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  • बदलते मौसम में सर्दी-खांसी और बुखार से बढ़ी परेशानी, बच्चों से बुजुर्गों तक इन बातों का रखें विशेष ध्यान

    बदलते मौसम में सर्दी-खांसी और बुखार से बढ़ी परेशानी, बच्चों से बुजुर्गों तक इन बातों का रखें विशेष ध्यान

    नई दिल्ली ।मौसम में बदलाव के साथ कई लोगों को सर्दी, खांसी, गले में दर्द, बुखार और वायरल संक्रमण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जब दिन और रात के तापमान में तेजी से अंतर आता है, तो शरीर को बदलते मौसम के अनुसार ढलने में समय लग सकता है। इसी दौरान वायरस और बैक्टीरिया तेजी से फैल सकते हैं, जिससे अचानक बीमार पड़ने का खतरा बढ़ सकता है।

    बदलते मौसम में हर व्यक्ति को समान स्तर की परेशानी नहीं होती। बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को इस दौरान अधिक सावधानी बरतने की जरूरत बताई गई है। इसके अलावा जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर है, उन्हें भी अपने स्वास्थ्य को लेकर विशेष सतर्क रहना चाहिए। पहले से अस्थमा, एलर्जी या किसी अन्य बीमारी से जूझ रहे लोगों को मौसम में बदलाव के दौरान अतिरिक्त सावधानी रखने की जरूरत हो सकती है।

    दिनभर अलग-अलग तापमान वाले वातावरण में रहने वाले लोगों को भी परेशानी हो सकती है। बाहर आने-जाने वाले लोगों, ऑफिस जाने वालों और नाइट शिफ्ट में काम करने वाले लोगों को अचानक तापमान में बदलाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में शरीर को बदलते वातावरण के अनुसार समायोजित होने में समय लग सकता है और स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें सामने आ सकती हैं।

    बदलते मौसम में खुद को सुरक्षित रखने के लिए कपड़ों का चयन मौसम के अनुसार करना जरूरी है। बहुत अधिक ठंडे या गर्म वातावरण में अचानक जाने से बचने की सलाह दी गई है। शरीर में पानी की पर्याप्त मात्रा बनाए रखना भी जरूरी है। इसके लिए पर्याप्त पानी पीना चाहिए और भोजन में ताजे तथा पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए।

    पर्याप्त नींद लेना भी इस दौरान महत्वपूर्ण माना गया है। रोजाना हल्की-फुल्की शारीरिक गतिविधि को अपनी दिनचर्या में शामिल किया जा सकता है। मौसम बदलने के दौरान साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना भी जरूरी है। बाहर से घर लौटने के बाद हाथ अच्छी तरह धोने की आदत संक्रमण से बचाव में मदद कर सकती है। व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ आसपास की साफ-सफाई का भी ध्यान रखना चाहिए।

    स्वास्थ्य से जुड़े लक्षण लंबे समय तक बने रहने पर उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि कई दिनों तक बुखार बना रहता है, लगातार खांसी बढ़ती जाती है, सांस लेने में परेशानी होती है या बहुत अधिक कमजोरी महसूस होती है, तो डॉक्टर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। यदि दवा लेने के बाद भी राहत नहीं मिलती है, तब भी चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    बदलते मौसम में बार-बार खुद से दवा लेना उचित नहीं माना गया है। खासकर जब लक्षण लगातार बने रहें या उनकी गंभीरता बढ़ती जाए, तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। मौसम के अनुसार कपड़े पहनना, पर्याप्त पानी पीना, पौष्टिक भोजन लेना, पूरी नींद लेना, हल्की शारीरिक गतिविधि करना और स्वच्छता का ध्यान रखना इस दौरान स्वास्थ्य संबंधी सावधानी के प्रमुख उपाय हैं।

  • अकेलापन सेहत के लिए बन सकता है गंभीर खतरा, डॉक्टर ने मोटापा, शराब और शारीरिक निष्क्रियता से जुड़े जोखिमों पर चेताया

    अकेलापन सेहत के लिए बन सकता है गंभीर खतरा, डॉक्टर ने मोटापा, शराब और शारीरिक निष्क्रियता से जुड़े जोखिमों पर चेताया


