Tag: India-Bangladesh Relations

  • बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षा पर बड़ा बयान: मंत्री ने दी इस्तीफे की चेतावनी, हिंदू हिंसा के दावों से बढ़ा तनाव

    बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षा पर बड़ा बयान: मंत्री ने दी इस्तीफे की चेतावनी, हिंदू हिंसा के दावों से बढ़ा तनाव



    नई दिल्ली। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। देश के धार्मिक मामलों के मंत्री काजी शाह मोफज्जल हुसैन कैकोबाद ने स्पष्ट कहा है कि वे अल्पसंख्यकों पर किसी भी तरह के अत्याचार या भेदभाव को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे और अगर जरूरत पड़ी तो अपने पद से इस्तीफा देने से भी पीछे नहीं हटेंगे। यह बयान उन्होंने ढाका में बांग्लादेश सेक्रेटेरिएट रिपोर्टर्स फोरम (BSRF) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दिया।

    मंत्री ने कहा कि देश में सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार और सुरक्षा मिलनी चाहिए और किसी भी समुदाय के खिलाफ हिंसा को राज्य स्तर पर गंभीरता से लिया जाएगा। उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी दूसरे देश में होने वाली घटनाओं के आधार पर बांग्लादेश में किसी भी समुदाय के खिलाफ प्रतिक्रिया या हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू समुदाय के खिलाफ कथित हमलों को लेकर विभिन्न संगठनों द्वारा चिंता जताई जा रही है। बांग्लादेश हिंदू-बौद्ध-ईसाई एकता परिषद (BHBCUC) के अनुसार, 4 अगस्त 2024 से 30 जून 2025 के बीच देश में 2,400 से अधिक सांप्रदायिक घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें हिंसा, घरों और संपत्तियों पर हमले और अन्य विवाद शामिल बताए गए हैं।

    वहीं, कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में भी अल्पसंख्यक समुदाय पर हमलों में वृद्धि का दावा किया गया है, हालांकि सरकार की ओर से कई मामलों को स्थानीय विवाद या आपराधिक घटनाएं बताकर खारिज किया गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। कुछ कट्टरपंथी समूहों की ओर से क्षेत्रीय स्तर पर तनावपूर्ण टिप्पणियां सामने आई हैं, जिससे हालात और संवेदनशील बन गए हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि वह सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी तरह की सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षा का मुद्दा केवल घरेलू नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति से भी जुड़ गया है, खासकर भारत-बांग्लादेश संबंधों के संदर्भ में। ऐसे में दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग इस मुद्दे को स्थिर करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

    फिलहाल स्थिति यह है कि सरकार की ओर से सख्त संदेश के बावजूद अल्पसंख्यक सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है और इस मुद्दे पर निगरानी और संवाद दोनों की जरूरत महसूस की जा रही है।

  • भारत से दोस्ती, पाकिस्तान से नजदीकी! जानिए बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान की नई ‘बैलेंस’ रणनीति

    भारत से दोस्ती, पाकिस्तान से नजदीकी! जानिए बांग्लादेशी पीएम तारिक रहमान की नई ‘बैलेंस’ रणनीति



    नई दिल्ली। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की विदेश नीति इन दिनों चर्चा में है। बांग्लादेश की नई सरकार एक तरफ India के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ भी नजदीकियां बनाए रखना चाहती है। अमेरिकी भू-राजनीतिक विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने इसे “बैलेंसिंग स्ट्रेटेजी” बताया है।

    विश्लेषकों के मुताबिक बांग्लादेश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए भारत के साथ बेहतर संबंध बेहद जरूरी हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत के साथ मजबूत व्यापारिक और रणनीतिक रिश्ते ढाका के लिए आर्थिक फायदे ला सकते हैं। साथ ही सीमा सुरक्षा, बिजली साझेदारी और साझा नदियों जैसे मुद्दों पर सहयोग भी बांग्लादेश के हित में माना जा रहा है।

