्का पैक्ट में भी उसकी प्रमुख भूमिका है। ऐसे में रियाद के सामने सुरक्षा सहयोग और आर्थिक संपर्क परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती हो सकती है। फिलहाल दोनों व्यवस्थाओं के बीच सीधा टकराव तय नहीं है। आने वाले समय में मध्य एशिया, दक्षिण काकेशस और खाड़ी क्षेत्र के देशों के फैसले यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि क्षेत्रीय व्यापार और सुरक्षा का नया ढांचा किस दिशा में आगे बढ़ता है।

  • इजरायल चुनाव पर भारत की नजर, IMEC कॉरिडोर से रक्षा साझेदारी तक दांव पर कई अहम हित….

    इजरायल चुनाव पर भारत की नजर, IMEC कॉरिडोर से रक्षा साझेदारी तक दांव पर कई अहम हित….

    नई दिल्ली । इजरायल में 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनाव पर भारत की नजरें टिकी हैं। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ भारत और इजरायल के द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, साइबर सुरक्षा, कृषि, नवाचार और व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहयोग है। ऐसे में इजरायल में सत्ता परिवर्तन या मौजूदा सरकार की वापसी से इन साझेदारियों की प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है।

    यह चुनाव 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा सीरिया में इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों के बाद पहला आम चुनाव है। नेतन्याहू को बंधकों की रिहाई के मामले को संभालने और गाजा युद्ध की रणनीति को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी हैं। हालांकि, उनके समर्थन में धुर राष्ट्रवादी और धार्मिक राजनीतिक दलों का गठबंधन है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन भी नेतन्याहू के राजनीतिक पक्ष के लिए अहम माना जा रहा है।

    चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और इजरायली सेना के पूर्व प्रमुख गादी आइजेनकोट की याशर पार्टी के बीच मुकाबले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं और सातवें कार्यकाल के लिए दावेदारी कर रहे हैं। दूसरी ओर, आइजेनकोट 7 अक्टूबर के हमले, गाजा युद्ध और बंधकों की रिहाई के मुद्दों पर सरकार को घेर रहे हैं। हाल के सर्वेक्षणों में उनके आगे रहने की बात कही गई है, हालांकि चुनाव का अंतिम परिणाम मतदाताओं के फैसले पर निर्भर करेगा।

    गादी आइजेनकोट इजरायली सेना के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह 2022 में राजनीति में आए और हमास के हमले के बाद नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट का हिस्सा बने। जून 2024 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। उनका आरोप रहा है कि सरकार के पास गाजा युद्ध को लेकर स्पष्ट रणनीति नहीं है। वह भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी नेतन्याहू की आलोचना करते रहे हैं। दिसंबर 2023 में उनके सबसे छोटे बेटे की गाजा में लड़ाई के दौरान मौत हो गई थी। युद्ध में उनके दो भतीजे भी मारे गए।

    भारत के लिए चुनाव का एक बड़ा पहलू इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी IMEC है। इस प्रस्तावित आर्थिक गलियारे में इजरायल को महत्वपूर्ण भागीदार माना गया है। परियोजना का उद्देश्य भारत, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच संपर्क तथा व्यापार को बढ़ावा देना है। यदि नई सरकार की प्राथमिकताओं में इस परियोजना को पर्याप्त महत्व नहीं मिला, तो इसके क्रियान्वयन में देरी की आशंका हो सकती है। इसलिए भारत के लिए इजरायल की नई सरकार की क्षेत्रीय नीति और आर्थिक सहयोग को लेकर रुख महत्वपूर्ण रहेगा।

    व्यापार के मोर्चे पर वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और इजरायल के बीच वस्तुओं का कुल व्यापार लगभग 3.93 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। दोनों देश मुक्त व्यापार समझौते पर भी बातचीत कर रहे हैं। भारत इजरायल को रत्न और आभूषण, रिफाइंड पेट्रोलियम, इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू लिनेन का निर्यात करता है। वहीं, भारत इजरायल से इंटीग्रेटेड सर्किट, हीरे, उर्वरक, पेट्रोलियम उत्पाद और रक्षा उपकरण आयात करता है। दोनों देशों के बीच रुपये में व्यापार को बढ़ावा देने पर भी बातचीत जारी है।

    भारत ने 17 सितंबर 1950 को इजरायल को मान्यता दी थी। वर्ष 1992 में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए और नियमित दूतावास खोले गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती मिली है। मोदी 2017 में इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने फरवरी 2026 में भी इजरायल का राजकीय दौरा किया और इजरायली संसद नेसेट को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इजरायल में एक लाख से अधिक भारतीय मूल के यहूदी रहते हैं, जबकि भारत में भी इजरायली नागरिक मौजूद हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक सहयोग की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।