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  • सुपर अल नीनो से भारत की आर्थिक विकास दर को खतरा, फसल उत्पादन घटेगा और महंगाई बढ़ेगीः IMF

    सुपर अल नीनो से भारत की आर्थिक विकास दर को खतरा, फसल उत्पादन घटेगा और महंगाई बढ़ेगीः IMF


    न्यूयार्क।
    भारत (India) की आर्थिक विकास दर (Economic Growth Rate) को लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund- IMF) ने सुपर अल नीनो (Super El Niño) के संभावित खतरे के प्रति आगाह किया है। IMF के मुताबिक, मौसम में होने वाले इस बदलाव से फसलों का उत्पादन घट सकता है, खाद्य महंगाई बढ़ सकती है और आम लोगों की खरीदारी करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।


    जनवरी में भारत की ग्रोथ का दोबारा आकलन करेगा IMF

    IMF की कम्युनिकेशन डायरेक्टर जूली कोजैक ने गुरुवार को कहा कि भारत के सामने सुपर अल नीनो से जुड़े कुछ खतरे हैं, लेकिन अभी तक ये हकीकत में सामने नहीं आए हैं।

    जूली कोजैक ने कहा, “IMF जनवरी में जारी होने वाले अपने अगले वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (WEO) अपडेट में भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान की दोबारा समीक्षा करेगा। यह समीक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि मौसम से जुड़े जोखिम किस तरह सामने आते हैं।”


    भारत की GDP ग्रोथ 7% रहने का अनुमान

    बता दें IMF ने इसी महीने वित्त वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% कर दिया था। इससे पहले जुलाई में IMF ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.4% और वित्त वर्ष 2027-28 के लिए 6.7% ग्रोथ का अनुमान लगाया था।

    IMF के मुताबिक, भारत में घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है और सर्विस सेक्टर में भी अच्छी गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। यही वजह है कि मौसम से जुड़े संभावित खतरों के बावजूद भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान मजबूत बना हुआ है।


    क्या है सुपर अल नीनो और भारत को इससे क्या खतरा है?

    अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक होने से जुड़ी जलवायु संबंधी घटना है। इसका असर दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर पड़ सकता है और भारत में मानसून की बारिश भी प्रभावित हो सकती है। अगर अल नीनो की स्थिति ज्यादा मजबूत होती है और बारिश में कमी आती है, तो इसका असर खेती और खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।


    इसके तीन बड़े संभावित असर हैं

    1. फसल उत्पादन में गिरावट: बारिश कम होने से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
    2. खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी: अनाज, दालों और दूसरी खाने-पीने की चीजों की सप्लाई घटने पर कीमतें बढ़ सकती हैं।
    3. आम लोगों के बजट पर दबाव: खाने-पीने की चीजें महंगी होने से परिवारों की खरीदारी करने की क्षमता कम हो सकती है।

    हालांकि, इन आशंकाओं का मतलब यह नहीं है कि महंगाई या आर्थिक विकास पर असर पड़ना तय है। वास्तविक प्रभाव मौसम की स्थिति और कृषि उत्पादन में होने वाले बदलाव पर निर्भर करेगा।


    भारत की अर्थव्यवस्था पर रहेगी नजर

    IMF ने फिलहाल भारत की आर्थिक विकास दर के अनुमान में सुपर अल नीनो के संभावित असर को शामिल करके कोई नई कटौती नहीं की है। संगठन का कहना है कि घरेलू मांग और सर्विस सेक्टर की मजबूती से भारत की आर्थिक विकास दर को समर्थन मिल रहा है।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, आईएमएफ ने 2026 और 2027 के लिए विकास दर अनुमान 7% किया

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, आईएमएफ ने 2026 और 2027 के लिए विकास दर अनुमान 7% किया

    नई दिल्ली । दुनिया की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की आशंकाओं, भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा बाजारों में उतार-चढ़ाव और व्यापारिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों के सख्त होने के बावजूद भारत प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे बना हुआ है। घरेलू मांग, सार्वजनिक निवेश, डिजिटल बदलाव और नीतिगत प्रबंधन को इस मजबूती के प्रमुख आधारों में गिना गया है।

    रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रमुख वैश्विक संस्थानों की ओर से भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि के अनुमानों में संशोधन किया जाना देश की आर्थिक संभावनाओं को दर्शाता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने 2026 और 2027, दोनों वर्षों के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर सात प्रतिशत कर दिया है। इस अनुमान के आधार पर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति बनाए रख सकता है।

    भारत की आर्थिक मजबूती का एक बड़ा कारण उसका विशाल और विविध घरेलू बाजार है। घरेलू उपभोग, निजी निवेश और बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च मिलकर आर्थिक गतिविधियों को गति देते हैं। वैश्विक बाजारों में मांग कमजोर होने या अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अस्थिरता बढ़ने पर घरेलू मांग अर्थव्यवस्था को सहारा प्रदान करती है। इससे बाहरी झटकों का प्रभाव सीमित करने में मदद मिलती है।

