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  • भारत-सेशेल्स रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती, स्वर्ण जयंती समारोह में शामिल होंगे प्रधानमंत्री मोदी

    भारत-सेशेल्स रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती, स्वर्ण जयंती समारोह में शामिल होंगे प्रधानमंत्री मोदी


    नई दिल्ली । सेशेल्स की आजादी की 50वीं वर्षगांठ भारत और सेशेल्स के रिश्तों को नई ऊंचाई देने का अवसर बनने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 27 से 29 जून 2026 तक सेशेल्स की राजकीय यात्रा पर रहेंगे, जहां वह राष्ट्रीय दिवस के स्वर्ण जयंती समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। राष्ट्रपति डॉ. पैट्रिक हर्मिनी के निमंत्रण पर होने वाली यह यात्रा दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे भरोसेमंद संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

    प्रधानमंत्री के आगमन को लेकर सेशेल्स में उत्साह का माहौल है। स्थानीय नागरिकों से लेकर भारतीय समुदाय तक सभी इस यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों के लिए बेहद अहम मान रहे हैं। लोगों का कहना है कि भारत और सेशेल्स के बीच पिछले कुछ वर्षों में सहयोग लगातार बढ़ा है और प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा इस साझेदारी को नई गति देगी। उनका मानना है कि व्यापार, निवेश, समुद्री सुरक्षा और विकास परियोजनाओं में सहयोग और मजबूत होगा।

    सेशेल्स में रहने वाले भारतीय समुदाय ने भी प्रधानमंत्री के दौरे का गर्मजोशी से स्वागत किया है। समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध बेहद मजबूत हैं। बड़ी संख्या में भारतीय सेशेल्स की अर्थव्यवस्था, व्यापार और विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। ऐसे में शीर्ष स्तर की यह यात्रा दोनों देशों के लोगों के बीच रिश्तों को और गहरा करेगी तथा नए अवसरों के द्वार खोलेगी।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले वर्ष 2015 में सेशेल्स की यात्रा कर चुके हैं। इस बार उनका दौरा कई मायनों में खास माना जा रहा है क्योंकि यह सेशेल्स की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर हो रहा है। समारोह में भारतीय सशस्त्र बलों की एक टुकड़ी और भारतीय नौसेना के दो युद्धपोत भी हिस्सा लेंगे, जो दोनों देशों के बीच मजबूत रक्षा और समुद्री सहयोग का प्रतीक होंगे।

    दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति डॉ. पैट्रिक हर्मिनी के बीच व्यापक द्विपक्षीय वार्ता होगी। दोनों नेता व्यापार, निवेश, विकास सहयोग, समुद्री सुरक्षा, क्षमता निर्माण, जलवायु परिवर्तन और हिंद महासागर क्षेत्र में साझेदारी सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया जाएगा। प्रधानमंत्री सेशेल्स की नेशनल असेंबली को संबोधित करेंगे और वहां रह रहे भारतीय समुदाय के सदस्यों से भी मुलाकात करेंगे।

    भारत और सेशेल्स के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और लोगों के बीच गहरे संपर्क पर आधारित रहे हैं। हिंद महासागर क्षेत्र में सेशेल्स भारत का एक महत्वपूर्ण समुद्री साझेदार है। भारत के ‘महासागर’ विजन और ग्लोबल साउथ को मजबूत करने की नीति में भी सेशेल्स की अहम भूमिका है। यही वजह है कि यह यात्रा केवल एक औपचारिक राजकीय दौरा नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण अवसर मानी जा रही है। उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा से दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा और व्यापक होगा तथा हिंद महासागर क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और विकास के साझा लक्ष्य को नई मजबूती मिलेगी।