    पाकिस्तान से दूरी भी नहीं चाहता ढाका
    रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश पाकिस्तान के साथ भी रिश्तों में गर्मजोशी बनाए रखना चाहता है। हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच वीजा नियमों में ढील और यात्रा संपर्क बढ़ाने जैसे कदम उठाए गए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय सहयोग के लिए दक्षिण एशियाई संघ यानी सार्क को मजबूत करने, “ग्लोबल साउथ” के साथ जुड़ाव बढ़ाने और तुर्की जैसी मध्यम ताकतों के साथ तालमेल जैसे मुद्दों पर ढाका और इस्लामाबाद की सोच काफी हद तक मिलती है।

    भारत विरोधी भावना का भी असर
    विश्लेषक माइकल कुलेगमैन का कहना है कि बांग्लादेश की राजनीति में भारत विरोधी भावना रखने वाला एक बड़ा वर्ग मौजूद है। ऐसे में पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रिश्ते बनाए रखना घरेलू राजनीति में भी तारिक रहमान सरकार को फायदा पहुंचा सकता है।हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर ढाका वास्तव में भारत के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है तो पाकिस्तान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना जोखिम भरा कदम हो सकता है।

    ‘दोनों से फायदा’ चाहती है बांग्लादेश सरकार
    रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश ऐसी विदेश नीति अपनाना चाहता है जिसमें भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ संबंध बने रहें और किसी भी पक्ष को नाराज न किया जाए। ढाका का फोकस आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय संतुलन और रणनीतिक फायदे हासिल करने पर है।विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में बांग्लादेश की यही संतुलन नीति दक्षिण एशिया की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकती है।

  • बंगाल की सियासत से ढाका तक हलचल! BJP की संभावित जीत पर खुश BNP, क्या अब सुलझेगा 10 साल पुराना तीस्ता विवाद?

    बंगाल की सियासत से ढाका तक हलचल! BJP की संभावित जीत पर खुश BNP, क्या अब सुलझेगा 10 साल पुराना तीस्ता विवाद?



    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत और भारत-बांग्लादेश रिश्तों को लेकर एक नया दिलचस्प मोड़ सामने आया है। बांग्लादेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने पश्चिम बंगाल में BJP की संभावित जीत पर खुशी जताई है और इसे दोनों देशों के रिश्तों के लिए सकारात्मक संकेत बताया है।

    BNP के सूचना सचिव अजीजुल बारी हेलाल ने कहा कि अगर पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होता है, तो भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से अटका तीस्ता नदी जल बंटवारा समझौता आगे बढ़ सकता है। उन्होंने सीधे तौर पर ममता बनर्जी सरकार को इस समझौते में सबसे बड़ी बाधा बताया। उनका कहना है कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार और बांग्लादेश, दोनों ही इस समझौते को अंतिम रूप देना चाहते थे, लेकिन राज्य स्तर पर सहमति नहीं बन पाई।

    BNP नेताओं को उम्मीद है कि अगर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बनती है, तो भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई गति आएगी और सीमा व जल विवाद जैसे मुद्दों पर प्रगति हो सकती है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति दोनों देशों के रिश्तों में अहम भूमिका निभाती है, क्योंकि बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी सीमा इसी राज्य की लगती है।

    इस पूरे विवाद के केंद्र में है तीस्ता नदी, जो हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश पहुंचती है। इस नदी पर दोनों देशों के करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर है। बांग्लादेश लंबे समय से इस नदी के 50% पानी की मांग करता रहा है, जबकि भारत भी अपने हिस्से को लेकर संतुलन बनाए रखना चाहता है।

    तीस्ता जल बंटवारे को लेकर प्रयास कई बार हुए, लेकिन हर बार सहमति बनने से पहले ही मामला अटक गया। 2011 में एक प्रस्ताव तैयार हुआ था, जिसमें बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की बात थी, लेकिन उस समय भी ममता बनर्जी के विरोध के चलते समझौता आगे नहीं बढ़ पाया।

    राज्य सरकार का तर्क रहा है कि तीस्ता नदी में पहले ही पानी का प्रवाह कम हो चुका है और अगर अतिरिक्त पानी साझा किया गया, तो उत्तर बंगाल में सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा सकता है। यही वजह है कि राज्य स्तर पर इस मुद्दे पर लगातार आपत्ति जताई जाती रही है।