    निजी उपभोग का प्रभाव कई प्रमुख क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। ऑटोमोबाइल, आवास, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों को घरेलू मांग से समर्थन मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती आय, शहरीकरण, डिजिटल सेवाओं तक पहुंच और बेहतर कनेक्टिविटी लोगों की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। इन बदलावों से निवेश और नवाचार के लिए भी नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

    डिजिटल परिवर्तन भी भारत की आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और प्रौद्योगिकी आधारित सरकारी सेवाओं ने लेन-देन को आसान बनाया है तथा लागत कम करने में मदद की है। डिजिटल माध्यमों के विस्तार से छोटे व्यवसायों को भी अपने स्थानीय बाजार से आगे बढ़कर व्यापक ग्राहक वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिला है। इससे व्यापारिक गतिविधियों में तकनीक की भूमिका मजबूत हुई है।

    बुनियादी ढांचे में निवेश को भी आर्थिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक बताया गया है। परिवहन, लॉजिस्टिक्स, बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़ी परियोजनाओं से वस्तुओं तथा सेवाओं की आवाजाही बेहतर हो रही है। बेहतर संपर्क व्यवस्था से बाजारों तक पहुंच का विस्तार होता है और कारोबार की लागत घटाने में मदद मिलती है। इसके साथ ही निर्यात में विविधता लाने, राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।

    रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का निर्यात एक ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है। वर्ष 2030 तक निर्यात को दो ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। विनिर्माण क्षेत्र ने भी वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। ये आंकड़े उत्पादन और बाहरी व्यापार के क्षेत्र में विस्तार की संभावनाओं की ओर संकेत करते हैं।

    कुल मिलाकर, भारत की आर्थिक स्थिति को घरेलू मांग, बुनियादी ढांचे के विकास, डिजिटल सेवाओं के विस्तार और नीतिगत प्रबंधन से समर्थन मिल रहा है। हालांकि, वैश्विक आर्थिक सुस्ती, ऊर्जा बाजारों की अस्थिरता और व्यापारिक तनाव जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। ऐसे माहौल में भारत की घरेलू आर्थिक बुनियाद और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता आने वाले वर्षों में उसकी विकास गति बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकती है।

  • वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध, व्यापारिक तनाव और बढ़ते कर्ज का खतरा, आईएमएफ ने आर्थिक स्थिरता को लेकर दी चेतावनी

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध, व्यापारिक तनाव और बढ़ते कर्ज का खतरा, आईएमएफ ने आर्थिक स्थिरता को लेकर दी चेतावनी

    नई दिल्ली । वैश्विक अर्थव्यवस्था ने हाल के आर्थिक झटकों का अनुमान से बेहतर सामना किया है, लेकिन आगे भी यही स्थिति बनी रहेगी, इसकी गारंटी नहीं है। युद्ध, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुकावट, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और भारी सार्वजनिक कर्ज वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर जोखिम बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की नीति-निर्धारक समिति ने इन चुनौतियों को लेकर चेतावनी देते हुए कहा है कि सरकारों को आने वाले समय में कई मोर्चों पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

    बैंकॉक में आयोजित अपनी 54वीं बैठक के बाद शनिवार को जारी बयान में इंटरनेशनल मॉनेटरी एंड फाइनेंशियल कमिटी (आईएमएफसी) ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का मौजूदा प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा है, लेकिन इसे स्थायी स्थिति मानना उचित नहीं होगा। समिति के मुताबिक, विभिन्न देशों की सरकारें एक साथ भू-राजनीतिक और वित्तीय चुनौतियों से जूझ रही हैं। ऐसे में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए सतर्क नीतियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है।

    समिति की अध्यक्षता सऊदी अरब के वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जदान ने की। बयान में कहा गया कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों के कारण भारी मानवीय और आर्थिक नुकसान हो रहा है। इन परिस्थितियों का सबसे अधिक असर गरीब और कमजोर देशों पर पड़ रहा है। युद्धों के कारण अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान पैदा हो सकता है, जिससे वस्तुओं की उपलब्धता प्रभावित होने के साथ उनकी कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।

    भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर दबाव बढ़ने की आशंका भी जताई गई है। इसका असर ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति पर पड़ सकता है। समिति ने चेताया कि यदि ये बाधाएं बढ़ती हैं, तो पहले से मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर रहे देशों में ऊर्जा और खाद्य असुरक्षा की समस्या गंभीर हो सकती है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार नीतियों और लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों के आर्थिक प्रभावों को लेकर अनिश्चितता भी बनी हुई है।