    नई दिल्ली । 
    स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले जोखिमों की चर्चा में आमतौर पर धूम्रपान, शराब, मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता को प्रमुख कारण माना जाता है। हालांकि, लंबे समय तक बना रहने वाला अकेलापन भी शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। हेल्थ एजुकेटर और डॉक्टर एरिक बर्ग ने अकेलेपन को लेकर लोगों को सावधान किया है और इसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर ध्यान देने की बात कही है।

    अकेलापन केवल किसी व्यक्ति का कुछ समय के लिए अकेले रहना नहीं है। समस्या तब बढ़ सकती है जब व्यक्ति लंबे समय तक सामाजिक संपर्क से दूर रहे, उसके पास बातचीत करने वाले लोग कम हों या उसे भावनात्मक रूप से अलग-थलग महसूस हो। ऐसी स्थिति लगातार बनी रहने पर तनाव और मानसिक दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर शरीर के अलग-अलग तंत्रों पर पड़ सकता है।

    डॉक्टर एरिक बर्ग के अनुसार, लंबे समय तक सामाजिक अलगाव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में अकेलेपन की तुलना कई अन्य स्वास्थ्य जोखिमों से करते हुए इसे गंभीरता से लेने की जरूरत बताई। हालांकि, अकेलेपन को सीधे तौर पर प्रतिदिन 15 सिगरेट पीने के बराबर नुकसान पहुंचाने वाला बताना एक लोकप्रिय स्वास्थ्य दावा है, जिसे संदर्भ और वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर सावधानी से समझना जरूरी है।

    लगातार अकेलेपन और तनाव की स्थिति में शरीर का तनाव प्रतिक्रिया तंत्र सक्रिय रह सकता है। इससे तनाव से जुड़े हार्मोन और रक्तचाप प्रभावित हो सकते हैं। लंबे समय तक बढ़ा हुआ तनाव हृदय स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है और हृदय रोग तथा स्ट्रोक जैसे रोगों से जुड़े अन्य जोखिमों को बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है।

    अकेलेपन का असर प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी पड़ सकता है। लगातार मानसिक तनाव शरीर की सामान्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकता है। इससे संक्रमण के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया और बीमारी से उबरने की प्रक्रिया पर असर पड़ने की संभावना रहती है।

    मानसिक स्वास्थ्य के स्तर पर सामाजिक संपर्क की कमी चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं के जोखिम से जुड़ी हुई है। परिवार, दोस्तों और समाज के साथ स्वस्थ संवाद व्यक्ति को भावनात्मक समर्थन देता है। जब यह संपर्क लगातार कम हो जाता है तो तनाव से निपटने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और नकारात्मक भावनाएं लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।

    अकेलेपन का संबंध नींद की गुणवत्ता से भी देखा गया है। लगातार चिंता, असुरक्षा या तनाव के कारण कुछ लोगों को सोने में परेशानी हो सकती है। पर्याप्त और अच्छी नींद नहीं मिलने पर दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं।

    लंबे समय तक सामाजिक अलगाव का असर सोचने और समझने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। सामाजिक गतिविधियों और बातचीत से दिमाग लगातार सक्रिय रहता है। उम्र बढ़ने के साथ सामाजिक अलगाव और संज्ञानात्मक गिरावट के बीच संबंध को लेकर भी शोध हुआ है। हालांकि, अकेलापन अकेले ही डिमेंशिया का कारण है, ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, अकेलेपन को नजरअंदाज करने के बजाय नियमित सामाजिक संपर्क बनाए रखना उपयोगी हो सकता है। परिवार और दोस्तों से बातचीत, सामुदायिक गतिविधियों में भागीदारी, पसंदीदा गतिविधियों के लिए समय निकालना और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना मददगार कदम हो सकते हैं। लंबे समय तक अकेलापन महसूस करने वाले व्यक्ति को इसे केवल व्यक्तिगत कमजोरी मानने के बजाय स्वास्थ्य से जुड़ी स्थिति के रूप में गंभीरता से लेना चाहिए।

  • आंवला है पोषक तत्वों का खजाना, डाइट में सही तरीके से शामिल करने पर इम्युनिटी और पाचन समेत मिल सकते हैं कई फायदे

    आंवला है पोषक तत्वों का खजाना, डाइट में सही तरीके से शामिल करने पर इम्युनिटी और पाचन समेत मिल सकते हैं कई फायदे