    गौरतलब है कि भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 54 साझा नदियां हैं, लेकिन अब तक सिर्फ गंगा और कुशियारा नदी पर ही औपचारिक समझौते हो पाए हैं। तीस्ता नदी का मुद्दा अब भी दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा लंबित जल विवाद बना हुआ है।

    कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल की राजनीति का असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत-बांग्लादेश के कूटनीतिक रिश्तों पर भी पड़ता है। अब देखना होगा कि आने वाले समय में सियासी समीकरण बदलते हैं या फिर तीस्ता का यह विवाद यूं ही अधूरा रह जाता है।

  • पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद बदलेगा समीकरण, तीस्ता जल विवाद सुलझने की उम्मीद..

    पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद बदलेगा समीकरण, तीस्ता जल विवाद सुलझने की उम्मीद..

    ढाका। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत के बाद इसका असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देखने को मिल रहा है। इस राजनीतिक बदलाव ने भारत और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से लंबित जल विवादों के समाधान को लेकर नई उम्मीदें जगा दी हैं।

    बांग्लादेश की सत्ताधारी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने भाजपा को जीत पर बधाई देते हुए इसे द्विपक्षीय संबंधों के लिए सकारात्मक संकेत बताया है। पार्टी के सूचना सचिव अजीजुल बारी हेलाल ने शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा के प्रदर्शन की सराहना की और उम्मीद जताई कि इससे दोनों पक्षों के रिश्ते और मजबूत होंगे। बीएनपी का मानना है कि नई राजनीतिक परिस्थिति से ढाका और कोलकाता के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाने में मदद मिल सकती है। खासतौर पर तीस्ता नदी जल बंटवारा समझौते को लेकर नई प्रगति की संभावना जताई गई है।

    तीस्ता विवाद पर ममता पर आरोप
    बीएनपी ने अपने बयान में ममता बनर्जी और उनकी सरकार को तीस्ता समझौते में देरी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। पार्टी का आरोप है कि पिछली राज्य सरकार के रुख के कारण यह संधि लंबे समय से अटकी हुई है। अब बीएनपी को उम्मीद है कि भाजपा सरकार केंद्र के साथ समन्वय कर इस समझौते को आगे बढ़ाएगी। उनका कहना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद तीस्ता बैराज परियोजना को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।

    पुराना है जल बंटवारे का मुद्दा
    भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 54 नदियां साझा हैं, लेकिन अब तक सिर्फ दो जल समझौते ही हो सके हैं—गंगा जल संधि और कुशियारा नदी संधि। 1996 की गंगा जल संधि के तहत फरक्का बैराज पर पानी के बंटवारे को नियंत्रित किया जाता है, हालांकि बांग्लादेश समय-समय पर कम पानी मिलने की शिकायत करता रहा है।

    तीस्ता नदी को लेकर 1983 में एक अस्थायी समझौता हुआ था, जिसमें बांग्लादेश को 36% और भारत को 39% पानी देने की बात कही गई थी, लेकिन यह पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। बाद में 2011 में मनमोहन सिंह की बांग्लादेश यात्रा के दौरान नए प्रस्ताव पर चर्चा हुई, लेकिन राज्य सरकार के विरोध के चलते यह समझौता भी अधूरा रह गया।

    वैचारिक अंतर के बावजूद सहयोग की उम्मीद
    बीएनपी नेता हेलाल ने यह भी कहा कि भले ही बीएनपी और भाजपा के बीच वैचारिक अंतर हो, लेकिन राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि तीस्ता जल विवाद और द्विपक्षीय संबंध जैसे मुद्दों पर दोनों पक्ष सहयोग कर सकते हैं। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल में नई सरकार बनने के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तेजी आने की संभावना है, जिससे लंबे समय से लंबित मुद्दों के समाधान का रास्ता साफ हो सकता है।

  • बंगाल में BJP की बढ़त से बांग्लादेश में बढ़ी बेचैनी, ‘घुसपैठ’ पर क्या शुरू होगा नया विवाद?