    वित्तीय क्षेत्र में समिति ने सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाले रिटर्न यानी सॉवरेन बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी, सार्वजनिक कर्ज के भारी स्तर और पुराने कर्ज को चुकाने के लिए नया कर्ज लेने की जरूरत को प्रमुख जोखिम बताया। इन परिस्थितियों में उन देशों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जिन्हें अपनी वित्तीय जरूरतें पूरी करने के लिए लगातार उधार लेना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजारों तक सीमित पहुंच रखने वाली अर्थव्यवस्थाओं पर इसका दबाव अधिक पड़ सकता है।

    समिति ने उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीकों के बढ़ते आर्थिक प्रभावों पर भी चर्चा की। उसके अनुसार, तेजी से हो रही तकनीकी प्रगति निवेश और व्यापार को बढ़ावा देने के साथ उत्पादकता में सुधार कर सकती है। हालांकि, इन तकनीकों के आर्थिक और वित्तीय नतीजों को लेकर बनी अनिश्चितता मौजूदा कमजोरियों को बढ़ा सकती है। इसलिए तकनीकी बदलावों से मिलने वाले अवसरों के साथ उनसे जुड़े जोखिमों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए आईएमएफसी ने मजबूत व्यापक आर्थिक नीतियों, विश्वसनीय राजकोषीय ढांचे और सरकारों के बीच निरंतर सहयोग पर जोर दिया। समिति ने देशों से अपनी वित्तीय कमजोरियों को दूर करने, कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी निवेश जारी रखने का आग्रह किया। उसने यह भी कहा कि महंगाई की उम्मीदों को नियंत्रित रखने और आर्थिक नीतियों पर भरोसा बनाए रखने के लिए केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है।

    बयान में बैंकॉक ब्लूप्रिंट का स्वागत किया गया, जिसका उद्देश्य डिजिटल वित्तीय सेवाओं को अधिक सुरक्षित बनाना, साइबर सुरक्षा मजबूत करना और डिजिटल धोखाधड़ी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना है। समिति ने वैश्विक आर्थिक असंतुलन, व्यापारिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य को प्रभावित करने वाली विसंगतियों को दूर करने के लिए भी आपसी सहयोग की आवश्यकता बताई।

    इसके अलावा, सुरक्षित और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने तथा वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए आवागमन की स्वतंत्रता बनाए रखने पर जोर दिया गया। समिति ने संप्रभु ऋण पुनर्गठन की प्रक्रिया में सुधार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। विशेष रूप से कम आय वाले और कमजोर मध्यम आय वाले देशों के लिए कर्ज पुनर्गठन को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत बताई गई। इसके तहत कर्ज लेने वालों और कर्ज देने वालों से अधिक पारदर्शिता बरतने तथा ऋण पुनर्गठन की व्यवस्थाओं को अधिक स्पष्ट और पूर्वानुमान योग्य बनाने का आह्वान किया गया।

  • बेल आउट पैकेज पर गुजारा करने वाला पाकिस्तान अब विश्व बैंक और IMF में बड़ी भूमिका में

    बेल आउट पैकेज पर गुजारा करने वाला पाकिस्तान अब विश्व बैंक और IMF में बड़ी भूमिका में


    इस्लामाबाद।
    IMF के बेल आउट पैकेज (Bailout package) से गुजर बसर करने वाला पाकिस्तान (Pakistan) अब बड़ी टेबल पर बैठता हुआ नजर आएगा। जी हां, IMF से 1.2 अरब डॉलर के पैकेज की मंजूरी का इंतजार कर रहा पाकिस्तान अब इस वैश्विक संस्था के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (Global Institution Board of Governors) की अध्यक्षता करने जा रहा है। पाकिस्तान सरकार के मुताबिक 1953 के बाद यह पहली बार है, जब इस्लामाबाद इस पद पर बैठेगा। बता दें, इस पद के तहत पाकिस्तान उन बैठकों की अध्यक्षता करेगा, जिनमें सदस्य देशों के वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंकों के गवर्नर शामिल होते हैं। हालांकि कर्ज देने के मामले में पाकिस्तान की कोई सीधी भूमिका नहीं होगी।

    पाकिस्तान सरकार की तरफ से बताया गया कि बैंकॉक में हुए विश्व बैंक और IMF की वार्षिक बैठकों के दौरान वहां पाकिस्तान के गवर्नर अहद खान चीमा को 2027 के लिए आगामी अध्यक्ष के रूप में नामित किया गया है। पाकिस्तान की तरफ से इस नियुक्ति को एक ऐतिहासिक पल करार दिया गाय है।

    कर्ज लेकर पलने वाला देश अब बड़ी भूमिका में
    पाकिस्तान अपनी स्थापना के बाद लगातार IMF से बेल आउट पैकेज ले चुका है। 1950 में IMF की स्थापना के बाद करीब 25 बार पाकिस्तान IMF की मदद लेकर अपना देश चलाने की कोशिश कर रहा है। बार-बार IMF के पास जाने से पता चलता है कि पाकिस्तान को अपनी बाहरी देनदारियों को पूरा करने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा जुटाने में लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसके साथ ही, देश में महंगाई और फंडिंग का दबाव भी बना हुआ है।