  • डोभाल की अध्यक्षता में ब्रिक्स एनएसए मीटिंग, रणनीतिक सहयोग और सुरक्षा पर फोकस

    डोभाल की अध्यक्षता में ब्रिक्स एनएसए मीटिंग, रणनीतिक सहयोग और सुरक्षा पर फोकस

    नई दिल्ली । नई दिल्ली में 22 से 23 जून 2026 को ब्रिक्स राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन होने जा रहा है जिसकी अध्यक्षता भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल करेंगे। विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस उच्च स्तरीय बैठक में ब्रिक्स सदस्य देशों के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी और एनएसए शामिल होंगे और वैश्विक सुरक्षा से जुड़े अहम मुद्दों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।
    यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया तेजी से बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य और नई तकनीकी चुनौतियों का सामना कर रही है। बैठक का मुख्य विषय आज की दुनिया के सामने मौजूद गैर पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियां तय किया गया है जिसके तहत साइबर सुरक्षा आतंकवाद सूचना युद्ध और उभरती तकनीक के सुरक्षा प्रभाव जैसे मुद्दों पर फोकस किया जाएगा।
    दो दिन चलने वाली इस बैठक में सदस्य देश अपने अनुभव और रणनीतिक दृष्टिकोण साझा करेंगे ताकि सामूहिक सुरक्षा सहयोग को और मजबूत किया जा सके। विदेश मंत्रालय के अनुसार बैठक के दौरान काउंटर टेररिज्म और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के सुरक्षित उपयोग पर ब्रिक्स के संयुक्त कार्य समूहों की प्रगति की समीक्षा भी की जाएगी। इससे सीमा पार खतरों से निपटने और एक मजबूत बहुपक्षीय सुरक्षा ढांचा विकसित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
    भारत इस मंच के माध्यम से ब्रिक्स के भीतर सुरक्षा सहयोग को केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित न रखते हुए उसे रणनीतिक और तकनीकी मुद्दों तक विस्तारित करने की दिशा में काम कर रहा है। इसी बीच इस बैठक में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के शामिल होने की संभावना भी चर्चा में है जो अगस्त 2025 के बाद उनका पहला भारत दौरा होगा।
    वांग यी चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका भी निभाते हैं और एनएसए अजीत डोभाल के निमंत्रण पर भारत आ रहे हैं। इस यात्रा को भारत और चीन के बीच चल रहे संवाद और क्षेत्रीय स्थिरता के प्रयासों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि वैश्विक कूटनीतिक गतिविधियों और अन्य अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों की टाइमिंग के कारण पिछले कुछ ब्रिक्स बैठकों में उनकी अनुपस्थिति भी देखी गई थी।
    इस बार की बैठक को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें बड़े भू राजनीतिक समीकरणों के बीच सुरक्षा सहयोग के नए रास्ते तलाशने की कोशिश होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक ब्रिक्स देशों के बीच रणनीतिक भरोसा बढ़ाने और वैश्विक सुरक्षा ढांचे को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • मोदी की विदेश यात्रा में भारतीय विरासत की झलक, स्लोवाकिया को मिले थेवा, हिमरू और डोकरा आर्ट गिफ्ट्स

    मोदी की विदेश यात्रा में भारतीय विरासत की झलक, स्लोवाकिया को मिले थेवा, हिमरू और डोकरा आर्ट गिफ्ट्स

    नई द‍िल्‍ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया विदेश यात्रा एक बार फिर भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक मंच पर बढ़ती सॉफ्ट पावर का उदाहरण बनकर सामने आई है फ्रांस में जी7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद पीएम मोदी अपने दो दिवसीय दौरे पर स्लोवाकिया पहुंचे जहां उन्होंने न केवल द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत किया बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को भी दुनिया के सामने प्रस्तुत किया स्लोवाकिया की आजादी के बाद यह पहला अवसर था जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इस देश का दौरा किया और इस यात्रा को ऐतिहासिक माना जा रहा है यहां प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी सम्मानित किया गया जो दोनों देशों के संबंधों की मजबूती का प्रतीक है