    नई दिल्ली ।आंवला आकार में छोटा जरूर होता है, लेकिन पोषण के लिहाज से इसे बेहद उपयोगी फल माना जाता है। इसमें विटामिन C, फाइबर और कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट यौगिक पाए जाते हैं। भारतीय खान-पान में आंवले का इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। इसे संतुलित आहार का हिस्सा बनाकर शरीर को कई जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

    आंवले में मौजूद विटामिन C शरीर के सामान्य इम्यून फंक्शन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह शरीर में एंटीऑक्सीडेंट की भूमिका भी निभाता है। इसलिए नियमित और संतुलित डाइट में आंवले को शामिल करना पोषण की दृष्टि से उपयोगी हो सकता है। हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को बीमारी से बचाव या इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    पाचन तंत्र के लिए भी आंवला उपयोगी हो सकता है। इसमें फाइबर मौजूद होता है, जो पाचन तंत्र के सामान्य कामकाज में मदद करता है। पर्याप्त फाइबर का सेवन मल त्याग को नियमित रखने में सहायक हो सकता है। आंवले को सलाद, चटनी या भोजन के साथ शामिल करना डाइट में फाइबर बढ़ाने का आसान तरीका हो सकता है।

    आंवले में मौजूद विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा के लिए भी महत्वपूर्ण पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। विटामिन C शरीर में कोलेजन बनाने की प्रक्रिया में भूमिका निभाता है। इसी वजह से संतुलित भोजन में आंवले को शामिल करना त्वचा की सामान्य सेहत के लिए उपयोगी हो सकता है।

    बालों की सेहत के संदर्भ में भी आंवले का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से किया जाता रहा है। आंवला खाने से मिलने वाले पोषक तत्व शरीर के समग्र पोषण में योगदान करते हैं। हालांकि केवल आंवला खाने से बालों से जुड़ी सभी समस्याएं दूर होने का दावा उचित नहीं है। बालों की अच्छी सेहत के लिए प्रोटीन, आयरन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा भी जरूरी होती है।

    आंवला विभिन्न एंटीऑक्सीडेंट यौगिकों का स्रोत भी है। शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स से कोशिकाओं को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस का सामना करना पड़ सकता है। संतुलित आहार में शामिल फल और सब्जियां शरीर को अलग-अलग प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। आंवला इसी तरह के पौष्टिक खाद्य विकल्पों में शामिल किया जा सकता है।

    हृदय की सेहत के लिहाज से भी आंवले को संतुलित डाइट का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसमें फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। हालांकि किसी एक फल को हृदय रोग से बचाव या उपचार का साधन मानना सही नहीं होगा। स्वस्थ हृदय के लिए संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और बेहतर जीवनशैली जरूरी है।

    आंवले को खाने का सबसे आसान तरीका इसे अच्छी तरह धोकर छोटे टुकड़ों में काटकर खाना है। स्वाद के लिए थोड़ी मात्रा में काला नमक या भुना जीरा मिलाया जा सकता है। इसे चटनी, सलाद या अन्य भोजन में भी शामिल किया जा सकता है।

    कई लोग आंवले का सेवन मुरब्बे और कैंडी के रूप में करते हैं, लेकिन ऐसे उत्पादों में अतिरिक्त चीनी हो सकती है। इसलिए रोजमर्रा की डाइट में ताजा आंवला या कम चीनी वाले विकल्पों को प्राथमिकता देना बेहतर हो सकता है। किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या, एलर्जी या आहार संबंधी प्रतिबंध की स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार इसका सेवन करना उचित रहेगा।

  • 5 से 12 साल की उम्र में सही पोषण है सबसे बड़ी पूंजी, संतुलित आहार से मिलेगा तेज दिमाग और मजबूत शरीर

    5 से 12 साल की उम्र में सही पोषण है सबसे बड़ी पूंजी, संतुलित आहार से मिलेगा तेज दिमाग और मजबूत शरीर

