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  • चीनी की किल्लत के बीच सरकार बोली- हमारे पास 20-25 लाख टन का अतिरिक्त स्टॉक… आयात की भी तैयारी

    चीनी की किल्लत के बीच सरकार बोली- हमारे पास 20-25 लाख टन का अतिरिक्त स्टॉक… आयात की भी तैयारी


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में चीनी की किल्लत (Sugar Crisis) की खबरों के बीच अब सरकार (Government) एक्शन मोड में आ गई है। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी (Pralhad Joshi) ने रविवार को कहा है कि त्योहारों के मौसम से पहले चीनी की उपलब्धता और बढ़ती कीमतों को लेकर चिंताओं को दूर करने के लिए केंद्र सरकार कई कदम उठा रही है। जोशी ने कहा कि रेड रॉट (गन्ने की फसल में होने वाली बीमारी) और अल नीनो की स्थितियों के कारण चीनी के उत्पादन में कमी आई है। इससे न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में चीनी सहित कुल कृषि उत्पादन में कमी आई है।

    केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि सरकार इसे लेकर चिंतित है और इसीलिए सरकार ने तुरंत कई कदम उठाए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी बताया है कि भारत की जरूरत लगभग 280 लाख टन है और आज की स्थिति में हमारे पास 20 से 25 लाख टन से ज्यादा का अतिरिक्त स्टॉक है।


    ब्राजील से आएगी चीनी

    वहीं सहकारी चीनी मिलों की संस्था एनएफसीएसएफ के प्रमुख ने कहा कि भारत आने वाली चीनी की कुछ खेप 15 अक्तूबर से पहले देश में पहुंच सकती है। हालांकि अभी इसकी सही मात्रा का अंदाजा लगाना मुश्किल है। वहीं, जमाखोरी के खिलाफ सरकार की सख्ती से कीमतों में कुछ कमी आने लगी है।

    एनएफसीएसएफ के अध्यक्ष प्रकाश नाइकनवारे ने रविवार को बताया कि फिलहाल आयात के लिए ब्राजील ही एकमात्र व्यावहारिक स्रोत है, क्योंकि पारंपरिक आपूर्तिकर्ता थाईलैंड खुद चीनी की कमी से जूझ रहा है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में सप्लाई सबसे पहले पहुंचेगी। ब्राजील से भारत तक सामान आने में 40-45 दिन लगते हैं।


    कीमतों में आ रही गिरावट

    नायकनवरे ने कहा कि केंद्रीय खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने फेडरेशन और इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। उन्होंने बाजार में पर्याप्त सप्लाई सुनिश्चित करने और कीमतों पर रोक लगाने का निर्देश दिया था। इससे पहले चीनी की कीमत 65-67 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई थी, हालांकि शनिवार को खुले टेंडरों में 5 रुपये प्रति किलोग्राम तक गिर गई।

  • पेट्रोल के बाद अब खाद्य तेल ने बढ़ाई महंगाई, आयात बिल 1.75 लाख करोड़ पार होने का अनुमान, रसोई का बजट फिर बिगड़ने के आसार

    पेट्रोल के बाद अब खाद्य तेल ने बढ़ाई महंगाई, आयात बिल 1.75 लाख करोड़ पार होने का अनुमान, रसोई का बजट फिर बिगड़ने के आसार

    नई दिल्ली। पेट्रोल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के बीच अब खाद्य तेलों की महंगाई ने आम लोगों की रसोई का बजट भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है। सरसों, सोयाबीन, मूंगफली और अन्य खाद्य तेलों की कीमतों में हाल के दिनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की कमजोरी, आयात लागत में बढ़ोतरी और घरेलू उत्पादन की सीमित उपलब्धता के कारण खाद्य तेलों की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। आगामी त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने की संभावना के चलते कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

    देश में खाद्य तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। उद्योग से जुड़े संगठनों के अनुसार पिछले वर्ष भारत का खाद्य तेल आयात बिल लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये रहा था, जबकि मौजूदा वित्तीय वर्ष में इसके बढ़कर 1.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आयात पर अत्यधिक निर्भरता देश के लिए आर्थिक चुनौती बनती जा रही है और इस स्थिति से निपटने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देना आवश्यक है।