    इस दौरे के दौरान पीएम मोदी ने स्लोवाकिया के नेताओं और शीर्ष अधिकारियों को भारत की पारंपरिक धरोहर से जुड़े विशेष उपहार भेंट किए जिनमें प्राचीन भारतीय चिकित्सा ज्ञान का प्रतिनिधित्व करने वाली सुश्रुत संहिता और चरक संहिता प्रमुख रूप से शामिल थीं सुश्रुत संहिता को सर्जरी के क्षेत्र में विश्व की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है जिसमें चिकित्सा विज्ञान और शल्य चिकित्सा की उन्नत तकनीकों का विस्तृत वर्णन मिलता है वहीं चरक संहिता आयुर्वेद का एक आधारभूत ग्रंथ है जो स्वास्थ्य रोग और मानव शरीर की संरचना को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाता है इन ग्रंथों के माध्यम से भारत ने यह संदेश दिया कि उसका ज्ञान केवल प्राचीन नहीं बल्कि आज भी वैश्विक स्वास्थ्य और चिकित्सा प्रणाली के लिए प्रासंगिक है

    इसके अलावा पीएम मोदी ने स्लोवाकिया के राष्ट्रपति को भारत की विविध हस्तशिल्प परंपराओं से जुड़े उपहार भी भेंट किए जिनमें प्रतापगढ़ की प्रसिद्ध थेवा कला से बने कफलिंक शामिल थे थेवा कला रंगीन कांच पर सोने की महीन नक्काशी से बनाई जाती है और इसे राजस्थान की दुर्लभ और अनोखी शिल्प परंपरा माना जाता है यह कला न केवल सौंदर्य का प्रतीक है बल्कि भारतीय कारीगरों की बारीक कारीगरी और धैर्य को भी दर्शाती है

    साथ ही हिमरू सिल्क टाई और पॉकेट स्क्वायर भी भेंट किए गए जो महाराष्ट्र के औरंगाबाद की पारंपरिक बुनाई कला का प्रतिनिधित्व करते हैं हिमरू कपड़ा अपनी हल्की चमक मुलायम बनावट और सुंदर पैटर्न के लिए जाना जाता है और इसे शाही संरक्षण में विकसित किया गया था

    पीतल का डोकरा एंटीलोप सेट भी इस सूची में शामिल था जो छत्तीसगढ़ ओडिशा झारखंड और पश्चिम बंगाल के आदिवासी कारीगरों की प्राचीन धातु कला को दर्शाता है यह कला लॉस्ट वैक्स कास्टिंग तकनीक से बनाई जाती है और हर मूर्ति अपने आप में अनोखी होती है इसके साथ ही पीएम मोदी ने स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री को कश्मीर की प्रसिद्ध सिल्क कारपेट भी भेंट किया जो बारीक डिजाइन और महीनों से लेकर वर्षों तक चलने वाली कारीगरी का उत्कृष्ट उदाहरण है

    इन सभी उपहारों के माध्यम से भारत ने न केवल अपनी सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित किया बल्कि यह भी संदेश दिया कि भारतीय हस्तशिल्प और ज्ञान परंपरा वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान रखती है यह यात्रा केवल कूटनीतिक बैठकें या औपचारिक चर्चाओं तक सीमित नहीं रही बल्कि इसने भारत की सांस्कृतिक शक्ति और वैश्विक संबंधों में उसकी बढ़ती भूमिका को भी मजबूती से सामने रखा

  • G20 से ग्लोबल साउथ तक भारत की नई पहचान, वैश्विक मंचों पर बढ़ा कूटनीतिक प्रभाव

    G20 से ग्लोबल साउथ तक भारत की नई पहचान, वैश्विक मंचों पर बढ़ा कूटनीतिक प्रभाव


    नई द‍िल्‍ली । बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत तेजी से एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक शक्ति के रूप में उभर रहा है जहां वह न केवल अपनी आर्थिक और सामरिक स्थिति को मजबूत कर रहा है बल्कि वैश्विक एजेंडा तय करने में भी निर्णायक भूमिका निभा रहा है पिछले कुछ वर्षों में भारत ने खुद को एक एजेंडा सेटर और ब्रिज बिल्डर के रूप में स्थापित किया है जो विकसित और विकासशील देशों के बीच सेतु का कार्य कर रहा है