    बंगाल में BJP की बढ़त से बांग्लादेश में बढ़ी बेचैनी, ‘घुसपैठ’ पर क्या शुरू होगा नया विवाद?


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के रुझानों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की बढ़त ने भारत के साथ-साथ बांग्लादेश में भी सियासी हलचल तेज कर दी है। चुनाव परिणामों पर नजर रख रहे बांग्लादेश के नेताओं ने पहले ही संभावित स्थिति को लेकर चिंता जताई थी, जो अब फिर चर्चा में है। सवाल उठ रहा है कि अगर बंगाल में BJP सरकार बनाती है, तो क्या अवैध प्रवासियों यानी कथित ‘घुसपैठियों’ पर कार्रवाई तेज होगी और इससे भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।

    दरअसल, बांग्लादेश की राजनीति में यह मुद्दा पहले ही उठ चुका है। बांग्लादेश की एक पार्टी के सांसद अख्तर हुसैन ने संसद में आशंका जताई थी कि अगर पश्चिम बंगाल में BJP सत्ता में आती है, तो भारत में रह रहे बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजा जा सकता है। उनके मुताबिक, ऐसा होने पर बांग्लादेश को एक बड़े शरणार्थी संकट का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि “प्रवासियों का सैलाब” देश में लौट सकता है, जिससे हालात बिगड़ सकते हैं।

    भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का केंद्र रहा है। BJP लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है और अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात करती रही है। ऐसे में बंगाल में उसकी संभावित जीत को इस नीति से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि जमीनी स्तर पर यह प्रक्रिया इतनी आसान नहीं है।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2001 में भारत में करीब 1.2 करोड़ अवैध बांग्लादेशी प्रवासी होने का अनुमान था। वहीं, कुछ स्वतंत्र रिपोर्ट्स के अनुसार यह संख्या 2026 तक 1.5 से 2 करोड़ के बीच हो सकती है। पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर और दक्षिण 24 परगना में जनसंख्या बदलाव को अक्सर इस मुद्दे से जोड़कर देखा जाता है।

    लेकिन असली चुनौती इन लोगों की पहचान को लेकर है। बड़ी संख्या में लोग फर्जी दस्तावेजों के जरिए खुद को भारतीय नागरिक साबित कर चुके हैं, जिससे उन्हें चिन्हित करना बेहद मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, अगर भारत इन्हें वापस भेजना चाहता है, तो बांग्लादेश की सहमति जरूरी होगी। अगर ढाका इन लोगों को अपना नागरिक मानने से इनकार करता है, तो यह मामला और जटिल हो सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल कानून या प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है। बांग्लादेश इस मुद्दे को अपनी संप्रभुता और सम्मान से जोड़कर देखता है, जबकि भारत इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन के नजरिए से देखता है।

    2024 के बाद बांग्लादेश की राजनीति में आए बदलाव के चलते वहां की सरकार पर घरेलू दबाव भी बढ़ा है कि वह भारत के प्रति सख्त रुख अपनाए। हालांकि, नई सरकार की ओर से भारत के साथ संबंध सामान्य रखने के संकेत भी दिए गए हैं, लेकिन ‘घुसपैठ’ का मुद्दा दोनों देशों के बीच एक संवेदनशील और संभावित विवाद का कारण बन सकता है।

    ऐसे में बंगाल चुनाव के नतीजे सिर्फ एक राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसके असर क्षेत्रीय राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी पड़ सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह मुद्दा सियासी बयानबाजी तक सीमित रहता है या वास्तव में किसी बड़े कूटनीतिक टकराव का रूप लेता है।

  • भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर असम की सियासत का साया, बयानबाजी से बढ़ा तनाव

    भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर असम की सियासत का साया, बयानबाजी से बढ़ा तनाव


    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। एक ओर नई दिल्ली कूटनीतिक स्तर पर संबंधों को सुधारने की कोशिश में जुटी है, वहीं असम से उठ रही राजनीतिक बयानबाजी ने माहौल में तल्खी घोल दी है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि चुनावी सियासत कहीं दोनों देशों के बीच बनी नई समझ को फिर से नुकसान न पहुंचा दे।