    बाजार में विभिन्न खाद्य तेलों की कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई है। सरसों तेल के भाव में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि सोयाबीन तेल, मूंगफली तेल और अन्य खाद्य तेलों के दाम भी ऊपर गए हैं। कारोबारियों के अनुसार सरसों की मांग बढ़ने और मंडियों में सीमित आवक के कारण कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना है। वहीं सोयाबीन की आवक में कमी आने से उससे जुड़े उत्पाद भी महंगे हुए हैं। इसका सीधा असर खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है।

    उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को दीर्घकालिक समाधान के रूप में तिलहन उत्पादन बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके लिए बेहतर बीज, आधुनिक खेती, प्रसंस्करण क्षमता और किसानों को प्रोत्साहन देने जैसी योजनाओं को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि यदि घरेलू उत्पादन बढ़ता है तो आयात पर निर्भरता कम होगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और उपभोक्ताओं को कीमतों में स्थिरता का लाभ मिलेगा।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि वैश्विक बाजार में कच्चे खाद्य तेलों की कीमतों, शिपिंग लागत और विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारतीय बाजार पर पड़ता है। डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आने से आयातित खाद्य तेल और महंगे हो जाते हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भी घरेलू कीमतों को प्रभावित करती हैं।

    हालांकि बाजार विश्लेषकों का कहना है कि भविष्य में कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, वैश्विक आपूर्ति, मौसम और सरकार की नीतियों पर निर्भर करेगी। यदि तिलहन की अच्छी पैदावार होती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर रहती हैं तो खाद्य तेलों की महंगाई पर कुछ हद तक नियंत्रण संभव है। फिलहाल उपभोक्ताओं को बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ रहा है और आने वाले महीनों में बाजार की स्थिति पर सभी की नजर बनी रहेगी।

  • जब कीमतें आसमान थी,,, सोने ने तोड़ डाले आयात के सभी रिकॉर्ड, व्यापार घाटा भी बढ़ा

    जब कीमतें आसमान थी,,, सोने ने तोड़ डाले आयात के सभी रिकॉर्ड, व्यापार घाटा भी बढ़ा


    नई दिल्ली।
    जनवरी में जब सोने-चांदी की कीमतें (Gold and Silver Prices) आसमान पर थी सोने के आयात (Gold Import) ने तो सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए, जो पिछले साल जनवरी के 2.66 अरब डॉलर के मुकाबले इस बार 350 प्रतिशत बढ़कर 12 अरब डॉलर पर पहुंच गया। दूसरी ओर, इसने भारत के व्यापार घाटे (Trade Deficits) पर बड़ा इंपैक्ट डाला। भारत का व्यापार घाटा जनवरी 2026 में बढ़कर 35 अरब डॉलर हो गया है। यह आंकड़ा दिसंबर में दर्ज 24 अरब डॉलर से कहीं अधिक है।


    सोने की चमक ने बढ़ाई व्यापार घाटे की टेंशन

    सोने का आयात भारत के व्यापार घाटे में उतार-चढ़ाव की एक अहम वजह बनकर उभरा है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों से साफ होता है कि बढ़ती सोने की कीमतों ने आयात बिल को काफी प्रभावित किया है। पिछले छह वर्षों में सोने के आयात मूल्य में 76 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि हुई है, जो वित्त वर्ष 2018-19 में 32.9 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 58.0 अरब डॉलर हो गया।


    आयात की मात्रा घटी, बिल बढ़ा

    हैरानी की बात यह है कि इस दौरान आयात की मात्रा में 23 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो 982.7 टन से घटकर 757.1 टन रह गई। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह एक संरचनात्मक बदलाव को दर्शाता है, जहां कीमतों में बढ़ोतरी आयात बिल बढ़ाने की मुख्य वजह है, न कि ज्यादा खपत।

