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  • तीस्ता पर चीन-बांग्लादेश समझौता, भारत के लिए बढ़ी टेंशन? सिलिगुड़ी कॉरिडोर के पास नई रणनीतिक हलचल

    तीस्ता पर चीन-बांग्लादेश समझौता, भारत के लिए बढ़ी टेंशन? सिलिगुड़ी कॉरिडोर के पास नई रणनीतिक हलचल


    नई दिल्ली । चीन और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी परियोजना को लेकर सहयोग का नया अध्याय शुरू हो गया है। दोनों देशों ने तीस्ता सहित अन्य नदियों के जल प्रबंधन, तकनीकी सहयोग और संभावित वित्तीय सहायता को लेकर सहमति जताई है। इस फैसले को भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि तीस्ता नदी परियोजना भारत के बेहद संवेदनशील सिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ के निकट स्थित है। यही संकरा भूभाग पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला सबसे अहम संपर्क मार्ग है।

    बीजिंग में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान और चीन के जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक में नदी प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, जल संरक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास पर व्यापक सहयोग को लेकर चर्चा हुई। बांग्लादेश ने तीस्ता परियोजना के लिए चीन से आधुनिक तकनीक और वित्तीय सहयोग की मांग भी की है। चीन लंबे समय से इस परियोजना में रुचि दिखाता रहा है और अब दोनों देशों के बीच बढ़ती नजदीकियों ने इस सहयोग को नई गति दे दी है।

    तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनका पहला आधिकारिक चीन दौरा माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने जल संसाधन प्रबंधन के अलावा कई अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई। बांग्लादेश सरकार का कहना है कि तीस्ता परियोजना से सिंचाई व्यवस्था मजबूत होगी, बाढ़ नियंत्रण में मदद मिलेगी और लाखों लोगों की आजीविका बेहतर होगी।

    हालांकि इस समझौते को भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों के नजरिए से भी देखा जा रहा है। तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से गुजरते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। परियोजना का स्थान सिलिगुड़ी कॉरिडोर के काफी निकट होने के कारण विशेषज्ञ इसे सामरिक दृष्टि से संवेदनशील मानते हैं। यही कारण है कि चीन की बढ़ती मौजूदगी पर भारत की नजर बनी हुई है।

    भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा लंबे समय से लंबित है। पश्चिम बंगाल की सहमति नहीं बनने के कारण दोनों देशों के बीच व्यापक जल समझौता अब तक नहीं हो सका है। ऐसे में बांग्लादेश द्वारा चीन के साथ बढ़ता सहयोग क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह सहयोग जल संसाधन प्रबंधन और विकास परियोजनाओं तक सीमित बताया जा रहा है, लेकिन भारत इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर रखेगा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि परियोजना का वास्तविक स्वरूप क्या होता है और इसका क्षेत्रीय सुरक्षा तथा कूटनीतिक संबंधों पर कितना प्रभाव पड़ता है।

  • दलाई लामा के अगले अवतार पर फिर गरमाई राजनीति, चीन ने भारत को दी चेतावनी; उत्तराधिकारी को लेकर बढ़ा तनाव

    दलाई लामा के अगले अवतार पर फिर गरमाई राजनीति, चीन ने भारत को दी चेतावनी; उत्तराधिकारी को लेकर बढ़ा तनाव



    नई दिल्ली। तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के अगले अवतार को लेकर चीन और भारत के बीच कूटनीतिक तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। चीन ने साफ कहा है कि दलाई लामा के पुनर्जन्म का मुद्दा उसका “आंतरिक मामला” है और इसमें किसी बाहरी दखल की अनुमति नहीं दी जाएगी।

    भारत स्थित चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर कहा कि तथाकथित “सेंट्रल तिब्बती एडमिनिस्ट्रेशन” को किसी भी संप्रभु देश की मान्यता नहीं है और उसे पुनर्जन्म प्रक्रिया पर दावा करने का अधिकार नहीं है। चीन ने साथ ही भारत से उम्मीद जताई कि वह तिब्बत की स्वतंत्रता से जुड़ी गतिविधियों को मंच नहीं देगा।

    दरअसल, यह विवाद तब और गहरा गया जब दलाई लामा ने हाल में कहा कि उनके पुनर्जन्म को पहचानने का “एकमात्र अधिकार” गादेन फोद्रांग ट्रस्ट के पास होगा और किसी अन्य संस्था या सरकार को इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