    एक दशक पहले तक भारत को मुख्य रूप से एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जाता था लेकिन आज यह स्थिति बदल चुकी है भारत अब उन देशों में शामिल है जो वैश्विक मंचों पर विचारों को दिशा देने और अंतरराष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने इस बदलाव को स्पष्ट रूप से दुनिया के सामने रखा

    वर्ष 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में देखी जाती है जहां भारत ने वन अर्थ वन फैमिली वन फ्यूचर के विचार के जरिए वैश्विक एकता का संदेश दिया इस दौरान अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाए जाने जैसे निर्णय ने भारत की समावेशी कूटनीति को मजबूत किया साथ ही वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ जैसी पहल ने 125 से अधिक विकासशील देशों की चिंताओं को वैश्विक मंच तक पहुंचाने का काम किया जिससे भारत की नेतृत्व क्षमता और भी स्पष्ट हुई

    भारत ने BRICS और SCO जैसे मंचों पर भी सक्रिय और संतुलित भूमिका निभाई है BRICS में भारत ने विस्तार प्रक्रिया पर पारदर्शिता और संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया है वहीं स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के विचार को आगे बढ़ाया है यह रुख भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति को दर्शाता है जो किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं बल्कि सभी के साथ संतुलन बनाने की कोशिश करता है

    SCO में भारत का फोकस मुख्य रूप से आतंकवाद विरोधी सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता पर रहा है यहां भारत मध्य एशिया तक अपनी पहुंच को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है वहीं QUAD के माध्यम से भारत अमेरिका जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हिंद प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा तकनीक सप्लाई चेन और सेमीकंडक्टर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहा है इस तरह भारत दो अलग अलग वैश्विक मंचों पर अपनी उपस्थिति के जरिए संतुलनकारी भूमिका निभा रहा है

    भारत की जलवायु और ऊर्जा कूटनीति भी उसकी वैश्विक छवि को नया आयाम दे रही है मिशन लाइफ ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन और नवीकरणीय ऊर्जा पर भारत का फोकस यह दिखाता है कि देश केवल चर्चा तक सीमित नहीं है बल्कि समाधान देने वाले देशों में शामिल हो चुका है

    इसके अलावा वैश्विक संकटों के समय भारत की सक्रिय भूमिका ने उसकी विश्वसनीयता को और मजबूत किया है कोविड महामारी के दौरान वैक्सीन कूटनीति ऑपरेशन गंगा ऑपरेशन कावेरी और ऑपरेशन अजय जैसे अभियानों ने यह साबित किया कि भारत न केवल अपने नागरिकों की बल्कि विदेशों में फंसे अन्य देशों के नागरिकों की भी सहायता करने में सक्षम है

    इन सभी प्रयासों ने मिलकर भारत को वैश्विक मंचों पर एक जिम्मेदार और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित किया है आज का भारत केवल एक सहभागी देश नहीं बल्कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय योगदान देने वाला प्रमुख राष्ट्र बन चुका है आने वाले समय में इसकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने की संभावना है क्योंकि वैश्विक व्यवस्था तेजी से बहुध्रुवीय होती जा रही है और भारत उसमें एक मजबूत स्तंभ के रूप में अपनी जगह बना रहा है

  • रोम दौरे के बाद बदलता वैश्विक समीकरण, चीन की बेचैनी और पाकिस्तान की चिंता बढ़ी, IMEC बना नया कूटनीतिक हथियार

    रोम दौरे के बाद बदलता वैश्विक समीकरण, चीन की बेचैनी और पाकिस्तान की चिंता बढ़ी, IMEC बना नया कूटनीतिक हथियार

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया रोम यात्रा को वैश्विक कूटनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। इस दौरे के दौरान भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय भागीदारी और विशेष रूप से India–Middle East–Europe Economic Corridor (IMEC) को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। इस रणनीतिक पहल को लेकर चीन और पाकिस्तान दोनों की प्रतिक्रिया सुर्खियों में है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और कनेक्टिविटी नेटवर्क का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। रोम में हुए कूटनीतिक संवाद और यूरोपीय देशों के साथ बढ़ती साझेदारी ने इस संदेश को और मजबूत किया है कि भारत अब यूरोप और पश्चिम एशिया के साथ अपने आर्थिक रिश्तों को नए स्तर पर ले जाना चाहता है।