    दरअसल, बांग्लादेश ने हाल ही में भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया। यह कदम हिमंत बिस्वा सरमा की उन टिप्पणियों के बाद उठाया गया, जिन्हें ढाका ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए नुकसानदायक बताया। बांग्लादेशी अधिकारियों ने साफ कहा कि इस तरह के बयान दोनों देशों के बीच विश्वास को कमजोर करते हैं, खासकर ऐसे समय में जब रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश हो रही है।

    पिछले कुछ समय में ढाका और नई दिल्ली के बीच रिश्तों में सुधार के संकेत मिले थे, लेकिन असम में बांग्लादेश को लेकर लगातार हो रही बयानबाजी ने इस प्रक्रिया को झटका दिया है। सीमा पार घुसपैठ, अवैध प्रवास और सुरक्षा जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं, लेकिन इन्हें लेकर सार्वजनिक मंचों से दिए जा रहे तीखे बयान अब कूटनीतिक तनाव का कारण बनते जा रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध सिर्फ सीमा विवाद या राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं हैं। दोनों देश दुनिया की सबसे संवेदनशील और घनी आबादी वाली सीमाओं में से एक साझा करते हैं, जहां नदियों के जल बंटवारे से लेकर तस्करी और सुरक्षा तक कई मुद्दे आपसी सहयोग पर निर्भर करते हैं।

    नई दिल्ली के रणनीतिक हलकों में यह समझ बढ़ी है कि बांग्लादेश भारत की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ का अहम स्तंभ है। इसी सोच के तहत केंद्र सरकार रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दे रही है और कूटनीतिक स्तर पर बड़े कदम भी उठा रही है। लेकिन राज्य स्तर की राजनीति अगर लगातार विपरीत संकेत देती रही, तो इससे भारत की क्षेत्रीय छवि और रणनीतिक हितों को नुकसान हो सकता है।

    फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केंद्र और राज्य की अलग-अलग राजनीतिक लाइनें इस रिश्ते को फिर से कमजोर कर देंगी? क्योंकि मौजूदा वैश्विक हालात में भारत के लिए अपने पड़ोसियों के साथ स्थिर और सहयोगपूर्ण संबंध बनाए रखना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

  • सरमा के बयान से भड़का कूटनीतिक विवाद: बांग्लादेश ने भारत के उच्चायुक्त को तलब कर जताया कड़ा विरोध

    सरमा के बयान से भड़का कूटनीतिक विवाद: बांग्लादेश ने भारत के उच्चायुक्त को तलब कर जताया कड़ा विरोध


    नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक रिश्तों में एक नया तनाव उभरकर सामने आया है, जब असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयान पर ढाका ने कड़ी आपत्ति जताई। गुरुवार को बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारतीय कार्यवाहक उच्चायुक्त पवन बाधे को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया और इस तरह की टिप्पणियों को ‘काउंटरप्रोडक्टिव’ बताया।

    विवाद की जड़ 26 अप्रैल को दिया गया वह बयान है, जिसमें हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया था कि असम में पकड़े गए 20 विदेशी नागरिकों को ‘पुश बैक’ कर बांग्लादेश भेज दिया गया। इस बयान के सामने आते ही बांग्लादेश की ओर से तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। ढाका ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक बयानबाजी से दोनों देशों के बीच भरोसे पर असर पड़ सकता है और द्विपक्षीय संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा होता है।