    वर्तमान की स्थिति में पाकिस्तान IMF से करीब 1.2 बिलियन डॉलर निकालने की जुगत में है। इसमें एक्सटेंटेड फंड फैसिलिटी और जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए दी जाने वाली मदद शामिल है। लेकिन इस पैसे को निकालने के लिए IMF के कार्यकारी बोर्ड की मंजूरी जरूरी है, जो कि अभी तक मिली नहीं है।


    पाकिस्तान का अर्थव्यवस्था का मॉडल अस्थिर- विश्वबैंक

    आईएमएफ की तरफ से पाकिस्तान को लगातार एक अस्थिर अर्थव्यवस्था वाला देश कहा जाता रहा है। विश्व बैंक ने भी हाल में पाकिस्तान के विकास मॉडल को अस्थिर ही बताया था। विश्व बैंक की तरफ से कहा गया था कि पाकिस्तान में सार्वजनिक खपत का उच्च स्तर, कम उत्पादकता और भारी मात्रा में कर्ज लेना। अब असली चुनौती यह है कि क्या ये लोन ऐसे विकास को बढ़ावा दे सकते हैं, जिससे भविष्य में किसी और ‘बेलआउट’ (आर्थिक मदद) की जरूरत न पड़े।

    पाकिस्तान शुरुआत से ही दुनिया के लिए एक बड़ा संकट बनकर उभरता रहता है। एक इस्लामिक देश, जिसके पास परमाणु हथियार है। वह अपने आप की मदद करने के लिए दुनिया को लगातार इस मामले में चैक पर रखता है कि वह आतंकवाद से लड़ रहा है। अगर उसकी मदद नहीं की गई, तो परमाणु हथियार खतरे में पड़ सकते हैं। इसलिए पश्चिम एशिया से लेकर अमेरिका तक पाकिस्तान और उसकी सेना का अपने मन मुताबिक उपयोग करके पैसे के जरिए इस्लामाबाद की सत्ता के संभाले रहते हैं।

    शहबाज शरीफ की सरकार के आने के बाद IMF और सऊदी अरब ने खुले मन से पाकिस्तान की मदद की है। IMF का कहना है कि पश्चिमी एशिया में चल रहे संघर्ष के बावजूद, पाकिस्तान ने अपनी व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखी है। इसमें मजबूत नीतियों और IMF के लोन कार्यक्रम के तहत मिली मदद ने अहम भूमिका निभाई है। वित्त वर्ष 2026 की पहली तीन तिमाहियों में वास्तविक GDP में 4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। हालाँकि, ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और सप्लाई में रुकावटों के कारण विकास की गति धीमी हो गई, जिससे पूरे साल के लिए विकास दर 3.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

  • भारत की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र और तकनीकी क्षमता वैश्विक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है: आईएमएफ

    भारत की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र और तकनीकी क्षमता वैश्विक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है: आईएमएफ

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के उप-प्रबंध निदेशक नाइजेल क्लार्क ने कहा है कि भारत के पास दुनिया की आर्थिक वृद्धि की अगली बड़ी लहर का नेतृत्व करने की क्षमता है। पांच दिवसीय भारत यात्रा पूरी करने के बाद जारी उनके बयान में देश की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र की प्रगति और बढ़ती तकनीकी क्षमताओं को इसकी प्रमुख वजह बताया गया।

    क्लार्क ने अपनी यात्रा के दौरान नई दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं। आईएमएफ में उप-प्रबंध निदेशक का पद संभालने के बाद यह उनकी भारत की पहली यात्रा थी। इस दौरान उन्होंने वित्त और कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा और नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी से मुलाकात की।

    क्लार्क ने कहा कि भारत दुनिया की अगली आर्थिक वृद्धि को गति देने की क्षमता रखता है और आईएमएफ इस यात्रा में देश का करीबी साझेदार बना रहेगा। उन्होंने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताया और वैश्विक आर्थिक विकास में देश की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

    उन्होंने कहा कि मजबूत आर्थिक आधार और अच्छी नीतियों के कारण भारत वैश्विक विकास के प्रमुख इंजनों में बना हुआ है। भारतीय नीति-निर्माताओं के साथ हुई बातचीत में देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति, वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव और टिकाऊ तथा समावेशी आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक कदमों पर चर्चा हुई।

    क्लार्क के मुताबिक, दुनिया में बढ़ती अनिश्चितताओं और बदलते जोखिमों के बीच आर्थिक स्थिरता और मजबूती बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नीतियों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप लचीला बनाए रखने, महंगाई को नियंत्रण में रखने तथा ऐसे सुधार आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई, जो उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा को मजबूत कर सकें।