    चीन ने इस बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि दलाई लामा के किसी भी पुनर्जन्म को बीजिंग की मंजूरी जरूरी होगी। चीन लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि तिब्बती बौद्ध परंपरा में पुनर्जन्म की प्रक्रिया चीनी कानूनों और ऐतिहासिक ‘गोल्डन अर्न’ प्रणाली के तहत होनी चाहिए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि अगला दलाई लामा चीन से बाहर, खासकर भारत में चुना जा सकता है। वर्तमान में तिब्बती निर्वासित सरकार भारत के धर्मशाला में संचालित होती है और दलाई लामा भी लंबे समय से भारत में रह रहे हैं।

    माना जा रहा है कि अगर अगला दलाई लामा भारत या किसी स्वतंत्र देश में चुना जाता है, तो इससे तिब्बत मुद्दे पर चीन की स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमजोर पड़ सकती है। यही वजह है कि बीजिंग इस पूरे मामले को लेकर बेहद संवेदनशील नजर आ रहा है।

    वहीं भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर ‘वन चाइना’ नीति का सम्मान किया जाता है, लेकिन कई भारतीय नेताओं ने कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी का फैसला तिब्बती परंपरा और उनके अनुयायियों के अनुसार होना चाहिए।

    फिलहाल दलाई लामा के अगले अवतार को लेकर धार्मिक परंपरा, भू-राजनीति और भारत-चीन रिश्तों के बीच नई खींचतान साफ दिखाई दे रही है।

  • ट्रंप-शी की नजदीकी से भारत की बढ़ी टेंशन! सुरक्षा से व्यापार तक बदल सकते हैं एशिया के समीकरण

    ट्रंप-शी की नजदीकी से भारत की बढ़ी टेंशन! सुरक्षा से व्यापार तक बदल सकते हैं एशिया के समीकरण



    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है। 13 से 15 मई तक बीजिंग में हुई इस बैठक को वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अगर अमेरिका और चीन के रिश्तों में नरमी आती है तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय प्रभाव पर पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो दशकों में भारत ने अमेरिका-चीन तनाव के बीच खुद को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक मजबूत साझेदार के रूप में स्थापित किया था। लेकिन अगर वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच समझौते बढ़ते हैं तो अमेरिका के लिए भारत की रणनीतिक अहमियत कम हो सकती है। इससे रक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर असर पड़ने की आशंका है।

    व्यापार के मोर्चे पर भी भारत के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है। हाल के वर्षों में कई वैश्विक कंपनियां चीन से बाहर निकलकर भारत में निवेश कर रही थीं, लेकिन अगर अमेरिका चीन पर लगाए गए टैरिफ और तकनीकी प्रतिबंधों में ढील देता है तो निवेश दोबारा चीन की ओर लौट सकता है। इससे भारत के “चीन प्लस वन” रणनीति के तहत मिले फायदे कमजोर पड़ सकते हैं।

    चीन-पाकिस्तान गठजोड़ भी भारत की चिंता का बड़ा कारण है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका चीन के साथ रिश्ते सुधारने की दिशा में आगे बढ़ता है तो पाकिस्तान में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर उसका दबाव कम हो सकता है। इससे चीन खुलकर पाकिस्तान का समर्थन कर सकता है, जिसका असर कश्मीर और सीमा सुरक्षा से जुड़े मामलों पर दिखाई दे सकता है।

    पश्चिम एशिया और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर भी भारत सतर्क नजर आ रहा है। भारत की बड़ी तेल जरूरतें होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं। अगर अमेरिका और चीन ईरान और खाड़ी क्षेत्र को लेकर किसी नई रणनीति पर साथ आते हैं तो भारत की भूमिका सीमित हो सकती है। इससे क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप-शी मुलाकात केवल दो देशों की कूटनीतिक बैठक नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की शक्ति संतुलन पर पड़ेगा। भारत के लिए यह संकेत है कि आने वाले समय में उसे अपनी विदेश नीति, आर्थिक रणनीति और सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करना होगा, ताकि बदलते वैश्विक समीकरणों में उसका प्रभाव कायम रह सके।

  • बीजिंग में भारत की नई कूटनीतिक शुरुआत, विक्रम दुरईस्वामी ने संभाली जिम्मेदारी; चीन को सौंपे साख पत्र