    नई दिल्ली । पांच से बारह वर्ष की आयु बच्चों के संपूर्ण विकास का सबसे महत्वपूर्ण दौर माना जाता है। इसी उम्र में शरीर तेजी से बढ़ता है, मांसपेशियां और हड्डियां मजबूत होती हैं तथा मस्तिष्क नई चीजों को सीखने और समझने की क्षमता विकसित करता है। ऐसे में संतुलित और पोषणयुक्त आहार बच्चों के वर्तमान स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके भविष्य की सेहत की भी मजबूत नींव तैयार करता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों की दैनिक डाइट में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन शामिल होना चाहिए। प्रोटीन शरीर की कोशिकाओं के निर्माण, मांसपेशियों के विकास और ऊतकों की मरम्मत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दाल, दूध, दही, पनीर, अंडा, सोया, चना और अन्य प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ नियमित रूप से देने से बच्चों की शारीरिक वृद्धि बेहतर होती है और उनकी ताकत भी बढ़ती है।

    हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए कैल्शियम और विटामिन डी भी बेहद आवश्यक हैं। बढ़ती उम्र में हड्डियों का विकास तेज गति से होता है, इसलिए दूध, दही, पनीर, रागी और अन्य कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थों को भोजन का हिस्सा बनाना चाहिए। साथ ही नियमित रूप से कुछ समय धूप में बिताने से शरीर को प्राकृतिक रूप से विटामिन डी प्राप्त करने में मदद मिलती है, जिससे हड्डियां मजबूत बनी रहती हैं।

    फल और हरी सब्जियां बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनमें मौजूद विटामिन, खनिज और फाइबर शरीर को आवश्यक पोषण प्रदान करते हैं। रंग-बिरंगे फल और विभिन्न प्रकार की सब्जियां खाने वाले बच्चों में संक्रमण का खतरा अपेक्षाकृत कम रहता है और उनका मानसिक विकास भी बेहतर माना जाता है।

    ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति के लिए साबुत अनाज को भोजन में शामिल करना लाभदायक होता है। गेहूं, ओट्स, दलिया, ब्राउन राइस और मल्टीग्रेन खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे बच्चे लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं और पढ़ाई या अन्य गतिविधियों के दौरान उनकी एकाग्रता बनी रहती है। इसके विपरीत अत्यधिक रिफाइंड आटे और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखना बेहतर माना जाता है।

    दिमाग के स्वस्थ विकास के लिए हेल्दी फैट भी जरूरी है। बादाम, अखरोट, मूंगफली और विभिन्न बीजों में मौजूद पोषक तत्व याददाश्त, एकाग्रता और सीखने की क्षमता को बेहतर बनाने में सहायक माने जाते हैं। इन्हें सीमित मात्रा में नियमित रूप से आहार में शामिल किया जा सकता है।

    पर्याप्त पानी पीना भी बच्चों के स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पानी शरीर में तरल संतुलन बनाए रखने, पाचन प्रक्रिया को बेहतर करने और शरीर को सक्रिय रखने में मदद करता है। वहीं अत्यधिक मीठे पेय और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स का सेवन कम करना चाहिए, क्योंकि इनके अधिक उपयोग से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बचपन से ही बच्चों में संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ खान-पान की आदतें विकसित की जाएं तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है। यही आदतें आगे चलकर उन्हें स्वस्थ, सक्रिय और ऊर्जावान जीवन की दिशा में मजबूत आधार प्रदान करती हैं।

  • बारिश से पहले क्यों बढ़ जाते हैं वायरल फीवर के मामले? जानिए मौसम और सेहत का यह अहम संबंध

    बारिश से पहले क्यों बढ़ जाते हैं वायरल फीवर के मामले? जानिए मौसम और सेहत का यह अहम संबंध

    नई दिल्ली । बारिश से ठीक पहले का मौसम शरीर के लिए सबसे संवेदनशील माना जाता है। गर्मी के बाद जब अचानक हवा में नमी बढ़ती है, तापमान बार-बार ऊपर-नीचे होता है और वातावरण अस्थिर हो जाता है, तो वायरस और बैक्टीरिया को फैलने का बेहतर माहौल मिल जाता है। इसी वजह से इस समय वायरल फीवर, फ्लू और इंफेक्शन के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं।

    इस मौसम में शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी थोड़ी कमजोर पड़ जाती है। दिन में गर्मी और रात में ठंडक के कारण शरीर एडजस्ट नहीं कर पाता, जिससे सर्दी-जुकाम, गले में दर्द और बुखार जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। इसके साथ ही नमी बढ़ने से मच्छरों की संख्या भी बढ़ती है, जिससे डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

    सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों पर पड़ता है। गंदा पानी, बाहर का खाना और साफ-सफाई की कमी भी पेट से जुड़ी बीमारियों जैसे दस्त, उल्टी और फूड पॉइजनिंग को बढ़ावा देती है।

    कैसे करें बचाव

    इस मौसम में बचाव ही सबसे बड़ा उपाय है। घर के आसपास पानी जमा न होने दें ताकि मच्छर न पनपें। बाहर का खुला या बासी खाना खाने से बचें और हल्का, ताजा भोजन करें। पर्याप्त पानी पिएं और शरीर को हाइड्रेट रखें।

    बारिश में भीगने के बाद तुरंत कपड़े बदलना जरूरी है। बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखें। अगर बुखार, कमजोरी या खांसी लंबे समय तक बनी रहे तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने की बजाय डॉक्टर से सलाह लें।

    थोड़ी सावधानी रखकर इस मौसम की कई गंभीर बीमारियों से आसानी से बचा जा सकता है।
    बारिश से पहले बदलते मौसम, नमी और कमजोर इम्युनिटी के कारण वायरल बीमारियां तेजी से फैलती हैं।

  • विटामिन D की कमी: जानिए किन लोगों को सप्लीमेंट, लेना है बेहद जरूरी

    विटामिन D की कमी: जानिए किन लोगों को सप्लीमेंट, लेना है बेहद जरूरी


    नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, लंबे समय तक घर या ऑफिस के अंदर रहना और कम धूप के संपर्क में आना शरीर में विटामिन D की कमी का बड़ा कारण बन रहा है। हैरानी की बात यह है कि धूप से भरपूर देश में भी बड़ी संख्या में लोग इस समस्या से प्रभावित हैं। विटामिन D हड्डियों की मजबूती, इम्यूनिटी और मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी माना जाता है, लेकिन इसकी कमी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार कुछ लोगों में विटामिन D की कमी का खतरा अधिक होता है और उन्हें सप्लीमेंट की जरूरत पड़ सकती है। सबसे पहले वे लोग जो ज्यादातर समय घर या ऑफिस के अंदर रहते हैं और जिनकी त्वचा पर पर्याप्त धूप नहीं पड़ती। इसके अलावा गहरी त्वचा (डार्क स्किन) वाले लोगों में भी यह कमी अधिक देखी जाती है क्योंकि उनकी त्वचा में मेलेनिन अधिक होने से विटामिन D बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।

    50 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों में भी विटामिन D बनाने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और जोड़ों में दर्द की समस्या बढ़ सकती है। वहीं मोटापे से ग्रस्त लोगों में यह विटामिन शरीर की फैट कोशिकाओं में फंस जाता है, जिससे इसकी उपलब्धता कम हो जाती है। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी इसकी अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि इस दौरान शरीर की जरूरतें बढ़ जाती हैं।

    शाकाहारी या वीगन लोगों में भी विटामिन D की कमी आम है क्योंकि इसके प्रमुख प्राकृतिक स्रोत जैसे मछली और अंडे उनके आहार में शामिल नहीं होते। इसके अलावा किडनी या पाचन संबंधी रोगों से पीड़ित लोगों में भी शरीर विटामिन D को सही तरीके से अवशोषित नहीं कर पाता, जिससे कमी की संभावना बढ़ जाती है।

    विटामिन D की कमी के लक्षणों में लगातार थकान, हड्डियों और जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, बाल झड़ना, बार-बार बीमार पड़ना और मूड स्विंग शामिल हैं। लंबे समय तक कमी रहने पर यह हड्डियों को कमजोर कर सकता है और इम्यून सिस्टम को प्रभावित कर सकता है।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सुबह या दिन के समय थोड़ी देर धूप लेना, आहार में मशरूम, फोर्टिफाइड दूध, अंडे की जर्दी और अन्य पोषक खाद्य पदार्थ शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। हालांकि सप्लीमेंट लेने से पहले ब्लड टेस्ट और डॉक्टर की सलाह जरूरी है, क्योंकि अधिक मात्रा में विटामिन D शरीर के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। कुल मिलाकर, सही जीवनशैली, संतुलित आहार और समय-समय पर जांच के जरिए विटामिन D की कमी को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