    उन्होंने मध्यम अवधि में तेज आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए सुधारों की जरूरत पर भी जोर दिया। साथ ही क्लार्क ने भारत सरकार को बहुपक्षीय सहयोग का समर्थन करने और क्षेत्र के अन्य देशों की मदद करने के लिए धन्यवाद दिया।

    भारत यात्रा के दौरान आईएमएफ के उप-प्रबंध निदेशक ने उद्योग जगत के कई नेताओं और कारोबारियों से भी मुलाकात की। इन बैठकों का उद्देश्य यह समझना था कि देश का निजी क्षेत्र आर्थिक प्रगति में किस तरह योगदान दे रहा है।

    क्लार्क ने भारतीय निजी क्षेत्र की ऊर्जा और देश में मौजूद प्रतिभाओं की सराहना की। उन्होंने तेजी से विकसित हो रही तकनीकी और विनिर्माण क्षमताओं को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, भारत में निजी क्षेत्र की गतिविधियां आर्थिक विकास की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

    उन्होंने नवाचार, डिजिटल बदलाव, उन्नत विनिर्माण और नई तकनीकों को अपनाने को उत्पादकता बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों के रूप में रेखांकित किया। क्लार्क के मुताबिक इन क्षेत्रों में प्रगति से प्रतिस्पर्धा मजबूत हो सकती है और अधिक मूल्य वाले आर्थिक कार्यों को बढ़ावा मिल सकता है।

    उनकी यात्रा के दौरान हुई चर्चाओं में भारत की आर्थिक मजबूती के साथ-साथ वैश्विक परिस्थितियों के बीच विकास को टिकाऊ बनाए रखने के उपायों पर भी ध्यान दिया गया। क्लार्क ने कहा कि आईएमएफ भारत के साथ साझेदारी जारी रखेगा और देश की आर्थिक वृद्धि से जुड़े प्रयासों में करीबी सहयोगी बना रहेगा।

  • अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की कोशिश में दुनिया, सोने और दूसरी मुद्राओं की बढ़ती मांग के बीच भारत के सामने नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । अमेरिकी डॉलर लंबे समय से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की सबसे प्रभावशाली मुद्रा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद और सीमा पार वित्तीय लेनदेन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, हाल के वर्षों में डॉलर की हिस्सेदारी और इसकी मजबूती को लेकर बहस तेज हुई है। केंद्रीय बैंक अपने भंडार में विविधता लाने के साथ सोने और दूसरी मुद्राओं की हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विचार कर रहे हैं।

    अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी लंबे समय में कम हुई है। इसके बावजूद डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे प्रमुख आरक्षित मुद्रा है। इसलिए मौजूदा बदलाव को डॉलर के तत्काल अंत के तौर पर देखना सही नहीं होगा। विशेषज्ञों के बीच इसे धीरे-धीरे बढ़ती डीडॉलराइजेशन की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

    डॉलर की हालिया कमजोरी ने इस चर्चा को और हवा दी है। अमेरिकी आर्थिक नीतियों, ब्याज दरों, आर्थिक विकास की संभावनाओं और बढ़ते सरकारी कर्ज को लेकर निवेशकों की चिंताओं का असर डॉलर की धारणा पर पड़ा है। अमेरिका का सरकारी कर्ज बढ़ने से भी लंबे समय में उसकी वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

    केंद्रीय बैंकों के रवैये में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। कई देश विदेशी मुद्रा भंडार को केवल एक मुद्रा पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग परिसंपत्तियों में बांटना चाहते हैं। सोने की खरीद इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही है। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के अनुभव ने भी देशों को अपने विदेशी भंडार की सुरक्षा और विविधता पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित किया है।

    रूस के विदेशी भंडार पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद कई देशों में यह चिंता बढ़ी कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक तनाव की स्थिति में विदेशी मुद्रा संपत्तियों पर भी असर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ केंद्रीय बैंक डॉलर के साथ सोने और अन्य मुद्राओं को भी रणनीतिक रूप से महत्व दे रहे हैं।

    तेल कारोबार में भी डॉलर की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है। हालांकि यह धारणा सही नहीं है कि सऊदी अरब के साथ अमेरिका का कोई ऐसा बाध्यकारी 50 साल का समझौता था जिसके तहत तेल की बिक्री केवल डॉलर में करना जरूरी था। फिर भी विभिन्न देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिशें वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बदलाव का संकेत जरूर देती हैं।

    भारत के लिए डॉलर में कमजोरी के कुछ फायदे हो सकते हैं। भारत कच्चे तेल समेत कई जरूरी वस्तुओं का बड़ा आयातक है। यदि डॉलर कमजोर रहता है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें अनुकूल बनी रहती हैं, तो आयात की लागत पर राहत मिल सकती है। विदेशी मशीनरी और कुछ अन्य आयातित वस्तुएं भी अपेक्षाकृत सस्ती हो सकती हैं। डॉलर में लिए गए विदेशी कर्ज की रुपये में लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ सकता है।