    चीन की चिंता का मुख्य कारण IMEC को माना जा रहा है, जिसे कई विश्लेषक चीन के बहुचर्चित Belt and Road Initiative (BRI) के विकल्प या चुनौती के रूप में देखते हैं। यह प्रस्तावित कॉरिडोर भारत से शुरू होकर मध्य पूर्व के देशों से होते हुए यूरोप तक एक नया व्यापारिक मार्ग विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। चीन को आशंका है कि यह नया नेटवर्क उसके मौजूदा वैश्विक व्यापार प्रभाव को कमजोर कर सकता है।

    इसके साथ ही, इटली जैसे यूरोपीय देशों की बढ़ती रुचि ने भी बीजिंग की रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है। पहले जो देश चीन के साथ आर्थिक परियोजनाओं में जुड़े थे, वे अब भारत के साथ सहयोग की संभावनाओं को अधिक गंभीरता से देखने लगे हैं। यही बदलाव चीन की कूटनीतिक रणनीति के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।

    दूसरी ओर, पाकिस्तान की चिंता का कारण भी यही कॉरिडोर है। पाकिस्तान लंबे समय से अपनी भौगोलिक स्थिति को क्षेत्रीय व्यापार में एक महत्वपूर्ण संपत्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, लेकिन IMEC के आने से यह समीकरण बदलते दिख रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह नया मार्ग सफल होता है तो पाकिस्तान की पारंपरिक ट्रांजिट भूमिका प्रभावित हो सकती है।

    पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक दबाव और कर्ज संकट का सामना कर रहा है, और ऐसे में वैश्विक व्यापार मार्गों में बदलाव उसकी रणनीतिक स्थिति को और कमजोर कर सकता है। यही वजह है कि वहां की राजनीतिक और आर्थिक चर्चाओं में भारत की विदेश नीति और IMEC का प्रभाव लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।

    हालांकि, चीन की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि किसी भी नए कॉरिडोर को प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग के रूप में देखा जाना चाहिए, लेकिन रणनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि वैश्विक व्यापार मार्गों में यह बदलाव आने वाले वर्षों में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

  • ट्रंप-शी की नजदीकी से भारत की बढ़ी टेंशन! सुरक्षा से व्यापार तक बदल सकते हैं एशिया के समीकरण

    ट्रंप-शी की नजदीकी से भारत की बढ़ी टेंशन! सुरक्षा से व्यापार तक बदल सकते हैं एशिया के समीकरण



    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हालिया मुलाकात ने भारत की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा दिया है। 13 से 15 मई तक बीजिंग में हुई इस बैठक को वैश्विक राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अगर अमेरिका और चीन के रिश्तों में नरमी आती है तो इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय प्रभाव पर पड़ सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो दशकों में भारत ने अमेरिका-चीन तनाव के बीच खुद को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक मजबूत साझेदार के रूप में स्थापित किया था। लेकिन अगर वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच समझौते बढ़ते हैं तो अमेरिका के लिए भारत की रणनीतिक अहमियत कम हो सकती है। इससे रक्षा सहयोग, खुफिया साझेदारी और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर असर पड़ने की आशंका है।

    व्यापार के मोर्चे पर भी भारत के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है। हाल के वर्षों में कई वैश्विक कंपनियां चीन से बाहर निकलकर भारत में निवेश कर रही थीं, लेकिन अगर अमेरिका चीन पर लगाए गए टैरिफ और तकनीकी प्रतिबंधों में ढील देता है तो निवेश दोबारा चीन की ओर लौट सकता है। इससे भारत के “चीन प्लस वन” रणनीति के तहत मिले फायदे कमजोर पड़ सकते हैं।