  • रोज खाएं जामुन, पाएं सेहत, इम्यूनिटी और दिल की सुरक्षा

    रोज खाएं जामुन, पाएं सेहत, इम्यूनिटी और दिल की सुरक्षा


    नई दिल्ली । गर्मियों का मौसम आते ही बाजार में कई तरह के मौसमी फल दिखाई देने लगते हैं, जिनमें जामुन एक खास स्थान रखता है। खट्टे-मीठे स्वाद वाला यह फल न केवल शरीर को ठंडक पहुंचाता है, बल्कि कई औषधीय गुणों से भरपूर भी होता है। आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही जामुन को एक बेहतरीन सुपरफूड मानते हैं, जो संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है।

    आयुर्वेद में जामुन को विशेष रूप से डायबिटीज और पेट संबंधी बीमारियों के लिए लाभकारी बताया गया है। जामुन के फल के साथ-साथ इसकी पत्तियां और डाली भी औषधीय रूप में उपयोग की जाती हैं। इसकी डाली से दातून करने पर मुंह के रोगों से बचाव होता है और दांत मजबूत रहते हैं। जामुन की तासीर ठंडी मानी जाती है, जिससे यह शरीर की अतिरिक्त गर्मी को कम करता है और पेट को ठंडक प्रदान करता है।

    जामुन का सबसे बड़ा लाभ ब्लड शुगर को नियंत्रित करना है। इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे यह डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद साबित होता है। नियमित सेवन से ब्लड शुगर स्तर को संतुलित रखने में मदद मिलती है।

    इसके अलावा जामुन पाचन तंत्र के लिए भी काफी उपयोगी है। इसमें मौजूद फाइबर पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है, कब्ज की समस्या को दूर करता है और पेट को स्वस्थ रखता है। गर्मियों में अक्सर भारी भोजन के कारण पाचन बिगड़ जाता है, ऐसे में जामुन इस समस्या को दूर करने में सहायक होता है।

    जामुन इम्यूनिटी बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा होती है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं। इससे मौसमी बीमारियों से बचाव होता है और शरीर ऊर्जा से भरपूर रहता है।

    दिल की सेहत के लिए भी जामुन काफी फायदेमंद है। इसमें मौजूद पोटैशियम ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है, जबकि इसके एंटीऑक्सीडेंट्स कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में सहायक होते हैं। इससे हृदय स्वस्थ बना रहता है और हृदय रोगों का खतरा कम होता है। कम कैलोरी वाला यह फल वजन नियंत्रित रखने में भी मदद करता है। इसमें मौजूद फाइबर भूख को नियंत्रित करता है, जिससे बार-बार खाने की आदत कम होती है।

    इतना ही नहीं, जामुन त्वचा के लिए भी लाभकारी है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाते हैं। गर्मियों में धूप और पसीने से प्रभावित त्वचा को यह निखारने में मदद करता है और प्राकृतिक ग्लो प्रदान करता है। इस प्रकार जामुन सिर्फ स्वाद ही नहीं बल्कि सेहत का खजाना है। अगर आप गर्मियों में खुद को स्वस्थ, ऊर्जावान और फिट रखना चाहते हैं, तो इस मौसमी फल को अपनी डाइट में जरूर शामिल करें।

  • गर्मियों में डिहाइड्रेशन से बचने का मंत्र ताजे जूस से शरीर को रखें ठंडा और एक्टिव

    गर्मियों में डिहाइड्रेशन से बचने का मंत्र ताजे जूस से शरीर को रखें ठंडा और एक्टिव


    नई दिल्ली: भारत में गर्मियों का असर तेज होते ही स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को खानपान में सावधानी बरतने और शरीर को हाइड्रेट रखने पर जोर दिया है तेज धूप और बढ़ते तापमान के कारण शरीर में पानी और जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी तेजी से होने लगती है जिससे थकान चक्कर और कमजोरी जैसी समस्याएं सामने आती हैं ऐसे में ताजे और ठंडे प्राकृतिक जूस शरीर को राहत देने का सबसे आसान और प्रभावी उपाय बनकर सामने आए हैं

    विशेषज्ञों के अनुसार गर्मियों में ऐसे पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए जो शरीर को तुरंत ठंडक पहुंचाने के साथ साथ ऊर्जा भी दें इस लिहाज से तरबूज का रस सबसे लोकप्रिय विकल्प माना जाता है इसमें लगभग 90 प्रतिशत पानी होता है जो शरीर को तुरंत हाइड्रेट करता है और गर्मी से राहत दिलाता है