    बीजिंग में भारत की नई कूटनीतिक शुरुआत, विक्रम दुरईस्वामी ने संभाली जिम्मेदारी; चीन को सौंपे साख पत्र


    नई दिल्ली। भारत और चीन के रिश्तों के बीच नए दौर की शुरुआत के संकेत देते हुए वरिष्ठ राजनयिक विक्रम दुरईस्वामी ने चीन में भारत के नए राजदूत के रूप में औपचारिक जिम्मेदारी संभाल ली है। उन्होंने बीजिंग में चीन के सहायक विदेश मंत्री और प्रोटोकॉल विभाग के महानिदेशक होंग लेई को अपने साख पत्रों (क्रेडेंशियल्स) की प्रति सौंपी।

    इस दौरान दोनों देशों के अधिकारियों की मौजूदगी में राजनयिक परंपराओं के तहत औपचारिक प्रक्रिया पूरी की गई। माना जा रहा है कि दुरईस्वामी की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब भारत और चीन कई संवेदनशील मुद्दों के बीच संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं।

    भारतीय दूतावास में आयोजित हुआ विशेष समारोह
    गुरुवार को बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की पहली वर्षगांठ पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें राजदूत विक्रम दुरईस्वामी ने भी हिस्सा लिया।

    भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी देते हुए कहा कि समारोह में भारतीय सशस्त्र बलों के साहस, सटीक कार्रवाई और दृढ़ संकल्प को याद किया गया। साथ ही पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए निर्दोष लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने का संकल्प दोहराया गया।

    अनुभवी राजनयिक हैं विक्रम दुरईस्वामी
    विक्रम दुरईस्वामी 1992 बैच के भारतीय विदेश सेवा (IFS) अधिकारी हैं और उन्हें विदेश नीति व अंतरराष्ट्रीय संबंधों का लंबा अनुभव है। चीन में नियुक्ति से पहले वह ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त के रूप में सेवाएं दे चुके हैं।

    बीजिंग पहुंचने पर उनका चीनी अधिकारियों और भारतीय दूतावास के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने स्वागत किया। विशेषज्ञों का मानना है कि दुरईस्वामी की कूटनीतिक समझ आने वाले समय में भारत-चीन संबंधों को नई दिशा दे सकती है।
  • बीजिंग मिशन से पहले औपचारिकता पूरी: राष्ट्रपति मुर्मु से मिले विक्रम दोराईस्वामी, सौंपे गए परिचय पत्र

    बीजिंग मिशन से पहले औपचारिकता पूरी: राष्ट्रपति मुर्मु से मिले विक्रम दोराईस्वामी, सौंपे गए परिचय पत्र


    नई दिल्ली ।
    भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है जहां विक्रम दोराईस्वामी ने चीन में भारत के राजदूत के रूप में अपनी नई जिम्मेदारी संभालने से पहले औपचारिक प्रक्रिया पूरी कर ली है उन्होंने भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात कर अपने परिचय पत्र प्राप्त किए हैं जो किसी भी राजनयिक नियुक्ति का एक जरूरी और औपचारिक चरण माना जाता है

    चीन में भारतीय दूतावास ने इस मुलाकात की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स के माध्यम से साझा की और बताया कि दोराईस्वामी को उनके नए असाइनमेंट के लिए राष्ट्रपति से क्रेडेंशियल्स प्रदान किए गए हैं यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब भारत और चीन के बीच संबंध कई वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों के चलते काफी अहम माने जा रहे हैं ऐसे में एक अनुभवी राजनयिक की तैनाती को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है

    1992 बैच के भारतीय विदेश सेवा अधिकारी विक्रम दोराईस्वामी का कूटनीतिक करियर बेहद समृद्ध और विविध अनुभवों से भरा रहा है उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में मास्टर डिग्री हासिल कर पूरी की इसके बाद 1992 से 1993 के दौरान नई दिल्ली में अपनी इन सर्विस ट्रेनिंग पूरी की और मई 1994 में हांगकांग स्थित भारतीय दूतावास में थर्ड सेक्रेटरी के रूप में अपनी पहली विदेशी नियुक्ति संभाली

    दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने हांगकांग के चीनी विश्वविद्यालय से चीनी भाषा में डिप्लोमा भी किया है जो उन्हें चीन से जुड़े मामलों में एक अतिरिक्त विशेषज्ञता प्रदान करता है यही कारण है कि उन्हें पहले भी बीजिंग में भारतीय दूतावास में कार्य करने का अनुभव मिल चुका है जहां उन्होंने लगभग चार वर्षों तक अपनी सेवाएं दी थीं

    इसके अलावा दोराईस्वामी ने विदेश मंत्रालय में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है जिसमें डिप्टी चीफ ऑफ प्रोटोकॉल और प्रधानमंत्री कार्यालय में निजी सचिव जैसे अहम पद शामिल हैं उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन न्यूयॉर्क में राजनीतिक सलाहकार के रूप में भी काम किया और दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में महावाणिज्य दूत की जिम्मेदारी भी संभाली

    उनका अनुभव केवल बहुपक्षीय मंचों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने क्षेत्रीय संगठनों में भी अहम भूमिका निभाई नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने सार्क विभाग का नेतृत्व किया और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के समन्वयक के रूप में भी कार्य किया

    हाल के वर्षों में वे ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त के पद पर कार्यरत रहे हैं और अब उन्हें चीन जैसे महत्वपूर्ण देश में भारत का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है ऐसे में यह नियुक्ति भारत की विदेश नीति और कूटनीतिक रणनीति के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है

    आने वाले समय में विक्रम दोराईस्वामी से उम्मीद की जा रही है कि वे अपने अनुभव और विशेषज्ञता के जरिए भारत और चीन के बीच संबंधों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर भारत के हितों को मजबूती से आगे बढ़ाएंगे

  • अरुणाचल प्रदेश पर चीन की नाम बदलने की कोशिशों पर भारत का सख्त रुख, कहा वास्तविकता को नहीं बदला जा सकता,

    अरुणाचल प्रदेश पर चीन की नाम बदलने की कोशिशों पर भारत का सख्त रुख, कहा वास्तविकता को नहीं बदला जा सकता,

    नई दिल्ली:भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक तनाव गहरा गया है। चीन की ओर से भारतीय क्षेत्रों के लिए नए और मनगढ़ंत नामों के इस्तेमाल पर भारत ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है। इस मुद्दे ने दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद संवेदनशील संबंधों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

    भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि Arunachal Pradesh हमेशा से भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा। सरकार ने कहा कि किसी भी प्रकार के नाम बदलने या काल्पनिक दावे से इस सच्चाई को बदला नहीं जा सकता। यह वास्तविकता ऐतिहासिक, भौगोलिक और राजनीतिक रूप से पूरी तरह स्थापित है।

    सरकारी पक्ष ने यह भी कहा कि इस तरह के प्रयास न केवल तथ्यहीन हैं, बल्कि द्विपक्षीय संबंधों पर भी नकारात्मक असर डालते हैं। भारत ने साफ किया कि ऐसे कदम आपसी विश्वास को कमजोर करते हैं और रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में चल रहे प्रयासों को बाधित करते हैं।

    भारत ने चीन को स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि मनगढ़ंत नामकरण और झूठे दावों से किसी भी क्षेत्र की वास्तविक स्थिति नहीं बदली जा सकती। सरकार का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थिरता बनाए रखने के लिए वास्तविक तथ्यों को स्वीकार करना सबसे जरूरी है।

    भारत की ओर से यह भी कहा गया कि दोनों देशों के बीच रिश्तों को सुधारने के लिए संवाद और सहयोग की आवश्यकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सभी पक्ष जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करें। ऐसी हरकतें, जो विवाद को बढ़ावा दें, उन्हें किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि सीमा से जुड़े मुद्दे भारत और चीन के संबंधों में संवेदनशील बने हुए हैं और इन्हें संभालने के लिए संतुलित, शांत और परिपक्व कूटनीति की आवश्यकता है।

  • प्रदूषण पर चीन की भारत को नसीहत, बीजिंग–दिल्ली की तुलना कर बोला-अनुभव साझा करने को तैयार

    प्रदूषण पर चीन की भारत को नसीहत, बीजिंग–दिल्ली की तुलना कर बोला-अनुभव साझा करने को तैयार