    चीन-पाकिस्तान गठजोड़ भी भारत की चिंता का बड़ा कारण है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर अमेरिका चीन के साथ रिश्ते सुधारने की दिशा में आगे बढ़ता है तो पाकिस्तान में चीन की बढ़ती गतिविधियों पर उसका दबाव कम हो सकता है। इससे चीन खुलकर पाकिस्तान का समर्थन कर सकता है, जिसका असर कश्मीर और सीमा सुरक्षा से जुड़े मामलों पर दिखाई दे सकता है।

    पश्चिम एशिया और ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर भी भारत सतर्क नजर आ रहा है। भारत की बड़ी तेल जरूरतें होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर हैं। अगर अमेरिका और चीन ईरान और खाड़ी क्षेत्र को लेकर किसी नई रणनीति पर साथ आते हैं तो भारत की भूमिका सीमित हो सकती है। इससे क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप-शी मुलाकात केवल दो देशों की कूटनीतिक बैठक नहीं है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की शक्ति संतुलन पर पड़ेगा। भारत के लिए यह संकेत है कि आने वाले समय में उसे अपनी विदेश नीति, आर्थिक रणनीति और सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करना होगा, ताकि बदलते वैश्विक समीकरणों में उसका प्रभाव कायम रह सके।

  • दिल्ली BRICS समिट में ईरान पर फूटा मतभेद, बिना संयुक्त बयान खत्म हुई विदेश मंत्रियों की बैठक

    दिल्ली BRICS समिट में ईरान पर फूटा मतभेद, बिना संयुक्त बयान खत्म हुई विदेश मंत्रियों की बैठक

    नई दिल्ली। BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की दिल्ली में हुई अहम बैठक ईरान मुद्दे पर गहरे मतभेदों के बीच बिना संयुक्त बयान के खत्म हो गई। समिट में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव, पश्चिम एशिया की स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही जैसे मुद्दों पर तीखी चर्चा हुई, लेकिन सदस्य देशों के बीच आम सहमति नहीं बन सकी।

    सूत्रों के मुताबिक, ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने BRICS देशों से मांग की कि संयुक्त बयान में ईरान पर हुए हमलों की स्पष्ट निंदा की जाए। उन्होंने अमेरिका और इजरायल पर अंतरराष्ट्रीय कानून तोड़ने का आरोप लगाया और BRICS से खुला समर्थन मांगा। हालांकि भारत समेत कई सदस्य देशों ने इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाने की जरूरत बताई।

    बैठक में मौजूद देशों का मानना था कि पश्चिम एशिया के हालात बेहद संवेदनशील हैं और किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से कूटनीतिक संतुलन बिगड़ सकता है। इसी कारण साझा बयान पर सहमति नहीं बन पाई और अंत में केवल एक “Outcome Statement” जारी किया गया।

    हालांकि ईरान के मुद्दे पर मतभेद सामने आए, लेकिन करीब 60 अहम एजेंडों पर सभी देशों ने एक जैसी राय रखी। इनमें ऊर्जा सहयोग, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यापार, क्लाइमेट एक्शन, वित्तीय कनेक्टिविटी और वैश्विक आर्थिक सहयोग जैसे विषय शामिल रहे।

    समिट के दौरान S. Jaishankar ने अपने संबोधन में समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों को हर हाल में खुला रखा जाना चाहिए, क्योंकि इन मार्गों पर रुकावट का असर पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

    समिट से इतर जयशंकर और अराघची के बीच अलग से द्विपक्षीय बैठक भी हुई। दोनों नेताओं ने ईरान-इजरायल तनाव, क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की। भारत ने साफ किया कि वह बातचीत और कूटनीति के जरिए तनाव कम करने के पक्ष में है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि BRICS मंच पर ईरान मुद्दे पर खुलकर मतभेद सामने आना इस बात का संकेत है कि संगठन के भीतर भी भू-राजनीतिक चुनौतियां बढ़ रही हैं। इसके बावजूद आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के कई मुद्दों पर सदस्य देशों की एकजुटता कायम दिखाई दी।

  • वैश्विक राजनीति का केंद्र बना भारत: ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में सहयोग और सुधार पर गहन चर्चा की तैयारी

    वैश्विक राजनीति का केंद्र बना भारत: ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में सहयोग और सुधार पर गहन चर्चा की तैयारी

    नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक महत्वपूर्ण दृश्य उस समय देखने को मिला जब ब्रिक्स सदस्य देशों और साझेदार देशों के विदेश मंत्री तथा वरिष्ठ राजनयिक उच्चस्तरीय बैठक के लिए भारत मंडपम पहुंचे। इस अवसर पर भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक ने वैश्विक सहयोग और कूटनीतिक संवाद को एक नई दिशा देने की शुरुआत की है।

    विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने बैठक स्थल पर पहुंचने वाले सभी प्रतिनिधियों का गर्मजोशी से स्वागत किया। विभिन्न देशों के शीर्ष कूटनीतिज्ञों की उपस्थिति ने इस आयोजन को वैश्विक स्तर पर विशेष महत्व प्रदान किया है। बैठक में ईरान, रूस, इंडोनेशिया सहित कई देशों के विदेश मंत्री और वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल हुए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ब्रिक्स मंच आज वैश्विक राजनीति में एक मजबूत संवाद का केंद्र बन चुका है।

    इस उच्चस्तरीय बैठक के दौरान सभी प्रतिनिधियों का एक आधिकारिक समूह फोटो भी लिया गया, जो इस आयोजन की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक माना गया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे हैं और भारत की भूमिका इस वर्ष ब्रिक्स के एजेंडा को दिशा देने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    बैठक का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आपसी सहयोग को मजबूत करना और वैश्विक तथा क्षेत्रीय मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करना है। बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बीच यह मंच आर्थिक सहयोग, सुरक्षा चुनौतियों और वैश्विक शासन प्रणाली में आवश्यक सुधारों पर चर्चा का अवसर प्रदान कर रहा है।

    कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में उभरती हुई भू-राजनीतिक वास्तविकताओं पर भी विस्तृत विचार-विमर्श होने की संभावना है। सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दों पर भी संवाद को आगे बढ़ाने की तैयारी है। इस तरह की चर्चाएं न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को मजबूत करती हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर संतुलित विकास की दिशा में भी योगदान देती हैं।

    बैठक के दौरान यह भी अपेक्षा की जा रही है कि सभी प्रतिनिधि आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के एजेंडा को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह शिखर सम्मेलन आने वाले समय में वैश्विक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा तय करने में अहम साबित हो सकता है।

    भारत के लिए यह आयोजन कूटनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे देश की वैश्विक मंच पर भूमिका और अधिक सशक्त होती दिखाई दे रही है। नई दिल्ली में हो रही यह बैठक न केवल ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को मजबूत कर रही है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भारत की बढ़ती भागीदारी को भी दर्शा रही है।

  • ऊर्जा संकट के बीच PM मोदी का बड़ा कूटनीतिक मिशन: 5 देशों का दौरा, UAE से होगी शुरुआत

    ऊर्जा संकट के बीच PM मोदी का बड़ा कूटनीतिक मिशन: 5 देशों का दौरा, UAE से होगी शुरुआत



    नई दिल्ली।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 मई से 20 मई तक एक महत्वपूर्ण विदेश दौरे पर जा रहे हैं, जिसमें वे कुल 5 देशों UAE, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का दौरा करेंगे। यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम एशिया में ईरान संकट और होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ा तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार और आपूर्ति श्रृंखला पर असर डाल रहा है, ऐसे में इस यात्रा को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है।

    दौरे की शुरुआत 15 मई को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से होगी, जहां प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात करेंगे। इस बैठक में ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और भारत-UAE व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर चर्चा होगी। UAE भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और वहां लगभग 45 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो दोनों देशों के रिश्तों को और गहरा बनाते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा वैश्विक हालात में होर्मुज स्ट्रेट के आसपास बढ़ते तनाव और तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के बीच यह दौरा भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए पश्चिम एशिया में स्थिरता उसके लिए रणनीतिक प्राथमिकता है।