    भारत के लिए एक अन्य अवसर रुपये में अंतरराष्ट्रीय कारोबार बढ़ाने का है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा पार भुगतान की व्यवस्था मजबूत होने से भारत डॉलर पर निर्भरता को कुछ हद तक कम कर सकता है। इससे रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ावा मिलने की संभावना भी बनती है।

    हालांकि कमजोर डॉलर का नुकसान भी हो सकता है। सूचना प्रौद्योगिकी, दवा, कपड़ा और अन्य निर्यात क्षेत्रों की कंपनियां विदेशों से बड़ी मात्रा में डॉलर कमाती हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति मजबूत होने पर उनकी डॉलर आय को रुपये में बदलने पर कम रकम मिल सकती है, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी मुद्रा संरचना में बदलाव का प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा डॉलर में अचानक और तेज गिरावट वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ा सकती है, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार और निवेश प्रवाह पर भी पड़ सकता है।

    फिलहाल डॉलर की वैश्विक ताकत खत्म होने की बात कहना जल्दबाजी होगी। वास्तविक बदलाव यह है कि दुनिया धीरे-धीरे अपने विदेशी भंडार और भुगतान व्यवस्था में विविधता बढ़ा रही है। डॉलर के साथ सोना और दूसरी मुद्राएं भी जगह बना रही हैं। भारत के लिए यह बदलाव आयात लागत और रुपये के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल के अवसर खोल सकता है, लेकिन निर्यात और वित्तीय बाजारों के लिए नई चुनौतियां भी पैदा कर सकता है।

  • वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, IMF ने अमेरिका-चीन से बेहतर विकास गति का जताया भरोसा

    वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, IMF ने अमेरिका-चीन से बेहतर विकास गति का जताया भरोसा

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक चुनौतियों, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बनी अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत गति से आगे बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपने नवीनतम वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक अपडेट में भारत को वर्ष 2026 के दौरान दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बताया है। रिपोर्ट में भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है, जो वैश्विक औसत से दोगुने से भी अधिक है।

    आईएमएफ के अनुसार इस वर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था की विकास दर लगभग 3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि भारत इससे काफी बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की मजबूत घरेलू मांग, निजी उपभोग में निरंतर बढ़ोतरी और सेवा क्षेत्र की सुदृढ़ गतिविधियां आर्थिक विकास की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई हैं। यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर अनिश्चित माहौल के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत अधिक स्थिर और मजबूत दिखाई दे रही है।

    रिपोर्ट में वित्त वर्ष और कैलेंडर वर्ष दोनों आधारों पर भारत की विकास दर का आकलन किया गया है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आईएमएफ ने भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जबकि अगले वित्त वर्ष में इसके बढ़कर 6.7 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। वहीं कैलेंडर वर्ष 2026 के लिए 7 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान भारत को दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे रखता है।

    आईएमएफ ने यह भी कहा है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव का वैश्विक अर्थव्यवस्था पर अपेक्षाकृत सीमित प्रभाव देखने को मिला है। कमोडिटी कीमतों, महंगाई की अपेक्षाओं और वित्तीय परिस्थितियों पर इसका असर नियंत्रित रहा है। साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों के बढ़ते उपयोग ने वैश्विक तकनीकी क्षेत्र में मांग को मजबूती दी है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को अतिरिक्त समर्थन मिला है।

    रिपोर्ट के अनुसार चीन की अर्थव्यवस्था वर्ष 2026 में लगभग 4.6 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है, जबकि अगले वर्ष इसमें और कमी आने का अनुमान है। वहीं अमेरिका की आर्थिक वृद्धि दर 2 प्रतिशत से कुछ अधिक रहने की संभावना जताई गई है। यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था भी अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ने का अनुमान है। इन अनुमानों के बीच भारत की विकास दर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक बनी हुई है।

    भारत की आर्थिक संभावनाओं को लेकर अन्य वैश्विक संस्थानों ने भी सकारात्मक अनुमान व्यक्त किए हैं। विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर 6.6 प्रतिशत और अगले वित्त वर्ष में 7.2 प्रतिशत रहने की संभावना जताई है। संयुक्त राष्ट्र ने भी भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बताते हुए 6.4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी चालू वित्त वर्ष के लिए 6.6 प्रतिशत की विकास दर का अनुमान बरकरार रखा है, जबकि कई वैश्विक वित्तीय संस्थानों ने भी अपने पूर्वानुमानों में सुधार किया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मजबूत घरेलू मांग, सार्वजनिक निवेश, सेवा क्षेत्र का विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था का तेज़ विकास और बुनियादी ढांचे पर लगातार हो रहा निवेश भारत की आर्थिक वृद्धि को आगे भी गति दे सकता है। यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल बनी रहती हैं तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के बीच अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है। आईएमएफ की ताजा रिपोर्ट इसी विश्वास को मजबूत करती है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था निरंतर विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रही है।

  • पाकिस्तान 100 अरब बढ़ा रहा रक्षा बजट, क्या किसी बड़ी सैन्य तैयारी की ओर इशारा?

