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  • संयुक्त राष्ट्र में भारत की दमदार पैरवी शांति निर्माण के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व और समान साझेदारी पर दिया जोर

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की दमदार पैरवी शांति निर्माण के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व और समान साझेदारी पर दिया जोर


    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र महासभा में आयोजित उच्चस्तरीय बहस के दौरान भारत ने वैश्विक शांति निर्माण को लेकर अपना स्पष्ट और दूरदर्शी दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने कहा कि किसी भी देश में स्थायी शांति तभी स्थापित की जा सकती है जब उसकी अगुवाई स्वयं उस देश के नेतृत्व के हाथों में हो और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बराबरी सम्मान तथा विश्वास के आधार पर आगे बढ़े। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब पारंपरिक दाता और प्राप्तकर्ता वाले मॉडल से आगे बढ़ने का समय आ गया है।

    पी हरीश ने संयुक्त राष्ट्र में पहले पीसबिल्डिंग वीक के दौरान आयोजित शांति निर्माण आयोग के वार्षिक सत्र और संयुक्त राष्ट्र महासभा की उच्चस्तरीय बहस में भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि शांति निर्माण की पूरी प्रक्रिया मांग आधारित होनी चाहिए। इसका उद्देश्य संबंधित देशों की वास्तविक जरूरतों और प्राथमिकताओं के अनुरूप समाधान तैयार करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका सहयोगी की होनी चाहिए न कि निर्णय थोपने वाले पक्ष की।

    उन्होंने कहा कि किसी भी शांति निर्माण अभियान की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब वह संबंधित देश की संस्थागत क्षमता को मजबूत करे और भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए उसे आत्मनिर्भर बनाए। मजबूत संस्थाएं और सक्षम प्रशासन ही दीर्घकालिक शांति की सबसे बड़ी गारंटी हैं।

    भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण संरचना के बीस वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अवधि में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल हुई हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र की शांति निर्माण व्यवस्था की चौथी समीक्षा पहली राष्ट्रीय शांति निर्माण रणनीति की प्रस्तुति और पीसबिल्डिंग फंड के साथ पहला वार्षिक रणनीतिक संवाद शामिल है। उन्होंने इन पहलों को वैश्विक शांति प्रयासों के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया।

    उन्होंने यह भी चिंता जताई कि पिछले तीन वर्षों में पीसबिल्डिंग फंड के लिए स्वैच्छिक योगदान में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा वित्तीय स्थिति का भी शांति निर्माण कार्यक्रमों पर असर पड़ा है। भारत का मानना है कि सीमित संसाधनों का उपयोग सबसे अधिक उन देशों में किया जाना चाहिए जो संघर्ष के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। इससे उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।

    पी हरीश ने कहा कि इस वर्ष आयोजित पीसबिल्डिंग वीक की थीम नवाचार समावेशन और प्रभाव के लिए साझेदारी वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में बेहद प्रासंगिक है। भारत भरोसे और समानता पर आधारित साझेदारी को शांति निर्माण की सबसे मजबूत नींव मानता है। उन्होंने कहा कि ऐसी साझेदारी तभी सफल होगी जब राष्ट्रीय स्वामित्व हर प्रक्रिया का मूल सिद्धांत बना रहेगा।

    भारत ने महिलाओं की भूमिका को भी शांति निर्माण का महत्वपूर्ण आधार बताया। पी हरीश ने हाल ही में भारत की मेजर अभिलाषा बराक को वर्ष 2025 का मिलिट्री जेंडर एडवोकेट ऑफ द ईयर सम्मान मिलने का उल्लेख करते हुए कहा कि यह महिलाओं शांति और सुरक्षा के प्रति भारत की मजबूत प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि भारत अपने राष्ट्र निर्माण के अनुभव और विकास मॉडल को दुनिया के साथ साझा करने के लिए पूरी तरह तैयार है तथा वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए सभी साझेदार देशों के साथ मिलकर काम करता रहेगा।

  • संयुक्त राष्ट्र में भारत का बड़ा संदेश 2030 तक एड्स को खत्म करने के वैश्विक संकल्प का समर्थन