    इसके बाद प्रधानमंत्री 15 से 17 मई तक नीदरलैंड में रहेंगे, जहां वे प्रधानमंत्री रॉब जेटन, किंग विलेम-अलेक्जेंडर और क्वीन मैक्सिमा से मुलाकात करेंगे। इस दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा, सुरक्षा, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और जल प्रबंधन जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी।

    17 और 18 मई को प्रधानमंत्री मोदी स्वीडन का दौरा करेंगे, जहां तकनीक, नवाचार और ग्रीन एनर्जी पर बातचीत होने की संभावना है। इसके बाद 18 से 19 मई को वे नॉर्वे जाएंगे। नॉर्वे के ओस्लो में 19 मई को तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें ग्रीन ट्रांजिशन, ब्लू इकोनॉमी, रक्षा, अंतरिक्ष और नई तकनीक जैसे मुद्दों पर विचार-विमर्श होगा।

    दौरे के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री 19 से 20 मई तक इटली में रहेंगे। यहां वे प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और राष्ट्रपति सर्जियो मातारेला से मुलाकात करेंगे। इस दौरान भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट, रक्षा सहयोग और स्वच्छ ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।

    कुल मिलाकर यह 5 देशों का दौरा भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक साझेदारी को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब दुनिया भू-राजनीतिक और ऊर्जा संकट के दौर से गुजर रही है।

  • तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की एंट्री से बढ़ी हलचल, बांग्लादेश-चीन की नजदीकी पर भारत की पैनी नजर

    तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की एंट्री से बढ़ी हलचल, बांग्लादेश-चीन की नजदीकी पर भारत की पैनी नजर



    नई दिल्ली। बांग्लादेश की नई सरकार ने तीस्ता नदी प्रबंधन और पुनर्स्थापन परियोजना के लिए चीन से औपचारिक सहयोग मांगा है, जिससे दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। यह कदम भारत-बांग्लादेश संबंधों और क्षेत्रीय संतुलन पर असर डाल सकता है।

    बीजिंग में हुई अहम बैठक
    बुधवार को बीजिंग में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खालिलुर रहमान और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई बैठक में तीस्ता रिवर कॉम्प्रिहेंसिव मैनेजमेंट एंड रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट (TRCMRP) पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग, इंफ्रास्ट्रक्चर और रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने पर सहमति जताई।

    चीन ने जताई निवेश में रुचि
    चीन ने कहा कि वह बांग्लादेश की विकास योजनाओं को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के साथ जोड़ने को तैयार है। साथ ही चीनी कंपनियों को बांग्लादेश में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने की बात भी कही गई।चीनी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि उसका सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है और न ही इसे किसी अन्य देश से प्रभावित होना चाहिए।

    तीस्ता नदी क्यों है अहम?
    तीस्ता नदी सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है और वहां लाखों लोगों की सिंचाई और जीवन का मुख्य आधार है। इसी कारण यह परियोजना भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती है, खासकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए।

    भारत की रणनीतिक चिंता
    भारत ने हाल के वर्षों में बांग्लादेश के साथ जल प्रबंधन सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है और 2024 में तीस्ता बेसिन के लिए तकनीकी सहायता का प्रस्ताव भी दिया था। चीन की बढ़ती मौजूदगी से क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    ढाका की कूटनीतिक संतुलन नीति
    नई बांग्लादेश सरकार चीन के साथ संबंध मजबूत कर रही है, जबकि साथ ही भारत के साथ भी संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रही है। इससे ढाका एक बहु-ध्रुवीय कूटनीतिक रणनीति अपनाता दिख रहा है।

    चीन-बांग्लादेश आर्थिक साझेदारी
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन अब बांग्लादेश का चौथा सबसे बड़ा कर्जदाता बन चुका है और 1975 से अब तक करीब 7.5 अरब डॉलर का निवेश और ऋण दे चुका है।

    तीस्ता प्रोजेक्ट में चीन की एंट्री ने दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को और जटिल बना दिया है। जहां बांग्लादेश विकास और निवेश के नए रास्ते तलाश रहा है, वहीं भारत अपनी रणनीतिक सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर सतर्क नजर बनाए हुए है।