    बांग्लादेश के अधिकारियों ने भारतीय प्रतिनिधि के समक्ष यह भी कहा कि सीमा, प्रवासन और नागरिकता जैसे विषय बेहद संवेदनशील होते हैं, जिन पर दोनों देशों के बीच पहले से स्थापित कूटनीतिक तंत्र के जरिए ही बातचीत होनी चाहिए। सार्वजनिक मंचों पर दिए गए बयान न केवल गलतफहमी बढ़ाते हैं, बल्कि सहयोग की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय पर सामने आया है, जब भारत और बांग्लादेश के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से मजबूत होने के बावजूद कुछ मुद्दों को लेकर संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर अब तक दोनों देशों ने सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में करीबी सहयोग बनाए रखा है। हालांकि अवैध प्रवासन, सीमा प्रबंधन और राजनीतिक बयानबाजी जैसे विषय समय-समय पर तनाव की वजह बनते रहे हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया विवाद भले ही बयानबाजी तक सीमित हो, लेकिन इसका असर कूटनीतिक संवाद पर पड़ सकता है। ऐसे में दोनों देशों के लिए जरूरी है कि वे संवाद और संयम के जरिए इस तरह के मुद्दों को सुलझाएं, ताकि लंबे समय से बने भरोसे और साझेदारी को नुकसान न पहुंचे।

    फिलहाल, यह मामला इस बात का संकेत है कि पड़ोसी देशों के बीच रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल नीतियां ही नहीं, बल्कि नेताओं की भाषा और सार्वजनिक बयान भी उतने ही अहम होते हैं

  • बांग्लादेशी सेना में बड़ा बदलाव, भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया

    बांग्लादेशी सेना में बड़ा बदलाव, भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया


    नई दिल्ली । बांग्लादेश सेना के उच्च कमान में रविवार को बड़ा फेरबदल हुआ जिसमें नए चीफ ऑफ जनरल स्टाफ की नियुक्ति भी शामिल है। इस बदलाव से प्रमुख रणनीतिक कमान और देश की मुख्य सैन्य खुफिया एजेंसी प्रभावित हुई है। ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार ये बदलाव प्रधानमंत्री तारिक रहमान की नई सरकार के सत्ता संभालने के कुछ दिनों बाद हुए। रिपोर्ट के मुताबिक लेफ्टिनेंट जनरल एम मैनुर रहमान को CGS नियुक्त किया गया जो पहले सेना प्रशिक्षण और सिद्धांत कमान ARTDOC के प्रमुख या जनरल ऑफिसर कमांडिंग GOC के पद पर थे।

    भारत में तैनात अधिकारी को वापस बुलाया
    भारत में बांग्लादेश उच्चायोग में रक्षा सलाहकार के पद पर तैनात ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद हाफिजुर रहमान को मेजर जनरल के दर्जे के साथ पैदल सेना डिवीजन का GOC बनने के लिए वापस बुलाया गया है।

    नई सरकार और चुनाव का संदर्भ

    बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी BNP ने 12 फरवरी को हुए चुनाव में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। 60 वर्षीय तारिक रहमान ने 17 फरवरी को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली जिससे मुहम्मद यूनुस के 18 महीने के अंतरिम शासन का अंत हुआ।

    भारत-बांग्लादेश संवाद को बढ़ावा
    ढाका में नियुक्त भारतीय उच्चायुक्त प्रणय वर्मा ने कहा कि नई सरकार के साथ सक्रिय संवाद को लेकर भारत उत्सुक है। उन्होंने बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान से मुलाकात की और संवाद सहयोग और पारस्परिक हितों पर जोर दिया। उच्चायुक्त वर्मा ने कहा कि भारत बांग्लादेश के साथ हर क्षेत्र में सकारात्मक और भविष्योन्मुखी सहयोग को मजबूत करना चाहता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यूनुस के कार्यकाल के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों में गिरावट आई थी और 1971 के बाद यह सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे।

  • बांग्लादेश चुनाव पर भारत की नजर, BNP या जमात? नई दिल्ली के सामने भरोसे और ‘तिहरे संकट’ की चुनौती

    बांग्लादेश चुनाव पर भारत की नजर, BNP या जमात? नई दिल्ली के सामने भरोसे और ‘तिहरे संकट’ की चुनौती


    नई दिल्ली । बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाला आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का मामला नहीं है बल्कि यह दक्षिण एशिया की भू-राजनीति की दिशा तय करने वाला अहम पड़ाव भी है। इस बार चुनाव के साथ जनमत संग्रह भी कराया जा रहा है जिससे मतदाता दो वोट डालेंगे एक सरकार के लिए और दूसरा जनमत संग्रह के मुद्दे पर। संकेत मिल रहे हैं कि चुनावी परिणाम इस्लामवादी दलों की ओर झुक सकते हैं जो भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है।

    अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रहा है। सड़कों पर प्रदर्शन हिंसा हड़तालें और प्रशासनिक फेरबदल ने माहौल को अनिश्चित बना दिया है। भारत के लिए यह स्थिति संवेदनशील है क्योंकि लंबी साझा सीमा पूर्वोत्तर की सुरक्षा व्यापार कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय स्थिरता सीधे तौर पर ढाका की राजनीति से जुड़ी हैं।

    अवामी लीग के चुनाव से बाहर होने के बाद मुकाबला मुख्य रूप से तीन संभावनाओं तक सिमट गया है बीएनपी के नेतृत्व वाली सरकार बीएनपी-जमात गठबंधन या जमात-ए-इस्लामी का प्रभुत्व। कुछ सर्वेक्षणों में बीएनपी को बढ़त दिखाई गई है। इनोविजन कंसल्टिंग के आंकड़ों के अनुसार बीएनपी को 52.8% वोट शेयर मिल सकता है हालांकि अन्य सर्वे इसे कांटे की टक्कर बता रहे हैं। निर्णायक भूमिका अवामी लीग के पारंपरिक मतदाताओं की होगी।

    भारत के नीति-निर्माताओं का आकलन है कि बीएनपी नेता तारिक रहमान के साथ काम करना अपेक्षाकृत व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। हालांकि अतीत में बीएनपी सरकारों पर पाकिस्तान समर्थक रुख और भारत के पूर्वोत्तर में उग्रवाद को हवा देने के आरोप लगे थे फिर भी उसे एक मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी और व्यवहारिक दल माना जाता है। भारत की प्राथमिकता स्थिर और निर्वाचित सरकार है भले ही वह पूर्णतः अनुकूल न हो।

    दूसरी ओर जमात-ए-इस्लामी का उभार नई दिल्ली के लिए तिहरे संकट की आशंका पैदा करता है। पहला सीमापार उग्रवाद और कट्टरपंथ के फिर से सक्रिय होने का खतरा; दूसरा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी से कथित समीकरण; और तीसरा चीन के साथ बढ़ती नजदीकी जिसमें रणनीतिक बुनियादी ढांचे तक पहुंच की चर्चा शामिल है। विश्लेषकों का मानना है कि हालिया अस्थिरता के दौरान जमात ने प्रशासनिक और शैक्षणिक संस्थानों में अपनी पकड़ मजबूत की है जो चुनावी लाभ में बदल सकती है।

    भारत की चिंता यह भी है कि 2024 की उथल-पुथल के बाद कुछ ऐसे तत्व रिहा हुए जिन पर पहले कट्टरपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप थे। सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि क्षेत्रीय अस्थिरता का असर सीमाओं के पार भी पड़ सकता है।

    फिर भी भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से व्यवहारिक रही है। नई दिल्ली ने ढाका में हर तरह की सरकार के साथ काम किया है और आगे भी ऐसा करने की संभावना है। लेकिन पिछले 18 महीनों में जिस धैर्य और संतुलन के साथ भारत ने स्थिति संभाली है उसकी परीक्षा इस चुनाव के नतीजों के बाद हो सकती है।

    अंततः बांग्लादेश का यह चुनाव केवल ढाका की सत्ता का फैसला नहीं करेगा बल्कि यह तय करेगा कि भारत-बांग्लादेश संबंध सहयोग स्थिरता और संतुलन की राह पर आगे बढ़ेंगे या नई रणनीतिक चुनौतियों का सामना करेंगे।

  • T20 वर्ल्ड कप 2026 विवाद: बांग्लादेश के बहिष्कार से ICC के सामने संकट, क्रिकेट में बढ़ी राजनीति की तपिश

    T20 वर्ल्ड कप 2026 विवाद: बांग्लादेश के बहिष्कार से ICC के सामने संकट, क्रिकेट में बढ़ी राजनीति की तपिश