    इसी तरह नारियल पानी को प्राकृतिक एनर्जी ड्रिंक कहा जाता है इसमें मौजूद पोटेशियम और मिनरल्स शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखते हैं और थकान को दूर करते हैं गर्मियों में नियमित रूप से इसका सेवन शरीर को तरोताजा बनाए रखता है

    नींबू और पुदीना से बना जूस भी बेहद फायदेमंद माना जाता है यह न केवल शरीर का तापमान नियंत्रित करता है बल्कि पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाता है खीरे का जूस शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करता है और पेट को ठंडक पहुंचाता है जिससे गर्मी में होने वाली जलन और एसिडिटी से राहत मिलती है

    पारंपरिक भारतीय पेय जैसे आम पन्ना और कोकम शर्बत भी लू से बचाने में काफी कारगर हैं ये शरीर को ठंडा रखने के साथ साथ ऊर्जा प्रदान करते हैं और हीट स्ट्रोक के खतरे को कम करते हैं वहीं अनानास और संतरे का जूस विटामिन सी से भरपूर होता है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि दिन के किसी भी समय इन जूसों का सेवन किया जा सकता है चाहे सुबह की शुरुआत करनी हो दोपहर की गर्मी से राहत चाहिए या शाम को थकान दूर करनी हो ये सभी विकल्प हर समय लाभकारी हैं खास बात यह है कि इन्हें घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है और इसमें किसी प्रकार के प्रिजर्वेटिव या अतिरिक्त चीनी की जरूरत नहीं होती

    विशेषज्ञ पैकेज्ड और डिब्बाबंद जूस से बचने की सलाह देते हैं क्योंकि इनमें अक्सर अतिरिक्त शुगर और प्रिजर्वेटिव्स होते हैं जो शरीर को नुकसान पहुंचा सकते हैं इसके मुकाबले ताजे फल और सब्जियों से बने जूस अधिक पोषक और सुरक्षित होते हैं

    गर्मियों में स्वस्थ रहने का सबसे सरल तरीका यही है कि शरीर को पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ मिलते रहें और इसके लिए प्राकृतिक जूस एक बेहतरीन विकल्प हैं जो न केवल हाइड्रेशन बनाए रखते हैं बल्कि शरीर को ठंडा और ऊर्जावान भी रखते हैं

  • नवरात्र विशेष: मां भगवती को प्रिय अनार, आस्था के साथ सेहत का भी खजाना

    नवरात्र विशेष: मां भगवती को प्रिय अनार, आस्था के साथ सेहत का भी खजाना


    नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर जहां भक्त मां दुर्गा की आराधना में लीन हैं वहीं पूजा में चढ़ाए जाने वाले फलों का भी विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अनार जिसे संस्कृत में दादिमा कहा जाता है माता भगवती को अत्यंत प्रिय फल माना गया है। लाल-लाल दानों से भरा यह फल न केवल आस्था का प्रतीक है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है।

    धर्म शास्त्रों में अनार को विशेष स्थान दिया गया है। मान्यता है कि सभी फलों में यह देवी को सबसे अधिक प्रिय है और इसे अर्पित करने से सुख-समृद्धि संतान सुख आरोग्य और कर्ज मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। नवरात्रि में अनार चढ़ाने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है जिसे अत्यंत फलदायी माना जाता है।

    अनार की गहरी लाल रंगत शक्ति ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक मानी जाती है। यह रंग मां दुर्गा के शक्तिशाली और रौद्र स्वरूप से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि भक्त नवरात्रि के दौरान विशेष रूप से अनार अर्पित करते हैं ताकि उनके जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहे। धार्मिक मान्यता यह भी है कि इसे चढ़ाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।

    अनार को अखंड फल भी माना जाता है ठीक वैसे ही जैसे नारियल या श्रीफल का धार्मिक महत्व है। कई भक्त इसे विशेष रूप से कर्ज से मुक्ति और परिवार की खुशहाली के लिए माता को अर्पित करते हैं। पूजा-पाठ के साथ-साथ यह फल परिवार के स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है।