    नई दिल्ली/दिल्ली और एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण ने एक बार फिर लोगों की सांसें मुश्किल कर दी हैं। घना स्मॉगजहरीली हवा और बेहद खराब एयर क्वालिटी के बीच अब चीन ने भी इस मुद्दे पर भारत को सलाह दी है। चीन के दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने दिल्ली के प्रदूषण को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए न सिर्फ चिंता जताईबल्कि बीजिंग और नई दिल्ली की तुलना करते हुए चीन को एक उदाहरण के तौर पर पेश किया।

    यू जिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि चीन और भारत दोनों ही तेजी से शहरीकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं और इसी कारण प्रदूषण एक साझा चुनौती बन चुका है। उन्होंने बीजिंग और दिल्ली की हवा की गुणवत्ता की तुलना करते हुए तस्वीरें साझा कीं। इन तस्वीरों में बीजिंग का एयर क्वालिटी इंडेक्स AQI 68 दिखाया गयाजो संतोषजनक श्रेणी में आता हैजबकि दिल्ली का AQI 447 दर्ज किया गयाजिसे गंभीर स्तर माना जाता है।अपने पोस्ट में यू जिंग ने लिखाचीन भी कभी गंभीर स्मॉग से जूझता था। लेकिन पिछले एक दशक में लगातार और सख्त प्रयासों से हमने स्थिति में बड़ा सुधार किया है। आने वाले दिनों में हम अपने अनुभवों को छोटी-छोटी सीरीज के जरिए साझा करेंगे। इस बयान के बाद भारत और चीन के बीच प्रदूषण को लेकर तुलना और चर्चा तेज हो गई है।

    दिल्ली में हालात बेहद गंभीर

    दिल्ली में प्रदूषण की स्थिति इस समय चिंताजनक बनी हुई है। हवा में PM2.5 और PM10 जैसे खतरनाक कण कई गुना ज्यादा दर्ज किए जा रहे हैं। हालात को देखते हुए कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट-CAQM ने ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान-GRAP का स्टेज-4 लागू कर दिया है। इसके तहत निर्माण और तोड़फोड़ के काम पर रोकडीजल वाहनों पर पाबंदीट्रकों की एंट्री पर नियंत्रण और अन्य आपातकालीन कदम उठाए गए हैं। इसके बावजूद लोगों को साफ हवा के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

    चीन ने प्रदूषण से निपटने के लिए क्या किया?
    चीन की प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत 2008 के बीजिंग ओलंपिक के दौरान अस्थायी उपायों से हुई थी। इसके बाद 2013 में प्रदूषण को राष्ट्रीय संकट मानते हुए एक व्यापक एक्शन प्लान लागू किया गया।चीन ने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों पर निर्भरता कम कीफैक्ट्रियों के लिए सख्त उत्सर्जन मानक लागू किए और पुराने उद्योगों को बंद या अपग्रेड किया। नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर दिया गया और इलेक्ट्रिक वाहनों तथा पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया गया। इसके साथ ही बीजिंगतियानजिन और हेबेई जैसे पड़ोसी इलाकों के साथ मिलकर साझा लक्ष्य तय किए गएताकि क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके।सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण पर भारी निवेश भी किया। 2013 से 2017 के बीच इस क्षेत्र में खर्च कई गुना बढ़ाजिससे नीतियों को जमीन पर उतारने में मदद मिली।

    चीन को क्या नतीजे मिले?

    इन सख्त कदमों का असर साफ दिखाई दिया। 2013 से 2017 के बीच बीजिंग में PM2.5 का स्तर करीब 35% तक कम हुआ। हालिया आंकड़ों के अनुसारपिछले साल बीजिंग में करीब 290 दिन अच्छी हवा वाले दर्ज किए गएजो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिकचीन ने दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण कम करने वाले देशों में अहम स्थान बनाया है।

    दिल्ली के लिए क्या सबक?

    चीन का अनुभव बताता है कि प्रदूषण से लड़ने के लिए सख्त नीतियांक्षेत्रीय सहयोगपारदर्शी डेटालगातार फंडिंग और मजबूत अमल जरूरी है। भारत में भी नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम-NCAP चल रहा हैलेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और तेज कार्रवाई की जरूरत है।चीन का यह बयान ऐसे समय में आया हैजब दिल्ली के लोग साफ हवा के लिए जूझ रहे हैं। यह घटनाक्रम दोनों देशों के बीच पर्यावरण सहयोग की संभावनाओं को भी दिखाता हैहालांकि भारत में इस नसीहत को लेकर राजनीतिक और कूटनीतिक बहस भी तेज हो सकती है।