    चालू वित्त वर्ष के अप्रैल-दिसंबर के दौरान ही सोने का आयात बिल 49.39 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि इस दौरान सिर्फ 474.99 टन सोना आयात किया गया। अप्रैल-जनवरी की अवधि में यह आंकड़ा 61.46 अरब डॉलर हो गया। नवंबर में सोने के आयात के आंकड़ों में भी भारी संशोधन देखने को मिला था, जो शुरुआती 14.8 अरब डॉलर से घटाकर 9.84 अरब डॉलर कर दिया गया था, जो इसकी अस्थिरता को रेखांकित करता है।


    चांदी के आयात में भी जोरदार उछाल

    सोने के साथ-साथ चांदी के आयात ने भी रफ्तार पकड़ी है। चालू वित्त वर्ष के अप्रैल-दिसंबर के दौरान चांदी के आयात मूल्य में 128.95 प्रतिशत का उछाल आया है। यह 3.39 अरब डॉलर से बढ़कर 7.77 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इसकी वजह आयात की मात्रा में 56.07 प्रतिशत और कीमतों में 46.69 प्रतिशत की बढ़ोतरी बताई जा रही है।


    अमेरिका और चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते

    टैरिफ के दबाव के बावजूद, अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात स्थल बना हुआ है। अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के दौरान अमेरिका को निर्यात लगभग 6 प्रतिशत बढ़कर 72.46 अरब डॉलर रहा। हालांकि, दिसंबर की तुलना में जनवरी में अमेरिका को निर्यात में 4.5 प्रतिशत की गिरावट जरूर आई है। वहीं, चीन भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत बना हुआ है। अप्रैल-जनवरी के दौरान चीन से आयात 13 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 108.18 अरब डॉलर हो गया। सकारात्मक पहलू यह है कि इसी अवधि में चीन को निर्यात में भी 38 प्रतिशत से अधिक की उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और यह 15.88 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

  • अडानी ग्रुप की कंपनी से US की एजेंसी ने मांगी ईरान से पेट्रोलियम उत्पादों के आयात को लेकर जानकारी

    अडानी ग्रुप की कंपनी से US की एजेंसी ने मांगी ईरान से पेट्रोलियम उत्पादों के आयात को लेकर जानकारी


    वाशिंगटन।
    गौतम अडानी समूह (Gautam Adani Group) की प्रमुख कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) (Adani Enterprises Limited (AEL) ने मंगलवार को कहा कि एक अमेरिकी एजेंसी (American agency) ने प्रतिबंधित इकाइयों के साथ लेनदेन की गैर-आपराधिक जांच के तहत ईरान से पेट्रोलियम उत्पादों के कथित आयात को लेकर कंपनी से जानकारी मांगी है।


    क्या कहा अडानी एंटरप्राइजेज ने?

    अडानी एंटरप्राइजेज ने शेयर बाजार को बताया कि उसे चार फरवरी को अमेरिकी वित्त विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय (ओएफएसी) से सूचना का अनुरोध मिला है। यह अनुरोध जून, 2025 में वॉल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के संबंध में हुई स्वैच्छिक चर्चा के बाद आया है। उस रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि अडानी से जुड़ी कंपनियों ने अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए शिपिंग मार्गों का उपयोग करके भारत में ईरानी तरल पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का आयात किया था। अडानी एंटरप्राइजेज ने कहा-कंपनी स्वेच्छा से विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय के साथ सहयोग कर रही है और मांगी गई जानकारी देगी। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिकी प्राधिकरण से प्राप्त संचार में ‘किसी भी प्रकार के उल्लंघन या गैर-अनुपालन का कोई निष्कर्ष शामिल नहीं है।


    पिछले साल आई थी रिपोर्ट

    पिछले साल जून में आई रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अमेरिकी अभियोजक इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या अडानी समूह की कंपनियों ने गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह के माध्यम से ईरानी एलपीजी का आयात किया था। अडानी समूह ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा था कि नीतिगत रूप से अडानी समूह अपने किसी भी बंदरगाह पर ईरान के किसी भी माल का प्रबंधन नहीं करता है। इसमें ईरान से आने वाली कोई भी खेप या ईरानी ध्वज के तहत चलने वाले जहाज शामिल हैं। समूह ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ऐसे किसी जहाज का प्रबंधन या सुविधा प्रदान नहीं करता है, जिनके मालिक ईरानी हों।