    नई दिल्ली।अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उस समय बड़ा भूचाल आ गया जब बांग्लादेश ने T20 वर्ल्ड कप 2026 के बहिष्कार का औपचारिक ऐलान कर दिया। भारत में प्रस्तावित इस मेगा टूर्नामेंट से हटने के फैसले के पीछे बांग्लादेश ने सुरक्षा चिंताओं और मौजूदा राजनीतिक हालात का हवाला दिया है। इस फैसले ने न केवल इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल की मुश्किलें बढ़ा दी हैं बल्कि पूरे टूर्नामेंट के शेड्यूल, ग्रुप समीकरण और एशियाई क्रिकेट की राजनीति को भी नए सिरे से चर्चा में ला दिया है।

    बांग्लादेश सरकार, बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड और खिलाड़ियों ने एकजुट होकर यह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत जाकर खेलना सुरक्षित नहीं है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के खेल सलाहकार आसिफ नजरुल ने ICC पर सीधे तौर पर आरोप लगाते हुए कहा कि खिलाड़ियों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जा रही। उनका कहना है कि बांग्लादेश किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर अपने खिलाड़ियों की सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा।

    ICC पहले ही यह साफ कर चुका था कि T20 वर्ल्ड कप के मुकाबले तय कार्यक्रम के अनुसार भारत में ही होंगे और किसी भी हाल में वेन्यू बदला नहीं जाएगा। इसके बावजूद बांग्लादेश अपने फैसले पर अडिग रहा। 21 जनवरी को ICC से आधिकारिक संदेश मिलने के बाद BCB अध्यक्ष ने सरकार के खेल सलाहकार से मुलाकात की। इसके अगले दिन खिलाड़ियों के साथ अहम बैठक हुई, जिसमें सभी खिलाड़ियों ने भारत में खेलने से इनकार कर दिया। इसके बाद BCB ने औपचारिक रूप से ICC को सूचित कर दिया कि यदि मैचों का वेन्यू श्रीलंका नहीं बदला गया तो बांग्लादेश टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं लेगा।

    ICC की 21 जनवरी को हुई अहम बैठक में बांग्लादेश ने अपने मैच भारत से बाहर कराने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव पर वोटिंग कराई गई, जिसमें 16 में से 14 देशों ने बांग्लादेश के खिलाफ मतदान किया। केवल पाकिस्तान और बांग्लादेश ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। इसके बाद ICC ने बयान जारी कर कहा कि भारत में बांग्लादेशी खिलाड़ियों, अधिकारियों या दर्शकों की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस खतरा नहीं है और टूर्नामेंट तय कार्यक्रम के अनुसार ही होगा।

    टूर्नामेंट शेड्यूल के मुताबिक बांग्लादेश को ग्रुप C में रखा गया था। टीम का पहला मुकाबला 7 फरवरी 2026 को वेस्टइंडीज के खिलाफ कोलकाता के ईडन गार्डन्स में होना था। इसके बाद 9 फरवरी को इटली, 14 फरवरी को इंग्लैंड और 17 फरवरी को नेपाल के खिलाफ मैच खेले जाने थे। अब बांग्लादेश के हटने से यह पूरा शेड्यूल अधर में लटक गया है।विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत-बांग्लादेश के हालिया राजनीतिक तनाव का असर अब क्रिकेट पर साफ दिखने लगा है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यक मुद्दों, आईपीएल 2026 से मुस्ताफिजुर रहमान के बाहर होने और आईपीएल के प्रसारण से जुड़े फैसलों ने रिश्तों में और कड़वाहट बढ़ाई है।

    बांग्लादेश के बाहर होने के बाद बड़ा सवाल यह है कि उसकी जगह कौन लेगा। चर्चाएं हैं कि स्कॉटलैंड को मौका दिया जा सकता है, हालांकि इस पर अभी ICC की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। बांग्लादेश के बहिष्कार ने ICC की साख और आयोजन क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब दुनिया की नजरें ICC के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस संकट से कैसे निपटता है और T20 वर्ल्ड कप 2026 को बिना किसी बड़े झटके के आगे बढ़ा पाता है या नहीं।