    पाकिस्तान 100 अरब बढ़ा रहा रक्षा बजट, क्या किसी बड़ी सैन्य तैयारी की ओर इशारा?



    नई दिल्ली। पाकिस्तान सरकार अगले वित्त वर्ष में अपने रक्षा बजट में करीब 100 अरब पाकिस्तानी रुपये की बढ़ोतरी करने की तैयारी में है। यह बढ़ोतरी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के समर्थन वाले आर्थिक सुधार कार्यक्रम के तहत तैयार किए जा रहे नए बजट का हिस्सा है, जिसमें देश की कुल आय और खर्च दोनों में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया गया है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2026-27 में पाकिस्तान का रक्षा खर्च लगभग 2.66 लाख करोड़ पाकिस्तानी रुपये तक पहुंच सकता है, जो मौजूदा वित्त वर्ष के 2.56 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। वहीं IMF ने अनुमान लगाया है कि इसी अवधि में पाकिस्तान की कुल संघीय आय 17.14 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 13.5 प्रतिशत अधिक है।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पाकिस्तान सरकार अपने वित्तीय ढांचे में सुधार के लिए बड़े कदम उठा रही है। इसमें केंद्र और प्रांतीय खर्च को GDP के 0.2 प्रतिशत तक बढ़ाना, सभी सरकारी भुगतान को डिजिटल करना और भ्रष्टाचार प्रभावित संस्थानों की जांच शामिल है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि रक्षा बजट में यह बढ़ोतरी पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने और हथियारों की खरीद बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा हो सकती है। हालांकि आर्थिक स्थिति अभी भी कमजोर है और IMF के अनुसार देश की लगभग 40 प्रतिशत आबादी आर्थिक रूप से कमजोर बनी हुई है।

    इसी बीच IMF मिशन पाकिस्तान में नए बजट को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में जुटा है, जिसे जल्द ही संसद में पेश किया जाएगा।

  • कंगाली से जूझ रहे पाकिस्तान ने फिर लिया कर्जा …, IMF ने दी 1.32 अरब डॉलर की नई किस्त को मंजूरी

    कंगाली से जूझ रहे पाकिस्तान ने फिर लिया कर्जा …, IMF ने दी 1.32 अरब डॉलर की नई किस्त को मंजूरी


    इस्लामाबाद।
    आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान (Pakistan) की हालत दिन-पर-दिन खराब होती जा रही है। उसकी भीख मांगने की आदत अब भी नहीं गई है। अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund.- IMF) ने पाकिस्तान को बड़ा कर्ज दिया है। IMF बोर्ड ने मौजूदा कर्ज कार्यक्रमों के तहत करीब 1.32 अरब डॉलर की नई किस्त को मंजूरी दे दी। इसमें एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी (Extended Fund Facility.- EFF) के तहत लगभग 1.1 अरब डॉलर और जलवायु संबंधी रेजिलियंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी के तहत करीब 22 करोड़ डॉलर शामिल हैं।

    IMF का कहना है कि पाकिस्तान ने आर्थिक सुधारों की दिशा में कुछ प्रगति दिखाई है और कठिन वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश की है। हालांकि यह मदद ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट, महंगाई और विदेशी मुद्रा की भारी कमी से जूझ रहा है।

    मध्य पूर्व में जारी तनाव और तेल की बढ़ती कीमतों ने पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में उछाल का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, जिसके चलते केंद्रीय बैंक को अचानक ब्याज दरें बढ़ाने जैसा कदम उठाना पड़ा। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार दबाव में हैं और आयात बिल बढ़ने से हालात और खराब हुए हैं। पाकिस्तान को अस्थायी राहत तब मिली जब सऊदी ने 3 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता का भरोसा दिया। वहीं यूएई ने अपने पुराने कर्ज की वापसी का दबाव भी बढ़ा दिया, जिससे इस राहत का बड़ा हिस्सा संतुलन बनाने में ही खर्च होने की आशंका है।

    IMF ने शुक्रवार को एक बयान में कहा कि उसे इस संस्था की ‘एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी’ (EFF) के तहत लगभग $1.1 बिलियन और जलवायु पर केंद्रित ‘रेजिलियंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी’ के तहत लगभग $220 मिलियन मिलने की उम्मीद है। IMF ने अपने बयान में आगे कहा, “EFF व्यवस्था के तहत पाकिस्तान के नीतिगत प्रयासों से अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और एक चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल, जिसमें मध्य पूर्व में चल रहा युद्ध भी शामिल है, के बीच भरोसा फिर से कायम करने में काफी प्रगति हुई है।” तेल की कीमतों में भारी उछाल के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है, जिसके चलते केंद्रीय बैंक को कीमतों पर बढ़ते दबाव से निपटने के लिए एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ीं।