    संयुक्त राष्ट्र में भारत का बड़ा संदेश 2030 तक एड्स को खत्म करने के वैश्विक संकल्प का समर्थन


    नई दिल्ली । संयुक्त राष्ट्र में आयोजित एचआईवी और एड्स पर उच्चस्तरीय बैठक में भारत ने वैश्विक एकजुटता और सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए वर्ष 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी हरीश ने इस अवसर पर भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर एचआईवी और एड्स के खिलाफ लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और इस दिशा में सामूहिक प्रयासों को और मजबूत करने की जरूरत है।

    भारत ने बैठक में प्रस्तुत राजनीतिक घोषणा पत्र में व्यक्त वैश्विक एकजुटता की भावना का समर्थन करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों में एचआईवी संक्रमण और एड्स से होने वाली मौतों को कम करने में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। हालांकि अभी भी असमानताओं, वित्तीय संसाधनों की कमी और नई वैश्विक चुनौतियों के कारण इस दिशा में हासिल उपलब्धियों पर खतरा बना हुआ है।

    पी हरीश ने कहा कि भारत वर्ष 2030 तक एड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरे के रूप में समाप्त करने और उसके बाद भी इस क्षेत्र में प्रगति बनाए रखने के संकल्प के साथ पूरी मजबूती से खड़ा है। उन्होंने बताया कि भारत इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए राष्ट्रीय एड्स एवं यौन संचारित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के माध्यम से व्यापक स्तर पर कार्य कर रहा है। यह कार्यक्रम वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित योजना, सामुदायिक सहभागिता और एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित है।

    भारत ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि लगातार घरेलू निवेश और योजनाबद्ध प्रयासों की बदौलत देश में नए एचआईवी संक्रमण और एड्स से संबंधित मौतों में उल्लेखनीय कमी आई है। साथ ही रोकथाम, जांच, उपचार, देखभाल और परामर्श सेवाओं तक लोगों की पहुंच भी पहले की तुलना में काफी बढ़ी है।

    बैठक में भारत ने देश-आधारित रणनीतियों और टिकाऊ वित्तपोषण के महत्व को भी रेखांकित किया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि प्रत्येक देश को अपनी स्थानीय परिस्थितियों और महामारी की प्रकृति के अनुरूप रणनीति तैयार करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इसके साथ ही मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और पूर्वानुमेय वित्तीय सहायता भी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि लंबे समय तक सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए जा सकें।

    भारत ने गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए अपनाई जा रही अपनी ट्रिपल एलिमिनेशन रणनीति का भी उल्लेख किया। इस पहल के तहत गर्भवती महिलाओं में एचआईवी, सिफलिस और हेपेटाइटिस-बी की सार्वभौमिक जांच, समय पर उपचार और संक्रमित बच्चों की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जा रही है। भारत ने बच्चों में एड्स को समाप्त करने और संक्रमण के मातृ-शिशु प्रसार को रोकने के वैश्विक प्रयासों का भी समर्थन किया।

    इसके अलावा भारत ने एचआईवी, तपेदिक, वायरल हेपेटाइटिस और अन्य सह-संक्रमणों के खिलाफ एकीकृत स्वास्थ्य रणनीति अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत का मानना है कि ऐसी समेकित व्यवस्था स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाने के साथ-साथ संसाधनों के प्रभावी उपयोग में भी मदद करती है।

    भारत ने बैठक में सस्ती दवाओं, जांच सुविधाओं और नई चिकित्सा तकनीकों तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता को भी प्रमुखता से उठाया। भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि विश्व व्यापार संगठन के टीआरआईपीएस समझौते के अंतर्गत उपलब्ध लचीले प्रावधानों का उपयोग विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, ताकि जीवनरक्षक दवाओं और स्वास्थ्य उत्पादों तक आम लोगों की पहुंच सुनिश्चित की जा सके।

    संयुक्त राष्ट्र में भारत की यह पहल वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा, समान स्वास्थ्य सेवाओं और एड्स मुक्त भविष्य के लिए उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। भारत ने स्पष्ट किया कि वह आने वाले वर्षों में भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर एचआईवी और एड्स के खिलाफ इस लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाता रहेगा।