    अगर आयुर्वेद की दृष्टि से देखें तो अनार औषधीय गुणों से भरपूर होता है। प्राचीन ग्रंथों विशेषकर 12वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथ मानसोल्लास में इसे पवित्र और स्वास्थ्यवर्धक बताया गया है। यह फल रक्त शुद्ध करने एनीमिया यानी खून की कमी दूर करने पाचन तंत्र को मजबूत बनाने और हृदय रोगों से बचाव में सहायक माना जाता है।

    अनार में भरपूर मात्रा में विटामिन C एंटीऑक्सीडेंट फाइबर और पोटैशियम पाए जाते हैं जो इम्युनिटी बढ़ाने में मदद करते हैं। गर्मी के मौसम में यह शरीर को ठंडक प्रदान करता है और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखता है। अनार का जूस पीने से शरीर में नई ऊर्जा आती है और थकान दूर होती है।

    इस तरह अनार केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं बल्कि स्वास्थ्य का भी महत्वपूर्ण स्रोत है। नवरात्रि के इस पावन पर्व पर इसे अर्पित करना जहां आध्यात्मिक लाभ देता है वहीं इसका सेवन शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखने में भी मदद करता है।

  • नवरात्रि में व्रत क्यों है जरूरी? आयुर्वेद बताता है शरीर और मन का संतुलन

    नवरात्रि में व्रत क्यों है जरूरी? आयुर्वेद बताता है शरीर और मन का संतुलन


    नई दिल्ली। नवरात्रि में व्रत रखना केवल धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरी आयुर्वेदिक सोच भी जुड़ी हुई है। अक्सर लोग इसे सिर्फ पूजा-पाठ और परंपरा से जोड़कर देखते हैं लेकिन आयुर्वेद के अनुसार यह शरीर को अंदर से रीसेट करने और संतुलित करने का एक प्राकृतिक तरीका है।

    दरअसल नवरात्रि ऐसे समय पर आती है जब मौसम बदल रहा होता है। यह संक्रमण काल शरीर के लिए संवेदनशील माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार इस दौरान शरीर में वात और पित्त दोष असंतुलित हो सकते हैं जिससे पाचन तंत्र कमजोर पड़ जाता है और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में व्रत रखने से शरीर को आराम मिलता है और वह खुद को संतुलित करने की प्रक्रिया शुरू करता है।

    नवरात्रि के व्रत में लोग हल्का और सात्विक भोजन जैसे फल कुट्टू सिंघाड़ा दही और साबूदाना लेते हैं। यह भोजन पचने में आसान होता है और पाचन तंत्र पर ज्यादा दबाव नहीं डालता। रोजमर्रा के तले-भुने और मसालेदार खाने से जो अतिरिक्त बोझ शरीर पर पड़ता है वह इस दौरान कम हो जाता है। इससे शरीर को खुद को ठीक करने और ऊर्जा को पुनः संतुलित करने का समय मिलता है।

    आयुर्वेद में पाचन शक्ति जिसे अग्नि कहा जाता है को स्वास्थ्य का आधार माना गया है। जब अग्नि कमजोर होती है तो शरीर में अपच और विषैले तत्व यानी टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं। व्रत रखने से यह अग्नि दोबारा सक्रिय होती है और शरीर में जमा विषैले तत्व बाहर निकलने लगते हैं। यही कारण है कि व्रत के दौरान लोग खुद को हल्का ऊर्जावान और अधिक सक्रिय महसूस करते हैं।

    नवरात्रि का व्रत केवल शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी फायदेमंद होता है। इस दौरान लोग ध्यान पूजा और संयम का पालन करते हैं जिससे मानसिक शांति मिलती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह एक तरह का मेंटल डिटॉक्स बन जाता है जहां व्यक्ति खुद को थोड़ा धीमा करके अंदर से संतुलित करता है।

    इसके अलावा व्रत में खाए जाने वाले सात्विक खाद्य पदार्थ शरीर को जरूरी पोषण देने के साथ-साथ इम्युनिटी बढ़ाने में भी मदद करते हैं। ये खाद्य पदार्थ न केवल हल्के होते हैं बल्कि मौसमी बीमारियों से बचाव में भी सहायक होते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि नवरात्रि का व्रत शरीर और मन दोनों को संतुलित करने का एक प्राकृतिक और प्रभावी तरीका है। यह परंपरा हमें न सिर्फ आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाती है बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहद लाभकारी साबित होती है।