    मित्र देशों के सामने हाथ फैलाता रहता है PAK

    पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान बार-बार आईएमएफ, सऊदी अरब, चीन और अन्य मित्र देशों के सामने आर्थिक मदद के लिए हाथ फैलाता रहा है। आलोचकों का कहना है कि वहां की सरकारें स्थायी आर्थिक सुधारों की बजाय कर्ज लेकर संकट टालने की नीति अपनाती रही हैं। कमजोर टैक्स व्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता, बढ़ता रक्षा खर्च और निर्यात में अपेक्षित बढ़ोतरी न होना पाकिस्तान की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियां बनी हुई हैं। यही कारण है कि हर कुछ वर्षों में देश भुगतान संकट में फंस जाता है और उसे बाहरी मदद की जरूरत पड़ती है।


    इससे नहीं खत्म होंगी आर्थिक समस्याएं

    एक्सपर्ट्स का मानना है कि IMF की यह नई किस्त पाकिस्तान को कुछ समय के लिए राहत जरूर दे सकती है, लेकिन इससे उसकी मूल आर्थिक समस्याएं खत्म नहीं होंगी। यदि पाकिस्तान ने उद्योग, निर्यात, कर संग्रह और ऊर्जा क्षेत्र में बड़े सुधार नहीं किए तो वह भविष्य में भी विदेशी कर्ज और बेलआउट पैकेज पर निर्भर रहेगा। फिलहाल हालात ऐसे हैं कि पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए फिर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और मित्र देशों की मदद पर टिका हुआ नजर आ रहा है।

  • आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा बजट: 10 साल में ढाई गुना उछाल, फंडिंग और पारदर्शिता पर उठे सवाल

    आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा बजट: 10 साल में ढाई गुना उछाल, फंडिंग और पारदर्शिता पर उठे सवाल


    नई दिल्ली। गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में एक ओर जहां सरकार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से राहत पैकेज पर निर्भर है, वहीं दूसरी ओर देश का रक्षा खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले एक दशक में पाकिस्तान का सैन्य बजट करीब ढाई गुना बढ़कर 2.5 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये के पार पहुंच गया है, जिसने वित्तीय प्राथमिकताओं और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2016 के आसपास जहां रक्षा बजट करीब 1.08 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये था, वहीं हाल के वर्षों में इसमें तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था उच्च महंगाई, विदेशी कर्ज और कमजोर राजस्व ढांचे जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।

    इस बीच International Monetary Fund और World Bank जैसी संस्थाएं पाकिस्तान के वित्तीय अनुशासन पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रक्षा खर्च के वास्तविक आंकड़ों को लेकर पारदर्शिता की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य पेंशन, रणनीतिक कार्यक्रम और कुछ उच्च-मूल्य परियोजनाओं को अलग मदों में दर्शाया जाता है, जिससे कुल रक्षा व्यय की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ पाती।

    रक्षा आधुनिकीकरण के मोर्चे पर पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में कई परियोजनाओं पर काम तेज किया है। इनमें नौसेना के बुनियादी ढांचे का विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को मजबूत करना और नई सैन्य तकनीकों में निवेश शामिल है। साथ ही चीन के सहयोग से पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों की खरीद भी चर्चा में रही है।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि पाकिस्तान की रक्षा फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा बाहरी सहयोग पर आधारित है। चीन से दीर्घकालिक ऋण और रक्षा सहयोग के जरिए महंगी परियोजनाओं की लागत को लंबी अवधि में बांटा जाता है। इसके अलावा सऊदी अरब के साथ हुए समझौते के तहत ऊर्जा और वित्तीय सहायता भी पाकिस्तान की आर्थिक जरूरतों को सहारा देती है।

    हालांकि, इन व्यवस्थाओं के बावजूद सवाल यह उठता है कि आर्थिक दबाव के बीच बढ़ता रक्षा बजट देश की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर क्या असर डालेगा। कुछ विशेषज्ञ इसे सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से जरूरी बताते हैं, जबकि अन्य का मानना है कि सामाजिक और विकास क्षेत्रों की कीमत पर रक्षा खर्च बढ़ाना संतुलित नीति नहीं माना जा सकता।

    कुल मिलाकर, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और रक्षा प्राथमिकताओं के बीच यह असंतुलन आने वाले समय में और गहन समीक्षा की मांग करता है खासतौर पर तब, जब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं देश की नीतियों पर करीबी नजर रखे हुए हैं।